Friday, February 26, 2016

जनता बाजारवाद में मस्त और पुरोहितवाद देश को खंड-खंड करने पर आमादा

 जन-संस्कृति मंच के तत्वावधान में 23 जूलाई 2015 को सम्पन्न गोष्ठी :प्रो .डॉ मेनेजर पांडे ------


 विभिन्न अखबारों तथा विद्वानों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों में डॉ पांडे द्वारा व्यक्त कुछ महत्वपूर्ण विचार प्रकाशित होने से रह गए हैं जबकि उनके वक्तव्य में वे शामिल थे । ऐसे ही प्रमुख विचारों को यहाँ लेने का प्रयास किया जा रहा है। 

डॉ पांडे ने यह भी कहा था कि  हमारे देश में वर्तमान लोकतन्त्र सिर्फ चुनाव कराने तक ही सीमित है उसके बाद इसमें जन की भागीदारी नहीं है जबकि 1789 ई . की फ्रांसीसी राज्य -क्रान्ति द्वारा जिस जनतंत्र की स्थापना की गई थी वह 'स्वतन्त्रता', 'समता' और 'बंधुत्व' पर आधारित था। अब्राहम लिंकन ने भी जनतंत्र को 'जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए' शासन कहा था। लेकिन चुनावों के बाद हमारे यहाँ 'जन' उपेक्षित हो जाता है । संसद और विधायिकाओं में जो लोग चुन कर पहुँचते हैं वे करोड़पति व्यापारी व उद्योगपति होते हैं वे ही नीतियाँ बनाते हैं जो उनके व्यापारिक हितों की पूर्ती करती हैं उनका जन सरोकारों से कोई वास्ता नहीं होता है। उनके कथन की पुष्टि 25 जूलाई 2015 को 'हिंदुस्तान' में प्रकाशित रामचन्द्र गुहा के इस लेख से भी होती है। 


 1857 के स्वातंत्र्य समर में भाग लेने वाली वन-जातियों को कुचलने हेतु 1871 में क्रिमिनल  ट्राईबल एक्ट   बनाया गया था जिसे बाद में  नेहरू जी ने  डिनोटिफाईड करवाया  था तब से अब ये  जातियाँ डिनोटिफाईड ट्राईब्स कहलाती हैं इनको नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं वे मतदाता नहीं हैं।
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'सरस्वती' का संपादक बनने हेतु आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी जी ने  अपनी जमी जमाई सुविधा सम्पन्न  रेलवे की रु 50/-मासिक वेतन की नौकरी छोड़ कर रु 20/- मासिक की नौकरी कर ली थी। उनका कहना था कि, "साहित्य में वह शक्ति छिपी रहती है जो तोप,तलवार और बम के गोलों में भी नहीं पाई जाती। " साहित्य साधना के लिए उन्होने 'पत्रकारिता' को अपनाया था।
आज के माहौल में साहित्यकारों पर जो साम्राज्यवादी/ब्राह्मण वादी हमले हो रहे हैं और नरेंद्र डोभाल, गोविंद पानसरे व एम एम काल्बुर्गी सरीखे विद्वानों को मौत के घाट उतारा गया है शोद्ध छात्र रोहित वेमुला को मौत के मुंह में धकेला गया है  तथा कुछ पत्रकार फासिस्टों के दलाल बन कर जन-विरोधी कार्यों में संलग्न हैं जैसा कि नामचीन TV चेनल्स ने फर्जी वीडियो चला कर JNUSU अध्यक्ष कन्हैया कुमार को षड्यंत्र पूर्वक जेल भिजवाया है उनको आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी के व्यक्तिव व कृतित्व से प्रेरणा लेनी चाहिए कि, ब्राह्मण कुल में जन्मने के बावजूद वह लिंग-भेद व दक़ियानूसी विचारों के विरोधी रहे।
केवल ब्राह्मण वाद का उन्मूलन ही आज देश को एकजुट रखने में सहायक हो सकता है अन्यथा ये पुरोहितवाद देश को खंड-खंड करने पर आमादा है ही।
आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी सरीखे विद्वानों के विचारों का सहारा लेकर ब्राह्मण वाद/साम्राज्यवाद पर प्रहार किया जाए तो जन-समर्थन हासिल करने में सहायता मिल सकती है।


~विजय राजबली माथुर ©
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Friday, February 12, 2016

