Sunday, January 31, 2016

पूंजी,पूजा,धर्म और विभ्रम ------ विजय राजबली माथुर

पूजा और धर्म मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध बनाने के लिए थे लेकिन आज पूंजी -वाद के युग में इनको विकृत करके विभेद व विभ्रम का सृजक बना दिया गया है। क्या पढे-लिखे और क्या अनपढ़ सभी विभ्रम का शिकार हैं ; कुछ अनजाने में तो कुछ जान-बूझ कर भी। 

धर्म शब्द की उत्पत्ति धृति धातु से हुई है जिसका अर्थ है धारण करना अर्थात मानव जीवन व समाज को धारण करने हेतु आवश्यक तत्व ही धर्म हैं अन्य कुछ नहीं, यथा----
सत्य, अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ), अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। 
आज इन तत्वों/लक्षणों का पालन न करने वाले ही खुद को धर्म का ठेकेदार घोषित किए हुये हैं। 

पूजा भगवान की करनी थी जड़ पदार्थों की नहीं, लेकिन आज जड़-पूजक ही खुद को भगवान-भक्त घोषित करके मानवता को कुचलने पर आमादा हैं। 
भगवान/खुदा/गाड को समझते नहीं और इनके नाम पर झगड़ा खड़ा करने को तैयार रहते हैं। 
भगवान = भ (भूमि-पृथ्वी ) +ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा ) +I (अनल-अग्नि ) + न (नीर-जल )=भगवान । 
खुदा = चूंकि ये पाँच तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी मानव ने बनाया नहीं है अर्थात ये ही खुदा हैं। 
गाड = चूंकि इन तत्वों का कार्य G (जेनरेट )+ O (आपरेट ) + D (डेसट्राय ) है इसलिए ये ही GOD हैं। 

इनकी पूजा का अर्थ है इन तत्वों का संरक्षण व संवर्धन अर्थात प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह भगवान/खुदा/गाड तत्वों की रक्षा करे व उन्हें नष्ट होने से बचाए। लेकिन आज हो क्या रहा है? अलग-अलग नाम पर इनको नष्ट करने का मानवीय दुष्चक्र चल रहा है वह भी धर्म के नाम पर। 

ज्योतिष वह विज्ञान है जो मानव जीवन को सुंदर, सुखद व समृद्ध बनाने हेतु चेतावनी व उपाय बताता है। लेकिन आज इस विज्ञान को स्वार्थी व धूर्त लोगों ने पेट-पूजा का औज़ार बना कर इसकी उपादेयता को गौड़ कर दिया व इसे आलोचना का शिकार बना दिया है। एक सप्ताह की ये अखबारी कटिंग्स जो बताती हैं ज्योतिष ने उनका पूर्वानुमान पहले ही कर दिया था किन्तु उस पूर्वानुमान को चेतावनी के रूप में बचाव के उपाय करने की किसी ने भी ज़रूरत नहीं समझी, क्यों ?




नीमच से प्रकाशित 'चंड-मार्तंड 'पंचांग के पृष्ठ 50 पर 26-12-2015 से 23-01-2016 की ग्रह-स्थिति का वर्णन था :
दिवद्वादश मंगल शनि भृगु भौम प्रस्तार। 
हिम प्रपात पर्वत पतन,मार्ग रोग विस्तार। । 
मेघ गाज वर्षा गति, लहर शीत  अभिसार। 
यान खान घटना विविध,शासन पक्ष विकार। । 

इस दौरान आकाश में 'मंगल' तुला राशि में होकर वृश्चिक के 'शनि' के साथ दो-बारह के संबंध में रहा जिससे  पृथ्वी के पश्चिमी व पूर्वी गोलार्द्ध में शीत  व हिम का प्रकोप रहा परंतु न भारत न ही यू एस ए की सरकारों ने कोई सुरक्षात्मक कदम उठाए ।

पृष्ठ 52 पर मंगल-शनि की इसी युति के साथ-साथ 'बुध', 'शुक्र' दोनों के एक साथ धनु राशि में स्थिति का परिणाम इस प्रकार पहले से ही वर्णित है जिस संबंध में मौसम विभाग अब आगाह कर रहा है :

युति योग शनि भौम का, नहीं सुखद प्रस्तार। 
विस्फोटक भय आपदा, भू-क्रंदन प्रतिचार। । 
क्षति विश्व, सुख संपदा जन धन क्षति प्रहार। 
यान खान घटना विविध, हरण करण विस्तार। । 
आतंक द्वंद रचना मही, अस्त्र शस्त्र प्रस्तार। 
व्यय विशेष रचना गति, सांसारिक प्रतिभार। । । 
युति योग बुध शुक्र का, ऋतु विषम प्रतिचार। 
हिम तुषार पर्वत क्षति, फसल कोप प्रतिचार। । 
लहर शीत महिमा गति, ग्रह गोचर संचार। 
तट समुद्र पर आपदा, जन धन क्षति विचार । ।    

यदि अफगानिस्तान में भूकंप आया तो दक्षिण-पूर्व एशिया में भी। भारत के पठानकोट में आतंकवादी हमला हुआ तो पाकिस्तान के स्कूली बच्चों पर भी । पश्चिम एशिया तो युद्ध का अखाडा बना ही हुआ है। 
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और अब देखिये एक बड़े कारपोरेट घराने के बड़े अखबार के बड़े संपादक महोदय के पूजा, धर्म और ज्योतिष पर विचार जिनको पढ़ कर कैसे कहा जा सकता है कि ये एक विद्वान के विचार हैं? :



