Friday, December 31, 2010

जीवेम शरदः शतम

यजुर्वेद क़े अध्य्याय ३६ क़े मन्त्र २४ में कहा गया है-
ओ ३ म तच्चक्षु..............पश्येम शरदः शतम जीवेम शरदः शतम ...........भूयश्च शरदः शातात..

एक विद्वान द्वारा किया भावानुवाद इस प्रकार है-

हों आँखों की आँख पिताजी,
देवों क़े महादेव अनादि.
महिमा देखें सौ वर्ष तक ,
सुनें कीर्तन सौ वर्ष तक.
 सुख से जीवें सौ वर्ष तक,
ध्यावें ईश्वर सौ वर्ष तक.
प्रेमलीन हों सौ वर्ष तक,
स्वाधीन हों सौ वर्ष तक.
सौ वर्ष से ज्यादा जीवें,
ओ ३ म नाम रस अमृत पीवें..

आचार्य  हजारी  प्रसाद दिवेदी ने भी इसी शीर्षक से एक निबन्ध लिखा है जो हमने हाई स्कूल में पढ़ा था. उन्होंने बताया है कि,पहले लोग रोजाना यह प्रार्थना करते थे और सुखी थे.अब जब से लोगों ने इसे छोड़ा है ,सुख ने भी उन्हें छोड़ा है.
आज इस शीर्षक क़े अंतर्गत हम आपको नित्य प्रयोग में आने वाले भोजन क़े मसाले और अनाज आदि क़े बारे में बताना चाहते हैं जो जटिल व असाध्य रोगों का इलाज करने में सक्षम हैं.वर्ष २०११ में आप सबके उत्तम स्वास्थ्य और मंगल की कामना करते हुए पेश है -" भारतीय मसलों क़े निराले नुस्खों का चमत्कार" .आप भी  आजमा कर देख सकते और लाभ उठा सकते हैं.:-

ह्रदय रोग में-गेहूं की भूसी को अर्जुन की छाल क़े साथ बराबर की मात्रा में चूर्ण बनाकर घी में भून लें,फिर इस मात्रा का तीन गुना शहद मिला कर रख लें.यह अवलेह छै ग्रामसे दस ग्रा.की मात्रा तक गाय क़े दूध में सेवन करें और भयंकर से भयंकर ह्रदय रोग को दूर भगा कर निश्चिन्त हो जाएँ.

दुबलेपन में-प्रातः सायं तीन-तीन ग्रा.हल्दी क़े चूर्ण को गोदुग्ध क़े साथ सेवन करने से शरीर मोटा हो जाता है.

ताकत क़े लिये -पचास ग्रा.चने की दाल को १०० ग्रा.दूध में रात्रि को भिगो दें.प्रातः काल इस फूली हुई दाल को चबा-चबा कर खाएं,उसके साथ किशमिश या गुड का प्रयोग करें.कम से कम चालीस दिन प्रयोग करने से ताकत बढ़ती है.

नकसीर में-छै ग्रा.फिटकरी को ५० ग्रा.पानी में घोल कर नाक में टपकायें अथवा रुई का फाहा तः करके नाक में लगा दें.इसी पानी में कपडा तः करके माथे पर रखें,नकसीर तुरन्त बन्द हो जायेगी.

नशा-नाशक -आंवले क़े पत्ते १०० ग्रा.लेकर ४०० ग्रा.पानी में ठंडाई की भांति पीस कर पिलाने से अफीम तक का विष दूर हो जाता है.

निमोनिया में-अदरक अथवा तुलसी क़े पत्तों का रस ६ ग्रा.,शहद ६ ग्रा.दोनों को मिलाकर दिन में दो-तीन बार दें.इस प्रयोग से बिना किसी इंजेक्शन प्रयोग क़े खांसी,बलगम,दर्द आदि ठीक हो जाते हैं.

पथरी में-पेठे क़े १०० ग्रा.रस में भवछार(जवाखार)३ ग्रा.तथा पुराना गुड २ ग्रा.मिलाकर पिलाने से कुछ ही दिन में हर प्रकार की पथरी नष्ट हो जाती है.

बदहजमी में-खाने का सोडा ,सोंठ ,काली मिर्च,छोटी पीपल और नौसादर समान मात्रा में लेकर कूट-पीस कर चूर्ण बना लें.डेढ़ ग्रा.दावा दिन में तीन बार पानी से खिलाएं.बदहजमी समाप्त होगी.

बाल काले करना-सूखे हुए आंवले को बारीक पीस लें,फिर नींबू का रस डालकर पीसें.इसे सिर में लगा दें.जब सूख जाये तो सिर को पानी से ढो लें.धन रखें सिर को दही से बिलकुल न धोयें.नारियल का तेल सिर में लगायें.बालों की सफेदी दूर होकर बाल काले,मुलायम और चमकदार हो जाते हैं.

कुत्ता काटने पर-देसी साबुन और शहद दोनों को समान मात्रा में मिलाकर इतना रगड़ें कि,मरहम बन जाये.इसे कुत्ते क़े काटे हुए घाव पर लगायें तत्काल फायदा होगा.

गंजापन दूर करें-पत्ता गोभी क़े रस को लगातार सिर पर मालिश करें तो गंजापन ,बाल ज्घरना,बाल गिरना आदि रोग दूर हो जाते हैं.

सांप का विष उतारें-सांप द्वारा काटने पर एक घंटे क़े भीतर नीला थोथा (तूतिया)लें और तवे पर भून कर मुनक्का में रख कर निगलवा दें तो सांप का विष समाप्त होगा.

हिचकी में-कलौंजी (मगरैला) का चूर्ण ३ ग्रा. लेकर १० ग्रा. ताज़ा मक्खन में मिलाकर खिलने से हिचकी दूर हो जाती है.
मलेरिया - बुखार में-१० ग्रा. दालचीनी का चूर्ण लें उसमें ढाई ग्रा. आक का दूध मिलाकर खुश्क करें.रोगी को एक ग्रेन (आधी रत्ती )दावा पानी क़े साथ दें.यह दावा कुनैन से ज्यादा प्रभाव कारी है.

दस्त में -सौंफ और सफ़ेद जीरा समान मात्रा में लें और तवे पर भून लें.फिर बारीक पीस कर ३ -३  ग्रा.दिन में दो -तीन बार तजा पानी से खिलाएं.यह सरल ,सस्ता और चमत्कारी इलाज है.

उल्टी में-नींबू पर नामक और काली मिर्च लगा कर चूसने से उल्टी में लाभ होता है.
                          
 राम-बाण  औषद्धि

साफ़ सिल-बट्टा लें,जिस पर मसाला न पीसा गया हो.इस पर २५ से ५० तक तुलसी क़े पत्ते खरल कर लें.ऐसे पिसे हुए पत्ते ६ से १० ग्रा. तक लें और ताजा दही अथवा शहद में मिलाकर खिलावें (दूध में भूल कर भी न दें ).यह दवा  प्रातः निराहार एक ही बार लें और तीन -चार मांस तक सेवन करें तो गठिया का दर्द,खांसी,सर्दी,जुकाम,गुर्दे की बीम्मारी,गुर्दे का काम न करना,गुर्दे की पथरी,सफ़ेद दाग का कोढ़,शरीर का मोटापा,वृधावस्था की दुर्बलता,पेचिश,अम्लता,मन्दाग्नि,कब्ज,गैस,दिमागी कमजोरी,याद -दाश्त में कमी,पुराने से पुराना सिर-दर्द,हाई एवं लो ब्लड-प्रेशर,हृदयरोग,शरीर की झुर्रियां,बिवाई और श्वास रोग दूर हो जाते हैं.विटामिन ,'ए'और 'सी'की कमी दूर होती है,रुका हुआ रक्तस्त्राव ठीक हो जाता है,आँख आने और दुखने तथा खसरा निवारण में यह राम-बाण औषद्धि है.
उपरोक्त नुस्खे आयुर्वेदिक पद्धति क़े अनुसार हैं तथा प्रत्येक घर-परिवार में उपलब्ध अन्न व मसलों पर आधारित हैं.इनका कोई साइड-इफेक्ट या रिएक्शन नहीं होता है.आपके व आपके सम्पूर्ण परिवार क़े लिये मंगल-कामनाओं क़े साथ इन्हें प्रस्तुत किया गया है.
                     
नव-वर्ष मुबारक हो,यह वर्ष आप को सपरिवार दीर्घायुष्य,उत्तम-स्वास्थ्य एवं उज्जवल संभावनाएं प्रदान करें.




(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

विशेष:-

१  वर्ष की समीक्षा और किसी को अच्छा या बुरा बताने वाले कई ब्लाग्स पढने को मिले.ऐसा करने वालों ने किस अधिकार या हैसियत से ऐसा किया यह तो वे ही जानें.हमें ऐसा कोई अधिकार प्राप्त नहीं है,परन्तु जितने ब्लाग्स हम फालो करते हैं,जितने हमारी फेवरिट लिस्ट में हैं,उनमें से जो हमें प्रेरित करते हैं और जिन ब्लागर्स ने जन -हित में ही अधिकांश लिखा है उनका उल्लेख तो हम भी कर ही सकते हैं और इनमें डा.टी.एस.दराल सा :,सलिल वर्माजी(चला ..ब्लागर वाले),विजय कुमार वर्माजी का नाम पूर्ण सम्मान क़े साथ दर्ज करते हैं.


Thursday, December 30, 2010

ॐ नमः शिवाय च

"ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है."यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है.हमारे देश में धर्म का प्रवर्तन किसी महापुरुष विशेष द्वारा नहीं हुआ है जिस प्रकार इस्लाम क़े प्रवर्तक हजरत मोहम्मद व ईसाईयत क़े प्रवर्तक ईसा मसीह थे.हमारे यहाँ राम अथवा कृष्ण धर्म क़े प्रवर्तक नहीं बल्कि धर्म की ही उपज थे.राम और कृष्ण क़े रूप में मोक्ष -प्राप्त आत्माओं का अवतरण धर्म की रक्षा हेतु ही,बुराइयों पर प्रहार करने क़े लिये हुआ था.उन्होंने कोई व्यक्तिगत धर्म नहीं प्रतिपादित किया था.आज जिन मतों को विभिन्न धर्म क़े नाम से पुकारा जा रहा है ;वास्तव में वे भिन्न-भिन्न उपासना-पद्धतियाँ हैं न कि,कोई धर्म अलग से हैं.लेकिन आप देखते हैं कि,लोग धर्म क़े नाम पर भी विद्वेष फैलाने में कामयाब हो जाते हैं.ऐसे लोग अपने महापुरुषों क़े आदर्शों को सहज ही भुला देते हैं.आचार्य श्री राम शर्मा गायत्री परिवार क़े संस्थापक थे और उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था -"उन्हें मत सराहो जिनने अनीति पूर्वक सफलता पायी और संपत्ति कमाई."लेकिन हम देखते हैं कि,आज उन्हीं क़े परिवार में उनके पुत्र व दामाद इसी संपत्ति क़े कारण आमने सामने टकरा रहे हैं.गायत्री परिवार में दो प्रबंध समितियां बन गई हैं.अनुयायी भी उन दोनों क़े मध्य बंट गये हैं.कहाँ गई भक्ति?"भक्ति"शब्द ढाई अक्षरों क़े मेल से बना है."भ "अर्थात भजन .कर्म दो प्रकार क़े होते हैं -सकाम और निष्काम,इनमे से निष्काम कर्म का (आधा क) और त्याग हेतु "ति" लेकर "भक्ति"होती है.आज भक्ति है कहाँ?महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना धर्म में प्रविष्ट कुरीतियों को समाप्त करने हेतु ही एक आन्दोलन क़े रूप में की थी.नारी शिक्षा,विधवा-पुनर्विवाह ,जातीय विषमता की समाप्ति की दिशा में महर्षि दयानंद क़े योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता.आज उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज में क्या हो रहा है-गुटबाजी -प्रतिद्वंदिता .