वसंत पंचमी और देवी सरस्वती ------ ध्रुव गुप्त /डॉ सुधाकर अदीब

  
Dhruv Gupt


वसंत पंचमी और देवी सरस्वती

प्राचीन आर्य सभ्यता और संस्कृति का केंद्र उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत हुआ करता था। आज की विलुप्त सरस्वती नदी तब इस क्षेत्र की मुख्य नदी हुआ करती थी। तत्कालीन आर्य-सभ्यता के सारे गढ़, नगर और व्यावसायिक केंद्र सरस्वती के किनारे बसे थे। तमाम ऋषियों और आचार्यों के आश्रम सरस्वती के तट पर स्थित थे। ये आश्रम अध्यात्म, धर्म, संगीत और विज्ञान की शिक्षा और अनुसंधान के केंद्र थे। वेदों, उपनिषदों और ज्यादातर स्मृति-ग्रंथों की रचना इन्हीं आश्रमों में हुई थी। सरस्वती को ज्ञान के लिए उर्वर अत्यंत पवित्र नदी माना जाता था। ऋग्वेद में इसी रूप में इस नदी के प्रति श्रद्धा-निवेदन किया गया है। कई हजार साल पहले सरस्वती में आई प्रलयंकर बाढ़ और विनाश-लीलाके बाद अधिकांश नगर और आश्रम जब नष्ट हुए तो आर्य सभ्यता क्रमशः गंगा और जमुना के किनारों पर स्थानांतरित हो गई। इस विराट पलायन के बाद भी जनमानस में सरस्वती की पवित्र स्मृतियां बची रहीं। इतिहास के गुप्त-काल के आसपास रचे गए पुराणों में उसे देवी का दर्जा दिया गया। पुराणों के अनुसार ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना की तो हर तरफ मौन छाया हुआ था। ब्रह्मा की तपस्या से वृक्षों के बीच से एक अद्भुत चतुर्भुजी स्त्री प्रकट हुई जिसके हाथों में वीणा, पुस्तक, माला और वर-मुद्रा थी। जैसे ही उस स्त्री ने वीणा का नाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी, जलधारा को कोलाहल और हवा को सरसराहट मिल गई। ब्रह्मा ने उसे वाणी की देवी सरस्वती कहा। वसंत पंचमी का दिन हम देवी सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में मनाते हैं। सरस्वती की पूजा वस्तुतः आर्य सभ्यता-संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान, गीत-संगीत और धर्म-अध्यात्म के कई क्षेत्रों में विलुप्त सरस्वती नदी की भूमिका के प्रति हमारी कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है।

मित्रों को वसंत पंचमी और सरस्वती पूजा की शुभकामनाएं !
साभार :

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यह वह आनंदमय समय होता है, जब खेतों में पीली-पीली सरसों खिल उठती है, गेहूं और जौ के पौधों में बालियां प्रकट होने लगती हैं, आम्र मंजरियां आम के पेड़ों पर विकसित होने लगती हैं, पुष्पों पर रंग-बिरंगी तितलियां मंडराने लगती हैं, भ्रमर गुंजार करने लगते हैं, ऐसे में आता है 'वसंत पंचमी' का पावन पर्व. इसे ऋषि पर्व भी कहते हैं.........................................................................
आधुनिक हिन्दी साहित्य जगत में महाप्राण निराला द्वारा रचित 'सरस्वती वंदना' सर्वाधिक लोकप्रिय है और अक्सर सारस्वत समारोहों के प्रारंभ में गाई जाती है-
"वर दे, वीणा वादिनि वर दे। 
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नवभारत में भर दे।
बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर,
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे।
नवल कंठ, नव जलद-मंद्र रव,
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे।"




काट अंध-उर के बंधन-स्तर
नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
वस्तुतः सरस्वती का ध्यान जड़ता को समाप्त कर मानव मन में चेतना का संचार करता है. सरस्वती का यह ज्ञानदायिनी मां का स्वरुप भारत में ही नहीं, विश्व के अनेक देशों में विभिन्न नामों से प्रचिलित है और वे श्रद्धापूर्वक वहां भी पूजी जाती हैं. उदाहरण के लिए हमारी 'सरस्वती' बर्मा में 'थुयथदी', थाईलैंड में 'सुरसवदी', जापान में 'बेंजाइतेन' और चीन में 'बियानचाइत्यान' कहा जाता है.
साभार :
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प्रायः सभी विद्वान वसंत पंचमी को सरस्वती आराधना का पर्व मानते हैं अर्थात ज्ञान-विज्ञान, मनन -चिंतन का पर्व है यह। वेदों में मानव- मात्र के कल्याण की बात कही गई है। वेद  देश - काल से परे सम्पूर्ण विश्व को आर्य अर्थात आर्ष = श्रेष्ठ बनाने की बात  करते हैं बिना किसी भी भेदभाव के । किन्तु दुर्भाग्य से मनुष्य ने अपने मूल चरित्र 'मनन' को भुला दिया है उसके स्थान पर कुतर्क, आस्था, अंध- विश्वास का बोलबाला हो गया है। ढोंग-पाखंड-आडंबर को ही उपासना या पूजा माना जाने लगा है। असमानता और भेदभाव आज सर्वत्र दिखाई दे रहा है। इसी कारण संघर्ष और विग्रह बढ़ रहा है। आज मुट्ठी भर  साधन-सम्पन्न वर्ग अपनी पकड़ व जकड़ को मजबूत बनाने हेतु बहुमत को विभिन्न खांचों व साँचों में बाँट कर परस्पर लड़ा कर कमजोर बनाता व उनका शोषण करता जा रहा है। आज समष्टिवादी  वेदों का स्थान शोषण- आधारित पुराणों को दे दिया गया है। वेदों को गड़रियों का गीत व आर्य को एक आक्रांता जाति घोषित करके जनता को गुमराह किया जा रहा है। 

आइये ज्ञान-विज्ञान की अधिष्ठात्री 'सरस्वती' पूजा के अवसर पर जानें कि कैसे  वेदों के अंतिम सूक्त द्वारा ऋषियों ने मानव - कल्याण की जो अपेक्षा की थी  उसे पुनर्स्थापित करके विश्व में शांति - स्थापना हो सकती है :
' सं समि ................................................... वसून्या भर। । '

हे प्रभो तुम शक्तिशाली हो बनाते सृष्टि को । 
वेद सब गाते तुम्हें हैं कीजिये धन वृष्टि को । । 1 । । 

 'संगच्छध्वं ...............................................................उपासते। । '

प्रेम से मिलकर चलें बोलें सभी ज्ञानी बनें। 
पूर्वजों की भांति हम कर्तव्य के मानी बनें । । 2 । । 

 'समानी मंत्र : ................................................... हविषा जुहोमि । । '

हों विचार समान सबके चित्त मन सब एक हों। 
ज्ञान पाते हैं बराबर भोग्य पा सब नेक हों । । 3 । । 

