Friday, July 19, 2019

बैंक,सार्वजनिक कम्पनियां, स्कूल , कॉलेज , यूनिवर्सिटियां बिकेंगी ------ हेमंत कुमार झा

Hemant Kumar Jha
55 mins (19-07-2019 )
वे अपने राजनीतिक इतिहास के सबसे खुशनुमा दौर से गुजर रहे हैं। अपेक्षाओं से भी अधिक जनसमर्थन मिला है उन्हें। केंद्र के साथ ही अधिकतर राज्यों में उन्हीं की सरकारें हैं। फिर...वे इतने हलकान क्यों हैं? न्यूनतम राजनीतिक शुचिता और लोकलाज को भी ताक पर रख वे क्यों खुला खेल फर्रुखाबादी खेलने में लगे हैं?

आखिर क्यों...?

क्या ये कुछ और राज्यों में महज सत्ता हासिल करने के लिये है?

उन्हें क्या हासिल हो जाएगा अगर वे तमाम राजनीतिक नैतिकताओं को दरकिनार कर कर्नाटक में भी अपनी सरकार बना लें? या...भविष्य में इसी खेल के सहारे मध्य प्रदेश या राजस्थान में?

दरअसल, इसे सिर्फ भाजपा की राजनीति से जोड़ना इस खेल के बृहत्तर उद्देश्यों को समझने में चूक करना है। भाजपा नामक राजनीतिक दल को ऐसे फूहड़ और अनैतिक कृत्यों से तात्कालिक तौर पर जो कुछ लाभ हो जाए, दीर्घकालिक तौर पर नुकसान ही है। आखिर...खुद को "पार्टी विद डिफरेंस" कहते हुए ही इसने जनता के दिलों में अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश की थी।

भाजपा को जब इतिहास से साक्षात्कार करना होगा तो आज की उसकी राजनीतिक दुरभिसन्धियों और अनैतिकताओं पर उसे जवाब देते नहीं बनेगा।

लेकिन, बात भाजपा की नहीं रह गई है। पार्टी तो नेपथ्य में चली गई है और उसके पारंपरिक थिंक टैंक सदस्य 'साइलेंट मोड' में हैं या अप्रासंगिक बना दिये गए हैं।

जो प्रभावी भूमिका में हैं उनके उद्देश्य कुछ और हैं। इन उद्देश्यों तक पहुंचने के लिये साधनों की शुचिता का उनके लिये कोई मतलब नहीं। क्योंकि...उनके उद्देश्य भी शुचिता के धरातल पर कहीं नहीं ठहरते।

वे और ताकतवर...और ताकतवर होना चाहते हैं। जितने राज्यों में उनकी सरकारें होंगी, उनकी ताकत उतनी बढ़ेगी। इसके लिये लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की प्रतीक्षा करने का धैर्य उनमें नहीं।

वे कैसे धैर्य रख सकते हैं? वे जानते हैं कि पार्टी कल भी रहेगी, परसों भी रह सकती है, लेकिन वे कल नहीं रहेंगे।

जो करना है अभी करना है।

भारत को दुनिया की सर्वाधिक मुक्त अर्थव्यवस्था बनाना है। वक्त कम है, उद्देश्य बड़ा है। इसके लिये अधिक से अधिक ताकतवर बनना है, चाहे जैसे भी हो।

लोकतंत्र में ताकत की परिभाषा संख्याबल से निर्धारित होती है तो...हम चुनाव से ही नहीं, थैली खोल कर भी संख्या बल बढाएंगे। धमकियों से, षड्यंत्रों से, पैसों से...जब जहां जो प्रभावी हो जाए।

कौन है वे लोग जो इनके लिये थैलियां खोल कर बैठे हैं?

वही...जिन्हें सरकारी संपत्ति खरीदनी है।

प्रतीक्षा कीजिये...वे सब खरीद लेंगे, ये सब बेच देंगे।

संविधान के अनेक प्रावधानों को बदलने में विधान सभाओं की भी भूमिकाएं होती हैं, राज्यसभा में संख्या बल बढाने के लिये विधान सभाओं में मजबूत होना जरूरी है।

तो...चाहे जिस रास्ते हो, वे विधानसभाओं को एक-एक कर अपने नियंत्रण में लेते जा रहे हैं।

