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Thursday, September 22, 2011

सड़क पर हुई वार्ता का ब्यौरा

यूं तो वार्ताएं पहले से तय प्रोग्राम के आधार पर होती हैं और किसी निश्चित स्थान पर होती हैं। सड़क पर हुई कोई भी बात महत्वपूर्ण नहीं होती है। परंतु मै यहाँ जिस वार्ता को सड़क पर सम्पन्न होने के बावजूद महत्व दे रहा हूँ उसके पीछे ठोस कारण हैं। यहाँ पुस्तक मेला चल रहा है और गत वर्ष की ही भांति हम इस बार भी पुस्तक मेला का भ्रमण करने गए थे। रविवार का दिन था और उस दिन बैंकों मे भर्ती की कोई परीक्षा भी हो रही थी। पास ही मे किसी कालेज मे परीक्षा दे रहे उम्मीदवारों के अभिभावक सड़क पर खड़े वार्ता कर रहे थे। वैसे मेरी  आदत बीच मे कूद पड़ने की नहीं है। चूंकि वे लोग अन्ना की तारीफ़ों के पुल बांध रहे थे ,मुझे अच्छा नहीं लगा और मै रुक कर चुप-चाप उनकी बातों को सुनने लगा। कुछ छात्रों को सेंटर से लौटा दिया गया था जब एक साहब ने उस संबंध मे प्रश्न उठाया तो मैंने हस्तक्षेप करते हुये बात को अन्ना -आंदोलन की तरफ मोड दिया और उन लोगों को समझाया कि अमेरिकी प्रशासन और उनकी कारपोरेट कंपनियों के चंदे से यह आंदोलन हमारे संविधान को ध्वस्त करने,संसद की गरिमा को खत्म करने और भारतीय कारपोरेट कंपनियों के भ्रष्टाचार को ढकने हेतु चलाया गया था जिसे कांग्रेस के मनमोहन गुट का भी समर्थन प्राप्त था।

धारा 370 को हटाने की मांग के पीछे छिपे राष्ट्र विरोधी मंतव्यों की भी उनसे चर्चा की और उनहे समझाया कि यह जोजीला दर्रे मे छिपे प्लेटिनम को विदेशियों के हवाले करने की मांग है। 1980 से आर एस एस द्वारा कांग्रेस के एक गुट का समर्थन करने की बात भी उन्हें समझाई तथा डा जय दत्त पन्त द्वारा बाला साहब देवरस की योजना का खुलासा करने की बात भी उन्हें समझाई जिसके अनुसार शहरों का 2 प्रतिशत और गावों का 3 प्रतिशत समर्थन प्राप्त करके आर एस एस अपनी अर्ध सैनिक तानाशाही स्थापित कर सकता है।

वे सभी लोग काफी समझदार थे उन्हें आसानी से सारी बातें समझ आ गईं और उन्होने मुझ से मेरे ब्लाग्स के रेफरेंस भी लेकर नोट कर लिए। फिर मेरा परिचय मांगने पर जब उन्हें बताया कि पेशे से ज्योतिषी और राजनीतिक रूप से कम्यूनिस्ट हूँ तो उन्हें आश्चर्य भी हुआ और स्पष्टीकरण मांगा कि कम्यूनिस्ट पार्टी माने अतुल अनजान  की पार्टी । जब जवाब हाँ मे दिया तो बोले अनजान साहब की पार्टी तो अच्छी पार्टी है । जैसे आगरा मे भाकपा की पहचान चचे की पार्टी या हफीज साहब की पार्टी के रूप मे थी उसी प्रकार लखनऊ मे भाकपा से तात्पर्य अनजान साहब की पार्टी से लिया जाता है। उनमे से दो-तीन लोग तो यूनीवर्सिटी मे अनजान साहब के साथ के पढे हुये भी थे ,इसलिए भी अनजान साहब की पार्टी मे मेरा होना उन्हें अच्छा लगा।

उनमे से एक जो बैंक अधिकारी थे ने बताया कि अब यू पी मे AIBEA को उसके नेताओं ने कमजोर कर दिया है जो खुद तो लाभ व्यक्तिगत रूप से उठाते हैं लेकिन कर्मचारियों की परवाह नहीं करते। इसी कारण छोटे स्तर के नेता प्रमोशन लेकर आफ़ीसर बन गए और दूसरे संगठनों की आफ़ीसर यूनियन से सम्बद्ध हो गए। वह यह चाहते थे कि अनजान साहब कुछ हस्तक्षेप करके AIBEA को फिर से पुरानी बुलंदियों पर पहुंचाने मे मदद करे जिसका लाभ पार्टी को भी मिलेगा।

उनमे एक सज्जन AG आफिस मे उच्चाधिकारी थे। उन्होने अमर सिंह संबन्धित बातों की पुष्टि भी कर दी। मैंने उन्हें बताया था कि अमर सिंह ने वीर बहादुर सिंह के पेटी कांट्रेक्टर के रूप मे आजीविका और उनके सहायक के रूप मे राजनीति शुरू की थी और आज बड़े उद्योगपति बन गए हैं। उन्होने बताया कि जब वह सिंचाई विभाग  गोरखपुर मे आडिट करने गए थे वीर बहादुर सिंह बतौर मुख्यमंत्री सर्किट हाउस मे बैठक कर रहे थे ।अकाउंटेंट ने एक एक्जीक्यूटिव इंजीनियर को आकर बताया कि मुख्यमंत्री उन्हें नाम लेकर बुला रहे हैं। उन सज्जन ने पूछा आपको मुख्यमंत्री क्यों बुला रहे हैं उन्होने स्पष्ट किया पहले वह उन्हीं के आधीन ठेकेदार थे इसलिए।

एक और सज्जन ने अन्ना संबन्धित मेरे द्वारा बताई बातों की पुष्टि कर दी। ये सब अनजान लोग थे और इत्तिफ़ाकिया सड़क पर मिल गए थे किन्तु तर्कसंगत बातों से सहमत थे। एक हमारा ब्लाग जगत है जहां सभी लोग हैं तो समझदार किन्तु तर्क को नहीं समझते और भावावेश मे बहे जाकर अन्ना का अंध समर्थन करते और सत्य उद्घाटित करने वाले को 'बकवास' एवं 'वाहियात' घोषित कर देते हैं। अतः मेरे लिए सड़क पर सम्पन्न यह वार्ता काफी यादगार एवं महत्वपूर्ण रहेगी।