Sunday, October 15, 2017

पूर्व छात्र नेता सत्यपाल मलिक ने पटना विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों का अपमान कैसे होने दिया ? ------ विजय राजबली माथुर

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जिस वर्ष 1969 में मैंने मेरठ कालेज, मेरठ में बी ए में प्रवेश लिया छात्र संघ के अध्यक्ष श्री सत्यपाल मलिक ही थे। कालेज के प्राचार्य थे डॉ वी पुरी किन्तु वह अपनी प्राचार्य परिषद के पदाधिकारी बन जाने के कारण त्याग - पत्र दे गए और कार्यवाहक प्राचार्य डॉ बी भट्टाचार्य ने तमाम आरोप लगा कर श्री सत्यपाल मलिक को कालेज से निष्कासित कर दिया। पूर्व में लिखे अपने मेरठ के संस्मरणों में इसका ज़िक्र किया है उसे आगे ज्यों का त्यों दिया जा रहा है। 
परंतु यहाँ मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि, समाजवादी युवजन सभा के बुलंद और जुझारू छात्र नेता रहे श्री सत्यपाल मलिक को बिहार के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति (चांसलर ) होते हुये यह कैसे गंवारा हुआ कि, पटना विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में वहाँ के पूर्व छात्र रहे गण मान्य व्यक्तियों जैसे वहीं के एक सांसद शत्रुघन सिन्हा, पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा और पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव को बुलाया ही नहीं गया ? या अपमानजनक तौर पर निमंत्रित किया गया जो वे नहीं आए ? 
लालू यादव भी श्री मलिक की भांति ही समाजवादी रहे हैं जबकि, सिन्हा द्वय उनके साथ  भाजपा सांसद रहे हैं। जैसा व्यक्तित्व मेरठ कालेज, मेरठ में श्री मलिक का देखा है उससे तो प्रतीत होता है कि, पटना विश्वविद्यालय के समारोह में पूर्व वरिष्ठ छात्रों को न बुलाया जाना उनको मंजूर नहीं होना चाहिए था और  उनको अपनी शक्तियों का  इस्तेमाल करते हुये हस्तक्षेप करना चाहिए था। यदि उन्होने ऐसा नहीं किया तो इसका कारण क्या हो सकता है ?
जीमखाना मैदान , मेरठ में 23 जनवरी को आज़ाद हिन्द संघ द्वारा आयोजित समारोहों में श्री मलिक जोरदार ढंग से तब तक के तीनों प्रधानमंत्रियों ( जवाहर लाल, लाल बहादुर, इन्दिरा गांधी ) पर नेताजी सुभाष की उपेक्षा करने हेतु मुकदमा चलाने की मांग करते थे। आज जब राज्यपाल व कुलाधिपति की हैसियत से विश्वविद्यालय संबंधी गलत निर्णयों में वह हस्तक्षेप नहीं कर पाये तो इसका क्या मतलब है ?
पुराना संस्मरण : 
 " पिछले वर्षों तक कालेज यूनियन क़े प्रेसीडेंट रहे सतपाल मलिक (जो भारतीय क्रांति दल,इंदिरा कांग्रेस ,जन-मोर्चा,जनता दल होते हुए अब भाजपा में हैं और वी.पी.सिंह सरकार में उप-मंत्री भी रह चुके) को डा.भट्टाचार्य ने कालेज से निष्कासित कर दिया और उनके विरुद्ध डी.एम.से इजेक्शन नोटिस जारी करा दिया.
नतीजतन सतपाल मलिक यूनियन क़े चुनावों से बाहर हो गये और उनके साथ उपाद्यक्ष रहे राजेन्द्र सिंह यादव (जो बाद में वहीं अध्यापक भी बने) और महामंत्री रहे तेजपाल सिंह क्रमशः समाजवादी युवजन सभा तथा भा.क्र.द .क़े समर्थन से एक -दूसरे क़े विरुद्ध अध्यक्ष पद क़े उम्मीदवार बन बैठे.बाज़ी कांग्रेस समर्थित महावीर प्रसाद जैन क़े हाथ लग गई और वह प्रेसिडेंट बन गये.महामंत्री पद पर विनोद गौड (श्री स.ध.इ.कालेज क़े अध्यापक लक्ष्मीकांत गौड क़े पुत्र थे और जिन्हें ए.बी.वी.पी.का समर्थन था)चुने गये.यह एम्.पी.जैन क़े लिए विकट स्थिति थी और मजबूरी भी लेकिन प्राचार्य महोदय बहुत खुश हुए कि,दो प्रमुख पदाधिकारी दो विपरीत धाराओं क़े होने क़े कारण एकमत नहीं हो सकेंगे.लेकिन मुख्यमंत्री चौ.चरण सिंह ने छात्र संघों की सदस्यता को ऐच्छिक बना कर सारे छात्र नेताओं को आन्दोलन क़े एक मंच पर खड़ा कर दिया.

