Thursday, December 17, 2015

यही वे लोग हैं जो साम्यवाद को जनता से काट कर साम्राज्यवाद को मजबूत कर रहे हैं ------ विजय राजबली माथुर

*आज से 10 लाख वर्ष पूर्व जब मानव अपने वर्तमान स्वरूप मे आया तो प्रकृति के अनुरूप समाज मे पालन करने हेतु जो नियम बनाए गए वे ही 'वेद' हैं। वेद सभी समय के सभी मनुष्यों के लिए देश-काल के भेदभाव के बिना समान व्यवहार का मार्ग बताते हैं। शासकों और व्यापारियों ने अपने निजी स्वार्थ वश 'कर्मगत' वर्ण व्यवस्था को 'जन्मगत' जाति-व्यवस्था मे परिवर्तित करके शासितों का उत्पीड़न-शोषण किया। वेदोक्त परम्पराएँ विलुप्त हो गईं और समाज मे विषमता की खाई उत्पन्न हो गई। भारत मे विदेशी शासकों के आगमन पर उनके द्वारा यहाँ की जनता को 'हिन्दू' कह कर पुकारा गया जो फारसी भाषा मे एक गंदी और भद्दी गाली है। कुछ लोग अरबी भाषा के 'स ' को 'ह ' उच्चारण से जोड़ कर हिन्दू शब्द की हिमायत करते हैं तब भी यह विदेशियों की ही देंन साबित होता है। कुछ 'कुतर्क करने वाले  लोग ' हिन्दू शब्द की प्राचीनता टटोलते फिरते हैं,किन्तु ईरानियों के आने से पूर्व बौद्ध मठों,विहारों को उजाड़ने वाले उनके ग्रन्थों को जलाने वाले हिंसक लोगों को बौद्धों ने 'हिन्दू' की संज्ञा दी थी। 'हिन्दू' शब्द विदेशी और पूरी तरह से अभारतीय है। 'कुरान' की तर्ज पर विदेशी शासकों ने यहाँ के विद्वानों को 'सत्ता' व 'धन' सुख देकर 'पुराण' लिखवाये जो वेद-विपरीत हैं। किन्तु तथाकथित गर्व से हिन्दू लोग वेद और पुराण को गड्म गड करके गुमराह करते हैं और दुखद है कि प्रगतिशील बामपंथी भी उसी झूठ को मान्यता देते हैं। 

*'आर्य' सार्वभौम शब्द है और यह किसी देश-काल की सीमा मे बंधा हुआ नहीं है। आर्यत्व का मूल 'समष्टिवाद' अर्थात 'साम्यवाद' है। प्रकृति में संतुलन को बनाए रखने हेतु हमारे यहाँ यज्ञ -हवन किये जाते थे। अग्नि में डाले गए पदार्थ परमाणुओं में विभक्त हो कर वायु द्वारा प्रकृति में आनुपातिक रूप से संतुलन बनाए रखते थे.'भ'(भूमि)ग (गगन)व (वायु) ।(अनल-अग्नि)न (नीर-जल)को अपना समानुपातिक भाग प्राप्त होता रहता था.Generator,Operator ,Destroyer भी ये तत्व होने के कारण यही GOD है और किसी के द्वारा न बनाए जाने तथा खुद ही बने होने के कारण यही 'खुदा'भी है।  अब भगवान् का अर्थ मनुष्य की रचना -मूर्ती,चित्र आदि से पोंगा-पंथियों के स्वार्थ में कर दिया गया है और प्राकृतिक उपादानों को उपेक्षित छोड़ दिया गया है जिसका परिणाम है-सुनामी,अति-वृष्टि,अनावृष्टि,अकाल-सूखा,बाढ़ ,भू-स्खलन,परस्पर संघर्ष की भावना आदि-आदि.
*शीशे की तरह चमकता हुआ साफ़ है कि वैदिक संस्कृति हमें जन  पर आधारित अर्थात  समष्टिवादी बना रही है जबकि आज हमारे यहाँ व्यष्टिवाद हावी है जो पश्चिम के साम्राज्यवाद की  देन है।
*'धर्म'तो वह है जो 'धारण'करता है ,उसे कैसे छोड़ कर जीवित रहा जा सकता है.कोई भी वैज्ञानिक या दूसरा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि वह-भूमि,गगन,वायु,अनल और नीर (भगवान्,GODया खुदा जो ये पाँच-तत्व ही हैं )के बिना जीवित रह सकता है.हाँ ढोंग और पाखण्ड तथा पोंगा-पंथ का प्रबल विरोध करने की आवश्यकता मानव-मात्र के अस्तित्व की रक्षा हेतु जबरदस्त रूप से है।
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Monday, August 20, 2012

वैज्ञानिक परम्पराएँ-वेद और हवन

हमारे देश मे एक फैशन चलता है कि हमारा देश एक पिछड़ा हुआ देश है और यहाँ ज्ञान,विज्ञान जो आया वह पश्चिम की देंन है। आज़ादी के एक लंबे अरसे बाद भी गुलामी की बू लोगों के दिलों से अभी निकली नहीं है। ऊपर जो स्कैन आप देख रहे हैं उसमे आधुनिक अनुसंधान के आधार पर देश मे प्रचलित कुछ प्राचीन  परम्पराओं को विज्ञान -सम्मत बताया गया है।

मैक्स मूलर साहब जर्मनी से भारत आकर यहाँ 30 वर्ष रहे और संस्कृत सीख कर  मूल पांडुलिपियाँ लेकर जर्मनी रवाना हो गए। जर्मनी भाषा मे उनके अनुवादों को पढ़ कर वहाँ अनुसंधान हुये *-होमियोपैथी,बायोकेमिक चिकित्सा पद्धतियों को वहाँ ईजाद किया गया जो एलोपेथी  से श्रेष्ठ हैं। परमाणु तथा दूसरे आयुधों का आविष्कार भी वेदोक्त ज्ञान से वहाँ हुआ। जर्मनी की द्वितीय विश्व युद्ध मे पराजय के बाद अमेरिका और रूस ने इन परमाणु वैज्ञानिकों को अपने-अपने देश मे लगा लिया। अमेरिका ने सबसे पहले जापान की आत्म समपर्ण की घोषणा के बाद रूस को डराने के लिए 06 और 09 अगस्त को परमाणु बमो का प्रहार किया।

जर्मनी आदि पाश्चात्य देशों ने षड्यंत्र पूर्वक भारत मे यह प्रचार किया कि,'वेद गड़रियों के गीत 'के सिवा कुछ भी नहीं हैं (जबकि ये ही देश खुद वेद-ज्ञान का लाभ उठा कर खुद को विज्ञान का आविष्कारक बताते रहे)। हमारे देश के पाश्चात्य समर्थक विद्वान चाहे वे दक्षिण पंथी हों या प्रगतिशील बामपंथी दोनों ही साम्राज्यवादी इतिहासकारों के 'भटकाव' को ज्ञान-सूत्र मानते हैं जिसके अनुसार 'आर्य' मध्य यूरोप से घोड़ों पर सवार होकर भारत आए और यहाँ के 'मूल निवासियों' को दास बना लिया। इसी मान्यता के कारण देश मे आजकल एक साम्राज्यवाद पोषक आंदोलन 'मूल निवासियों देश को मुक्त करो' भी ज़ोर-शोर से चल रहा है। 

साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासकों ने( जब सेफ़्टी वाल्व के रूप मे स्थापित कांग्रेस  आर्यसमाजियों के प्रभाव से 'राष्ट्र वादी आंदोलन चलाने लगी तब )अपने हितों की रक्षा हेतु RSS का गठन एक पूर्व क्रांतिकारी के माध्यम से कराया। RSS और मुस्लिम लीग ने देश को विभाजित करा दिया। आज भी नफरत की सांप्रदायिकता फैला कर साम्राज्यवादी अमेरिका को दोनों संप्रदायों के कुछ संगठन लाभ पहुंचा रहे हैं। RSS और इसके दूसरे सहायक संगठन 'गर्व से हिन्दू' की मुहिम चलाते हैं। प्रगतिशील-बामपंथी कहलाने वाले विद्वान भी हिन्दू,इस्लाम,ईसाइयत को ही धर्म मानते हैं और प्रकट मे धर्म की आलोचना तथा छिपे तौर पर उन सांप्रदायिक गतिविधियों का पालन करते हैं। 

धर्म =सत्य,अहिंसा (मनसा,वाचा,कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य के समुच्य को धर्म कहते हैं जो शरीर को धारण करने हेतु आवश्यक हैं। जो लोग 'धर्म' की आलोचना करते हैं वे इन सदगुणो का पालन न करने को प्रेरित करते हैं। इसी कारण 1917 मे सम्पन्न साम्यवादी क्रांति रूस मे विफल हो गई क्योंकि शासक पार्टी कार्यकर्ताओं और जनता का शोषण कर रहे थे। आज वहाँ समाज-सरकार द्वारा स्थापित उद्योग पूर्व शासकों ने अपने भ्रष्टाचार की कमाई से खरीद लिए हैं और पूंजीपति बन गए हैं। 

भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)। प्रकृति के ये पाँच तत्व ही संयुक्त रूप से 'भगवान' हैं चूंकि इनको किसी ने बनाया नहीं है और ये खुद ही बने हैं इसलिए ये ही 'खुदा' हैं।  इंनका कार्य G(जेनरेट)+O(आपरेट)+D(डेसट्राय) करना है इसलिए ये ही 'गाड ' हैं। जो भगवान=खुदा=गाड को दिमागी फितूर कहते हैं वे सच से आँखें मूँद लेने को ही कहते हैं। 

भगवान या खुदा या गाड =प्रकृति के पाँच तत्व । अतः इनकी पूजा का माध्यम केवल और केवल 'हवन' है। 'पदार्थ विज्ञान' =मेटेरियल साईन्स के मुताबिक अग्नि मे यह गुण है कि उसमे डाले गए पदार्थों को 'परमाणुओ' -'एटम्स' मे विभक्त कर देती है और वायु उन परमाणुओं को पर्यावरण मे प्रसारित कर देती है। अर्थात भगवान या खुदा या गाड को वे परमाणु प्राप्त हो जाते हैं क्योंकि ये तत्व सर्वत्र व्यापक हैं-घट-घट वासी हैं। इनके अतिरिक्त नदी,समुद्र,वृक्ष,पर्वत,आकाश,नक्षत्र,ग्रह आदि देवताओं को भी हवन द्वारा प्रसारित परमाणु प्राप्त हो जाते हैं। 'देवता' =जो देता है ,लेता नहीं है। अतः इन प्राकृतिक संसाधनो के अतिरिक्त और कोई देवता नहीं होता है। 

विवाद तभी शुरू होता है जब हिन्दू,इस्लाम,ईसाइयत  आदि के नाम पर 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' को धर्म की संज्ञा देकर पूजा जाता है। वस्तुतः व्यापारियों-उद्योगपतियों और शासकों ने मिल कर ये विभाजन अपने-अपने व्यापार को चमकाने हेतु समाज मे कर रखे हैं। प्रगतिशील-बामपंथी जनता को इन लुटेरे व्यापारियों के चंगुल से छुड़ाने हेतु 'धर्म' की वास्तविक व्याख्या प्रस्तुत करने के बजाए धर्म का विरोध करते हैं किन्तु पाखंड से उनको गुरेज नहीं है उसे वे भी धर्म ही पुकारते हैं। दमन जनता का होता है।

आज से 10 लाख वर्ष पूर्व जब मानव अपने वर्तमान स्वरूप मे आया तो प्रकृति के अनुरूप समाज मे पालन करने हेतु जो नियम बनाए गए वे ही 'वेद' हैं। वेद सभी समय के सभी मनुष्यों के लिए देश-काल के भेदभाव के बिना समान व्यवहार का मार्ग बताते हैं। शासकों और व्यापारियों ने अपने निजी स्वार्थ वश 'कर्मगत' वर्ण व्यवस्था को 'जन्मगत' जाति-व्यवस्था मे परिवर्तित करके शासितों का उत्पीड़न-शोषण किया। वेदोक्त परम्पराएँ विलुप्त हो गईं और समाज मे विषमता की खाई उत्पन्न हो गई। भारत मे विदेशी शासकों के आगमन पर उनके द्वारा यहाँ की जनता को 'हिन्दू' कह कर पुकारा गया जो फारसी भाषा मे एक गंदी और भद्दी गाली है। कुछ लोग अरबी भाषा के 'स ' को 'ह ' उच्चारण से जोड़ कर हिन्दू शब्द की हिमायत करते हैं तब भी यह विदेशियों की ही देंन साबित होता है। कुछ 'कुतर्क करने वाले  लोग ' हिन्दू शब्द की प्राचीनता टटोलते फिरते हैं,किन्तु ईरानियों के आने से पूर्व बौद्ध मठों,विहारों को उजाड़ने वाले उनके ग्रन्थों को जलाने वाले हिंसक लोगों को बौद्धों ने 'हिन्दू' की संज्ञा दी थी। 'हिन्दू' शब्द विदेशी और पूरी तरह से अभारतीय है। 'कुरान' की तर्ज पर विदेशी शासकों ने यहाँ के विद्वानों को 'सत्ता' व 'धन' सुख देकर 'पुराण' लिखवाये जो वेद-विपरीत हैं। किन्तु तथा कथित गर्व से हिन्दू लोग वेद और पुराण को गड्म गड करके गुमराह करते हैं और दुखद है कि प्रगतिशील बामपंथी भी उसी झूठ को मान्यता देते हैं। 