काफी अरसा पूर्व आगरा में आर्य समाज क़े वार्षिक निर्वाचन में गोलियां खुल कर चलीं थीं.यह कौन सी अहिंसा है?जिस पर स्वामी जी ने सर्वाधिक बल दिया था. स्वभाविक है कि, यह सब नीति-नियमों की अवहेलना का ही परिणाम है,जबकि आर्य समाज में प्रत्येक कार्यक्रम क़े समापन पर शांति-पाठ का विधान है.यह शांति-पाठ यह प्रेरणा देता है कि, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में विभिन्न तारागण एक नियम क़े तहत अपनी अपनी कक्षा (Orbits ) में चलते हैं उसी प्रकार यह संसार भी जियो और जीने दो क़े सिद्धांत पर चले.परन्तु एरवा कटरा में गुरुकुल चलाने  वाले एक शास्त्री जी ने रेलवे क़े भ्रष्टतम व्यक्ति जो एक शाखा क़े आर्य समाज का प्रधान भी रह चुका था क़े भ्रष्टतम सहयोगी क़े धन क़े बल पर एक ईमानदार कार्यकर्ता पर प्रहार किया एवं सहयोग दिया पुजारी व पदाधिकारियों ने तो क्या कहा जाये कि, आज सत्यार्थ-प्रकाश क़े अनुयायी ही सत्य का गला घोंट कर ईमानदारी का दण्ड देने लगे हैं.यह सब धर्म नहीं है.परन्तु जन-समाज ऐसे लोगों को बड़ा धार्मिक मान कर उनका जय-जयकारा करता है.आज जो लोगों को उलटे उस्तरे से मूढ़ ले जाये उसे ही मान-सम्मान मिलता है.ऐसे ही लोग धर्म व राजनीति क़े अगुआ बन जाते हैं.ग्रेषम का अर्थशास्त्र में एक सिद्धांत है कि,ख़राब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है.ठीक यही हाल समाज,धर्म व राजनीति क़े क्षेत्र में चल रहा है.
दुनिया लूटो,मक्कर से.
रोटी खाओ,घी-शक्कर से.
   एवं
अब सच्चे साधक धक्के खाते हैं .
फरेबी आज मजे-मौज  उड़ाते हैं.
आज बड़े विद्वान,ज्ञानी और मान्यजन लोगों को जागरूक होने नहीं देना चाहते,स्वजाति बंधुओं की उदर-पूर्ती की खातिर नियमों की गलत व्याख्या प्रस्तुत कर देते हैं.राम द्वारा शिव -लिंग की पूजा किया जाना बता कर मिथ्या सिद्ध करना चाहते हैं कि, राम क़े युग में मूर्ती-पूजा थी और राम खुद मूर्ती-पूजक थे. वे यह नहीं बताना चाहते कि राम की शिव पूजा का तात्पर्य भारत -भू की पूजा था. वे यह भी नहीं बताना चाहते कि, शिव परमात्मा क़े उस स्वरूप को कहते हैं कि, जो ज्ञान -विज्ञान का दाता और शीघ्र प्रसन्न होने वाला है. ब्रह्माण्ड में चल रहे अगणित तारा-मंडलों को यदि मानव शरीर क़े रूप में कल्पित करें तो हमारी पृथ्वी का स्थान वहां आता है जहाँ मानव शरीर में लिंग होता है.यही कारण है कि, हम पृथ्वी -वासी शिव का स्मरण लिंग रूप में करते हैं और यही राम ने समझाया भी होगा न कि, स्वंय ही  लिंग बना कर पूजा की होगी. स्मरण करने को कंठस्थ करना कहते हैं न कि, उदरस्थ करना.परन्तु ऐसा ही समझाया जा रहा है और दूसरे विद्वजनों से अपार प्रशंसा भी प्राप्त की जा रही है. यही कारण है भारत क़े गारत होने का.


जैसे सरबाईना और सेरिडोन क़े विज्ञापनों में अमीन सायानी और हरीश भीमानी जोर लगते है अपने-अपने उत्पाद की बिक्री का वैसे ही उस समय जब इस्लाम क़े प्रचार में कहा गया कि हजरत सा: ने चाँद क़े दो टुकड़े  कर दिए तो जवाब आया कि, हमारे भी हनुमान ने मात्र ५ वर्ष की अवस्था में सूर्य को निगल लिया था अतः हमारा दृष्टिकोण श्रेष्ठ है. परन्तु दुःख और अफ़सोस की बात है कि, सच्चाई साफ़ करने क़े बजाये ढोंग को वैज्ञानिकता का जामा ओढाया जा रहा है.


यदि हम अपने देश  व समाज को पिछड़ेपन से निकाल कर ,अपने खोये हुए गौरव को पुनः पाना चाहते हैं,सोने की चिड़िया क़े नाम से पुकारे जाने वाले देश से गरीबी को मिटाना चाहते हैं,भूख और अशिक्षा को हटाना चाहते हैंतो हमें "ॐ नमः शिवाय च "क़े अर्थ को ठीक से समझना ,मानना और उस पर चलना होगा तभी हम अपने देश को "सत्यम,शिवम्,सुन्दरम"बना सकते हैं.आज की युवा पीढी ही इस कार्य को करने में सक्षम हो सकती है.अतः युवा -वर्ग का आह्वान है कि, वह सत्य-न्याय-नियम और नीति पर चलने का संकल्प ले और इसके विपरीत आचरण करने वालों को सामजिक उपेक्षा का सामना करने पर बाध्य कर दे तभी हम अपने भारत का भविष्य उज्जवल बना सकते हैं.काश ऐसा हो सकेगा?हम ऐसी आशा तो संजो ही सकते हैं.







(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

Saturday, December 25, 2010

Clinging to Delusion in Soltitude

                                                            [By Shaily Sahay]


Some where in the midst of Darkness
I was lost
Alone Alone in the mob
Howling and Shouting for  existence and
attention 
My prayers and pleas echoed in that 
Big      arena,
Lost,unheared,unnoticed   and   ignored 
in   Vioelence,
Apparently, in  that feggy  season 
 Some  one unknown,held my  hands 
Which  were  stuiched  out  for  help
 we  sailed  through   the   crowd,
Some where, Some where   away  from  that
lost  world
My  angel led  me   to  the  door  from
where  brightness  of  light  piered
My  eyes ,slowly it  enlightened

My dreams,   I started living  my
dreams, trying to  make  there  true
Approaching     with   passion  and
leest   towards  the  door ,     I wished
to  cross  it  , before  ,before  .....
I   was  bowed    down
Alas  !  The Angel  was  lost ,the  door
was  closed   for ever   and   ever .
Emptiness  gazed, Silence  prevailed
every  where ,

I  ,I   was  sturned  and  lost  again ,
I  am  lost  till   now  ,
Clinging  to  the  delusion  that  the
angel   will   come   again.......

(शैली अपनी बुआ श्रीमती पूनम माथुर क़े साथ)

(इस कविता की हस्तलिखित प्रति जो शैली ने पूनम को भेंट की थी )

शैली सहाय (सुपुत्री श्री राजीव रंजन सहाय एवं श्रीमती सविता सिन्हा) मेरी पत्नी की  बड़ी  भतीजी है जो अब तो Mass  Comunication क़े द्वितीय वर्ष में है,परन्तु उसने यह कविता उस समय सन २००८ ई.में लिखी थी जब इन्टर मीडीएट की छात्रा थी. वस्तुतः उसके यहाँ बर्तन मांजने वाली की बेटी को धर्माचार्य जी क़े आश्रम द्वारा संचालित पटना क़े स्कूल में फ्री शिक्षा हेतु कम्पटीशन में सफल रहने क़े बावजूद वायदे क़े अनुसार एडमीशन न मिलने पर शैली क़े मस्तिष्क पर जो प्रभाव पड़ा;उसी की प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति है यह कविता.

आज क्रिसमस क़े अवसर पर जब सान्ताक्लाज़ द्वारा गरीब बच्चों को उपहार देने की चर्चा होगी तो हमारे देश क़े पूज्य धर्माचार्य जी का चरित्र -चित्रण करती यह कविता पुनः प्रकाशित करना मैंने अपना कर्त्तव्य समझा.इससे पूर्व इसी कविता को "जो मेरा मन कहे" पर यशवन्त द्वारा भी प्रकाशित किया गया था.
क्या इनकम टैक्स की बचत हेतु धर्माचार्यों को धन देने वालों  द्वारा उनके इस आचरण की ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है अथवा नहीं ?




(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

Thursday, December 23, 2010

परमात्मा क़े विराट स्वरूप क़े दर्शन करें

२५ दिसंबर को ईसामसीह का जन्म दिन मनाया जाता है.महात्मा ईसा ने हिमालय पर आकर गहन अध्ययन करने क़े उपरांत ही उस देश-काल क़े अनुसार प्रवचन दिए हैं.पूरी की पूरी बाईबल "टेन सरमन आन द माउनट्स" का ही विस्तार है.ये हमारे ५ यम और ५ नियम का ही रूपांतरण हैं.


(अमर बलिदानी स्वामी श्रद्धानंद)
आज २३ दिसंबर को स्वामी श्रद्धानंद जी का बलिदान दिवस है.स्वामी दयानंद जी क़े बाद स्वामी श्रद्धानंद जी ही थे जिन्होंने पूरी दक्षता एवं क्षमता से उनके सिद्धांतों को प्रचारित -प्रसिरित किया.उन्होंने भारत में फिर से गुरुकुलों की स्थापना की. कांगड़ी में स्थापित प्रथम गुरुकुल में उन्होंने अपने पुत्र-पुत्री को भेज कर एक दृष्टान्त उपस्थित किया.वह कायस्थ परिवार से थे तथा पुलिस अधिकारी भी रह चुके थे .उस नौकरी को छोड़ कर आर्य समाज और स्वाधीनता आन्दोलन में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभायी.उन्होंने साम्प्रदायिक -एकता की भी मिसाल कायम की. वह पहले गैर मुस्लिम थे जिसने दिल्ली की जामा मस्जिद से वेद मन्त्रों का सफल पाठ किया था.यह ब्रिटिश सरकार को नागवार गुजरा तथा एक पुलिस दरोगा( जिसका सम्बन्ध इस्लाम से था )को मोहरा बना कर स्वामी श्रधानंद की निर्मम हत्या करा दी.आज उनके बलिदान-दिवस पर उनके बताये मार्ग का दिग्दर्शन इस पोस्ट में करने का प्रयास कर रहे हैं.

