Wednesday, July 30, 2014

श्रद्धा और आस्था की बेड़ियों में जकड़े लोग क्या आज़ाद होकर सच को मान सकेंगे?---विजय राजबली माथुर




हरियाली तीज / स्त्रियों की मानसिक दासता का पर्व :

सावन महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरियाली तीज के रुप में मनाया जाता है। यह व्रत अविवाहित कन्याएं योग्य वर पाने की तथा विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र की चाहत में करती हैं। देश के पूर्वी इलाकों में इसे कजली तीज के रुप में जाना जाता हैं। सवाल है कि पति की लंबी ज़िन्दगी के लिए हमेशा से सिर्फ स्त्रियां ही क्यों ब्रत करती हैं रही ? पतियों में ऐसे कौन से सुर्खाब के पर लगे होते हैं ? कोई ऐसा व्रत हमारे शास्त्रों और परंपराओं में क्यों नहीं है जो हिन्दू पति अपनी पत्नी की लंबी उम्र के लिए भी करता हो ? पति पर आर्थिक रूप से निर्भर और सामंती माहौल में जीने वाली स्त्रियों की पारिवारिक और सामाजिक हैसियत उनके पतियों के जीवन-काल तक ही हुआ करती है। पतियों को लेकर उनका भय और उनकी असुरक्षा की भावना समझ में आती है। लेकिन आज की शिक्षित और आत्मनिर्भर स्त्रियों ने अगर पुरूष अहंकार को ताक़त देने वाले ऐसे ब्रत-त्योहारों का अबतक वहिष्कार नहीं किया है तो इसका सीधा मतलब है कि स्त्रियों के भीतर पुरूष-दासता की जड़ें बहुत गहरी हैं।

क्या तीज जैसे ब्रत नहीं करने वाले आदिवासी समाजों और दूसरे धर्मों के पतियों की उम्र हिन्दू पतियों की उम्र से कम हुआ करती है ?











ध्रुव गुप्त जी एवं पंकज चतुर्वेदी जी द्वारा उठाए गए प्रश्न प्रासांगिक एवं सामयिक हैं और इन पर गंभीरता से गौर किए जाने की आवश्यकता है।

वस्तुतः आज जितने भी पर्व मनाए जा रहे हैं केवल थोथी आस्था,ढ़ोंगी श्रद्धा एवं दिखावे की होड़ा-हाड़ी के लिए मनाए जा रहे हैं। उनको मनाए जाने की तार्किकता एवं औचित्य पर किसी का भी ध्यान नहीं है। 'बाजारवाद' ने इस सब खुराफात को अपने मुनाफे की खातिर बढ़ाया ही है और खेद की बात है कि तथाकथित 'एथीस्टवादी ' व प्रगतिशील लोग भी सच्चाई को जन-प्रकाश में लाने को तैयार नहीं हैं । वे केवल 'धर्म' को नहीं मानते कह कर अधर्म को बढ़ावा दे देते हैं किन्तु धर्म की सच्ची व्याख्या : सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य   को समझने व बताने के लिए तैयार नहीं हैं जिसका पूरा-पूरा लाभ ढोंगियों,पाखंडियों व आड्मबरकारियों को समाज को सामंती पद्धति पर गुमराह करने हेतु मिलता जाता है। जब तक खुद महिलाएं ही आगे बढ़ कर इस ढोंग व पाखंड का प्रतीकार नहीं करेंगी तब तक समाज का मुक्त होना संभव नहीं है। 

  ~विजय राजबली माथुर ©
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Sunday, July 20, 2014

क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त निर्वाण दिवस ( 20 जुलाई 1965 )

 
श्रद्धेय बटुकेश्वर दत्त जी के साथ उनकी पत्नी व पुत्री श्रीमती भारती बागची (पूर्व विभागाध्यक्ष वाणिज्य संकाय-मगध महिला विद्यालय,पटना जो प्रतिवर्ष अपने पिता श्री की याद में गोष्ठी आयोजित करती हैं)