बताइये भला जड़ पदार्थ (संपादक जी खुद ही लिखते हैं वहाँ एक पत्थर का टुकड़ा है ) को क्या पूजना ? फिर इतनी मूर्खता सिर्फ पुरुषों तक ही नहीं सीमित रहनी चाहिए उसका विस्तार महिलाओं तक भी होना चाहिए और महिलाएं खुद भी ऐसी मूर्खता करने के लिए लालायित हैं। संपादक पंडित जी ने ही लिखा है कि पहले वहाँ वीरान सा था अब भव्य मंदिर व दुकानें हैं। स्पष्ट है यह पूंजी का खेल है जिसमें  अबोध जनता सिर्फ इसलिए पिस रही है क्योंकि बुद्धिमान लोग   व संपादक जी-पंडित जी उसे ऐसा ही करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। धर्म,पूजा व ज्योतिष की इन अनर्थकारी परिभाषाओं-व्याख्याओं ने सम्पूर्ण मानव जाति के अस्तित्व के लिए खतरा नजदीक ला दिया है। 


  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Monday, January 25, 2016

कायस्थों को सावधान रहना चाहिए ब्राह्मणवादी चालों से ------ विजय राजबली माथुर

 नेताजी सुभाष बोस की जयंती पर कायस्थ समाज की महिला शाखा द्वारा डॉ राजेन्द्र प्रसाद को संविधान निर्माता का श्रेय दिये जाने का मांग-पत्र  ए डी एम प्रशासन राजेश कुमार पाण्डेय को सौंप कर आर एस एस की ब्राह्मणवादी चाल में फँसने का प्रमाण दे दिया गया  है। 

वर्णाश्रम व्यवस्था से ऊपर स्थान वाले 'कायस्थ' को पहले तो ब्राह्मणों के आधीन घोषित किया गया फिर अब दलित कहे जाने वाले वर्ग से टकराव में ब्राह्मणों की 'ढाल' बनने को उत्प्रेरित किया गया है। 

वस्तुतः डॉ राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे जबकि 'संविधान' का प्रारूप तैयार करने वाली कमेटी के अध्यक्ष डॉ भीम राव अंबेडकर थे। खुद डॉ राजेन्द्र प्रसाद द्वारा डॉ अंबेडकर को संविधान निर्माता घोषित किया गया था । 

 किन्तु आज उन डॉ राजेन्द्र प्रसाद को डॉ अंबेडकर के खिलाफ खड़ा करने की धूर्तता पूर्ण साजिश की जा रही है। यह साजिश मूल संविधान को नष्ट करने के अभियान की कड़ी है , इस साजिश को समझना व ब्राह्मणवादी चालों को नाकाम करना कायस्थ समाज का ध्येय होना चाहिए । ब्राह्मणों ने बड़ी ही चालाकी से  कायस्थ महिलाओं को दलित विरोधी के रूप में खड़ा किया है , परंतु जो कायस्थ समाज मूलतः बुद्धिजीवी है अपनी बुद्धि को शोषक-उत्पीड़क ब्राह्मणों के हाथों गिरवी रख कर अपने ही हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चलाने को कैसे तैयार हो रहा है ; यह बेहद खेद व परेशानी की बात है। कायस्थ समाज की आँखें खोलने के लिए मौलिक जानकारी को यहाँ उपलब्ध कराया जा रहा है और यह अपेक्षा की जाती है कि कायस्थ समाज ब्राह्मणों की कुत्सित चालों का शिकार बनने के बजाए शोषित-उत्पीड़ित वर्ग के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ा हो तथा उनको प्रशिक्षित व जागरूक करने में अपना अमूल्य योगदान दे। डॉ अंबेडकर के अवमूल्यन तथा नेताजी की मृत्यु के ब्राह्मणवादी विवाद से कायस्थ समाज को दूर रहना चाहिए वही देश-हित में है।  

 पौराणिक-पोंगापंथी -ब्राह्मणवादी व्यवस्था मे जो छेड़-छाड़ विभिन्न वैज्ञानिक आख्याओं के साथ की गई है उससे 'कायस्थ' शब्द भी अछूता नहीं रहा है।
 'कायस्थ'=क+अ+इ+स्थ
क=काया या ब्रह्मा ;
अ=अहर्निश;इ=रहने वाला;
स्थ=स्थित। 
'कायस्थ' का अर्थ है ब्रह्म से अहर्निश स्थित रहने वाला सर्व-शक्तिमान व्यक्ति। 


आज से दस लाख वर्ष पूर्व मानव जब अपने वर्तमान स्वरूप मे आया तो ज्ञान-विज्ञान का विकास भी किया। वेदों मे वर्णित मानव-कल्याण की भावना के अनुरूप शिक्षण- प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। जो लोग इस कार्य को सम्पन्न करते थे उन्हे 'कायस्थ' कहा गया। क्योंकि ये मानव की सम्पूर्ण 'काया' से संबन्धित शिक्षा देते थे  अतः इन्हे 'कायस्थ' कहा गया। किसी भी  अस्पताल मे आज भी जेनरल मेडिसिन विभाग का हिन्दी रूपातंरण आपको 'काय चिकित्सा विभाग' ही लिखा मिलेगा। उस समय आबादी अधिक न थी और एक ही व्यक्ति सम्पूर्ण काया से संबन्धित सम्पूर्ण जानकारी देने मे सक्षम था। किन्तु जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई शिक्षा देने हेतु अधिक लोगों की आवश्यकता पड़ती गई। 'श्रम-विभाजन' के आधार पर शिक्षा भी दी जाने लगी। शिक्षा को चार वर्णों मे बांटा गया-


1- जो लोग ब्रह्मांड से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'ब्राह्मण' कहा गया और उनके द्वारा प्रशिक्षित विद्यार्थी शिक्षा पूर्ण करने के उपरांत जो उपाधि धारण करता था वह 'ब्राह्मण' कहलाती थी और उसी के अनुरूप वह ब्रह्मांड से संबन्धित शिक्षा देने के योग्य माना जाता था। 

