महद आश्चर्य !

सोमवार, 4 जून 2012

कबीर को क्यों याद करें?




            ( यह वीडियो अपर्णा मनोज जी की फेसबुक वाल से 02 मार्च 2012 को लिया गया है। )

संतकबीर 




गत वर्ष मैंने कबीर दास जी पर यह विचार दिये थे-

http://krantiswar.blogspot.in/2011/06/blog-post_15.html

आज 615वी कबीर जयंती पर भी उनको दोहराना उपयुक्त रहेगा ।



"चौदह सौ पचपन साल गये,चंद्रवार एक ठाट ठये.
जेठ सुदी बरसायत को ,पूरनमासी प्रगट भये .."   

'कबीर चरित्र बोध' ग्रन्थ के अनुसार कबीर-पंथियों ने सन्त कबीर का जन्म सम्वत १४५५ की जेठ शुक्ल पूर्णिमा को माना है.

कबीर की रचनाओं में काव्य के तीन रूप मिलते हैं-साखी,रमैनी और सबद .साखी दोहों में,रमैनी चौपाइयों में और सबद पदों में हैं.साखी और रमैनी मुक्तक तथा सबद गीत-काव्य के अंतर्गत आते हैं .इनकी वाणी इनके ह्रदय से स्वभाविक रूप में प्रवाहित है और उसमें इनकी अनुभूति की तीव्रता पाई जाती है.


वैसे सभी रोते रहते हैं भ्रष्टाचार को और कोसते रहते हैं राजनेताओं को ;लेकिन वास्तविकता समझने की जरूरत और फुर्सत किसी को भी नहीं है.भ्रष्टाचार-आर्थिक,सामजिक,राजनीतिक,आध्यात्मिक और धार्मिक सभी क्षेत्रों में है और सब का मूल कारण है -ढोंग-पाखंड पूर्ण धर्म का बोल-बाला.



कबीर के अनुसार धर्म  

कबीर का धर्म-'मानव धर्म' था.मंदिर,तीर्थाटन,माला,नमाज,पूजा-पाठ आदि बाह्याडम्बरों ,आचार-व्यवहार तथा कर्मकांडों की इन्होने कठोर शब्दों में निंदा की और 'सत्य,प्रेम,सात्विकता,पवित्रता,सत्संग (अच्छी सोहबत न कि ढोल-मंजीरा का शोर)इन्द्रिय -निग्रह,सदाचार',आदि पर विशेष बल दिया.पुस्तकों से ज्ञान प्राप्ति की अपेक्षा अनुभव पर आधारित ज्ञान को ये श्रेष्ठ मानते थे.ईश्वर की सर्व व्यापकता और राम-रहीम की एकता के महत्त्व को बता कर इन्होने समाज में व्याप्त भेद-भाव को मिटाने प्रयास किया.यह मनुष्य मात्र को एक समान मानते थे.वस्तुतः कबीर के धार्मिक विचार बहुत ही उदार थे.इन्होने विभिन्न मतों की कुरीतियों संकीर्णताओं  का डट कर विरोध किया और उनके श्रेयस्कर तत्वों को ही ग्रहण किया.

लोक भाषा को महत्त्व 

कबीर ने सहज भावाभिव्यक्ति के लिए साहित्य की अलंकृत भाषा को छोड़ कर 'लोक-भाषा' को अपनाया-भोजपुरी,अवधी,राजस्थानी,पंजाबी,अरबी ,फारसी के शब्दों को उन्होंने खुल कर प्रयोग किया है.यह अपने सूक्ष्म मनोभावों और गहन विचारों को भी बड़ी सरलता से इस भाषा के द्वारा व्यक्त कर लेते थे.कबीर की साखियों की भाषा अत्यंत सरल और प्रसाद गुण संपन्न है.कहीं-कहीं सूक्तियों का चमत्कार भी दृष्टिगोचर होता है.हठयोग और रहस्यवाद की विचित्र अनुभूतियों का वर्णन करते समय कबीर की भाषा में लाक्षणिकता आ गयी है.'बीजक''कबीर-ग्रंथावली'और कबीर -वचनावली'में इनकी रचनाएं संगृहीत हैं.
(उपरोक्त विवरण का आधार हाई-स्कूल और इंटर में चलने वाली उत्तर-प्रदेश सरकार की पुस्तकों से लिया गया है)



कबीर के कुछ  उपदेश 

ऊंचे कुल क्या जनमियाँ,जे करणी उंच न होई .
सोवन कलस सुरी भार्या,साधू निंदा सोई..

हिन्दू मूये राम कही ,मुसलमान खुदाई.
कहे कबीर सो जीवता ,दुई मैं कदे न जाई..

सुखिया सब संसार है ,खावै अरु सोवै.
दुखिया दास कबीर है ,जागे अरु रोवै..

दुनिया ऐसी बावरी कि,पत्थर पूजन जाए.
घर की चकिया कोई न पूजे जेही का पीसा खाए..

कंकर-पत्थर जोरी कर लई मस्जिद बनाये.
ता पर चढ़ी मुल्ला बांग दे,क्या बहरा खुदाय

..इस प्रकार हम देखते हैं कि,सन्त कबीर की वाणी आज भी ज्यों की त्यों जनोपयोगी है.तमाम तरह की समस्याएं ,झंझट-झगडे  ,भेद-भाव ,ऊँच-नीच का टकराव ,मानव द्वारा मानव का शोषण आदि अनेकों समस्याओं का हल कबीर द्वारा बताये गए धर्म-मार्ग में है.कबीर दास जी ने कहा है-

दुःख में सुमिरन सब करें,सुख में करे न कोय.
जो सुख में सुमिरन करे,तो दुःख काहे होय..


अति का भला न बरसना,अति की भली न धुप.
अति का भला न बोलना,अति की भली न चूक..