यू एस ए की राजधानी वाशिंगटन (DC) मे अग्निहोत्र यूनिवर्सिटी मे अनवरत 24 घंटे हवन चलता रहता है जिसके परिणामस्वरूप USA के क्ष्तिज पर बना ओज़ोन का छिद्र परिपूर्ण हो गया और वह सरक कर दक्षिण-पूर्व एशिया की तरफ आ गया है। इस क्षेत्र मे प्राकृतिक प्रकोपों का कारण यह ओज़ोन छिद्र ही है जो यू एस ए आदि पाश्चात्य देशों के कुकृत्य का कुफ़ल है। किन्तु हमारे बामपंथी भाई और प्रगतिशील पत्रकार जिनमे दैनिक जागरण के चेनल IBN 7वाले प्रमुख हैं 'हवन' का घोर विरोध करते हैं-व्यंग्य उड़ाते हैं। 

यदि हमे अपने देश 'भारत' को प्रकृतिक प्रकोपों से बचाना है,अपने नागरिकों को शुद्ध पर्यावरण उपलब्ध कराना है और परस्पर भाई-चारा उत्पन्न करना है तो 'वेदोक्त हवन' का सहारा लेना ही चाहिए। अन्यथा तो जो चल रहा है चलता रहेगा फिर रोना-झींकना क्यों?

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*वेदों के 'समष्टिवाद' का ही आधुनिक रूप है 'साम्यवाद' जिसका निरूपण किया जर्मनी के महर्षि कार्ल मार्क्स ने उन जर्मन ग्रन्थों के अवलोकन के पश्चात जो वेदों की मूल पांडु लिपियों से अनूदित थे। लेकिन भारतीय साम्यवादी विद्वान 'साम्यवाद' को पाश्चात्य विज्ञान मानते हैं और इसी मुगालते मे जनता से कटे रहते हैं। वस्तुतः 'साम्यवाद'='समष्टिवाद' मूल रूप से भारतीय अवधारणा है और इसे लागू भी तभी किया जा सकेगा जब हकीकत को समझ लिया जाएगा।
http://krantiswar.blogspot.in/2012/08/blog-post_3188.html

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योगीराज श्री कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन शोषण-उत्पीड़न और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुये ही बीता किन्तु ढ़ोंगी-पोंगापंथी-पुरोहितवाद ने आज श्री कृष्ण के संघर्ष को 'विस्मृत' करने हेतु उनको अवतार घोषित करके उनकी पूजा शुरू करा दी। कितनी बड़ी विडम्बना है कि 'कर्म' पर ज़ोर देने वाले श्री कृष्ण के 'कर्मवाद' को भोथरा करने के लिए उनको अलौकिक बता कर उनकी शिक्षाओं को भुला दिया गया और यह सब किया गया है शासकों के शोषण-उत्पीड़न को मजबूत करने हेतु। अनपढ़ तो अनपढ़ ,पढे-लिखे मूर्ख ज़्यादा ढोंग-पाखंड मे उलझे हुये हैं।

तथा कथित प्रगतिशील साम्यवादी बुद्धिजीवी जिंनका नेतृत्व विदेश मे बैठे पंडित अरुण प्रकाश मिश्रा और देश मे उनके बड़े भाई पंडित ईश मिश्रा जी  करते हैं सांप्रदायिक तत्वों द्वारा निरूपित सिद्धांतों को धर्म मान कर धर्म को त्याज्य बताते हैं। जबकि धर्म=जो शरीर को धारण करने के लिए आवश्यक है वही 'धर्म' है;जैसे-सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य । अब यदि ढ़ोंगी प्रगतिशीलों की बात को सही मान कर धर्म का विरोध किया जाये तो हम लोगों से इन सद्गुणों को न अपनाने की बात करते हैं और यही कारण है कि सोवियत रूस मे साम्यवाद का पतन हो गया(सोवियत भ्रष्ट नेता ही आज वहाँ पूंजीपति-उद्योगपति हैं जो धन जनता और कार्यकर्ता का शोषण करके जमा किया गया था उसी के बल पर) एवं चीन मे जो है वह वस्तुतः पूंजीवाद ही है।दूसरी ओर थोड़े से  पोंगापंथी केवल 'गीता' को ही महत्व देते हैं उनके लिए भी 'वेदों' का कोई महत्व नहीं है। 'पदम्श्री 'डॉ कपिलदेव द्विवेदी जी कहते हैं कि,'भगवद  गीता' का मूल आधार है-'निष्काम कर्म योग'
"कर्मण्ये वाधिकारस्ते ....................... कर्मणि। । " (गीता-2-47)

इस श्लोक का आधार है यजुर्वेद का यह मंत्र-
"कुर्वन्नवेह कर्मा................... न कर्म लिपयाते नरो" (यजु.40-2 )

इसी प्रकार सम्पूर्ण बाईबिल का मूल मंत्र है 'प्रेम भाव और मैत्री' जो यजुर्वेद के इस मंत्र पर आधारित है-
"मित्रस्य मा....................... भूतानि समीक्षे।  ....... समीक्षा महे । । " (यजु .36-18)

एवं कुरान का मूल मंत्र है-एकेश्वरवाद-अल्लाह की एकता ,उसके गुण धर्मा सर्वज्ञ सर्व शक्तिमान,कर्त्ता-धर्त्तासंहर्त्ता,दयालु आदि(कुरान7-165,12-39,13-33,57-1-6,112-1-4,2-29,2-96,87-1-5,44-6-8,48-14,1-2,2-143 आदि )। 

इन सबके आधार मंत्र हैं-

1-"इंद्रम मित्रम....... मातरिश्चा नामाहू : । । " (ऋग-1-164-46)
2-"स एष एक एकवृद एक एव "। । (अथर्व 13-4-12)
3-"न द्वितीयों न तृतीयच्श्तुर्थी नाप्युच्येत। । " (अथर्व 13-5-16)
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 'आर्य'=श्रेष्ठ अर्थात वे स्त्री पुरुष जिनके आचरण और कार्य श्रेष्ठ हैं 'आर्य' है इसके विपरीत लोग अनार्य हैं। न यह कोई जाति थी न है।


'आर्य' सार्वभौम शब्द है और यह किसी देश-काल की सीमा मे बंधा हुआ नहीं है। आर्यत्व का मूल 'समष्टिवाद' अर्थात 'साम्यवाद' है। प्रकृति में संतुलन को बनाए रखने हेतु हमारे यहाँ यज्ञ -हवन किये जाते थे। अग्नि में डाले गए पदार्थ परमाणुओं में विभक्त हो कर वायु द्वारा प्रकृति में आनुपातिक रूप से संतुलन बनाए रखते थे.'भ'(भूमि)ग (गगन)व (वायु) ।(अनल-अग्नि)न (नीर-जल)को अपना समानुपातिक भाग प्राप्त होता रहता था.Generator,Operator ,Destroyer भी ये तत्व होने के कारण यही GOD है और किसी के द्वारा न बनाए जाने तथा खुद ही बने होने के कारण यही 'खुदा'भी है।  अब भगवान् का अर्थ मनुष्य की रचना -मूर्ती,चित्र आदि से पोंगा-पंथियों के स्वार्थ में कर दिया गया है और प्राकृतिक उपादानों को उपेक्षित छोड़ दिया गया है जिसका परिणाम है-सुनामी,अति-वृष्टि,अनावृष्टि,अकाल-सूखा,बाढ़ ,भू-स्खलन,परस्पर संघर्ष की भावना आदि-आदि.
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शीशे की तरह चमकता हुआ साफ़ है कि वैदिक संस्कृति हमें जन  पर आधारित अर्थात  समष्टिवादी बना रही है जबकि आज हमारे यहाँ व्यष्टिवाद हावी है जो पश्चिम के साम्राज्यवाद की  देन है। दलालों के माध्यम से मूर्ती पूजा करना कहीं से भी समष्टिवाद को सार्थक नहीं करता है,जबकि वैदिक हवन सामूहिक जन-कल्याण की भावना पर आधारित है। IBN 7 के पत्रकार हवन का विरोध पोंगापंथ को सबल बनाने हेतु करते है और दूसरे चेनल वाले भी। साम्राज्यवादी -विदेशी तो खुद को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए वेदों का विरोध करते ही हैं एवं उनके निष्कर्षों का लाभ लेकर उसे अपना आविष्कार बताते हैं।

ऋग्वेद के मंडल ५/सूक्त ५१ /मन्त्र १३ को देखें-

विश्वे देवा नो अद्या स्वस्तये वैश्वानरो वसुरग्निः स्वस्तये.
देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तये स्वस्ति नो रुद्रः पात्व्हंससः ..

(जनता की कल्याण -कामना से यह यज्ञ  रचाया.
विश्वदेव के चरणों में अपना सर्वस्व चढ़ाया..)

जो लोग (अरुण प्रकाश मिश्रा -ईश मिश्रा जी और उनके चेले सरीखे )धर्म की वास्तविक व्याख्या को न समझ कर गलत  उपासना-पद्धतियों को ही धर्म मान कर चलते हैं वे अपनी इसी नासमझ के कारण ही  धर्म की आलोचना करते और खुद को प्रगतिशील समझते हैं जबकि वस्तुतः वे खुद भी उतने ही अन्धविश्वासी हुए जितने कि पोंगा-पंथी अधार्मिक होते हैं। 

ऋग्वेद के मंडल ७/सूक्त ३५/मन्त्र १ में कहा गया है-

शं न इन्द्राग्नी भवतामवोभिः शन्न इन्द्रावरुणा रातहव्या डे
शमिन्द्रासोमा सुविताय शंयो :शन्न इन्द्रा पूष्णा वाजसात..

(सूर्य,चन्द्र,विद्युत्,जल सारे सुख सौभाग्य बढावें.
रोग-शोक-भय-त्रास हमारे पास कदापि न आवें..)

वेदों में किसी व्यक्ति,जाति,क्षेत्र,सम्प्रदाय,देश-विशेष की बात नहीं कही गयी है.वेद सम्पूर्ण मानव -सृष्टि की रक्षा की बात करते हैं.इन्हीं तत्वों को जब मैक्समूलर साहब जर्मन ले गए तो वहां के विचारकों ने अपनी -अपनी पसंद के क्षेत्रों में उनसे ग्रहण सामग्री के आधार पर नई -नई खोजें प्रस्तुत कीं हैं.जैसे डा.हेनीमेन ने 'होम्योपैथी',डा.एस.एच.शुस्लर ने 'बायोकेमिक'  भौतिकी के वैज्ञानिकों ने 'परमाणु बम'एवं महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'वैज्ञानिक समाजवाद'या 'साम्यवाद'की खोज की। 


दुर्भाग्य से महर्षि कार्ल मार्क्स ने भी अन्य विचारकों की भाँती ही गलत उपासना-पद्धतियों (ईसाइयत,इस्लाम और हिन्दू ) को ही धर्म मानते हुए धर्म की कड़ी आलोचना की है ,उन्होंने कहा है-"मैंन  हैज क्रियेटेड द गाड फार हिज मेंटल सिक्योरिटी ओनली".आज भी उनके अनुयाई एक अन्धविश्वासी की भांति इसे ब्रह्म-वाक्य मान कर यथावत चल रहे हैं.जबकि आवश्यकता है उनके कथन को गलत अधर्म के लिए कहा गया मानने की.'धर्म'तो वह है जो 'धारण'करता है ,उसे कैसे छोड़ कर जीवित रहा जा सकता है.कोई भी वैज्ञानिक या दूसरा विद्वान यह दावा नहीं कर सकता कि वह-भूमि,गगन,वायु,अनल और नीर (भगवान्,GODया खुदा जो ये पाँच-तत्व ही हैं )के बिना जीवित रह सकता है.हाँ ढोंग और पाखण्ड तथा पोंगा-पंथ का प्रबल विरोध करने की आवश्यकता मानव-मात्र के अस्तित्व की रक्षा हेतु जबरदस्त रूप से है।  
http://krantiswar.blogspot.in/2012/08/blog-post_9.html

