Monday, March 7, 2011

वेद में नारी

महिला दिवस ८ मार्च के उपलक्ष्य में यह संकलन प्रस्तुत है:-

२७ .१२ १९९७ के राष्ट्रीय सहारा ,लखनऊ में  प्रकाशित  सुश्री अंशु नैथानी के विचार सर्वप्रथम देखें इस स्कैन कापी में-


भ्रामक भारतीयता के मसीहा नरेंद्र मोदी के गुजरात में देखें महिलाओं की यह दुर्दशा-

हिंदुस्तान लखनऊ-२७/फरवरी/2011


०६ .०३ २०११ के हिंदुस्तान रीमिक्स में प्रकाशित का.शबाना आजमी के यह विचार -



-(सार्वदेशिक साप्ताहिक,११ अक्टूबर १९९८ से साभार  ) यह लेख  प्रस्तुत है-
"भूमिर्माता द्यौ :न पिता " (अथर्व.६ -१२०- २)

समाज में पुरुष और स्त्री का वही कार्य है,जो भू मंडल में प्रथ्वी और सूर्य का.,सूर्य प्रथिवी के बिना कोई सृजन नहीं कर सकता.

वेद में स्त्री के लिये उषा शब्द का प्रयोग हुआ है-"उषा वै सूर्यस्य पुरोगवी ".उषा सूर्य के आगे चलने वाली है.पुरुष सूर्य है और स्त्री पुरुष की पुरोगवी उषा है.तभी तो विवाह संस्कार में यज्ञ  वेदी की परिक्रमा करते हुए वधू आगे-आगे चलती है और वर पीछे-पीछे .
"स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ "  (ऋग.८ -३३ -१६ )

स्त्री-गृह,समाज,राष्ट्र एवं विश्व की ब्रह्मा है.मानव की जन्मदात्री,निर्माणकर्ती,संरक्षिका,शिक्षिका तथा संचालिका है."यथा ब्रह्मा तथा रचना".यदि स्त्री का अपना जीवन श्रद्धा,लज्जा,संयम,धैर्य,त्याग,स्नेह,सुशीलता,पवित्रता आदि श्रेष्ठ गुणों से युक्त होगा तो उसकी संतान भी शुद्ध,संयमी,धर्मात्मा,आस्तिकेवं कर्तव्य परायण होगी,और इसके विपरीत यदि नारी अक्षम,अबोध,अज्ञानी,असंयमी है,तो उसकी रचना भी त्रुटिपूर्ण होगी.अतः जिस राष्ट्र की नारी आदर्श ब्रह्मा औए शिक्षिका होगी,वही राष्ट्र आदर्श राष्ट्र बनेगा.

आर्य सभ्यता में नारी का सतीत्व सर्वोपरि है,तथा सतीत्व रक्षा का अचूक और श्रष्ट उपाय है,नारी का स्वंय सबला और सशस्त्र होना.महिला सम्मलेन करके,अधिकार मांगने,पुरुषों के आगे गिडगिडाने से कुछ भी मिलने वाला नहीं है.इसके लिए वेद माता का दिव्य-सन्देश नारी समाज ध्यान से सुने,समझे और फिर आचरण/व्यवहार में लाये तभी उसकी समस्याओं का समाधान हो जायेगा.


आलाक्ता ......वृह्न्नमः.. (ऋग .६ -७५ -१५)

भावार्थ-नारियां सुन्दर सुशील हों,पर साथ ही वीरांगना,सबला और सशस्त्रा भी हों.सतीत्व पर वार होने पर भयंकर,विकराला,विष से बुझी कटारियां हों तथा राष्ट्र पर संकट आने पर शास्त्रों और शरों की वर्षा करने वाली दुर्गा-लक्ष्मीबाई भी हों.समाज में ऐसी नारियों का सर्वाधिक सम्मान होना चाहिए.

राजपूत महिला किरण बाई ने 'मीना बाजार'से अपह्रत हो जाने पर साक्षात दुर्गा बन कर बादशाह अकबर की छाती पर चढ़ कर कटार तान दी थी और उसके प्राणों की भीख मांगने पर तथा भविष्य में मीना बाजार न लगाने का वचन लेकर उसे जीवन दान देकर -इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया.इसी प्रकार झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई ने राष्ट्र रक्षा के लिए साक्षात दुर्गा बन कर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे.