मानव जीवन को सुन्दर,सुखद और समृद्ध बनाने के लिए कबीर द्वारा दिखाया गया मानव-धर्म अपनाना ही एकमात्र विकल्प है-भूख और गरीबी दूर करने का,भ्रष्टाचार और कदाचार समाप्त करने का तथा सर्व-जन की मंगल कामना का.

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जैसा कि शोषक वर्ग दूसरे जन-हितैषी सुधारकों के साथ छल करता आया है उसने कबीर दास जी के साथ भी किया है । उनके मंदिर बना दिये गए हैं उनकी मूर्तियाँ स्थापित कर दी गई हैं। खुद कबीर दास जी जीविकोपार्जन हेतु श्रम करते थे-कपड़ा बुनते थे,सूत कातते थे।उन्होने हर तरह के ढोंग का विरोध किया-

कंकर-पत्थर जोड़   कर लई मस्जिद        बनाए। 
ता पर चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय । । 


दुनिया ऐसी  बावरी कि          पत्थर पूजन जाये। 
घर की चकिया कोई न पूजे जेही का पीसा खाये। ।  

कबीर दास जी के बाद स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी जनता को जागरूक करने का बीड़ा उठाया था। किन्तु आज इन दोनों महात्माओं को भी जातिगत खांचे मे डाल कर उनकी आलोचना का फैशन चला हुआ है। ढोंग-पाखंड और आडंबर का जबर्दस्त बोल-बाला है। स्वामी,बापू,भगवान न जाने क्या-क्या बन कर लुटेरे जनता को ठग रहे हैं और जनता खुशी से लुट रही है। सीधी-सच्ची बात किसी को समझ नहीं आ रही है जो जितना ज्यादा खुद को काबिल बता रहा है वही उतना ही कूपमंडूकता पर चल रहा है। तथा-कथित प्रगतिशील और आधुनिक विज्ञानी होने का दावा करने वाले ही ढोंग-पाखंड-आडंबर को बढ़ावा देने मे आगे-आगे हैं।

आज भी मानवता को यदि बचाना है तो 'संत कबीर 'को याद करना ही पड़ेगा ,उनकी सीख पर ध्यान देना ही पड़ेगा। 










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शुक्रवार, 1 जून 2012

ब्लाग -लेखन के दो वर्ष बाद भी -"अकेला हूँ मैं"

सर्व-प्रथम आज 01 जून अंतर्राष्ट्रीय बाल दिवस पर दुनिया के सभी बच्चो को मंगलकामनाएं। 


अब अपनी बात-



02 जून 2010 को इस ब्लाग मे पहला लेख दिया था-"आठ और साठ घर मे नहीं" जो एक स्थानीय अखबार मे पूर्व मे प्रकाशित हो चुका था। आज  आयु साठ वर्ष पूर्ण करने के बाद जब इस ब्लाग लेखन के भी दो वर्ष पूर्ण हो रहे हैं तो मैं यह कह सकने की स्थिति मे हूँ कि अपनी तरह के लेखन मे मैं ब्लाग जगत मे बिलकुल अकेला हूँ। एक ब्लागर् साहब  ने बड़ी मेहनत से सभी ब्लागरों की श्रेणियाँ बनाई थीं और उनके चरित्र बताए थे शायद उनमे से भी किसी खांचे मे मैं फिट नहीं हूँ। मैंने प्रारम्भ मे ही सूचित किया था कि 'स्वांत: सुखाय,सर्वजन हिताय' मेरे लेखन का उद्देश्य है। टिप्पणियों को मुद्दा बना कर अनेक ब्लागर्स ने कहा कि जो लोग स्वांत: सुखाय लिखते हैं उन्हें टिप्पणी बाक्स बंद कर देना चाहिए। मैंने ऐसा किया भी था तब उन लोगों को दिक्कत हुई जो निष्पक्ष टिप्पणियाँ देना चाहते थे अतः उनकी सुविधा हेतु पुनः टिप्पणी बाक्स को खोलना  पड़ा। कुछ ब्लागर्स लिखते हैं यह लेंन -देंन(give&take)है मैं इस सिद्धान्त से पूर्णतया असहमत हूँ। अपने अनुभव और ज्ञात ज्ञान के आधार पर हमने जो विचार दिये उससे कोई भी किसी भी कारण से असहमत हो सकता है,यदि वह तर्क संगत बात प्रस्तुत करता है तो उसका स्वागत है किन्तु यहाँ तो ब्लागर्स अहंकार मे डूबे हुये हैं वे खुद को खुदा और दूसरों को बेवकूफ समझते है। मेरे कई लेखों पर ऐसी टिप्पणियाँ दी गई हैं-"यह मूर्खतापूर्ण कथा है","यह आप क्या बेपर की उड़ा रहे हैं" आदि-आदि। उस पर भी तुर्रा यह कि ब्लागर्स उम्दा लिखते हैं फेसबुक पर 'बकवास' होती है। 'जाकी रही भावना जैसी,प्रभु  मूरति देखि  तिन तैसी'। जिसकी फेसबुक लिस्ट मे जैसे लोग होंगे वैसा ही तो लिखेंगे। मैंने तो तमाम अन्ना/रामदेव भक्तों को अपनी लिस्ट से हटा दिया था जिन लोगों ने तर्क न आने पर कुतर्कपूर्ण बातें जैसे-'वाहियात','नानसेन्स','बंगाल की खाड़ी मे डुबो दिया जाएगा' शब्दों का प्रयोग किया था। यदि ऐसे ढपोर शंखों को न हटाता तो मेरी फेसबुक लिस्ट भी  हजारों की संख्या छूती किन्तु मैंने उसे दो सौ के ऊपर  पर समेटा हुआ है और आँख बंद करके किसी भी रिकुएस्ट को स्वीकार नहीं करता हूँ।पोंगा-पंथ आदि के समर्थक ज्ञात होते ही एक पल मे अपनी लिस्ट से ऐसे लोगों को हटा देता हूँ।मेरे ज्योतिषयात्मक विश्लेषण की खिल्ली उड़ाने वाले ब्लागर(जिसे ब्लैक मेलर कहना ज़्यादा उपयुक्त होगा क्योंकि वह कई ब्लागर्स से  उनकी रचनाएँ छपवाने   का प्रलोभन दे कर धन उगाही मे ही संलिप्त रहता है ) के प्रशंसक और सहयोगी ब्लागर्स के ब्लाग अनफालों करते हुये उन्हे फेसबुक लिस्ट से तत्काल हटा दिया था।