~विजय राजबली माथुर ©
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Wednesday, December 16, 2015

बांग्लादेश की आज़ादी किन्तु इतिहास से सबक नहीं ------ विजय राजबली माथुर

यह लेख 16 दिसंबर 2011 को लिखा व प्रकाशित हुआ था उसमें  23 फरवरी 2011 को लिखे एक और लेख के अंशों को जोड़ कर आज बांग्लादेश की 45 वीं वर्षगांठ के अवसर पर पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है। 

 हम समस्त बांग्ला देशवासियों को उनके स्वतन्त्रता दिवस पर हार्दिक बधाई देते एवं मंगलकामनाएं करते है। एक समृद्ध,सुदृढ़ और सुरक्षित बांग्लादेश की अभिलाषा करते हैं। 

जब बांग्लादेश की आजादी का आंदोलन चल रहा था तो मेरठ कालेज,मेरठ मे 'समाज शास्त्र परिषद'की एक गोष्ठी मे  एकमात्र मैंने ही बांग्लादेश की निर्वासित सरकार को मान्यता देने का प्रबल विरोध किया था।  




http://vidrohiswar.blogspot.in/2011/02/blog-post.html


मुझे आज भी लगता है कि जिस उद्देश्य से 'बांग्लादेश'की स्थापना पाकिस्तान से प्रथक्क करके की गई थी वह अब तक पूरा नहीं हुआ है। 'बग-बंधु' शेख मुजीब का सपना 'सोनार बांग्ला' का था,क्या वैसा हो सका?कदापि नहीं। शेख मुजीब की सपरिवार (वर्तमान प्रधान मंत्री शेख हसीना ही एकमात्र वह सदस्य थीं जो रूस मे पढ़ाई करने के कारण जीवित बच सकीं) हत्या करके उनके बानिज्य मंत्री खोंडाकर मुश्ताक अहमद को उनके उत्तराधिकारी के रूप मे राष्ट्रपति बनाया गया था फिर उनकी भी हत्या कर दी गई और इस क्रम मे फौजी शासन ही वहाँ कायम हुआ जैसा पाकिस्तान मे होता आया था। फौजी शासन मे वैसे ही जुल्म ढाये गए जैसे पाकिस्तानी हुकूमत मे ढाये जाते थे। बांग्लादेश के 'मुक्ति आंदोलन'मे पाक फौजों से उत्पीड़ित होकर वहाँ के नागरिक भारत मे शरणार्थी बन कर आ गए थे तो आजाद बांग्ला देश की फौजी हुकूमत के अत्याचारों से त्रस्त होकर काफी नागरिक अपना वतन छोड़ कर भारत -भू पर आ बसे हैं और अधिकांश आज भी रिक्शा चला कर,मोहल्लों मे सफाई करके या मजदूरी करके अथवा भीख मांग कर गुजारा कर रहे हैं। 

बांग्लादेश 'आत्म-निर्भर' देश नहीं है । प्रारम्भ मे अमेरिका ने फिर चीन ने भी वहाँ की राजनीति को प्रभावित किया है और अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान ने भी। मुजीब की बेटी को भी आज भारत -हितैषी नहीं कहा जा सकता है। बांग्लादेश को आजाद कराने मे हिन्दुस्तानी फौज का बहुत बड़ा योगदान रहा है जिस कारण लगभग 90 हजार पाकिस्तानी फ़ौजियों को गिरफ्तार करके -POW के रूप मे भारत मे फौज की निगरानी मे रखा गया था। एक लंबे समय तक बंगला देश के नागरिकों का उत्पीड़न करने वाले फौजी भारत सरकार की आव-भगत मे मौज से रहे। इससे पूर्व जब अंधा-धुन्ध बांग्ला शरणार्थी भारत आ गए थे तो इंदिरा जी की सरकार ने एक अध्यादेश के जरिये RRF की स्थापना की थी। 10 पैसे के रेवेन्यू स्टैम्प के साथ 10 पैसे का ही 'शरणार्थी सहायता' का एक और रेवेन्यू स्टैम्प लागू करके इस कोश की स्थापना की गई थी ताकि शरणार्थियों  का खर्च वहन  किया जा सके। बांग्ला नागरिकों को रखना,खाना खिलाना,उनके लिए युद्ध लड़ना और जितवाना,फिर पाक बंदी फ़ौजयों को रखना और खाना खिलाना यह सब कुछ हम भारतीयों ने झेला। 

फिर भी 'बांग्ला देश' भारत का बफर स्टेट कभी न बन सका और इसी वजह से तब मैंने उसे मान्यता दिये जाने की खिलाफत की थी जबकि सभी साथी छत्रों ने और सभी अध्यापकों ने चाहे वे जनसंघ ,चाहे सोशलिस्ट, चाहे कांग्रेस समर्थक थे एक-स्वर से बांग्लादेश को मान्यता दिये जाने का समर्थन किया था। मै आज उन सभी लोगों से यह जानना चाहता हूँ कि 'बंगला देश' को पाक से प्रथक्क करके और मान्यता देकर कौन सा लाभ अर्जित किया गया इसका खुलासा करें। मानवीय और आर्थिक कुर्बानी जो दी गई वह मेरे निगाह मे निरर्थक गई। यही नहीं इस्स कारण हमे जो क्षति हुई सो अलग। 

1971 मे पाकिस्तान के राष्ट्रपति जेनरल याहिया खान की पुकार पर अमेरिकी प्रेसिडेंट रिचर्ड निकसन ने अपना 7 th Fleet हिन्द महासागर मे रवाना कर दिया था जिसका मुक़ाबला करने हेतु इंदिरा जी ने आनन-फानन मे 20 वर्षीय 'भारत-सोवियत शांति-सहयोग की मैत्री "  नामक संधि कर ली और ठीक 20 वर्ष बाद 1991 मे सोवियत रूस से 'साम्यवाद' का सफाया हो गया। CIA ने रूसी कम्यूनिस्ट पार्टी मे घुसपैठ करके उसे अंदर से खोखला कर दिया था और इसके लिए आर्थिक भ्रष्टाचार का सहारा लिया था। वही अमेरिकी प्रशासन आज भारत मे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अपने 'पिछलगुवे' को मोहरा बना कर चलवा रहा है जो भ्रष्टाचार का जनक है। 

1971 की भारतीय सेना की जीत को इन्दिरा जी की जीत बताया गया था और तत्काल विपक्षी 'जनसंघ'के नेता (अब पूर्व प्रधानमंत्री) अटल बिहारी बाजपाई साहब ने इंदिरा जी को 'दुर्गा' कह कर माल्यार्पण किया था। एक कवि ने लिखा था-"लोग इतिहास बदलते रहे,तुमने भूगोल बदल डाला" इसके बाद मध्यावधि चुनाव मे इंदिरा जी को प्रचंड बहुमत मिला था जिसके बल पर संविधान मे संशोधन करके 'लोकसभा' का कार्यकाल छै वर्ष कर दिया गया था ,यह अलग बात है कि गुप्तचर बलों से गुमराह होकर फिर पाँच वर्ष बाद लोकसभा भंग कर मध्यावधि चुनाव करा दिये जिसमे इन्दिरा सरकार अपनी 'एमेर्जेंसी' की ज़्यादतियों के कारण सत्ताच्युत्त हो गई। यह एमेर्जेंसी भी 1971 मे मिली पाक पर जीत के बदले लोकसभा  मे मिले प्रचंड बहुमत के घमंड मे  थोपी गई थी। जनता सरकार ने पुनः संविधान संशोधन द्वारा 5 वर्ष का लोकसभा का कार्यकाल निश्चित करा दिया था। 

1977 की चुनावी हार को इंदिरा जी ने आर एस एस के सहयोग से 'जनता सरकार' को तोड़ कर बदला लेकर चुकता किया। 1980 के मध्यावधि चुनाव मे आर एस एस का गुप्त समर्थन प्राप्त कर इंदिरा जी पुनः सत्तारूढ़ हुई। बांग्लादेश के निर्माण का बदला पाकिस्तान ने अमेरिकी शह से पंजाब मे 'खालिस्तान' और 'काश्मीर' मे आतंकवादी आंदोलन खड़ा करके लिया और इसी का शिकार खुद इंदिरा जी भी हुई और उनकी हत्या कर दी गई। राजीव गांधी उनके उत्तराधिकारी बने और अपनी माँ द्वारा शह दिये गए श्रीलंका के 'लिट्टे' संघर्ष मे कूद पड़े तथा श्रीलंका मे बंदूक की बट से घायल होकर लौटे और अंततः 1991 के चुनाव के दौरान  'लिट्टे'उग्रवादियों द्वारा मार दिये गए। 


इस चुनाव के बाद भूतपूर्व आर एस एस कार्यकर्ता पी वी नरसिंघा राव साहब प्रधानमंत्री बने जिनहोने वर्तमान पी एम को वित्तमंत्री बनाया था जिनकी नीतियों को अमेरिका जाकर एल के आडवाणी साहब ने उनकी नीतियों का चुराया जाना घोषित किया था। आज आर एस एस,मनमोहन गुट ,अमेरिकी और भारतीय कारपोरेट घराने तथा अमेरिकी प्रशासन के सहयोग से 'अन्ना आंदोलन'चल रहा है जिसका लक्ष्य कारपोरेट घरानों की लूट,शोषण और भ्रष्टाचार को संरक्षण प्रदान करना है। नरसिंघा राव जी ने पद छोडने के बाद अपने उपन्यास THE-INSIDER मे कुबूल किया है कि-"हम स्वतन्त्रता के भ्रमजाल मे जी रहे हैं"।

बांग्लादेश और पाकिस्तान मे तो फौज के माध्यम से अमेरिका अपने पसंद के लोगों का नेतृत्व थोपने मे कामयाब हो जाता है परंतु भारत मे उसे काफी कसरत करनी पड़ती है-कभी इंदिराजी की हत्या करवाई जाती है तो कभी राजीव जी की । सन 2014 के चुनावों के लिए अमेरिकी संस्थाओं ने नरेंद्र मोदी /राहुल गांधी के मध्य संघर्ष का लक्ष्य रखा है। उसी पृष्ठ-भूमि मे 'अन्ना-आंदोलन' चल रहा है। 

हिंदुस्तान ,लखनऊ,12 दिसंबर 2011 
 पाकिस्तान की 'सार्व-भौमिकता' का उल्लंघन करके ओसामा बिन लादेन को मारना ,पाकिस्तानी फौजी टुकड़ियों पर हमला करना अमेरिका के बाएँ हाथ का खेल है। साम्राज्यवादियों का पृष्ठपोषक आर एस एस और उसके सहयोगी इन कृत्यों पर खुशी मनाते हैं। अफगान युद्ध मे भूमिका खत्म होने पर पाक प्रेसीडेंट जिया-उलल-हक के विमान को रिमोट  विस्फोटक से उड़वा दिया गया। कभी बेनजीर कभी नवाज शरीफ को समर्थन देकर नेतृत्व हासिल करा दिया। कभी परवेज़ मुशर्रफ का समर्थन किया तो उन्हे हटवा कर बेनजीर के पति आसिफ जरदारी का,अब उन्हें हटवा कर पूर्व क्रिकेटर इमरान खान को बैठाने की तैयारी है

मीडिया चाहे प्रिंट हो या इलेक्ट्रानिक आम जनता को सच्चाई से वाकिफ नहीं करा रहा है वह केवल कारपोरेट इशारे पर 'अन्ना' का महिमा-मंडन करता आ रहा है। आम जनता अपनी भूख से व्याकुल है उसे 'आजादी' का मतलब मालूम नहीं चल पता है। हमारे इंटरनेटी विद्वान खाते-पीते समृद्ध लोग हैं उन्हें आम जनता से क्या लेना-देना?देश आजाद रहे या गुलाम उनकी समृद्धि तो बढ़नी ही है तो वे क्यों जाग्रत करें जनता को ?'क्रांतिस्वर' का लेखन तो नक्कार खाने मे तूती की आवाज की तरह खो जाता है। लेकिन फर्ज अदायगी तो हम अपनी तरफ से करते ही रहेंगे,चाहे जिसे जो बुरा लगता रहे। 


'हिंदुस्तान मे आज प्रकाशित इस लेख से भी उपरोक्त लेख की पुष्टि होती है-


(हिंदुस्तान-लखनऊ-16/12/2011 )