शहीद - ए - आजम के क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के 49 वे निर्वाण दिवस ( 20 जुलाई 1965 ) पर नमन्

एक प्रसिद्ध क्रान्तिकारी हैं जिनका जन्म नवम्बर, 1908 में कानपुर में हुआ था। उनका पैत्रिक गाँव बंगाल के 'बर्दवान ज़िले' में था, पर पिता 'गोष्ठ बिहारी दत्त' कानपुर में नौकरी करते थे। बटुकेश्वर ने 1925 ई. में मैट्रिक की परीक्षा पास की और तभी माता व पिता दोनों का देहान्त हो गया। इसी समय वे सरदार भगतसिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद के सम्पर्क में आए और क्रान्तिकारी संगठन ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन’ के सदस्य बन गए। सुखदेव और राजगुरु के साथ भी उन्होंने विभिन्न स्थानों पर काम किया।
प्रतिशोध की भावना

विदेशी सरकार जनता पर जो अत्याचार कर रही थी, उसका बदला लेने और उसे चुनौती देने के लिए क्रान्तिकारियों ने अनेक काम किए। 'काकोरी' ट्रेन की लूट और लाहौर के पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या इसी क्रम में हुई। तभी सरकार ने केन्द्रीय असेम्बली में श्रमिकों की हड़ताल को प्रतिबंधित करने के उद्देश्य से एक बिल पेश किया। क्रान्तिकारियों ने निश्चय किया कि वे इसके विरोध में ऐसा क़दम उठायेंगे, जिससे सबका ध्यान इस ओर जायेगा।
असेम्बली बम धमाका

8 अप्रैल, 1929 ई. को भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दर्शक दीर्घा से केन्द्रीय असेम्बली के अन्दर बम फेंककर धमाका किया। बम इस प्रकार बनाया गया था कि, किसी की भी जान न जाए। बम के साथ ही ‘लाल पर्चे’ की प्रतियाँ भी फेंकी गईं। जिनमें बम फेंकने का क्रान्तिकारियों का उद्देश्य स्पष्ट किया गया था। दोनों ने बच निकलने का कोई प्रयत्न नहीं किया, क्योंकि वे अदालत में बयान देकर अपने विचारों से सबको परिचित कराना चाहते थे। साथ ही इस भ्रम को भी समाप्त करना चाहते थे कि काम करके क्रान्तिकारी तो बच निकलते हैं, अन्य लोगों को पुलिस सताती है।
आजीवन कारावास

भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त दोनों गिरफ्तार हुए, उन पर मुक़दमा चलाया गया। 6 जुलाई, 1929 को भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अदालत में जो संयुक्त बयान दिया, उसका लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ा। इस मुक़दमें में दोनों को आजीवन कारावास की सज़ा हुई। बाद में लाहौर षड़यंत्र केस में भी दोनों अभियुक्त बनाए गए। इससे भगतसिंह को फ़ाँसी की सज़ा हुई, पर बटुकेश्वर दत्त के विरुद्ध पुलिस कोई प्रमाण नहीं जुटा पाई। उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा भोगने के लिए अण्डमान भेज दिया गया।
रिहाई

इसके पूर्व राजबन्दियों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार के लिए भूख हड़ताल में बटुकेश्वर दत्त भी सम्मिलित थे। यही प्रश्न जब उन्होंने अण्डमान में उठाया तो, उन्हें बहुत सताया गया। गांधीजी के हस्तक्षेप से वे 1938 ई. में अण्डमान से बाहर आए, पर बहुत दिनों तक उनकी गतिविधियाँ प्रतिबन्धित रहीं। 1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में भी उन्हें गिरफ्तार किया गया था। छूटने के बाद वे पटना में रहने लगे थे।
निधन

एक दुर्घटना में घायल हो जाने के कारण 20 जुलाई, 1965 को दिल्ली में बटुकेश्वर दत्त का देहान्त हो गया। 