 'समानी व .............................. सुसहासति  । ।  '

हों सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा । 
मन भरे हों प्रेम से जिससे बढ़े सुख संपदा । । 4 । । 

' सर्वे भवन्तु सुखिन : सर्वे संतु निरामया :  । 
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद दु :ख भाग भवेत । ।  '

सबका भला करो भगवान सब पर दया करो भगवान । 
सब पर कृपा करो भगवान, सबका सब विधि हो कल्याण । । 
हे ईश सब सुखी हों कोई न हो दुखारी । 
सब हों निरोग भगवन धन -धान्य के भण्डारी । । 
सब भद्र भाव देखें, सन्मार्ग के पथिक हों । 
दुखिया न कोई होवे सृष्टि में प्राण धारी । । 5 । ।   

बसंत पंचमी, होली, नवरात्र, श्रावणी,दीपावली आदि पर्वों पर सामूहिक रूप से हवन - यज्ञ किए जाते थे । यज्ञ 'संगति ' पर आधारित होते हैं और पति - पत्नी संयुक्त रूप से करते हैं। परिवार या समाज में कहीं भेदभाव न था। किन्तु पौराणिक ब्राह्मणों ने वेदों को पृष्ठ भूमि में धकेल दिया और मन गढ़ंत कहानिया रच डालीं जिनके द्वारा समाज व परिवारों में फूट डाल कर  विग्रह उत्पन्न कर दिया जिससे आज तक मानवता पीड़ित होकर कराह रही है। यज्ञ की सम्पूर्ण होने के बाद की जाने वाली प्रार्थना में भी सम्पूर्ण मानवता ही नहीं समस्त जीवधारियों के कल्याण की कामना की जाती है , देखिये : 

पूजनीय प्रभों हमारे भाव उज्जवल कीजिये ।
छोड़ देवें छल कपट को मानसिक बल दीजिये । 1 । । 

वेद की बोलें ऋचाएँ सत्य को धारण करें । 
हर्ष में हों मग्न सारे शोक सागर से तरें । । 2 । । 

अश्वमेधादिक रचाएं यज्ञ पर उपकार को । 
धर्म मर्यादा चला कर लाभ दें संसार को  । । 3 । । 

नित्य श्रद्धा भक्ति से यज्ञादि हम करते रहें । 
रोग पीड़ित विश्व के संताप सब हरते रहें। । 4 । । 

भावना मिट जाये मन से पाप अत्याचार की। 
कामनाएँ पूर्ण होवें यज्ञ से नर-नार की । । 5 । । 

लाभकारी हो हवन हर जीवधारी के लिए। 
वायु जल सर्वत्र हों शुभ गंध को धारण किए। । 6 । । 

स्वार्थभाव मिटे हमारा प्रेम पथ विस्तार हो। 
"इदं न मम " का सार्थक प्रत्येक में व्यवहार हो। । 7 । । 

प्रेम रस में तृप्त होकर वंदना हम कर रहे ।  
नाथ करुणारूप करुणा आपकी सब पर रहे । । 8 । ।   

ऐसी समष्टिवादी - समाजवादी वैदिक व्यवस्था को ठुकराये जाने से शोषण वादी - पूंजीवादी व्यवस्था ही मजबूत हुई है और पूंजी की पूजा का आज सर्वत्र विस्तार हो गया है। हवन करने को अन्न व घी- मिष्ठान्न सबकी बरबादी का हेतु बताया जाने लगा है और लंच व डिनर पार्टियों में अथाह भोजन बर्बाद किया जाने लगा है। हवन में दी गई आहुतियों से पर्यावरण भी शुद्ध रहता था व  जन-कल्याण  भी होता रहता  था । अब ब्राह्मण वादी व्यवस्था में जड़ - पत्थर पूजे जाते हैं जिस प्रक्रिया में अक्सर हादसे होते रहते हैं जिनमें असंख्य निर्दोषों के जीवन की इह - लीला तक समाप्त हो जाती है। 'नास्तिक संप्रदाय ' और 'मूल निवासी संप्रदाय '  भी वैदिक व्यवस्था का विरोध करके शोषक ब्राह्मण वादी व्यवस्था को अप्रत्यक्ष सहयोग देते रहते हैं  और जनता लुटती व पिटती रहती है। क्या आज वसंत पंचमी के पावन अवसर पर मननशील प्रबुद्ध जन साम्राज्यवादी/संप्रदायवादी/ फासिस्ट शक्तियों के निर्मूलन हेतु  समष्टिवादी - समाजवादी वैदिक व्यवस्था का अवलंबन लेने का संकल्प ले सकेंगे? 
( विजय राजबली माथुर )

~विजय राजबली माथुर ©
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Thursday, February 11, 2016

ज्योतिष को विकृत व बदनाम किया है ब्राह्मण पुजारियों ने ------ विजय राजबली माथुर


ज्योतिष वह विज्ञान है जो मानव जीवन को सुंदर, सुखद व समृद्ध बनाने 

हेतु चेतावनी व उपाय बताता है। लेकिन आज इस विज्ञान को स्वार्थी व 

धूर्त लोगों ने पेट-पूजा का औज़ार बना कर इसकी उपादेयता को गौड़ कर 

दिया व इसे आलोचना का शिकार बना दिया है।
http://krantiswar.blogspot.in/2016/01/blog-post_31.html


हिंदुस्तान, लखनऊ , दिनांक 11 फरवरी, 2016 में विभिन्न कर्मकांडी पुजारियों ने ज्योतिषी होने का दावा करते हुये 'बसंत पंचमी' पर्व 12 व 13 फरवरी दो दिन होने की घोषणा की है। कुछ ने तो 13 फरवरी 2016 की प्रातः 10 : 20 तक पंचमी घोषित कर दी है। 