Monday, December 14, 2015

ज्योतिष अंधविश्वास नहीं : ज्योतिष कर्मवान बनाता है ------ विजय राजबली माथुर

आगरा से लखनऊ आने के बाद 14 दिसंबर 2009 को ज्योतिष कार्यालय भी यहीं खोल लिया था , आज जब उसके सातवें वर्ष में प्रवेश के समय पटना निवासी अवकाश प्राप्त पुलिस उच्चाधिकारी साहब का स्टेटस देखा तो कुछ पुरानी पोस्ट्स को संयुक्त रूप से पुनः दे रहा हूँ। उनके सवाल और मेरे द्वारा उस पर टिप्पणी भी संलग्न कर रहा हूँ। 


***सदियों से ब्राह्मण किस प्रकार जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ते आ रहे हैं। और जनता को क्या कहे?समाज मे मेरी इसलिए आलोचना है कि लोगों के अनुसार  मैंने ब्राह्मणों के क्षेत्र मे अतिक्रमण कर डाला है। जबकि मूल रूप से समाज मे शिक्षा-व्यवस्था का दायित्व कायस्थों ही का था । ( है क्या बला यह--'कायस्थ'?)आगरा कालेज ,आगरा  मे जूलाजी विभाग के अवकाश प्राप्त अध्यक्ष डॉ वी के तिवारी साहब,भारत पेट्रोलियम के उच्चाधिकारी डॉ बी एम उपाध्याय जी  ,सपा नेता और मर्चेन्ट नेवी के रिटायर्ड  उच्चाधिकारी पंडित सुरेश चंद पालीवाल जी आदि अनेकों शिक्षित व समझदार  ब्राह्मणों ने न केवल मुझसे जन्म्पत्रियों के विश्लेषण सहर्ष कराये बल्कि अपने-अपने निवास पर 'वास्तु' हवन भी कराये और लाभान्वित भी हुये।'कायस्थ सभा,'आगरा,'अखिल भारतीय कायस्थ महासभा',आगरा और 'माथुर सभा',आगरा के कई पदाधिकार्यों ने भी मुझसे ज्योतिषीय एवं वास्तु परामर्श प्राप्त कर लाभ भी उठाया। परंतु मांगने की आदत न होने के कारण वांछित अर्थ-लाभ मैं न प्राप्त कर सका और अंततः मकान बेच कर छोटा मकान लखनऊ मे लेकर रहने लगा।
http://krantiswar.blogspot.in/2012/12/blog-post.html
December 12 ,2015 



मैं जो कह रहा हूं, उसपर बहुत कम लोगों को यक़ीन होगा। बात सपनों की है जिसे हम मिथ्या मानकर चलते रहे हैं। दो-ढाई साल पहले फेसबुक पर आते ही साहित्य, कला, संगीत और संस्कृति में योगदान देने वाले अपने प्रिय महापुरूषों के बारे में उनके जन्मदिन या पुण्यतिथि पर लिखना शुरू किया था मैंने। पिछले साल ऊबकर कुछ अरसे तक उनपर लिखना स्थगित कर दिया था। उनकी जन्म और मृत्यु तिथि की डायरी जो मेरे पास थी , वह भी कहीं गुम हो गई। फिर अचानक ऐसा हुआ कि मुझे सपने में लगातार वे लोग दिखाई देने लगे जो मेरे पसंदीदा शायर, कवि, संगीतकार या कलाकार रहे थे। सुबह उठकर मैं गूगल सर्च करता तो यह देखकर हैरान होता कि उसी या अगले दिन उनकी जन्मतिथि या पुण्यतिथि है। आज भी दिन में आंख लगी तो मेरे प्रिय शायरों में एक पाकिस्तान के जॉन एलिया मेरे सामने मुस्कुराते हुए हाज़िर थे। अभी गूगल पर गया तो देखा कि परसों मरहूम एलिया का जन्मदिन है। मैं पिछले एक साल से परेशान हूं। क्या हो रहा है यह मेरे साथ ? आत्माओं से संवाद ? टेलीपैथी ? सपने में अस्तित्व के दूसरे आयामों की यात्रा ? वैसे बताता चलूं कि मेरी मानसिक स्थिति बिल्कुल ठीक है और मैं अंधविश्वासी नहीं, वैज्ञानिक दृष्टि से संपन्न इक्कीसवी सदी का व्यक्ति हूं। बहुत ईमानदारी से अपनी समस्या शेयर कर रहा हूं आपके साथ। 
यह संयोग अकारण तो नहीं हो सकता न ? आपको क्या लगता है ?

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=957288401014425&set=a.379477305462207.89966.100001998223696&type=3&theater&notif_t=like
मनुष्य का यह भौतिक शरीर जो अंततः एक समयोपरान्त नष्ट हो जाता है के साथ-साथ दो शरीर और (कारण शरीर व सूक्ष्म शरीर ) चलते रहते हैं जो नष्ट नहीं होते हैं बल्कि 'आत्मा' के साथ-साथ निरंतर चलते रहते हैं। सूक्ष्म शरीर बिना कहीं जाये अपनी सूक्ष्म दृष्टि से ज्ञात करता रहता है और कारण शरीर को संप्रेषित करता रहता है। कारण शरीर भौतिक शरीर पर उसकी अभिव्यक्ति कर देता है। जिन व्यक्तियों के जन्म के समय 'चंद्रमा' की स्थिति अच्छी (उच्च अथवा स्व-ग्रही होकर पंचम भाव में होती है ) जिसकी पहचान हथेली से भी की जा सकती है कि, चंद्र पर्वत उन्नत हो अथवा हथेली में चंद्र पर्वत पर 'अर्द्ध-चंद्राकार' एक रेखा हो उनके 'मस्तिष्क' पर कारण शरीर द्वारा संप्रेषित भाव संकेत पहुंचा देते हैं जिनसे वह भावी घटनाओं का पूर्वानुमान बिना किसी गणितीय जोड़-घटाव के लगा लेता है।
जो लोग इस प्रक्रिया के साथ अंध-विश्वास को समिश्रित करके अन्य कुछ चमत्कार की बात करते हैं , वे सब को धोखा देते हैं। 

जबकि जो लोग इस प्रक्रिया से समाज के कल्याण की बात सामने रखते हैं वे सबका भला चाह रहे होते हैं।
https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/981935851868391

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Thursday, September 23, 2010

ज्योतिष और हम

अक्सर यह चर्चा सुनने को मिलती है की ज्योतिष का सम्बन्ध मात्र धर्म और आध्यात्म से है.यह विज्ञान सम्मत नहीं है और यह मनुष्य को भाग्य के भरोसे जीने को मजबूर कर के अकर्मण्य बना देता है.परन्तु ऐसा कथन पूर्ण सत्य नहीं है.ज्योतिष पूर्णतः एक विज्ञान है.वस्तुतः विज्ञान किसी भी विषय के नियम बद्ध  एवं क्रम बद्ध  अध्ययन को कहा जाता है.ज्योतिष के नियम खगोलीय गणना पर आधारित हैं और वे पूर्णतः वैज्ञानिक हैं वस्तुतः ज्योतिष में ढोंग पाखण्ड का कोंई स्थान नहीं है.परन्तु फिर भी हम देखते हैं कि कुछ लोग अपने निजी स्वार्थों की खातिर जनता को दिग्भ्रमित कर के ठगते हैं और उन्हीं के कारण सम्पूर्ण ज्योतिष विज्ञान पर कटाक्ष किया जाता है.यह एक गलत क्रिया की गलत प्रतिक्रिया है.जहाँ तक विज्ञान के अन्य विषयों का सवाल है वे What & How का तो जवाब देते हैं परन्तु उनके पास Why का उत्तर नहीं है.ज्योतिष विज्ञान में इस Why का भी उत्तर मिल जाता है.
जन्म लेने वाला कोई भी बच्चा अपने साथ भाग्य (प्रारब्ध) लेकर आता है.यह प्रारब्ध क्या है इसे इस प्रकार समझें कि हम जितने भी कार्य करते हैं,वे तीन प्रकार के होते हैं-सद्कर्म,दुष्कर्म और अकर्म.
यह तो सभी जानते हैं की सद्कर्म का परिणाम शुभ तथा दुष्कर्म का अशुभ होता है,परन्तु जो कर्म किया जाना चाहिए और नहीं किया गया अथार्त फ़र्ज़ (duity) पूरा नहीं हुआ वह अकर्म है और इसका भी परमात्मा से दण्ड मिलता है.अतएव सद्कर्म,दुष्कर्म,और अकर्म के जो फल इस जन्म में प्राप्त नहीं हो पाते वह आगामी जन्म के लिए संचित हो जाते हैं.अब नए जन्मे बच्चे के ये संचित कर्म जो तीव्रगामी होते हैं वे प्रारब्ध कहलाते हैं और जो मंदगामी होते हैं वे अनारब्ध कहलाते हैं.मनुष्य अपनी बुद्धि व् विवेक के बल पर इस जन्म में सद्कर्म ही अपना कर ज्ञान के द्वारा अनारब्ध कर्मों के दुष्फल को नष्ट करने में सफल हो सकता है और मोक्ष भी प्राप्त कर सकता है.मोक्ष वह अवस्था है जब आत्मा को कारण और सूक्ष्म शरीर से भी मुक्ति मिल जाती है.और वह कुछ काल ब्रह्मांड में ही स्थित रह जाता है.ऐसी मोक्ष प्राप्त आत्माओं को संकटकाल में परमात्मा पुनः शरीर देकर जन-कल्याण हेतु पृथ्वी पर भेज देता है.भगवान् महावीर,गौतम बुद्ध,महात्मा गांधी,स्वामी दयानंद ,स्वामी विवेकानंद,आदि तथा और भी बहुत पहले मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम एवं योगी राज श्री कृष्ण तब अवतरित हुए जब पृथ्वी पर अत्याचार अपने चरम पर पहुँच गया था.
जब किसी प्राणी की मृत्यु हो जाती है तो वायु,जल,आकाश,अग्नि और पृथ्वी इन पंचतत्वों से निर्मित यह शरीर तो नष्ट हो जाता है परन्तु आत्मा के साथ-साथ कारण शरीर और सूक्ष्म शरीर मोक्ष प्राप्ति तक चले चलते हैं और अवशिष्ट संचित कर्मफल के आधार पर आत्मा भौतिक शरीर को प्राप्त कर लेती है जो उसे अपने किये कर्मों का फल भोगने हेतु मिला है.यदि जन्म मनुष्य योनी में है तो वह अपनी बुद्धि व विवेक के प्रयोग द्वारा मोक्ष प्राप्ति का प्रयास कर सकता है.
बारह राशियों में विचरण करने के कारण आत्मा के साथ चल रहे सूक्ष्म व कारण शरीर पर ग्रहों व नक्षत्रों का प्रभाव स्पष्ट अंकित हो जाता है.जन्मकालीन समय तथा स्थान के आधार पर ज्योतिषीय गणना द्वारा बच्चे की जन्म-पत्री का निर्माण किया जाता है और यह बताया जा सकता है कि कब कब क्या क्या अच्छा  या बुरा प्रभाव पड़ेगा.अच्छे प्रभाव को प्रयास करके प्राप्त क्या जा सकता है और लापरवाही द्वारा छोड़ कर वंचित भी हुआ जा सकता है.इसी प्रकार बुरे प्रभाव को ज्योतिष विज्ञान सम्मत उपायों द्वारा नष्ट अथवा क्षीण किया जा सकता है और उस के प्रकोप से बचा जा सकता है.जन्मकालीन नक्षत्रों की गणना के आधार पर भविष्य फल कथन करने वाला विज्ञान ही ज्योतिष विज्ञान है.
ज्योतिष कर्मवान बनाता है
ज्योतिष विज्ञान से यह ज्ञात करके कि समय अनुकूल है तो सम्बंधित जातक को अपने पुरुषार्थ व प्रयास से लाभ उठाना चाहिए.यदि कर्म न किया जाये और प्रारब्ध के भरोसे हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहे तो यह अवसर निष्फल चला जाता है.इसे एक उदहारण से समझें कि माना आपके पास कर्णाटक एक्सप्रेस से बंगलौर जाने का reservation है और आप नियत तिथि व निर्धारित समय पर स्टेशन पहुँच कर उचित plateform पर भी पहुँच गए पर गाड़ी आने पर सम्बंधित कोच में चढ़े नहीं और plateform पर ही खड़े रह गए.इसमें आपके भाग्य का दोष नहीं है.यह सरासर आपकी अकर्मण्यता है जिसके कारण आप गंतव्य तक नहीं पहुँच सके.इसी प्रकार ज्योतिष द्वारा बताये गए अनुकूल समय पर तदनुरूप कार्य न करने वाले उसके लाभ से वंचित रह जाते हैं.लेकिन यदि किसी की महादशा/अन्तर्दशा अथवा गोचर ग्रहों के प्रभाव से खराब समय चल रहा है तो ज्योतिष द्वारा उन ग्रहों को ज्ञात कर के उनकी शान्ति की जा सकती है और हानि से बचा भी जा सकता है,अन्यथा कम किया जा सकता है.
ज्योतिष अकर्मण्य नहीं बनाता वरन यह कर्म करना सिखाता है.परमात्मा द्वारा जीवात्मा का नाम क्रतु रखा गया है.क्रतु का अर्थ है कर्म करने वाला.जीवात्मा को अपने बुद्धि -विवेक से कर्मशील रहते हुए इस संसार में रहना होता है.जो लोग अपनी अयोग्यता और अकर्मण्यता को छिपाने हेतु सब दोष भगवान् और परमात्मा पर मढ़ते हैं वे अपने आगामी जन्मों का प्रारब्ध ही प्रतिकूल बनाते हैं.
ज्योतिष अंधविश्वास नहीं
कुछ निहित स्वार्थी तत्वों ने ज्योतिष विज्ञान का दुरूपयोग करते हुए इसे जनता को उलटे उस्तरे से मूढने का साधन बना डाला है.वे लोग भोले भाले एवं धर्मभीरु लोगों को गुमराह करके उनका मनोवैज्ञानिक ढंग से दोहन करते हैं और उन्हें भटका देते हैं.इस प्रकार से पीड़ित व्यक्ति ज्योतिष को अंधविश्वास मानने लगता है और इससे घृणा करनी शुरू कर देता है.ज्योतिषीय ज्ञान के आधार पर होने वाले लाभों से वंचित रहकर ऐसा प्राणी घोर भाग्यवादी बन जाता है और कर्महीन रह कर भगवान को कोसता रहता है.कभी कभी कुछ लोग ऐसे गलत लोगों के चक्रव्यूह में फंस जाते हैं,जिन के लिए ज्योतिष गंभीर विषय न हो कर लोगों को मूढने का साधन मात्र होता है.इसी प्रकार कुछ कर्म कांडी भी कभी -कभी ज्योतिष में दखल देते हुए लोगों को ठग लेते हैं. साधारण जनता एक ज्योतिषी और ढोंगी कर्मकांडी में विभेद नहीं करती और दोनों को एक ही पलड़े पर रख देती है.इससे ज्योतिष विद्या के प्रति अनास्था और अश्रद्धा उत्पन्न होती है और गलतफहमी में लोग ज्योतिष को अंधविश्वास फैलाने का हथियार मान बैठते हैं.जबकि सच्चाई इसके विपरीत है.मानव जीवन को सुन्दर,सुखद और समृद्ध बनाना ही वस्तुतः ज्योतिष का अभीष्ट है.
क्या ग्रहों की शांति हो सकती है?
यह संसार एक परीक्षालय(Examination Hall) है और यहाँ सतत परीक्षा चलती रहती है.परमात्मा ही पर्यवेक्षक(Invegilator) और परीक्षक (Examiner) है. जीवात्मा कार्य क्षेत्र में स्वतंत्र है और जैसा कर्म करेगा परमात्मा उसे उसी प्रकार का फल देगा.आप अवश्य ही जानना चाहेंगे कि तब ग्रहों की शांति से क्या तात्पर्य और लाभ हैं?मनुष्य पूर्व जन्म के संचित प्रारब्ध के आधार पर विशेष ग्रह-नक्षत्रों की परिस्थिति में जन्मा है और अपने बुद्धि -विवेक से ग्रहों के अनिष्ट से बच सकता है.यदि वह सम्यक उपाय करे अन्यथा कष्ट भोगना ही होगा.जिस प्रकार जिस नंबर पर आप फोन मिलायेंगे बात भी उसी के धारक से ही होगी,अन्य से नहीं.इसी प्रकार जिस ग्रह की शांति हेतु आप मंत्रोच्चारण करेंगे वह प्रार्थना भी उसी ग्रह तक हवन में दी गयी आपकी आहुति के माध्यम से अवश्य ही पहुंचेगी.अग्नि का गुण है उसमे डाले गए पदार्थों को परमाणुओं (Atoms) में विभक्त करना और वायु उन परमाणुओं को मन्त्र के आधार पर ग्रहों की शांति द्वारा उनके प्रकोप से बच सकता है.प्रचलन में लोग अन्य उपाय भी बताते हैं परन्तु उन से ग्रहों की शांति होने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं मिलता,हाँ मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ सकता है.





 ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Sunday, December 13, 2015

दोषी और भ्रष्टाचारी न्यायधीशों की जांच के लिए बनें स्पेशल ज्युडिशिअल कमीशन जैसे स्वतंत्र आयोग : उर्वशी शर्मा





Urvashi Sharma
12-12-2015


दोषी और भ्रष्टाचारी न्यायधीशों की जांच के लिए बनें स्पेशल ज्युडिशिअल कमीशन जैसे स्वतंत्र आयोग : उर्वशी शर्मा


लखनऊ/12 दिसम्बर 2015/ आबादी के हिसाब से देश के सबसे बड़े सूबे यूपी की राजधानी लखनऊ के हजरतगंज में आज नज़ारा बदला हुआ था. लखनऊ का यह इलाका मौज मस्ती और शॉपिंग के लिए विश्वविख्यात है. पर आज की ‘अवध की शाम’ में हर कोई फ़िल्म अभिनेता सनी देओल की हिंदी फ़िल्म ‘दामिनी’ के अदालत में बोले गए डायलॉग ‘तारीख पे तारीख, ‘तारीख पे तारीख’, ‘तारीख पे तारीख’ को याद करता और गुनगुनाता नज़र आ रहा था. चौंकिए मत, यहाँ न तो दामिनी फ़िल्म की स्क्रीनिंग हो रही थी और न ही इस फ़िल्म से जुड़ा कोई कलाकार यहाँ आया हुआ था बल्कि लोग ऐसा बोल और गुनगुना रहे थे 12 फुट ऊंचे उस पोस्टर को देखकर जिसे लेकर आज यहाँ देश भर से आये हुए सामाजिक संगठनों और समाजसेवियों ने लखनऊ के सामाजिक संगठन येश्वर्याज सेवा संस्थान की सचिव उर्वशी शर्मा के नेतृत्व में लखनऊ के जिलाधिकारी आवास से हजरतगंज जीपीओ स्थित महात्मा गांधी पार्क तक पैदल शांति मार्च ‘न्याय-यात्रा’ निकालकर भारत की अदालतों में ‘न्याय’ की जगह ‘तारीख पे तारीख’ ही मिलने की बात रखते हुए अदालती कार्यवाहियों में वीडियो रिकॉर्डिंग कराने, अदालतों में मामलों के निपटारे की अधिकतम समय सीमा निर्धारित करने समेत अनेकों मांगों को बुलंद कर न्यायिक भ्रष्टाचार की भर्त्सना की और अदालती कार्यवाहियों में पारदर्शिता और जबाबदेही लाने के लिए अपनी आवाज बुलंद की. न्याय यात्रा के संपन्न होने पर समाजसेवियों ने हजरतगंज जीपीओ स्थित महात्मा गांधी पार्क में महात्मा गांधी की प्रतिमा के नीचे मोमबत्ती जलाकर बैठकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी किया.
येश्वर्याज की सचिव और आरटीआई कार्यकर्त्ता उर्वशी शर्मा ने न्याय मिलने में देरी को मानवाधिकारों का उल्लंघन बताते हुए कहा कि देश भर की सभी अदालतों में सभी को एक समान,सस्ता,सही और त्वरित न्याय दिलाने के लिए चल रही देशव्यापी मुहिम के तहत ही आज इस कार्यक्रम का आयोजन यूपी की राजधानी लखनऊ में किया गया है जिसमें येश्वर्याज के साथ साथ दिल्ली की सामाजिक संस्था फाइट फॉर जुडिशिअल रिफॉर्म्स, गाजियावाद की राष्ट्रीय सूचना का अधिकार टास्क फोर्स ट्रस्ट, लखनऊ की सोसाइटी फॉर फ़ास्ट जस्टिस, जन जर्नलिस्ट एसोसिएशन, एस.आर.पी.डी.एम. समाज सेवा संस्थान, अवाम वेलफेयर सोसाइटी और सूचना का अधिकार कार्यकर्त्ता वेलफेयर एसोसिएशन ने भी अपने अपने बैनर के साथ प्रतिभाग किया l
कार्यक्रम की संयोजिका उर्वशी शर्मा ने कहा कि न्याय देने जैसा ईश्वरीय काम करने बाले जज भी आम लोगों के बीच से ही आये होते हैं और इस कारण उनमें गुणों के साथ साथ अवगुण भी होना स्वाभाविक ही है. उर्वशी ने भ्रष्टाचारी और अन्य मामलों के दोषी न्यायधीशों, जजों की जांच के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्पेशल ज्युडिशिअल कमीशन जैसे स्वतंत्र आयोगों की स्थापना की मांग करते हुए हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों के खिलाफ कार्यवाही के लिए बनी सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस कमेटी द्वारा आज तक किसी भी न्यायधीश के खिलाफ कार्यवाही न करने के आधार पर इसे न्यायिक भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए नाकाफी बताया. न्यायधीशों की भिन्न और महत्वपूर्ण जिम्मेवारियों को इंगित करते हुए उर्वशी ने कहा कि सभी को न्यायधीशों से बहुत अधिक अपेक्षाएं होती हैं क्योंकि यदि लोकतंत्र का और कोई अंग गलती करता है तो सुधार का मौका होता है लेकिन एक न्यायधीश के गलती करने पर उसे दूसरा मौका नहीं मिलता है । भारतीय संविधान की बात करते हुए उर्वशी ने कहा कि संविधान की प्रस्तावना में स्वतंत्रता और समानता से पहले न्याय को जगह दिया जाना यह स्पष्ट करता है कि संविधान निर्माताओं ने भारत के सभी नागरिकों को न्याय उपलब्ध कराने को प्रमुखता दी थी किन्तु आजाद भारत की सरकारें इस संविधान के लागू होने के 65 सालों के बाद भी न्यायिक प्रक्रियाओं में समानता स्थापित करने में असफल ही रही हैं.उर्वशी ने कहा कि न्यायपालिका द्वारा स्वायत्तता के नाम पर जवाबदेही से बचने के कारण ही न्याय व्यवस्था दूषित हो गयी है और न्याय की एक पारदर्शी और जिम्मेदार प्रणाली विकसित किये बिना इस समस्या का समाधान संभव ही नहीं है.
न्याय व्यवस्था के मकड़जाल में बहुतायत मध्यम वर्ग और गरीबों के फंसे होने की बात कहते हुए आंकड़ों की बात करते हुए उर्वशी ने कहा कि अभी देश में जजों की संख्या लगभग 19 हजार है जिसमें से लगभग 18 हजार निचली अदालतों में कार्य कर रहे हैं. उर्वशी ने बताया कि देश के उच्च न्यायालयों में न्यायधीशों की संख्या की संख्या अंतरराष्ट्रीय मानकों के सापेक्ष लगभग 30% कम है.भारत में लगभग 62 हज़ार नागरिकों पर एक ही जज है जो अंतर्राष्ट्रीय मानकों से बहुत कम है जिसके कारण देश की अदालतों में तीन करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं और देश की बढ़ती आबादी के चलते अगले 25 सालों में यह संख्या 15 करोड़ तक पहुंच जाएगी और यदि हम अभी नहीं चेते तो स्थिति अत्यन्त भयावह हो जायेगी. अभी निचली अदालतों में ढाई करोड़ से ज्यादा मामले और उच्च न्यायालयों में 45 लाख से अधिक मामलों पर सुनवाई चल रही है तो वहीं सुप्रीम कोर्ट में भी लगभग 70 हज़ार मामले लंबित हैं.इनमें से एक चौथाई मामले ऐसे हैं जो पांच साल से भी अधिक समय से चल रहे हैं.
दिल्ली के समाजसेवी गुलशन पाहुजा का कहना था कि न्यायिक पारदर्शिता की कमी के कारण न्यायिक प्रक्रियाओं में भ्रष्टाचार गहरे तक घर कर गया है और इसलिए आज सभी के लिए एकसमान न्याय की बात बेमानी सी होती जा रहे है. फ़िल्म अभिनेता सलमान खान के केस का जिक्र करते हुए पाहुजा ने अदालती कार्यवाहियों की आडिओ-वीडिओ रिकॉर्डिंग की अनिवार्यता पर बल दिया तो वहीं मोदीनगर,गाजियावाद से आये समाजसेवी सुरेश शर्मा ने कहा कि वे यहाँ अर्थ आधारित उस न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ आवाज बुलंद करने को आये हैं जिसमें विशिष्ट लोग और अमीर लोग जेल जाने से बच जाते हैं और निर्दोष होने पर भी गरीब जेलों में पड़े रहने को मजबूर हैं. सुरेश ने कहा कि हालांकि अदालतों को न्याय का मंदिर कहे जाने बाली अदालतों का चक्कर काटना बहुत बुरा और कष्टदायक है और सभी ट्रायल कोर्ट और सभी अपीलीय कोर्ट में मामलों के निस्तारण की अधिकतम समयसीमा के निर्धारण की मांग की.
आज आयोजित होने बाली लोक अदालतों का जिक्र करते हुए लखनऊ के राम स्वरुप यादव ने कहा कि इन लोक अदालतों में न्याय नहीं समझौता मिलता है. न्याय में देरी को न्याय न मिलने जैसा बताते हुए यादव ने भ्रष्टाचार को न्याय में देरी की मुख्य वजह बताया.
सरकारों का देश की सबसे बड़ी वादकारी होने पर चिंता व्यक्त करते हुए समाजसेवी तनवीर ने कहा कि यह आवश्यक है कि सरकारें भी अपने निर्णयों और फैसलों में स्पष्टता और पारदर्शिता लायें ताकि अदालतों पर पड़ा मुकदमों का बोझ कम हो सके.
दिल्ली के अरुण कुमार,हरिद्वार के मनोज कुमार, उन्नाव के ओम प्रकाश यादव,श्याम लाल यादव, सीतापुर के एच.एस.आनंद, लखनऊ की समाजसेविका इंदु सुभाष,पत्रकार राशिद अली आजाद, फरहत खानम,मो० हयात कादरी,स्वतंत्र प्रिय,अधिवक्ता रुवैद किदवई, अधिवक्ता अशोक कुमार शुक्ल, अधिवक्ता अरविन्द कुमार गौतम,अशफाक खान,संजय आजाद,अधिवक्ता अब्दुल्ला सिद्दीकी,शमीम अहमद,मनीष त्रिपाठी,होमेंद्र पाण्डेय,एस.के.शर्मा,राम पाल कश्यप,सूरज प्रसाद,सईद खान,टी.बी.गुप्ता,हरपाल सिंह,आर.डी.कश्यप,मारूफ हुसैन, अजय कुमार,अशोक यादव,अनुज कुमार,जे.पी. शाह,सरवन कुमार,विनोद कुमार यादव,राणा प्रताप यादव,मंजू वर्मा,बबिता सिंह,नीतू अवस्थी,समीर अंसारी,कवि अनिल अनाड़ी समेत बड़ी संख्या में समाजसेवियों ने न्यायधीशों की नियुक्तिओं में पारदर्शिता लाने,अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप जनसँख्या के समानुपातिक कोर्ट और न्यायधीशों की संख्या बढाकर प्रणालीगत समस्या को दूर किये जाने,न्यायिक प्रणाली में न्यायधीशों द्वारा दिए निर्णयों की संख्या और उनकी गुणवत्ता को लेकर उत्तरदायित्व निर्धारण की स्पष्ट व्यवस्था लागू किये जाने,सरकारी अधिकारी या पुलिस द्वारा किसी नागरिक पर किया गया केस अदालत में गलत सिद्ध होने सरकारी अधिकारी या पुलिस पर स्वतः पेनाल्टी की व्यवस्था स्थापित किये जाने,गैर-आईपीसी अपराधों के लिए सीआरपीसी की व्यवस्था के अनुसार सेवानिवृत्त ज्युडिशल मैजिस्टे्रट या एग्जिक्युटिव मैजिस्ट्रेट को स्पेशल ज्युडिशल मैजिस्ट्रेट नियुक्त किए जाने,अदालत में सभी मामलों में मौखिक सुनवाई की अनिवार्यता के स्थान पर वादी और प्रतिवादी के लिखित पक्ष के आधार पर भी फैसला किये जाने,अदालत द्वारा तारीख दिए जाने में उभय-पक्षों की रजामंदी जरूरी किये जाने, गैर-जरूरी कानून को खत्म करने,न्यायपालिका का प्रभावी तंत्र स्थापित करने के लिए समुचित संसाधन प्रदान करने, न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आंच लाये बिना न्यायिक सुधार करने समेत अनेकों मांगे उठाईं.
समाजसेवी तनवीर अहमद सिद्दीकी ने इस कार्यक्रम का समन्वयन और राम स्वरुप यादव ने सह-समन्वयन किया. कार्यक्रम के अंत में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के माध्यम से देश के राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री,मुख्य न्यायधीश और सभी प्रदेशों के राज्यपालों,मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के न्यायधीशों को ज्ञापन भेजा गया.
 ~विजय राजबली माथुर ©
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Wednesday, December 9, 2015