यहाँ हम अथर्व वेद क़े आधार पर परमात्मा क़े विराट स्वरूप पर प्रकाश डालना चाहते हैं,जिन  तथ्यों का उल्लेख आप को बाईबल में भी अपने तरीके से मिल जायेगा.हमारी यह पृथ्वी परमात्मा क़े चरण हैं,सूर्य और चन्द्र परमात्मा की आँखें हैं,अंतरिक्ष परमात्मा का उदर है,द्विलोक परमात्मा का मस्तिष्क है और अग्नि परमात्मा का मुख है.सर्वत्र व्याप्त वायु परमात्मा का प्राण है.लेकिन आप ऐसे परमात्मा का चित्र या मूर्ती नहीं बना सकते-न वह कभी नस -नाडी क़े बंधन में बंधता है और न ही अवतरित होता है क्योंकि पृथ्वी तो उसका चरण है ही.वह तो ब्रह्माण्ड में स्थित है तथा वहीं से सम्पूर्ण सृष्टी का सञ्चालन कर रहा है.हमारे मनुष्य शरीर में भी मस्तिष्क द्विलोक है,आँखों का प्रत्यक्ष सम्बन्ध सूर्य क़े प्रकाश से है.यदि सूर्य का प्रकाश न मिले तो मनुष्य की आँखें काम नहीं कर सकतीं.चंद्रमा मानव मस्तिष्क का प्रमुख सूत्रधार है.इसका प्रमाण हमारे ज्योतिष विज्ञान से मिलता है.ज्योतिष में हम चंद्रमा की गति से ही जन्मांग बनाते हैं,राशिफल निकालते हैं और पाखंडियों की कुधारणा क़े विपरीत परमात्मा क़े जिस विराट स्वरूप की व्याख्या करते हैं वह सर्वथा ज्योतिष-सम्मत है.आर्य समाज समेत जिन मतों क़े प्रचारक ज्योतिष की आलोचना करते हैं उन्हें सबक मिलता है- महर्षि दयानंद की श्रेष्ठ पुस्तक 'संस्कार विधि'से जिसमें उन्हों ने प्रत्येक तिथि और उस तिथि के देवता हेतु आहुतियाँ देने का विधान बताया है.नक्षत्रों और उनके देवता हेतु भी आहुतियाँ देने का विधान है.महर्षि द्वारा बताई तिथियों एवं नक्षत्रों की गणना केवल और केवल ज्योतिष -विज्ञान द्वारा ही संभव है.संसार में प्रचलित कोई भी अन्य पूजा-पद्धति परमात्मा तक लगाया गया भोग पहुँचाने में समर्थ नहीं है.केवल और केवल हवन(यज्ञ) ही वह वैज्ञानिक पद्धति है जिसमें दी गई आहुतियाँ अग्नि (अर्थात परमात्मा का मुख)द्वारा सम्पूर्ण अंतरिक्ष व ब्रहमांड में फ़ैल कर सभी ग्रह-नक्षत्रों और देवताओं तक पहुंचतीं हैं.चूंकि परमात्मा क़े चरण ही यह धरती है और हमारे चरण सदा धरती पर ही टिके रहते हैं -इस प्रकार परमात्मा क़े चरणों में ही हमारा अस्तित्व टिका है.हम जब नींद या विश्राम क़े लिए लेटते हैं हमारा मस्तिष्क अदा हो जाता है और तब उसका सम्बन्ध परमात्मा क़े द्विलोक से विच्छेद हो जाता है.इसलिए पढने और साधना करने क़े लिए बैठने का विधान है ताकि हमारे मस्तिष्क का सम्बन्ध परमात्मा क़े मस्तिष्क से बना रहे और हम अधिकत्तम ज्ञानार्जन कर सकें.डा.लोग (चिकित्सक गण )भी बैठ कर पढने को ही उचित बताते हैं.

खेद एवं नितांत वेदना की बात है कि,मनुष्य ने व्यर्थ स्वार्थवश पहाड़ों को काट डाला,वनों को उजाड़ दिया और विश्व क़े पर्यावरण क़े संतुलन को बिगाड़ दिया है.चंद अमीरों क़े प्रासादों को संगमरमर से धवल करने हेतु,उनके  ड्राईंग -रूमों की शोभा बढ़ने हेतु सोफासेट व बेड निर्माण हेतु पर्वतों व वनों को नेस्तनाबूद कर दिया गया है.(अफ़सोस है कि,आगरा से आने पर मजबूरी में हमें जो मकान खरीदना पड़ा वह ऐसे संगमरमरी फर्श का ही है,जिसमें हम असहज महसूस करते हैं).यह पृथ्वी केवल मनुष्यों क़े आज क़े उपभोग क़े लिए ही नहीं है.यह प्राणी -मात्र क़े लिए है और हमारी आने वाली संतानों क़े भोग क़े लिए भी है.आज चंद मनुष्यों क़े सतही सुख क़े लिए पर्यावरण से की गई छेड़-छाड़ आने वाली पीढ़ियों को दंश देती रहेगी और हमारी आत्माएँ इस पाप का फल भोगती रहेंगीं.

तुलसी,पीपल और आंवला क़े वृक्ष दिन और रात आक्सीजन ही छोड़ते हैं जो प्राणी -मात्र क़े जीवन क़े लिए आवश्यक है;अतः प्रत्येक मनुष्य को इंका संरक्षण व संवर्धन करना चाहिए.इसी प्रकार हम आम की समिधा का प्रयोग हवन में करते हैं जो हमारे पूर्वजों द्वारा लगाये गये वृक्षों से हमें प्राप्त होती है ,अतः हमें भी आने वाली पीढ़ियों क़े प्रयोग हेतु समिधा प्रदान करने क़े वास्ते कम से कम जीवन में एक आम का पौधा अवश्य लगाना चाहिये ,अन्यथा हम यज्ञ -विध्वंस क़े भागीदार होकर उस पाप का फल भोगने को बाध्य होंगें.(हम आगरा का मकान छोड़ते समय ३ -४ आम क़े पौधे ,दर्जन भर या अधिक तुलसी क़े पौधे,नीम क़े ३ पौधे ,बेल-पत्र का एक फलदार -वृक्ष,फल लगे दो अनार क़े पेड़ ,फलदार ३ पपीते क़े पेड़  वहां छोड़ कर आये हैं ,परन्तु यहाँ मुट्ठी भर भी कच्ची जमीन न मिलने क़े कारण गमले में तुलसी व एलोवेरा ही रख सके हैं.)

यदि हमें मानवता की रक्षा करनी है तो हवन को दिनचर्या का अंग बनाना ही होगा तभी परमात्मा क़े प्राण-वायु की रक्षा होगी जो जो मानव सहित प्राणी-मात्र क़े जीवन का मूलाधार है.पृथ्वी की रक्षा करना हमारा प्रथम कर्त्तव्य है.इस वर्ष की चला-चली में आज स्वामी श्रधानंद जी क़े बलिदान दिवस पर उन्हें श्रधान्जली स्वरूप  - आने वाले वर्ष से वनों की रक्षा व हवन पद्धति अपनाने का संकल्प लिया जा सकता है.       





(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

Tuesday, December 21, 2010

श्रीराम की सफल कूट नीति



हाराज दशरथ क़े पुत्र मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम का आविर्भाव एक ऐसे समय में हुआ था जब भारत क़े आर्यावर्त और जम्बू द्वीप खंडों में विभिन्न छोटे छोटे राज्य परस्पर संघर्षरत थे और महा साम्राज्यवादी रावण सम्पूर्ण विश्व में एक छत्र वर्चस्व स्थापित करने को लालायित था.जैसाकि पाश्चात्य इतिहासकारों ने कुप्रचारित किया है कि रावण द्रविड़ संस्कृति का वाहक था वह सर्वथा गलत है.वस्तुतः रावण वेदों का प्रकांड पंडित और आर्य संस्कृति का ध्वजा वाहक था और प्रवासी आर्यों का सिरमौर भी इसलिए वह अपने को रक्षस कहता था.रक्ष धातु का अर्थ है रक्षा और रक्षस का अभिप्राय हुआ आर्य सभ्यता और संस्कृत की  रक्षा करने वाला.कालांतर में यही रक्षस अपभ्रंश होकर राक्षस कहा जाने लगा.त्रिवृष्टि(वर्तमान तिब्बत) से आर्ष-आर्य श्रेष्ठ संस्कृति का उद्भव व विकास हुआ और उत्तर भारत में विंध्यांचल तक क़े क्षेत्रों में फ़ैल गयी जिस कारण इस क्षेत्र को आर्यावर्त कहा जाने लगा.दक्षिण भारत का त्रिभुजाकार क्षेत्र जो जम्बू द्वीप कहलाता था समुद्र क़े पटाव से और प्राकृतिक परिवर्तनों क़े आधार पर आर्यावर्त से जुड़ गया और यहाँ भी आर्य संस्कृति का प्रचार एवं विकास हो गया.इस प्रकार सम्पूर्ण भारत को आर्य बनाने क़े बाद आर्य मनीषियों क़े प्रचारक दल विदेशो में भी आर्य सभ्यता और संस्कृति का प्रसार करने हेतु भेजे गये.कामरूप आसाम स्वर्ण देश (बर्मा या म्यांमार ) होते हुए साईबेरिया -अलास्का मार्ग से मय और तक्षक ऋषि क़े नेतृत्व में उत्तर पूर्व से एक दल गया.तक्षक ऋषि ने जहाँ पड़ाव डाला वह स्थान आज भी उनके नाम पर टेक्सास कहलाता है,यहीं पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जान ऍफ़.कैनेडी की ह्त्या की गयी थी. मय ऋषि अपने दल क़े साथ दक्षिण अमरीका क़े उस क्षेत्र में रुके जो आज भी मैक्सिको कहलाता है.पश्चिम क्षेत्र से गये ऋषियों का पहला पड़ाव  आर्यनगर ऐर्यान वर्तमान ईरान था.(ईरान का अपदस्थ शाह तक स्वयं को आर्यमेहर रजा पहलवी लिखा करता था.जो उसके पूर्वजों क़े आर्य होने का संकेत है.)यह दल मैसोपोटामिया (ईराक )होते हुए यूरोप में जर्मन तक पहुंचा.(एडोल्फ हिटलर तो स्वयं को शुद्ध आर्य कहा करता था और यूरोपीय इतिहासकारों ने मध्य एशिया अथवा जर्मन को ही आर्यों का उद्भव प्रदेश बता कर हमारे देश को विकृत इतिहास परोस दिया है) दक्षिण प्रदेश से पुलस्त्य मुनि क़े नेतृत्व में गया आर्य दल उस क्षेत्र में जा पहुंचा जो आज आस्ट्रेलिया कहलाता है.इनके पुत्र विश्र्वा मुनि में राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं जाग उठीं और उन्होंने वहां शासन स्थापित कर लिया.उनके तीन पुत्र थे-कुबेर,रावण,और विभीषण.रावण ने विभीषण को मिलाकर सत्ता पर अधिकार करके कुबेर को भगा दिया जो प्रयाग क़े भारद्वाज मुनि (जो उसके नाना थे)क़े पास पहुंचा.भारद्वाज मुनि ने कुबेर को स्वर्ग लोक  (वर्तमान हिमाचल प्रदेश) का शासक बना दिया.रावण ने व्यापारिक साम्राज्य फैलाते हुए वर्तमान लंका प्रदेश पर अधिकार कर लिया और सत्ता का केंद्र इसे ही बना दिया.(विश्व व्यापार हेतु यह क्षेत्र उत्तम सफलता का है और इसी कारण अमरीका ने डियागोगर्शिया में अपना सैन्य अड्डा कायाम किया है) यहाँ क़े शासक सोमाली को भगा दिया गया जो आस्ट्रेलया क़े पास पड़े उस निर्जन प्रदेश में बस गया जो अब उसी क़े नाम पर सोमाली लैंड कहा जाता है.छः माह क़े लम्बे संघर्ष क़े बाद रावण ने वानर-प्रदेश (आंध्र) क़े शासक बाली से यह फ्रेंडली एलायंस किया कि एक दूसरे पर आक्रमण होने की दशा में वे परस्पर सहयोग करेंगे और उसने दक्षिण भारत से हो कर सीढी बना कर स्वर्ग लोक (हिमाचल) पहुँचने का विचार त्याग दिया,अब रावण ने कुबेर को पकड़ने हेतु कांधार क्षेत्र से आर्यावर्त में घुसने का प्रयास किया और यहाँ भीषण देवासुर संग्राम चले.हमारे आर्य ऋषि मुनियों ने परस्पर संघर्षरत आर्य राज्यों क़े एकीकरण व सहयोग का बीड़ा उठाया और उसमे उन्हें सफलता भी मिली.अयोध्या क़े शासक दशरथ भी इस संग्राम में पहुंचे और कैकेय प्रदेश की राजकुमारी कैकयी से उनका विवाह सम्पन्न कराकर आर्य ऋषियों ने दो आर्य राज्यों को रिश्तों क़े सूत्र में बाँध दिया.जनक मिथिला क़े शासक थे और उनका भी दशरथ से शत्रुत्व था जिसे उनकी पुत्री सीता से दशरथ पुत्र राम का विवाह कराकर दूर किया गया.आर्यावर्त को एकीकरण क़े सूत्र में पिरोकर दक्षिण को भी मिलाने हेतु ऋषि योजना क़े अनुकूल राष्ट्रवादी कैकेयी क़े माध्यम से राम को वनवास दिलाया गया.इस वनवास काल का प्रयोग श्री राम ने जम्बू द्वीप क़े आर्यों को उत्तर भारत क़े आर्यावर्त से जोड़ने का कार्य किया.एक बाधा सिर्फ बाली की रह गयी जिसका रावण से पूर्व में ही फ्रेंडली एलायंस हो चुका था.श्री राम ने कूटनीति (DIPLOMACY) का सहारा ले कर बाली क़े भाई सुग्रीव को अपनी ओर मिलाया और छिपकर बाली का वध कर दिया.(यदि घोषित युद्ध होता तो रावण बाली की मदद को आ जाता और तब संघर्ष भारत भू पर ही होता).सुग्रीव को किष्किन्धा का शासक बना कर उसके विरूद्ध बाली पुत्र अंगद की संभावित बगावत को टालने हेतु बाली की विधवा तारामती (जो सुषेन वैद्य की पुत्री और विदुषी थी) से करा दिया जो की नियोग की वैदिक पद्दति क़े सर्वथा अनुकूल था और देवर से भाभी का विवाह कराकर श्री राम ने कोई अनर्थ नहीं किया था बल्कि आर्य संस्कृति का ही निर्वहन किया था.इसके बाद रावण क़े भाई विभीषण को श्री  हनुमान की मदद से मिलाकर और लंका की फ़ौज व खजाना ध्वस्त करने क़े बाद लंका पर चढ़ाई की.रावण क़े संहार क़े साथ साम्राज्यवाद का उन्मूलन किया और यहाँ भी विभीषण को सत्ता सौपने क़े उपरान्त रावण की विधवा मंदोदरी से विभीषण का विवाह नियोग पद्दति से करा दिया.श्री राम ने एक सफल कूटनीतिक प्रयोग करते  हुए भारत भूमि को साम्राज्यवाद क़े चंगुल से  भी मुक्ति दिलाई तथा सम्पूर्ण भारत का एकीकरण किया इसीलिए आज नौ लाख वर्षों बाद भी वह हमारे देश में पूजनीय हैं,वन्दनीय हैं,स्तुत्य हैं और उनका जीवन अनुकरणीय है.प्रत्येक राष्ट्रवादी को श्री राम का चरित्र अपनाना चाहिए.      





