Saturday, March 15, 2014

सन्त कामरेड अब्दुल हफीज साहब---विजय राजबली माथुर

 15 मार्च जयंती दिवस पर विशेष स्मरण :

 आगरा भाकपा के नए  कार्यालय का नामकरण जिन कामरेड महादेव नारायण टंडन के नाम पर है वह आगरा में पार्टी के संस्थापक के रूप में जाने जाते हैं। टंडन जी ने आगरा मे भाकपा की स्थापना के बाद दूसरे शहरों से कई प्रतिभाशाली युवाओं को आगरा लाकर पार्टी को मजबूत किया था। इनमे से  दो का सान्निध्य मुझे भी मिला था। एक थे कामरेड अब्दुल हफीज साहब  जो टंडन जी की ही तरह स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे और पार्टी कार्यालय मे ही स्वास्थ्य ठीक रहने तक रहे। मजदूरों मे ही नहीं आम जनता मे भी वह  'चचे' नाम से जाने जाते थे। इनको टंडन जी झांसी से विद्यार्थी काल मे लाये थे।

होटल मुगल शेरटन,आगरा से 'सुपर वाईजर  अकाउंट्स' की पोस्ट से बर्खास्तगी को कानूनी चुनौती देने के दौरान कामरेड अब्दुल हफीज साहब से संपर्क हुआ था जो त्याग की सच्ची मूर्ती थे और उनको संत कामरेड की संज्ञा प्राप्त थी। उनको लोग प्यार से 'चचे' भी पुकारते थे और वह आगरा में भाकपा के पर्यायवाची थे। कम्युनिस्ट पार्टी से अभिप्राय आम जनता में चचे की पार्टी से था। यह ठीक उसी प्रकार था जैसे कि लखनऊ में कम्युनिस्ट पार्टी से अभिप्राय यहाँ के आम नागरिक कामरेड अतुल अंजान की पार्टी से लेते हैं। हफीज साहब ने पार्टी के आडिटर कामरेड हरीश आहूजा एडवोकेट के पास मुझे भेज दिया जिन्होने मेरा केस तैयार कराया। कामरेड आहूजा ने मुझे भाकपा में शामिल कर लिया।

1985 में जब मेरा चचे से संपर्क हुआ था तब भाकपा कार्यालय सुंदर होटल राजा-की-मंडी बाज़ार में स्थित था। चचे पार्टी के AITUC से सम्बद्ध होने के कारण मजदूरों के हितार्थ कार्य करते थे और उनके बारे में सुना था कि जब तक वह पूर्ण सक्रिय रहे खुद ही टाईप राईटर से मजदूरों की अर्ज़ियाँ टाईप करते व केस तैयार करते थे उनकी सक्रियता के दौरान मजदूरों को न्यायालयों  से बराबर न्याय मिलता रहा था। उनको जो स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी के रूप में सरकारी पेंशन मिलती थी उससे गुज़ारा चलाते हुये वह पार्टी कामरेड्स तथा आगंतुकों को भी अक्सर खुद चाय बना कर अपने हाथों से बड़े प्यार से पिलाया करते थे। 

बाहर से आने वाले बड़े नेता गण चाहे वे  आज के वयोवृद्ध कामरेड बर्द्धन जी हों  या पूर्व के  काली शंकर शुक्ला जी,राम नारायण उपाध्याय जी,जगदीश नारायण त्रिपाठी जी अथवा लल्लू सिंह चौहान साहब हों सभी चचे का सम्मान करने वाले रहे हैं। आगरा के सभी बड़े स्थानीय नेतागण तो उनका स्वभाविक सम्मान करते ही थे। कार्यकर्ताओं और मजदूरों के तो वह संरक्षक समान थे। कोई भी व्यक्ति जो एक भी बार उनके संपर्क में आ गया वह उनसे प्रभावित हुये बगैर नहीं रह सकता था।  अंतिम समय में उनको उनके भतीजे झांसी ले गए थे जो अक्सर पहले भी ले जाते रहे थे जबकि  उससे पहले कई बार वह पार्टी कार्यालय,आगरा लौट आते थे। 
आज के समय में चचे-कामरेड अब्दुल हफीज साहब सदृश्य नेताओं का सर्वथा आभाव है और यही कारण है कि पार्टी अपना पुराना गौरव भुला बैठी है। आज उनके जन्मदिन पर हम उनको हार्दिक श्रद्धांजली अर्पित करते हैं।