ताला पड़े यूनियन आफिस क़े सामने कालेज क़े अन्दर १९७० में जो सभा हुई उसमें पूर्व महामंत्री विनोद गौड ने दीवार पर चढ़ काला झंडा फहराया और पूर्व प्रेसीडेंट महावीर प्रसाद जैन ने उन्हें उतरने पर गले लगाया तो सतपाल मलिक जी ने पीठ थपथपाई और राजेन्द्र सिंह यादव ने हाथ मिलाया.इस सभा में सतपाल मलिक जी ने जो भाषण दिया उसकी ख़ास -ख़ास बातें ज्यों की त्यों याद हैं (कहीं किसी रणनीति क़े तहत वही कोई खण्डन न कर दें ).सतपाल मलिक जी ने आगरा और बलिया क़े छात्रों को ललकारते हुए,रघुवीर सहाय फिराक गोरखपुरी क़े हवाले से कहा था कि,उ .प्र .में आगरा /बलिया डायगनल में जितने आन्दोलन हुए सारे प्रदेश में सफल होकर पूरे देश में छा  गये और उनका व्यापक प्रभाव पड़ा.(श्री मलिक द्वारा दी  यह सूचना ही मुझे आगरा में बसने क़े लिए प्रेरित कर गई थी ).मेरठ /कानपुर डायगनल में प्रारम्भ सारे आन्दोलन विफल हुए चाहे वह १८५७ ई .की प्रथम क्रांति हो,सरदार पटेल का किसान आन्दोलन या फिर,भा .क .पा .की स्थापना क़े साथ चला आन्दोलन  हो.श्री मलिक चाहते थे कि आगरा क़े छात्र मेरठ क़े छात्रों का पूरा समर्थन करें.श्री मलिक ने यह भी कहा था कि,वह चौ.चरण सिंह का सम्मान  करते हैं,उनके कारखानों से चौ.सा :को पर्याप्त चन्दा दिया जाता है लेकिन अगर चौ.सा : छात्र संघों की अनिवार्य सदस्यता बहाल किये बगैर मेरठ आयेंगे तो उन्हें चप्पलों की माला पहनाने वाले श्री मलिक पहले सदस्य होंगें.चौ.सा :वास्तव में अपना फैसला सही करने क़े बाद ही मेरठ पधारे भी थे और बाद में श्री सतपाल मलिक चौ. सा : की पार्टी से बागपत क्षेत्र क़े विधायक भी बने और इमरजेंसी में चौ. सा :क़े जेल जाने पर चार अन्य भा.क्र.द.विधायक लेकर इंका.में शामिल हुए.

जब भारत का एक हवाई जहाज लाहौर अपहरण कर ले जाकर फूंक दिया गया था तो हमारे कालेज में छात्रों व शिक्षकों की एक सभा हुई जिसमें प्रधानाचार्य -भट्टाचार्य सा :व सतपाल मलिक सा :अगल -बगल खड़े थे.मलिक जी ने प्रारंभिक भाषण में कहा कि,वह भट्टाचार्य जी का बहुत आदर करते हैं पर उन्होंने उन्हें अपने शिष्य लायक नहीं समझा.जुलूस में भी दोनों साथ चले थे जो पाकिस्तान सरकार क़े विरोध में था.राष्ट्रीय मुद्दों पर हमारे यहाँ ऐसी ही एकता हमेशा रहती है,वरना अपने निष्कासन पर मलिक जी ने कहा था -इस नालायक प्रधानाचार्य ने मुझे नाजायज तरीके से निकाल  दिया है अब हम भी उन्हें हटा कर ही दम लेंगें.बहुत बाद में भट्टाचार्य जी ने तब त्याग -पत्र दिया जब उनकी पुत्री वंदना भट्टाचार्य को फिलासफी में लेक्चरार नियुक्त कर लिया गया.

समाज-शास्त्र परिषद् की तरफ से बंगलादेश आन्दोलन पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया था.उसमें समस्त छात्रों व शिक्षकों ने बंगलादेश की निर्वासित सरकार को मान्यता देने की मांग का समर्थन किया.सिर्फ एकमात्र वक्ता मैं ही था जिसने बंगलादेश की उस सरकार को मान्यता देने का विरोध किया था और उद्धरण डा.लोहिया की पुस्तक "इतिहास-चक्र "से लिए थे (यह पुस्तक एक गोष्ठी में द्वितीय पुरूस्कार क़े रूप में प्राप्त हुई थी ).मैंने कहा था कि,बंगलादेश हमारे लिए बफर स्टेट नहीं हो सकता और बाद में जिस प्रकार कुछ समय को छोड़ कर बंगलादेश की सरकारों ने हमारे देश क़े साथ व्यवहार किया मैं समझता हूँ कि,मैं गलत नहीं था.परन्तु मेरे बाद क़े सभी वक्ताओं चाहे छात्र थे या शिक्षक मेरे भाषण को उद्धृत करके मेरे विरुद्ध आलोचनात्मक बोले.विभागाध्यक्ष डा.आर .एस.यादव (मेरे भाषण क़े बीच में हाल में प्रविष्ट हुए थे) ने आधा भाषण मेरे वक्तव्य क़े विरुद्ध ही दिया.तत्कालीन छात्र नेता आर.एस.यादव भी दोबारा भाषण देकर मेरे विरुद्ध बोलना चाहते थे पर उन्हें दोबारा अनुमति नहीं मिली थी.गोष्ठी क़े सभापति कामर्स क़े H .O .D .डा.एल .ए.खान ने अपने  भाषण मेरी सराहना करते हुये कहा था 
हम उस छात्र से सहमत हों या असहमत लेकिन मैं उसके साहस की सराहना करता हूँ कि,यह जानते हुये भी सारा माहौल बंगलादेश क़े पक्ष में है ,उसने विपक्ष में बोलने का फैसला किया और उन्होंने मुझसे इस साहस को बनाये रखने की उम्मीद भी ज़ाहिर की थी.