असीमित शक्ति...एक डरावना सच। यह लोकतंत्र नहीं है।

नहीं, उनकी छाया में लम्पटों के कुछ समूह शोर चाहे जितना करें उत्पात चाहे जितना मचाएं, उन्हें हिदुत्व आदि से कोई लेना देना नहीं। चुनाव जीतने के लिये हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, पाकिस्तान आदि थे। चुनाव खत्म...अब ये मुद्दे उनके एजेंडा में नहीं।

बस...आर्थिक उद्देश्य हैं उनके। देश को कारपोरेट राज के हवाले करना है उन्हें।

कोई और भी आता तो कारपोरेट शक्तियों के आगे दुम ही हिलाता। लेकिन, इनकी बात ही अलग है। इनमें दुर्धर्ष साहस है, अनहद बेशर्मी है, झूठ को सच और सच को झूठ बना कर जनता को भ्रमित कर देने का असीमित कौशल है।

इसलिये...ये कारपोरेट को बहुत प्यारे हैं। इसलिये, विधायको, सांसदों की खरीद-फरोख्त के लिये थैलियां खुली हैं, बोलियां लग रही हैं। आज कर्नाटक, कल बंगाल, परसों मध्यप्रदेश, फिर राजस्थान...फिर और कहीं।

अच्छा है। इनके राज में मीडिया ने दिखा दिया कि वह कितना गिर सकता है, अनेक संवैधानिक शक्तियों ने दिखा दिया कि वे कितने पालतू हो सकते हैं और...नेता लोग भी दिखा रहे हैं कि बाजार के आलू-बैंगन और उनमें कितना फर्क रह गया है।
इस दौर के अनैतिक खोखलेपन को उजागर करने के लिये इनका राज याद किया जाएगा।

खुली थैलियों के आगे कौन कितनी देर ठहर सकता है? कसौटी पर है भारतीय राजनीति, समाज, संवैधानिक प्रतिमान।

कारपोरेट उत्साह में है। थैलियों का मुंह खुला है।

क्योंकि...दांव पर बहुत कुछ है।

भूल जाइये कि रेल मंत्री ने संसद में कहा कि रेल का निजीकरण नहीं करेंगे। ये सब तो...बातें हैं बातों का क्या।स्कूल बिकेंगे, कॉलेज बिकेंगे, यूनिवर्सिटियां बिकेंगीस्कूल बिकेंगे, कॉलेज बिकेंगे, यूनिवर्सिटियां बिकेंगी

बैंक बिकेंगे, सार्वजनिक क्षेत्र की तमाम कम्पनियां बिकेंगी। नई शिक्षा नीति आ रही है। देखते जाइये...स्कूल बिकेंगे, कॉलेज बिकेंगे, यूनिवर्सिटियां बिकेंगी। देश के बेशकीमती संसाधन औने-पौने दामों पर बिकेंगे। आप रामधुन गाते रहिये। टीवी स्क्रीन पर बिके हुए बेगैरत एंकरों को हिन्दू-मुसलमान, भारत-पाकिस्तान आदि पर डिबेट करते-कराते देखते रहिये।

आपकी आंखों के सामने देश का आर्थिक स्वत्व छीना जा रहा है। हम सबको कारपोरेट का गुलाम बनाने की कवायद जोर-शोर से जारी है।

रेलवे कारपोरेट के निशाने पर है। इसकी नसों में जहर का इंजेक्शन दिया जा रहा है। धीरे-धीरे खुद ब खुद भरभरा कर गिर जाएगा यह और...संभालने के लिये कारपोरेट की शक्तियां आ जाएंगी।

कौन सी कम्पनी वास्तविक तौर पर कितने की थी, कितने में बिकी...कौन जान सकता है? वे जो बताएंगे, हम वही सुनेंगे।

वे अपने अभियान पर हैं। वे न थक रहे, न रुक रहे। उनके उद्देश्य नितांत जनविरोधी हैं, लेकिन उनके अथक प्रयत्नों की तारीफ तो बनती ही है। खास कर तब...जब विपक्ष के तमाम कर्णधार शीतनिद्रा में हों।