वैदिक संस्कृति में नारी का स्थान पुरुष से एक हजार गुना ऊंचा है तथा उसका कार्य क्षेत्र गृह है.अपने घर की सुव्यवस्था करना दिव्यगुणी संततियों को जन्म देके उनका सुसंस्कारों से युक्त करके निर्माण करना प्रमुख दायित्व है.गृहस्थ रूपी गाडी के दो पहिये हैं-स्त्री व पुरुष .यदि दोनों ही अपनी -अपनी लीक (मर्यादा)में चलेंगे तभी घर स्वर्ग-धाम बनेगा.दोनों के ही सर्विस या धनोपार्जन में लग जाने से अनेक समस्यायें उत्पन्न होंगी .संतानों को आयाओं पर छोड़ कर सुयोग्य नहीं बनाया जा सकता.

वैदिक संस्कृति में नारी शक्ति की अधिष्ठात्री -'दुर्गा,'धन की 'लक्ष्मी' तथा ज्ञान की 'सरस्वती'के रूप में मानी , गयी है.कन्याएं साक्षात 'दुर्गा'हैं,वही विवाह के पश्चात 'गृह लक्ष्मी एवं साम्राज्ञी'बन जाती हैं तथा प्रौढ़ावस्था में ज्ञान व अनुभवों से संपन्न होकर 'सरस्वती'बन जाती हैं.हमने अज्ञानवश इनकी कल्पित -फर्जी मूर्तियाँ बनाकर पूजना आरम्भ करके अपने असली स्वरूप को भुला दिया.

विवाह से पूर्व कन्या दो हाथ वाली है,विवाह हो जाने पर चार भुजाधारी और बेटा होने पर छः भुजाधारी तथा पुत्र-वधु आ जाने पर अष्ट भुजाधारी तथा वीर पुत्रों-पुत्रों की मान व दादी मान बन कर सिंह-वाहिनी बन जाती है.

जिस अष्ट-भुजाधारी व सिंह वाहिनी 'दुर्गामाता'की कल्पित मूर्ती की हम पूजा करते हैं-वह किसी चित्रकार ने 'भारत-माता'के रूप में अपनी कल्पना के आधार पर एक चित्र बनाया है.राष्ट्र की सामजिक व्यवस्था में उसके चारों अंगों -ब्राह्मन,क्षत्रिय ,वैश्य एवं शूद्र सभी का सहयोग रहता है.राष्ट्र पर शत्रु का आक्रमण होने पर चारों वर्णों के दो-दो हाथ मिला कर भारत माता 'अष्ट भुजाधारी'चारों के सिंह सदृश्य वीर पुत्रों के सहयोग से 'सिंह वाहिनी'बन जाती है.'वाहिनी'शब्द सेना के लिए भी प्रयोग होता है.

घर एक विश्वविद्यालय
संसार के महान  पुरुषों का प्रारंभिक शिक्षण अपने घर में ही हुआ है.बच्चे की सर्व प्रथम आचार्या उसकी माता है.है .हमारा अपना घर ही संसार का लघु संस्करण है.जैसे परिवार के स्त्री-पुरुष होंगे ,वैसा ही समाज बनेगा,जैसा समाज बनेगा,वैसा ही राष्ट्र होगा और जैसे राष्ट्र होंगे,वैसा ही विश्व होगा.

स्वामी विवेकानंद से किसी अमेरिकन महिला ने पूछा-स्वामी जी आपने कौन से विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त की है,मैं भी अपने एक बेटे को उसी में पढाना चाहती हूँ.स्वामी जी ने उत्तर दिया-"वह विश्वविद्यालय तो अब टूट चूका है".कौन सा था वह विश्वविद्यालय ?यह पूछने पर स्वामी जी ने कहा-वह विश्वविद्यालय था-मेरी जन्मदात्री माँ-जो अब इस संसार में नहीं है.'माता निर्माता भवति'.

गृहस्थ विज्ञानं
गृहस्थ विज्ञानं संसार का सबसे बड़ा विज्ञानं है,जिसकी सर्वथा उपेच्छा  की जा रही है.उस विज्ञानं को भली भांति'संस्कार चन्द्रिका'पुस्तक में समझ कर आचरण में लाने पर माताएं बच्चे को संत,महात्मा,ऋषी,वीर,राजा अथवा चोर व डाकू जैसा चाहे बना सकती हैं.विधाता ने यह सामर्थ्य नारी को ही दिया है.वीर अभिमन्यु ने माँ के पेट में ही चक्रव्यूह भेदन क्रिया सीख ली थी.नेपोलियन की माता गर्भावस्था में नित्य सैनिक परेड देखती थी.अष्टावक्र ने गर्भ काल में ही वेदान्त की शिक्षा प्राप्त कर ली थी.महारानी मदालसा ने अपने तीन बेटों को ऋषी और चौथे को श्रेष्ठ राजा बना दिया था.