मेरे लिए फख्र की बात थी की सिर्फ मुझे ही अध्यक्षीय भाषण में स्थान मिला था किसी अन्य वक्ता को नहीं.इस गोष्ठी क़े बाद राजेन्द्र सिंह जी ने एक बार जब सतपाल मलिक जी कालेज आये थे मेरी बात उनसे कही तो मलिक जी ने मुझसे कहा कि,वैसे तो तुमने जो कहा था -वह सही नहीं है,लेकिन अपनी बात ज़ोरदार ढंग से रखी ,उसकी उन्हें खुशी है.  '' 
http://vidrohiswar.blogspot.in/2010/12/blog-post_18.html

~विजय राजबली माथुर ©


पटना विश्वविद्यालय की छात्राओं द्वारा शताब्दी समारोह पर प्रतिक्रिया  : 
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Saturday, October 14, 2017

यह साफ़गोई सिर्फ अर्द्ध - सत्य है ------ विजय राजबली माथुर

2011 में सोनिया जी के विदेश में इलाज कराने जाने के वक्त से डॉ मनमोहन सिंह जी हज़ारे/केजरीवाल के माध्यम से संघ से संबंध स्थापित किए हुये थे जिसके परिणाम स्वरूप 2014 के चुनावों में सरकारी अधिकारियों/कर्मचारियों ने भी परिणाम प्रभावित करने में अपनी भूमिका अदा की है। 
1967,1975 ,1980,1989 में लिए गए इन्दिरा जी व राजीव जी के निर्णयों ने 2014 में भाजपा को पूर्ण बहुमत तक पहुंचाने में RSS की भरपूर मदद की है।



हमारे विद्वान क्यों सतही बातों से प्रभावित हो जाते हैं और तथ्य की गहराई तक जाये बिना ही आसान निष्कर्ष निकाल लेते हैं जैसा गिरीश मालवीय  जी ने किया  ? आइये तथ्यावलोकन करें :  यों तो इंदिराजी की हत्या के बाद भी प्रणब मुखर्जी साहब पी एम बनने की अपेक्षा करते रहे किन्तु राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जी ने इंका महासचिव और सांसद राजीव गांधी को सीधे ही पी एम पद की शपथ दिलवा दी थी अतः उनको ही इंका संसदीय दल का नेता भी चुन लिया गया। शायद इसी वजह से दोनों में कुछ मतभेद भी हुये और प्रणब साहब ने ' समाजवादी कांग्रेस ' बना ली किन्तु 1989 के चुनावों के समय राजीव गांधी के नेतृत्व में समाजवादी कांग्रेस का कांग्रेस में विलय कर दिया था। 1991 में भी पी एम पद शायद इसीलिए पी नरसिंघा राव साहब को मिला कि, एक बार प्रणब साहब कांग्रेस से बाहर जा चुके थे वैसे उनकी राजनीतिक शुरुआत ' बांग्ला कांग्रेस ' के माध्यम से हुई थी जिसका गठन पूर्व केंद्रीय शिक्षामंत्री हुमायूँ कबीर द्वारा इन्दिरा जी के विरोध में किया गया था। 
लेकिन जैसा कि, मनमोहन जी ने कहा उनको 2004 में  इत्तेफाक से पी एम बना दिया गया यह बात भ्रामक है। जिन ताकतों ने उनको 1991 में वित्तमंत्री बनवाया था उनके द्वारा ही वह इस पद के लिए चयनित किए गए थे सोनिया जी ने तो अपनी पार्टी की मोहर भर लगाई थी। जैसा कि, पदमुक्त होने के बाद पी नरसिंघा राव साहब ने अपने उपन्यास  ' THE INSIDER ' में स्पष्ट कर दिया था कि, " हम स्वतन्त्रता के भ्रमजाल में जी रहे हैं '' । 
यही वजह रही कि, सोनिया जी चाह कर भी प्रणब साहब को पी एम नहीं बनवा सकती थी। और जब 2009 में उन्होने प्रणब साहब को प्रस्तावित करना चाहा तब यही साफ़गोई वाले मनमोहन सिंह साहब अड़ गए थे और 2011 में सोनिया जी के विदेश में इलाज कराने जाने के वक्त से डॉ मनमोहन सिंह जी  ने हज़ारे / केजरीवाल के माध्यम से संघ से संबंध स्थापित किए  व कारपोरेट घरानों के सहयोग से भ्रष्टाचार संरक्षण आंदोलन शुरू करा दिया था।  परंतु सोनिया जी ने 2012 में मनमोहन जी को राष्ट्रपति व प्रणब जी को पी एम बनाने की मुहिम शुरू कर दी तब जापान से लौटते वक्त हवाई जहाज में ही ये साफ़गोई वाले मनमोहन जी ने कहा कि, वह जहां हैं वहीं ठीक हैं बल्कि तीसरा मौका मिले तो उसके लिए भी तैयार हैं जिसके परिणाम स्वरूप 2014 के चुनावों में सरकारी अधिकारियों / कर्मचारियों ने भी परिणाम प्रभावित करने में अपनी भूमिका अदा की है  । आज की मोदी सरकार के गठन में आर एस एस , भाजपा के साथ - साथ मनमोहन जी का भी अप्रत्यक्ष व महत्वपूर्ण हाथ है जिसको बताने की साफ़गोई से वह बखूबी बचे रहे हैं। इनके अलावा 1967,1975 ,1980,1989 में लिए गए इन्दिरा जी व राजीव जी के निर्णयों ने  भी 2014 में भाजपा को पूर्ण बहुमत तक पहुंचाने में RSS की भरपूर मदद की है।