 ~विजय राजबली माथुर ©

Wednesday, June 26, 2019

कहानी 26 जून 1975 : एमर्जेंसी की ------ विजय राजबली माथुर





Friday, June 26, 2015
एमर्जेंसी 26 जून 1975 की --- विजय राजबली माथुर
इस वर्ष 1975 में लगी एमर्जेंसी को 44  वर्ष हो गए हैं और काफी दिनों से लोग इस पर बहुत कुछ लिखते रहे हैं। 1971 के मध्यावधी चुनाव को बांग्ला देश निर्माण की पृष्ठ भूमि में इंदिरा कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत से जीत तो लिया था किन्तु रायबरेली में उनके प्रतिद्वंदी रहे चौगटा मोर्चा के राजनारायण सिंह ने मोरारजी देसाई के समर्थन से उत्तर प्रदेश उच्च न्यायालय, इलाहाबाद में उनके चुनाव को रद्द करने के लिए एक याचिका दायर कर दी थी।मेरे कार्यस्थल के एक साथी मेरठ कालेज , मेरठ से ला कर रहे थे उनके शिक्षक सिन्हा साहब के एक रिश्तेदार जगमोहन लाल सिन्हा साहब उस याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। उन शिक्षक महोदय ने अपने छात्रों से कह दिया था कि निर्णय इन्दिरा जी के विरुद्ध भी जा सकता है। उन्होने उदाहरण स्वरूप चौधरी चरण सिंह संबंधी घटना का वर्णन किया था जिसमें उनके किसी चहेते का केस जस्टिस सिन्हा के पास मेरठ में चल रहा था और वह निर्णय उसके पक्ष में चाहते थे। मुख्यमंत्री रहते हुये चरण सिंह उनसे मिलने उनकी कोठी पर जब पहुंचे तो जस्टिस सिन्हा साहब ने अर्दली से पुछवाया कि चौधरी चरण सिंह मिलना चाहते हैं या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जिसके जवाब में चौधरी साहब ने कहलवाया था कि जज साहब से कह दो कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह मिलने आए हैं। जस्टिस सिन्हा ने चौधरी साहब को मिलने से इंकार कर दिया था और बाद में निर्णय भी उनके परिचित के विरुद्ध देते हुये डरे नहीं थे। इसलिए 12 जून 1975 के निर्णय को देते हुये जहां उन्होने राजनारायन द्वारा लगाए गए तमाम आरोपों को खारिज कर दिया था वहीं इंदिरा जी के चुनाव को भी दो तकनीकी कारणों के कारण रद्द कर दिया था। इंदिरा जी के चुनाव एजेंट यशपाल का सरकारी सेवा से त्याग पत्र विधिवत स्वीकृत न होने से उनको सरकारी अधिकारी माना गया और रायबरेली के जिलाधिकारी द्वारा सभा की तैयारी कराना भी सत्ता का दुरुपयोग माना गया । इन दो आधारों पर इन्दिरा जी का चुनाव रद्द हुआ था। उनके स्टेनो रहे आर के धवन ने अब कहा है कि इन्दिरा जी तब स्तीफ़ा देना चाहती थीं लेकिन उनके सहयोगियों ने नहीं देने दिया जो सर्वथा गलत वक्तव्य है। 
वस्तुतः इंदिराजी को सुझाव दिया गया था कि वह बाबू जगजीवन राम को पी एम बनवा कर सुप्रीम कोर्ट में अपील करें। परंतु एन डी ए सरकार की मंत्री के पति संजय गांधी (जिनके निर्देश पर जगमोहन जी ने 'तुर्कमान गेट' और जामा मस्जिद क्षेत्र में फायरिंग करवाई थी ) की ज़िद्द के कारण इंदिराजी ने एमर्जेंसी के कागजात पर  बिना केबिनेट की पूर्व स्वीकृति के विदेश गए राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली साहब  को सोते से जगवा कर फ़ाईलो पर हस्ताक्षर करवाए थे। यह एमर्जेंसी 25 जून की सुबह 09 बजे लगनी थी और इंदिराजी के विश्वस्त गृहमंत्री उमाशंकर दीक्षित(दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जी के श्वसुर साहब) को छोड़ कर अन्य मंत्रियों को इसकी कोई जानकारी न थी।  उमाशंकर दीक्षित जी उत्तर प्रदेश के राजभवन के अतिथि कक्ष में निर्धारित समय पर घोषणा की अपेक्षा में टहलते रहे थे । इंदिरा जी कुछ द्विधा में थीं और उमाशंकर दीक्षित जी ने दिल्ली लौट कर उनका हौंसला बढ़ाया तब 25 जून 1975 की रात्रि में 2 या 3 बजे जाकर एमेर्जेंसी की घोषणा की गई। 26 जून 1975 को मैं अन्य साथी के साथ दिल्ली में था खुद अपनी आँखों से इंडियन एक्स्प्रेस के दफ्तर पर काले कपड़ों की  विरोध पट्टिका को मुख्य द्वार पर  देखा था । अखबार का मुख पृष्ठ केवल काले हाशिये के चौखटे के साथ छ्पा था उस पर कोई खबर नहीं थी। 

