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Monday, September 30, 2019

हरि सिंह कश्मीरियों के बीच बेहद अलोकप्रिय थे :वे गैर-कश्मीरी शासक थे: ------ अजेय कुमार

 
http://epaper.navbharattimes.com/details/63237-77176-1.html

अजेय कुमार
कश्मीर समस्या के लिए क्या नेहरू जिम्मेदार ? 

शेख अब्दुल्ला पर जब महाराजा ने राजद्रोह का मुकदमा चलाया तो उनकी ओर से लड़ने के लिए बतौर वकील जवाहरलाल नेहरू कश्मीर गए
अगर महाराजा हरि सिंह ने ढुलमुल रवैया नहीं अपनाया होता तो घाटी की यह हालत नहीं होती
बीते 4 सितंबर को बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने एक विडियो जारी किया है जिसमें जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने और उसे दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांटने को एक ऐतिहासिक कदम बताया गया है। यह 11 मिनट का विडियो है, जिसके लगभग अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि पटेल व आंबेडकर दोनों नेहरू की कश्मीर नीति के खिलाफ थे। विडियो के अनुसार सरदार पटेल ने 562 देसी रियासतों का भारत में सफल ढंग से विलय करवा दिया मगर कश्मीर मुद्दे को नेहरू ने अपने हाथों में ले लिया और राज्य को विशेष दर्जा देने की भयंकर भूल की।
गांधी की अपील 

सवाल है कि केवल कश्मीर को नेहरू ने अपने हाथों में क्यों लिया? जिन देसी रियासतों का विलय पटेल ने कराया, वे भारत की भौगोलिक सीमा के अंदर थीं और उनमें से किसी पर विदेशी आक्रमण नहीं हुआ था। कश्मीर भारत-पाकिस्तान की सीमा पर था और 1941 की जनगणना के अनुसार घाटी में मुसलमानों की जनसंख्या 93.45 प्रतिशत, जम्मू में 61.35 प्रतिशत (जम्मू के कुल 6 जिलों में से तीन जिले मुस्लिम बहुल हैं) और लद्दाख, गिलगिट आदि में 86.7 प्रतिशत थी। इस तरह कश्मीर की भौगोलिक, सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां अन्य रियासतों से अलग थीं। इतनी बड़ी मुस्लिम आबादी के बावजूद जम्मू-कश्मीर की सत्ता महाराजा हरि सिंह के हाथों में थी जो एक डोगरा हिंदू थे। अमृतसर की संधि के बाद केवल 75 लाख रुपये में घाटी और लद्दाख के क्षेत्र जम्मू डोगराशाही के अधीन आ गए थे।

हरि सिंह कश्मीरियों के बीच बेहद अलोकप्रिय थे। वे दरअसल गैर-मुस्लिम से अधिक गैर-कश्मीरी शासक थे। उनके शासन के विरुद्ध शेख अब्दुल्ला ने संघर्ष का आह्वान किया और ‘महाराजा, कश्मीर छोड़ो’ का नारा दिया। कश्मीर के इतिहास में विभाजन रेखा इस्लाम नहीं, बल्कि कश्मीरी से गैर-कश्मीरी शासन का परिवर्तन है। दूसरी ओर, नेहरू और गांधी की अहम भूमिका थी जिन्होंने कश्मीरी मुसलमानों को पाकिस्तान जाने से रोका। जब महाराजा ने शेख अब्दुल्ला पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया तो बतौर वकील उनकी ओर से लड़ने के लिए जवाहरलाल नेहरू कश्मीर गए। गांधी जी ने भी एक अगस्त 1947 को कश्मीर का दौरा किया जिसने कश्मीरियों को प्रभावित किया। गांधी जी ने अमृतसर समझौते, जिसने महाराजा को कश्मीर पर शासन करने का कानूनी अधिकार दिया था, को एक ऐसी सेल-डीड कहा, जिसका अंग्रेजी शासन खत्म होने पर कोई औचित्य न था। उन्होंने कश्मीर की जनता की तारीफ की कि जहां शेष भारत में सांप्रदायिक दंगे हो रहे हैं, कश्मीर एक आशा की किरण है। इस तरह नेहरू और गांधी, दोनों ने अपनी भावनात्मक अपीलों से मुस्लिम सांप्रदायिकता को बेअसर करके जनता में कश्मीरी देशभक्ति की भावना जागृत की। इसलिए आज अगर कश्मीर भारत का हिस्सा है तो उसका बहुत कुछ श्रेय शेख अब्दुल्ला के साथ-साथ नेहरू और गांधी को भी जाता है। 

शेख अब्दुल्ला को भरोसा था कि भारत आजादी के बाद नेहरू के नेतृत्व में एक धर्मनिरपेक्ष प्रगतिशील देश बनेगा। उन्हें जिन्ना की सांप्रदायिक राजनीति से नफरत थी। जिन्ना ने शेख अब्दुल्ला के आंदोलन को ‘गुंडों का आंदोलन’ कहा था। इधर हरि सिंह ‘मैं इधर जाऊं या उधर जाऊं’ की पसोपेश में थे। 12 अक्टूबर, 1947 को रियासत के उप दीवान राय बहादुर बत्रा ने घोषणा कीः ‘हम हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों से मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखना चाहते हैं। भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का हमारा कोई इरादा नहीं है।’

कश्मीर समस्या की जड़ यहां है, नेहरू की नीतियों में नहीं। अगर महाराजा सही वक्त पर सही रुख अपनाते तो आज कश्मीर का मुद्दा कहीं न होता! महाराजा के ढुलमुलपन का फायदा पाकिस्तान उठाना चाहता था। पाकिस्तान के दो दूतों ने श्रीनगर में शेख अब्दुल्ला से मुलाकात की और पाकिस्तान के पक्ष में निर्णय कराने पर जोर दिया। वरना, उनका कहना था कि दूसरे तरीके इस्तेमाल किए जाएंगे। यह सरासर धमकी थी। शेख अब्दुल्ला ने अपनी आत्मकथा ‘आतिशे चिनार’ में लिखा है कि जब वे पाकिस्तान के कुछ नेताओं से बातचीत में मशगूल थे, पाकिस्तानी हमलावर कश्मीर के लोगों की जमीन और उनके अधिकारों को अपने पांवों तले कुचल रहे थे।’

कश्मीर पर कई पुस्तकों के लेखक बलराजपुरी ने लिखा है ‘इन घटनाओं के कारण महाराजा हरि सिंह के पास हिंदुस्तान की तरफ मुड़ने के अलावा कोई चारा न था। महाराजा ने नेहरू तक यह संदेश पहुंचाया कि मैं भारत में शामिल हो सकता हूं, शर्त यह है कि भारतीय सेना के जहाज इसी शाम को श्रीनगर पहुंच जाएं, अन्यथा मैं जाकर जिन्ना से बात कर लूंगा। नेहरू को यह सौदेबाजी अच्छी नहीं लगी लेकिन शेख अब्दुल्ला के आग्रह पर वे नरम पड़े और 27 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तानी आक्रमणकारियों का सफाया करने के लिए भारतीय सेना भेजी।’ 
कोई मतभेद नहीं : 