 ~विजय राजबली माथुर ©
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Monday, March 10, 2014

काश लोग बतबना पन छोड़ कर सच को स्वीकारें व मानवता की रक्षा हेतु तत्पर हों!---विजय राजबली माथुर




कुदरत का कहर: महाराष्ट्र में दिखा कश्मीर जैसा नजारा, हजारों किसान हुए बर्बाद

http://www.bhaskar.com/article/MH-PUN-heavy-rain-in-maharashtra-and-pune-4545627-PHO.html?seq=3 

भास्कर.कॉम | Mar 10, 2014, 18:31PM IST

पुणे। महाराष्ट्र के पुणे और आसपास के शहरों में पिछले 24 घंटो के दौरान तूफानी बारिश और ओलावृष्टि का कहर देखने को मिला है। भीषण ओलावृष्टि के चलते जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। खेतों में खड़ी फसल बर्बाद हो गई। कहीं पर पेड़ गिरे तो कहीं पर बिजली के खंभे गिर जाने से बिजली चली गई। ओलावृष्टि के कारण कई जानवरों की मौत हो गई। पश्‍चिम विदर्भ में भीषण ओलावृष्टि ने एक युवक की जान ले ली और तीन दर्जन से अधिक लोगों को घायल कर दिया।............................... 
 
 




15 फरवरी से 16 मार्च 2014  हेतु पृष्ठ संख्या-52 ,'निर्णय सागर,चंड-मार्तण्ड' पंचांग पर पहले ही से आगाह किया हुआ था ।:



 किन्तु वस्तु-स्थिति यह है कि प्रशासनिक अधिकारियों(IAS/PCS) को इस तरफ ध्यान देने की क्या ज़रूरत? और तो और पंडे-पुजारी भी अपना पेट भरने तथा जनता का खून चूसने (खटमल और जोंक की भांति) में ही संलिप्त रहते हैं। उनको ही ज्योतिषी मानते हुये 'वैज्ञानिकता-प्रगतिशीलता' का लबादा ओढ़े प्रबुद्ध जन 'ज्योतिष' को ही फिजूल और व्यर्थ बताते रहते हैं। तब परिणाम इससे भिन्न कैसे हो सकते हैं?चाहे वह उत्तराखंड त्रासदी हो अथवा कुम्भ -भगदड़ अथवा देवघर आदि मंदिरों की भगदड़।  जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ते रहने तथा उनका निर्बाध शोषण-उत्पीड़न करते रहने हेतु व्यापारी/उद्योगपति वर्ग 'पोंगापंथ-आडम्बर-ढोंग' को बढ़ावा देता रहता है-फिल्मों के माध्यम से भी और मंदिरों -मेलों -तमाशों के माध्यम से भी। 'शिवरात्रि' पर अखबारों में सुर्खियों के साथ छ्पा था कि ब्राह्मण पुजारी ने एक दलित महिला को मंदिर प्रवेश नहीं करने दिया था। क्यों जाते हैं लोग इन मंदिरों में? क्यों नहीं लोगों को समझाया जाता है कि 'भगवान' मंदिर में नहीं सर्वत्र व्यापक है। कैसे-






  मानव ही नहीं विश्व के सभी प्राणियों व वनस्पतियों के जीवन हेतु जिन पाँच तत्वों की विशद आवश्यकता है उनका समन्वय ही भगवान-खुदा-गाड है। देखिये कैसे?:

भ(भूमि) +ग(गगन-आकाश)+व (वायु)+I(अनल-अग्नि)+न(नीर-जल)=भगवान।
 
अध्यात्म=अध्ययन अपनी आत्मा का ।

धर्म=जो शरीर व समाज को धारण करने हेतु आवश्यक हैं ;जैसे-

सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।

लेकिन अफसोस यही है कि लोग सच्चाई को समझना और समझाना तो चाहते ही नहीं हैं बल्कि ऊपर से मखौल और उड़ाते हैं। यदि पंचांग में दी गई चेतावनी पर ध्यान देते हुये प्रशासनिक स्तर पर पहले ही सुरक्षात्मक उपाए कर लिए जाया करें तो इस तरह अपार जन-धन की क्षति को कम तो किया ही जा सकता है। 
01 मार्च ,शनिवार के दिन अमावस्या थी और 16 मार्च रविवार को पूर्णिमा है जो कि पर्यावरण हेतु सुखद नहीं है साथ ही निर्धनों,पशुओं व साधारण जनता हेतु पीड़ादायक स्थिति उत्पन्न करने वाली आदि  चेतावनी स्पष्ट रूप से उपरोक्त स्कैन डबल क्लिक करके पढ़ी जा सकती हैं। 

काश लोग बतबना पन छोड़ कर सच को स्वीकारें व मानवता की रक्षा हेतु तत्पर हों!