 ~विजय राजबली माथुर ©

Friday, October 13, 2017

निष्पन्न अपराध है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ------ जगदीश्वर चतुर्वेदी


Jagadishwar Chaturvedi
22 mins

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"*( दिलचस्प बात यह है पुनरुत्थानवाद के नज़रिए का बड़े पैमाने पर आर्यसमाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती ने जमकर प्रचार किया। इस नज़रिए के अनेक पहलुओं का माधव सदाशिव गोलवलकर के नज़रिए से मेल बैठता है। यही वजह है कि आर्यसमाज का 1920-21 के बाद से लगातार साम्प्रदायिकता की ओर रुझान बढ़ा है। आज देश में अधिकांश स्थानों पर आर्यसमाज संगठन पर संघ का ही क़ब्ज़ा है। 
दयानन्द सरस्वती का मानना था कि भक्ति आंदोलन की कोई भूमिका नहीं है। वहीं पर एम.एस. गोलवलकर ने "वी ओर अवर नेशनहुड डिफाइंड" में लिखा है कि भगवान से बडा भर्त को मानने की मध्यकालीन परंपरा सही नहीं है इससे व्यक्तिवादिता का विकास हुआ और धार्मिक सामूहिकता का क्षय हुआ। )* "

जगदीश्वर चतुर्वेदी जी  जिनका उपरोक्त कथन उद्धृत किया है  मथुरा के हैं और वहीं स्वामी विरजनन्द जी से स्वामी दयानन्द जी ने शिक्षा ग्रहण की थी और उनके आदेशानुसार ही वेदों का प्रचार - प्रसार किया था। 1857 की क्रांति में सक्रिय भाग लेने वाले स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 1875 में 'आर्यसमाज ' की स्थापना 'कृण्वंतोंविश्वमार्यम ' अर्थात सम्पूर्ण विश्व को 'आर्ष ' = श्रेष्ठ बनाने हेतु की थी। सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित 'सत्यार्थ प्रकाश ' के पृष्ठ : 314 - 315 पर  एकादशसमुल्लास : में भागवत पुराण में वर्णित अवैज्ञानिक, अतार्किक बातों के संबंध में स्वामी दयानन्द सरस्वती के विचार दिये गए हैं, यथा ------ 
" वाहरे  वाह ! भागवत के बनाने वाले लालभुजक्कड़ ! क्या कहना ! तुझको ऐसी ऐसी मिथ्या बातें लिखने में तनिक भी लज्जा और शर्म न आई, निपट अंधा ही बन गया ! ........... शोक है इन लोगों की रची हुई इस महा असंभव लीला पर , जिसने संसार को अभी तक  भ्रमा रखा है। भला इन महा झूठ बातों को वे अंधे पोप और बाहर भीतर की फूटी आँखों वाले उनके चेले सुनते और मानते हैं। बड़े ही आश्चर्य की बात है कि, ये मनुष्य हैं या अन्य कोई ! ! !  इन भागवतादि  पुराणों  के बनाने वाले जन्मते ही ( वा ) क्यों नहीं गर्भ  ही में  नष्ट  हो गए ? वा जन्मते समय मर क्यों न गए  ? क्योंकि इन पापों से बचते तो आर्यावर्त्त देश दुखों से बच जाता । " 
स्पष्ट है कि, जैसे ढोंग और हिंदुवाद आर एस एस का है वैसा स्वामी दयानन्द का हो ही नहीं सकता क्योंकि वह तो देश-काल-लिंग-जाति-क्षेत्र के भेद भाव से परे समस्त विश्व को ही आर्य = आर्ष = श्रेष्ठ बनाना चाहते थे। 
स्वामी दयानन्द के उत्तराधिकारी स्वामी श्रद्धानंद की हत्या के बाद आर्यसमाज पर संघ ने हावी होना शुरू किया था और आज भी जकड़े है परंतु लगातार आर्यसमाज के भीतर से ऐसे दोहरे चरित्र वाले ( संघी / हिन्दू समर्थक ) लोगों का विरोध आगरा व लखनऊ में होते मैंने स्वम्य देखा है। अतः जगदीश्वर जी का स्वामी दयानंद  जी पर आरोप पूर्वाग्रह पूर्ण प्रतीत होता है और अवास्तविक एवं निराधार है। 
------ ~विजय राजबली माथुर ©