नेहरू ने कश्मीर मामले से जुड़े सभी मुद्दों पर पटेल समेत केंद्रीय मत्रिमंडल से बाकायदा बातचीत की। प्रख्यात पत्रकार दुर्गादास ने 10 खंडों में पटेल के पत्रों (1947 से 1950 तक) का एक बड़ा संकलन ‘सरदार पटेल्ज कॉरेसपॉन्डेंस’ नाम से तैयार किया है। इसमें नेहरू को लिखे कई पत्र हैं जिनमें कहीं भी इसका जिक्र नहीं है कि उनके नेहरू से कोई गहरे मतभेद थे। पटेल जैसे ‘लौह-पुरुष’ क्या अपना अपमान सह सकते थे! अगर कोई मतभेद होते तो वे फौरन केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे देते। आज पटेल के उस भाषण को याद करने की जरूरत है जो उन्होंने 30 अक्टूबर, 1948 को बंबई में एक आमसभा को संबोधित करते हुए दिया था, ‘हम कश्मीर में इसलिए हैं क्योंकि वहां के लोग ऐसा चाहते हैं। जिस क्षण हमें लगेगा कि कश्मीर के लोग नहीं चाहते कि हम वहां रहें, उसके बाद हम एक मिनट भी वहां नहीं रुकेंगे.... हम कश्मीर को धोखा नहीं दे सकते।’
साभार : 

http://epaper.navbharattimes.com/details/63237-77176-1.html


 ~विजय राजबली माथुर ©

Saturday, September 28, 2019

जीत गए तो 71 , हार गये तो 62 ------ मनीष सिंह / संतोष कुमार झा






Santosh Kumar Jha
28-09-2019 
Manish singh
https://www.facebook.com/manish.janmitram/posts/2450682738349362

हर सितारे का एक वक्त होता है। उसके बनने का, चमकने का और धूमिल हो जाने का भी..। नेपोलियन के लिए वाटरलू, हिटलर के लिए ईस्टर्न फ्रंट और नेहरू के लिए चीन..

15 अगस्त 1947 में आजाद भारत की सीमाएं, ब्रिटिश भारत से विरासत में मिली। पश्चिमी सीमा तो बंटवारे में ब्रिटिश ने रेडक्लिफ लाइन से तय कर दी थी। कश्मीर बाद में हमसे जुड़ा, जुड़ने के पहले कुछ हिस्सा पाक दबा चुका था। वहां एक्चुअल कन्ट्रोल की लाइन को फोर्टिफाइ कर सेफ किया गया। मगर पूर्वी सीमा बड़ी अस्पस्ट थी।

पूर्वी सीमाओ का रिफरेंस पॉइंट, अंग्रेजो के दो सौ साल के राज दौरान अलग अलग सन्धियों से तय होनी थी। अंग्रेज युद्ध मे "इलाके" जीत लेते थे, इलाके खरीद भी लेते थे (कुमाऊँ गढ़वाल नेपालियों से खरीदा), इलाके लीज पर लेते थे ( गिलगित बल्टिस्तान, 1930 में कश्मीर राजा से 60 साल की लीज पर लिया था)। इन्ही सन्धियों को रिफरेंस पॉइंट लेकर भारत को अपनी सीमा तय करनी थी, जिसमे पड़ोसी की भी मंजूरी हो।

पर सन्धियों में इलाके लिखे होते हैं, कागज पर डॉटेड लाइन बना दी जाती है, मान ली जाती है। जमीनी बार्डर अलग चीज है,वह जमीन पर पक्की लाइन खींचकर तय की जाती है। इसलिए जॉइंट बॉर्डर कमीशन बनते, सर्वे होता, नक़्शे के आधार पर जमीनी लाइन खिंचती थी।

मगर चीन के साथ ब्रिटीश ऐसा कर नही पाए। पहली बात ये, मजे की.. की ब्रिटिश के लिए चीन से सीमा मिली ही नही थी। वो तिब्बत था, जिसपर ढीला कन्ट्रोल चीन राजा का था जरूर, मगर तिब्बतियन ट्राइब्स लगभग स्वतंत्र थे। ब्रिटिश ने तिब्बतियों को कई झड़पों में दबाया। फिर 1914 में शिमला में एक कान्फ्रेंस हुई। तिब्बती और ब्रिटिश इंडियन अफसरों ने समझौता करके बार्डर तय किये गए। अरुणाचल के इलाके तय करती इस रेखा को "मैकमेंहन लाइन" कहा गया। कई स्थानों पर इस लाइन ने तिब्बती इलाके, ब्रिटिश भारत मे दिखाए। तिब्बती कमजोर थे, दस्तखत कर गए। सो टेक्निकली तिब्बती कल्चर कई इलाके नक़्शे में ब्रिटिश सरकार के हो गए। मगर जमीन पर अंग्रेजो ने इन्हें न अपने प्रशासन में लिया, न फोर्टिफाइ किया। तवांग ऐसा ही इलाका था, जिसका जिक्र आगे आएगा।

47 में इन्ही सीमाओ (नक्शों) को हमनें विरासत में पाया। तिब्बत तो मित्र था, कोई समस्या नही थी। पर समस्या आयी जब माओइस्ट चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया। तिब्बत अब चीन था, अग्रेसिव था, अब कम्युनिस्ट भी था, रूस की बैकिंग थी। भारत को देश हुए जुम्मा जुम्मा दो साल हुए थे। सेना कम थी, पश्चिम में पाकिस्तान से उलझी हुई थी। तो पूर्व में चीन से उलझना बेवकूफी थी। नेहरू ने दो चीजें तय की। एक- चीन को संतुष्ट रखना, दो- सीमा मामले पर मैकमैहन लाइन पर दृढ़ रहना।

खुश करने के लिए चीन की कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता दी, तब जबकि पूरे पश्चिम ने माओ को चीन का अधिकृत शासक मानने से इनकार कर दिया था। चीन की यूएन में परमानेंट सीट होल्ड हुई, तो नेहरू ने उसकी वकालत की। चीन की सीट इंडिया को दिए जाने के लालच से भी खुद को बचाया।

दूसरी ओर, सीमा के मसले पर चीन के भारतीय राजदूत पणिक्कर के द्वारा मैकमैहन लाइन को फाइनल मानने का संदेश भेजा। चाइनीज पीएम चाऊ का जवाब-"हमे अपनी मित्रता, और सांस्कृतिक आदान प्रदान पर ध्यान देना चाहिए. सीमा का मसला, जैसी परम्पराये हैं, उस आधार पर देख लेंगे"। अब समझना कठिन था की मैकमैहन पर चीन उत्तर हां है या ना??

नेहरू ने टेस्ट किया। तवांग, जो था मैकमैहन लाइन में हमारी ओर, मगर था तिब्बती इलाका। 1951 में भारतीय प्रशासन वहां पहुंचा औऱ अपने नियंत्रण में ले लिया। पहली बार आजाद भारत ने मैकमैहन लाइन को एक्सरसाइज किया। देश झूम उठा। चीन की कोई प्रतिक्रिया नही आई। हमने इसे मैकमैहन लाइन पर चीन की स्वीकृति माना। अरुणाचल और नॉर्थ ईस्ट में मसला सुलझने का सन्देश समझा गया।

मगर 1952 में एक घटना हुई। ऊपर अक्साई चिन नाम का इलाका है। इसे ब्रिटिश मैप्स में कश्मीर.. (अब भारत) मे दिखाया गया था। इन नक्शो को ब्रिटिश सर्वेयर्स ने एकतरफा बनाया था, और तिब्बत/ चीन को अप्रूवल के लिये भेजा था। तिब्बत या चीन की ओर से कभी वेरिफाई करने का रिकार्ड नही है। ठंडा, निर्जन रेगिस्तान जैसे इस इलाके में कश्मीर राजा, या तिब्बतीयों, या अंग्रेजो ने सुरक्षा या गश्त की जहमत कभी नही की थी। इस अन्डिफेंडेड इलाके से होकर चीन ने एक सड़क बना ली थी।

सड़क थी जिनजियांग इलाके को तिब्बत से जोड़ने के लिए। वहां विद्रोह होते रहते थे। सेना पहुंचाने के लिए उसकी जरूरत थी। मगर विरासत में मिले नक़्शे के लिहाज से हिंदुस्तानी इलाके का वॉयलेशन था। हिंदुस्तान चीत्कार उठा। "नेहरूऊऊऊ.., सुई के नोक के बराबर भारत भूमि चीन को मत देना"।

नेहरू ऐसी वारमोंगरिंग के खतरे समझते थे। समझाने की कोशिश की- "बंजर पहाड़ है, ज्यादा पंगा मत लो"। तो हमने गंजा सिर दिखा दिया-" इस सिर पर कुछ नही उगता, तो कटवा दें क्या??" .