प्रस्तुत स्कैन से स्पष्ट हो जाएगा कि, 12 फरवरी 2016 की प्रातः 09 : 16 तक ही चतुर्थी तिथि है और उसी दिन रात्रि 30 :29 अर्थात घड़ी के हिसाब से 13 तारीख की सुबह 06 : 29 पर  पंचमी तिथि समाप्त होकर षष्ठी तिथि प्रारम्भ हो जाएगी अर्थात सूर्योदय समय 07 : 20 पर षष्ठी तिथि लग चुकी होगी। अतः बसंत पंचमी केवल 12 फरवरी 2016 को ही है लेकिन धंधेबाजों ने जनता को गुमराह करके अपनी पेट पूजा के लिए गलत घोषणाएँ की हैं जिनको प्रतिष्ठित अखबार ने अपने विज्ञापनीय कारोबार के लिहाज से प्रमुखता के साथ प्रकाशित किया है। इन सबका उद्देश्य अधिकाधिक धनोपार्जन है 'जन -कल्याण ' नहीं। इसी कारण जनता व सरकारें गुमराह होती हैं और मानवता को अनर्थ का सामना करना पड़ता है, ज्योतिष विज्ञान नाहक बदनाम होता है जिसके लिए ये ब्राह्मण पुजारी शत-प्रतिशत उत्तरदाई हैं।  


चंड - मार्तण्ड पंचांग, नीमच , पृष्ठ-53 

गुमराह करती अखबारी सूचना : 


सरकार ने कुतर्क को सही माना 


चंड - मार्तण्ड पंचांग, नीमच  की  ये पूर्व घोषणाएँ  घटित हो चुकी हैं  : 




पृष्ठ 52 पर वर्णित स्थिति 23-01-2016 से 22-02-2016 तक के लिए है और इसी दौरान ही सियाचिन का ग्लेशियर कांड घटित हुआ जिसमें दस सैनिकों का जीवन बलिदान हो गया। यह सब कुछ ग्रहों की स्थिति के कारण ही घटित हुआ परंतु सावधानी न बरती गई क्योंकि जनता व सरकार इन ब्राह्मण पुजारियों की गलत व्याख्याओं में ही उलझे रहते हैं। यदि चेतावनी पर ध्यान देते हुये अग्रिम सावधानी बरती जाती तो जन-क्षति को बचाया जा सकता था। 

लखनऊ में ही कल 10 फरवरी का वकील-तांडव और उसके जरिये हुये नुकसान से भी बचा जा सकता था यदि सावधानी बरतते तो। 





इसी प्रकार सरस्वती को ब्रह्मा की पुत्री बताना और पौराणिक गलत आख्यानों के आधार पर पूजा करवाना एक ऐसा घिनौना खेल है जिसने भारत में चारित्रिक पतन  ला दिया है। 'वेदों' में  'सरस्वती', 'गोमती' आदि  शब्दों के व्यापक अर्थ हैं न कि संकुचित जैसा कि इन ब्राह्मणों ने पुरानों में लिख डाला है और पुरानों को वेद आधारित बताने का कुचक्र रच रखा है। वस्तुतः पुराण वेदों में निहित उद्देश्यों से जनता को भटकाने हेतु ब्राह्मणों ने बड़ी चालाकी से गढ़े हैं। 'नास्तिक' संप्रदाय अपने गलत कदमों से इन ढ़ोंगी ब्राह्मणों की चालों को और मजबूत करता रहता है। जनता के सामने बचाव के बजाए भुगतने का ही विकल्प इस प्रकार बचा रह जाता है। इसी वजह से अब भी कोई एहतियात नहीं बरती जाएगी और आपको आगे भी दुखद घटनाओं के समाचार सुनने-पढ़ने को मिलते रहेंगे। 



 ~विजय राजबली माथुर ©
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Monday, February 8, 2016

लोकतन्त्र, राजनीति,आस्था,अध्यात्म,धर्म : सत्यार्थ का आभाव ------ विजय राजबली माथुर

*****'डार्विन वाद ' ने मतस्य से मनुष्य तक की विकास -गाथा को रचा व माना है। इस सिद्धान्त में 'पहले अंडा ' या 'पहले मुर्गी' वाला विवाद चलता रहता है और उसका व्यावहारिक समाधान नहीं हो पाने के बावजूद उसी के अनुसार सारी व्याख्याएँ की जाती हैं।  'युवा - पुरुष ' और 'युवा - स्त्री ' वाला सिद्धान्त 'तर्कसंगत' व 'व्यावहारिक' है किन्तु इसका मखौल इसलिए उड़ाया जाता है कि, इससे सफ़ेद जाति के मध्य - यूरोपीय मनुष्यों की श्रेष्ठता का सिद्धान्त और उनका 'डार्विन वाद ' थोथा सिद्ध हो जाता है। 

'डार्विन वाद ' के अनुसार जब मानव विकास माना जाता है तब यह जवाब नहीं दिया जाता है कि शिशु मानव का पालन और विकास कैसे संभव हुआ था ? जबकि 'युवा - पुरुष ' और 'युवा - स्त्री ' वाला सिद्धान्त इसलिए  'तर्कसंगत' व 'व्यावहारिक' है क्योंकि युवा नर- व नारी न केवल अपना खुद का अस्तित्व बचाने में बल्कि  'प्रजनन' में भी सक्षम हैं और नई संतान का पालन -पोषण करने में भी। 