मरणोपरांत बटुकेश्वर दादा की समाधि आज फिरोजपुर में हैं और शहीद - ए - आजम की  समाधि पर मुखाग्नि दी गई


शहीद - ए - आजम के क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के 49 वे निर्वाण दिवस ( 20 जुलाई 1965 ) पर नमन्
एक प्रसिद्ध क्रान्तिकारी हैं जिनका जन्म नवम्बर, 1908 में कानपुर में हुआ था। उनका पैत्रिक गाँव बंगाल के 'बर्दवान ज़िले' में था, पर पिता 'गोष्ठ बिहारी दत्त' कानपुर में नौकरी करते थे। बटुकेश्वर ने 1925 ई. में मैट्रिक की परीक्षा पास की और तभी माता व पिता दोनों का देहान्त हो गया। इसी समय वे सरदार भगतसिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद के सम्पर्क में आए और क्रान्तिकारी संगठन ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन’ के सदस्य बन गए। सुखदेव और राजगुरु के साथ भी उन्होंने विभिन्न स्थानों पर काम किया।
प्रतिशोध की भावना

विदेशी सरकार जनता पर जो अत्याचार कर रही थी, उसका बदला लेने और उसे चुनौती देने के लिए क्रान्तिकारियों ने अनेक काम किए। 'काकोरी' ट्रेन की लूट और लाहौर के पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या इसी क्रम में हुई। तभी सरकार ने केन्द्रीय असेम्बली में श्रमिकों की हड़ताल को प्रतिबंधित करने के उद्देश्य से एक बिल पेश किया। क्रान्तिकारियों ने निश्चय किया कि वे इसके विरोध में ऐसा क़दम उठायेंगे, जिससे सबका ध्यान इस ओर जायेगा।
असेम्बली बम धमाका

8 अप्रैल, 1929 ई. को भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दर्शक दीर्घा से केन्द्रीय असेम्बली के अन्दर बम फेंककर धमाका किया। बम इस प्रकार बनाया गया था कि, किसी की भी जान न जाए। बम के साथ ही ‘लाल पर्चे’ की प्रतियाँ भी फेंकी गईं। जिनमें बम फेंकने का क्रान्तिकारियों का उद्देश्य स्पष्ट किया गया था। दोनों ने बच निकलने का कोई प्रयत्न नहीं किया, क्योंकि वे अदालत में बयान देकर अपने विचारों से सबको परिचित कराना चाहते थे। साथ ही इस भ्रम को भी समाप्त करना चाहते थे कि काम करके क्रान्तिकारी तो बच निकलते हैं, अन्य लोगों को पुलिस सताती है।
आजीवन कारावास

भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त दोनों गिरफ्तार हुए, उन पर मुक़दमा चलाया गया। 6 जुलाई, 1929 को भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अदालत में जो संयुक्त बयान दिया, उसका लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ा। इस मुक़दमें में दोनों को आजीवन कारावास की सज़ा हुई। बाद में लाहौर षड़यंत्र केस में भी दोनों अभियुक्त बनाए गए। इससे भगतसिंह को फ़ाँसी की सज़ा हुई, पर बटुकेश्वर दत्त के विरुद्ध पुलिस कोई प्रमाण नहीं जुटा पाई। उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा भोगने के लिए अण्डमान भेज दिया गया।
रिहाई

इसके पूर्व राजबन्दियों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार के लिए भूख हड़ताल में बटुकेश्वर दत्त भी सम्मिलित थे। यही प्रश्न जब उन्होंने अण्डमान में उठाया तो, उन्हें बहुत सताया गया। गांधीजी के हस्तक्षेप से वे 1938 ई. में अण्डमान से बाहर आए, पर बहुत दिनों तक उनकी गतिविधियाँ प्रतिबन्धित रहीं। 1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में भी उन्हें गिरफ्तार किया गया था। छूटने के बाद वे पटना में रहने लगे थे।
निधन