बिल्कुल नही। अब सीमा पर चौकसी मजबूत की जाने लगी। सेना में खूब भर्ती होने लगी। नेशनल डिफेंस कालेज, एनसीसी वगेरह उसी दौर में आये। और आये कृष्णा मेनन। बड़े योग्य, ज्ञानी, प्रॉफेशनल और उतने ही बदतमीज डिफेंस मिनिस्टर। पूर्वी सीमा के लिए अलग से नई कोर बनी। पहाड़ो में सड़कें, हवाई अड्डे बनने लगे।

चीन देख रहा था, आपत्ति कर रहा था। नेहरू ने उसे भी सन्तुष्ट रखने की कोशिश की। 1954 में पंचशील समझौता किया। याने तिब्बत पर चाइनीज अधिकार स्वीकार कर लिया। हिंदी चीनी भाई भाई कहलाए। नेहरू यूएन में उंसके पक्ष में बोलते रहे। मगर फिर धर्मसंकट आ गया।

1958 में दलाई लामा भारत भाग आये। नेहरू ने खुद मिलकर समझाया, मगर लामा वापस जाने को तैयार नही हुए। भारत मे बैठकर तिब्बत की निर्वासित सरकार बना ली। उधर नई नई शुरू हो गई बॉर्डर पेट्रोल में रोज रोज चाइनीज सेना का सामना होता। इसे हमारी फारवर्ड पॉलिसी कहा गया। रोज हेडलाइन्स बनती, संसद में बहस होती, चीन की निगाह में भारत होस्टाइल होता जा रहा था। सीमा पर उसने भी इन्फ्रास्ट्रक्चर और फॉर्मेशन बढ़ाने शुरू किए। उसकी भी खबरें बनती, याने और हेडलाइन, और बहस...

उधर पाकिस्तान में एक जनरल ने सत्ता हाथ मे ले ली। भारत मे जनरल थिमैया और बदतमीज मेनन की रोज किचकीच होती। इसमे नए इलाके में घुसकर पेट्रोलिंग के मुद्दे शामिल थे। थिमैया ने इस्तीफा तक दे दिया, नेहरू के कहने पर वापस लिया। इस किचकिच और अविश्वास का फायदा मिला- बीएम कौल को। कहते है कि वे नेहरू और मेनन के विश्वाशपात्र थे। दर्जन भर अफसर दरकिनार कर उन्हें उप सेनाध्यक्ष बनाया गया, और नई नवेली ईस्टर्न कमांड उनको दी गयी। अपनी जान में नेहरू, मेनन और कौल ..सेना और सीमा मजबूत करने में जुटे थे।

1960 में चाऊ भारत आये। एक प्रस्ताव दिया। नीचे मैकमोहन लाइन हम मान लेते हैं, इस तरह नेफा (अरुणाचल) आपका।। ऊपर अक्साई चिन पर हमारा अधिकार स्वीकार कर लो। बॉर्डर पर झड़पें रोकने के लिए दोनो सेनाएं, स्टेटस क्वो से 20 किमी पीछे लौट जाएं। भारत ने मना कर दिया। काहे सर पे बाल नही, मगर सर थोड़ी कटा सकते हैं। इसलिए- "सीमा वहीं बनाएंगे"

1961 आया। भारत की सेना ने गोआ जीत लिया। यूएन में भी पुर्तगाल को नेहरू ने सुलट लिया। याने सेना भी मजबूत है, और विश्व मे हमारी पकड़ भी। छप्पनिया देश का और क्या सबूत चाहिए। उधर पूर्वी सीमा पर झड़पें खूनी हो चली थी। युद्ध आसन्न था।

20 अक्टूबर 1962 को चीन ने अक्साई चिन इलाके पर धावा बोला। नीचे तवांग के इलाके में भी उसकी फौजें घुसी। नेहरू देश से बाहर थे। भागे भागे आए, तो पता चला, बहादुर जनरल कौल हार्ट अटैक के नाम पर दिल्ली आकर भर्ती थे। उन्हें वापस मोर्चे पर दौड़ाया। वर्ल्ड कम्युनिटी से सहयोग चाहा। मगर सितारे उल्टे चल रहे थे।

क्यूबा का मिसाइल संकट चल रहा था। जब रूस ने अपने परमाणु मिसाइल क्यूबा में लगाकर सारे अमरीका को घेरे में ले रखा हो, अमरीका ने तैनाती तुरन्त न हटाने पर रूस पर सारी मिसाइल तान रखी हो, जब सारा विश्व परमाणु युद्ध के मुहाने पर खड़ा हो। उस वक्त एशिया की पहाड़ियों पर लड़ रहे, तीसरी दुनिया के दो देशों के बीच- बचाव की फुर्सत किसे। हम पिटते रहे.. गाते रहे - कर चले हम फिदा ...।

18 दिन का क्यूबा संकट खत्म हुआ। रूस को फुर्सत मिली, तो चीन को समझाया। चीन का उद्देश्य भारत को सबक सिखाना था। काफी टेरेट्रीज जीत चुका था। 19 नवम्बर को उसने एकतरफा युद्ध विराम कर दिया। भारत की निर्णायक हार हो चुकी थी। अक्साई चिन और अरुणाचल में वो जितना देने को तैयार था, उससे आगे आकर कब्जा कर गया। आज भी वे कब्जे बरक़रार हैं।

इसे सैनिक असफलता कहें, कूटनीतिक असफ़लता कहे, राजनैतिक असफलता कहे, या नेहरू की निजी असफलता.. भारत का मान मर्दन पूरा हो चुका था। मेनन- कौल के इस्तीफे आये। नेहरू अस्ताचल में चले गए। डेढ़ साल बाद मर गए। एसटीडी/एड्स से तो नही.. मगर हार्ट अटैक से।

चीन, नेहरू का वाटरलू था। वाटरलू नेपोलियन की महानता को खत्म नही करता, मगर पूर्ण विराम तो लगाता ही है। चीन से हार के लिए नेहरू जिम्मेदार थे, कोई शक नही। मगर अनिच्छुक नेहरू को इस तरफ धकेलने के लिए उस वक्त की संसद, अखबारो और जनमानस को भी एक छटाँक जिम्मा लेना चाहिए।

नक्शों पर, सैंकड़ो साल पहले.. किसी और के विजयोत्सव के दौरान खींची गई रेखाओं के आधार पर, हम आज विजयी भाव लेकर पड़ोसियों से युद्ध की ताल ठोकें। वर्तमान को नकार दें। सड़को पर, संसद में , मीडिया में , गली कूचों पर " सीमा वहीँ बनाएंगे" का वीरभाव दिखाएं। ये राष्ट्रीय भाव जगाने को अच्छा है, शायद चुनाव जीतने के लिए भी। मगर युद्ध न प्रधानमंत्री को लड़ना होता है, न मीडिया, न सांसदो को, न जनरल को, न गली कूचों बैठी गर्वोंन्मत जनता को। मरते बस सैनिक है।


वे सैनिक, कोई सिख, कोई जाट मराठा, कोई गुरखा कोई मद्रासी... हाड़मांस के आम इंसान, जो सर्द पहाड़ी पर हमारी आपकी शेखी की पताका लेकर ऊंचे से ऊंचा फहराने के लिए वर्दी डालकर जान देते है। जीत गए तो 71 , हार गये तो 62

https://www.facebook.com/santoshkumar.jha.50/posts/2570889722933147


  ~विजय राजबली माथुर ©

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Wednesday, May 9, 2018

धर्म आधारित राष्ट्र लोकतंत्र विरोधी अवधारणा है ------ अफलातून अफ़लू / सांप्रदायिकता है साम्राज्यवाद की प्रहरी ------ विजय राजबली माथुर