2- जो लोग शासन-प्रशासन-सत्ता-रक्षा आदि से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'क्षत्रिय'कहा गया और वे ऐसी ही शिक्षा देते थे तथा इस विषय मे पारंगत विद्यार्थी को 'क्षत्रिय' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो शासन-प्रशासन-सत्ता-रक्षा से संबन्धित कार्य करने व शिक्षा देने के योग्य  माना जाता था। 
3-जो लोग विभिन व्यापार-व्यवसाय आदि से संबन्धित शिक्षा प्रदान करते थे उनको  'वैश्य' कहा जाता था। इस विषय मे पारंगत विद्यार्थी को 'वैश्य' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो व्यापार-व्यवसाय करने और इसकी शिक्षा देने के योग्य माना जाता था। 
4-जो लोग विभिन्न  सूक्ष्म -सेवाओं से संबन्धित शिक्षा देते थे उनको 'क्षुद्र' कहा जाता था और इन विषयों मे पारंगत विद्यार्थी को 'क्षुद्र' की उपाधि से विभूषित किया जाता था जो विभिन्न सेवाओं मे कार्य करने तथा इनकी शिक्षा प्रदान करने के योग्य माना जाता था। 

ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि,'ब्राह्मण','क्षत्रिय','वैश्य' और 'क्षुद्र' सभी योग्यता आधारित उपाधियाँ थी। ये सभी कार्य श्रम-विभाजन पर आधारित थे । अपनी योग्यता और उपाधि के आधार पर एक पिता के अलग-अलग पुत्र-पुत्रियाँ  ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य और क्षुद्र हो सकते थे उनमे किसी प्रकार का भेद-भाव न था।'कायस्थ' चारों वर्णों से ऊपर होता था और सभी प्रकार की शिक्षा -व्यवस्था के लिए उत्तरदाई था। ब्रह्मांड की बारह राशियों के आधार पर कायस्थ को भी बारह वर्गों मे विभाजित किया गया था। जिस प्रकार ब्रह्मांड चक्राकार रूप मे परिभ्रमण करने के कारण सभी राशियाँ समान महत्व की होती हैं उसी प्रकार बारहों प्रकार के कायस्थ भी समान ही थे।


 कालांतर मे व्यापार-व्यवसाय से संबन्धित वर्ग ने दुरभि-संधि करके  शासन-सत्ता और पुरोहित वर्ग से मिल कर 'ब्राह्मण' को श्रेष्ठ तथा योग्यता  आधारित उपाधि-वर्ण व्यवस्था को जन्मगत जाति -व्यवस्था मे परिणत कर दिया जिससे कि बहुसंख्यक 'क्षुद्र' सेवा-दाताओं को सदा-सर्वदा के लिए शोषण-उत्पीड़न का सामना करना पड़ा उनको शिक्षा से वंचित करके उनका विकास-मार्ग अवरुद्ध कर दिया गया।'कायस्थ' पर ब्राह्मण ने अतिक्रमण करके उसे भी दास बना लिया और 'कल्पित' कहानी गढ़ कर चित्रगुप्त को ब्रह्मा की काया से उत्पन्न बता कर कायस्थों मे भी उच्च-निम्न का वर्गीकरण कर दिया। खेद एवं दुर्भाग्य की बात है कि आज कायस्थ-वर्ग खुद ब्राह्मणों के बुने कुचक्र को ही मान्यता दे रहा है और अपने मूल चरित्र को भूल चुका है। कहीं कायस्थ खुद को 'वैश्य' वर्ण का अंग बता रहा है तो कहीं 'क्षुद्र' वर्ण का बता कर अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहा है। 


शूद्रक लिखित संस्कृत नाटक 'मृच्छ्कटिक ' में  कायस्थों को निम्न जाति का वर्णन किया गया है और ब्राह्मणों का सहायक घोषित किया गया है। यह सब 'चित्रगुप्त' की संतान बताने की काल्पनिक  ब्राह्मणवादी कहानी ( जिसे कायस्थ शिरोधार्य कर रहे हैं )का दुष्परिणाम है । 

'मृच्छ्कटिक '  की नायिका -गणिका बसंत सेना 


यह जन्मगत जाति-व्यवस्था शोषण मूलक है और मूल भारतीय अवधारणा के प्रतिकूल है। आज आवश्यकता है योग्यता मूलक वर्ण-व्यवस्था बहाली की एवं उत्पीड़क जाति-व्यवस्था के निर्मूलन की।'कायस्थ' वर्ग को अपनी मूल भूमिका का निर्वहन करते हुये भ्रष्ट ब्राह्मणवादी -जातिवादी -जन्मगत व्यवस्था को ध्वस्त करके 'योग्यता आधारित' मूल वर्ण व्यवस्था को बहाल करने की पहल करनी चाहिए।

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~विजय राजबली माथुर ©
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Saturday, January 23, 2016

नेताजी सुभाष के ग्रह-योग और विमान हादसा ------ विजय राजबली माथुर

 नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 120 वीं वर्षगांठ पर एक स्मरण :





डॉ नारारायन दत्त श्रीमाली साहब द्वारा किए  उपरोक्त विश्लेषण को नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जीवन पर चरितार्थ देखा जा सकता है। उनके संबंध में खास तौर पर विमान हादसे में उनके निधन होने की खबर के संबंध में नेहरू जी की विरोधी शक्तियों- आर एस एस आदि ने विभ्रम फैला रखा है जिस कारण सरकार ने अनेकों जांच बैठाईं जिनमें विमान हादसे में उनकी मृत्यु की पुष्टि की गई है। 
हिंदुस्तान टाईम्स की ओर से प्रसून सोनवाकर साहब ने नेताजी की पुत्री अनीता बोस जी का एक साक्षात्कार ( नीचे प्रस्तुत है )कल 22 जनवरी 2016 को प्रकाशित किया है जिसमें उन्होने भी विमान हादसे में नेताजी सुभाष की मृत्यु होने की बात स्वीकारी है। उन्होने तो विभ्रम फैलाने वालों के प्रति नाराजगी भी प्रकट की है। लेकिन हम यहाँ नेताजी की प्रस्तुत जन्म-कुंडली के आधार पर कुछ बातों पर प्रकाश डालने का प्रयास कर रहे हैं :