एक दुर्घटना में घायल हो जाने के कारण 20 जुलाई, 1965 को दिल्ली में बटुकेश्वर दत्त का देहान्त हो गया।
मरणोपरांत बटुकेश्वर दादा की समाधि आज फिरोजपुर में हैं और शहीद - ए - आजम की समाधि पर मुखाग्नि दी गई

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 20 जूलाई 2013
आज अमर क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त की पुण्यतिथि है!
इस अवसर पर हम उन्हें पूरी क्रांतिकारी श्रद्धा से याद कर रहे हैं!!
बटुकेश्वर दत्त (नवंबर १९०८ - २० जुलाई १९६५) और भगत सिंह ने ८ अप्रैल १९२९ को केंद्रीय असेंबली में बम फेंककर अंग्रेजों को हिला दिया था. इसके बाद इन्होने अपनी गिरफ्तारी दी. १२ जून १९२९ को इन्हें आजीवन कारावास की सजा दी गयी. बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास काटने के लिए काला पानी जेल भेज दिया गया। जेल में ही उन्होंने 1933 और 1937 में ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। सेल्यूलर जेल से 1937 में बांकीपुर केन्द्रीय कारागार, पटना में लाए गए और 1938 में रिहा कर दिए गए। काला पानी से गंभीर बीमारी लेकर लौटे दत्त फिर गिरफ्तार कर लिए गए और चार वर्षों के बाद 1945 में रिहा किए गए। बटुकेश्वर दत्त अपनी आखिरी दिनों में अभाव में गुजारे! चाहते तो वो भी अपनी पहचान का उपयोग करके आसानी से ऐश की जिंदगी जीते . पर ऐसे मतवाले क्रांतिकारियों को देश ही सब कुछ होता है और इन्हें सिद्धानतों के सिवा कुछ भी मंजूर नहीं होता . दत्त की मृत्यु 20 जुलाई, 1965 को नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में हुई। मृत्यु के बाद इनका दाह संस्कार इनके अन्य क्रांतिकारी साथियों-भगत सिंह, राजगुरु एवं सुखदेव की समाधि स्थल पंजाब के हुसैनी वाला में किया गया।

  ~विजय राजबली माथुर ©
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Saturday, July 5, 2014

ब्रह्मांड प्रकृति भगवान और धर्म के नाम पर अधर्म का हैवान ---विजय राजबली माथुर


घूम रहे ब्रह्माण्ड में कितने तारे, ग्रह, नक्षत्र
किंतु प्रकृति ने बस हमको ही दी है
मीठे पानी की नदियाँ, सुंदर झरने और हरे भरे वन.
लेकिन हमने प्रकृति के उपहार का बस उपहास बनाया
जैसे चाहा वैसे इसको रौंदा, कुचला, दास बनाया.
धरती की छाती पर हमने, गाड़ के खूंटे, बाँट ली धरती,
जब कराह से काँपी धरती, हम बोले भूचाल है आया.
नदियों को मैला करके, हालत कर दी नाले से बदतर,
नदियाँ तट को तोड़ चलीं, तो हम बोले कि बाढ़ है आई.
काट दिए सब जंगल, वन और पर्वत को नंगा कर डाला,
बारिश रस्ता भूल गई और हम बोले सूखा है आया.
जाने क्या क्या बहा दिया जब हमने सागर के पानी में,
सागर ने प्रतिकार किया तो हमने कहा सूनामी आई.
.
प्रकृति माँ है, हमने प्रकृति का कितना अपमान किया
माँ के जब आँसू निकले, प्राकृतिक आपदा नाम दिया.
बात याद रखनी थी जो वह भूल गया क्यों अपना मन
प्रकृति ने बस हमको दी है, मीठे पानी की नदियाँ,
सुंदर झरने और हरे भरे वन!!