  ~विजय राजबली माथुर ©
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Thursday, February 27, 2014

जनतंत्र नहीं यह धन-तंत्र है :जनता क्या करे?---विजय राजबली माथुर






जब बहस होते-होते नौबत हाथापाई तक आ गयी और टीना शर्मा ने ‘आप’ के प्रवक्ता एजाज खान को एक जबरदस्त थप्पड़ रसीद कर दिया. दरअसल इंडिया न्यूज़ पर बहस चल रही थी कि केजरीवाल जाति-जुगाड़ की राजनीति कर रहे हैं?
 http://www.youtube.com/watch?v=gLMcKHkIhYM


नई लोकसभा के गठन हेतु चुनाव होने ही वाले हैं। परंतु स्थिति कुछ भिन्न होगी ऐसी कोई संभावना नहीं है। राज्यसभा सांसद तरुण विजय जी ने बातें तो सटीक कही हैं लेकिन उनको मानने वाले कहाँ हैं? 

1978 मे होटल मुगल कर्मचारी संघ के हम छह -सात लोग दिल्ली में होटल मौर्या के ट्रेड यूनियन साथियों से मिल कर आगरा ट्रेन से  वापिस लौट रहे थे। एक सज्जन ने दो सीटों पर अवैध कब्जा कर रखा था उनसे हमारे साथियों का विवाद हुआ तो उन्होने सांसद राजेन्द्र कुमारी बाजपेयी (जो  यू पी की पूर्व मंत्री भी थीं) की सिक्यूरिटी से सम्बद्ध होने का हवाला दिया और अड़ गए। जब मैंने उनसे बात की तो वह एक सीट छोडने पर राज़ी हो गए और हम लोग एडजस्ट हो गए। दरअसल वह राजेन्द्र कुमारी जी के भांजे अजिताभ बाजपेयी को छोडने आए थे। गाड़ी चलने पर अजिताभ जी अपनी सीट पर आए तब उनसे वार्तालाप हुआ। उनका कहना था अभी वह बिजनेस पर ध्यान दे रहे हैं और पैसा एकत्र करने के बाद राजनीति में उतरेंगे। वह राजनीति में आए या नहीं परंतु उन्होने जो बताया वह महत्वपूर्ण है। उनका कहना था कि आज राजनीति में दो तरह के लोग ही सफल हैं -

1)-एक वे जो खुद पैसे वाले हैं और समर्थक व कार्यकर्ता खरीद सकते हैं। 

2)-वे जो खुद फक्कड़ हैं और पैसे वालों के आगे खुद को बेच देते हैं। 

उनके कथन की व्यवहारिक सत्यता मैंने काफी निकट से देखी है,नामोल्लेख जानबूझ कर नहीं कर रहा हूँ। यही कारण है कि मेरे जैसा ईमानदारी पर चलने वाला साधारण इंसान राजनीति में पिछड़ा ही रहता है। न तो हम किसी को खरीद सकते हैं न इस बात को पसंद करते हैं और न ही हम बिक सकते हैं इसलिए हमारी बात नक्कारखाने में तूती की आवाज़ बन कर रह जाती है। 

जब पैसे वाले खुद या उनके नुमाईन्दे संसद में पहुंचेंगे तो वही होगा जो आजकल हो रहा है। अपने-अपने बिजनेस के हित में सांसद भिड़ते रहेंगे क्योंकि जनहित तो उनके लिए मुद्दा है ही नहीं। जो नए-नवेले आम आदमी के नुमाइंदे हैं वे तो और भी अधिक निकृष्ट एवं भ्रष्ट हैं जैसा कि प्रस्तुत वीडियो से स्पष्ट होता है। 