मध्य -यूरोपीय सफ़ेद मनुष्यों की जाति शोषण पर चल कर ही सफल हुई है और उस शोषण को निरंतर मजबूत बनाने के लिए नित्य नए-नए अनुसंधान करके नई-नई कहानियाँ गढ़ती रहती है। उसी में एक कहानी है भारत पर 'आर्यों के आक्रमण ' की जबकि आर्य कोई जाति या धर्म नहीं है।  श्रेष्ठता का प्रतीक है 'आर्ष ' जिसका अपभ्रंश है -'आर्य' अर्थात कोई भी मनुष्य जो श्रेष्ठ कर्म करता है वह आर्ष अर्थात आर्य है चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो या किसी भी नस्ल का चाहे किसी भी आस्था को अपनाने वाला।*****  मानव जीवन को सुंदर- सुखद- समृद्ध  बनाने  की धारणा वालों ने खुद को धर्म-निरपेक्ष अर्थात सद्गुणों  से रहित घोषित कर रखा है और नास्तिक भी ; साथ ही डॉ अंबेडकर के अनुयाई कहलाने वालों ने खुद को  सफ़ेद जाति के षड्यंत्र में फंस कर मूल निवासी घोषित कर रखा है। स्पष्ट है इन परिस्थितियों का पूरा-पूरा लाभ शोषणकारी  - साम्राज्यवादी /सांप्रदायिक  - ब्राह्मण वादी शक्तियाँ  उठा कर खुद को मजबूत व शोषितों को विभक्त करने में उठाती हैं। यदि हम शब्दों के खेल में न फंस कर उनके सत्य अर्थ  को समझें व समझाएँ  तो सफल हो सकते हैं अन्यथा भारत का संविधान व लोकतन्त्र नष्ट हुये बगैर नहीं रह सकता। *****




डॉ अंबेडकर द्वारा संविधान सभा में दिये गए समापन भाषण का जो अंश  इस वर्ष गणतंत्र  दिवस पर प्रकाशित हुआ है उससे साफ झलकता है कि, आज जो कुछ संविधान को नष्ट किया जा रहा है उसका उनको पूर्वानुमान था और उन्होने तभी सचेत भी कर दिया था। किन्तु निहित स्वार्थी तत्वों ने जान-बूझ कर उस चेतावनी को नज़रअंदाज़ किया जिससे मुट्ठी भर लोगों के लाभ के लिए असंख्य लोगों का अबाध शोषण व उत्पीड़न किया जा सके।इसके लिए  लोकतन्त्र, राजनीति,आस्था,अध्यात्म,धर्म सबकी मनमानी झूठी व्याख्याएँ गढ़ी गईं । विरोध व प्रतिक्रिया स्वरूप जो तथ्य सामने लाये गए स्व्भाविक तौर पर वे भी गलत ही हुये क्योंकि वे गलत व्याख्याओं पर ही तो आधारित थे। महर्षि कार्ल मार्क्स, शहीद भगत सिंह व डॉ अंबेडकर ने इसी कारण धर्म का गलत आधार पर विरोध किया है जिसके परिणाम स्वरूप पोंगापंथी, शोषण वादी पुरोहितों की गलत व्याख्याएँ और भी ज़्यादा मजबूत हो गईं हैं। हम मनुष्य तभी हैं जब 'मनन' करें किन्तु आज मनन के बजाए 'आस्था' पर ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है और अदालतों तक से आस्था के आधार पर निर्णय दिये जा रहे हैं। आज 08 फरवरी, 2016 के हिंदुस्तान का जो सम्पादकीय प्रस्तुत किया गया है उसमें भी आस्था को अक्ल (मनन ) से ज़्यादा तरजीह दी गई है। 


अबसे दस लाख वर्ष पूर्व  पृथ्वी पर जब 'मनुष्य की उत्पति ' हुई  तो वह 'युवा - पुरुष ' और 'युवा - स्त्री ' के रूप तीन क्षेत्रों - अफ्रीका, मध्य - यूरोप व 'त्रि वृष्टि' (तिब्बत ) में एक साथ हुई थी। भौगोलिक प्रभाव से तीनों क्षेत्रों के मनुष्यों के रंग क्रमशः काला, सफ़ेद व गेंहुआ हुये। प्रारम्भ में तीनों क्षेत्रों की मानव - जाति का विकास प्रकृति द्वारा उपलब्ध सुविधाओं पर निर्भर था। किन्तु कालांतर में सफ़ेद रंग के मध्य यूरोपीय मनुष्यों ने खुद को सर्व- श्रेष्ठ घोषित करते हुये तरह- तरह की कहानियाँ गढ़ डालीं और उनकी पुष्टि के लिए मानव-विकास के क्रम को अपने अनुसार लिख डाला। 

'डार्विन वाद ' ने मतस्य से मनुष्य तक की विकास -गाथा को रचा व माना है। इस सिद्धान्त में 'पहले अंडा ' या 'पहले मुर्गी' वाला विवाद चलता रहता है और उसका व्यावहारिक समाधान नहीं हो पाने के बावजूद उसी के अनुसार सारी व्याख्याएँ की जाती हैं।  'युवा - पुरुष ' और 'युवा - स्त्री ' वाला सिद्धान्त 'तर्कसंगत' व 'व्यावहारिक' है किन्तु इसका मखौल इसलिए उड़ाया जाता है कि, इससे सफ़ेद जाति के मध्य - यूरोपीय मनुष्यों की श्रेष्ठता का सिद्धान्त और उनका 'डार्विन वाद ' थोथा सिद्ध हो जाता है। 

