Friday, January 11, 2019

10 प्रतिशत अगड़ा आरक्षण का लक्ष्य संविधान की बुनियाद बदलना है ------ उर्मिलेश













 ~विजय राजबली माथुर ©

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14-01-2019 : 

Thursday, January 10, 2019

प्रगतिशील काव्य धारा के महत्वपूर्ण कवि गिरिजाकुमार माथुर की पुण्यतिथि पर

 गिरिजा कुमार माथुर : जन्म - 22 अगस्त 1919 ,
मृत्यु - 10 जनवरी 1994 






/www.bharatdarshan.co.nz/author-profile/71/girija-kumar-mathur-biography.html






~विजय राजबली माथुर ©

Thursday, January 3, 2019

पी एम के साक्षात्कार की समीक्षा : अभिसार शर्मा / बाबी नक़वी द्वारा

 NewsClickin
Published on Jan 2, 2019

2019 में मोदी ने मीडिया को पहला इंटरव्यू दियाI इसकी ख़ासियत यह रही कि इसमें देश के तमाम विवादास्पद मुद्दों पर सवाल उठाये गएI मगर अधिक्तर मुद्दों पर प्रधानमंत्री ने गोल-मोल जवाब दिये, कुछ मुद्दे तो छुए भी नहीं। आज अभिसार शर्मा न्यूज़चक्र के इस खास एपिसोड मे मोदी के बड़े इंटरव्यू का एक एक पहलू आपके सामने रखने जा रहे हैं। पेश है उनके इंटरव्यू की सबसे गहन समीक्षा।: 
Smita Prakash , ANI