होटल मुगल, आगरा में हमारे एक साथी लखनऊ के थे जो वस्तुतः उमाशंकर दीक्षित जी के दामाद के छोटे भाई अर्थात शीला दीक्षित जी की नन्द के देवर थे उनके पास अघोषित/अप्रकाशित खबरों का खजाना था उसी की कुछ मुख्य बातों का उल्लेख किया है। शुरू-शुरू में वह सज्जन आगरा के तत्कालीन DM विनोद दीक्षित जी के साथ रहे थे बाद में ताजगंज में अलग कमरा ले लिया था। जब अलग रहने लगे थे तब जब भी शीला दीक्षित जी किसी राजनीतिक/सामाजिक कार्य से होटल आती थीं तो उन सज्जन को बुलवा कर नियमित मिलती रहती थीं। 
https://krantiswar.blogspot.com/2015/06/26-1975.html



~विजय राजबली माथुर ©

Friday, May 24, 2019

:चुनावी लड़ाई को आखिरी संघर्ष मत मानिए ------ अनिल सिन्हा

 * मोदी ने झूठ से भरे और निचले स्तर के भाषण किए और पैसे तथा नौकरशाही के इस्तेमाल में कोई कसर नहीं छोड़ा। लेकिन वही मोदी लोकप्रिय साबित हुए क्योंकि कारपोरेट पूंजीवाद उनके पीछे खड़ा था। मीडिया, सोशल मीडिया और प्रचार में उन्होंने हजारों करोड़ खर्च किया और झूठ को सच साबित करने मे कामयाब हुए। अब उनकी जीत का औचित्य साबित करने की कोशिश होगी और पराजित विपक्ष भी अपने को लोकतांत्रिक तथा उदार साबित करने के लिए चुनाव अभियान में अपनाई गई अनैतिकता और बेईमानी की चर्चा करना बंद कर देगा। लेकिन इसकी चर्चा करने का असली समय यही है। इस बहुमत का नकाब उतरना चाहिए।
** भूमिहार को गिरिराज चाहिए, कन्हैया नहीं। ऐसा ही कायस्थों के साथ है, उन्हें रविशंकर प्रसाद चाहिए, शत्रुघ्न सिन्हा नहीं। इस तरह कई जाति और समुदाय पूरी तरह हिंदुत्व के असर में आए हैं।