Typed by-Yashwant

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Sunday, December 19, 2010

मानव क्या है ?

                             जब तक जियो ,मौज से जियो.
                            घी पियो,चाहे उधार लेके  पियो..
महर्षि चार्वाक का यह कथन आज क़े मानव ने शतशः अपना लिया है.चारों ओर एक -दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ मची हुई है.हर किसी का धर्म बन चुका है कि,-
                              दुनिया लूटो मक्कर से.
                              रोटी खाओ घी-शक्कर से..
क्या यही मानवता है ?मनुष्य होने का अर्थ क्या मौज -मस्ती ही है ? जी नहीं .यह न तो मानवता है और न ही मनुष्यत्व का यह धर्म है.वस्तुतः जैसा कि,गोस्वामी तुलसीदास जी ने राम चरित मानस में कहा भी है कि -"बड़ भाग मानुष तन पावा " -यह मनुष्य जीवन आत्मा को यों ही नहीं मिल गया है,कुल -खानदान,माता -पिता और उनके जीन्स यों ही नहीं मिला करते हैं बल्कि पूर्वजन्मों क़े संचित शुभ कर्मों क़े आधार पर प्रारब्ध निर्माण हो कर ही यह मनुष्य शरीर मिला करता है.आत्मा स्वंय में चेतन होते हुए भी जड़ शरीर क़े बगैर कुछ नहीं कर सकता.आत्मा और शरीर का सम्बन्ध अन्धे और लंगड़े जैसा है ;एक क़े बगैर दूसरा कार्य नहीं कर सकता .मनुष्य जन्म मोक्ष का द्वार है,यदि  इसमें चूक गये तो फिर अनन्त योनियों क़े चक्र में पुनः फंसना पड़ेगा और कर्मों का भोग भोगना होगा.लेकिन आज मनुष्य तन पाकर लोग अहंकार में भरे पड़े हैं.येन -केन प्रकारेण   पद -पैसा -बुद्धि बटोर कर स्वंय को उच्च और दूसरों को तुच्छ समझने की एक अजीब मानसिकता बन चुकी है.जो लोग स्वंय को उच्च उठाने में नाकामयाब रह जाते हैं,दूसरों को गिराने की युक्तियाँ चलते रहते हैं और इनका सहयोग करते हैं -स्वार्थी पोंगापंथी तथाकथित ज्योतषी,पंडित आदि-आदि.क्योंकि गाँठ क़े पूरे और अक्ल क़े अधूरे लोगों को उलटे उस्तरे से मूढ्ना ऐसे फरेबी  लोगों क़े बाएँ हाथ का खेल होता है,इसलिए आज क़े मार्केटिंग युग में उन्होने दावों की पुष्टि  में गारंटी कार्ड देना शुरू कर दिया है.लोग यह नहीं समझते कि,परमात्मा से ऊपर कोई नहीं है,अतः किसी कार्य को सम्पन्न करने का न तो कोई दावा करना उचित है और न ही गारंटी दी  जा सकती है.फिर सवाल उठता है कि तब ज्योतिष का क्या लाभ ?ज्योतिष मानव जीवन को सुन्दर ,सुखद व समृद्ध बनाने का विज्ञान है.ज्योतिष क़े माध्यम से मनुष्य अपने पूर्व जन्मों क़े संचित कर्म-अकर्म आदि का फल ज्ञात कर सकता है और ग्रह -नक्षत्रों क़े प्रकोप को शांत करा सकता है.इसके लिए परमात्मा से स्तुति,प्रार्थना की जाती है,परमात्मा द्वारा प्रस्तुत वेदों क़े ज्ञान का लाभ उठाते हुए मन्त्रों से हवन में आहुतियाँ देकर ग्रह नक्षत्रों क़े दुष्प्रभाव को कम या समाप्त भी किया जा सकता है.

अग्नि परमात्मा का तथा सभी देवताओं का मुख होती है.अग्नि में  गई आहुति बोले गये मन्त्रों की शक्ति से देवताओं तथा ग्रह -नक्षत्रों तक वायु द्वारा तत्काल पहुंचा डी जाती है.इस प्रकार यदि मनुष्य श्रद्धा और पूर्ण भक्ति भाव से हवन करता हैऔर ज्योतिषी अथवा सुविज्ञ पंडित समुचित विधि-विधान से ग्रह -नक्षत्रों की शांति हेतु निर्धारित मन्त्रों से हवन करता है तो लाभ अवश्य ही मिलता है.परमात्मा इस मनुष्य जीवन की शेष अवधि क़े लिए कष्टों को स्थगित कर देता है और मनुष्य सुख पूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता है.बुद्धि और विवेक का प्रयोग करते हुए मनन करना ही मानव का गुण है और यही मनुष्यत्व है जो धारण करना सिखाता है.
                                         यदि हम अपने कष्टों को शांत करना
                                        चाहते हैं तो हमें दूसरों को कष्ट देने
                                         की प्रवृति को छोड़ना होगा अन्यथा
                                       हम चाहे जितनी प्रार्थनाएं और ढोंग
                                        करें फल कुछ नहीं निकलेगा..

सिर्फ वही ढाक क़े तीन पात रह जायेंगे.जो लोग दूसरों को नीचा दिखाने हेतु अपनी भव्यता का प्रदर्शन करने हेतु ढोंगी -फरेबी लोगों का सहारा लेते हैं ,तात्कालिक रूप से भले ही अपने को लाभान्वित समझें कुल मिलकर अपने कर्मों को बिगाड़ लेते हैं;अपना मानवीय धर्म नष्ट कर लेते हैं और इनके दुष्परिणाम अन्ततः उन्हें भोगने ही पड़ते हैं.इसलिए उत्तम यही है कि,सही निदान किये जाएँ,सही व्यक्ति से संपर्क किया जाये और सिर्फ ऊपर उठने की बात सोची जाये;किसी दूसरे को नीचा दिखाने या /तथा गिराने का न तो प्रयास करना चाहिए और न ही ऐसी दुर्भावना रखनी चाहिए,फिर देखिये कि मनुष्य जीवन कितना सार्थक,कितना सफल रहता है.मनुष्य -मनुष्य में भेद न करना ही मानव धर्म है.यही मानवता है.   

एक विद्वान् का कहना है--

त्याग-तपस्या से पवित्र -परिपुष्ट हुआ जिसका 'तन' है
भद्र भावना -भरा स्नेह -संयुक्त शुद्ध जिसका 'मन' है
होता है नित्य-प्रति पर -हित में,जिसका शुचि संचित 'धन' है
वही श्रेष्ठ -सच्चा 'मानव' है,धन्य उसी का 'जीवन' है 


[टाइप समन्वय-यशवन्त ]


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Thursday, December 16, 2010

सुदेशी और सुराज

डा .टी .एस .दराल सा :,गोदियाल सा :,मनोज कुमारजी ,सलिल वर्माजी, इधर मानवीयता तथा आम जनता क़े हित में एवं व्यवस्था की खामियों पर लिखते रहे हैं.उन्हें पढ़ कर तो लगता ही था परन्तु रंजना जी क़े नवीनतम दो लेखों को पढ़ कर मैंने जो टिप्णी दीं वे इस प्रकार हैं :-

१ .मीठा माने पर -आपने इस व्यंग्यात्मक आलेख क़े माध्यम से बहुत खरा -खरा सच कहा.आज़ाद भारत में अंगरेजी ज्यादा ही फ़ैली है.अपने स्व को भुलाया जा रहा है.आज "सुदेशी और सुराज "आन्दोलन चलाये जाने की महती आवश्यकता है.

