हमारा भारत विश्व गुरु कहलाता था ,जैसा कि पिछली पोस्ट में स्पष्ट किया है कि शिव ही भारत है और भारत ही शिव.अतः शिव-स्तुति में 'वामदेव महादेवं लोकनाथं जगत गुरुम' कहने का आशय भारत -देश से ही है.लोकनाथं अर्थात जन- कल्याणकारी कारी हैं -शिव और यही भारत की संस्कृति रही है- जनोन्मुखी.वामदेव महादेव भी इसी सन्दर्भ में शिव को कहा गया है कि वह अवाम (जनता) का ख्याल रखने वाले हैं.भारत की नीतियां सदा से ही जनता की सार्व-भौमिकता वाली रही हैं.यही कारण रहा है कि विदेशी विद्वान भारत खिंचे चले आते थे और यहाँ से ज्ञान बटोर कर स्वदेश लौटते थे.वेदों की आध्यात्मिक और रहस्यात्मक व्याख्या करने वाले विदेशी विद्वानों में प्रो.मैक्समूलर ,प्रो.ग्रिफ्थ ,प्रो.विल्सन,प्रो.ग्रासमान,प्रो.लुड्विश,प्रो.ओल्डेन बर्ग,प्रो.लान्गलवा,डॉ.मैक्डानल,डॉ.कीथ,प्रो.आर.रोठ,प्रो.बाटलिक,प्रो.व्लूम फील्ड ,प्रो.लुई रेन ,प्रो.वाकर नोगल ,प्रो.बेवर ,प्रो.हिव्ट्नी,प्रो.केलंड,प्रो.इंग्लिश,प्रो.स्टेन कोनो,प्रो.हिल ब्रांट,प्रो.जे.गोंड आदि के नाम प्रमुख हैं.(यह विवरण पदमश्री डॉ.कपिल देव दिवेदी के लेख "वेद और विज्ञान" से लिया गया है).
प्रो.मैक्समूलर तो भारत में ३० वर्ष रहे -संस्कृत सीखी और यहाँ से मूल पांडुलिपिया भी लेकर जर्मनी चले गये.उनकी खोजों के आधार पर जर्मन वैज्ञानिकों ने एटम बम ईजाद किया जिन्हें अमेरिका तथा रूस ने जर्मनी की पराजय के बाद अपने-अपने देश में पनाह दी.उन्हीं के विश्लेषण के आधार पर महर्षि कार्ल मार्क्स ने जनोन्मुखी नीतियों का प्रतिपादन किया.मार्क्स देख रहे थे किस प्रकार मजदूरों का शोषण किया जा रहा है उनकी दुर्दशा का निदान कैसे हो ,ये सिद्धांत उन्होंने ब्रिटेन और जर्मनी की स्थितियों के मद्दे नजर बनाये थे.वह जर्मनी से स्व-निष्कासन के बाद इंग्लैण्ड में रह रहे थे.१९१७ की रूसी क्रान्ती लेनिन के नेतृत्त्व में मार्क्स के सिद्धांतों पर आधारित थी.
इधर भारत में १८७५ में महर्षि दयानंद सरस्वती ने सशस्त्र क्रान्ति की विफलता के बाद आर्य समाज की स्थापना स्वराज्य प्राप्ति के लक्ष्य से की थी. १८८५ में ब्रिटिश सरकार ने आर्य -समाज आन्दोलन से भयभीत होकर अवकाश प्राप्त आई.सी.एस.एलेन आक्तावियन ह्युम की मार्फ़त वोमेश चन्द्र बनर्जी की अध्यक्षता में इन्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना इसलिए करवाई थी कि सरकार को जन-असंतोष की दिशा पता चलती रहे और वह बचाव करती रहे.महर्षि दयानंद ने आर्यसमाजियों को कांग्रेस में शामिल होकर स्वतंत्रता की मांग उठाने का निर्देश दिया. धीरे-धीरे कांग्रेस के मंच से आजादी की मांग होने लगी.अब ब्रिटिश सरकार ने १९०६ में मुस्लिम लीग की स्थापना ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को आगे करके की तथा कांग्रेस में दयानंद विरोधी नेताओं यथा पं.मदन मोहन मालवीय,लाला लाजपत राय आदि के द्वारा हिन्दू महासभा की स्थापना हुयी १९२० में.इसका मिलिटेंट संगठन आर.एस.एस.अस्तित्व में आया १९२५ में.इन दोनों नये राजनीतिक दलों ने देश के स्वतंत्रता आन्दोलन को क्षति पहुंचाई.कांग्रेस के भीतर आजादी के प्रबल पक्षधरों ने रूसी क्रान्ति से प्रभावित होकर २५ दिसंबर १९२५ को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन कानपुर में किया.चूंकि आर.एस.एस.ने आर्य समाज में भी घुसपैठ बना ली थी;अतः कम्युनिस्ट नेताओं ने पूरे तौर पर भारतीय दर्शन को छोड़ कर शुद्ध मार्क्सवाद को अपना लिया.जबकि नियम आर्य समाज से मिलते-जुलते हैं.'कर्तव्य-दर्पण'में आर्यसमाजियों को अपनी आमदनी का एक प्रतिशत अंश आर्य समाज को भेंट करने का प्राविधान रखा था उसे ज्यों का त्यों कम्युनिस्टों पर भी लागू किया गया.कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान में एक प्रतिशत आय का अंशदान करने का प्राविधान रखा गया है.
सरदार भगत सिंह का परिवार आर्य समाजी था,'सत्यार्थ-प्रकाश' पढ़ते हुए उन्हें पूर्ण स्वाधीनता का जो जूनून चढ़ा तो वह क्रांतिकारी बन गये.उन्होंने एच.आर.ए.और भारत नौजवान सभा के माध्यम से क्रांतिकारियों को संगठित किया.भगत सिंह आदि भारत में बाम-आन्दोलन कारी थे.आज भारत का बाम-आन्दोलन यदि भटक रहा है तो उसका कारण ही सिर्फ यह है कि भारतीय बाम - दर्शन का ख्याल नहीं रखा गया है.हमारे बाम-देव-महादेव शिव के कल्याणकारी सिद्धांतों को अपना कर बाम-पन्थ भारत में रक्त-हीन क्रान्ति करने में सफल हो सकता है.बाम-पंथी आन्दोलन की सफलता ;कोटि-कोटि भारतीयों के जीवन को सुन्दर-सुखद -समृद्ध बनाने के लिए परमावश्यक है.
************************************
फेसबुक कमेंट्स :
| 24 फरवरी 2017 |