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जन्म-कुंडली में 'शनि' अपने विरोधी ग्रह 'मंगल' की 'वृश्चिक' राशि में स्थित है। ऐसा शनि अल्प-आयु योग देता है। यही शनि गलत-फहमियेँ उत्पन्न करता है व मुक़दमेबाज़ी का शिकार बनाता है। अष्टम भाव की वृश्चिक राशि यह सूचित करती है कि, अंतिम दिनों में जातक या तो रुधिर विकार का सामना करता है या फिर त्वचा विकार का सामना करता है , ऐसे व्यक्ति को विष भी दिया जा सकता है। 

विमान हादसे : 18 अगस्त 1945 के समय नेताजी 48 वर्ष 07 माह की आयु (जो अल्प-आयु ही है ) पूर्ण कर चुके थे और जन्म-तिथि 23 जनवरी 1897 से गणना के आधार पर 'ब्रहस्पति' की महादशा के अंतर्गत 'राहू' की अंतर्दशा में थे जो 26 सितंबर 1945 तक चलनी थी। 'राहू' पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव है जिसे छाया ग्रह के रूप में गणना में शामिल किया जाता है और इसका प्रभाव 'शनि' के समान ही होता है। शनि एक वायु प्रधान ( गैसों का भंडार ) ग्रह है। आयु के अनुसार नेताजी अपने जन्म-लग्न की 'मेष' राशि में संचार कर रहे थे जो स्वम्य भी 'अग्नि' राशि है और जिसका स्वामी ग्रह 'मंगल' भी एक अग्नि ग्रह है जिस कारण ही मंगल को 'अंगरकाय' भी कहा जाता है। इस राशि पर  नेताजी के कर्म भाव में स्थित राहू की चतुर्थ दृष्टि भी पड़ रही है। इस प्रकार 'वायु' और 'अग्नि' के संयोग ने नेताजी के विमान को दुर्घटना का शिकार बनाया और उसमें जलने से उनका प्राणान्त हो गया। यह अलग बात हो सकती है कि यह दुर्घटना मात्र दुर्घटना न हो शत्रु का निशाना हो, परंतु नेताजी के जन्म-कालीन ग्रहों के अनुसार उनका निधन उस विमान हादसे में ही हुआ प्रतीत होता है। 
(विजय राजबली माथुर )


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My father would’ve been prominent alternative to Nehru: Bose’s daughter

  • Prasun Sonwalkar, Hindustan Times, Ausburg, Germany
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  • Updated: Jan 22, 2016 09:25 IST