२ .अंधेर नगरी पर -"सुदेशी और सुराज "आन्दोलन चलाया जाना अवश्यम्भावी हो गया है.लेकिन अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता .स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि ,यदि मुट्ठी भर लोग मनसा -वाचा -कर्मणा संगठित हो जाएँ तो सारे संसार को उखड फेंक सकते हैं.

गुलामी क़े दौरान महात्मा गांधी जी ने "स्वदेशी और स्वराज्य " आन्दोलन चलाया था ,उस समय लोगों में देश -भक्ति की तीव्र भावना थी.आज हमें स्वतन्त्र हुए ६३ वर्ष हो चुके हैं.जहाँ आज़ादी से पहले हम सुई भी विदेशों से मंगाते थे.आज हमारे यहाँ हवाई जहाज ही नहीं रॉकेट और मिसाईल भी बन रहे हैं,हम विदेशों में कं .खोल रहे हैं .शिक्षा का स्तर पहले से ऊंचा हुआ है."रीढ़ की हड्डी" नाटक क़े रचयिता पूर्व I .C .S .स्व .जगदीश चन्द्र माथुर ने एक स्थान पर लिखा था कि,१९४७ में आज़ादी क़े समय केवल २ प्रतिशत आई.सी .एस .आफीसर्स की पत्नियाँ ही अंग्रेज़ी पढी थीं .आज अंग्रेज़ी का कितना चलन है यह तो रंजना जी क़े आलेखों से स्पष्ट हो ही गया है.एक ओर तो हमने गगन -चुम्बी तरक्की कर ली है ,दूसरी ओर मानवीयता का किता ह्रास हो गया है अन्य विद्वान् ब्लागर्स क़े आलेखों से स्पष्ट है.हमारे कानून हमारे कानूनविदों की राय में सिर्फ अमीरों का हित साधन कर रहे हैं ,गरीब जनता को कानूनों का कोई लाभ नहीं मिल रहा है.कानून गरीब का शोषण और अमीर का पोषण करने वाले सिद्ध हो रहे हैं. एक समय ब्रिटेन में एडमण्ड बर्क क़े नेतृत्व में कानून सुधार आन्दोलन चलाया गया था  और वहां क़े कानून अन्ततः सुधारे गये थे.हमारे देश में भी आज एक तो कानून -सुधार आन्दोलन चलाये जाने की नितांत ज़रुरत है दूसरे जनता क़े सर्वांगीण हित में 'सुदेशी और सुराज" आन्दोलन तत्काल चलाया जाये ऐसी परिस्थितियं बन चुकी हैं.

हमारे एक विद्वान् प्रो .ब्लागर सा :ने किसी ब्लाग पर टिप्णी में लिखा कि,उनकी दिलचस्पी राजनीति में नहीं है और भी ज़्यादातर ब्लागर्स तथा अन्य लोग भी राजनीतिज्ञों की तीखी आलोचना करते हैं.परस्पर संबंधों का ताना -बाना समाज है और मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है -अरस्तू की यह परिभाषा सर्वमान्य है.अरस्तू क़े गुरु सुकरात (प्लूटो )का कहना है कि,मैन इज ए पोलिटिकल बीईंग अर्थात मनुष्य जन्म से ही एक राजनीतिक प्राणी है.पोलिटिक्स शब्द ग्रीक भाषा क़े पोली व ट्रिक्स दो शब्दों क़े मेल से बाना है.विभिन्न तरीके इस शब्द का अर्थ है और निजी ज़िंदगी में सभी लोग विभिन्न समयों पर विभिन्न तरीके अपनाते ही हैं.यानी कि सब राजनीति में लगे ही हैं.फिर देश और जनता क़े प्रति ज़िम्मेदारी से बचना क्यों ? अच्छे लोग घर बैठते हैं तभी तो गलत लोग शासन में पहुँच जाते हैं.ज़रुरत है अच्छे लोगों को आगे बढ़ कर सत्ता अपने हाथ में लेने की.सुदेशी  और सुराज का संकल्प ले कर हमें सुधारात्मक आन्दोलन छेड़ देना चाहिए -जनता तो स्वतः पीछे -पीछे समर्थन को चल पड़ेगी.यदि मन ,वचन और कर्म से एकजुट हो कर थोड़े से लोग ही पहल कर देंगें तो कारवां जुटते  देर नहीं लगेगी.केवल ८० छात्रों ने जनरल द गाल की तानाशाही को उखाड़ फेंका था.तुफैल अहमद ने ढाका क़े छात्रों को एकजुट कर मुजीब क़े पीछे खड़ा कर दिया और याह्या की तानाशाही से आजाद होकर बांगला देश बना.

नया वर्ष दरवाज़े पर खड़ा है.आने वाले समय में कुछ लोग आगे आ कर सुदेशी और सुराज की नयी आवाज़ लगायें तो यह आन्दोलन स्वतः -स्फूर्त फैलते देर नहीं लगेगी.देर है तो सिर्फ पहल की,मैं तो लगातार सड़ी -गली मान्यताओं और व्यवस्था क़े विरुद्ध "क्रन्तिस्वर "  बुलंद कर ही रहा हूँ आप सब का सहयोग और समर्थन मिल जाये तो परिवर्तन भी संभव है.




[टाइप समन्वय-यशवन्त ]


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Thursday, December 9, 2010

अच्छे विचारों से दिमाग तनावमुक्त होता है

प्रार्थनाएं ,हमेशा मदद करती हैं.बारबार की जाने वाली प्रार्थनाएं बार बार मदद करती हैं.आप "ॐ "या "एक 'कह सकते हैं और अपने खाली दिमाग में हजारों विचारों पर ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं.उसके बाद आप जो कार्य उस समय करना चाहते हैं,उस पर ध्यान केन्द्रित करने में आपको मदद मिलेगी और ये आपके दिमाग को भी हल्का -फुल्का और शान्त रखेगी.मैं आपके साथ अपनी एक क्षण की प्रार्थना बांटना चाहता हूँ.

मैं इसे बहुत जोर से नहीं परन्तु धीरे -धीरे अपने आप से कहता हूँ .'हे भगवान् ,जो मुझे चाहिए वो सब मेरे पास है.इसके लिए आपका धन्यवाद .जो मेरे पास नहीं है ,वो मुझे नहीं चाहिए.मेरे कहने का त्तात्पर्य है कृपया मुझे सेहत,समझदारी ,हौसला और सेवा करने की योग्यता प्रदान कीजिये और यह मेरे नज़दीकी प्रियजनों क़े लिए भी कीजिये.मैं अपने दिमाग में हमेशा अच्छे विचार ही रखना चाहता हूँ.ऐसे विचार खुशी और तनाव रहित होने क़े सही साधन हैं.

मैं जानता हूँ कि,मुझे कुछ पाने से पहले योग्य बनना है.मैं यह भी जानता हूँ कि  मुझे जो चाहिए उसके लिए कार्य करना पड़ता है.यहाँ मुफ्त में कुछ नहीं मिलता.मैं उन लोगों को जानता हूँ जो 15 से 90   मिनिट तक अपना समय प्रार्थना और धर्म -कर्म में लगते हैं,वे माला क़े मनके फेरते हैं;मगर कबीर दास जी क़े अनुसार -                       
                                               
                                                   माला फेरत जुग भया,फिरा न मनका फेर.
कर का मनका डार क़े,मन का मनका फेर..

यह उनके लिए बहुत अच्छा होगा अगर वे "तनाव और गुस्से "को कम करने क़े योग्य हो जाएं.
मैंने यह भी ध्यान दिया कि यह ढंग (ढोंग -पाखण्ड वाला ) कुछ ख़ास मामलों में लागू नहीं होता.मैं जो समय लम्बी प्रार्थनाएं नहीं करके बचाता हूँ उसे "जो मुझे चाहिए "वह प्राप्त करने क़े लिए सोचने पर लगता हूँ.मैं हमेशा अपने दिमाग में परमात्मा प्रदत्त आशीर्वादों को गिन कर अपनी आंतरिक मुस्कराहट पर बल देता हूँ.

अगर मुझे ओपन हार्ट सर्जरी क़े लिए भी जाना पड़ेगा तो मैं अपने तनाव को कम करने क़े लिए ईश्वर क़े आशीर्वादों को गिनूंगा.मेरे लिए यह तरकीब काम करती है.विचार अच्छी चीजें कहने क़े लिए हैं.यह तनाव कम करने में मदद करते हैं.दिन में अक्सर कई बार मैं,परमात्मा द्वारा प्रदत्त आशीषों को गिनता हूँ.उदाहरण क़े लिए मैं कई बार अपने आप भगवान् का धन्यवाद करके खुश होता हूँ कि मुझे दिल का आपरेशन नहीं कराना पड़ा और मुझे करवाना भी पड़ता तो भी मैं भगवान्  का ध्यान करूंगा क्योंकि मुझे शुगर नहीं है.यह एक परिदृश्य है.आप भी अपनी स्थिति से सम्बंधित दूसरे परिदृश्यों की कल्पना कर सकते हैं.

विचार यह है कि,आपको तब भी तनावमुक्त होना है जब दिल की सर्जरी कराने जा रहे हैं.चिंतित मत होइए .........खुश रहिए.अब क्या यह सामान्य ज्ञान नहीं है ?
अगर हमारे पास अच्छा स्वास्थ्य ,अधिक खाने को और रहने को एक घर है तो क्या हम फिर भी तनावग्रस्त होंगें ?दुर्भाग्य से हम फिर भी होंगें.अपने पूर्व जनम क़े कर्मफल क़े आधार पर जब मुझे हल्का हार्ट पेन हुआ तो मैंने अपनी सम्पूर्ण जानकारी का भरपूर उपयोग करके चिकित्सकों से अपने को बचाए रखा.मैंने सिर्फ ये उपाए ही किये थे और पूर्ण स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर लिया.:-

१ .काली फास ६ एक्स का ४ T .D .S .सेवन किया.और -
२ .ॐ भू ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ तत्सवितुर्व्रेनियम भर्गो देवस्य धीमही .ॐ धियो यो न प्रचोदयात ..

इस मन्त्र का १०८ बार जाप जिसे करने में डेढ़ घंटे का समय लग जाता था ही केवल किया.सिर्फ ॐ शब्द का उच्चारण जोर से करते थे क्योंकि ॐ क़े उच्चारण से नाभी जो शरीर का केंद्र -बिंदु है की कसरत या वर्जिश हो जाती है जिससे शरीर में रक्त संवहन सुचारू रूप से होने लगता है. हमारे प्राचीन ऋषी -मुनियों ने बड़ी होश्यारी से ॐ शब्द को परमात्मा का मुख्य नाम घोषित किया था ताकि मनुष्य मात्र इसके उच्चारण से अपने शरीर को पूर्ण स्वस्थ रख सकें.यह शब्द आपको तनावमुक्त रखने में पूर्ण सहायक है.   