एक विचार गोष्ठी : ‘असहिष्णुता की चुनौतियां और सोशल मीडिया' विषय पर: ------: विजय राजबली माथुर



लखनऊ, 09 दिसंबर 2015 :
आज साँय 3 बजे यू पी प्रेस क्लब में  वंदना मिश्रा जी की अध्यक्षता में  मानवाधिकार दिवस की पूर्व संध्या और हस्तक्षेप डाॅट काॅम के पांच साल पूरे होने पर इंसाफ अभियान और नागरिक परिषद  के संयुक्त तत्वावधान में  एक विचार गोष्ठी  ‘असहिष्णुता की चुनौतियां और सोशल मीडिया' विषय  पर सपन्न हुई  जिसका कुशल संचालन राजीव यादव द्वारा किया गया। कार्यक्रम में अध्यक्ष महोदया  के अतिरिक्त  मंचस्थ  अन्य विचारकों में अमलेंदु उपाध्याय, अभिषेक श्रीवास्तव, रणधीर सिंह सुमन, महिलाओं की पत्रिका 'खबर लहरिया' की संपादक सुश्री लक्ष्मी एवं इमरान थे।

कार्यक्रम प्रारम्भ करने से पूर्व बी डी शर्मा जी व कवि विद्रोही जी के निधन पर एक मिनट का मौन रख कर श्रद्धांजली भेंट की गई।

अयोध्या के सुखराम जी द्वारा असहिष्णुता का वर्णन करने के उपरांत मुख्य अतिथि अमलेंदु उपाध्याय जी ने कहा कि, 'असहिष्णुता' शब्द आज की परिस्थितियों में  काफी हल्का शब्द है वस्तुतः परिस्थितियाँ कहीं काफी ज़्यादा भयावह व चिंतनीय हैं। हस्तक्षेप डाट काम के पाँच वर्ष पूर्ण होने पर उन्होने अपने लगभग डेढ़ सौ लेखक साथियों व पाठकों का आभार व्यक्त किया।आर्थिक झंझावातों  के मध्य   कारपोरेट घरानों के प्रिंट मीडिया व इलेक्ट्रानिक चेनलों के इस युग  में पाँच वर्ष सफलतापूर्वक पूर्ण कर लेना कोई हंसी मज़ाक का खेल नहीं था वह भी तब जबकि असहिष्णु लोगों द्वारा अनर्गल गालियों तथा धमकियों का निरंतर सामना करना पड़ा हो। अमलेंदु जी ने बताया कि जब कोई व्यक्ति अपने तर्कों को तो रखे किन्तु विपक्षी के तर्कों को समुचित रूप से गलत सिद्ध न कर पाने की स्थिति में नीचता व गाली गलौज पर उतर आए तो उसे असहिष्णुता कहा जाएगा और आज का दौर ऐसा ही है। उन्होने स्पष्ट किया कि इसकी शुरुआत 2011 से ही हज़ारे आंदोलन के दौरान हुई थी जिसका भरपूर लाभ मोदी व उनके साथियों ने 2014 में उठाया। उन्होने यह भी कहा कि उनके कहने का आशय यह नहीं है कि हज़ारे व केजरीवाल असहिष्णु लोग थे बल्कि हो सकता है कि वे इसके पीछे की चाल को न समझ पाये हों एवं निहित स्वार्थी शक्तियों का शिकार बन गए हों। उस समय यह मुहावरा प्रचलित हो गया था कि जो हज़ारे व केजरीवाल के साथ नहीं हैं वे भ्रष्टाचार के समर्थक हैं जो अब आज इस तरह बदल गया है कि जो मोदी के साथ नहीं है वह देशद्रोही है।

अमलेंदु जी ने कहा कि, सोशल मीडिया का प्रयोग करने वाले के ऊपर है कि वह इसका दुरुपयोग करता है या सदुपयोग। उन्होने कहा कि यह एक माध्यम है साध्य नहीं। इलेक्ट्रानिक चेनल और प्रिंट मीडिया में तो गलती सुधारने के मौके प्रसारण -मुद्रण को रोकने से मिल भी जाते हैं किन्तु सोशल मीडिया में ऐसा अवसर नहीं मिलता है एक बार प्रकाशित कर दिया तो वह तुरंत दुनिया भर में प्रसारित हो  गया। इसी बात का उदाहरण दिया 'जनपथ' के अभिषेक श्रीवास्तव साहब ने। उन्होने कहा कि परसों मुंबई की सामाजिक कार्यकर्ता सुश्री कामायनी बाली महाबल ने कामरेड बर्द्धन जी से संबन्धित एक पोस्ट अपनी साईट पर जल्दबाज़ी में दे दी  जिसे तुरंत काफी लोगों ने लाईक कर दिया व कई और साईट्स पर भी शेयर हो गई। रात्रि 11 बजे उनके संग्यान में आने पर उन्होने इसमें सुधार करवाया। अभिषेक जी का ज़ोर था कि सोशल मीडिया पर अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है।

असहिष्णुता के संबंध में अभिषेक जी का कहना था कि इसका प्रारम्भ वस्तुतः 2009 में तब ही हो गया था जब बेंगलुरु के एक हब में मुथालिक के अराजक तत्वों ने युवतियों के विरुद्ध अभद्र आचरण किया था। उन्होने यह भी कहा कि केवल सोशल मीडिया कोई परिवर्तन नहीं ला सकता जब तक कि इसे ज़मीन पर न उतारा जाये।

खबर लहरिया की लक्ष्मी जी ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों का वर्णन करते हुये बताया कि महिलाओं के लिए विशेषकर दलित महिलाओं के लिए पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करना बहुत विकट है। उन्होने अपनी साथिन पत्रकारों के कैमरे तोड़े जाने उनके साथ अभद्रता किए जाने का भी उल्लेख किया। प्रशासनिक अधिकारियों का व्यवहार भी असहयोगात्मक व असहिष्णु ही रहा है। तमाम विघ्न-बाधाओं के बावजूद उनकी टीम अपने अभियान में लगी है और लगी रहेगी ऐसा आश्वासन उन्होने दिया।

रणधीर सिंह सुमन ने अमलेंदु जी के साहस की प्रशंसा करते हुये कहा कि तमाम बाधाओं और चुनौतियों का मुक़ाबला करके आज वह इस मुकाम पर पहुंचे हैं जो वाकई बधाई की बात है। उनका मत था कि सोशल मीडिया पर सक्रिय रह कर हर गलत बात का जवाब दिया जाना चाहिए। उन्होने बताया कि फासिस्ट शक्तियों ने विकी पीडिया तक पर इतिहास बदल डाला है जब गूगल सर्च के सहारे जानकारी हासिल की जाएगी और वहाँ से गलत बात सामने आएगी तब इस संकट का मुक़ाबला करना एक बड़ी कठिन चुनौती है।

ताहिरा हसन जी , इमरान, पूर्व विधायक रामलाल जी, निरंजनदेव, अंकुर  आदि ने भी अपने विचार रखे। नागपुर से पधारे युवा पर्वतारोही जिंनका एक पैर नकली बना हुआ है ने  अपने मार्मिक सम्बोधन में बताया कि किस प्रकार आर एस एस /भाजपा के लोग दलितों को मोहरा बना कर उनका हितैषी होने का स्वांग भरते हैं जबकि उनके प्रति वस्तुतः घृणा भाव से ओत-प्रोत रहते हैं।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में वंदना जी ने सोशल मीडिया को मायावी बताते हुये इसके भ्रमजाल से बचने की सलाह दी। उनका मत था कि सोशल मीडिया का दुरुपयोग अधिक हो रहा है अगर कोई तस्वीर डालता है तो उसे हजारों लाईक्स मिल जाते हैं जबकि सकारात्मक और समाजोपयोगी  पोस्ट्स को दो-चार लाईक्स भी मिल जाएँ तो गनीमत है। लेकिन फिर भी उनका कहना था कि हम सोशल मीडिया से अधिक से अधिक सकारात्मक लाभ उठा कर असहिष्णुता का वाजिब मुक़ाबला करें यह वक्त की मांग है।