 * किसी धर्म आधारित राष्ट्र में लोकतंत्र कभी पनप नहीं सकता । संविधान , न्यायपालिका , और प्रेस का हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर अपमान कट्टरपंथियों के लोकतंत्र विरोधी रुख की ही बानगी है । गोलवलकरपंथी राष्ट्रतोड़क ‘राष्ट्रवादियों’ के चंगुल में में देश चला गया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक होगा । इसलिए समय रहते इनके हिटलरी मंसूबों को उजागर करें और इनके खिलाफ़ चौतरफ़ा ढंग से सक्रिय हों ।
** एडवर्ड थाम्पसन ने 'एनलिस्ट इंडिया फार फ़्रीडम के पृष्ठ 50 पर लिखा है-"मुस्लिम संप्रदाय वादियों  और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों मे गोलमेज़ सम्मेलन के दौरान अपवित्र गठबंधन रहा। "
*** अफलातून साहब की इस चेतावनी " गोलवलकरपंथी राष्ट्रतोड़क ‘राष्ट्रवादियों’ के चंगुल में मे देश चला गया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक होगा । इसलिए समय रहते इनके हिटलरी मंसूबों को उजागर करें और इनके खिलाफ़ चौतरफ़ा ढंग से सक्रिय हों ।" के मद्देनजर देश की जागरूक जनता और देश हितैषी दलों की मनसा - वाचा - कर्मणा एकता की महती आवश्यकता है।
Aflatoon Afloo
Varanasi
राष्ट्र की हिटलरी कल्पना फासीवाद के नाम से कुख्यात है । हिटलर ने ‘नस्ल’ की कथित शुद्धता और यहूदी विद्वेष की विक्षिप्तता को फैलाकर जर्मनी को भीषण बर्बरता और रक्तपात में डुबो दिया और विश्व भर की लांछना का पात्र बना दिया । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का धर्म आधारित राष्ट्र भी उसी प्रकार का एक बर्बर उद्देश्य है । हिटलर से तुलना करके या हिटलर का उदाहरण देकर हम संघ-परिवार पर कोई काल्पनिक आरोप नहीं लगा रहे हैं । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गौरव-पुरुष गुरु गोलवलकर ने खुद १९३९ में लिखी अपनी पुस्तक ‘ वी ऑर आवर नेशनहुड डिफाइन्ड ‘ ( हम या हमारी राष्ट्रीयता परिभाषित ) ( अब उनके चेले अधिकृत रूप से कहने लगे हैं कि यह उनकी लिखी किताब नहीं है , उनका अनुवाद है ) में कहा था –

” नस्ल और इसकी संस्कृति की पवित्रता को बनाए रखने के लिए जर्मनी ने यहूदियों से अपने देश को रिक्त कर दुनिया को स्तम्भित कर दिया । नस्ल का गर्व यहाँ अपनी उच्चतम अभिव्यक्ति पाता है। जर्मनी ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि संस्कृतियों और नस्लों के फर्क जो बुनियाद तक जाते हैं , एक संपूर्ण इकाई में जज़्ब नहीं किए जा सकते । हम भारतीयों के लिए यह एक अच्छा सबक है जिससे लाभ उठाना चाहिए । “

यह सचमुच बड़े शर्म की बात है कि जिस विद्वेष और क्रूरता के लिए हिटलर का जर्मनी पूरी दुनिया में लांछित हुआ , गोलवलकर ने उसी की प्रशंसा की और भारत के लिए उसी हिटलरी रास्ते की सिफारिश की । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गुरु गोलवलकर के बताए हुए फासीवाद के रास्ते पर चल रहा है । वह जिस हिन्दू राष्ट्र की बात करता है , वह सिर्फ मुस्लिम विद्वेष तक सीमित नहीं है । स्त्रियों और शूद्र कही जाने वाली जातियों , जिन्हें सबसे अधिक धर्माचार्यों द्वारा अनुमोदित क्रूर प्रथाओं और परम्परागत ऊँच-नीच का शिकार होना पड़ा है , की दुर्दशा कम होने के बजाए , धर्म आधारित राष्ट्र में काफ़ी बढ़ जाएगी । सती प्रथा और बाल-विवाह पर रोक सम्बन्धी कानून हटाने और वर्ण व्यवस्था को स्थापित करने की मांग धर्म-संसद के प्रस्तावों में होने लगी थीं । स्त्रियों को सम्पत्ति में हक देने वाले हिन्दू कोड बिल का भी गोलवलकर ने विरोध किया था ।

इसलिए यदि आप कूप मंडूकता , धर्मान्धता , स्त्री उत्पीड़न और दलितों तथा पिछड़ों की सामाजिक दुर्दशा को देश की नियति नहीं बनाना चाहते तो हिन्दू राष्ट्र के नारे से सतर्क रहे। हम किस प्रकार पूजा पाठ करें , त्योहार किस ढंग से मनाएं , धार्मिक प्रतीकों का क्या अर्थ ग्रहण करें और दूसरे धर्म के अनुयायियों के साथ क्या व्यवहार करें , इन बातों को संघ परिवार और महंत मठाधीश नियंत्रित करने  की कोशिश करते हैं । इनके चलते हमारे धार्मिक आचरण की स्वाधीनता सुरक्षित नहीं है । ऐसे तत्वों को धार्मिक मान्यता और राजनैतिक समर्थन देना बन्द करें नहीं तो ये हमें एक अन्धी सुरंग में पहुंचा देंगे ।

दुनिया के कई धर्म आधारित राष्ट्रों में जनता का उत्पीड़न और रुदन हमसे छिपा नहीं है। धर्म आधारित राष्ट्र के रूप में हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के बारे में हम जानते हैं कि इस्लामियत के नाम पर कैसे कठमुल्लों , सामन्तों , फौजी अफसरों , भ्रष्ट नेताओं और असामाजिक तत्वों का वह चारागाह बन गया है । क्या हम भारत में भी उसी दुष्चक्र को स्थापित करना चाहता हैं ? धर्म आधारित राष्ट्र लोकतंत्र विरोधी अवधारणा है । किसी धर्म आधारित राष्ट्र में लोकतंत्र कभी पनप नहीं सकता । संविधान , न्यायपालिका , और प्रेस का हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर अपमान कट्टरपंथियों के लोकतंत्र विरोधी रुख की ही बानगी है । गोलवलकरपंथी राष्ट्रतोड़क ‘राष्ट्रवादियों’ के चंगुल में देश चला गया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक होगा । इसलिए समय रहते इनके हिटलरी मंसूबों को उजागर करें और इनके खिलाफ़ चौतरफ़ा ढंग से सक्रिय हों ।
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सांप्रदायिकता का आधुनिक इतिहास 1857 की क्रांति की विफलता के बाद शुरू होता है। चूंकि 1857 की क्रांति मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर के नेतृत्व मे लड़ी गई थी और इसे मराठों समेत समस्त भारतीयों की ओर से समर्थन मिला था सिवाय उन भारतीयों के जो अंग्रेजों के मित्र थे तथा जिनके बल पर यह क्रांति कुचली गई थी।ब्रिटेन ने सत्ता कंपनी से छीन कर जब अपने हाथ मे कर ली तो यहाँ की जनता को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने हेतु प्रारम्भ मे मुस्लिमों को ज़रा ज़्यादा  दबाया। 19 वी शताब्दी मे सैयद अहमद शाह और शाह वली उल्लाह के नेतृत्व मे वहाबी आंदोलन के दौरान इस्लाम मे तथा प्रार्थना समाज,आर्यसमाज,राम कृष्ण मिशन और थियोसाफ़िकल समाज के नेतृत्व मे हिन्दुत्व मे सुधार आंदोलन चले जो देश की आज़ादी के आंदोलन मे भी मील के पत्थर बने। असंतोष को नियमित करने के उद्देश्य से वाइसराय के समर्थन से अवकाश प्राप्त ICS एलेन आकटावियन हयूम ने कांग्रेस की स्थापना कारवाई। जब कांग्रेस का आंदोलन आज़ादी की दिशा मे बढ्ने लगा तो 1905 मे बंगाल का विभाजन कर हिन्दू-मुस्लिम मे फांक डालने का कार्य किया गया। किन्तु बंग-भंग आंदोलन को जनता की ज़बरदस्त एकता के आगे 1911 मे इस विभाजन को रद्द करना पड़ा। लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन  एवं सर आगा खाँ को आगे करके मुस्लिमों को हिंदुओं से अलग करने का उपक्रम किया जिसके फल स्वरूप 1906  मे मुस्लिम लीग की स्थापना हुई और 1920 मे हिन्दू महासभा की स्थापना मदन मोहन मालवीय को आगे करके करवाई गई जिसके सफल न हो पाने के कारण 1925 मे RSS की स्थापना कारवाई गई जिसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करना था । मुस्लिम लीग भी साम्राज्यवाद का ही संरक्षण कर रही थी जैसा कि,एडवर्ड थाम्पसन ने 'एनलिस्ट इंडिया फार फ़्रीडम के पृष्ठ 50 पर लिखा है-"मुस्लिम संप्रदाय वादियों  और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों मे गोलमेज़ सम्मेलन के दौरान अपवित्र गठबंधन रहा। "