(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

Monday, December 6, 2010

श्रद्धा,विश्वास और ज्योतिष

यह कौतूहल का विषय हो सकता है कि, जब ज्योतिष विज्ञान है और इसके द्वारा निरूपित सिद्धांत खगोलीय गणनाओं पर आधारित होते हैं तो श्रद्धा और विश्वास का क्या मतलब ? जब  ज्योतिष की गणनाओं क़े माध्यम से किसी समस्या की तह तक पहुँच जाते हैं,तब उसके समाधान हेतु अपनाई जाने वाली प्रक्रिया यदि श्रद्धा व विश्वास से रहित की जाती है तो निरर्थक रह जाती है.इस प्रकार ज्योतिषीय आंकलन को ही संदेह क़े घेरे में ले लिया जाता है. हाई स्कूल में पढी इंग्लिश की एक कहानी का ज़िक्र करना प्रासंगिक रहेगा.उस कहानी क़े अनुसार एक बार सूखे से त्रस्त जनता ने चर्च में बारिश क़े लिए प्रार्थना करने का निर्णय लिया. एक छोटा बच्चा छाता लेकर गया जबकि बाक़ी लोग बिना छाते क़े गाए थे ,लोगों ने उस बच्चे से छाता साथ ले जाने का कारण पूछा -बच्चे ने सहज भाव से उत्तर दिया -"हमारी प्रार्थना सुन कर भगवान् (GOD) बारिश करेंगे तो उससे बचने क़े लिए ही  छाता ले जा रहा हूँ .अधिकाँश लोग बच्चे की बुद्धि पर हँस दिए.पर बच्चा अडिग रहा और छाता साथ लेकर ही गया .चर्च में प्रार्थना समाप्त कर वापिस चलते ही मूसलाधार बारिश हुयी और उस छोटे बच्चे को छोड़ कर सभी लोग बारिश में भीगते हुए ही घर लौटे.ज़ाहिर सी बात है कि,लोग प्रार्थना करने तो गये थे परन्तु न तो उन्हें भगवान् पर श्रद्धा थी और न ही विश्वास कि ,उनकी प्रार्थना से बारिश होगी ही,परिणामस्वरूप सभी को भीगना पड़ा जबकि वह छोटा बच्चा श्रद्धा व विश्वास क़े कारण ही वर्षा से अपना बचाव कर सका.

व्यक्ति क़े जन्मकालीन ग्रह नक्षत्रों की गणना पर आधारित महादशा व अन्तर्दशा तथा गोचर -ग्रहों क़े चलन क़े आधार पर उस कारण को ज्ञात करके कि ,कोई समस्या या कष्ट क्यों है ? उसका समाधान बताया जाता है.व्यवहार में आजकल अधिकाँश ज्योतिषी जो उपाय बताते हैं,वे शुद्ध आस्था का प्रतीक हैं और उनका न तो कोई वैज्ञानिक महत्त्व है न ही तर्क .उदाहरणस्वरूप शनि से पीड़ित व्यक्ति द्वारा शनि की प्रतिमा पर तिल  व तेल चढ़ाना अथवा पीपल वृक्ष  की जड़ में तेल का दीपक जलवाना आदि.इस पद्धति से जो भी लाभ प्राप्त होता है ,वह विशुद्ध मनोवैज्ञानिक़ आस्था का परिणाम होता है.

परन्तु इसका वैज्ञानिक समाधान भी है,जैसे शनि मन्त्र क़े सस्वर उच्चारण क़े साथ हवन सामग्री में कला तिल मिलाकर आहुतियाँ देना.इस पूर्ण वैज्ञानिक पद्धति में भी श्रद्धा व विश्वास का होना अत्यंत महत्वपूर्ण है.ग्रह शान्ति हेतु हवन करने पर अग्नि द्वारा डाले गये पदार्थों को परमाणुओं में विभक्त कर दिया जाता है और वायु द्वारा उन परमाणुओं क़े ५० प्रतिशत भाग को नासिका क़े माध्यम से हवन पर बैठे लोगों क़े रक्त में सीधे घुलनशील कर दिया जाता है.५० प्रतिशत भाग वायु द्वारा (बोले गये मन्त्रों की शक्ति से )सम्बंधित ग्रह लोक तक पहुंचा दिया जाता है और इस प्रकार उस ग्रह क़े प्रकोप से उस व्यक्ति -विशेष को राहत मिल जाती है.अब यदि मन्त्रोच्चारण अथवा आहुतियाँ श्रद्धा व विश्वास क़े साथ नहीं दी गई हैं तो वांछित -अनुकूल परिणाम नहीं मिल सकेगा.जिस प्रकार फोन का नं .डायल करने में जरा सी चूक क़े कारण सही नं .नहीं लग पाता है.उसी प्रकार मन्त्रोच्चारण व आहुतियों में की गई चूक सम्बंधित ग्रह तक संवाद स्थापित करने में विफल रहती है.व्यक्ति को इसे अपनी श्रद्धा व विश्वास में कमी क़े रूप में नहीं लेकर ज्योतिष विज्ञान की कमी या विफलता मानता है जो ज्योतिष - क्षेत्र की एक विकट त्रासदी ही है.कुछ उदाहरणों  से आपको स्पष्ट हो जाएगा कि किस प्रकार श्रद्धा व विश्वास -पूर्वक किये गये उपायों द्वारा लोगों ने भरपूर लाभ उठाया है.

लगभग नौ वर्ष पूर्व आगरा में जी .जी .आई .सी.की एक शिक्षिका अपनी एक रिश्तेदार क़े माध्यम से मेरे पास आईं
और टूटने की कगार पर पहुँच चुकी अपनी गृहस्थी का समाधान चाहा. मुझसे पूर्व वह कई स्थापित व विख्यात ज्योतिषियों से मिल चुकी थीं जिन्होंने काफी खर्चीले उपाए बताये थे.एक ने तो २२ हज़ार कीमत क़े रत्न जड्वाकर पहनने को कहा था.परन्तु उन सबसे उक्त शिक्षिका महोदय को निराशा ही हाथ लगी.मेरे द्वारा उन्हें मात्र कुछ मन्त्र पाठ करने को दिए गये व हवन करने को कहा गया.मात्र सप्ताह भर क़े प्रयोग से उन्हें काफी लाभ हुआ और न केवल उनकी गृहस्थी सानन्द चल रही है बल्कि उसके बाद उन्हें एक और कन्या रत्न की प्राप्ति भी हुई है.कम खर्च में सटीक लाभ उन शिक्षिका द्वारा श्रद्धा व विश्वास क़े साथ मन्त्रों का पाठ करने से ही संभव हो सका.हमारे बताये उपायों को अपनाने से उन्हें एक और भी लाभ यह हुआ कि वह पहले एक मकान खरीदने फिर उसके बाद दूसरा मकान बनवाने में कामयाब रहीं.दोनों मकानों का गृह-प्रवेश   हवन  उन्होंने मुझसे ही करवाए. मेरे आगरा छोड़ने क़े छः  माह बाद उन्होंने फोन पर सूचित किया कि अब उन्होंने कार भी ले ली है. उनके पति जो एक मल्टीनेशनल कं .में जू .एकाउंटेन्ट हैं भी मेरे पास अपने भाई -बहनों की समस्याएँ लेकर आते रहते थे.यदि उन लोगों ने नियमतः पालन किया तो निश्चित रूप से लाभ भी उन्हीं लोगों को हुआ .मुझे भी संतोष रहा कि मेरी सलाह कामयाब रही.
दूसरा उदाहरण एक ऐसे शिक्षक महोदय का है जिनका सम्प्रदाय ज्योतिष को मान्यता नहीं देता है.उन्हें समस्या -समाधान हेतु जो पाठ दिए गये थे ,उन्होंने आधे -अधूरे ढंग से और बेमन से किये.परिणामस्वरूप उन्हें लाभ भी अधूरा ही मिल पाया. लगभग ८ वर्ष पूर्व पुत्र -वधु को लेकर लौटती बरात में दूल्हा -दुल्हन क़े वाहन में सामने से टक्कर लगी;वाहन का काँच टूट गया.परन्तु किसी सवारी को खरोंच भी न लगने से उन्हें मन्त्रों पर पूर्ण विश्वास हो गया. वर्ष २००३  क़े प्रारम्भ में उन्होंने हवन क़े माध्यम से अपने पुत्र क़े ग्रहों की हल्की शान्ति करा ली थी,जिसका सुपरिणाम भी उन्हें उसी अनुरूप मिला.३१ मार्च २००३ को उनके पौत्र का जन्म हुआ ,यह प्रीमैच्योर डिलीवरी थी.यदि उस दिन चार घंटे बाद बच्चे का जन्म होता तो वह शनि की ढैय्या क़े प्रभाव में होता. उक्त शिक्षक महोदय द्वारा २६ .१ .२००३ को ही श्रद्धा व विश्वास पूर्वक हवन क़े माध्यम से ग्रहों की शान्ति करने का परिणाम सुखद रहा.

कुछ लोग उपाय तो करते हैं ,परन्तु अस्थिर चित्त से और बगैर पूर्ण श्रद्धा क़े उन्हें समुचित अनुकूल परिणाम भी नहीं मिल पाते.एक प्रख्यात ज्योतिर्विद ने अपने गुरु (अवकाश प्राप्त शिक्षक )की पुत्री क़े विवाह हेतु ऐसे उपाए बताये जिनका कुल खर्च २५ /२६ हज़ार रु .आता था ,जिसे करने में वह असमर्थ थे.परन्तु मेरे बताये पूर्ण वैज्ञानिक हवन -पद्धति द्वारा उपाए करने में उन्हें विश्वास नहीं था.अतः वह मेरे ज्योतिषीय सुझावों का कोई लाभ न उठा सके.उनकी पुत्री को विलम्ब से विवाह क़े अतिरिक्त सुसराल में भी परेशानी का ही सामना करना पड़ा -पोंगा पंडितों क़े चक्कर में पड़ कर.
आगरा क़े एक प्रख्यात चिकित्सक की पुत्री क़े विवाह हेतु भी अन्य जानकारों ने सोलह हज़ार का खर्च वाला नुस्खा बताया था,जिसे शायद वह करते भी.परन्तु मेरे द्वारा तार्किक उपायों की जानकारी दिए जाने पर कम खर्च क़े उपाए उन्होंने पूर्ण श्रद्धा व विश्वास से किये और अब उनकी पुत्री का विवाह हुए ८ वर्ष हो चुके हैं.
                      श्रद्धा व विश्वास का अभाव
श्रद्धा और विश्वास का अभाव हो तथा ज्योतिष पर पूर्ण आस्था भी न हो तब ऐसे लोग किस गति को प्राप्त करते हैं;मात्र दो -तीन उदाहरणों से सिद्ध हो जायेगा.सतीश चन्द्र शर्मा ने अपने गृह क़े S . W . में हैण्ड -पम्प लगवा लिया ,उत्तर दिशा में रसोई पहले से थी ही.परिणामस्वरूप शराब का व्यय अत्यधिक बढ़ गया,उसकी पत्नी व बेटा उसे अकेला छोड़ कर भाग गये.यह क्षेत्र रहू -केतु का होता है और यहाँ कूप आदि बनवाने का दुष्परिणाम गृह -स्वामी या उसके ज्येष्ठ पुत्र की मृत्यु क़े रूप में ही सामने आता है.१९९६ में दशहरे पर किडनी बर्स्ट से उसकी मृत्यु हो गई.