जनता के सामने यदि संसदीय लोकतन्त्र राहत देने में विफल रहता है तो सशस्त्र क्रान्ति के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचता है। किन्तु सशस्त्र क्रांति को देश-द्रोह के नाम पर कुचलना इन धनिकों के लिए और भी सुगम होता है जैसा कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में देखने को मिल रहा है। इसलिए बेहतर यही है कि सभी जनहितैषी वामपंथी दल परस्पर एकजुट होकर संसदीय चुनावों में भाग लें न कि धनिकों के ही इस या उस गुट के साथ तालमेल करें जैसा कि किया गया है। 

 ~विजय राजबली माथुर ©
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Wednesday, February 26, 2014

जयललिता का जयगान और उसके उल्टे परिणाम ---विजय राजबली माथुर

  






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Digest this: #RajyaSabha MPs Sachin Tendulkar and actress Rekha have spent "zero" rupee on development in their respective adopted areas in the last 2 years.



एस श्रीनिवासन साहब का निष्कर्ष यों ही नहीं ठुकराया जा सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारों को इस तरह छोड़ा जाना जनता में विपरीत प्रभाव डाल सकता है विशेष कर अन्य प्रदेशों में तो ऐसा होगा ही। जयललिता जी के जन्मदिवस पर समर्थकों द्वारा 'संसद' की आकृति का केक काट कर खा जाना भी 'संसदीय लोकतन्त्र' के लिए खतरे की घंटी ही सुनाता है। 

फिर पटकनी खाएँगे प्रकाश करात :


https://www.facebook.com/cpofindia/photos/a.335629103138331.91488.120263388008238/721068401261064/?type=1&theater

सी पीएम महासचिव खुद को आधुनिक राजनीति का चाणक्य भले ही समझते रहें लेकिन उनको पटकनियाँ खाते रहने की आदत और शौक है। पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह के ज्योति बसु को 1996 में प्रधानमंत्री बनाने के सुझाव को ठुकरा कर भी उन्होने पटकनी ही खाई थी जिस पर बाद में कामरेड ज्योति बसु को 'ऐतिहासिक भूल' कह कर स्वीकारना ही पड़ा था। 

फिर 2012 में ममता बनर्जी द्वारा प्रणव मुखर्जी के विरोध को वास्तविक मानते हुये राष्ट्रपति चुनाव में उनको समर्थन देकर भी वाह ताज़ातरीन पटकनी खा चुके थे क्योंकि ममता जी ने बड़ी चतुराई से अंतिम क्षणों में प्रणव मुखर्जी साहब को खुला समर्थन दे दिया था। 

अपनी गलतियों से कोई सबक न सीखते हुये उन्होने इस बार जयललिता जी को पी एम बनाने का झण्डा बुलंद किया है जबकि जयललिता जी के बारे में एस श्रीनिवासन साहब का निष्कर्ष बिलकुल सटीक और व्यावहारिक है। 

CPI के आफ़िशियल पेज पर संलग्न फोटो यह बताता है कि  1964 में स्थापित पार्टी सी पी एम  के महासचिव साहब देश की सर्वाधिक पुरानी पार्टी CPI के महासचिव को तुच्छ समझते हैं तभी तो कामरेड सुधाकर रेड्डी साहब को अपने से पीछे की पंक्ति में स्थान दिलवाया है।1885 में स्थापित कांग्रेस के 1977 में जनता पार्टी में विलीन होने के बाद 1925 में स्थापित CPI ही आज सबसे पुरानी पार्टी है । केंद्रीय सत्ता में भागीदार इन्दिरा कांग्रेस की स्थापना तो 1969 ई में ही हुई है। 

सी पी आई को पृष्ठभूमि में धकेलना और जयललिता जी से हाथ मिलाना प्रकाश करात साहब को एक नई पटकनी देने वाला ही साबित होने जा रहा है। तामिलनाड में मार्क्सवादी फिल्म निर्माता जेमिनी गनेशन की पुत्री राज्यसभा सदस्य 'रेखा' ,उत्तर-प्रदेश में बसपा-मायावती जी तथा पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के साथ मोर्चा बनाना चाहिए था जो कि करात साहब की ज़िद्द के चलते संभव न हो सकता था। 