June 29, 2016 
Pm से मुलाकात हो रही है

प्रधानमंत्री के साथ साक्षात्कार की व्यवस्था करना लंबा खींचा और दुर्वह प्रक्रिया हो सकती है. मैं पिछले अगस्त को पहला हाथ अनुभव करने का अवसर था.
संयुक्त अरब अमीरात में उनकी यात्रा के आगे, मैंने अरब दुनिया में दो देशों और भारत की भूमिका के बीच द्विपक्षीय संबंधों पर एक साक्षात्कार का अनुरोध किया । कई दिनों के लिए नौकरशाह के साथ कई ईमेल का आदान-प्रदान करने के बाद, मुझे एक बहुत ही वरिष्ठ अधिकारी से एक कॉल मिली: " बॉबी, मेरे पास अच्छी खबर और बुरी खबर है । कौन सा आप पहले सुनना चाहते हैं?"
मुझे नहीं पता था कि क्या कहना है. इससे पहले कि मैं बोल सकता था, उसने कहा कि " pm ने सहमति दी है." फिर उसने दो अन्य प्रकाशनों का उल्लेख भी किया होगा । मैं बहुत निराश था क्योंकि यह अब एक विशेष साक्षात्कार नहीं था. मेरा कोई विकल्प नहीं था, लेकिन कुछ विरोध के साथ इसे स्वीकार करने के लिए.
फिर मुझे पूर्व स्वीकृति के लिए अपने प्रश्नों को भेजने के लिए कहा गया था. और फिर सुरक्षा निकासी के लिए कई अनुरोधों का पालन किया: मेरे ड्राइवर, कार पंजीकरण नंबर, फोटोग्राफर के विवरण और उसके उपकरण आदि की सूची.
अंतिम क्षण तक, मैं इस बैठक के स्थान और समय के बारे में कोई सुराग नहीं था. मुझे बताया गया था कि यह स्वतंत्रता दिवस पर अपने लाल किले के भाषण के बाद कभी भी हो सकता है. 14 अगस्त को हुए कॉल करने के बाद, मुझे दिल्ली में अपने संपर्क का फोन नंबर दिया गया था. इस व्यक्ति, एक युवा अधिकारी ने मुझे दोपहर से पहले राजधानी में होने के लिए कहा और कहा कि सटीक समय और स्थान बाद में प्रदान किया जाएगा.
मैं 14 अगस्त को फ्लाइट पर सवार होने से पहले, मुझे एक अजीब फोन कॉल मिल गया. यह एक प्रमुख मुस्लिम व्यक्तित्व से था जो pm के करीब माना जाता है । " कर रवाना pm साहब का इंटरव्यू, बड़े, बड़े लग लाइन में bhaithen हैं उनसे मिलने के लिए."
मैं हैरान हो गया था और यह पता नहीं चला कि वह कैसे मेरी बैठक के बारे में पता चला है क्योंकि यह व्यक्ति सरकार का हिस्सा नहीं है.
अगली सुबह दिल्ली में, एक और झटका मुझे इंतजार कर रहा है । मेरे संपर्क अधिकारी ने सूचित किया कि मेरे फोटोग्राफर की अनुमति नहीं होगी और वह तस्वीरें पीएम के आधिकारिक फोटोग्राफर द्वारा ली जाएगी । मैंने अपने पैर को नीचे रखने का निर्णय लिया और उसे बताया कि मैं ऐसा नहीं कर सकता. तनाव वार्तालाप पीछे और बाहर और कुछ घंटे बाद फोटोग्राफर को एक शर्त पर अनुमति दी गई - कि वह केवल पांच मिनट अंदर खर्च करेगा.
हम तीनों -- मेरा ड्राइवर, मेरे भाई Saify और फोटोग्राफर Pankaj ने भारत के सबसे प्रसिद्ध पते को भगा दिया । उस दिन बिल्लियों और कुत्तों की बारिश हो रही थी । 7 rcr पर पहले चेकपॉइंट पर हमने एक और मुसीबत का सामना किया । जब एक रेनकोट में एक भारी सशस्त्र आदमी कार के पास आ गया तो एक विशाल टॉर्च ने हमें लगभग अंधा कर दिया. भारी बारिश की आवाज ने उसे सुनना असंभव बना दिया । वह सब समझ सकता था कि हम " दुबई से " हैं ", शब्द उन्होंने कई बार दोहराया कि वह उन्हें सही सुना है । वह फिर सुरक्षा कार्यालय में वापस चला गया. कुछ मिनट बाद वह वापस आ गया और हमें उस गाड़ी को अवरोध से दूर करने के लिए कहा और मुझे उसका अनुसरण करने के लिए इशारा किया । एक अधिकारी ने फिर से हमारा विवरण लिया और उन्हें कार्यालय-निवास परिसर के अंदर अपने sodium को radioed किया. कई मिनट बाद उन्होंने कहा कि फोटोग्राफर को कोई सुरक्षा निकासी नहीं थी. मैंने फिर से अपने संपर्क अधिकारी से संपर्क किया और समस्या को समझाया. बाद में कई बेचैन पल, हमें अंदर की अनुमति दी गई और विज़िटर पार्किंग के लिए निर्देशित किया गया, रिसेप्शन हॉल से कुछ मीटर दूर.
अंदर तीव्र सुरक्षा जाँच के बाद हमें एक दूसरे कमरे में इंतजार करने के लिए कहा गया था जहां एक सूँघने वाला कुत्ता लाया गया था । जल्द ही, हम एक एसपीजी आदमी द्वारा संचालित शटल कार में मुख्य इमारत के लिए स्थानांतरित किया गया था.
अंदर, हम एक कमरे ग्रीन लॉन को निहार रहे थे, जहां मैं "साक्षात्कार के आदेश" पर लप्पास किया गया था.
" फोटो और दोनों के बाद, प्रधानमंत्री आपको देख लेंगे, और फिर आप अपनी बातचीत शुरू कर देंगे," एक अधिकारी ने मुझे एक स्वर में बताया जो विनम्र था लेकिन दृढ़ है । एक और शॉकर -- कि मैं केवल एक प्रश्न पूछ सकता हूँ और मेरे बाकी प्रश्नों के उत्तर मिलने के बाद लिखने में प्रदान किया जाएगा.
ब्रीफिंग के बाद हम पीएम के टीम के सदस्यों को पेश किया गया, जिसमें बिहार से मुस्लिम अधिकारी शामिल हैं (इस अधिकारी, मुझे बताया गया था, pm का प्रसिद्ध सिलिकॉन वैली भाषण लिखा था).
यह बैठक स्क्रिप्ट के अनुसार चली गई. एक गर्म हाथ से हाथ मिलाने के बाद हमने हिंदी में अपनी देर रात की उड़ान और उसके लाल किले के भाषण के बारे में बात की । एक और पत्रकार जो आगे बोलने के लिए शेड्यूल किया गया था (वह हमारे पास से आया और ड्यूटी मुक्त से पीएम के लिए एक उपहार उठाया) एक अनुवादक के माध्यम से अंग्रेजी में बोले, एक वरिष्ठ महिला अधिकारी प्रचार मंडल से । बैठक के बाद एक घंटे या इसलिए, मैं बातचीत के प्रिंट प्रतिलिपियाँ दिया गया था और मेरे सवालों के जवाब दे दिया था कि मैं पूछ नहीं सका.
आज, मुझे आश्चर्य नहीं था कि जब मैं समय के लिए उस सवाल को पढ़ रहा था, अब इंटरव्यू एडवांस में मांग लिया गया था । मुझे यकीन नहीं है कि यह इस सरकार के लिए सभी पीएमएस या अद्वितीय के लिए एक मानक प्रक्रिया है.