Sunday, October 1, 2017

प्रेमचंद ने ब्राह्मणवादी चेतना के विरुद्ध जो शंखनाद किया था उसे भूल कर लगभग पूरी कायस्थ बिरादरी .......? ------ अश्विनी श्रीवास्तव


Ashwani Srivastava
29 minsLucknow 
यशवंत सिन्हा प्रसंग 
प्रेमकुमार मणि
भाजपा नेता और भारत के पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा के लेख " I need to speak up now " ( इंडियन एक्सप्रेस , 27 सितम्बर ) ने तहलका मचा दिया है . यह लेख ऐसे समय पर आया है , जब गुजरात में प्रांतीय असेम्ब्ली के चुनाव होने जा रहे हैं और 2019 के तय लोकसभा चुनावों के भी बस डेढ़ साल रह गए हैं . मैं नहीं जानता , न ही इसकी जरुरत समझता हूँ कि श्री सिन्हा ने किसी व्यक्तिगत खुन्नस से ऐसा लिखा है . सिन्हा के तथ्य आंकड़ों से जुड़े हैं ,और उन्हें यूँ ही ख़ारिज नहीं किया जा सकता . न सिन्हा अर्थशास्त्री हैं , न जेटली , लेकिन दोनों वित्त मंत्री बने . एक पूर्व हो गए और दूसरे हैं . इसलिए सिन्हा के आरोपों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए . यह सच है कि आलोचना जब भीतर से फूटती है ,तब इसका अर्थ है मामला गंभीर है . राजीव गाँधी प्रचंड बहुमत के साथ मिस्टर क्लीन की छवि बनाये घूम रहे थे , लेकिन कांग्रेस के भीतर से ही जब वीपी सिंह ने बोफोर्स घोटाले के आरोप लगाए तब राजीव उससे उबर नहीं पाए . उस वक़्त भी इंडियन एक्सप्रेस ने ही पहल की थी . इस दफा ऐसा यदि हुआ , तब इंडियन एक्सप्रेस और सिन्हा दोनों एक बार फिर भावी इतिहास के उपकरण बनेंगे . राजीव गाँधी सरकार में वीपी सिंह भी वित्त मंत्री ही थे . रक्षा मंत्री बाद में बने थे .
लेकिन इस विवाद का एक दूसरा कोण भी हो सकता है . उस पर विचार करना बुरा नहीं होना चाहिए . क्या यह विवाद उस ब्राह्मण -कायस्थ संघर्ष की पुनरावृत्ति है , जो कुछ लोगों के अनुसार ख़त्म हो गई थी और मेरे जैसे लोगों के अनुसार हाइबरनेशन में चली गई थी ? दो सौ सालोँ तक यह लड़ाई जॉब चार्नक के शहर कोलकाता में चली . 1911 में जब कोलकाता से राजधानी उठकर दिल्ली आई तब यह लड़ाई भी दिल्ली चली आई . इस लड़ाई का पूरा ब्यौरा यहाँ एक पोस्ट में नहीं दिया जा सकता ,लेकिन देवासुर संग्राम ,महिषासुर -दुर्गा , शैव -वैष्णव या फिर बौद्ध -ब्राह्मण संग्राम की तरह यह संग्राम भी दिलचस्प है . शैव और वैष्णवों ने हाजीपुर के पास सांस्कृतिक समझौता किया था , वह स्थान आज भी हरि(विष्णु )हर (शिव ) अर्थात हरिहर क्षेत्र कहा जाता है और वहां हर साल विशाल मेला लगता है . बंगाल में कायस्थों और ब्राह्मणों की लड़ाई को थोड़ा विराम मिला रामकृष्ण -विवेकानंद के समझौते में . यह कायस्थों का ब्राह्मणवाद के प्रति समर्पण था . मैत्री भाव नहीं , गुरु चेला भाव . कायस्थों ने अपनी सांस्कृतिक क्रन्तिकारी भूमिका खो दी , और वर्णवादी ब्राह्मण परंपरा से जुड़ गए . इसीलिए हिंदुत्ववादी -ब्राह्मणवादी शक्तियां विवेकानंद का गुणगान करते थकतीं नहीं . पिछले पचास वर्षों में कायस्थों का इतना सांस्कृतिक पतन हुआ ,जिसका कोई हिसाब नहीं . प्रेमचंद ने ब्राह्मणवादी चेतना के विरुद्ध जो शंखनाद किया था उसे भूल कर लगभग पूरी कायस्थ बिरादरी आज संघ -भाजपा के ब्राह्मणवादी चौखटे पर माथा टेक चुकी है . 