सी पी एम के समर्थक 'टाईम्स आफ इंडिया' की प्रस्तुति के माध्यम से 'रेखा' को अकर्मण्य सिद्ध कर रहे हैं जिसमें बताया गया है कि पिछले दो वर्षों में उन्होने 'सांसद निधि' का धन व्यय नहीं किया है। वस्तुतः ऐसा करके 'रेखा'जी ने एक आदर्श ही स्थापित किया है। वह कला-क्षेत्र 'फिल्म' से संबन्धित हैं जहां उनको सरकारी धन लगाने की क्या ज़रूरत थी जिसे अन्य जनोपयोगी कार्यों में व्यय किया  जा सकता है? किन्तु  NGOs चलाने वाले CPM के लोग इसे इसलिए गलत बता रहे हैं कि ऐसा न करके रेखा जी ने IAS अधिकारियों,NGOs संचालकों,सरकारी कर्मचारियों द्वारा 'लूट' किए जाने का मार्ग अवरुद्ध कर दिया है। 


जहां CPM के NGOs संचालक सांसद निधि द्वारा लूट में सहयोगी न होने पर 'रेखा' जी की आलोचना कर रहे हैं वहीं CPI के राष्ट्रीय सचिव कामरेड अतुल कुमार अनजान साहब का कहना है-"देश से भ्रष्टाचार खत्म कराने के लिए सांसद व विधायक निधि का समाप्त होना बहुत ज़रूरी है। "

"राज्येश'बुध' की महादशा मे 12 अगस्त 2010 से 23 फरवरी 2017 तक की अंतर्दशाये भाग्योदय कारक,अनुकूल सुखदायक और उन्नति प्रदान करने वाली हैं। 24 फरवरी 2017 से 29 जून 2017 तक बुध मे 'सूर्य' की अंतर्दशा रहेगी जो लाभदायक राज्योन्नति प्रदान करने वाली होगी।
अभी तक रेखा के किसी भी राजनीतिक रुझान की कोई जानकारी किसी भी माध्यम से प्रकाश मे नहीं आई है ,किन्तु उनकी कुंडली मे प्रबल राज्य-योग हैं। जब ग्रहों के दूसरे परिणाम चरितार्थ हुये हैं तो निश्चित रूप से इस राज्य-योग का भी लाभ मिलना ही चाहिए।"
19 अप्रैल 2012 को इसी ब्लाग में मैंने यह विश्लेषण दिया था और 26 अप्रैल 2012 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल जी ने 'रेखा'जी को राज्यसभा सदस्य मनोनीत करने की घोषणा कर दी थी। इस निष्कर्ष को देखते हुये जयललिता जी की अपेक्षा यदि वांम मोर्चा ने 'रेखा जी' को आगे करके तमिल पी एम की कल्पना की होती तो स्थिति लाभप्रद रहती। किन्तु जब ज्योतिष को मानते नहीं तो उसके निष्कर्ष पर कैसे ध्यान दे सकते थे? अब हो सकता है कि इन्दिरा कांग्रेस रेखा को आगे करके लाभ उठा ले।" 

यदि 2014 के चुनावों के बाद 'रेखा' जी अथवा 'ममता' जी की अगुवाई में कांग्रेस एक बार फिर सत्ता पर काबिज होती है तो  इसके लिए प्रकाश करात साहब व उनकी सी पी एम ही उत्तरदाई होगी जिसने 'दीवार पर लिखे को ' न पढ़ने की कसंम  खा रखी है। 


~विजय राजबली माथुर ©
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Sunday, February 23, 2014

चुनावी परिदृश्य में तृणमूल कॉंग्रेस व ममता बनर्जी की स्थिति ---विजय राजबली माथुर


'रेखा जी' के अतिरिक्त एक और महिला( जिनसे वांम मोर्चा नफरत रख रहा है ) ममता बनर्जी का समय भी उनके अनुकूल चल रहा है। रण-नीति का तक़ाज़ा था कि 'गैर भाजापा' और 'गैर कांग्रेस'मोर्चे का नेता ममता जी को स्वीकार करके दोनों को परास्त किया जाता। किन्तु राजनीतिक लाभ को नहीं व्यक्तिगत द्वेष को वरीयता देने से हानि उठानी पड़ सकती है क्योंकि यहाँ भी हो सकता है कि कांग्रेस घोषित न सही तो अघोषित तालमेल ममता जी से बैठा कर लाभदायक स्थिति अपने लिए बना सकती है।