NBT,Lko.,03-01-2019,Page-12





~विजय राजबली माथुर ©

Monday, December 31, 2018

राहुल की कांग्रेस उदारीकरण की पैरोकार नहीं ------ अनिल सिन्हा

  
http://epaper.navbharattimes.com/details/7110-77163-1.html


अनिल सिन्हा साहब के निष्कर्ष बताते हैं कि राहुल गांधी 1991 से प्रचलित उदारीकरण की नीति के विपरीत किसानों और गरीबों के प्रति हमदर्दी के साथ चलना चाहते हैं। यदि वास्तव में राहुल इसी नीति पर चलेंगे तो अवश्य ही फासिस्ट आर एस एस को परास्त करने में सफल रहेंगे। 2014 में मोदी सरकार के सत्तारूढ़ होते ही ऐसा करने का सुझाव दिया था उस पोस्ट को ज्यों का त्यों पुनः प्रस्तुत किया जा रहा है। 
(विजय राजबली माथुर )

Tuesday, May 27, 2014

प्रियंका-राहुल को राजनीति में रहना है तो समझ लें उनके पिता व दादी के कृत्यों का प्रतिफल है नई सरकार का सत्तारोहण ---विजय राजबली माथुर

नेहरू जी की 51वीं पुण्य तिथि पर विशेष :
जिस प्रकार किसी वनस्पति का बीज जब बोया जाता है तब अंकुरित होने के बाद वह धीरे-धीरे बढ़ता है तथा पुष्पवित,पल्लवित होते हुये फल भी प्रदान करता है। उसी प्रकार जितने और जो कर्म किए जाते हैं वे भी समयानुसार सुकर्म,दुष्कर्म व अकर्म भेद के अनुसार अपना फल प्रदान करते हैं। यह चाहे व्यक्तिगत,पारिवारिक,सामाजिक,राजनीतिक क्षेत्र में हों अथवा व्यवसायिक क्षेत्रों में। पालक,गन्ना और गेंहू एक साथ बोने पर भी भिन्न-भिन्न समय में फलित होते हैं। उसी प्रकार विभिन्न कर्म एक साथ सम्पन्न होने पर भी भिन्न-भिन्न समय में अपना फल देते हैं। 16 वीं लोकसभा चुनावों में भाजपा की सफलता का श्रेय RSS को है जिसको राजनीति में मजबूती देने का श्रेय इंदिरा जी व राजीव जी को जाता है। 

आज से 50 वर्ष पूर्व 27 मई 1964 को देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू का निधन हुआ था। कार्यवाहक प्रधानमंत्री गुलज़ारी लाल नन्दा को यदि कांग्रेस अपना नेता चुन कर स्थाई प्रधानमंत्री बना देती तो कांग्रेस की स्थिति सुदृढ़ रहती किन्तु इन्दिरा जी पी एम नहीं बन पातीं। इसलिए समाजवाद के घोर विरोधी लाल बहादुर शास्त्री जी को पी एम पद से नवाजा गया था जिंनका 10/11 जनवरी 1966 को ताशकंद में निधन हो गया फिर कार्यावाहक पी एम तो नंदा जी ही बने किन्तु उनकी चारित्रिक दृढ़ता एवं ईमानदारी के चलते  उनको कांग्रेस संसदीय दल का नेता न बना कर इंदिराजी को पी एम बनाया गया। 1967 के चुनावों में उत्तर भारत के अनेक राज्यों में कांग्रेस की सरकारें न बन सकीं। केंद्र में मोरारजी देसाई से समझौता करके इंदिराजी पुनः पी एम बन गईं। अनेक राज्यों की गैर-कांग्रेसी सरकारों में 'जनसंघ' की साझेदारी थी। उत्तर प्रदेश में प्रभु नारायण सिंह व राम स्वरूप वर्मा (संसोपा) ,रुस्तम सैटिन व झारखण्डे राय(कम्युनिस्ट ),प्रताप सिंह (प्रसोपा),पांडे  जी आदि (जनसंघ) सभी तो एक साथ मंत्री थे। बिहार में ठाकुर प्रसाद(जनसंघ ),कर्पूरी ठाकुर व रामानन्द तिवारी (संसोपा ) एक साथ मंत्री थे। मध्य प्रदेश में भी यही स्थिति थी। इन्दिरा जी की नीतियों से कांग्रेस को जो झटका लगा था उसका वास्तविक लाभ जनसंघ को हुआ था। जनसंघी मंत्रियों ने प्रत्येक राज्य में संघियों को सरकारी सेवा में लगवा दिया था जबकि सोशलिस्टों व कम्युनिस्टों ने ऐसा नहीं किया कि अपने कैडर को सरकारी सेवा में लगा देते। 