 (यह चिंता 21 मार्च 2012 को फेस बुक पर बिहारी बाबू -सलिल वर्मा जी ने  व्यक्त की थी। उनकी यह रचना और चिन्ता मुझे सर्वोत्कृष्ट प्रतीत हुई  इसका समाधान मै नीचे दे रहा हूँ):


                                        यज्ञ  माहात्म्य

लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की।
जो वस्तु अग्नि मे जलाई,हल्की होकर वो ऊपर उड़ाई।
करे वायु से मिलान,जाती है रस्ता गगन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 1 । ।

फिर आकाश मण्डल मे भाई,पानी की होत सफाई।
वृष्टि होय अमृत समान,वृद्धि होय अन्न और धन की।
लिखा वेदों मे विधान,अद्भुत है महिमा हवन की। । 2 । ।

जब अन्न की वृद्धि होती है,सब प्रजा सुखी होती है।
न रहता दु : ख का निशान ,आ जाती है लहर अमन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 3 । ।

जब से यह कर्म छुटा है,भारत का भाग्य लुटा है।
'सुशर्मा'करते बयान सहते हैं मार दु :खन की।
लिखा वेदों मे विधान ,अद्भुत है महिमा हवन की। । 4 । ।

जनाब 'हवन' एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। कैसे? Material  Science (पदार्थ विज्ञान ) के अनुसार अग्नि मे जो भी चीजें डाली जाती हैं उन्हे अग्नि परमाणुओ (Atoms) मे विभक्त कर देती है और वायु उन परमाणुओ को बोले गए मंत्रों की शक्ति से संबन्धित ग्रह अथवा देवता तक पहुंचा देती है।

देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-अग्नि,वायु,आकाश,समुद्र,नदी,वृक्ष,पृथ्वी,ग्रह-नक्षत्र आदि।(पत्थर के टुकड़ों तथा कागज पर उत्कीर्ण चित्र वाले नहीं )। 

मंत्र शक्ति=सस्वर मंत्र पाठ करने पर जो तरंगें (Vibrations) उठती हैं वे मंत्र के अनुसार संबन्धित देवता तक डाले गए पदार्थों के परमाणुओ को पहुंचा देती हैं।

अतः हवन और मात्र हवन (यज्ञ ) ही वह पूजा या उपासना पद्धति है जो कि पूर्ण रूप से वैज्ञानिक सत्य पर आधारित है। बाकी सभी पुरोहितों द्वारा गढ़ी गई उपासना पद्धतियेँ मात्र छ्ल हैं-ढोंग व पाखंड के सिवा कुछ भी नहीं हैं। चाहे उनकी वकालत प्रो . जैन अर्थात 'ओशो-रजनीश' करें या आशा राम बापू,मुरारी बापू,अन्ना/रामदेव,बाल योगेश्वर,आनंद मूर्ती,रवी शंकर जैसे ढ़ोंगी साधू-सन्यासी। 'राम' और 'कृष्ण' की पूजा करने वाले राम और कृष्ण के शत्रु हैं क्योंकि वे उनके बताए मार्ग का पालन न करके ढ़ोंगी-स्वांग रच रहे हैं। राम को तो विश्वमित्र जी 'हवन'-'यज्ञ 'की रक्षा हेतु बाल काल मे ही ले गए थे। कृष्ण भी महाभारत के युद्ध काल मे भी हवन करना बिलकुल नहीं भूले। जो लोग उनके द्वारा प्रदर्शित मार्ग -हवन करना छोड़ कर उन्हीं की पूजा कर डालते हैं वे जान बूझ कर उनके कर्मों का उपहास उड़ाते हैं। राम और कृष्ण को 'भगवान' या भगवान का अवतार बताने वाले इस वैज्ञानिक 'सत्य ' को स्वीकार नहीं करते कि 'भगवान' न कभी जन्म लेता है न उसकी मृत्यु होती है। अर्थात भगवान कभी भी 'नस' और 'नाड़ी' के बंधन मे नहीं बंधता है क्योंकि,-

भ=भूमि अर्थात पृथ्वी।
ग=गगन अर्थात आकाश।
व=वायु।
I=अनल अर्थात अग्नि (ऊर्जा )।
न=नीर अर्थात जल।