ब्लागर्स पढ़ें या न पढ़ें फेसबुक लिंक के माध्यम से न केवल फ्रेंड-लिस्ट मे शामिल लोगों बल्कि विभिन्न ग्रुप्स के जरिये उन लोगों तक भी जो सीधे-सीधे फ्रेंड लिस्ट मे शामिल नहीं हैं संदेश पहुँच जाता है। अतः मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि फेसबुक तो ब्लाग-लेखन का उद्देश्य सिद्ध करने मे बहुत सहायक है। यदि फेसबुक पर कुछ लोग जो बिगड़े हुये अमीर हैं गलत हैं तो ब्लाग जगत मे तो 99 .9 प्रतिशत लोग हेंकड़ी,अहंकार,अहम मे डूब कर रचनाएँ कर रहे हैं। एक ब्लागर दूसरे ब्लागर को नीचा दिखाने के  प्रयासो मे ही लगा रहता है। मैं घोषित रूप से 'ढोंग-पाखंड' का विरोध करता हूँ तो अनेकों ब्लागर्स 'ढोंग-पाखंड' को बढ़ावा देने हेतु एक के बाद एक पोस्ट लिखते जा रहे हैं। मेरे ज्योतिषीय विश्लेषण के सटीक निकलने पर दूसरे ब्लाग मे टिप्पणी के माध्यम से उसकी खिल्ली उड़ाई गई।खिल्ली उड़ाने वाले इस ब्लागर के एक समर्थक का दृष्टिकोण है कि चूंकि आपने निशुल्क सहायता उस ब्लागर को दी थी इसलिए वह आपको मूर्ख समझता है। यह ब्लागर्स ब्रांड  आधुनिक सोच है कि निशुल्क सहायता का एहसान मानने की बजाए उसे मूर्खता समझ कर उसकी खिल्ली उड़ाई जाये।  मेरे पिछले कई लेखों को एक साथ निरर्थक घोषित करने हेतु कुछ ब्लागर्स तो स्वामी दयानंद सरस्वती तक पर प्रहार कर रहे हैं उनको अज्ञानी साबित करने पर आमादा हैं।

देश को आज़ाद हुये 65 वर्ष पूर्ण होने वाले हैं परंतु अभी तक लोगों के दिलो-दिमाग से गुलामी की बू नहीं निकली है। विदेशी शासकों ने हमारे देश की संस्कृति और साहित्य को यहीं के पद-लूलुप,धन-पिपासू विद्वानों की सहायता से विकृत करा दिया था अब उसका परिष्करण किया जाना चाहिए था किन्तु इसके विपरीत आज बड़ी तेज़ी से 'सांस्कृतिक-साहित्यिक आक्रमण' करके देश और इसकी एकता को छिन्न-भिन्न करने का प्रयास विदेशी साम्राज्यवादी शक्तियों के हित  मे किया जा रहा है। "समाजवाद और वेदिक मत" के माध्यम से मैंने सृष्टि से अब तक का संक्षिप्त वर्णन देकर स्पष्ट किया था समाज मे समानता के सिद्धान्त को ध्वस्त करने हेतु देश-द्रोही शक्तियाँ गलत व्याख्याये प्रस्तुत कर रही हैं तब से इस क्रम मे  और तीव्रता से वृद्धि हुई है।

जो विदेशी भारत आकर यहीं बस गए उन्होने जनता पर अपनी पकड़ मज़बूत करने हेतु यहाँ विद्वानो को उपकृत करके 'कुरान' की त्तर्ज पर 'पुराण' लिखवाये जिनमे हमारे महापुरुषों का चरित्र हनन किया गया है। दुर्भाग्य की बात है कि आज उन  सब पुराण का अंध-प्रकोप फैला हुआ है जिसने जीवन के सभी आयामो मे भ्रष्टाचार कूट-कूट कर भर दिया है। बाद मे आए यूरोपीय शासकों ने तो और भी हद कर दी। भारत के इतिहास को उलट -पलट दिया गया ,विकृत कर दिया गया। लेंनपूल,कर्नल टाड आदि और इन्ही के स्वर मे स्वर मिलाते हुये आर सी माजूमदार सरीखे भारतीय इतिहासकारों ने देश को एक सांप्रदायिक इतिहास प्रदान किया। इन इतिहासकारों ने आर्यों को आक्रांता घोषित किया और उनका मूल उद्गम दक्षिण-पश्चिम एशिया मे मेसोपोटामिया को बताया। 'हिटलर' की पुस्तक के पृष्ठ 85 के हवाले से कुछ लोगों ने यूरोप को आर्यों का मूल उद्गम बताया। आज देश मे एक ज़बरदस्त बहस छिड़ी हुई है भारत के मूल निवासियों की सत्ता स्थापना की। इस हेतु आर्यों को विदेशी बता कर उनकी कटु आलोचना की जा रही है। महात्मा गौतम बुद्ध को मूल निवासी बताया जा रहा है जबकि उन्होने खुद प्रत्येक शब्द के पूर्व 'आर्य सत्य है' लगाया है जबकि आज इसे आर्यों का षड्यंत्र बताया जा रहा है। कहाँ हैं हमारे ब्लाग -जगत के विद्वान शूर-वीर?क्या वे आत्म-प्रशंसा या एक दूसरे की प्रशंसा मे ही रचना संसार चलाते रहेंगे?



