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Saturday, July 23, 2011

तिलक और आजाद ------ विजय राजबली माथुर

बाल गंगा धर 'तिलक'और पं.चंद्रशेखर आजाद की जयन्ति २३ जूलाई पर श्र्द्धा -सुमन  


बाल गंगा धर 'तिलक 'का जन्म २३ जूलाई १८५६ ई.को रत्नागिरी (महाराष्ट्र)में हुआ था.१८९० में वह कांग्रेस में शामिल हुए.१८९६-९७ में महाराष्ट्र में प्लेग फैला तो उन्होंने राहत कार्यों को सुचारू रूप से संचालित किया.अरविन्द घोष के छोटे भाई बरेंद्र कुमार घोष एवं स्वामी  विवेकानंद(जिन्हें आर.एस.एस.जबरिया अपने बैनर पर घसीटता है) के भाई भूपेन्द्र नाथ दत्त 'युगांतर'तथा 'संध्या'नामक शक्तिशाली समाचार-पत्रों के माध्यम से 'क्रान्ति'का सन्देश फैला रहे थे.बंगाल के अरविन्द घोष और विपिन चन्द्र पाल तथा पूना के लोकमान्य तिलक कांग्रेस में 'बाम-पंथी'(लेफ्ट विंग)के नेता माने जाते थे.बम्बई के फीरोज शाह मेहता और पूना के जी.के.गोखले एवं बंगाल के एस.एन.बनर्जी  दक्षिण -पंथी (राईट विंग)के माने जाते थे.पंजाब के लाला लाजपत राय मध्यम मार्गी नेता थे.१९०६ में दादा भाई नौरोजी के कुशल नेत्रित्व के कारण कांग्रेस ने स्व-राज्य का ध्येय अपना लिया और स्व-देशी के प्रचार का प्रस्ताव भी पास किया.

१९०७ में सूरत अधिवेंशन में लाल-बाल-पाल जैसे कर्मठ नेता कांग्रेस से अलग होकर आजादी की लड़ाई में जुट गए.इन परिस्थितियों में ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार ने उदार कांग्रेसियों,मुस्लिमों जागीरदारों,धनवानों के प्रति नरम रुख रख कर उग्र -दल के नेताओं का निर्मम दमन-चक्र चलाया.

१९०७ में बंगाल के गवर्नर की रेल गाडी पर बम फेंका गया और ढाका के जिलाधीश की हत्या का असफल प्रयास हुआ.१९०८ में कलकत्ता के प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट पर गोली चलाई गयी.इस सम्बन्ध में खुदी राम बोस को फांसी की सजा दी गयी. इन बम कांडों पर १९०८ में 'केसरी' में तिलक ने लिखा था कि,"बम जनता के राजनीतिक तापक्रम का थर्मा मीटर है."एक दुसरे लेख में उन्होंने लिखा-"बंगालियों के बम समाज के लिए राजद्रोहात्मक न थे,वरन उनके मूल में देश-भक्ति की अत्यधिक भावना थी".ऐसे ही लेखों के लिए उन्हें छः वर्षों के लिए 'मांडला'(बर्मा)में कैद करके रखा गया.१९१४ में छूटने  के बाद वह पुनः आजादी के कार्य में जुट गए.

१९१५ में फीरोजशाह मेहता और गोपाल कृष्ण गोखले की मृत्यु हो गई अतः तिलक आदि १९१६ में  पुनः कांग्रेस में लौट आये .तिलक और एनी बेसेंट ने मिल कर १९१६ में 'होम रूल लीग'बना कर स्वदेशी आन्दोलन को और धार दी.१९१६ में लखनऊ में संपन्न हुए कांग्रेस अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने भी संयुक्त रूप से भाग लिया और इसका श्रेय पूरी तौर पर तिलक को है.(यह बेहद गौर करने की बात है जिन तिलक को आर.एस.एस.हिंदूवादी घोषित करते नहीं थकताऔर जनता को गुमराह करता रहता है  वही बाल गंगा धर तिलक मुस्लिम लीग को कांग्रेस के मंच पर लाने और आजादी के लिए संयुक्त संघर्ष हेतु राजी करने में सफल रहे थे,वस्तुतः तिलक बामपंथी -राष्ट्र भक्त थे).

अगस्त १९२० में तिलक का निधन होने से बाम-पंथी आन्दोलन अनाथ हो गया .