'डार्विन वाद ' के अनुसार जब मानव विकास माना जाता है तब यह जवाब नहीं दिया जाता है कि शिशु मानव का पालन और विकास कैसे संभव हुआ था ? जबकि 'युवा - पुरुष ' और 'युवा - स्त्री ' वाला सिद्धान्त इसलिए  'तर्कसंगत' व 'व्यावहारिक' है क्योंकि युवा नर- व नारी न केवल अपना खुद का अस्तित्व बचाने में बल्कि  'प्रजनन' में भी सक्षम हैं और नई संतान का पालन -पोषण करने में भी। 

मध्य -यूरोपीय सफ़ेद मनुष्यों की जाति शोषण पर चल कर ही सफल हुई है और उस शोषण को निरंतर मजबूत बनाने के लिए नित्य नए-नए अनुसंधान करके नई-नई कहानियाँ गढ़ती रहती है। उसी में एक कहानी है भारत पर 'आर्यों के आक्रमण ' की जबकि आर्य कोई जाति या धर्म नहीं है।  श्रेष्ठता का प्रतीक है 'आर्ष ' जिसका अपभ्रंश है -'आर्य' अर्थात कोई भी मनुष्य जो श्रेष्ठ कर्म करता है वह आर्ष अर्थात आर्य है चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो या किसी भी नस्ल का चाहे किसी भी आस्था को अपनाने वाला।  

किन्तु आर्य को एक जाति और भारत में आक्रांता घोषित करने वाले सिद्धान्त ने यहाँ के निवासियों को अंत हींन  विवादों व संघर्षों में उलझा कर रख दिया है  'मूल निवासी आंदोलन ' भी उसी की एक कड़ी है। ' नास्तिक वाद' भी उसी  थोथे सिद्धान्त का खड़ा हुआ विभ्रम है। वस्तुतः शब्दों के खेल को समझ कर  'मनन' करने व सच्चा  मनुष्य बनने की ज़रूरत है और मानव-मानव में  विभेद करने वालों को बेनकाब करने की । 

मनुष्य   = जो मनन कर सके। अन्यथा 'नर-तन' धारी पशु। 
आस्तिक = जिसका स्वम्य  अपने ऊपर विश्वास हो। 
नास्तिक = जिसका अपने ऊपर विश्वास न हो। 
अध्यात्म = अध्यन  अपनी  आत्मा का । न कि  अपनी आत्मा से परे। 
धर्म = जो मनुष्य तन व समाज को धारण  करने हेतु आवश्यक है , यथा --- सत्य, अहिंसा (मनसा - वाचा - कर्मणा ), अस्तेय, अपरिग्रह व ब्रह्मचर्य। 
भगवान = भ (भूमि-पृथ्वी )+ ग (गगन -आकाश )+ व (वायु - हवा )+I ( अनल - अग्नि ) + न  (नीर - जल )। 
खुदा = चूंकि ये पांचों तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी मनुष्य ने नहीं बनाया है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं। 
GOD = G (जेनरेट )+ O (आपरेट ) + D (डेसट्राय )। इन तत्वों का कार्य  उत्पति - पालन - संहार = GOD है। 

मानव जीवन को सुंदर- सुखद- समृद्ध  बनाने  की धारणा वालों ने खुद को धर्म-निरपेक्ष अर्थात सद्गुणों  से रहित घोषित कर रखा है और नास्तिक भी ; साथ ही डॉ अंबेडकर के अनुयाई कहलाने वालों ने खुद को  सफ़ेद जाति के षड्यंत्र में फंस कर मूल निवासी घोषित कर रखा है। स्पष्ट है इन परिस्थितियों का पूरा-पूरा लाभ शोषणकारी  - साम्राज्यवादी /सांप्रदायिक  - ब्राह्मण वादी शक्तियाँ  उठा कर खुद को मजबूत व शोषितों को विभक्त करने में उठाती हैं। यदि हम शब्दों के खेल में न फंस कर उनके सत्य अर्थ  को समझें व समझाएँ  तो सफल हो सकते हैं अन्यथा भारत का संविधान व लोकतन्त्र नष्ट हुये बगैर नहीं रह सकता। 


  ~विजय राजबली माथुर ©
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Saturday, February 6, 2016

सिनेमा और सामाजिक सरोकार : एम . एस . सथ्यू से एक संवाद


संदर्भ : फिल्म गर्म हवा 




एम एस सथ्यू साहब से संवाद करते प्रदीप घोष साहब 





प्रथम पंक्ति में राकेश जी, विजय राजबली माथुर, के के वत्स 


लखनऊ, दिनांक 04 फरवरी, 2016 को कैफी आज़मी एकेडमी , निशांतगंज के हाल में सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक मैसूर श्रीनिवास सथ्यू साहब के साथ 'सिनेमा और सामाजिक सरोकार' विषय पर एक संवाद परिचर्चा का आयोजन कैफी आज़मी एकेडमी और इप्टा के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। प्रारम्भ में कैफी आज़मी एकेडमी के सचिव सैयद सईद मेंहदी साहब ने एकेडमी व इप्टा की ओर से बुके देकर सथ्यू साहब का स्वागत किया व उनका संक्षिप्त परिचय देते हुये उनको महान एवं जागरूक फ़िल्मकार बताया। उन्होने इस बात को ज़ोर देकर कहा कि, पैसे को महत्व न देते हुये सथ्यू साहब ने फिल्म की अपेक्षा थियेटर को ज़्यादा अपना समय दिया और समाज को जागरूक करने का बीड़ा आज 85 वर्ष की आयु में भी बुलंदगी के साथ उठाए हुये हैं। 