समाज-शास्त्र (Sociology) की बी ए की पुस्तक मे पढ़ा था कि-'जिस प्रकार धुए को देख कर ज्ञात होता है कि आग लगी है और गर्भिणी को देख कर भान होता है कि संभोग हुआ है उसी प्रकार मानव के विकास क्रम मे कुछ कड़ियाँ अभ भी मिल जाती हैं जिनसे अतीत का भान होता है।'इस आधार पर विदेशी विद्वानों के निष्कर्ष और उनके अनुयाईओ का भ्रामक प्रचार अतार्किक और अवैज्ञानिक सिद्ध होता है। मैक्समूलर साहब जर्मनी से आए भारत मे तीस वर्ष रहे यहीं पर संस्कृत सीखी और यहाँ से मूल पांडुलिपियाँ लेकर जर्मन रवाना हो गए। जर्मन भाषा मे अनुवाद प्रकाशित कराये जिनके आधार पर वहाँ और पूरे यूरोप मे वैज्ञानिक क्रांति हुई। आज यूरोप को विज्ञान का सिरमौर माना जा रहा है क्योंकि हमारे पूर्वज देशवासी अपनी धरोहर को सम्हाल कर न रख सके तो वे अनाड़ी और मूर्ख करार दे दिये जा रहे हैं। 'परमाणु बम' का आविष्कार इन ग्रन्थों की सहायता से जर्मन मे हुआ उसकी पराजय के बाद अमेरिका और रूस ने इन वैज्ञानिकों को बाँट लिया जिसके फल् स्वरूप यू एस ए और रूस मे एटम बम बनाए गए, इसी प्रकार हेनीमेन साहब ने  होम्योपैथी, शुसलर साहब ने बायोकेमिक और कार्ल मार्क्स ने साम्यवाद आदि के जो  सिद्धान्त प्रतिपादित किए वे  भारत से ही जर्मन पहुंचे हैं जिसे हिटलर ने अपना बता दिया था।वस्तुतः 'साम्यवाद' के सिद्धान्त 'वेदों'से ही निकले हैं किन्तु दुखद है कि भारत के साम्यवादी इस वास्तविक सत्य को स्वीकार न करने के कारण जनता से अलग-थलग पड़े हैं। नतीजतन साम्राज्यवादियों के हितार्थ स्थापित RSS और उसके संगठन जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ने मे कामयाब हो जाते हैं। 

आज से दस लाख वर्ष पूर्व जब मानव का उद्भव हुआ तो सम्पूर्ण पृथ्वी पर तीन स्थानों -1-त्रिवृष्टि-आधुनिक तिब्बत,2-मध्य अफ्रीका महाद्वीप और 3- मध्य यूरोप मे 'युवा स्त्री' और 'युवा पुरुष' के रूप मे सृष्टि प्रारम्भ हुई थी। आज विश्व की सम्पूर्ण आबादी उन्हीं की वंशज है। भौगोलिक जलवायु के अनुसार अफ्रीका, यूरोप और एशिया के मानव भिन्न- रूप,रंग,आकार-प्रकार के हैं। प्राकृतिक सुविधा के अनुसार 'त्रिवृष्टि' अर्थात तिब्बत मे उत्पन्न मानव दूसरे स्थानो पर उत्पन्न मानव से ज्ञान-विज्ञान मे श्रेष्ठ था जिसे आर्ष पुकारा गया वही शब्द अब आर्य कहलाता है। किन्तु आर्यों को विदेशी आक्रांता बताते हुये इसकी उत्पत्ति 'अरि' (शत्रु)के रूप मे बता कर आर्यों पर हमला बोलने का आहवाहन किया जा रहा है। आर्यों के विस्तार का विकृत इतिहास इसका प्रमाण बताया जा रहा है।


आर्य न कोई जाति थी न है। आर्य=आर्ष=श्रेष्ठ। ज्ञान-विज्ञान इस श्रेष्ठता का आधार था न कि रूप,रंग या नस्ल। त्रिवृष्टि मे जन-संख्या वृद्धि होने पर आर्ष या आर्य लोग हिमालय पार कर उत्तर भारत के निर्जन प्रदेश पर आ गए और इसे आर्यावृत्त नाम दिया यहाँ पहले आबादी थी ही नहीं तो आक्रमण करने या मूल निवासियों को कुचलने का प्रश्न कहाँ से आ गया?साम्राज्यवादियो की विभाजनकारी थीसिस है यह सिद्धान्त। बाद मे जंबू द्वीप भी आर्यावृत्त से जुड़ गया तो बढ़ती आबादी वहाँ भी पहुंची वहाँ भी आक्रमण या किसी को कुचलने की बात नहीं थी। आर्य-द्रविड़ झगड़ा अंग्रेज़ इतिहासकारों की कपोल - कल्पना है जो आज भी  भारत और श्रीलंका मे तनाव उत्तपन्न किए हुये है।

यह अफसोसनाक ही है कि साम्यवादी विद्वान भी आर्यों को विदेशी आक्रांता ही मानते हैं जैसा कि साम्राज्यवादियों ने घोषित कर रखा है। मार्क्स के अनुयायी तपाक से कह देते हैं कि आर्यों को भारत का मूल मानने का सिद्धान्त आर एस एस का हैं। वे यह भूल जाते हैं कि आर एस एस आर्यों =श्रेष्ठ कार्यों की बात नहीं करता है वह तो साम्राज्यवादियो द्वारा रटाये'हिंदूवाद' की बात करता है अब भी अमेरिकी इशारे पर नरेंद्र मोदी को 2014 के चुनावों मे हिन्दू हीरो के तौर पर पेश करने की तैयारी चल रही है जो सांम्प्रदायिक मसीहा है । सांप्रदायिकता और साम्राज्यवाद सगी बहने हैं। 