"अखबारी विश्लेषण से अलग मेरा विश्लेषण यह है कि जन्म के बाद ममता जी की 'चंद्र महादशा' 07 वर्ष 08 आठ माह एवं 07 दिन शेष बची थी। इसके अनुसार 03 जूलाई 2010 से वह 'शनि'महादशांतर्गत 'शुक्र' की अंतर्दशा मे 03 सितंबर 2013 तक चलेंगी। यह उनका श्रेष्ठत्तम समय है। इसी मे वह मुख्य मंत्री बनी हैं। 34 वर्ष के मजबूत बामपंथी शासन को उखाड़ने मे वह सफल रही हैं तो यह उनके अपने ग्रह-नक्षत्रों का ही स्पष्ट प्रभाव है।
इसके बाद पुनः 'सूर्य' की शनि मे अंतर्दशा 15 अगस्त 2014 तक उनके लिए अनुकूल रहने वाली है और लोकसभा के चुनाव इसी अवधि के मध्य होंगे। केंद्र (दशम भाव मे )'शनि' उनको 'शश योग' प्रदान कर रहा है जो 'राज योग'ही है।

हाल ही में ममता बनर्जी को अन्ना हज़ारे द्वारा व्यक्त समर्थन से बौखला कर कुछ वामपंथी चिंतकों ने उनको RSS/मोदी समर्थक घोषित कर दिया है जिसका जवाब ममता जी ने इस प्रकार दिया है:

:"ममता ने कहा,किसी भी हाल में मोदी को नहीं दूंगी समर्थन"

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता 


बनर्जी ने भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी को समर्थन 

देने से साफ इनकार कर दिया है। ममता ने कहा कि भाजपा दंगे 

करवाकर सत्ता में आने वाली पार्टी है। एक समाचार पत्र को दिए 

साक्षात्कार में ममता ने कहा कि न भाजपा,कांग्रेस का विकल्प नहीं हो 

सकती और न ही कांग्रेस,भाजपा का विकल्प हो सकती है। हम न तो 

भ्रष्ट सरकार के साथ रह सकते हैं और न ही दंगे करवाने वाली पार्टी के 

साथ जा सकते हैं। ओपिनियन पोल के मुताबिक तृणमूल कांग्रेस 

आगामी लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में सबसे बड़ी पार्टी के तौर 

पर उभरेगी।केन्द्र में अगले गठबंधन को आकार देने में तृणमूल कांग्रेस 

बड़ा फैक्टर हो सकती है। खुद के अगले प्रधानमंत्री बनने को लेकर भी 

ममता बनर्जी स्पष्ट नहीं है। तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ने कहा कि कई 

नेता हैं जो देश के अच्छे नेता हो सकते हैं। लोकतंत्र और जनता ही तय 

करेगी कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा। ममता ने कहा कि केन्द्र में 

अगली सरकार नया गठबंधन बना सकता है। बकौल ममता,मुझे 


लगता है कि अगर चुनाव के बाद भाजपा और कांग्रेस की सीटों को जोड़कर 



देखेंगे तो आंकड़ा आधे से भी कम होगा। फेडरल फ्रंट ही भविष्य है।

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27 नवंबर 2012 को स्थगित रैली 16 फरवरी 2014 को लखनऊ में  आयोजित करवाकर ममता जी ने संकेत दे दिया है कि यदि मुलायम सिंह प्रकाश करात के फेर में फंसे रहे तो वह  उनके  सहयोग के बगैर ही फेडरल फ्रंट की दिशा में बढ़ सकती हैं।यदि उत्तर-प्रदेश में ममता जी ने मायावती जी से तालमेल बैठा लिया तो यहाँ भी उनको काफी मजबूती मिल जाएगी।  सी पी एम में भाजपा के भगौड़ों को शामिल किए जाने से उसके भविष्य की दिशा का खुलासा हो चुका है। इस सूरत में ममता बनर्जी के तर्क जनता को आसानी से ग्राह्य हो सकते हैं। सी पी एम की शुतुरमुरगी चालें वामपंथ को जोरदार झटका दे सकती हैं। तब 'पाछे पछताए होत क्या? जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत' । अभी भी बहुत समय है कि सी पी एम को छोड़ कर समस्त वामपंथ एकजुट होकर  ममता बनर्जी के नेतृत्व में भाजपा/कांग्रेस/आ आ पा  को संयुक्त रूप से चुनावों में परास्त कर सकता है। 

~विजय राजबली माथुर ©
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