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Thursday, June 15, 2017

बिन अन्नदाता के क्या खाएंगे-पिएंगे न्यू इंडिया के न्यू नागरिक?............ नवेन्दु कुमार

  
Navendu Kumar
40 हज़ार करोड़ बनाम 5 लाख करोड़ !
बैंकों को कंगाल करने वाले बड़े फर्म मालिकों यानि बड़े पूँजीखोरों की फ़ाइल तो निकाली जा रही पर ऋण माफ़ी भी दी जा रही। जबकि भारतीय बैंकों का कुल एनपीए 6 लाख करोड़ से ज़्यादा पहुँच चुका है। दिलचस्प तथ्य और आंकड़े ये कि सिर्फ़ देश के बड़े औदौगिक घराने और बड़े पूँजीखोरों के पास 5 लाख करोड़ का कर्ज बर्षों से बकाया है जिस पर सरकार की नजरें इनायत है। इनायत अमीर भारतीयों के कर्ज माफ़ी की।
देश के प्रधानमंत्री से लेकर वित्त मंत्रियों तक राष्ट्र के ऐसे धन कुबेरों पर रहम बरसाते रहे। जबकि वहीं कर्ज़ और भूख से आत्महत्या कर रहे देश के किसानों के हिस्से के कर्ज माफ़ी पर निष्ठुर बनी रही हैं सरकारें। कांग्रेसी कल और भाजपाई आज में कोई फर्क नहीं आया। बल्कि आलम ये कि वर्तमान केंद्र सरकार की निष्ठुरता और भी अधिक बढ़ी है। 
माल्या लंदन से भी ललकार रहा है और सरकार दिल्ली से लेकर बंगलोर तक उसकी परिसंपत्तियों की केयर टेकर बनी हुई है। अभी-अभी भूषण स्टील को भी करोड़ों की माफी दे दी गयी। माफ़ी वाली पंगत में और भी पूँजीशाह पत्तल बिछाये बैठे हैं। वहीं किसान बर्बादी के कगार पर खड़े दम तोड़ रहे हैं। चार दिन पहले तीन किसानों की आत्महत्या की खबर मध्यप्रदेश और बुंदेलखंड से आई। ख़ुदकुशी करने वाला एक किसान तो मुख्यमंत्री के ही क्षेत्र का है।
अभी देश का संकट ये है कि ऐसी घटनाओं पर भी सरकार और अवाम के एक हिस्से में बहस ये हो रही है कि किसानों को भड़काया किसने। ये बहस नहीं हो रही कि किसान अपने खेत-खलिहान छोड़ सड़क पर आने को क्यों मजबूर है? क्यों मजबूर है वो लागतार खुदकुशी करने को? 
राजनीति में बंट चुका देश ये नहीं समझ पा रहा कि खुदकुशी करने या गोली खाने के बीच जी-मर रहे किसान को उसकी मुश्किलों से त्राण दिला सकती है तो सरकारें ही और उनकी किसान नीति। और किसान मर-मरा रहा तो इसकी ज़िम्मेदार भी हैं सरकारें और उनकी नीतियां।
अब लाल बहादुर शास्त्री को समझने वाला भारत रहा कहाँ जिसका नारा और नीति ही थी...जय जवान-जय किसान! अब तो आलम ये कि सरहद के तनाव और पाक मुकाबले की राजनीति में जवान भी मारे जा रहे और आंतरिक घरेलू कृषि नीतियों की वजह से किसान भी मर रहे या मारे भी जा रहे।
पिछले दिनों दिल्ली के जंतर मंतर पर तमिलनाडु के जिन किसानों के नंग धड़ंग धरने और कर्ज़ माफी की गुहार को लेकर जो हायतोबा मची वह रेड कार्पेट के नीचे दबा दी गयी। दिलचस्प ये भी कि इन तमिल किसानों पर महज 40 हज़ार करोड़ का कर्ज है, जिसकी माफ़ी की फरियाद लेकर ये दिल्ली पहुंचे थे। कांग्रेस की दिल्ली ने भी इनकी कभी नहीं सुनी थी और अब बीजेपी-मोदी की दिल्ली भी इनको सुनने को तैयार नहीं।

अलबत्ता सबका साथ सबका विकास वाली सरकार की रुचि और चिंता फिलहाल पूंजी घरानों के कर्ज माफ़ी पर है...क्योंकि भारत को न्यू इंडिया जो बनाना है! तो क्या अभी चल रहा मेकिंग इंडिया अभियान, गरीब और कर्ज में डूबे किसानों की इहलीला समाप्त करने का नया उद्यमिता शास्त्र तो नहीं बन जायेगा? काल का किसान रहित न्यू इंडिया जाने कैसा होगा? और बिन अन्नदाता के क्या खाएंगे-पिएंगे न्यू इंडिया के न्यू नागरिक?....यक्ष प्रश्न!!
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