भारत से कुछ आर्ष=आर्य विद्वानों के दल दूसरे स्थान के मानवों को भी आर्य=श्रेष्ठ बनाने हेतु गए उनका उद्देश्य ज्ञान-विज्ञान का प्रचार व प्रसार करना था न कि किसी को उजाड़ना। जो दल पश्चिम पर्वत माला को पार कर बाहर गया था उसका पहला पड़ाव जहां हुआ उसे 'आर्यनगर' कहा गया जो भाषाई बदलाव से 'ऐरयान' फिर 'ईरान' हो गया। यहाँ के अंतिम शासक खुद को आर्य मेहर रज़ा पहलवी कहते थे। लेकिन विदेशियों से प्रभावित विद्वान ईरानियों को असली आर्य घोषित कर रहे हैं। यह दल आगे मध्य एशिया होते हुये यूरोप भी पहुंचा जहां उसका पड़ाव जर्मन के आस-पास था।

पूर्व क्षेत्र की पर्वत माला को पर कर जो दो ऋषि-मय और तक्षक चले वे वर्तमान साईबेरिया के ब्लाडीवोस्ट्क को पार करते हुये वर्तमान उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के 'अलास्का' से प्रविष्ट हुये और दक्षिन्न की ओर चले। जहां तक्षक ऋषि ने पड़ाव डाला वह आज भी उन्ही के नाम पर ' टेक्सास' कहलाता है जहां जान एफ केनेडी को गोली मारी गई थी। मय ऋषि ने दक्षिण अमेरिका के जिस स्थान पर पड़ाव डाला वह आज भी उनके नाम पर 'मेक्सिको' कहलाता है।

दक्षिण दिशा से जाने वाले ऋषियों का नेतृत्व 'पुलत्स्य मुनि'ने किया था जिनहोने वर्तमान आस्ट्रेलिया महाद्वीप मे पड़ाव डाला था। शेष स्थानों पर गए ऋषि-मुनि ज्ञान-विज्ञान के प्रसार तक ही सीमित रहे किन्तु पुलत्स्य मुनि के पुत्र 'विश्रवा'ने वहाँ से लंका  मे आ कर  सत्ता अपने हाथ मे ले ली और तत्कालीन शासक 'सोमाली' को आस्ट्रेलिया के पास के प्रदेश मे भेज दिया जो आज भी उसी के नाम पर 'सोमाली लैंड' कहलाता है। 'विश्रवा'के मध्यम पुत्र 'रावण' ने बड़े भाई 'कुबेर' को भगा कर छोटे भाई विभीषण को मिला कर वहाँ  सत्तारूढ़ हो गया।

भारत से बाहर बसे आर्य खुद को 'रक्षस'=रक्षा करने वाले कहते थे। अर्थात उनका दावा था कि वे आर्य सभ्यता और संस्कृति की रक्षा करने वाले हैं। 'रक्षस' अपभ्रंश हो कर 'राक्षस' कहलाया। अंग्रेज़ इतिहासकारों ने राम-रावण युद्ध जो भारतीय और प्रवासी-साम्राज्यवादी आर्यों के मध्य था को भी आर्य-द्रविड़ संघर्ष के रूप मे प्रचारित किया है। स्वामी दयानन्द को अंग्रेज़ शासक रिवोल्यूशनरी संत कहते थे क्योंकि वह 1857 के प्रथम-संग्राम मे भी भाग ले चुके थे। अतः आज भी साम्राज्यवादियों का पहला प्रहार दयानंद पर ही है। दयानन्द सरस्वती की शिक्षाओं को ध्वस्त करने हेतु प्रथम भारतीय पोस्ट मास्टर जेनरल के अवकाश ग्रहण करने पर साम्राज्यवादियों के हितार्थ स्थापित राधास्वामी मत की कमान सम्हालने को कहा गया । उनके आध्यात्मिक रूपान्तरण का लाभ लेकर 'सत्यार्थ प्रकाश' का खंडन करने हेतु 'यथार्थ प्रकाश' की रचना हुई जिसमे स्वामी दयानन्द के सिद्धांतो को गलत और झूठा सिद्ध करने का घिनौना प्रयास किया गया है(यह अलग बात है कि उनकी छ्ठ्वी पीढ़ी के अधिष्ठाता स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी भी बने ) । आज तो अनेकों ढपोर शंख बापू और स्वामी कहलाकर आध्यात्मिकता के नाम पर आडंबर और भ्रष्टाचार खुले आम फैला रहे हैं जो कि 'नव उदारवाद' का उपहार है। कितने प्रतिशत ब्लागर्स इस सब कुराफ़त का विरोध कर रहे हैं?कोई करे या न करे हमे तो अन्याय और असत्य के विरुद्ध संघर्ष करना ही है। इसीलिए 'मैं अकेला हूँ'। 
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बृहस्पतिवार, 24 मई 2012

प्रेरणादाता को आत्मीय श्रंधाजली

24 मई पुण्य तिथि पर एक स्मरण -बी पी सहाय साहब

स्व. बिलासपति सहाय साहब( पूनम के पिताजी ) को यह संसार छोड़े अब 12 वर्ष हो गए हैं और 12 वर्षों का एक युग माना जाता है। मुझे ज्योतिष को व्यवसाय के रूप मे अपनाने का परामर्श उन्होने ही दिया था और उनकी मृत्यु के लगभग 07 माह बाद उनके मत के क्षेत्र दयाल बाग(आगरा) मे मैंने उन्ही की पुत्री के नाम पर अपना ज्योतिष कार्यालय खोला भी था जिसे बाद मे वहाँ घर पर स्थानांतरित कर दिया था। अब यहाँ लखनऊ मे पूनम की राय पर ही कार्यालय का नाम बदल दिया गया है। सहाय साहब के बारे मे ज्योतिषयात्मक विश्लेषण आगरा के अखबार मे छ्पा था जिसकी स्कैन कापी ऊपर के चित्र मे देख सकते हैं।