प्रकृति के ये पाँच तत्व ही 'भगवान' हैं और चूंकि इन्हें किसी ने बनाया नहीं है ये खुद ही बने हैं इसी लिए ये 'खुदा' हैं। ये पांचों तत्व ही प्राणियों और वनस्पतियों तथा दूसरे पदार्थों की 'उत्पत्ति'(GENERATE),'स्थिति'(OPERATE),'संहार'(DESTROY) के लिए उत्तरदाई हैं इसलिए ये ही GOD हैं। पुरोहितों ने अपनी-अपनी दुकान चमकाने के लिए इन को तीन अलग-अलग नाम से गढ़ लिया है और जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं। इनकी पूजा का एकमात्र उपाय 'हवन' अर्थात 'यज्ञ' ही है और कुछ भी कोरा पाखंड एवं ढोंग।

                                         यज्ञ महिमा

होता है सारे विश्व का कल्याण यज्ञ से।
जल्दी प्रसन्न होते हैं भगवान यज्ञ से। ।

1-ऋषियों ने ऊंचा माना है स्थान यज्ञ का।
करते हैं दुनिया वाले सब सम्मान यज्ञ का।
दर्जा है तीन लोक मे-महान यज्ञ का।
भगवान का है यज्ञ और भगवान यज्ञ का।
जाता है देव लोक मे इंसान यज्ञ से। होता है ...........

2-करना हो यज्ञ प्रकट हो जाते हैं अग्नि देव।
डालो विहित पदार्थ शुद्ध खाते हैं अग्नि देव।
सब को प्रसाद यज्ञ का पहुंचाते हैं अग्नि देव।
बादल बना के भूमि पर बरसाते हैं अग्निदेव।
बदले मे एक के अनेक दे जाते अग्नि देव।
पैदा अनाज होता है-भगवान यज्ञ से।
होता है सार्थक वेद का विज्ञान यज्ञ से। होता है ......

3-शक्ति और तेज यश भरा इस शुद्ध नाम मे ।
 साक्षी यही है विश्व के हर नेक काम मे।
 पूजा है इसको श्री कृष्ण-भगवान राम ने।
होता है कन्या दान भी इसी के सामने।
मिलता है राज्य,कीर्ति,संतान यज्ञ से।
सुख शान्तिदायक मानते हैं सब मुनि इसे। होता है .....

4-वशिष्ठ विश्वमित्र   और नारद मुनि इसे।
इसका पुजारी कोई पराजित नहीं होता।
भय यज्ञ कर्ता को कभी किंचित नहीं होता।
होती हैं सारी मुश्किलें आसान यज्ञ से। होता है ......

5-चाहे अमीर है कोई चाहे गरीब है।
 जो नित्य यज्ञ करता है वह खुश नसीब है।
हम सब मे आए यज्ञ के अर्थों की भावना।
'जख्मी'के सच्चे दिल से है यह श्रेष्ठ कामना।
होती हैं पूर्ण कामना--महान यज्ञ से । होता है ....  



हम जानते हैं कि आपके इर्द-गिर्द छाए   हज़ारे/केजरीवाल  और सुबरमनियम स्वामी के चेले-चपाटे  आपको हकीकत  स्वीकारने नहीं देंगे। नीचे स्कैन मे आप ओज़ोन पर्त की जो समस्या देख रहे हैं वह भी 'हवन'पद्धती को त्यागने का ही परणाम है। -