1974 में जब जय प्रकाश नारायण गुजरात के छात्र आंदोलन के माध्यम से पुनः राजनीति में आए तब संघ के नानाजी देशमुख आदि उनके साथ-साथ उसमें शामिल हो गए।

1977 में मोरारजी देसाई की जनता पार्टी की केंद्र सरकार में आडवाणी व बाजपेयी साहब जनसंघ  कोटे से  तो राजनारायन संसोपा कोटे से मंत्री थे। बलराज माधोक तो मोरारजी देसाई को 'आधुनिक श्यामा प्रसाद मुखर्जी' कहते थे। जनसंघी मंत्रियों ने सूचना व प्रसारण तथा विदेश विभाग में खूब संघी प्रविष्ट करा दिये थे।  

1977 में उत्तर प्रदेश में राम नरेश यादव (वर्तमान राज्यपाल-मध्य प्रदेश) की जनता पार्टी सरकार में कल्याण सिंह(जनसंघ),मुलायम सिंह(संसोपा ) आदि सभी एक साथ मंत्री थे। पूर्व जनसंघ गुट के मंत्रियों ने संघियों को सरकारी सेवाओं में खूब एडजस्ट किया था। 
 1975 में संघ प्रमुख मधुकर दत्तात्रेय 'देवरस' ने जेल से बाहर आने हेतु इंदिराजी से एक गुप्त समझौता किया कि भविष्य में संकट में फँसने पर वह इंदिराजी की सहायता करेंगे। और उन्होने अपना वचन निभाया 1980 में संघ का पूर्ण समर्थन इन्दिरा कांग्रेस को देकर जिससे इंदिराजी पुनः पी एम बन सकीं।परंतु इसी से प्रतिगामी नीतियों पर चलने की शुरुआत भी हो गई 'श्रम न्यायालयों' में श्रमिकों के विरुद्ध व शोषक व्यापारियों /उद्योगपतियों के पक्ष में निर्णय घोषित करने की होड लग गई।इंदिराजी की हत्या के बाद 1984 में बने पी एम राजीव गांधी साहब भी अपनी माता जी की ही राह पर चलते हुये कुछ और कदम आगे बढ़ गए । अरुण नेहरू व अरुण सिंह की सलाह पर राजीव जी ने केंद्र सरकार को एक 'कारपोरेट संस्थान' की भांति चलाना शुरू कर दिया था।आज 2014 में नई सरकार कारपोरेट के हित में जाती दिख रही है तो यह उसी नीति का ही विस्तार है। 

 1989 में उन्होने सरदार पटेल द्वारा लगवाए विवादित बाबरी मस्जिद/राम मंदिर का ताला खुलवा दिया। बाद में वी पी सिंह की सरकार को बाहर से समर्थन देने के एवज में भाजपा ने स्वराज कौशल (सुषमा स्वराज जी के पति) जैसे लोगों को राज्यपाल जैसे पदों तक नियुक्त करवा लिया था। सरकारी सेवाओं में संघियों की अच्छी ख़ासी घुसपैठ करवा ली थी। 

आगरा पूर्वी विधान सभा क्षेत्र मे 1985 के परिणामों मे संघ से संबन्धित क्लर्क कालरा ने किस प्रकार भाजपा प्रत्याशी को जिताया  वह कमाल पराजित घोषित कांग्रेस प्रत्याशी सतीश चंद्र गुप्ता जी के  अलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती देने से उजागर हुआ। क्लर्क कालरा ने नीचे व ऊपर कमल निशान के पर्चे रख कर बीच में हाथ का पंजा वाले पर्चे छिपा कर गिनती की थी जो जजों की निगरानी में हुई पुनः गणना में पकड़ी गई। भाजपा के सत्य प्रकाश'विकल' का चुनाव अवैध  घोषित करके सतीश चंद्र जी को निर्वाचित घोषित किया गया। 
ऐसे सरकारी संघियों के बल पर 1991 में उत्तर-प्रदेश आदि कई राज्यों में भाजपा की बहुमत सरकारें बन गई थीं।1992 में कल्याण सिंह के नेतृत्व की सरकार ने बाबरी मस्जिद ध्वंस करा दी और देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क गए। 1998 से 2004 के बीच रही बाजपेयी साहब की सरकार में पुलिस व सेना में भी संघी विचार धारा के लोगों को प्रवेश दिया गया। 