Netaji Subhas Chandra Bose’s daughter is annoyed that instead of accepting evidence, many continue to be excited with “asinine” theories that he survived the plane crash in Taipei in 1945 and lived in the mountains as “Gumnami Baba”.
Anita Bose Pfaff, 73, was about a month old when Bose saw her for the last time in Vienna. She is convinced Bose died in the crash on August 18, 1945, and has proposed a DNA test on his remains kept at Renkoji Temple in Japan. Speaking to Hindustan Times shortly before the Narendra Modi government begins releasing declassified files related to Bose, Pfaff said she supported the move but doubted if it would end the “fruitless” controversy.
A former academic and economist, she spoke on a range of issues, including the relationship between her mother, Emily Schenkl, and her iconic father.
Excerpts:
Q: Are you convinced that your father died in the air crash?
A: I think that is the most likely thing to have happened. If we get evidence that supports something else, I am open to that but so far I have not seen any evidence which is more convincing. In the beginning we all doubted that he died in the plane crash but as time passed some things came out and I was also present in the interview of some people who were survivors of that plane crash. It sounded very convincing.
Q: Since there is so much evidence about the crash and witness statements, do you think it is time to put this controversy to rest?
A: I wish so, it is rather fruitless with all these rather asinine theories being advanced, including that he is still alive, god knows where, or that he lived in the mountains as ‘Gumnami Baba’, which is an insult to him, because how can anyone believe that a person who was so dedicated to his country would then go and live in the mountains and not involve himself at all and not get in touch with any member of his family?
Ultimately, it is a very uninteresting controversy. Sometimes I am really annoyed. My father gave so much of his life to his country and then he is remembered by some people as , ‘Oh, he is that chap about whose death there is a controversy’. Is that the only claim to fame that he has? It’s really not a very fair reflection on his life and his contribution to the independence struggle.
Q: Do you think the files being declassified from Saturday will help put the controversy to rest?
A: I doubt it very much because these files will cover any number of interesting details, maybe interesting to historians, corroborate something, contradict other things, some of them new, some of them not really new, but I doubt very much that the convincing story about the plane crash not having happened, which some expect, is going to come out of that.
Q: You mentioned the idea of a DNA test on the remains in the Renkoji temple in Japan.
A: Yes. The two governments – India and Japan – need to be involved, they need to agree, because without that the priest of the temple will not agree to hand over the material. There are bones but if the bones are charred very badly you cannot extract the DNA. Some specialists in the field have looked at the pictures of the bones and they say it’s quite conceivable that one could (extract DNA) because there are larger parts of the jaw and so on and that the DNA could be extracted from the centre of the bones. I think one should try. Originally, I was a bit hesitant because I felt the Japanese would feel very insulted but this whole rather undignified discussion which has been going on over decades can possibly be, well not put to rest, because there will be some people who will not take DNA proof as proof either. But I think rational people would at least accept the outcome of that, whichever way it were to go. The danger is that maybe the Japanese government feels that, well, what if they are not his remains - then they will sort of feel embarrassed. That is an issue where they may dilly-dally around it.
Q: Would you like the ashes to go to India?
A: If the proof of the DNA test shows that and the Japanese would be amenable to that, I think it would be better (if they are taken to India). If we cannot have a DNA test I personally would not mind if they came to India but if we were to face a very ugly controversy – from including members of my family – I think we could save ourselves that trouble (laughs).
Q: Do you think India would be different if your father were alive?
A: First, I am convinced that if he were alive he would have involved himself in the politics of the time. That might have had a number of consequences. There would have been a prominent alternative to Nehru. Of course we must consider that on some issues they had very similar views. They were both in essence in favour of a political system which was not dominated by communal controversies. They were both modern in the sense that they wanted industrialisation. But on the other hand, there would have been differences; for example, I imagine his position vis-à-vis Pakistan would have been different. Nobody really wanted or expected what happened after Partition. The amount of genocide left wounds on both sides which were difficult to overcome but I imagine he would have a different view towards Pakistan. If he could not prevent Partition – both he and Gandhi wanted to prevent it – I think he probably would have tried and succeeded in having better relations with Pakistan…India has been suffering less from the controversies (since independence) because with all the problems India faces, it is a functioning state, and from that point of view Pakistan is in a much worse position.
Q: What is your memory of your father, your assessment of him as a person; what did your mother say to you about him?
A: I have no recollection of him at all. He was a person very dedicated to the cause of fighting for India’s independence. Of course, my mother told me a number of things about him. Well, she was certainly a biased person in that matter, of course. Given the circumstances, one has to be surprised that she was willing to share her life with a person who was so dedicated to a cause which took him away. Looking at this as an adult it is really more surprising that she always spoke well of him and did not criticise him because he really must have been a disaster of a husband…She was better at maintaining correspondence with members of my family than I am.
Q: Prime Minister Narendra Modi was in Berlin last year, but you did not meet him.
A: I was invited to the reception in Berlin but I decided not to go because I felt he is so busy with any number of topical issues on the Indo-German relations, so certainly talking to him about anything pertaining to my father would have just added a totally different issue which in essence would have been a burden on him I felt. And just to go and say Namashkar (laughs)…I am sure he would have met me for a few minutes but I felt this would have been more symbolic than anything else. His office has been in touch; they asked several times if I would be coming for the 23 January event (declassification of files) but few days ago I told them I won’t be able to make it; they even told me that he would meet me privately, but maybe I will go later in the year. The embassy told me that they would make an appointment for me to see him.
साभार : http://www.hindustantimes.com/india/theories-that-he-survived-the-plane-crash-are-asinine-bose-s-daughter/story-9EP1GPyVptPsJBobAO30sM.html 


~विजय राजबली माथुर ©
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Monday, January 11, 2016

विपक्ष में लाल बहादुर शास्त्री जैसे अदम्य साहसी नेता की परमावश्यकता ------ विजय राजबली माथुर

51 वीं पुण्यतिथि पर शास्त्री जी की आवश्यकता आज क्यों? : 


इतिहासकार रामचन्द्र गुहा साहब ने 1965 में हुये भारत-पाक संघर्ष के विजेता के रूप में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के साहस व निर्णय की सराहना करने के साथ-साथ उन परिस्थितियों की ओर भी संकेत किया है जो दोनों देशों के मध्य विवाद का हेतु हैं।

वस्तुतः 1857 की प्रथम क्रान्ति के बाद से ही ब्रिटिश साम्राज्यवादी फूट डालो और शासन करो की जिस नीति पर चलते आ रहे थे उसके बावजूद जब 1942 के भारत-छोड़ो आंदोलन, एयर-फोर्स व नेवी में विद्रोह तथा आज़ाद हिन्द फौज की गतिविधियों के कारण जब उनका टिके रहना मुश्किल हो गया तब नए साम्राज्यवादी सरगना यू एस ए ने भारत-विभाजन का सुझाव दिया जिस पर मेजर लार्ड ऐटली ने अपने प्रधान मंत्रित्व काल में अमल करते हुये पाकिस्तान व भारत दो स्वतंत्र देशों को सत्ता सौंप दी थी। पाकिस्तान तो तत्काल अमेरिकी प्रभुत्व में चला गया था किन्तु नेहरू जी ने गुट-निरपेक्ष आंदोलन के बैनर तले अमेरिका से दूरी बनाए रखी थी जिस कारण वह पाकिस्तान के माध्यम से भारत को परेशान करता रहा था। 1947 के बाद 1965 का संघर्ष भी उसी कड़ी में था और 1971 का बांग्लादेश व 1999 का कारगिल संघर्ष भी ।

जब जिया-उल-हक साहब की उपयोगिता अफगान समस्या के बाद समाप्त हो गई तब यू एस ए ने उनको अपने राजदूत की कीमत पर भी हवाई जहाज समेत उड़ा दिया था। ओसामा-बिन-लादेन के सफाये के साथ ही यू एस ए ने पाकिस्तान की सार्वभौमिकता को अमान्य कर दिया है। उसके लिए अब पाकिस्तान उपयोगी नहीं रह गया है विशेषकर तब जब मोदी के नेतृत्व में आर एस एस समर्थक सरकार भारत में गठित हो चुकी है। जब सरकार के माध्यम से भारत को अपने समर्थन में यू एस ए खड़ा देख रहा है तब पाकिस्तान के अस्तित्व का मतलब ही क्या रह जाता है? 
अनुच्छेद 370 को समाप्त कराने की मांग उठाते रहे लोग जब सत्ता में मजबूती से आ गए हैं तब बिना पाकिस्तान के अस्तित्व के ही 'जोजीला'दर्रे में स्थित 'प्लेटिनम' जो 'यूरेनियम' के उत्पादन में सहायक है यू एस ए को देर सबेर हासिल होता दीख रहा है । अड़ंगा चीन व रूस की तरफ से हो सकता है और उस स्थिति में भारत-भू 'तृतीय विश्वयुद्ध' का अखाड़ा भी बन सकती है। देश और देश कि जनता का कितना नुकसान तब होगा उसका आंकलन वर्तमान सरकार नहीं कर सकती है तो क्या विपक्ष भी नहीं करेगा ? और जनता से तादात्म्य स्थापित करने का कोई प्रयास साम्राज्यवाद विरोधी खेमे की ओर से भी अभी तो नहीं हो रहा है अभी तो वही पुरानी लीक ही पीटी जा रही है जिसका इस देश कि जनता पर कभी भी कोई भी असर हो ही नहीं सकता है। 