Hindustan-Lucknow-30/03/2012



भोपाल गैस कांड के बाद यूनियन कारबाईड ने खोज करवाई थी कि तीन परिवार सकुशल कैसे बचे। निष्कर्ष मे ज्ञात हुआ कि वे परिवार घर के भीतर हवन कर रहे थे और दरवाजों व खिड़कियों पर कंबल पानी मे भिगो कर डाले हुये थे। ट्रायल के लिए गुजरात मे अमेरिकी वैज्ञानिकों ने 'प्लेग' के कीटाणु छोड़ दिये। इसका प्रतिकार करने हेतु सरकार ने हवन के पैकेट बँटवाए थे और 'हवन' के माध्यम से उस प्लेग से छुटकारा मिला था। तब से लगातार अमेरिका मे 'अखंड हवन' चल रहा है और जो ओजोन का छिद्र अमेरिका के ऊपर था वह खिसक कर दक्षिण-पूर्व एशिया की तरफ आ गया है। लेकिन भारत के लोग ओशो,मुरारी और आशाराम बापू ,रामदेव,अन्ना हज़ारे,गायत्री परिवार जैसे ढोंगियों के दीवाने बन कर अपना अनिष्ट कर रहे हैं । परिणाम क्या है  एक विद्वान ने यह बताया है-


परम पिता से प्यार नहीं,शुद्ध रहे व्यवहार नहीं। 
इसी लिए तो आज देख लो ,सुखी कोई परिवार नहीं। । परम ... । । 
फल और फूल अन्य इत्यादि,समय समय पर देता है। 
लेकिन है अफसोस यही ,बदले मे कुछ नहीं लेता है। । 
करता है इंकार नहीं,भेद -भाव तकरार  नहीं। 
ऐसे दानी का ओ बंदे,करो जरा विचार नहीं। । परम ....। । 1 ।  ।
मानव चोले मे ना जाने कितने यंत्र लगाए हैं। 
कीमत कोई माप सका नहीं,ऐसे अमूल्य बनाए हैं। । 
कोई चीज बेकार नहीं,पा सकता कोई पार नहीं । 
ऐसे कारीगर का बंदे ,माने तू उपकार नहीं। । परम ... । । 2 । । 
जल,वायु और अग्नि का,वो लेता नहीं सहारा है। 
सर्दी,गर्मी,वर्षा का अति सुंदर चक्र चलाया है। । 
लगा कहीं दरबार नहीं ,कोई सिपाह -सलारनहीं। 
कर्मों का फल दे सभी को ,रिश्वत की सरकार नहीं। । परम ... । । 3 । । 
सूर्य,चाँद-सितारों का,जानें कहाँ बिजली घर बना हुआ। 
पल भर को नहीं धोखा देता,कहाँ कनेकशन लगा हुआ। । 
खंभा और कोई तार नहीं,खड़ी कोई दीवार नहीं। 
ऐसे शिल्पकार का करता,जो 'नरदेव'विचार नहीं। । परम .... । । 4 । ।  
आज  इस पाखंडी नारे का परित्याग करने कि-सीता राम,सीता राम कहिए जाहि विधि राखे राम ताही विधि रहिए-और वास्तविकता को स्वीकारते हुये इस तथ्य का पालन करने का संकल्प लेना चाहिए कि,"सीता-राम,सीता-राम कहिए ---जाहि विधि रहे राम ताही विधि रहिए।"
आलसी और अकर्मण्य लोग राम को दोष दे कर बच निकलना चाहते हैं।  राम ने जो त्याग किया  और कष्ट देश तथा देशवासियों के लिए खुद व पत्नी सीता सहित सहा उसका अनुसरण करने -पालन करने की जरूरत है । राम के नाम पर आज देश को तोड़ने और बांटने की साजिशे हो रही हैं जबकि राम ने पूरे 'आर्यावृत ' और 'जंबू द्वीप'को एकता के सूत्र मे आबद्ध किया था और रावण के 'साम्राज्य' का विध्वंस किया था । राम के नाम पर क़त्लो गारत करने वाले राम के पुजारी नहीं राम के दुश्मन हैं जो साम्राज्यवादियो के मंसूबे पूरे करने मे लगे हुये हैं । जिन वेदिक नियमों का राम ने आजीवन पालन किया आज भी उन्हीं को अपनाए जाने की नितांत आवश्यकता है।


  ~विजय राजबली माथुर ©
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