चंद्र शेखर आज़ाद 

बाल गंगाधर तिलक के जन्म के ५० वर्ष बाद २३ जूलाई १९०६ को पं.सीता राम तिवारी और माता जगरानी देवी के पुत्र के रूप में क्रांतिकारी चंद्रशेखर 'आजाद ' का जन्म हुआ.इनके पिता मूल रूप से कानपूर जिले के राउत मरा बानपुर के निकट भाँती ग्राम निवासी कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे.यह अपने माता -पिता की पांचवीं एवं अंतिम तथा एकमात्र जीवित संतान थे.इन्होने ईमानदारी तथा स्वाभिमान पिता से सीखा था.

१३ अप्रैल १९१९ को हुए जलियाँ वाला बाग़ नर-संहार ने  इन्हें व्यथित कर दिया था.१९२१ में गांधी जी के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने पर इन्हें १५ बेंतों की सजा मिली थी जिसे गांधी जी की जयकारे के साथ इन्होने भुगता.मरहम -पट्टी के लिए इन्हें तीन आने मिले जिन्हें जेलर के ऊपर फेंक कर इन्होने अपने दोस्त डा. से मरहम-पट्टी कराई.

फरवरी १९२२ में चौरी-चौरा के आधार पर गांधी जी के आन्दोलन वापिस लेने पर यह १९२३ में 'हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी'में सम्मिलित हो गए.क्रांतिकारी कार्यों हेतु धन-संग्रह के उद्देश्य से लखनऊ के 'काकोरी'स्टेशन पर इनके नेत्रित्व में गार्ड के डिब्बे से ०९ अगस्त १९२५ ई.को  सरकारी खजाना हस्तगत कर लिया गया.हालांकि अशफाक उल्ला खान ने पहले ही चेतावनी दे दी थी कि,ऐसा करने पर प्रशासन  उनके दल को जड़ से उखाड़ देगा और उनकी यह भविष्य वाणी सत्य हुई.

१७ तथा १९ दिसंबर १९२७ को राम प्रसाद 'बिस्मिल',अशफाक उल्ला खान ,रोशन सिंह तथा राजेन्द्र लाहिड़ी को फांसी दे दी गई.अब चंद्रशेखर 'आजाद'ने सरदार भगत सिंह के साथ मिल कर दल का पुनर्गठन करके 'सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन' नामकरण कर दिया.पं.जवाहर लाल नेहरू ने 'स्वराज भवन'में आजाद के दल के सदस्यों को रूस में प्रशिक्षण हेतु रु.१०००/-दिए थे जिनमें से बचे हुए रु.४४८/-उनके वस्त्रों से शहादत के समय प्राप्त हुए थे.

भगत सिंह और साथियों द्वारा नेशनल असेम्बली में बम फेंक कर गिरफ्तार होने से वह अकेले पड़ गए थे.इलाहाबाद में ०६ फरवरी १९२७ को मोती लाल नेहरू की शव यात्रा में उन्होंने गुप्त रूप से भाग लिया था और ब्रिटिश पुलिस उन्हें पकड़ न सकी थी.यह छिपते-छिपाते अंग्रेजों के छक्के छुडाते रहे.किन्तु जब साथियों को रूस भेजने की योजना पर विचार करने हेतु सुखदेव से २७ फरवरी १९३१ को अल्फ्रेड पार्क ,इलाहाबाद में वह चर्चा कर रहे थे तो मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने पार्क को चारों और से घेर लिया.अकेले ही पिस्तौल से संघर्ष करते रहे और जब आख़िरी गोली बची तब उसे अपने सीने में उतार कर 'आजाद'ही रहते हुए प्राणोत्सर्ग कर दिया.परन्तु शत्रु ब्रिटिश साम्राज्यवाद उन्हें गुलाम न बना सका.

हिन्दुस्तान,लखनऊ के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित प्रबुद्ध पाठकों के विचारों का अवलोकन करें तो आज के तथा-कथित नेताओं के प्रति वितृष्णा होती है.वस्तुतः ये लोग जन-नेता नहीं हैं बल्कि स्वयंभू नेता हैं और वस्तुतः आधुनिक साम्राज्यवादियों के एजेंट हैं.क्या  इन्हीं की मौज मस्ती के लिए 'तिलक','आजाद' सरीखे जन-नायकों ने अपने प्राणों की आहुति दी थी.कदापि नहीं उनका ध्येय कोटि-कोटि जनता की आर्थिक और राजनीतिक आजादी था.आज अपने इन दो महान नेताओं के जन्म दिन पर नमन,स्मरण,आदि औपचारिक संबोधनों का परित्याग करते हुए हम सब क्या  यह संकल्प ले सकते हैं कि ,भारत माँ के इन वीर सपूतों की इच्छा को अब साकार करेंगे?

हिंदुस्तान-लखनऊ-22/07/2011 
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