अनिल सिन्हा द्रोहकाल संपादक मंडल के सदस्य है



एक दुःस्वप्न के सच होने जैसा है मोदी का वापस आना। पूरे  पांच साल तक देश की संस्थाओं को क्षत-विक्षत करने के बाद देश को सामाजिक विभाजन में ले जाने का उनका अभियान अब इतनी ताकत से चलेगा कि शायद 1947 से ज्यादा बड़ा अंधकार देश को घेर ले। फर्क यही होगा कि उस समय आजादी के आंदोलन की रोशनी थी जो नफरत से भरे लोगांे को भी रास्ते पर ले आई। सरहद पार से दंगों की आग में झुलस कर आए लोग भी अमन और मुहब्बत की बात करते थे। आजादी के आंदोलन ने उनके दिल को ऐसा बनाया ही था। गांधी जी की मौत से एक तेज रोशनी फैली थी। ऐसी रोशनी अब गायब हो चुकी है। नाम बदलने यानि जनसंघ नाम धारण करने पर भी हिंदू महासभा और आरएसएस को वर्षों तक देश की मुख्यधारा में आने का इंतजार करना पड़ा। अब वे ही मुख्यधारा हैं, यह प्रज्ञा सिंह ठाकुर और गिरिराज सिंह की जीत से जाहिर हो गया। बिहार में गिरिराज सिंह को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पसंद नहीं करते, लेकिन बेगूसराय में कन्हैया कुमार के खिलाफ उनका समर्थन करने मेें उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ा क्योंकि भूमिहार जाति को साथ रखने का यही उपाय था। भूमिहार को गिरिराज चाहिए, कन्हैया नहीं। ऐसा ही कायस्थों के साथ है, उन्हें रविशंकर प्रसाद चाहिए,  शत्रुघ्न सिन्हा नहीं। इस तरह कई जाति और समुदाय पूरी तरह हिंदुत्व के असर में आए हैं।
मतदान के बाद बेगूसराय के एक लड़के का फोन आया कि पचपनिया यानि अति-पिछड़ों के बड़े तबके ही नहीं, यादवों के एक हिस्से ने एनडीए के गठबंधन को वोट दिया है क्योंकि उन्हें लगता है कि पाकिस्तान से मोदी ही लड़ सकते हैं। मोदी यह प्रचार इसलिए कर पाए कि सेना के नाम के इस्तेमाल को लेकर चुनाव आयोग उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर पाया। चुनाव आयोग को अपना काम कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बाध्य नहीं किया और मीडिया तो मोदी के साथ ही खड़ा था। मीडिया की औकात तो प्रधानंत्री ने उस दिन भी बता दी जब वह पांच साल शासन करने के बाद मीडिया से मुखातिब तो हुए, लेकिन उसके सवाल नहीं लिए। एक दंडवत मीडिया, ध्वस्त संस्थाओं और बिखरे विपक्ष का असली पीड़ित कौन होगा, यह समझना मुश्किल नहीं है। इसके सबसे पहले पीड़ित मुसलमान होंगे, दूसरे दलित होंगे और तीसरे मजदूर होंगे। इसके पीड़ित वे देश के वे लोग भी होंगे जो सवाल करेंगे।
अब यह बहस निरर्थक है कि कांगे्रस भाजपा को रोक नहीं पाई। कांग्रेस नहीं रोक पाई तो बाकी भी उसे रोक नहीं पाए। संस्थाओं पर हमले के खिलाफ विपक्ष एकजुट नहीं हो पाया। इसमें समाजवादी, आंबेडकरवादी और वामपंथी सभी ने निकम्मेपन से काम किया। राहुल गांधी रफाल-रफाल चिल्लाते रहे, लेकिन इस मुद्दे पर उनकी पार्टी ने कोई आंदोलन नही किया। उनका प्रगतिशील घोषणा-पत्र  बेअसर साबित हुआ क्योंकि कांग्रेस के पास कार्यकर्ताओं की वैसी फौज नहीं थी जो इसे लोगों के पास पहुंचाने की मेहनत कर सके। उसने तीन राज्यों की विधान सभाएं जीत तो लीं, लेकिन वैसेी सरकारें नहीं दे पाई जो वहां के लोगों में उत्साह भर सके।  राहुल ने एक हताश फौज को लेकर लड़ाई लड़ी और बहादुरी से लड़ी। लेकिन राहुल गांधी को इस बात की बधाई देनी पड़ेगी कि उन्होंने  कभी भी अपने को नीचे स्तर पर नहीं लाया।
बाकी विपक्ष का हाल क्या रहा? सपा, बसपा और राजेडी के पास जाति की पूंजी के अलावा कुछ नहीं बचा था। इस ताकत का भी इस्तेमाल वे नहीं कर पाए। उत्तर प्रदेश में एक दकियानूस, जातिवादी और सांप्रदायिक सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए जिस लड़ाई की जरूरत थी, उन्होंनेे नहीं लड़ी। बिहार में आरजेडी ने भी कुछ नहीं किया और विपक्ष के नेतृत्व के लिए जरूरी लड़ाई लड़ने में पूरी तरह नाकाम सिद्ध हुआ।  लेकिन इनके बारे में भी कहना पडे़गा कि उन्होंने चुनाव अभियान को बहुत नीचे नहीं जाने दिया।

मोदी ने झूठ और निचले स्तर के भाषण किए और पैसे तथा नौकरशाही के इस्तेमाल में कोई कसर नहीं छोड़ा। लेकिन वही मोदी लोकप्रिय साबित हुए क्योंकि  कारपोरेट पूंजीवाद उनके पीछे खड़ा था। मीडिया, सोशल मीडिया और प्रचार में उन्होंने हजारों करोड़ खर्च किया और झूठ को सच साबित करने मे कामयाब हुए। अब उनकी जीत का औचित्य साबित करने की कोशिश होगी और पराजित विपक्ष भी अपने को लोकतांत्रिक तथा उदार साबित करने के लिए चुनाव अभियान में अपनाई गई अनैतिकता और बेईमानी की चर्चा करना बंद कर देगा। लेकिन इसकी चर्चा करने का असली समय यही है। इस बहुमत का नकाब उतरना चाहिए। मोदी के राष्ट्रवाद के चेहरे प्रज्ञा ठाकुुर हैं, योगी आदित्यनाथ हैं, अनंत हेगडे हैं और उसके पीछे पूंजी की ताकत है। यह मुसलमान और पाकिस्तान के विरोध का यह हिंदू राष्ट्रवाद है। इससे लड़ने के लिए मंदिरों में भटकने और कुंभ में स्नान करने के बदले जन-समस्याओं को मजबूती से उठाने वाला और हर तरह के कट्टरपंथ के विरोध का आंदोलन होना चाहिए। चुनावी लड़ाई को आखिरी संघर्ष मत मानिए। इतिहास के महत्वपूर्ण फैसले सड़क पर होते हैं। देश किसी बड़े आंदोलन का इंतजार कर रहा है।
साभार :