वस्तुतः मेरे विचार मे सांप्रदायिकता और साम्राज्यवाद सहोदरी ही हैं। इसी लिए भारत को आज़ादी देते वक्त भी ब्रिटश साम्राज्यवाद  ने पाकिस्तान और भारत  दो देश बना दिये। पाकिस्तान तो सीधा-सीधा वर्तमान साम्राज्यवाद के सरगना अमेरिका के इशारे पर चला जबकि अब भारत की सरकार  भी अमेरिकी हितों का संरक्षण कर रही है। भारत मे चल रही सभी आतंकी गतिविधियों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन अमेरिका का रहता है। हाल के दिनों मे जब बढ़ती मंहगाई ,डीजल,पेट्रोल,गैस के दामों मे बढ़ौतरी और वाल मार्ट को सुविधा देने के प्रस्ताव से जन-असंतोष व्यापक था अमेरिकी एजेंसियों के समर्थन से सांप्रदायिक शक्तियों ने दंगे भड़का दिये। इस प्रकार जनता को आपस मे लड़ा देने से मूल समस्याओं से ध्यान हट गया तथा सरकार को साम्राज्यवादी हितों का संरक्षण सुगमता से करने का अवसर प्राप्त  हो गया। 
यू एस ए के इशारे पर भारत विभाजन को धार्मिक आधार इसलिए प्रदान किया गया जिससे  इसके पीछे के साम्राज्यवादी मंसूबों को छिपाए रखा जा सके। कश्मीर के राजा हरी सिंह ने बेवजह ही नहीं भारत और पाकिस्तान से अलग एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में रहने का निर्णय किया था बल्कि उनको यू एस ए , ब्रिटेन व आर एस एस का समर्थन प्राप्त था। 




कश्मीर की बाह्य भौगोलिक स्थिति ही नहीं वरन इसके लद्दाख क्षेत्र में जोजीला दर्रे के नीचे पाया जाने वाला प्लेटिनम का आकर्षण भी यू एस ए को ललचा रहा था। ज्ञातव्य है कि प्लेटिनम न केवल स्वर्ण से भी अधिक मूल्यवान धातु है बल्कि यह यूरेनियम के निर्माण में भी सहायक है। यूरेनियम सिर्फ परमाणु बम ही नहीं परमाणु ऊर्जा में भी प्रयोग होता है इसलिए स्वतंत्र कश्मीर के शासकों को बहका कर यू एस ए इस यूरेनियम को भी हासिल करना चाहता था। किन्तु नेहरू, पटेल और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने मिल कर हरी सिंह को भारत में विलय के लिए विवश कर दिया था और कश्मीर में बाहरी लोगों के भूमि - क्रय को प्रतिबंधित करने हेतु अनुच्छेद 370 का प्राविधान संविधान में रखवाया था। यही वजह है कि आर एस एस , हिंदूमहासभा, जनसंघ ( अब भाजपा ) आदि साम्राज्यवादियों के समर्थक दल भारतीय संविधान और इसके प्राविधान अनुच्छेद 370 का शुरू से ही विरोध कर रहे हैं। मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के एक मंत्री भी संविधान बदलने की बात कह चुके हैं और अब सरकार से बाकायदा प्रस्ताव देकर मांग की जा रही है।  





अतएव अफलातून साहब की इस चेतावनी " गोलवलकरपंथी राष्ट्रतोड़क ‘राष्ट्रवादियों’ के चंगुल में देश चला गया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक होगा । इसलिए समय रहते इनके हिटलरी मंसूबों को उजागर करें और इनके खिलाफ़ चौतरफ़ा ढंग से सक्रिय हों ।" के मद्देनजर देश की जागरूक जनता और देश हितैषी दलों की मनसा - वाचा - कर्मणा एकता की महती आवश्यकता है। 
~विजय राजबली माथुर ©

Friday, August 18, 2017

अनुच्छेद ३७० है 'भारतीय एकता व अक्षुणता' को बनाये रखने की गारंटी और इसे हटाने की मांग है-साम्राज्यवादियों की गहरी साजिश.------ विजय राजबली माथुर








Tuesday, July 12, 2016
जोजीला दर्रा का प्लेटिनम है कश्मीर समस्या की जड़ ------ विजय राजबली माथुर
श्रीनगर - लेह मार्ग पर 'द्रास क्षेत्र' में 'जोजीला' दर्रे के क्षेत्र में स्वर्ण से भी महंगी धातु 'प्लेटिनम' है जो 'यूरेनियम' के उत्पादन में सहायक है ही है कश्मीर विवाद की जड़। 
http://krantiswar.blogspot.in/2016/07/blog-post.html

जोजीला दर्रा का प्लेटिनम है कश्मीर समस्या की जड़ :

वस्तुतः 1857 की प्रथम क्रान्ति के बाद से ही ब्रिटिश साम्राज्यवादी फूट डालो और शासन करो की जिस नीति पर चलते आ रहे थे उसके बावजूद जब 1942 के भारत-छोड़ो आंदोलन, एयर-फोर्स व नेवी में विद्रोह तथा आज़ाद हिन्द फौज की गतिविधियों के कारण जब उनका टिके रहना मुश्किल हो गया तब नए साम्राज्यवादी सरगना यू एस ए ने भारत-विभाजन का सुझाव दिया जिस पर मेजर लार्ड ऐटली ने अपने प्रधान मंत्रित्व काल में अमल करते हुये पाकिस्तान व भारत दो स्वतंत्र देशों को सत्ता सौंप दी थी। पाकिस्तान तो तत्काल अमेरिकी प्रभुत्व में चला गया था किन्तु नेहरू जी ने गुट-निरपेक्ष आंदोलन के बैनर तले अमेरिका से दूरी बनाए रखी थी जिस कारण वह पाकिस्तान के माध्यम से भारत को परेशान करता रहा था। 1947 के बाद 1965 का संघर्ष भी उसी कड़ी में था और 1971 का बांग्लादेश व 1999 का कारगिल संघर्ष भी ।

जब जिया-उल-हक साहब की उपयोगिता अफगान समस्या के बाद समाप्त हो गई तब यू एस ए ने उनको अपने राजदूत की कीमत पर भी हवाई जहाज समेत उड़ा दिया था। ओसामा-बिन-लादेन के सफाये के साथ ही यू एस ए ने पाकिस्तान की सार्वभौमिकता को अमान्य कर दिया है। उसके लिए अब पाकिस्तान उपयोगी नहीं रह गया है विशेषकर तब जब मोदी के नेतृत्व में आर एस एस समर्थक सरकार भारत में गठित हो चुकी है। जब सरकार के माध्यम से भारत को अपने समर्थन में यू एस ए खड़ा देख रहा है तब पाकिस्तान के अस्तित्व का मतलब ही क्या रह जाता है? 