 ~विजय राजबली माथुर ©
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Wednesday, November 25, 2015

इतिहास के झरोखों से नये पदचाप को दिशा देने की तमन्ना ------ विजय राजबली माथुर





यादों के झरोखों से ------


स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )




https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/972778176117492

पाँच वर्ष पूर्व मैंने एक पोस्ट में लिखा था :

http://vidrohiswar.blogspot.in/2010/10/blog-post.html
:चार वर्ष पूर्व की एक पोस्ट का अंश : 



http://vijaimathur.blogspot.in/2011/11/blog-post.html
 प्रस्तुत यह कविता दीवान सिंह जी ने मुझे 'सप्तदिवा ' के लिए दी थी किन्तु फिर जब मैं ही अलग हो गया तो न छप सकी थी।इसे अब इस ब्लाग -पोस्ट में प्रकाशित कर रहे हैं। :




'मैं गरिमा हूँ ' 

एक समय था 
जब मैं मैले-कुचैले  सुकरात की मुकुट थी 
बहुजन हिताय व बहुजन सुखाय के निकट थी। 
कंटकाकीर्ण पथ गमनकारी मेरा श्रिंगार करते थे 
त्याग तपस्या की तपन के बावजूद मेरे लिए मचलते थे। 
क्योंकि मैं गरिमा हूँ। 
        ***
लेकिन अफसोस हो रहा है 
समय के साथ मेरा निवास भी बदल रहा है 
आजकल मैं अट्टालिकाओं में बहार करती हूँ। 
सेठ-साहूकारों के पैरों में निवास करती हूँ । 
आज मैं बड़ों की बड़ाई का अस्त्र हूँ। 
क्योंकि मैं गरिमा हूँ। 

--- ( दीवान सिंह बघेल, ग्राम-बास अचलू, टर्र्म्पुर, आगरा )  
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Comments
Narendra Parihar wah sir ji ......yaado ko sametna yane naye ki padchaap ko ansuna karna hi maane ya itihaas ke jharokho se nayi padchaap ko disha dene ki tamannaSee Translation
Vijai RajBali Mathur जैसा आप मानें।

बंधु नरेंद्र जी ने जानना चाहा था कि उपरोक्त 'यादों के झरोखों से' का तात्पर्य क्या लगाया जाये अतः पुरानी ब्लाग-पोस्ट्स के जरिये उसे स्पष्ट करने का प्रयास किया है। 

एक नैतिक प्रश्न सामने था कि ,


इस 'राईटर एंड जर्नलिस्ट ' फोरम से आदरणीय शेष नारायण सिंह जी ने सितंबर 2011 में सम्बद्ध तब किया था जब भड़ास में उन्होने सुब्रमनियम स्वामी वाला लेख प्रकाशित करवाया था। तब -

इन लोगों की व्याख्या से केवल और केवल ब्रहमनवाद तथा संघ के मंसूबे ही पूरे होंगे 

 http://krantiswar.blogspot.in/2015/11/blog-post_13.html

पोस्ट के जरिये उनके सुझाए लेखकों की व्याख्याओं पर संदेह करना क्या उचित था ?
ऊपर जो पुराने पोस्ट्स या अखबार की स्कैन कापी दी गई है वे यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि मैं 1982 से ही राजनीतिक/धार्मिक विषयों पर दृढ़ता व स्पष्टता के साथ विचार रखता आया हूँ और किसी भी प्रकार का समझौता करके मूल चरित्र को नहीं बदला है भले ही 1991 में उस अखबार से अलग ही हो गया था। अब जब बात 'हिन्दू धर्म' पर इन लेखकों की व्याख्या की थी तब फिर स्पष्ट विचार देना ही मुनासिब समझा भले ही सिंह साहब नाराज़ हो लें। लेकिन सही बात तो सबके सामने आनी  ही चाहिए।  

~विजय राजबली माथुर ©
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Facebook Comments :

इस खतरे को भाँपना व सचेत रहना होगा ------ विजय राजबली माथुर

 Vijai RajBali Mathur added 2 new photos.
19-11-2015  at 9:30am · Lucknow · 
उत्पादक (किसान तथा मजदूर ) और उपभोक्ता (जनता )का एक साथ उत्पीड़न व शोषण करने वाला व्यापारी वर्ग बड़ी ही धूर्तता के साथ सारी विकृतियों का दोष 'राजनीति' और 'राजनीतिज्ञों' पर मढ़ कर अपनी जकड़बंदी को मजबूत करता रहता है। अपने गलत कार्यों में रिश्वत के जरिये अधिकारियों व राजनीतिज्ञों को पहले खरीदने की प्रवृति थी, फिर अपने चहेते लोगों को राजनीति में आगे करके राजनीति को खरीदने की अब तो व्यापारी/उद्योगपति खुद ही चुनाव लड़ कर विधानसभाओं व लोकसभा/राज्यसभा में छा गए हैं तब भी बदनाम राजनीतिज्ञों को ही करना है। यह इसलिए कि जनता वास्तविक लुटेरे को पहचान न सके और राजनीतिज्ञों को दोषी मान कर उनके विरुद्ध खड़ी हो जाये। इसी हेतु हज़ारे/केजरीवाल आंदोलन खड़ा करके व्यापारियों/साम्राज्यवादियो की फासिस्ट सरकार केंद्र में गठित करवा दी अब उसे मजबूत तानाशाही में बदलने हेतु व्यापारियों द्वारा राजनीतिज्ञों पर प्रहार की नई प्रक्रिया शुरू की गई है। प्रबुद्ध जनता को इस खतरे को भाँपना व सचेत रहना होगा अन्यथा लोकतन्त्र का खात्मा इन व्यापारियों का लक्ष्य है ही जिसे वे आसानी से हासिल कर लेंगे। 
ज्योतिष= ज्योति +इष (ज्योति=प्रकाश +इष =ज्ञान )। लेकिन व्यापारी वर्ग की बुद्धि देखिये कि राजनीति के साथ-साथ ज्योतिष पर भी प्रहार किया जाता है जिससे जनता वास्तविक ज्ञान से दूर रहे और व्यापारियों के हितैषी ब्राह्मणों के अनर्थकारी चंगुल में फंस कर खुद को लुटवाती रहे। मंदिर का ढ़ोंगी पुजारी या सड़क किनारे बैठा व्यापारी ज्योतिषी नहीं ठग होता है लेकिन उसका विरोध न करके ज्योतिष का ही मखौल उड़ाया जाता है तब स्पष्ट है कि, व्यापारियों के छल-कपट पर पर्दा डालना अभीष्ट है।





https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/970862519642391?pnref=story

लेकिन कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि प्रगतिशील कहे जाने वाले विद्वान भी आर एस एस के भंवर जाल में इस कदर फंस चुके हैं कि उससे बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। ज्वलंत उदाहरण के रूप में  मेरे द्वारा व्यक्त निम्नोक्त टिप्पणियाँ प्रस्तुत हैं जिनको डिलीट कर दिया गया है । अतः मैंने पोस्ट लेखिका को अंफ्रेंड तो कर दिया परंतु जो प्रश्न मैंने प्रगतिशील तबके के समक्ष उठाया है उसका उत्तर बड़े से बड़े विद्वान के भी पास इसलिए  नहीं है क्योंकि वे 'हिन्दू' और 'हिन्दुत्व' के मकड़जाल से बाहर निकलना और जनता को निकालना ही नहीं चाहते हैं। केवल हवा में लट्ठ / तलवार चलाने से आप अपने शत्रु को नहीं परास्त कर सकते हैं।



 ~विजय राजबली माथुर ©
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Sunday, November 22, 2015

इन लोगों की व्याख्या से केवल और केवल ब्रहमनवाद तथा संघ के मंसूबे ही पूरे होंगे ------ विजय राजबली माथुर





  https://www.facebook.com/permalink.php?story_fbid=901062683313476&id=100002292570804
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इन 30 में 8 अर्थात 26 ॰66 प्रतिशत लोग  घोषित रूप से जन्मगत ब्राह्मण हैं और बाकी भी ब्रहमनवाद द्वारा फैलाये 'विभ्रम' को ही 'धर्म' की संज्ञा देकर 'धर्म' की आलोचना करते हैं। इनमें से एक का भी प्रभाव जन-मानस पर नहीं पड़ सकता है। जहां तक 'हिन्दू' शब्द की बात है यह एक ब्रिटिश राजनीति के तहत प्रचारित-प्रसारित शब्द है कोई भी धर्म नहीं। जिनको सबसे अधिक जानकारी वाला घोषित किया गया है उन्होने तो स्वामी दयानन्द तक को 'महान हिन्दू' लिख डाला है। इन लोगों की व्याख्या से केवल और केवल ब्रहमनवाद तथा संघ के मंसूबे ही पूरे होंगे, सच्चाई पर पर्दा ही पड़ा रहेगा। पांचवे नंबर पर जिन जनाब का नाम है वह तो राम के सबसे बड़े निंदक हैं और इस प्रकार वह रावण (जो साम्राज्यवाद का पुरोधा था और जिसके  विस्तारवाद व शोषण का राम ने खात्मा किया था ) के पुजारी हुये। उनकी व्याख्या किसको लाभ पहुंचाने वाली होगी स्पष्ट है। तीन वर्ष पूर्व लिखे एक पोस्ट को ज्यों का त्यों दे रहा हूँ जिसमें इसी विषय को उठाया था। मशहूर हस्ती न होने के कारण मेरे दृष्टिकोण का उपहास उड़ाया तो जाता है लेकिन देखिये उपरोक्त महानुभावों की प्रचार-शैली ने केंद्र में फासिस्ट सरकार गठित करा दी है। उससे छुटकारा पाना है तो उसे अधार्मिक, ढ़ोंगी, पाखंडी, लुटेरा साबित करने के लिए'धर्म  के मर्म ' का सहारा लेना ही होगा अन्यथा फिर वही 'ढाक के तीन पात' ।  

1989-90 में उत्तर-प्रदेश के प्रत्येक ज़िले में सांप्रदायिकता विरोधी रैलियों का आयोजन हुआ था जिसका पूरा-पूरा लाभ सांप्रदायिक शक्तियों को ही मिला और 1991 में उनकी पूर्ण बहुमत की सरकार बन गई जिसने 1992 में अयोध्या में विवादास्पद ढांचा 06 दिसंबर (डॉ अंबेडकर परिनिर्वाण दिवस पर ) गिरा कर वर्तमान संविधान के खात्मे की ओर संकेत कर दिया था। 2011-12 के हज़ारे/रामदेव/केजरीवाल/मनमोहन सिंह प्रेरित आंदोलन ने 2014 में केंद्र में जिस फासिस्ट सरकार का गठन करवा दिया है उसी को अपनी गलत व्याख्याओं से उद्धृत विद्वान मजबूती प्रदान करने का ही कार्य करेंगे ( जैसी कि उनसे अपेक्षा की गई है ) यदि हिन्दू को धर्म की संज्ञा देंगे तो। 


Friday, November 30, 2012
सांप्रदायिकता और धर्म निपेक्षता ---विजय राज बली माथुर
http://krantiswar.blogspot.in/2012/11/sampradayikta-dharam-nirpexeta.html