http://www.drohkaal.com/is-bahumat-ka-naqab-utarna-chahiye/









 ~विजय राजबली माथुर ©

Tuesday, May 21, 2019

विपक्ष , एकजिट पोल्स और संभावना ------ विजय राजबली माथुर


ऐसा प्रतीत होता है कि , इन विद्वान लेखक ने  उन एक्जिट  पोल्स  को हू - ब - हू सही मान लिया है जो  मोदी / भाजपा समर्थक चेनल्स  के इशारे पर किए गए हैं।  कुछ निष्पक्ष विश्लेषकों के अनुसार ये एक्जिट पोल्स  अक्सर सही नहीं होते हैं। परंतु विद्वान लेखक ने उन पर भरोसा करके वर्तमान विपक्ष की भूमिका को प्रश्नांकित किया है। जबकि इसके विपरीत LTV के सर्वे में  भाजपा गठबंधन को  171 तथा करेंट के आंकलन द्वारा  190 सीटें  ही मिल पाने का अनुमान है। पुण्य प्रसून बाजपेयी के आंकलन में भाजपा को 145 सीटें  मिलने व 137 सीटें हारने का अनुमान है। 
जब कोलकाता में 2013 ई  में  आर एस एस ने मोदी को 10 वर्ष पी एम बनाए रख कर बाद में  योगी को उनके विकल्प के रूप में  रख कर नीति निर्धारण किया था  तबसे  2019 तक परिस्थितियेँ  काफी बदल चुकी हैं। अब आर एस एस ने प्रथम कार्यकाल के बीच में ही मोदी को हटा कर नितिन गडकरी को बनाने का अभियान चलाया था  जिसे मोदी - शाह की जोड़ी ने विफल कर दिया था। तब उसके द्वारा मोदी को दूसरा कार्यकाल देने का प्रश्न कहाँ से ? 
जैसा कि  बसपा प्रमुख मायावती सार्वजनिक रूप से कह चुकी हैं कि आर एस एस कार्यकर्ताओं ने मोदी की भाजपा के लिए प्रचार नहीं किया है । ऐसा इसलिए क्योंकि भाजपा को बहुमत मिलने की दशा में मोदी - शाह जोड़ी को हटाना संभव नहीं और इस जोड़ी का दोबारा सत्तासीन होना आर एस एस के भविष्य के लिए सुखद नहीं। अतः भाजपा गठबंधन के पुनः सत्तासीन होने का प्रश्न नहीं है सत्ता का लाभ लेकर चाहे एक्जिट पोल्स जितने भी अपने पक्ष में करा लिए हों मोदी सरकार का सत्ताच्युत होना संभावित है। 
कारपोरेट वैसे ही सत्तारूढ़ सरकार का विरोध नहीं करता है जब तक पूर्ण आश्वस्त न हो कि वह सरकार जाने वाली है। रतन टाटा  आर एस एस प्रमुख के साथ दो बार बैठक कर चुके हैं। महेन्द्रा ग्रुप के एक प्रमुख व्यक्ति द्वारा क्षेत्रीय पार्टियों के नेतृत्व की सरकार का भी स्वागत करने का बयान यों ही व्यर्थ नहीं हो सकता। राजनीतिक दल भले ही जन हित न देख कर मोदी का साथ देने को तत्पर हों परंतु कारपोरेट को अब मोदी से कोई लाभ नहीं दीखता अतः वे उनको हटाने हेतु कटिबद्ध है। 
यह आसन्न चुनाव परिणामों की ही धमक है जो इनकी हेकड़ी ढीली पड़ गई। 

इन परिस्थितियों में  कमर्शियल लाभ के लिए जारी किए गए एक्जिट पोल्स से अलग चुनाव परिणाम आने की प्रबल संभावनाएं हैं। 



Current 




 





 ~विजय राजबली माथुर ©