2011 में सोनिया जी के विदेश में इलाज कराने जाने के वक्त से डॉ मनमोहन सिंह जी हज़ारे/केजरीवाल के माध्यम से संघ से संबंध स्थापित किए हुये थे जिसके परिणाम स्वरूप 2014 के चुनावों में सरकारी अधिकारियों/कर्मचारियों ने भी परिणाम प्रभावित करने में अपनी भूमिका अदा की है । 

 1967,1975 ,1980,1989 में लिए गए इन्दिरा जी व राजीव जी के निर्णयों ने 2014 में भाजपा को पूर्ण बहुमत तक पहुंचाने में RSS की भरपूर मदद की है। प्रियंका गांधी वाडरा,राहुल गांधी अथवा जो भी भाजपा विरोधी लोग राजनीति में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं उनको खूब सोच-समझ कर ही निर्णय आज लेने होंगे जिनके परिणाम आगामी समय में ही मिलेंगे। 'धैर्य',संयम,साहस के बगैर लिए गए निर्णय प्रतिकूल फल भी दिलवा सकते हैं।  


~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, December 30, 2018

यशपाल को भूलने का खामियाजा लखनऊ भरेगा, यशपाल के वंशज नहीं ------ आनंद

 * एक वरिष्ठ साहित्यिक ने कहा: यशपाल का कर्मक्षेत्र लखनऊ था, उनके संपूर्ण साहित्य का रचनास्थल। यह भूलने का खामियाजा लखनऊ भरेगा, यशपाल के वंशज नहीं।
**  ‘यशपाल का कोई नाम न लेने वाला’ होने का प्रमाण यह दिया गया कि लखनऊ के अन्य दिवंगत साहित्यिकों की तरह उनकी जन्म या पुण्यतिथि पर उनका परिवार उन्हें स्मरण करने के लिए लोगों को जलपान नहीं कराता।
*** एक लेखक या कलाकार की स्मृति को जीवित रखना उसके पाठकों, प्रशंसकों और समाज का दायित्व है या लेखक के परिवार का। 
**** वर्तमान सरकार यशपाल जयंती की बात तो क्या, क्रांतिकारी-स्वतंत्रता सेनानी स्मृति समारोहों के समय दुर्गा भाभी तथा यशपाल के वंशजों को पूछती तक नहीं।
http://epaper.navbharattimes.com/details/6209-65069-1.html



प्रसिद्ध हिंदी उपन्यासकार यशपाल की 42वीं पुण्यतिथि (26 दिसंबर) को  उनके पुत्र आनंद जी ने अपने परिवार की ओर से पिछले दिनों आए एक अप्रिय प्रसंग पर अपना पक्ष नवभारत टाइम्स के माध्यम से प्रस्तुत किया है :

मेरे पिता क्रांतिकारी और लेखक यशपाल के 42वें निधन दिवस (26 दिसंबर) के संदर्भ में दो प्रश्न सामने आए: क्या किसी लेखक को ‘भुला दिया गया’ कहा जा सकता है जब न केवल वह चाव से पढ़ा जा रहा हो वरन उसकी पुस्तकों की खूब बिक्री भी हो रही हो। दूसरा यह कि एक लेखक या कलाकार की स्मृति को जीवित रखना उसके पाठकों, प्रशंसकों और समाज का दायित्व है या लेखक के परिवार का। 

प्रश्नों के मूल में इसी वर्ष हिंदी दिवस के अवसर पर लखनऊ के एक समाचारपत्र द्वारा नगर की प्रसिद्ध साहित्यकार त्रयी - भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर और यशपाल - को याद करते हुए यशपाल के बारे में छापी गई यह टिप्पणी थी कि ‘...यशपाल का शहर में अब कोई नाम लेने वाला भी नहीं है।’ तथा ‘...बस एक घर की शक्ल में यशपाल की याद (क्योंकि) यशपाल का परिवार यहां रहता नहीं और बाकी किसी को उन्हें याद करने की फिक्र नहीं है।’ अपना अज्ञान छिपाने के लिए किसी बात को दावे या दुस्साहस के साथ कहने का चलन हिंदी में आम हो गया है, मगर ध्यान देने लायक है कि इस मामले में ‘यशपाल का कोई नाम न लेने वाला’ होने का प्रमाण यह दिया गया कि लखनऊ के अन्य दिवंगत साहित्यिकों की तरह उनकी जन्म या पुण्यतिथि पर उनका परिवार उन्हें स्मरण करने के लिए लोगों को जलपान नहीं कराता।