लेकिन लगता है यशवंत सिन्हा ने सचमुच एक विद्रोह किया है . उन्होंने कर्पूरी ठाकुर के साथ काम किया है . वे थोड़े अक्खड़ हैं ,लेकिन डरपोक नहीं हैं . मैं अभी उनके अगले क़दमों का इंतज़ार करूँगा . कम से कम मेरी दिलचस्पी के पात्र तो वे हो ही गए हैं .
कायस्थों ने अपनी सांस्कृतिक क्रन्तिकारी भूमिका खो दी , और वर्णवादी ब्राह्मण परंपरा से जुड़ गए . इसीलिए हिंदुत्ववादी -ब्राह्मणवादी शक्तियां विवेकानंद का गुणगान करते थकतीं नहीं . पिछले पचास वर्षों में कायस्थों का इतना सांस्कृतिक पतन हुआ ,जिसका कोई हिसाब नहीं . प्रेमचंद ने ब्राह्मणवादी चेतना के विरुद्ध जो शंखनाद किया था उसे भूल कर लगभग पूरी कायस्थ बिरादरी आज संघ -भाजपा के ब्राह्मणवादी चौखटे पर माथा टेक चुकी है . 
साभार :
https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=812031442302886&id=100004881137091

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'कायस्थ' वर्णाश्रम व्यवस्था से ऊपर :


पौराणिक-पोंगापंथी -ब्राह्मणवादी व्यवस्था मे जो छेड़-छाड़ विभिन्न वैज्ञानिक आख्याओं के साथ की गई है उससे 'कायस्थ' शब्द भी अछूता नहीं रहा है।
 'कायस्थ'=क+अ+इ+स्थ
क=काया या ब्रह्मा ;
अ=अहर्निश;इ=रहने वाला;
स्थ=स्थित। 
'कायस्थ' का अर्थ है ब्रह्म से अहर्निश स्थित रहने वाला सर्व-शक्तिमान व्यक्ति। 


आज से दस लाख वर्ष पूर्व मानव जब अपने वर्तमान स्वरूप मे आया तो ज्ञान-विज्ञान का विकास भी किया। वेदों मे वर्णित मानव-कल्याण की भावना के अनुरूप शिक्षण- प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। जो लोग इस कार्य को सम्पन्न करते थे उन्हे 'कायस्थ' कहा गया। क्योंकि ये मानव की सम्पूर्ण 'काया' से संबन्धित शिक्षा देते थे  अतः इन्हे 'कायस्थ' कहा गया। किसी भी  अस्पताल मे आज भी जेनरल मेडिसिन विभाग का हिन्दी रूपातंरण आपको 'काय चिकित्सा विभाग' ही लिखा मिलेगा। उस समय आबादी अधिक न थी और एक ही व्यक्ति सम्पूर्ण काया से संबन्धित सम्पूर्ण जानकारी देने मे सक्षम था। किन्तु जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई शिक्षा देने हेतु अधिक लोगों की आवश्यकता पड़ती गई। 'श्रम-विभाजन' के आधार पर शिक्षा भी दी जाने लगी। शिक्षा को चार वर्णों मे बांटा गया-

1- जो लोग ब्रह्मांड से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'ब्राह्मण' कहा गया और उनके द्वारा प्रशिक्षित विद्यार्थी शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत जो उपाधि धारण करता था वह 'ब्राह्मण' कहलाती थी और उसी के अनुरूप वह ब्रह्मांड से संबन्धित शिक्षा देने के योग्य माना जाता था। 
2- जो लोग शासन-प्रशासन-सत्ता-रक्षा आदि से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'क्षत्रिय'कहा गया और वे ऐसी ही शिक्षा देते थे तथा इस विषय मे पारंगत विद्यार्थी को 'क्षत्रिय' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो शासन-प्रशासन-सत्ता-रक्षा से संबन्धित कार्य करने व शिक्षा देने के योग्य  माना जाता था। 
3-जो लोग विभिन व्यापार-व्यवसाय आदि से संबन्धित शिक्षा प्रदान करते थे उनको  'वैश्य' कहा जाता था। इस विषय मे पारंगत विद्यार्थी को 'वैश्य' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो व्यापार-व्यवसाय करने और इसकी शिक्षा देने के योग्य माना जाता था। 
4-जो लोग विभिन्न  सूक्ष्म -सेवाओं से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'क्षुद्र' कहा जाता था और इन विषयों मे पारंगत विद्यार्थी को 'क्षुद्र' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो विभिन्न सेवाओं मे कार्य करने तथा इनकी शिक्षा प्रदान करने के योग्य माना जाता था। 

ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि,'ब्राह्मण','क्षत्रिय','वैश्य' और 'क्षुद्र' सभी योग्यता आधारित उपाधियाँ थी। ये सभी कार्य श्रम-विभाजन पर आधारित थे । अपनी योग्यता और उपाधि के आधार पर एक पिता के अलग-अलग पुत्र-पुत्रियाँ  ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और क्षुद्र हो सकते थे उनमे किसी प्रकार का भेद-भाव न था।'कायस्थ' चारों वर्णों से ऊपर होता था और सभी प्रकार की शिक्षा -व्यवस्था के लिए उत्तरदाई था। ब्रह्मांड की बारह राशियों के आधार पर कायस्थ को भी बारह वर्गों मे विभाजित किया गया था। जिस प्रकार ब्रह्मांड चक्राकार रूप मे परिभ्रमण करने के कारण सभी राशियाँ समान महत्व की होती हैं उसी प्रकार बारहों प्रकार के कायस्थ भी समान ही थे।

 कालांतर मे व्यापार-व्यवसाय से संबन्धित वर्ग ने दुरभि-संधि करके  शासन-सत्ता और पुरोहित वर्ग से मिल कर 'ब्राह्मण' को श्रेष्ठ तथा योग्यता  आधारित उपाधि-वर्ण व्यवस्था को जन्मगत जाति -व्यवस्था मे परिणत कर दिया जिससे कि बहुसंख्यक 'क्षुद्र' सेवा-दाताओं को सदा-सर्वदा के लिए शोषण-उत्पीड़न का सामना करना पड़ा उनको शिक्षा से वंचित करके उनका विकास-मार्ग अवरुद्ध कर दिया गया।'कायस्थ' पर ब्राह्मण ने अतिक्रमण करके उसे भी दास बना लिया और 'कल्पित' कहानी गढ़ कर चित्रगुप्त को ब्रह्मा की काया से उत्पन्न बता कर कायस्थों मे भी उच्च-निम्न का वर्गीकरण कर दिया। खेद एवं दुर्भाग्य की बात है कि आज कायस्थ-वर्ग खुद ब्राह्मणों के बुने कुचक्र को ही मान्यता दे रहा है और अपने मूल चरित्र को भूल चुका है। कहीं कायस्थ खुद को 'वैश्य' वर्ण का अंग बता रहा है तो कहीं 'क्षुद्र' वर्ण का बता कर अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहा है। 

शूद्रक लिखित संस्कृत नाटक 'मृच्छ्कटिक ' में  कायस्थों को निम्न जाति का वर्णन किया गया है और ब्राह्मणों का सहायक घोषित किया गया है। यह सब 'चित्रगुप्त' की संतान बताने की काल्पनिक  ब्राह्मणवादी कहानी ( जिसे कायस्थ शिरोधार्य कर रहे हैं )का दुष्परिणाम है । 

यह जन्मगत जाति-व्यवस्था शोषण मूलक है और मूल भारतीय अवधारणा के प्रतिकूल है। आज आवश्यकता है योग्यता मूलक वर्ण-व्यवस्था बहाली की एवं उत्पीड़क जाति-व्यवस्था के निर्मूलन की।'कायस्थ' वर्ग को अपनी मूल भूमिका का निर्वहन करते हुये भ्रष्ट ब्राह्मणवादी -जातिवादी -जन्मगत व्यवस्था को ध्वस्त करके 'योग्यता आधारित' मूल वर्ण व्यवस्था को बहाल करने की पहल करनी चाहिए।

~विजय राजबली माथुर ©

Thursday, September 28, 2017

शाब्दिक अर्थ अनर्थ कर देते हैं : मर्म को समझना होगा ------ विजय राजबली माथुर

  



प्रस्तुत उद्धरण दुर्गा सप्तशती के 'अर्गला स्त्रोत ' के 24 वें श्लोक की प्रथम पंक्ति में प्रयुक्त शब्द के प्रयोग पर आपत्ति का है। इससे पूर्व गोवा की वर्तमान राज्यपाल मृदुला सिन्हा जी भी इसी शब्द पर आपत्ति उठा चुकी हैं। 
 * वस्तुतः इस भ्रम का कारण इन संस्कृत शब्दों का ' मर्म ' समझे बगैर  सिर्फ शाब्दिक अर्थ लेने के कारण है । सिर्फ साहित्यिक दृष्टिकोण से इनके मर्म को नहीं समझा जा सकता है। इसे संस्कृत के बीज गणितीय विश्लेषण के आधार पर समझना पड़ेगा तभी मर्म तक पहुंचा जा सकेगा। 