मेंहदी साहब के बाद इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश जी ने भी सथ्यू साहब की सादगी व इप्टा के प्रति उनके समर्पण की चर्चा की। इप्टा के वरिष्ठ उपाध्यक्ष की हैसियत से इप्टा की मजबूती में सथ्यू साहब के योगदान को उन्होने प्रेरक बताया। राकेश जी ने यह भी बताया कि सथ्यू साहब की लोकप्रियता पाकिस्तानी जनता के बीच भी है। उन्होने पाकिस्तान यात्रा के संस्मरण सुनाते हुये बताया कि 'मोहन जो देड़ो ' की ओर अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए जो बोर्ड लगाया गया है उस पर अंकित है- YOU ARE VIEWING ANCIENT INDIA- तात्पर्य यह है कि भारत और पाकिस्तान सांस्कृतिक रूप से एक ही हैं और इसी बात को सथ्यू साहब ने फिल्म 'गर्म हवा' में बड़े अच्छे ढंग से रखा है। 


सथ्यू साहब ने शुरुआत में कहा कि वह मूल रूप से कन्नड़ भाषी होने के कारण हिन्दी-उर्दू पर अच्छी पकड़  तो नहीं रखते हैं लेकिन लखनऊ की तहज़ीब से पूरे वाकिफ हैं। काफी अर्सा पहले कन्नड़ लेखक बी सुरेशा लिखित नाटक-'गिरिजा कल्याणम' के हिन्दी रूपातंरण 'गिरिजा के सपने' के मंचन के सिलसिले में लखनऊ आने की उन्होने संक्षिप्त चर्चा की। उन्होने बताया कि इस नाटक की नायिका इंगलिश व गणित में कमजोर होने के कारण 'मेट्रिक फेल' हो गई और इसी 'मेट्रिक फेल' नाम से वह लोकप्रिय भी हुई। नाटक में बैंकों द्वारा आम जनता के शोषण का ज़िक्र करते हुये वह नायिका ICICI का उच्चारण कुछ इस प्रकार करती है - आई सी - आई सी - आई कि बरबस ही दर्शक उसकी बात की  ओर आकर्षित हो जाते हैं। 


एक युवती रेखा द्वारा युवाओं के लिए संदेश देने का सथ्यू साहब से आग्रह करने पर उन्होने कहा कि सफलता कोई बड़ी बात नहीं होती है। असफल होने पर सीखने का अवसर मिलता है और उसके बाद जो सफलता मिलती है वह पूर्ण परिपक्व होती है। उन्होने खुद अपना दृष्टांत प्रस्तुत करते हुये कहा कि इंजीनियर पिता, चाचा और भाइयों के परिवार से होने व साईन्स विद्यार्थी होने के बावजूद उनका रुझान कला की ओर था। उन्होने एक गुरु से सरोद वादन सीखा और खुद महसूस किया कि वह सफल नहीं हैं तब तीन वर्षों तक 'कत्थक कली' नृत्य सीखा और उसके लिए भी अपने को अनुकूल नहीं पाया तब पिताजी से कह दिया कि बी एस सी की परीक्षा नहीं देंगे उनको बंबई भिजवा दें और छह माह तक रु 50/- की मदद कर दें । उनको रु 13/- का टिकट दिला कर मैसूर से बंबई भेज दिया गया जहां उनका संपर्क इप्टा से हुआ , वह पहले से ही नाटकों में भाग लेते रहे थे अतः हबीब तनवीर व के ए अब्बास के सहयोग से थियेटर में भाग लेने लगे । लेकिन तब तक सिर्फ कन्नड़ और अङ्ग्रेज़ी ही जानते थे इसलिए बंबई में उन्होने पर्दे के पीछे के  मंच- सज्जा, ध्वनि, रोशनी आदि के ही कार्य लिए।  


के आसिफ ने एक नाटक के सेट की ज़िम्मेदारी उनको दी थी , उस नाटक को देखने चेतन आनंद भी आए थे उन्होने सेट से प्रभावित होकर सज्जा करने वाले से मिलने की इच्छा व्यक्त की और इस प्रकार सथ्यू साहब उनके संपर्क में आए। चेतन आनंद ने सथ्यू साहब को मिलने को बुलाया और उनको अपने साथ असिस्टेंट डाइरेक्टर के रूप में काम करने को कहा। सथ्यू साहब ने कहा कि उनको हिन्दी नहीं आती है वह कैसे करेंगे ?आनंद साहब ने उनको रोमन का सहारा लेने को कहा , उनके द्वारा प्रस्तावित रु 250/- प्रतिमाह वेतन को अपर्याप्त बताने पर सथ्यू साहब की इच्छानुसार रु 275/- प्रतिमाह पर नियुक्त कर लिया। 


सथ्यू साहब ने 1956 में अपने पहले निर्देशन की चर्चा करते हुये कहा कि, पहली बार में ही उनको अपने निर्देशक चेतन आनंद साहब को भी निर्देशित करना पड़ा क्योंकि वह अभिनय भी कर रहे थे। फिल्म टैगोर के नाटक 'चंडालिका' पर आधारित थी जिसमें सितारा देवी और आगरा की निम्मी भी थीं। सथ्यू साहब ने एक दृश्य पर जैसे ही 'कट' कहा चेतन आनंद साहब चौंक पड़े कि जो साहायक बनने से इंकार कर रहा था उसकी दृश्यों पर इतनी बारीक पकड़ है कि वह उनको भी कमियाँ बता कर रीटेक के लिए कह रहा है। वह सथ्यू साहब से प्रसन्न हुये और यह जान कर और भी कि वह मूलतः थियेटर से ही संबन्धित हैं। एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उन्होने कहा कि वह बंबई पैसा या नाम कमाने नहीं, बल्कि 'काम सीखने' के लिए आए थे। 