यशपाल के परिवार के सामने समस्या है कि उनकी जन्मतिथि पर हिमाचल प्रदेश में पिछले 35 वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार राज्य सरकार द्वारा प्रति वर्ष आयोजित दो-दिवसीय यशपाल जयंती - जिसमें प्रदेश भर के साहित्यिक भाग लेते हैं - में सम्मिलित हो या उनके अपने नगर में उन्हीं लोगों को बुलाकर यशपाल की प्रशस्ति में वही पुरानी घिसी-पिटी बातें सुन उन्हें जलपान कराए।  उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध साहित्यकार और भाषाविद् विष्णुकांत शास्त्री हिमाचल के राज्यपाल रहते यशपाल जयंती समारोहों में आते थे और उत्तर प्रदेश का राज्यपाल होने पर 2003 में उन्होंने यशपाल शताब्दी के समय यथासंभव सरकारी योगदान भी दिया। उसी प्रदेश में वर्तमान सरकार यशपाल जयंती की बात तो क्या, क्रांतिकारी-स्वतंत्रता सेनानी स्मृति समारोहों के समय दुर्गा भाभी तथा यशपाल के वंशजों को पूछती तक नहीं।

लखनऊ की महानगर कॉलोनी के उसी घर में जिसके बारे में कहा गया कि ‘...यशपाल का परिवार यहां रहता नहीं’, हमारी मां प्रकाशवती न केवल अपनी मृत्यु पर्यंत 2002 तक रहीं बल्कि मेरी पत्नी तथा पुत्र पिछले बीस वर्षों से लगातार निवास कर रहे हैं और मैं स्वयं हर वर्ष (उत्तरी अमेरिका में आठ मास पत्रकारिता करने के बाद) चार मास रहता हूं। पिछले वर्षों में इसी घर से संकलन-संपादन के बाद यशपाल की 15 अप्रकाशित-असंकलित तथा अनूदित नई पुस्तकें प्रकाशित हुईं। यहां रखी यशपाल द्वारा संपादित-प्रकाशित राजनीतिक मासिक ‘विप्लव’ की फाइलें पढ़ कर तीन (लखनऊ विश्वविद्यालय से दो) डॉक्टरेट प्राप्त की गईं तथा अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास का प्रतिनिधि आकर ऐतिहासिक महत्त्व की इन फाइलों को डिजिटलाइज करने के लिए ले जाकर लौटा गया।

यशपाल-प्रकाशवती को लखनऊ याद करे न करे, विश्व शायद करेगा। अनेक विदेशी विश्वविद्यालयों में दक्षिण एशिया साहित्य के पाठ्यक्रम में संस्मरणों की पठन सूची में यशपाल के संस्मरण ‘सिंहावलोकन’ तथा प्रकाशवती लिखित ‘लाहौर से लखनऊ तक’ साथ-साथ मिलेंगे। अक्टूबर 2018 में न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी में भारत विभाजन/लाहौर संबंधी एक कॉन्फ्रेंस के दोनों दिन केवल एक पुस्तक की चर्चा हुई: यशपाल के उपन्यास ‘झूठा सच’ का अंग्रेजी तथा उर्दू अनुवाद।


इसमें दो राय नहीं कि किसी लेखक या कलाकार की प्रतिष्ठा बैठक में सजे पुरस्कारों या प्रशस्तिपत्रों से नहीं, जनमानस पर उसकी छाप तथा आगामी पीढ़ी पर उसके प्रभाव से आंकी जानी चाहिए। जैसा हिंदी दिवस पर उक्त समाचारपत्र से उद्धृत पंक्तियां पढ़ने के बाद एक वरिष्ठ साहित्यिक ने कहा: यशपाल का कर्मक्षेत्र लखनऊ था, उनके संपूर्ण साहित्य का रचनास्थल। यह भूलने का खामियाजा लखनऊ भरेगा, यशपाल के वंशज नहीं।
http://epaper.navbharattimes.com/details/6209-65069-1.html

 ~विजय राजबली माथुर ©