 इस वक्त पाकिस्तान को झुका कर यू एस ए भारत में मोदी की हैसियत को मजबूत करना चाहता है जिनकी सरकार का लोकप्रिय होना दीर्घकालीन अमेरिकी हितों के अनुरूप होगा। निकट भविष्य में पाकिस्तान के स्थान पर कई छोटे-छोटे देश सृजित करवा कर अमेरिका भारत की बहुसंख्यक जनता के दिलों में अपना राज जमा कर अपने देश के व्यापारिक हितों को ही साधेगा जबकि यहाँ की जनता को लगेगा कि वह यहाँ कि बहुसंख्यक जनता का हितैषी है और यह सब मोदी व उनकी सरकार के चलते संभव हुआ है। 


 इस बात की कोई सम्भावना नहीं है कि  मोदी साहब शास्त्री जी जैसी (1965 ) या इंदिरा जी जैसी (1971 ) दृढ़ता दिखाएंगे। तब तक भारत से नेहरू जी की  व्यावहारिक नीतियों का सफाया नहीं हुआ था और देश का स्वाभिमान कायम था। लेकिन 1975  में हुये देवरस-इन्दिरा 'गुप्त-समझौते' के तहत 1980 में इंदिराजी की पुनर्वापसी से देश में आर एस एस का जो प्रभाव बढ़ना शुरू हुआ था वह 1991 में मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री बनने के साथ ही मजबूत होता गया तथा 13 दिन, 13 माह और 60 माह की ए बी वाजपेयी सरकारों के दौरान उसने शासन-प्रशासन और इंटेलीजेंस में तगड़ी पकड़ बना ली थी। मनमोहन सिंह जी का 120 माह का कार्यकाल आर एस एस की दोहरी खुशियों का था जिसमें सत्ता व विपक्ष उसके ही इशारे पर चल रहा था। मोदी के सत्तारोहण ( जिसमें मनमोहन सिंह जी का सक्रिय योगदान है ) से सत्ता तो सीधे-सीधे आर एस एस से ही प्रभावित है किन्तु अब विपक्ष को पुनः अपनी पकड़ में लाने हेतु आर एस एस तमाम तिकड़में एक साथ चल रहा है। आ आ पा के रूप में उसे एक नया राजनीतिक दल तो मिल ही चुका है पुराने क्षेत्रीय दलों जैसे सपा, बसपा आदि-आदि को अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित करके आर एस एस राजनीति में व्यापक रूप से अपने पैर पसार रहा है। भारत में सर्वहारा (दलित ) वर्ग को व्हाईट हाउस की नीतियों के तहत मोदी के पीछे गुप-चुप ढंग से लामबंद किया जा रहा है। 

'भारतीय एकता व अक्षुणता ' को बनाये रखने की गारंटी  :

तमाम राजनीतिक विरोध के बावजूद इंदिरा जी की इस बात के लिए तो प्रशंसा करनी ही पड़ेगी कि उन्होंने अपार राष्ट्र-भक्ति के कारण कनाडाई,जर्मन या किसी भी विदेशी कं. को वह मलवा देने से इनकार कर दिया क्योंकि उसमें 'प्लेटिनम'की प्रचुरता है.सभी जानते हैं कि प्लेटिनम स्वर्ण से भी मंहगी धातु है और इसका प्रयोग यूरेनियम निर्माण में भी होता है.कश्मीर के केसर से ज्यादा मूल्यवान है यह प्लेटिनम.सम्पूर्ण द्रास क्षेत्र प्लेटिनम का अपार भण्डार है.अगर संविधान में सरदार पटेल और रफ़ी अहमद किदवई ने अनुच्छेद  '३७०' न रखवाया  होता  तो कब का यह प्लेटिनम विदेशियों के हाथ पड़ चुका होता क्योंकि लालच आदि के वशीभूत होकर लोग भूमि बेच डालते और हमारे देश को अपार क्षति पहुंचाते.अनुच्छेद ३७० को हटाने का आन्दोलन चलाने वाले भी छः वर्ष सत्ता में रह लिए परन्तु इतना बड़ा देश-द्रोह करने का साहस नहीं कर सके,क्योंकि उनके समर्थक दल सरकार गिरा देते,फिर नेशनल कान्फरेन्स भी उनके साथ थी जिसके नेता शेख अब्दुल्ला साहब ने ही तो महाराजा हरी सिंह के खड़यंत्र  का भंडाफोड़ करके कश्मीर को भारत में मिलाने पर मजबूर किया था .तो समझिये जनाब कि अनुच्छेद  ३७० है 'भारतीय एकता व अक्षुणता' को बनाये रखने की गारंटी और इसे हटाने की मांग है-साम्राज्यवादियों की गहरी साजिश.और यही वजह है कश्मीर समस्या की .साम्राज्यवादी शक्तियां नहीं चाहतीं कि भारत अपने इस खनिज भण्डार का खुद प्रयोग कर सके इसी लिए पाकिस्तान के माध्यम से विवाद खड़ा कराया गया है.इसी लिए इसी क्षेत्र में चीन की भी दिलचस्पी है.इसी लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रक्षा हेतु गठित आर.एस.एस.उनके स्वर को मुखरित करने हेतु 'अनुच्छेद  ३७०' हटाने का राग अलापता रहता है.इस राग को साम्प्रदायिक रंगत में पेश किया जाता है.साम्प्रदायिकता साम्राज्यवाद की ही सहोदरी है.यह हमारे देश की जनता का परम -पुनीत कर्तव्य है कि, वह सरकार की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखे कि वह यू एस ए के मंसूबे न पूरे कर दे। 


अनुच्छेद 370 को समाप्त कराने की मांग उठाते रहे लोग जब सत्ता में मजबूती से आ गए हैं तब बिना पाकिस्तान के अस्तित्व के ही 'जोजीला'दर्रे में स्थित 'प्लेटिनम' जो 'यूरेनियम' के उत्पादन में सहायक है यू एस ए को देर सबेर हासिल होता दीख रहा है । अड़ंगा चीन व रूस की तरफ से हो सकता है और उस स्थिति में भारत-भू 'तृतीय विश्वयुद्ध' का अखाड़ा भी बन सकती है। देश और देश कि जनता का कितना नुकसान तब होगा उसका आंकलन वर्तमान सरकार नहीं कर सकती है तो क्या विपक्ष भी नहीं करेगा ? और जनता से तादात्म्य स्थापित करने का कोई प्रयास साम्राज्यवाद विरोधी खेमे की ओर से भी अभी तो नहीं हो रहा है अभी तो वही पुरानी लीक ही पीटी जा रही है जिसका इस देश कि जनता पर कभी भी कोई भी असर हो ही नहीं सकता है।


अफसोसनाक बात यह है कि साम्राज्यवाद विरोधी साम्यवाद/वामपंथ के हिमायती यू एस ए व आर एस एस के इस अभियान का कोई विकल्प न प्रस्तुत करके उनकी चालों का शिकार होते जा रहे हैं और अपने ही हाथों अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी चलाते जा रहे हैं। पोंगापंथ, ढोंगवाद/ब्रहमनवाद तेजी से अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा है और प्रगतिशीलता/वैज्ञानिकता के नाम पर जिस तरीके से उसका विरोध किया जाता है उससे उसे अत्यधिक मजबूती ही मिलती जाती है। आज जब जनता को वास्तविक धर्म का मर्म समझाये जाने कि ज़रूरत थी तब माकपा महासचिव उसी पोंगापंथ के पथ का अनुसरण करके अंततः अपने विरोधियों को ही शक्तिशाली बनाने का कार्य शुरू कर चुके हैं। आज शासन में  तो अब संभव ही नहीं  है  अतः विपक्ष में लाल बहादुर शास्त्री जैसे अदम्य साहसी नेता की परमावश्यकता है जो जनता का दिल जीत कर किसान,जवान और मजदूर के हितों का संघर्ष चला कर नेतृत्व कर सके। 