वेदप्रकाश गुप्ता ने अपने मकान में स्वंय आने क़े बाद दो गलत निर्माण करवा डाले.एक तो ईशान में सीढ़ियों का निर्माण ,दूसरा द.प .में दुकान का खोलना.परिणाम यह रहा कि,इस व्यक्ति का दिवाला पिट  गया और इसे मकान बेचना और अन्यत्र जाना पड़ा.इसके उत्तरवर्ती ने भी मकान तोड़ कर दो गलत निर्माण करा डाले. एक तो रसोई उत्तर दिशा में स्थानांतरित करा ली और दूसरे पूर्व दिशा को पश्चिम से ऊंचा करा लिया.फलतः इनके व्यापार में भी कर्मचारियों द्वारा चोरी व लूट की घटनाएं होते -होते साझीदार से अलगाव हो गया.अब इन्होने तेल में मिलावाट बड़े पैमाने पर शुरू की जिस पर डा .बी .पी .अशोक (एस .पी .सिटी ) ने अपने आगरा कार्यकाल क़े दौरान इनकी फर्म पर छापा डाल कर फर्म स्वामी और उसके पिता को गिरफ्तार कर लिया.ले -देकर छूट तो गये पर मुकदमे  में
फंस गये.

अवकाश प्राप्त इ .विनोद बाबू शर्मा ने ऊपरी मंजिल क़े ईशान में रसोई बना दी और उत्तर दिशा बंद करा दी.परिणामस्वरूप उनके पहले किरायेदार व तीसरे किरायेदार क़े पुत्र की मृत्यु हो गई.दूसरे तथा चौथे किरायेदार दिवालिया हो गये.कई साल मकान खाली रहा -कौन जान -बूझ कर मौत को गले लगाना चाहता है?
ये वे लोग हैं जो एक ओर तो अल्ट्रामाडर्न हैं -धनाढ्य हैं और दूसरी ओर पोंगा -पंथी ,दकियानूसीवाद क़े अनुयायी हैं.इनके लिए ज्योतिष क़े वैज्ञानिक सिद्धांतों में विश्वास करना संभव नहीं है.पोंगापंथी इन्हें उलटे उस्तरे से मूढ़ते  रहते हैं और वे उसी में प्रसन्न  भी रहते हैं.

सुख -दुःख जीवन में यदि सुख आते हैं तो दुःख भी आते है. दुःख आने पर घबराना नहीं चाहिए.ऐसी स्थिति में ज्योतिष आपको वैज्ञानिक कारण व उपाए बताने में सक्षम है ,उनका पालन करके तथा परमात्मा से प्रार्थना करके दुखों को समाप्त अथवा कम तो अवश्य ही किया जा सकता है.श्रद्धा व विश्वास पूर्वक की गई प्रार्थना परमात्मा सुनता है और पीड़ित को प्रकोप से मुक्ति मिल जाती है अतः ज्योतिष का श्रद्धा व विश्वास क़े साथ अभिन्न सम्बन्ध है और विवेकी व्यक्ति इसका भर -पूर लाभ भी उठाते हैं . क्या आप भी उनमें से एक हैं ?

Saturday, December 4, 2010

ज्योतिष और अंधविश्वास

पिछले कई अंकों में आपने जाना कि,ज्योतिष व्यक्ति क़े जन्मकालीन ग्रह -नक्षत्रों क़े आधार पर भविष्य कथन करने वाला विज्ञान है और यह कि ज्योतिष कर्मवादी बनाता  है -भाग्यवादी नहीं. इस अंक में आप जानेंगे कि ,अंधविश्वास ,ढोंग व पाखण्ड का ज्योतिष से कोई सरोकार नहीं है.

कुछ निहित स्वार्थी तत्वों ने ज्योतिष -विज्ञान का दुरूपयोग करते हुए इसे जनता को उलटे उस्तरे से मूढ्ने का साधन बना डाला है.वे लोग भोले -भले एवं धर्म -भीरू लोगों को गुमराह करके उनका मनोवैज्ञानिक ढंग से दोहन करते हैं और उन्हें भटका देते हैं.इस प्रकार पीड़ित व्यक्ति ज्योतिष को अंधविश्वास मानने लगता है और इससे घृणा करनी शुरू कर देता है.ज्योतिष -ज्ञान क़े आधार पर होने वाले लाभों से वंचित रह कर ऐसा प्राणी घोर भाग्यवादी बन जाता है और कर्म विहीन रह कर भगवान् को कोसता रहता है.कभी -कभी कुछ लोग ऐसे गलत लोगों क़े चक्रव्यूह में फंस जाते हैं जिनके लिए ज्योतिष गम्भीर विषय न हो कर लोगों को मूढ्ने का साधन मात्र होता है.इसी प्रकार कुछ कर्मकांडी भी कभी -कभी ज्योतिष में दखल देते हुए लोगों को ठग लेते हैं.साधारण जनता एक ज्योतषीऔर ढोंगी कर्मकांडी में विभेद नहीं करती और दोनों को एक ही पलड़े पर रख देती है .इससे ज्योतिष विद्या क़े प्रति अनास्था और अश्रद्धा उत्पन्न होती है और गलतफहमी में लोग ज्योतिष को अंध -विश्वास फ़ैलाने का हथियार मान बैठते हैं .जब कि सच्चाई इसके विपरीत है.मानव जीवन को सुन्दर,सुखद और समृद्ध बनाना ही वस्तुतः ज्योतिष का अभीष्ट है

७ वर्ष पूर्व २००३ ई .क़े नवरात्रों में एक ढोंगी व पाखंडी कर्मकांडी द्वारा कमला नगर ,आगरा निवासी एक व्यवसायी की माता की निर्मम हत्या व लूट -पाट तथा उसकी पत्नी को घायल कर दिया गया.पुलिस प्रशासन द्वारा पाखंडी को बचाने हेतु नाटक रचा गया और पीड़ित परिवार का चरित्र हनन किया गया.इस हरकत की जनता में उग्र प्रतिक्रिया हुई .फलस्वरूप दो पुलिस अधिकारियों को निलंबित होना पड़ा.इतने वीभत्स और कारुणिक काण्ड पर एक प्रतिष्ठित मिशनरी विद्द्यालय क़े प्रतिष्ठित शिक्षक की प्रतिक्रिया थी कि,उस कर्मकांडी क़े बयान में कुछ सच्चाई है और कि पुलिस अधिकारी निष्पक्ष व ईमानदार हैं.क्या आप जानना चाहेंगे कि,एक तथा -कथित सभ्रांत शिक्षक क़े ऐसे उदगार क्यों हैं ?नितांत आर्थिक आधार.अतीत में कभी पीड़ित परिवार का कोई बच्चा उक्त शिक्षक से पंद्रह दिन ट्यूशन पढ़ा था और बाद में उनका पारिश्रमिक भुगतान इसलिए नहीं किया गया था कि,उस बच्चे पर कोई तवज्जो नहीं दी गई थी .बस इतने मात्र से उक्त पीडिता को दोषी कहने में इन शिक्क्षक महोदय ने कोई संकोच नहीं किया .
आइये ,इन शिक्षक महोदय की ऐसी सोच का ज्योतिषीय विश्लेषण करें.यह शिक्षक एक ऐसे सम्प्रदाय (गायत्री परिवार )क़े अनुयायी हैं जो ज्योतिष को अन्धविश्वासी मानता है और इसी कारण इन महोदय ने अपने आवास पर इस प्रकार निर्माण -परिवर्तन कराया है जो ज्योतिष और वास्तु क़े विपरीत है.वास्तु ज्योतिष का ही एक अंग है और ग्रह नक्षत्रों की स्थिति क़े आधार पर गृह -निर्माण की विधि बताता है.संदर्भित शिक्षक महोदय ने अपने आवास क़े ईशान में दोनों मंजिलों पर शौचालय निर्मित करा लिए;उत्तर दिशा में रसोई स्थानांतरित कर ली ,जो कि वास्तु -शास्त्र क़े अनुसार (दोनों कृत्य) बुद्धि -विपर्याय क़े सूचक हैं.ईशान दिशा बृहस्पति का क्षेत्र है जो कि ज्ञान -विज्ञान ,बुद्धि -प्रदाता ग्रह है.इस क्षेत्र को नियमानुसार खाली या हल्का रखते हैं अथवा पूजा -स्थल का वहां निर्माण कराते हैं.जिससे  बुद्धि व ज्ञान का संचार सुचारू रूप से होता रहे.प्रस्तुत उदाहरण में शिक्षक महोदय ने ज्ञान क़े देवता को (शौचालय निर्मित कर ) मल -मूत्र से आवृत करके अपनी बुद्धि पर कुठाराघात कर लिया और इस अंध विश्वास से ग्रस्त हैं कि ,ज्योतिष ही अंध विश्वास का वाहक है.इस निर्माण कार्य को ७ वर्ष पूर्ण हो चुके हैं और वहां बुद्धि -विभ्रम का बहुत कुछ खेल हो चुका है (जिसका वर्णन वास्तु दोष एक प्रेक्टिकल उदाहरण में भी हुआ है और "श्रधा ,विश्वास और ज्योतिष "में भी आगे होगा ).

अब आइये ,इन्हीं की तर्ज़ पर हू -ब -हू निर्मित एक पुलिस अधिकारी क़े आवास से इस वास्तु दोष को समझते हैं,जिनके निर्माण काल को अब ११ वर्ष पूर्ण हो चुके हैं और उस भवन क़े निवासियों पर समस्त वास्तु दोष सिर पर चढ़ कर बोल रहे हैं.उत्तर की रसोई और ईशान क़े दोनों मंजिलों वाले शौचालय युक्त आवास क़े निवासी पुलिस अधिकारी पब्लिक में तो सौम्य व विनम्र अधिकारी क़े रूप में जाने जाते हैं (अब रिटायर्ड ),परन्तु घर में अब उनका नियंत्रण समाप्त हो गया है.उनके बेटे -बेटियां पिता को कुछ समझते ही नहीं हैं और कहते हैं कि ,पुलिसिया डंडा घर में नहीं चलेगा. इनकी पत्नी इन्हें देखते ही गुर्राने लगती हैं.अधिकारी महोदय भी अपनी शिक्षिका पत्नी को कुछ महत्त्व नहीं देते हैं.फलतः इनका घर भानुमती का कुनबा बनकर रह गया है. इस ईशान -दोष ने बेटे -बेटियों क़े विवाह में अनावश्यक बाधाएं खडी कीं (गुण मिल जाने क़े बावजूद लड़के वाले बाद में बिदक जाते थे और कभी इन्ही क़े किसी रिश्तेदार की बेटी से विवाह करके इन अधिकारी महोदय को धोखा खिला देते थे;उपाए करने क़े बाद ही उन बच्चों का विवाह हो सका ).यही नहीं ,इस ईशान -दोष ने अधिकारी महोदय को रक्त -चाप का मरीज़ बना कर रख दिया है.घर में घुसते ही यह चिडचिडे बन जाते हैं.इनकी शिक्षिका पत्नी को गठिया रोग ने घेर लिया है और अब घर क़े कार्यों से भी लाचार हो गई हैं और पुत्रियों फिर बहुओं पर निर्भर होकर रह गई हैं.इस परिवार की बुद्धि इतनी विकृत हो गई है कि,किसी भी प्रकार का उपचार व निराकरण भी सम्यक रूप से करने को कोई तैयार नहीं है और अपनी अकर्मण्यता को छिपाने हेतु भगवान् की मर्जी को ढाल बना लेते हैं.