प्रस्तुत समाचार व अमेरिकी प्रवक्ता के बयान के लिंक  यू एस ए अभियान की पुष्टि करते हैं।


http://navbharattimes.indiatimes.com/world/america/is-us-hinting-at-covert-operation-after-pathankot-terror-attack/articleshow/50516993.cms?

  इस वक्त पाकिस्तान को झुका कर यू एस ए भारत में मोदी की हैसियत को मजबूत करना चाहता है जिनकी सरकार का लोकप्रिय होना दीर्घकालीन अमेरिकी हितों के अनुरूप होगा। निकट भविष्य में पाकिस्तान के स्थान पर कई छोटे-छोटे देश सृजित करवा कर अमेरिका भारत की बहुसंख्यक जनता के दिलों में अपना राज जमा कर अपने देश के व्यापारिक हितों को ही साधेगा जबकि यहाँ की जनता को लगेगा कि वह यहाँ कि बहुसंख्यक जनता का हितैषी है और यह सब मोदी व उनकी सरकार के चलते संभव हुआ है। 

अतः इस बात की कोई सम्भावना नहीं है कि ( जैसा कि इतिहासकार महोदय कल्पना कर रहे हैं ) मोदी साहब शास्त्री जी जैसी (1965 ) या इंदिरा जी जैसी (1971 ) दृढ़ता दिखाएंगे। तब तक भारत से नेहरू जी की  व्यावहारिक नीतियों का सफाया नहीं हुआ था और देश का स्वाभिमान कायम था। लेकिन 1975  में हुये देवरस-इन्दिरा 'गुप्त-समझौते' के तहत 1980 में इंदिराजी की पुनर्वापसी से देश में आर एस एस का जो प्रभाव बढ़ना शुरू हुआ था वह 1991 में मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री बनने के साथ ही मजबूत होता गया तथा 13 दिन, 13 माह और 60 माह की ए बी वाजपेयी सरकारों के दौरान उसने शासन-प्रशासन और इंटेलीजेंस में तगड़ी पकड़ बना ली थी। मनमोहन सिंह जी का 120 माह का कार्यकाल आर एस एस की दोहरी खुशियों का था जिसमें सत्ता व विपक्ष उसके ही इशारे पर चल रहा था। मोदी के सत्तारोहण ( जिसमें मनमोहन सिंह जी का सक्रिय योगदान है ) से सत्ता तो सीधे-सीधे आर एस एस से ही प्रभावित है किन्तु अब विपक्ष को पुनः अपनी पकड़ में लाने हेतु आर एस एस तमाम तिकड़में एक साथ चल रहा है। आ आ पा के रूप में उसे एक नया राजनीतिक दल तो मिल ही चुका है पुराने क्षेत्रीय दलों जैसे सपा, बसपा आदि-आदि को अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित करके आर एस एस राजनीति में व्यापक रूप से अपने पैर पसार रहा है। भारत में सर्वहारा (दलित ) वर्ग को व्हाईट हाउस की नीतियों के तहत मोदी के पीछे गुप-चुप ढंग से लामबंद किया जा रहा है। 

अफसोसनाक बात यह है कि साम्राज्यवाद विरोधी साम्यवाद/वामपंथ के हिमायती यू एस ए व आर एस एस के इस अभियान का कोई विकल्प न प्रस्तुत करके उनकी चालों का शिकार होते जा रहे हैं और अपने ही हाथों अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी चलाते जा रहे हैं। पोंगापंथ, ढोंगवाद/ब्रहमनवाद तेजी से अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा है और प्रगतिशीलता/वैज्ञानिकता के नाम पर जिस तरीके से उसका विरोध किया जाता है उससे उसे अत्यधिक मजबूती ही मिलती जाती है। आज जब जनता को वास्तविक धर्म का मर्म समझाये जाने कि ज़रूरत थी तब माकपा महासचिव उसी पोंगापंथ के पथ का अनुसरण करके अंततः अपने विरोधियों को ही शक्तिशाली बनाने का कार्य शुरू कर चुके हैं। आज शासन में  तो अब संभव ही नहीं  है  अतः विपक्ष में लाल बहादुर शास्त्री जैसे अदम्य साहसी नेता की परमावश्यकता है जो जनता का दिल जीत कर किसान,जवान और मजदूर के हितों का संघर्ष चला कर नेतृत्व कर सके। 



~विजय राजबली माथुर ©
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Sunday, January 3, 2016