बी पी सहाय साहब सरकारी सेवा से अवकाश ग्रहण करने के उपरांत मृत्यु पर्यंत 'पटना हाई स्कूल ओल्ड ब्वायज एसोसिएशन'मे सक्रिय रहे। उनके सभी सहपाठी उच्च पदो पर रहे जिनमे बिहार के पूर्व मुख्य सचिव के के श्रीवास्तव साहब का नाम प्रमुख है। 11 अगस्त 1942 के छात्र आंदोलन मे शहीद हुये एक क्रांतिकारी के भाई भी उनके सहपाठी थे। पटना सचिवालय के पास जो सप्त्मूर्ती हैं उनमे से एक मूर्ति उनके सहपाठी के अनुज की भी है। सरकारी सेवा के सम्पूर्ण काल मे उन्होने पूरी ईमानदारी से कार्य किया और न खुद कभी रिश्वत ली न अधीन्स्थों को लेने दी जबकि सिंचाई विभाग मे सर्किल आफिसर थे । नतीजतन उनके अनेक शत्रु रहे और आर्थिक स्थिति सदैव डांवा-डॉल रही। यही कारण है कि जन्म से अपने पिताजी  की ईमानदारी देखने के कारण पूनम को मेरे ईमानदारी पर चलने और परेशानी उठाने पर कोई एतराज़ नहीं है। यही वजह थी कि उन्होने मेरे बाबूजी द्वारा भेजे एक पोस्ट कार्ड को वरीयता दी और पूनम का विवाह मुझ से कर दिया।


जैसा कि अक्सर होता है और मेरे साथ पूरे तौर पर चरितार्थ है कि ईमानदार व्यक्ति को अपने घर-परिवार से भी सहयोग नहीं मिलता है बल्कि खींच-तान का सामना करना पड़ता है। मेरे बाबूजी भी इसी परिस्थिति से अपनी ईमानदारी की वजह से गुजरे और पूनम के बाबू जी भी इसी राह के राही रहे। पूनम के विवाह के समय उनके भाइयों ने ही उन्हें गुमराह करने का प्रयास किया  किन्तु अंततः वह भटके नहीं। यदि मैंने उनके परामर्श को न माना होता तो आज भी मुनीमगिरी ही कर रहा होता। वह आजीविका का कार्य विरोधाभासी था क्योंकि मै मजदूर आंदोलन मे सक्रिय था और व्यापारी वर्ग मजदूरों का शोषक होता है।उन्होने मेरी मानसिकता और क्षमता का पूर्वाङ्क्लन करते हुये मुझसे ज्योतिष को शौक के स्थान पर व्यवसाय के रूप मे अपनाने को कहा। वह मेरे कम्युनिस्ट आंदोलन मे शामिल रहने को बुरा नहीं समझते थे क्योंकि उनके छोटे बहनोई स्व.शशीभूषण प्रसाद जी मधुबनी के उसी डिग्री कालेज मे एकोनामिक्स पढ़ाते थे जिसमे पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री कामरेड चतुरानन मिश्रा जी भी एकोनामिक्स पढ़ाते थे। कामरेड चतुरानन मिश्र फूफाजी साहब के घर भी आते रहते थे और इनकी बातों का ज़िक्र वह बाबूजी साहब से करते रहते थे।


 समाज मे ज्योतिषी के रूप मे एक पहचान सम्मानजनक तो है ही इसमे भी छल-छढ्म से दूर रहने के कारण मुझे संतोष रहता है कि मैंने किसी का कुछ भला तो किया । हालांकि कुछ लोग ईमानदारी और सच्चाई पर चलने के कारण मुझे बेवकूफ और कमजोर सिद्ध करने का प्रयास करते रहते हैं। पूना मे प्रवास कर रहे और पटना से संबन्धित एक ब्लागर का कृत्य ऐसा ही रहा। व्यक्तिगत रूप से ज्योतिषयात्मक राय लेने के बाद उक्त ब्लागर ने मेरे विश्लेषण को गलत सिद्ध कराने का असफल प्रयास भी किया जिस कारण मुझे श्रीमती शबाना आज़मी,सुश्री रेखा और X-Y संबन्धित  ज्योतिषयात्मक विश्लेषण देने पड़े। एक सप्ताह के भीतर सुश्री रेखा के राज्यसभा मे मनोनीत हो जाने पर जहां मेरे विश्लेषण की सटीकता सिद्ध होती थी उक्त ब्लागर ने एक अन्य ब्लाग पर उसकी खिल्ली उड़ाई। वस्तुतः पटना से संबन्धित उक्त ब्लागर ने मेरे ज्योतिषीय ज्ञान की खिल्ली नहीं उड़ाई है बल्कि पटना के होनहार भविष्यदृष्टा स्व .बिलासपति सहाय साहब की खिल्ली उड़ाई है क्योंकि ज्योतिष को व्यवसाय बनाने का सुझाव उन्होने ही मुझे दिया था।


यद्यपि उन्होने कभी किसी को कुछ बताया नहीं किन्तु उनकी गणना काफी सटीक थी। 23 मई 2000 को उन्हें देखने आए अपनी बड़ी पुत्र वधू के पिताजी डॉ नरेंद्र कुमार सिन्हा (जो सरकारी सेवा से अवकाश ग्रहण करने के बाद निशुल्क होम्योपैथी इलाज करते थे)से उन्होने कहा था-"my death is sure tomorrow"। यह बात उन्होने मुझसे 25 मई को घाट पर बताई थी किन्तु उनके परिवार के किसी सदस्य को यहाँ तक कि अपनी पुत्री को भी पूर्व सूचित नहीं किया था। डॉ एन के सिन्हा साहब मुझे आर्यसमाजी भाई कहते थे सिर्फ इसलिए ही मुझसे कहा था। । यदि बाबूजी साहब ने मुझे अकौण्ट्स छोड़ कर 'ज्योतिष' का कार्य करने को कहा तो  कुछ सोच-समझ कर ही कहा होगा क्योंकि शौकिया तो मै लोगों को ज्योतिषीय परामर्श एक काफी लंबे समय से देता आ रहा ही था।