 ~विजय राजबली माथुर ©

Tuesday, July 12, 2016

जोजीला दर्रा का प्लेटिनम है कश्मीर समस्या की जड़ ------ विजय राजबली माथुर

श्रीनगर - लेह मार्ग पर 'द्रास क्षेत्र' में 'जोजीला' दर्रे के क्षेत्र में स्वर्ण से भी महंगी धातु 'प्लेटिनम' है जो 'यूरेनियम' के उत्पादन में सहायक है ही है कश्मीर विवाद की जड़। 

वस्तुतः 1857 की प्रथम क्रान्ति के बाद से ही ब्रिटिश साम्राज्यवादी फूट डालो और शासन करो की जिस नीति पर चलते आ रहे थे उसके बावजूद जब 1942 के भारत-छोड़ो आंदोलन, एयर-फोर्स व नेवी में विद्रोह तथा आज़ाद हिन्द फौज की गतिविधियों के कारण जब उनका टिके रहना मुश्किल हो गया तब नए साम्राज्यवादी सरगना यू एस ए ने भारत-विभाजन का सुझाव दिया जिस पर मेजर लार्ड ऐटली ने अपने प्रधान मंत्रित्व काल में अमल करते हुये पाकिस्तान व भारत दो स्वतंत्र देशों को सत्ता सौंप दी थी। पाकिस्तान तो तत्काल अमेरिकी प्रभुत्व में चला गया था किन्तु नेहरू जी ने गुट-निरपेक्ष आंदोलन के बैनर तले अमेरिका से दूरी बनाए रखी थी जिस कारण वह पाकिस्तान के माध्यम से भारत को परेशान करता रहा था। 1947 के बाद 1965 का संघर्ष भी उसी कड़ी में था और 1971 का बांग्लादेश व 1999 का कारगिल संघर्ष भी ।

जब जिया-उल-हक साहब की उपयोगिता अफगान समस्या के बाद समाप्त हो गई तब यू एस ए ने उनको अपने राजदूत की कीमत पर भी हवाई जहाज समेत उड़ा दिया था। ओसामा-बिन-लादेन के सफाये के साथ ही यू एस ए ने पाकिस्तान की सार्वभौमिकता को अमान्य कर दिया है। उसके लिए अब पाकिस्तान उपयोगी नहीं रह गया है विशेषकर तब जब मोदी के नेतृत्व में आर एस एस समर्थक सरकार भारत में गठित हो चुकी है। जब सरकार के माध्यम से भारत को अपने समर्थन में यू एस ए खड़ा देख रहा है तब पाकिस्तान के अस्तित्व का मतलब ही क्या रह जाता है? 


 इस वक्त पाकिस्तान को झुका कर यू एस ए भारत में मोदी की हैसियत को मजबूत करना चाहता है जिनकी सरकार का लोकप्रिय होना दीर्घकालीन अमेरिकी हितों के अनुरूप होगा। निकट भविष्य में पाकिस्तान के स्थान पर कई छोटे-छोटे देश सृजित करवा कर अमेरिका भारत की बहुसंख्यक जनता के दिलों में अपना राज जमा कर अपने देश के व्यापारिक हितों को ही साधेगा जबकि यहाँ की जनता को लगेगा कि वह यहाँ कि बहुसंख्यक जनता का हितैषी है और यह सब मोदी व उनकी सरकार के चलते संभव हुआ है। 


 इस बात की कोई सम्भावना नहीं है कि  मोदी साहब शास्त्री जी जैसी (1965 ) या इंदिरा जी जैसी (1971 ) दृढ़ता दिखाएंगे। तब तक भारत से नेहरू जी की  व्यावहारिक नीतियों का सफाया नहीं हुआ था और देश का स्वाभिमान कायम था। लेकिन 1975  में हुये देवरस-इन्दिरा 'गुप्त-समझौते' के तहत 1980 में इंदिराजी की पुनर्वापसी से देश में आर एस एस का जो प्रभाव बढ़ना शुरू हुआ था वह 1991 में मनमोहन सिंह के वित्तमंत्री बनने के साथ ही मजबूत होता गया तथा 13 दिन, 13 माह और 60 माह की ए बी वाजपेयी सरकारों के दौरान उसने शासन-प्रशासन और इंटेलीजेंस में तगड़ी पकड़ बना ली थी। मनमोहन सिंह जी का 120 माह का कार्यकाल आर एस एस की दोहरी खुशियों का था जिसमें सत्ता व विपक्ष उसके ही इशारे पर चल रहा था। मोदी के सत्तारोहण ( जिसमें मनमोहन सिंह जी का सक्रिय योगदान है ) से सत्ता तो सीधे-सीधे आर एस एस से ही प्रभावित है किन्तु अब विपक्ष को पुनः अपनी पकड़ में लाने हेतु आर एस एस तमाम तिकड़में एक साथ चल रहा है। आ आ पा के रूप में उसे एक नया राजनीतिक दल तो मिल ही चुका है पुराने क्षेत्रीय दलों जैसे सपा, बसपा आदि-आदि को अप्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित करके आर एस एस राजनीति में व्यापक रूप से अपने पैर पसार रहा है। भारत में सर्वहारा (दलित ) वर्ग को व्हाईट हाउस की नीतियों के तहत मोदी के पीछे गुप-चुप ढंग से लामबंद किया जा रहा है। 


तमाम राजनीतिक विरोध के बावजूद इंदिरा जी की इस बात के लिए तो प्रशंसा करनी ही पड़ेगी कि उन्होंने अपार राष्ट्र-भक्ति के कारण कनाडाई,जर्मन या किसी भी विदेशी कं. को वह मलवा देने से इनकार कर दिया क्योंकि उसमें 'प्लेटिनम'की प्रचुरता है.सभी जानते हैं कि प्लेटिनम स्वर्ण से भी मंहगी धातु है और इसका प्रयोग यूरेनियम निर्माण में भी होता है.कश्मीर के केसर से ज्यादा मूल्यवान है यह प्लेटिनम.सम्पूर्ण द्रास क्षेत्र प्लेटिनम का अपार भण्डार है.अगर संविधान में सरदार पटेल और रफ़ी अहमद किदवई ने अनुच्छेद  '३७०' न रखवाया  होता  तो कब का यह प्लेटिनम विदेशियों के हाथ पड़ चुका होता क्योंकि लालच आदि के वशीभूत होकर लोग भूमि बेच डालते और हमारे देश को अपार क्षति पहुंचाते.अनुच्छेद ३७० को हटाने का आन्दोलन चलाने वाले भी छः वर्ष सत्ता में रह लिए परन्तु इतना बड़ा देश-द्रोह करने का साहस नहीं कर सके,क्योंकि उनके समर्थक दल सरकार गिरा देते,फिर नेशनल कान्फरेन्स भी उनके साथ थी जिसके नेता शेख अब्दुल्ला साहब ने ही तो महाराजा हरी सिंह के खड़यंत्र  का भंडाफोड़ करके कश्मीर को भारत में मिलाने पर मजबूर किया था .तो समझिये जनाब कि अनुच्छेद  ३७० है 'भारतीय एकता व अक्षुणता' को बनाये रखने की गारंटी और इसे हटाने की मांग है-साम्राज्यवादियों की गहरी साजिश.और यही वजह है कश्मीर समस्या की .साम्राज्यवादी शक्तियां नहीं चाहतीं कि भारत अपने इस खनिज भण्डार का खुद प्रयोग कर सके इसी लिए पाकिस्तान के माध्यम से विवाद खड़ा कराया गया है.इसी लिए इसी क्षेत्र में चीन की भी दिलचस्पी है.इसी लिए ब्रिटिश साम्राज्यवाद की रक्षा हेतु गठित आर.एस.एस.उनके स्वर को मुखरित करने हेतु 'अनुच्छेद  ३७०' हटाने का राग अलापता रहता है.इस राग को साम्प्रदायिक रंगत में पेश किया जाता है.साम्प्रदायिकता साम्राज्यवाद की ही सहोदरी है.यह हमारे देश की जनता का परम -पुनीत कर्तव्य है कि, वह सरकार की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखे कि वह यू एस ए के मंसूबे न पूरे कर दे। 