बर्धन होना एक बहुत मुश्किल काम है ------ कामरेड बादल सरोज

वे जीवन भर पार्टी के होलटाइमर रहे । उनकी पत्नी कालेज पढ़ाकर घर चलाती रहीं। इस उम्मीद के साथ कि फंड और ग्रेच्युटी के पैसों से रिटायरमेंट के बाद का वक़्त गुजर जाएगा। रिटायरमेंट के बाद मिली पूरी रकम को यूटीआई की एक योजना में जमा कर दिया गया - और विडम्बना यह रही कि वह डूब गयी। इस हादसे की जानकारी बर्धन साब ने एक पत्रकारवार्ता में ठहाका लगाते हुए दी थी। स्थितप्रज्ञता इसी स्थिति को कहते हैं।
ऐसी विरली शख्सियत - फिर भले वह कितनी भी पकी उम्र में क्यों न जाए- एक बड़ी रिक्ति , महाकाय शून्य पैदा करके जाती है।

 Badal Saroj
कामरेड ए बी बर्धन नहीं रहे। फ़िराक गोरखपुरी से रियायत लेते हुए यह कहने का मन है कि ; 
 "आने वाली नस्लें तुम से रश्क़ करेंगी हमअसरो जब उनको मालूम पडेगा तुमने बर्धन को देखा था "
भारतीय राजनीति की उस पीढ़ी की ऐसी धारा के - संभवतः आख़िरी - बुजुर्ग थे बर्धन जिसने शब्दशः खुद को मोमबत्ती की तरह जलाकर अँधेरे के गरूर को तोड़ा है, उजाले की आमद के प्रति उम्मीद बनाये रखी है। ऐसी विरली शख्सियत - फिर भले वह कितनी भी पकी उम्र में क्यों न जाए- एक बड़ी रिक्ति , महाकाय शून्य पैदा करके जाती है। 25 सितम्बर 1925 को जन्मे अर्धेन्दु भूषण बर्धन जब 15 साल के थे तब ही देश की आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो गए थे । 1940 में वे आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के सदस्य बने, 1941 में नागपुर विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष निर्वाचित हुए । विद्यार्थियों के बड़े जत्थे के साथ उन्होंने 1942 के भारत छोडो आंदोलन में भाग लेते हुए जेल काटी । 17 वर्ष की नाबालिग उम्र से आंदोलनों और जेल के साथ उनका जो रिश्ता कायम हुआ वह तकरीबन आख़िरी सांस तक बना रहा । 1957 में वे महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने गए । स्थानीय श्रमिक आन्दोलनों से ऊपर उठते उठते वे आल इंडिया ट्रेड यूनियन के महासचिव और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारियों तक पहुंचे ।
यह तथ्यात्मक विवरण जीवनीकार के लिए उपयोगी हो सकता है । मगर यह बर्धन जैसे व्यक्तित्व को जानने के लिए बहुत नाकाफी है । वे बहुत बड़े कद के व्यक्तित्व थे और यह कद उन्होंने किसी सोने या चांदी की आरामदेह सीढ़ी पर चढ़कर नहीं गाँव शहर में छोटे बड़े संघर्षों में लड़ते भिड़ते हासिल किया था । बिना किसी तरह का समझौता किये, बिना कोई पतली गली या शार्ट कट ढूंढें।
बर्धन जिस दिशा के प्रति ताउम्र समर्पित रहे, उस दिशा में कुछ और मजबूत कदम आगे बढ़के ही उन्हें सच्ची श्रद्दांजलि दी जा सकती है।
बर्धन साब के व्यक्तित्व में चमत्कारिक सरलता और चुम्बकीय आकर्षण दोनों थे । वे अथक प्रेरक थे । अमोघ वक्ता होना एक गुण है, मगर बोलते समय परिस्थितियों की कठिनता का हवाला देते हुए उनसे बाहर निकल आने का यकीन पैदा करना एक असाधारण योग्यता है । यह एकदम साफ़ समझ और अटूट समर्पण से पैदा होती है । बर्धन साब के तमाम भाषण आन्दोलनकर्ता (agitator) और प्रचारकर्ता (propagandist) का मेल हुआ करते थे । वे बाँध लेने वाली शैली में बोलते थे किन्तु रिझाने या सहलाने वाली अदा से काम नहीं लेते थे । उनकी स्टाइल कुरेदने और झकझोरने वाली हुआ करती थी । मगर उसमे भी एक निराली निर्मलता होती थी ।
बर्धन वाम आंदोलन में उस वक़्त शामिल हुए थे जब दुनिया में समाजवाद की विजय यात्रा चल रही थी। वे जिस दौर में जवान हुए वह दौर फासिज्म की ऐतिहासिक शिकस्त का दौर था। इंक़लाब की आहटों से विश्व - खासतौर से तीसरी दुनिया - गूँज रही थी। बर्धन जिस दौर में प्रौढ़ और बुजुर्ग हुए वह एक तरह से दुःस्वप्न की वापसी का दौर था। दुनिया को एक गाँव में बदल देने वाला फलसफा सिर्फ आर्थिक वर्चस्व तक ही महदूद नहीं रहा था। वह जीवन शैली, (कु) विचार, मानवता विरोधी मूल्यों के विस्तार में भी हावी हो रहा था। बर्धन साब की महानता इस बात में निहित थी कि वे पूर्णिमा के अमावस में तब्दील होजाने की स्थिति से घबराये नहीं। सामाजिक विकास की वैज्ञानिक समझ ने उन्हें कभी लड़खड़ाने नहीं दिया। समाज इस तरह की वैचारिक प्रतिबद्दताओं से - जब भी बदलता है - ही बदलता है। इस तरह की परीक्षा से गैलीलियो, कोपरनिकस, सुकरात, बृहस्पति, चार्वाक, कबीर यहां तक कि बुद्द तक को गुजरना पड़ा। अग्निपरीक्षा बर्धन साब पर भी गुज़री - मगर उसके ताप से डरकर उन्होंने छाँव नहीं ढूंढी। इतिहास घनी छाया में बैठने वाले नहीं, तपती धूप में नंगे पाँव विचरने वाले लिखते हैं। बर्धन उन्ही में से एक थे।