अपनी सुप्रसिद्ध फिल्म 'गर्म हवा' का ज़िक्र करते हुये सथ्यू साहब ने बताया कि यह इस्मत चुगताई की कहानी पर आधारित है किन्तु इसके अंतिम दृश्य में जिसको प्रारम्भ में पर्दे पर दिखाया गया था - राजेन्द्र सिंह बेदी की कहानी के कुछ अंशों को जोड़ लिया गया था। इस दृश्य में यह दिखाया गया था कि किस प्रकार मिर्ज़ा साहब (बलराज साहनी ) जब पाकिस्तान जाने के ख्याल से तांगे पर बैठ कर परिवार के साथ निकलते हैं तब मार्ग में रोज़ी-रोटी, बेरोजगारी, भुखमरी के प्रश्नों पर एक प्रदर्शन मिलता है जिसमें भाग लेने के लिए उनका बेटा (फारूख शेख जिनकी यह पहली फिल्म थी  ) तांगे से उतर जाता है बाद में अंततः मिर्ज़ा साहब तांगे पर अपनी बेगम को वापिस हवेली भेज देते हैं और खुद भी आंदोलन में शामिल हो जाते हैं। 


एक प्रश्न के उत्तर में सथ्यू साहब ने बताया कि 1973 में 42 दिनों में 'गर्म हवा' बन कर तैयार हो गई थी। इसमें इप्टा आगरा के राजेन्द्र रघुवंशी और उनके पुत्र जितेंद्र रघुवंशी (जितेंद्र जी के साथ आगरा भाकपा में कार्य करने  व आदरणीय राजेन्द्र रघुवंशी जी को सुनने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त  हुआ है ) आदि तथा दिल्ली इप्टा के कलाकारों ने भाग लिया था। ताजमहल व फ़तहपुर सीकरी पर भी शूटिंग की गई थी। इप्टा कलाकारों का योगदान कला के प्रति समर्पित था। बलराज साहनी साहब का निधन हो जाने के कारण उनको कुछ भी न दिया जा सका बाद में उनकी पत्नी को मात्र रु 5000/- ही दिये तथा फारूख शेख को भी सिर्फ रु 750/- ही दिये जा सके थे। किन्तु कलाकारों ने लगन से कार्य किया था। सथ्यू  साहब ने एक अन्य प्रश्न के उत्तर में बताया कि, 'निशा नगर', 'धरती के लाल' व 'दो बीघा ज़मीन' फिल्में भी इप्टा कलाकारों के सहयोग से बनीं थीं उनका उद्देश्य सामाजिक-राजनीतिक चेतना को जाग्रत करना था। 


चर्चा में भाग लेने वाले लोगों में वीरेंद्र यादव, भगवान स्वरूप कटियार, मेंहदी अब्बास रिजवी, प्रदीप घोष आदि के नाम प्रमुख हैं। 

कुछ प्रश्नों के उत्तर में सथ्यू साहब ने रहस्योद्घाटन किया कि, यद्यपि 'गर्म हवा' 1973 में ही पूर्ण बन गई थी किन्तु 'सेंसर बोर्ड' ने पास नहीं किया था तब उनको प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी से संपर्क करना पड़ा था जिनके पुत्रों राजीव व संजय को वह पूर्व में 'क्राफ्ट' पढ़ा चुके थे। उन्होने बताया कि इंदिराजी अक्सर इन्स्टीच्यूट घूमने आ जाती थीं उनके साथ वी के कृष्णा मेनन भी आ जाते थे। वे लोग वहाँ चाय पीते थे, कभी-कभी वे कनाट प्लेस से खाना खा कर तीन मूर्ती भवन तक पैदल जाते थे तब तक सिक्योरिटी के ताम -झाम नहीं होते थे और राजनेता जन-संपर्क में रहते थे। काफी हाउस में उन्होने भी इंदर गुजराल व इंदिरा गांधी के साथ चर्चा में भाग लिया था। अतः सथ्यू साहब की सूचना पर इंदिराजी ने फिल्म देखने की इच्छा व्यक्त की जिसे तमाम झंझटों के बावजूद उन्होने दिल्ली ले जाकर दिखाया। इंदिराजी के अनुरोध पर सत्ता व विपक्ष के सांसदों को भी दिखाया और इस प्रकार सूचना-प्रसारण मंत्री गुजराल के कहने पर सेंसर सर्टिफिकेट तो मिल गया किन्तु बाल ठाकरे ने अड़ंगा खड़ा कर दिया अतः प्रीमियर स्थल 'रीगल थियेटर' के सामने स्थित 'पृथ्वी थियेटर' में शिव सेना वालों को भी मुफ्त फिल्म शो दिखाया जिससे वे सहमत हो सके। 1974 में यह फ्रांस के 'कान' में दिखाई गई और 'आस्कर' के लिए भी नामित हुई। इसी फिल्म के लिए 1975 में सथ्यू साहब को 'पद्मश्री' से भी सम्मानित किया गया और यह सम्मान स्वीकार करने के लिए गुजराल साहब ने फोन करके विशेष अनुरोध किया था अतः उनको इसे लेना पड़ा। 

सथ्यू साहब ने बताया कि मई माह में तीन नाटकों का एक फेस्टिवल कराने वह फिर लखनऊ आएंगे जिसमें नादिरा बब्बर के नाटक को भी शामिल किया जाएगा। अंत में इप्टा के प्रदीप घोष साहब ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों में रिशी श्रीवास्तव, दीपक कबीर, के के वत्स, ओ पी अवस्थी, प्रोफेसर ए के सेठ व विजय राजबली माथुर भी शामिल थे। 

~विजय राजबली माथुर ©
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