"अंधविश्वास "से ग्रस्त लोग ज्योतिष और वास्तु को ठुकरा कर किस प्रकार अपना अहित कर लेते हैं,इसका एक और उदाहरण उक्त शिक्षक महोदय क़े सलाहकारों पर एक नज़र डालने से मिल जाएगा .इनके एक सलाहकार बचपन क़े सहपाठी और अब दूरसंचार अधिकारी कहते हैं कि,आज विज्ञान क़े युग में ज्योतिष को केवल मूर्ख -लोग ही मानते हैं.(उन्हीं महोदय को अपनी पुत्री नीलम क़े विवाह की अडचने दूर करने हेतु मेरा परामर्श मानने पर मजबूर होना पड़ा और समुचित उपाय  करने क़े बाद ही उसका विवाह सम्पन्न हो सका ).इनके दूसरे सलाहकार चुनावों में परास्त एक छुट -भैय्ये नेता का कहना है-भाग्य में जो होना है वह हो कर रहता है और ज्योतिष का कोई लाभ नहीं है.उनके अपने निवास में जो वास्तु दोष हैं उनका उपचार वह करना नहीं चाहते और बेटे -बेटियों की बढ़ती उम्र क़े बावजूद शादी न होने से हताश हैं और  भगवान् को कोसते रहते हैं. "ऐसे  अन्धविश्वासी लोगों क़े लिए बस यही कहा जा सकता है -जो होना है ,सो होना है.फिर  किस बात का रोना है.."

ज्योतिष को अंधविश्वास का प्रतीक मानने वाली एक महिला राजनेता का रसोई घर तो पहले से ही द.-प .(S .W .)में था जो कलह की जड़ था ही;अब उसी क्षेत्र में नल -कूप भी लगवा लिया है.परिणामस्वरूप पहली छमाही  क़े भीतर ही ज्येष्ठ पुत्र को आपरेशन का शिकार होना पड़ गया.

इसी प्रकार कान्वेंट शिक्षा प्राप्त लोग प्रतीक चिन्हों का उपहास उड़ाते हैं जबकि छोटा सा चिन्ह भी गूढ़ वैज्ञानिक रहस्यों को समेटे हुए है.उदाहरण स्वरूप इस स्वास्तिक चिन्ह को देखें और इस मन्त्र का अवलोकन करें :-
            (कृपया स्कैन को इनलार्ज कर पढ़ें इसी आलेख का भाग है )


१ .चित्रा-२७ नक्षत्रों में मध्यवर्ती तारा है जिसका स्वामी इंद्र है ,वही इस मन्त्र में प्रथम निर्दिष्ट है.
२ .रेवती -चित्रा क़े ठीक अर्ध समानांतर १८० डिग्री पर स्थित है जिसका देवता पूषा है.नक्षत्र विभाग में अंतिम नक्षत्र होने    क़े कारण इसे मन्त्र में विश्ववेदाः (सर्वज्ञान युक्त )कहा गया है.
३ .श्रवण -मध्य से प्रायः चतुर्थांश ९० डिग्री की दूरी पर तीन ताराओं से युक्त है.इसे इस मन्त्र में तार्क्ष्य (गरुण )है.
४ .पुष्य -इसके अर्धांतर पर तथा रेवती से चतुर्थांश ९० डिग्री की दूरी पर पुष्य नक्षत्र है जिसका स्वामी बृहस्पति है जो मन्त्र क़े पाद में निर्दिष्ट हुआ है.

इस प्रकार हम देखते हैं कि धार्मिक अनुष्ठानों में स्वास्तिक निर्माण व स्वस्ति मन्त्र का वाचन पूर्णतयः ज्योतिष -सम्मत है.धर्म का अर्थ ही धारण करना है अर्थात ज्ञान को धारण करने वाली प्रक्रिया ही धर्म है.इस छोटे से स्वस्ति -चिन्ह और छोटे से मन्त्र द्वारा सम्पूर्ण खगोल का खाका खींच दिया जाता है.  अब  जो लोग इन्हें अंधविश्वास कह कर इनका उपहास उड़ाते हैं वस्तुतः वे स्वंय ही अन्धविश्वासी लोग ही हैं जो ज्ञान (Knowledge ) को धारण नहीं करना चाहते.अविवेकी मनुष्य इस संसार में आकर स्वम्यवाद अर्थात अहंकार से ग्रस्त हो जाते हैं.अपने पूर्व -संचित संस्कारों अर्थात प्रारब्ध में मिले कर्मों क़े फलस्वरूप जो प्रगति प्राप्त कर लेते हैं उसे भाग्य का फल मान कर भाग्यवादी बन जाते हैं और अपने भाग्य क़े अहंकार से ग्रसित हो कर अंधविश्वास पाल लेते हैं.उन्हें यह अंधविश्वास हो जाता है कि वह जो कुछ हैं अपने भाग्य क़े बलबूते हैं और उन्हें अब किसी ज्ञान को धारण करने की आवश्यकता नहीं है.जबकि यह संसार एक पाठशाला है और यहाँ निरंतर ज्ञान की शिक्षा चलती ही रहती है.जो विपत्ति का सामना करके आगे बढ़ जाते हैं ,वे एक न एक दिन सफलता का वरन कर ही लेते हैं.जो अहंकार से ग्रसित होकर ज्ञान को ठुकरा देते हैं,अन्धविश्वासी रह जाते हैं.ज्योतिष वह विज्ञान है जो मनुष्य क़े अंधविश्वास रूपी अन्धकार का हरण करके ज्ञान का प्रकाश करता है.

शक  ओ  शुबहा -अब सवाल उस संदेह का है जो विद्व जन व्यक्त करते हैं ,उसके लिए वे स्वंय ज़िम्मेदार हैं कि वे अज्ञानी और ठग व लुटेरों क़े पास जाते ही क्यों हैं ? क्यों नहीं वे शुद्ध -वैज्ञानिक आधार पर चलने वाले ज्योत्षी से सम्पर्क करते? याद रखें ज्योतिष -कर्मकांड नहीं है,अतः कर्मकांडी से ज्योतिष संबंधी सलाह लेते ही क्यों है ? जो स्वंय भटकते हैं ,उन्हें ज्योतिष -विज्ञान की आलोचना करने का किसी भी प्रकार हक नहीं है. ज्योतिष भाग्य पर नहीं कर्म और केवल कर्म पर ही आधारित शास्त्र है.  





(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

Thursday, December 2, 2010

डा.राजेन्द्र प्रसाद की जन्म कुंडली- (03दिसंबर जयंती पर विशेष)


भारत क़े प्रथम राष्ट्रपति डा.राजेन्द्र प्रसाद की जयंती प्रतिवर्ष ०३ दिसंबर को धूम धाम से मनाई जाती है.आइये देखें इतनी विलक्षण क्षमता प्राप्त कर क़े वह कैसे इतना ऊपर उठ सके.


उनकी जन्म कुंडली से स्पष्ट है कि चन्द्रमा से केंद्र स्थान में बृहस्पति बैठकर गजकेसरी योग बना रहा है इस योग में जन्म लेने वाला व्यक्ति अनेक मित्रों,प्रशंसकों व सम्बन्धियों में घिरा रहता है व उनके द्वारा सराहा जाता है.स्वभाव से नम्र,विवेकवान व गुणी होता है.तेजस्वी,मेधावी,गुणज्ञ,तथा राज्य पक्ष में प्रबल उन्नति प्राप्त करने,उच्च  पद प्राप्त करने तथा मृत्यु क़े बाद भी अपनी यश गाथा अक्षुण रखने वाला होता है.ठीक ऐसे ही थे राजेन्द्र बाबू जिनका जन्म बिहार क़े छपरा जिले में जीरादेई ग्राम में हुआ था.एक किसान परिवार में जन्म लेकर अपने बुद्धि कौशल से राजेन्द्र बाबू ने वकालत पास की उस समय कायस्थ वर्ग सत्ता क़े साथ था परन्तु राजेन्द्र बाबू ने गोपाल कृष्ण गोखले क़े परामर्श से देश की आजादी क़े आन्दोलन में कूदने का निश्चय किया और कई बार जेल यात्राएं कीं.राजेन्द्र बाबू ने स्वंत्रता आन्दोलन क़े दौरान जेल में रहकर कई पुस्तकें लिखीं जिन में 'खंडित भारत' विशेष उल्लेखनीय है.इसमें राजेन्द्र बाबू ने तभी लिख दिया था कि यदि अंग्रेजों की चाल से देश का विभाजन हुआ तो क्या क्या समस्याएँ उठ खडी होंगी और हम आज देखते हैं कि दूर दृष्टि कितनी सटीक थी.डा.राजेन्द्र प्रसाद मध्यम मार्ग क़े अनुगामी थे और उन्हें नरम तथा गरम दोनों विचारधाराओं का समर्थन प्राप्त था.जब नेता जी सुभाष चन्द्र बोस महात्मा गांधी क़े उम्मीदवार डा.पट्टाभि सीता रमैया को हराकर कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हो गये तो गांधी जी क़े प्रभाव से उनकी कार्यकारिणी में कोई भी शामिल नहीं हुआ और सुभाष बाबू को पद  त्याग करना पडा.उस समय कांग्रेस की अध्यक्षता  राजेन्द्र बाबू ने संभाली और स्वाधीनता आन्दोलन को गति प्रदान की.राजेन्द्र बाबू की कुडली क़े चतुर्थ भाव में मीन राशी है जिसके प्रभाव से वह धीर गंभीर और दार्शनिक बन सके.इसी कारण धार्मिक विचारों क़े होते हुए भी वह सदा नवीन विचारों को ग्रहण करने को प्रस्तुत रहे.राजेन्द्र बाबू ने एक स्थान पर लिखा है कि यदि जो कुछ पुरातन है और उससे कोई नुक्सान नहीं है तो उसका पालन करने में कोई हर्ज़ नहीं है लेकिन उनके इसी भाव में स्थित हो कर केतु ने उनको जीवन क़े अंतिम वर्ष में कष्ट एवं असफलता भी प्रदान की.पंडित नेहरु से मतभेद क़े चलते राजेन्द्र बाबू को तीसरी बार राष्ट्रपति पद नहीं मिल सका और इस सदमे क़े कारण ६ माह बाद उनका निधन हो गया.परन्तु इसी केतु ने उन्हें मातृ -पितृ भक्त भी बनाया विशेषकर माता से उन्हें अति लगाव रहा.एक बार माता की बीमारी क़े चलते बोर्ड परीक्षा में वह एक घंटा की देरी से परीक्षा हाल में पहुंचे थे और उनकी योग्यता को देखते हुए ही उन्हें परीक्षा की अनुमति दी गयी थी तथा राजेन्द्र बाबू ने उस परीक्षा को प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया था.षष्ठम भावस्थ उच्च  क़े चन्द्र ने भी उन्हें हर प्रकार क़े सुख प्राप्त करने में सहायता की.नवम क़े बृहस्पति तथा दशम क़े राहू ने राजेन्द्र बाबू को राजनीति में दक्षता प्रदान की तो द्वादश क़े सूर्य ने शिक्षा क़े क्षेत्र में प्रसिद्धि दिला कर दार्शनिक बना दिया.

समय करे नर क्या करे,
समय बड़ा बलवान
असर ग्रह सब पर करे
परिंदा,पशु,इंसान.

हम देखते हैं कि विद्वान् कवि क़े ये उदगार राजेन्द्र बाबू पर हू ब हू लागू होते हैं.उनके जन्मकालीन ग्रह नक्षत्रों ने उन्हें स्वाधीन भारत क़े प्रथम राष्ट्रपति क़े पद तक पहुंचाया.आजादी से पूर्व वह संविधान निर्मात्री सभा क़े अध्यक्ष भी रहे.अपने पूर्वकालीन संस्कारों से अर्जित प्रारब्ध क़े आधार पर ग्रह नक्षत्रों क़े योग से डा.राजेन्द्र प्रसाद स्तुत्य बन सके.


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