वे उन कुछ नेताओं में से एक थे जो कम्युनिस्ट पार्टियों के विभाजन के बाद के दौर के तीखे क्लेशपूर्ण वातावरण के बावजूद दोनों ही पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच मकबूल थे । (राजेन्द्र शर्मा प्रलेस वालों से मिली कुछ आत्मकथाओं में से एक चिटनीस साब की आत्मकथा में बर्धन साब के बारे में लिखी बातों को पढ़कर महसूस हुआ कि उनकी इस स्वीकार्यता ने उन्हें डांगे साब के कुछ अति करीबियों की गुस्सा और आक्रोश तक का शिकार बना दिया था । सही रुख पर कायम रहने की जहमत जोखिम तो होती ही हैं ।)
इस अवसर पर कामरेड बर्धन के साथ के तीन अनुभव साझे करने के साथ उनके कुछ यादगार शिक्षाप्रद पहलू रखना उचित होगा।
एक :
2 अप्रैल 1995 । चंडीगढ़ में हुयी पार्टी की 15 वीं कांग्रेस (महाधिवेशन) की शुरुआत की सुबह ।
झंडारोहण की जगह पर विशिष्ट अतिथियों और वेटरन्स (वरिष्ठो) के लिए कोई एक डेढ़ दर्जन कुर्सियां रखी गयी थी । हम लोग, अनधिकृत ही, इनकी सबसे पहली कतार में अपने दोनों बड़े वरिष्ठों -यमुना प्रसाद शास्त्री और सुधीर मुखर्जी को बिठा आये । सुधीर दादा सीपीआई के देश के प्रमुख और मप्र के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे, कुछ ही समय पहले वे सीपीआई (एम) में शामिल हुए थे । (यूं इन दोनों स्थापित नेताओं का मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होना, वह भी मध्यप्रदेश में, एक बड़ी और विरल राजनीतिक घटना थी । सुधीर दा के निर्णय के दोनों वाम पार्टियों के बीच अन्योन्यान्य असर भी हुए थे । बहरहाल यहां प्रसंग चंडीगढ़ है ।) जहां हम सुधीर दा को बिठा कर आये थे, थोड़ी ही देर में एकदम उनकी बगल की सीट पर सीपीआई के तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव आकर बैठ गये । कुछ ही समय पहले अपनी पार्टी छोड़कर जाने वाले कामरेड के एकदम पास बैठना, दोनों ही के लिए, एक असुविधाजनक स्थिति हो सकती थी । मगर, बजाय चिड़चिड़ाने या मुंह मोड़कर बैठने के उन्होंने सुधीर दा का हाथ थामा । बोले, तबियत कैसी है ? सुधीर दा ने कहा ठीक है । वे बोले, "बहुत अच्छे और फ्रेश लग रहे हैं ।" इसी के साथ जोड़ा कि " जहां मन अच्छा रहे, वहीँ रहना चाहिए ।" इस वाक्य के बाद दोनों ने इतनी जोर का ठहाका लगाया कि ज्योति बसु, सुरजीत सहित नजदीक बैठे सभी नेता उन दोनों की ओर देखने लगे । ऐसे थे कामरेड ए बी बर्धन । बर्फ पिघली तो सुधीर दा ने कामरेड शैली को बुलाया और बर्धन साब से परिचय कराते हुए बताया कि ये हैं हमारे यंग सेक्रेटरी । बर्धन साब शैली से बोले : टेक केअर ऑफ़ दिस ओल्ड यंग मैन !!
दो :
10-15 साल पहले कभी गांधी भवन भोपाल । ट्रेड यूनियनो का संयुक्त सम्मेलन । हर संयुक्त सम्मेलनों की तरह साझा भी, विभाजित भी । अपने अपने वक्ता का नाम आने पर सभागार के अलग अलग कोनो से उठती ज़िंदाबाद की पुकारें । बर्धन साब का नाम आते ही जिस हिस्से में एटक का समूह बैठा था वहां से नारे शुरू हुए । जाहिर तौर पर झुंझलाए दिख रहे बर्धन साब ने अपने संगठन के कार्यकर्ताओं को फटकारने के बहाने सभी की जोरदार खिंचाई करते हुए कहा कि इस हॉल में गला फाड़ प्रतियोगिता में जीतने में ताकत खर्च करने की बजाय उसे बाहर मध्यप्रदेश के शहरों गाँवों मे जो करोड़ों मजदूर हैं, उन्हें संगठित करने में खर्च करो । जीत हार का फैसला उसी रणक्षेत्र में होना है । उनके कहे पर फिर नारे उठे, तालियां बजी । मगर इस बार किसी एक समूह से नहीं, समूचे हॉल से, जिसकी गूँज बाहर तक सुनाई दी।
तीन :
वे जीवन भर पार्टी के होलटाइमर रहे । उनकी पत्नी कालेज पढ़ाकर घर चलाती रहीं। इस उम्मीद के साथ कि फंड और ग्रेच्युटी के पैसों से रिटायरमेंट के बाद का वक़्त गुजर जाएगा। रिटायरमेंट के बाद मिली पूरी रकम को यूटीआई की एक योजना में जमा कर दिया गया - और विडम्बना यह रही कि वह डूब गयी। इस हादसे की जानकारी बर्धन साब ने एक पत्रकारवार्ता में ठहाका लगाते हुए दी थी। स्थितप्रज्ञता इसी स्थिति को कहते हैं।
बर्धन होना एक बहुत मुश्किल काम है। सलाम कामरेड बर्धन। आपके बाद की पीढ़ी आपके श्रम और कुर्बानी को व्यर्थ नहीं जाने देगी।




(लेखक कामरेड बादल सरोज जी मध्य -प्रदेश माकपा के प्रदेश सचिव )

 ~विजय राजबली माथुर 
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