 1984 मे होटल मुगल शेरटन मे अकौण्ट्स सुपरवाइज़र के रूप मे कार्य करते हुये एक डच नर्स को हाथ देख कर जो कुछ बताया था वह उसकी पूर्ण संतुष्टि का रहा था । न तो ठीक से इंगलिश बोलना  उस डच नर्स को आता था और न मुझे किन्तु वार्ता समझ आ गई थी। होटल के ज्योतिषी महोदय ने उस लेडी को इसलिए हाथ देखने से मना कर दिया था कि उनका उस दिन का कोटा पूरा हो चुका था और उस लेडी की वापिसी फ्लाईट उसी दिन की थी तथा उसे भारत मे ही हाथ दिखाना और हाल जानना था। अतः फ्लोर स्टाफ ने मुझसे उस लेडी के रूम मे हाथ देखने का आग्रह किया था। ज्योतिषी साहब की फीस का 50 प्रतिशत उस लेडी ने रु 100/- मुझे परामर्श शुल्क के रूप मे दिया था। नियमानुसार मै वहाँ ज्योतिषीय परामर्श नहीं दे सकता था अपने सर्विस रूल के मुताबिक भी और उन ज्योतिषी साहब से होटल के काण्टरेक्ट के मुताबिक भी। ज्योतिषी साहब से मेरे संबंध मधुर थे अतः मैंने वह रु 100/- जाकर उनको देना चाहा तो उन्होने मुझसे खुद ही रखने को कह दिया। उन्होने मेरे द्वारा ज्योतिषीय परामर्श देने पर भी एतराज़ नहीं किया  था।


धन-पिपासु लोगों से किसी सच्ची बात को स्वीकारने की उम्मीद मैंने कभी नहीं की इसलिए मुझे इस प्रकार की बेजा हरकतों से कभी कोई फर्क भी नहीं पड़ता है जैसी कि पूना प्रवास कर रहे पटना के ब्लागर ने की । मुझे नहीं लगता कि कभी मेरे किसी कार्य से स्व .बिलासपति सहाय जी का मुझे ज्योतिष अपनाने का सुझाव देने का आंकलन गलत सिद्ध होगा। आज हमारे अपने कम्युनिस्ट नेतागण भी मुझसे ज्योतिषीय परामर्श ले रहे हैं तो यह एक उपलब्धि ही है। इसका पूरा का पूरा श्रेय बाबूजी साहब (स्व .बिलसपति सहाय जी) को है।
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शनिवार, 19 मई 2012

ईमानदारी की समाज मे कद्र नहीं

हिंदुस्तान,लखनऊ,15 मई 2012



"रूखा-सूखा खाय के ठंडा पानी पीव। 


देख पराई चूपड़ी मत ललचावे जीव। । "

कभी समाज मे इस कथन को जीवन का आदर्श माना जाता था किन्तु आज?उपरोक्त स्कैन मे ईमानदार अधिकारी ए डी एम विनोद राय साहब की आत्म-हत्या के संबंध मे लखनऊ के जिलाधिकारी महोदय की श्रीमती जी ने जो विचार दिये हैं उन पर गौर किए जाने की नितांत आवश्यकता है। वस्तुतः किसी भी व्यक्ति के ईमानदार होने और बने रहने मे उसके पूरे परिवार का सहयोग होता है। प्रस्तुत मामले मे लेखिका ने जो रहस्योद्घाटन किया है उसके अनुसार राय साहब की पत्नी उनकी ईमानदारी से संतुष्ट नहीं थीं और उनकी ईमानदारी उनके पारिवारिक असंतोष का कारण थी जिसने उन्हें आत्म-हत्या को प्रेरित किया। जनता को एक ईमानदार अधिकारी के न रहने से जो क्षति होगी उसका आंकलन कोई नहीं करेगा। भ्रष्टाचार विरोध के नाम पर आंदोलन चलाने वाले और उसका समर्थन करने वाले इस हादसे पर क्या दृष्टिकोण अपनाते हैं उसका भी कुछ पता नहीं चलेगा।

भ्रष्टाचार बहता हुआ पानी है जो ऊपर से नीचे बहता है। अर्थात जब शीर्ष पर भ्रष्टाचार उत्पन्न होता है तभी वह बह कर निचले स्तर पर पहुंचता है किन्तु NGO आंदोलन निचले स्तर पर भ्रष्टाचार का नाम लेकर चल रहा है वह ऊपर के भ्रष्टाचार को सँजो कर रखने का एक उपक्रम है। इसीलिए बड़े सरकारी अधिकारी उसका समर्थन करते है। जब एक बड़ा अधिकारी ईमानदारी पर चलता है तो समाज की कौन कहे उसके परिवार के लोग ही उसे जीने नहीं देते हैं और वह अवसादग्रस्त होकर आत्म-हत्या करने पर मजबूर हो जाता है। समाज की इस सड़ांध को दूर करने के लिए 'सदाचार' को महत्व देना होगा। 'सदाचार'धुए की भांति नीचे से ऊपर को जाता है। यदि समाज की इकाई परिवारों मे सदाचार रहे तो ऊपर तक उसका प्रभाव पड़ेगा ही