अनुच्छेद 370 को समाप्त कराने की मांग उठाते रहे लोग जब सत्ता में मजबूती से आ गए हैं तब बिना पाकिस्तान के अस्तित्व के ही 'जोजीला'दर्रे में स्थित 'प्लेटिनम' जो 'यूरेनियम' के उत्पादन में सहायक है यू एस ए को देर सबेर हासिल होता दीख रहा है । अड़ंगा चीन व रूस की तरफ से हो सकता है और उस स्थिति में भारत-भू 'तृतीय विश्वयुद्ध' का अखाड़ा भी बन सकती है। देश और देश कि जनता का कितना नुकसान तब होगा उसका आंकलन वर्तमान सरकार नहीं कर सकती है तो क्या विपक्ष भी नहीं करेगा ? और जनता से तादात्म्य स्थापित करने का कोई प्रयास साम्राज्यवाद विरोधी खेमे की ओर से भी अभी तो नहीं हो रहा है अभी तो वही पुरानी लीक ही पीटी जा रही है जिसका इस देश कि जनता पर कभी भी कोई भी असर हो ही नहीं सकता है।

अफसोसनाक बात यह है कि साम्राज्यवाद विरोधी साम्यवाद/वामपंथ के हिमायती यू एस ए व आर एस एस के इस अभियान का कोई विकल्प न प्रस्तुत करके उनकी चालों का शिकार होते जा रहे हैं और अपने ही हाथों अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी चलाते जा रहे हैं। पोंगापंथ, ढोंगवाद/ब्रहमनवाद तेजी से अपनी पकड़ मजबूत करता जा रहा है और प्रगतिशीलता/वैज्ञानिकता के नाम पर जिस तरीके से उसका विरोध किया जाता है उससे उसे अत्यधिक मजबूती ही मिलती जाती है। आज जब जनता को वास्तविक धर्म का मर्म समझाये जाने कि ज़रूरत थी तब माकपा महासचिव उसी पोंगापंथ के पथ का अनुसरण करके अंततः अपने विरोधियों को ही शक्तिशाली बनाने का कार्य शुरू कर चुके हैं। आज शासन में  तो अब संभव ही नहीं  है  अतः विपक्ष में लाल बहादुर शास्त्री जैसे अदम्य साहसी नेता की परमावश्यकता है जो जनता का दिल जीत कर किसान,जवान और मजदूर के हितों का संघर्ष चला कर नेतृत्व कर सके। 






  ~विजय राजबली माथुर ©
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Monday, March 10, 2014

काश लोग बतबना पन छोड़ कर सच को स्वीकारें व मानवता की रक्षा हेतु तत्पर हों!---विजय राजबली माथुर




कुदरत का कहर: महाराष्ट्र में दिखा कश्मीर जैसा नजारा, हजारों किसान हुए बर्बाद

http://www.bhaskar.com/article/MH-PUN-heavy-rain-in-maharashtra-and-pune-4545627-PHO.html?seq=3 

भास्कर.कॉम | Mar 10, 2014, 18:31PM IST

पुणे। महाराष्ट्र के पुणे और आसपास के शहरों में पिछले 24 घंटो के दौरान तूफानी बारिश और ओलावृष्टि का कहर देखने को मिला है। भीषण ओलावृष्टि के चलते जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। खेतों में खड़ी फसल बर्बाद हो गई। कहीं पर पेड़ गिरे तो कहीं पर बिजली के खंभे गिर जाने से बिजली चली गई। ओलावृष्टि के कारण कई जानवरों की मौत हो गई। पश्‍चिम विदर्भ में भीषण ओलावृष्टि ने एक युवक की जान ले ली और तीन दर्जन से अधिक लोगों को घायल कर दिया।............................... 
 
 




15 फरवरी से 16 मार्च 2014  हेतु पृष्ठ संख्या-52 ,'निर्णय सागर,चंड-मार्तण्ड' पंचांग पर पहले ही से आगाह किया हुआ था ।:



 किन्तु वस्तु-स्थिति यह है कि प्रशासनिक अधिकारियों(IAS/PCS) को इस तरफ ध्यान देने की क्या ज़रूरत? और तो और पंडे-पुजारी भी अपना पेट भरने तथा जनता का खून चूसने (खटमल और जोंक की भांति) में ही संलिप्त रहते हैं। उनको ही ज्योतिषी मानते हुये 'वैज्ञानिकता-प्रगतिशीलता' का लबादा ओढ़े प्रबुद्ध जन 'ज्योतिष' को ही फिजूल और व्यर्थ बताते रहते हैं। तब परिणाम इससे भिन्न कैसे हो सकते हैं?चाहे वह उत्तराखंड त्रासदी हो अथवा कुम्भ -भगदड़ अथवा देवघर आदि मंदिरों की भगदड़।  जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ते रहने तथा उनका निर्बाध शोषण-उत्पीड़न करते रहने हेतु व्यापारी/उद्योगपति वर्ग 'पोंगापंथ-आडम्बर-ढोंग' को बढ़ावा देता रहता है-फिल्मों के माध्यम से भी और मंदिरों -मेलों -तमाशों के माध्यम से भी। 'शिवरात्रि' पर अखबारों में सुर्खियों के साथ छ्पा था कि ब्राह्मण पुजारी ने एक दलित महिला को मंदिर प्रवेश नहीं करने दिया था। क्यों जाते हैं लोग इन मंदिरों में? क्यों नहीं लोगों को समझाया जाता है कि 'भगवान' मंदिर में नहीं सर्वत्र व्यापक है। कैसे-






  मानव ही नहीं विश्व के सभी प्राणियों व वनस्पतियों के जीवन हेतु जिन पाँच तत्वों की विशद आवश्यकता है उनका समन्वय ही भगवान-खुदा-गाड है। देखिये कैसे?:

भ(भूमि) +ग(गगन-आकाश)+व (वायु)+I(अनल-अग्नि)+न(नीर-जल)=भगवान।
 
अध्यात्म=अध्ययन अपनी आत्मा का ।

धर्म=जो शरीर व समाज को धारण करने हेतु आवश्यक हैं ;जैसे-

सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।

लेकिन अफसोस यही है कि लोग सच्चाई को समझना और समझाना तो चाहते ही नहीं हैं बल्कि ऊपर से मखौल और उड़ाते हैं। यदि पंचांग में दी गई चेतावनी पर ध्यान देते हुये प्रशासनिक स्तर पर पहले ही सुरक्षात्मक उपाए कर लिए जाया करें तो इस तरह अपार जन-धन की क्षति को कम तो किया ही जा सकता है। 
01 मार्च ,शनिवार के दिन अमावस्या थी और 16 मार्च रविवार को पूर्णिमा है जो कि पर्यावरण हेतु सुखद नहीं है साथ ही निर्धनों,पशुओं व साधारण जनता हेतु पीड़ादायक स्थिति उत्पन्न करने वाली आदि  चेतावनी स्पष्ट रूप से उपरोक्त स्कैन डबल क्लिक करके पढ़ी जा सकती हैं। 

काश लोग बतबना पन छोड़ कर सच को स्वीकारें व मानवता की रक्षा हेतु तत्पर हों!

  ~विजय राजबली माथुर ©
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