सांप्रदायिकता ---

सांप्रदायिकता का आधुनिक इतिहास 1857 की क्रांति की विफलता के बाद शुरू होता है। चूंकि 1857 की क्रांति मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर के नेतृत्व मे लड़ी गई थी और इसे मराठों समेत समस्त भारतीयों की ओर से समर्थन मिला था सिवाय उन भारतीयों के जो अंग्रेजों के मित्र थे तथा जिनके बल पर यह क्रांति कुचली गई थी।ब्रिटेन ने सत्ता कंपनी से छीन कर जब अपने हाथ मे कर ली तो यहाँ की जनता को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने हेतु प्रारम्भ मे मुस्लिमों को ज़रा ज़्यादा  दबाया। 19 वी शताब्दी मे सैयद अहमद शाह और शाह वली उल्लाह के नेतृत्व मे वहाबी आंदोलन के दौरान इस्लाम मे तथा प्रार्थना समाज,आर्यसमाज,राम कृष्ण मिशन और थियोसाफ़िकल समाज के नेतृत्व मे हिन्दुत्व मे सुधार आंदोलन चले जो देश की आज़ादी के आंदोलन मे भी मील के पत्थर बने। असंतोष को नियमित करने के उद्देश्य से वाइसराय के समर्थन से अवकाश प्राप्त ICS एलेन आकटावियन हयूम ने कांग्रेस की स्थापना करवाई। जब कांग्रेस का आंदोलन आज़ादी की दिशा मे बढ्ने लगा तो 1905 मे बंगाल का विभाजन कर हिन्दू-मुस्लिम मे फांक डालने का कार्य किया गया। किन्तु बंग-भंग आंदोलन को जनता की ज़बरदस्त एकता के आगे 1911 मे इस विभाजन को रद्द करना पड़ा। लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन  एवं सर आगा खाँ को आगे करके मुस्लिमों को हिंदुओं से अलग करने का उपक्रम किया जिसके फल स्वरूप 1906  मे मुस्लिम लीग की स्थापना हुई और 1920 मे हिन्दू महासभा की स्थापना मदन मोहन मालवीय को आगे करके करवाई गई जिसके सफल न हो पाने के कारण 1925 मे RSS की स्थापना करवाई गई जिसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करना था । मुस्लिम लीग भी साम्राज्यवाद का ही संरक्षण कर रही थी जैसा कि,एडवर्ड थाम्पसन ने 'एनलिस्ट इंडिया फार फ़्रीडम के पृष्ठ 50 पर लिखा है-"मुस्लिम संप्रदाय वादियों  और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों मे गोलमेज़ सम्मेलन के दौरान अपवित्र गठबंधन रहा। "

वस्तुतः मेरे विचार मे सांप्रदायिकता और साम्राज्यवाद सहोदरी ही हैं। इसी लिए भारत को आज़ादी देते वक्त भी ब्रिटश साम्राज्यवाद  ने पाकिस्तान और भारत  दो देश बना दिये। पाकिस्तान तो सीधा-सीधा वर्तमान साम्राज्यवाद के सरगना अमेरिका के इशारे पर चला जबकि अब भारत की सरकार  भी अमेरिकी हितों का संरक्षण कर रही है। भारत मे चल रही सभी आतंकी गतिविधियों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन अमेरिका का रहता है। हाल के दिनों मे जब बढ़ती मंहगाई ,डीजल,पेट्रोल,गैस के दामों मे बढ़ौतरी और वाल मार्ट को सुविधा देने के प्रस्ताव से जन-असंतोष व्यापक था अमेरिकी एजेंसियों के समर्थन से सांप्रदायिक शक्तियों ने दंगे भड़का दिये। इस प्रकार जनता को आपस मे लड़ा देने से मूल समस्याओं से ध्यान हट गया तथा सरकार को साम्राज्यवादी हितों का संरक्षण सुगमता से करने का अवसर प्राप्त  हो गया।

धर्म निरपेक्षता---

धर्म निरपेक्षता एक गड़बड़ शब्द है। इसे मजहब या उपासना पद्धतियों के संदर्भ मे प्रयोग किया जाता है । संविधान मे भी इसका उल्लेख इसी संदर्भ मे  है । इसका अभिप्राय यह था कि,राज्य किसी भी उपासना पद्धति या मजहब को संरक्षण नही देगा। जबकि व्यवहार मे केंद्र व राज्य सरकारें कुम्भ आदि मेलों के आयोजन मे भी योगदान देती हैं और हज -सबसीडी के रूप मे भी। वास्तविकता यह है कि ये कर्म धर्म नहीं हैं। धर्म का अर्थ है जो मानव शरीर और मानव सभ्यता को धारण करने के लिए आवश्यक हो। जैसे -सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। धर्म निपेक्षता की आड़ मे इन सद्गुणों का तो परित्याग कर दिया गया है और ढोंग-पाखण्ड-आडंबर को विभिन्न सरकारें खुद भी प्रश्रय देती हैं और उन संस्थाओं को भी बढ़ावा देती हैं जो ऐसे पाखंड फैलाने मे मददगार हों। इन पाखंडों से किसी भी  आम जनता का  भला  नहीं होता है किन्तु व्यापारी/उद्योगपति वर्ग को भारी आर्थिक लाभ होता है। अतः कारपोरेट घरानों के अखबार और चेनल्स पाखंडों का प्रचार व प्रसार खूब ज़ोर-शोर से करते हैं। 

एक ओर धर्म निरपेक्षता की दुहाई दी जाती है और दूसरी ओर पाखंडों को धर्म के नाम पर फैलाया जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि धर्म को उसके वास्तविक रूप मे समझ-समझा कर उस पर अमल किया जाए और ढोंग-पाखंड चाहे वह किसी भी मजहब का हो उसका प्रतिकार किया जाये। पहले प्रबुद्ध-जनों को समझना व खुद को सुधारना  होगा फिर जनता व सरकार को समझाना होगा तभी उदेश्य साकार हो सकता है। वरना तो धर्म निरपेक्षता के नाम पर सद्गुणों को ठुकराना और सभी मजहबों मे ढोंग-पाखंड को बढ़ाना जारी रहेगा और इसका पूरा-पूरा लाभ शोषक-उत्पीड़क वर्ग को मिलता रहेगा। जनता आपस मे सांप्रदायिकता के भंवर जाल मे फंस कर लुटती-पिसती रहेगी। 


http://dlvr.it/60WrY9
बाबा ने की विदेश महिला से छेड़छाड़, गिरफ्तार
www.liveaaryaavart.com
 समाज को संवेदनशील कैसे बनाया जाएगा जब ढोंगियों,पाखंडियों,आडंबरकारियों को 'बाबा','साधू','सन्यासी','धार्मिक प्रचारक','बापू'  आदि-आदि उपाधियाँ दी जाती रहेंगी। 
वस्तुतः पाँच हज़ार वर्ष पूर्व महाभारत काल के बाद 'धर्म' ='सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य' का लोप हो गया और उसके स्थान पर 'ढोंग-पाखंड-आडंबर-शोषण-उत्पीड़न' को धर्म कहा जाने लगा। 'वेदों' का जो मूल मंत्र -'कृणवंतों  विश्वमार्यम  ...' था अर्थात समस्त विश्व को 'आर्य'=आर्ष=श्रेष्ठ बनाना था उसे ब्राह्मणों द्वारा शासकों की मिली-भगत से ठुकरा दिया गया। 'अहं','स्वार्थ','उत्पीड़न'को महत्व दिया जाने लगा। 'यज्ञ'=हवन में जीव हिंसा की जाने लगी। इन सब पाखंड और कुरीतियों के विरुद्ध गौतम बुद्ध ने लगभग ढाई हज़ार वर्ष पूर्व बुलंद आवाज़ उठाई और लोग उनसे प्रभावित होकर पुनः कल्याण -मार्ग पर चलने लगे तब शोषकों के समर्थक शासकों एवं ब्राह्मणों ने षड्यंत्र पूर्वक महात्मा बुद्ध को 'दशावतार' घोषित करके उनकी ही पूजा शुरू करा दी। 'बौद्ध मठ' और 'विहार' उजाड़ डाले गए बौद्ध साहित्य जला डाला गया। परिणामतः गुमराह हुई जनता पुनः 'वेद' और 'धर्म' से विलग ही रही और लुटेरों तथा ढोंगियों की 'पौ बारह' ही रही।
यह अधर्म को धर्म बताने -मानने का ही परिणाम था कि देश ग्यारह-बारह सौ वर्षों तक गुलाम रहा। गुलाम देश में शासकों की शह पर ब्राह्मणों ने  'कुरान' की तर्ज पर 'पुराण' को महत्व देकर जनता के दमन -उत्पीड़न व शोषण का मार्ग मजबूत किया था जो आज भी बदस्तूर जारी है। पुराणों के माध्यम से भारतीय महापुरुषों का चरित्र हनन बखूबी किया गया है। उदाहरणार्थ 'भागवत पुराण' में जिन राधा के साथ कृष्ण की रास-लीला का वर्णन है वह राधा 'ब्रह्म पुराण' के अनुसार भी  योगीराज श्री कृष्ण की मामी  ही थीं जो माँ-तुल्य हुईं परंतु पोंगापंथी ब्राह्मण राधा और कृष्ण को प्रेमी-प्रेमिका के रूप में प्रस्तुत करते हैं । आप एक तरफ भागवत पुराण को पूज्य मानेंगे और समाज में बलात्कार की समस्या पर चिंता भी व्यक्त करेंगे तो 'मूर्ख' किसको बना रहे हैं?चरित्र-भ्रष्ट,चरित्र हींन लोगों के प्रिय ग्रंथ भागवत के लेखक के संबंध में स्वामी दयानन्द 'सरस्वती' ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि वह गर्भ में ही क्यों नहीं मर गया था जो समाज को इतना भ्रष्ट व निकृष्ट ग्रंथ देकर गुमराह कर गया। क्या छोटा और क्या मोटा व्यापारी,उद्योगपति व कारपोरेट जगत खटमल और जोंक की भांति दूसरों का खून चूसने  वालों के भरोसे पर 'भागवत सप्ताह' आयोजित करके जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ने का उपक्रम करता रहता है जबकि प्रगतिशील,वैज्ञानिक विचार धारा के 'एथीस्टवादी' इस अधर्म को 'धर्म' की संज्ञा देकर अप्रत्यक्ष रूप से उस पोंगापंथ को ही मजबूत करते रहते हैं। 


'मूल निवासी' आंदोलन :

एक और आंदोलन है 'मूल निवासी' जो आर्य को 'ब्रिटिश साम्राज्यवादियों' द्वारा  कुप्रचारित षड्यंत्र के तहत  यूरोप की एक आक्रांता जाति ही मानता है । जबकि आर्य विश्व के किसी भी भाग का कोई भी व्यक्ति अपने आचरण व संस्कारों के आधार पर बन सकता है। आर्य शब्द का अर्थ ही है 'आर्ष'= 'श्रेष्ठ' । जो भी श्रेष्ठ है वह ही आर्य है। आज स्वामी दयानन्द सरस्वती का आर्यसमाज ब्रिटिश साम्राज्य के हित में गठित RSS द्वारा जकड़ लिया गया है इसलिए वहाँ भी आर्य को भुला कर 'हिन्दू-हिन्दू' का राग चलने लगा है। बौद्धों के विरुद्ध हिंसक कृत्य करने वालों को सर्व-प्रथम बौद्धों ने 'हिन्दू' संज्ञा दी थी फिर फारसी शासकों ने एक गंदी और भद्दी गाली के रूप में इस शब्द का प्रयोग यहाँ की गुलाम जनता के लिए किया था जिसे RSS 'गर्व' के रूप में मानता है। अफसोस की बात यह है कि प्रगतिशील,वैज्ञानिक लोग भी इस 'सत्य' को स्वीकार नहीं करते हैं और RSS के सिद्धांतों को ही मान्यता देते रहते हैं। 'एथीस्ट वादी' तो 'धर्म'='सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह,अस्तेय और ब्रह्मचर्य' का विरोध ही करते हैं तब समाज को संवेदनशील कौन बनाएगा?
यदि हम समाज की दुर्व्यवस्था से वास्तव में ही चिंतित हैं और उसे दूर करना चाहते हैं तो अधर्म को धर्म कहना बंद करके वास्तविक धर्म के मर्म को जनता को स्पष्ट समझाना होगा तभी सफल हो सकते हैं वर्ना तो जो चल रहा है और बिगड़ता ही जाएगा।  
सत्य क्या है?:
'धर्म'='सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह,अस्तेय और ब्रह्मचर्य'। 
अध्यात्म=अध्ययन +आत्मा =अपनी 'आत्मा' का अध्ययन। 
भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)। 
खुदा=चूंकि ये पांचों तत्व खुद ही बने हैं किसी ने बनाया नहीं है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं।  
गाड=G(जेनरेट)+O(आपरेट)+D(डेसट्राय) करना ही इन तत्वों का कार्य है इसलिए ये ही GOD भी हैं। 
व्यापारियों,उद्योगपतियों,कारपोरेट कारोबारियों के हितों में गठित रिलीजन्स व संप्रदाय जनता को लूटने व उसका शोषण करने हेतु जो ढोंग-पाखंड-आडंबर आदि परोसते हैं वह सब 'अधर्म' है 'धर्म' नहीं। अतः अधर्म का विरोध और धर्म का समर्थन जब तक साम्यवादी व वामपंथी नहीं करेंगे तब तक जन-समर्थन हासिल नहीं कर सकेंगे बल्कि शोषकों को ही मजबूत करते रहेंगे जैसा कि 2014 के चुनाव परिणामों से सिद्ध भी हो चुका है। 


~विजय राजबली माथुर ©
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