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Friday, October 2, 2015

गांधी को पूजनीय नहीं अनुकरणीय बनाइये --- विजय राजबली माथुर

आज सारे देश में गांधी जयन्ती मनाई जा रही है.कहीं कहीं तकली और चरखा भी चलाया जाएगा और गांधी जी का प्रिय भजन भी गाया जाएगा.गांधी जी के चित्रों पर माल्यार्पण भी किया जाएगा उन के आदर्शों का गुण गान भी किया जाएगा,लेकिन कोई भी उन के आदर्शों का अनुसरण करता नज़र नहीं आएगा.दरअसल यही हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हम लोग महापुरुषों का गुणगान तो करते हैं परन्तु उनका अनुसरण नहीं कर सकते.गांधी जी के सम्बन्ध में सिंहासन राय 'सिद्धेश' ने लिखा है:-

''धरा जब जब विकल होती,मुसीबत का समय आता,
किसी न किसी रूप में कोई न कोई महामानव चला आता.''

जी हाँ जब १८५७ की क्रान्ति कुचले जाने के बाद हमारा देश स्वतंत्रता के लिए छटपटा रहा था और हर छिटपुट विद्रोह कुचला जा रहा था तो गांधी जी ने सत्य और अहिंसा(जिन के बीज वेदों में मौजूद थे) का मार्ग अपनाया.उन्होंने विदेशी शासकों के विरुद्ध सत्याग्रह का प्रयोग किया.सत्य का मार्ग दुर्गम और कठिन होता है गांधी जी ने स्वंय पर आत्मानुशासन लागू कर इसे अपनाया और जनता का आह्वान किया.उसका प्रभाव भी हुआ जनता ने गांधी जी की अपीलों का हाथों हाथ पालन किया.कविवर सोहन लाल द्विवेदी ने लिखा है:-

चल पड़े जिधर भी दो डग मग में
बढ़ चले कोटि पग उसी ओर
गड़ गयी जिधर भी एक दृष्टी
गड़ गए कोटि द्रग उसी ओर.

उस समय के लोग गांधी जी का अनुसरण करते हुए त्यागी बने और अपने प्राणों तक का बलिदान भी किया तब जा कर कहीं यह आजादी मिली है.

लेकिन आज राम और कृष्ण ,नानक,बुद्ध और महावीर की भाँति ही गांधी जी को भी पूजनीय तो बना दिया गया  है.कोई भी उनमे से किसी का भी अनुसरण करने को तैय्यार नहीं है.इसी लिए भौतिक विकास के बावजूद देश में तमाम समस्याएँ मुहं बाएं  खडी हैं और उनका समाधान नहीं निकल पा रहा है.

गांधी जी के एक शिष्य लाल बहादुर शास्त्री जी का भी आज ही के दिन जन्म हुआ था.वह भी त्याग और सादगी के प्रतीक थे.जब उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में साम्राज्यवादी अमेरीका के PL -४८० से टक्कर ली तो जनता से उन्होंने सप्ताह में एक दिन एक समय अन्न त्यागने का आह्वान किया जिसे जनता ने सहर्ष स्वीकार भी किया.ईमानदारी में शास्त्री जी का कोई मुकाबला नहीं था.जब वह वह उ.प्र.के सिंचाई मंत्री थे तो विभाग के कायस्थ चीफ इंजीनियर को भ्रष्टाचार के कारण सस्पेंड करने में कोई देर नहीं की.

वह वायदे के भी पक्के थे यही सोच कर उनके गृहमंत्री काल में लखनऊ यूनिवर्सिटी के छात्रों ने स्टेडियम में पुलिस उत्पीडन की शिकायत की और मांग रखी कि स्टेडियम में लाल टोपी नहीं दिखाई देनी चाहिए तब तक U P पुलिस की टोपी लाल होती थी.शास्त्री जी ने हामी भर दी,छात्र खुश हो कर लौट गए.सारी रात लखनऊ के तमाम दर्जी लगा कर सैकड़ों खाकी टोपियाँ बनवाईं और अगले दिन पुलिस को खाकी टोपी पहना कर स्टेडियम में तैनात करवा दिया.छात्र दुबारा शास्त्री जी से शिकायत ले कर मिले तो उन्होंने तपाक से कहा कि आप लोगों ने लाल टोपी पर ऐतराज़ किया था हमने उसे हटा कर खाकी टोपी कर दी-छात्र अपना सा मुहं ले कर लौट आये.

१९६५ में प्रधान मंत्री के रूप में देश को पाकिस्तान के विरुद्ध जीत दिलवाई जो उनकी दृढ़ता का प्रतीक है.जिस समय शास्त्री जी का निधन हुआ उनके ऊपर कार की किश्तें लोन के रूप में अदा करने को बाक़ी थीं.आज तो पार्षद भी लाखों,करोड़ों बना लेता है.कहीं कोई गांधी व शास्त्री जैसी सादगी व त्याग को अपनाना नहीं चाहता.

कुछ लोग राहुल गांधी में देश के लिए संभावनाएं देख रहे हैं.राहुल गांधी का देश के प्रति त्याग क्या है?उन के पिता की ह्त्या श्रीलंका के लिट्टे के विरुद्ध उनकी कार्रवाई के कारण हुई थी.राहुल गरीबों के हक़ की बातें केवल अपनी पार्टी को लोकप्रिय बनाने के लिए कर रहे हैं,गरीबों के हित की योजनाएं बना कर उन पर अमल  करवाने की कोई  कसरत नहीं की  है जबकि केंद्र में उनकी पार्टी की सरकार रह चुकी  है.

आज हमें राहुल गांधी के आडम्बर में फंसने की नहीं महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री सरीखे त्याग और साहस की आवश्यकता है.सारे देशवासी इन दो महानुभावों के जीवन से प्रेरणा ले कर  वैसा ही आचरण करें तो हम देश को उचत्तम   सोपान पर पहुंचा सकते हैं.कोरे स्तुति गान से कुछ नहीं होगा.  

Typist -यशवन्त
(नोट : यह लेख मूल रूप से 02-10-2010 को प्रकाशित हुआ था जिसका यह पुनर्प्रकाशन है )
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