आज हो उल्टा रहा है भ्रष्टाचार दूर करने का  आंदोलन चलाने वाले महा-भ्रष्ट ,लुटेरे,शोषक और उत्पीड़क लोग हैं उनका सदाचार से कोई वास्ता नहीं है।  इन परिस्थितियों मे अन्ना/रामदेव आदि का आंदोलन महज ढोंग और पाखंड को बढ़ा कर लूट और भ्रष्टाचार को और पुख्ता करने वाला ही है। जबकि आवश्यकता है -ईमानदारी और सदाचार को बढ़ावा देने की तभी हम अपने होनहार जन-हितैषी अधिकारियों की रक्षा कर सकेंगे एवं भ्रष्टाचार स्वतः ही समाप्त हो सकेगा। 
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मंगलवार, 15 मई 2012

भारतीय संसद


दोनों कटिंग-हिंदुस्तान-लखनऊ-29/03/2012 

अभी 13 मई को भारतीय संसद के 60 वर्ष पूर्ण करने के जश्न काफी धूम-धाम से मनाए गए हैं जबकि हाल ही मे संसदीय लोकतन्त्र और भारतीय संसद पर खौफनाक हमले भी खूब हुये हैं जैसा उपरोक्त स्कैन कापियों से स्पष्ट भी हो रहा है। 1969-71 मे मेरठ कालेज मे बी ए पढ़ते समय अपने प्रो .कैलाश चंद्र गुप्त जी द्वारा बताए गए ये शब्द मुझे आज भी ज्यों के त्यों याद हैं ,"संसद भवन की नींव बहुत गहरी और मजबूत है और उतना ही मजबूत है हमारा संसदीय लोकतन्त्र "। हालांकि प्रो .गुप्ता खुद 'जनसंघ' से संबन्धित थे और अक्सर प्रो .बलराज मधोक को 'राजनीतिक चिंतक'बताते थे किन्तु उनकी रूस मे बनी  'अदृश्य स्याही' के जरिये इंदिरा जी के चुनाव जीतने की बात को उन्होने  हमारी कक्षा मे भ्रामक और असत्य भी कहा था। उनका निजी विचार था कि, संविधान के अनुसार संसद काफी शक्तिशाली है और उस पर किसी भी प्रकार का आघात उसे क्षति नहीं पहुंचा सकेगा। उन्होने मेरठ कालेज मे सम्पन्न एक 'छात्र संसद' का भी कई बार ज़िक्र किया था जिसे देखने तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकुम सिंह जी भी आए थे। यह कार्यक्रम मेरे कालेज ज्वाइन करने से बहुत पहले हुआ था। उन्होने यह भी बताया था कि जिन सतपाल मालिक,पूर्व अध्यक्ष छात्र संघ को प्राचार्य डॉ भट्टाचार्य ने कालेज मे दाखिला देने पर रोक लगा रखी है वह उसी वर्ष कालेज मे दाखिल हुये थे और उन्होने 'राज नारायण' की भूमिका अदा की थी जिसे सरदार हुकुम सिंह जी ने बहुत सराहा था क्योंकि वह राजनारायण जी को प्रत्यक्ष लोकसभा मे वैसा करते देखते रहे थे। तब यह सतपाल मलिक जी मधु लिंमये और राज नारायण वाली संसोपा (संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी) और उसके युवा संगठन -समाजवादी युवजन सभा मे सक्रिय थे ,जो अब भाजपा के बड़े नेता हैं)।

भारतीय संसद ने इंदिरा जी की 'एमर्जेंसी' को भी देखा और उनके कटु आलोचक एवं उन्हें अपदस्थ करने वाले (जिन्हें प्रो . गुप्ता पढ़ाते समय 'राजनीतिक दार्शनिक'-Political Philosphar बताते थे) मोरार जी देसाई ने स्पष्ट कहा था कि इंदिरा जी तानाशाह नहीं थीं। लेकिन आजकल अन्ना/रामदेव आंदोलन के नाम पर RSS/NGOs/देशी-विदेशी कारपोरेट घराने 'भारतीय संसद' और संसदीय लोकतन्त्र के लिए गंभीर खतरा बन कर उभरे हैं। नकसलवादी( जो संसदीय लोकतन्त्र को नहीं मानते और अमेरिकी धन के बल पर संसद के लिए चुनौती बने हुये हैं )से कम खतरनाक नहीं हैं ये एन जी ओ आंदोलनकारी। अन्ना/रामदेव का एक खतरनाक नारा है-सभी राजनीतिज्ञ भ्रष्ट हैं',इन लोगों ने आम जनता को राजनीति से विरक्त रखने का एक सुनियोजित षड्यंत्र चला रखा है। साम्राज्यवादियों के ये पिट्ठू अच्छी तरह जानते हैं कि जनता को राजनीति से दूर कर दो तो जनतंत्र स्वतः ही विफल हो जाएगा। 

दुर्भाग्य यह है कि पढे-लिखे और खुद को खुदा समझने वाले इंटरनेटी वीर भी इस नापाक अभियान मे शामिल हैं। ये वे लोग हैं जो खाते-पीते,सम्पन्न परिवारों से आते हैं और सरकारी नौकरी मे ऊंचे-ऊंचे पदों पर आसीन है या उद्योग-धंधे,व्यापार मे लगे हुये हैं। ये लोग कभी भी अपना 'मत'-Vote देने नहीं जाते और एयर कंडीशंड कमरों मे बैठ कर राजनीति और राजनीतिज्ञों को कोसते रहते हैं। इस प्रकार के लोगों ने आज भारतीय संसद के सम्मुख गंभीर चुनौती संसदीय लोकतन्त्र को नष्ट करने की उपस्थित कर रखी हैं।लेकिन भारत की जनता इन सरमायेदारों और सकारी नौकरशाहों के  नापाक मंसूबों को भलीभाँति समझती है  और उन्हें करारी शिकस्त देती रहती है। अतः भारत की जनता अपने संसदीय जनतंत्र और संसद की रक्षा करने मे सदैव सफल रहेगी। 
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