 * दुर्गा सप्तशती के ही ' कुंजिका स्त्रोत 'के 5 वें श्लोक में वर्णन है :

" विच्चे  चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिणी ' । । 5 । । 
अब यदि उदाहरण के अनुसार शाब्दिक अर्थ लेंगे तो लगेगा कि, अपने लिए 'भय ' मांगने की प्रार्थना की गई है। परंतु इसमें चाभयदा को संधि विच्छेद करके उच्चारण करना होगा जो इस प्रकार होगा --- 
च+अभय +दा = और अभय दें 
लेकिन पोंगा पंडित खुद भी गलत पढ़ते - बोलते हैं और न जानने के कारण सही अर्थ जनता को बताने में असमर्थ हैं। परिणाम अनर्थ के रूप में सामने आता है और वाचक या यजमान इसके दुष्परिणाम को भोगता है । जब आप प्रार्थना में 'भय' मांगेंगे तो भय ही तो मिलेगा !
 * इसी प्रकार चिंता एवं रोग निवारणार्थ गणेश स्तुति को समझें :

" सर्वकामप्रदम नृणाम सर्वोपद्रवनाशनम । । " 
इसमें सर्वोपद्रवनाशनम को संधि - विच्छेद करके पढ्ना  चाहिए , यथा --- 
सर्व + उपद्रव + नाशनम = सभी प्रकार के उपद्रवों को नष्ट करें। अब यदि ऐसा न करके सर्वोपद्रवनाशनम उच्चारण करेंगे तो उसका अर्थ होगा समस्त द्रव नष्ट कर दें। 
* समस्त कामनाओं की सिद्धि हेतु गणेश स्तुति में : 

" यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोर्यत:संपदोभक्त संतोषिका: स्यु:। " 
अब इसमें  ' बुद्धिरज्ञाननाशो ' को ज्यों का त्यों उच्चारण करेंगे तो उसका अर्थ होगा बुद्धि और ज्ञान नष्ट कर दें। इसको संधि - विच्छेद कर पढ्ना होगा : 
बुद्धिर  + अज्ञान + नाशो =  बुद्धि के अज्ञान को नष्ट कर दें। 

* अतः 'पत्नी मनोराम' का शाब्दिक अर्थ लेकर उद्वेलित होने के बजाए विद्व्जनों को इसके मर्म को समझना चाहिए। साहित्यिक काव्य - सृजन में रस, छंद, अलंकार का प्रयोग होने के कारण मात्रा आदि को संतुलित करने हेतु शब्द प्रयुक्त होते हैं। किसी किसी प्रार्थना में  ' जो कोई नर गावे ' शब्द प्रयुक्त होता है तब इसका अर्थ केवल पुरुषों के लिए लेना अनर्थ है। नर  या पत्नी जो भी शब्द होगा  वह सभी मनुष्यों के लिए होगा सिर्फ पुरुष या महिला के लिए नहीं और उसे उसी संदर्भ में ग्रहण करना तथा समझाना चाहिए। 

* अक्सर " स्त्रीं " शब्द प्रार्थना - स्तुति में आता है तब उसका साहित्यिक शाब्दिक अर्थ नारी या महिला नहीं होता है। इसको संधि - विच्छेद करें : 
स + त + र + ई + अनुस्वार = दुर्गा + तारण + मुक्ति + महामाया + दुखहर्ता । 
अर्थात " स्त्रीं " शब्द का मर्म हुआ : 
" दुर्गा मुक्तिदाता दुखहर्ता भवसागर तारिणी महामाया मेरे दुखों का नाश करें। "
इसी प्रकार अनेकानेक शब्द संस्कृत की स्तुतियों - प्रार्थनाओं में मिलेंगे जिनके शाब्दिक  अर्थ नहीं मर्म को समझना होगा जिसके लिए पोंगा - पंडितों का आसरा छोड़ना होगा।  
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पुनश्च : 
वरिष्ठ पत्रकार विनोद दुआ साहब ने एक कार्यक्रम में स्पष्ट किया है कि, वाईस चांसलर को हिन्दी में 'कुलपति ' कहा गया है तो यहाँ यह शब्द किसी महिला के पति के रूप में नहीं प्रयुक्त होता है। कुल का अर्थ परिवार से है और विश्वविद्यालय को एक परिवार माना गया है उस परिवार का पति यहाँ ' पिता ' या ' संरक्षक ' के रूप में प्रयुक्त हुआ है। 
विनोद जी का तर्क युक्तिसंगत है। क्योंकि देश के प्रेसिडेंट को ' राष्ट्रपति ' कहा गया है तो यहाँ भी एक राष्ट्र परिवार के पिता या संरक्षक के रूप में ही यह शब्द प्रयुक्त हुआ है। 
अतः उपयुक्त यही है कि, शब्दों के ' मर्म ' पर ध्यान दिया जाये और बेवजह उद्वेलित या परेशान न हुआ जाये। 
  ~विजय राजबली माथुर ©