वैदिक विवाह
विवाह शब्द का अर्थ है-विवहनार्थ -विविध कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्वों के पालन हेतु दो आत्माओं और दो जीवनों का आजीवन अभिन्न मिलन.जहाँ दोनों मिल कर परिवार,समाज,राष्ट्र एवं विश्व की उन्नति में अपना योगदान करेंगे तथा लोक व परलोक की सुसाधना करेंगे.

वैदिक विवाह में तलाक का कोई स्थान नहीं है.आजीवन साथ रहने का विधान है.जैसे दो स्थानों का जल मिला देने पर संसार का बड़े से बड़ा वैज्ञानिक भी उन्हें अलग नहीं कर सकता .यह है वैदिक विवाह की श्रेष्ठता एवं विशेषता.विवाह से पूर्व ही केवल चरम नेत्रों से नहीं बल्कि ज्ञान नेत्रों से भी वर एवं कन्या के वंश ,गुण ,शील,स्वभाव,रूप-रंग,चरित्र आदि की परख कर लेनी आवश्यक है.केवल बाह्य रूप,रंग,कार-कोठी,पैसा,सर्विस आदि को प्राथमिकता नहीं देनी चाहिए.विवाह संस्कार वैदिक रीति से -वर एवं वधु स्वंय वेद मन्त्र बोल कर उनके अर्थ समझ कर प्रसन्नतापूर्वक आजीवन एक साथ रहने की प्रतिज्ञा करें.

आजकल विदेशियों की नक़ल करके जो प्रेम विवाह हो रहे हैं,उनमें से अधिकाँश का १ -२ वर्ष के भीतर तलाक हो जाता है.और अब तो विदेशों में यह मान कर कि जब विवाह का अंत तलाक में होना है,तो क्यों न विवाह को ही बीच में निकाल दिया जाए.परिणाम स्वरूप वहां हजारों स्त्री-पुरुष बिना विवाह्किये ही साथ -साथ रह रहे हैं-जिसके कारण वहां की सरकारों के सामने उनके बच्चों के पालन-पोषण ,शिक्षा व उत्तराधिकार जैसी समस्याएं उत्पन्न हो गयी हैं.उनका गृहस्थ जीवन पशुओं जैसा बन गया है.

भारत में भी यह बीमारी तेजी से बढ़ रही है.दूरदर्शन व सिनेमा के माध्यम से विवाहोंतर संबंधों एवं बिन विवाह किये बच्चे को जन्म देने का हवाला अब शान के साथ दिया जाने लगा है.जो शीघ्र ही एक भयंकर त्रासदी की और देश को ले जायेगा

वैदिक संस्कृति के अभाव में नारी के अपने दिव्य स्वरूप,अपनी छमताओं,परिवार,समाज एवं राष्ट्र निर्माण में अपनी उज्जवल भूमिका  को  भुला  दिया  है .पुरुष  जो  उसी  की कृति है  -  नारी को एक  अभिशाप  के रूप  में चित्रित कर रहा है.आज का पुरुष यदि शैतान है तो इसका मूल कारण यही है कि  नारी ने उसे संत बनाने की चिंता नहीं की.आज नारी ही नारी की शत्रु बन रही है.दहेज़ के कारण होने वाली अधिकाँश हत्याओं तथा कन्याओं की भ्रूण हत्याओं एवं गर्भपात में मूल रूप से सास व ननदें ही दोषी पाई जाती हैं.


हे मातृ शक्ति !वैदिक संस्कृति संसार की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति है.जैसे आत्मा के बिना शरीर निष्प्राण हो जाता है,उसी प्रकार अपनी संस्कृति के बिना आपका जीवन,परिवार,समाज व राष्ट्र निष्प्राण होकर अनेकों समस्याओं व संकटों से घिर गया है,तथा विनाश के कगार पर खड़ा है.

हे मानव की जन्मदात्री व निर्माण कर्त्ती माता !वैदिक संस्कृति को अपना कर 'सृष्टि की ब्रह्मा' बन कर वेदमाता के आदेश -'जनया दैव्यं जनम 'का पालन करके दिव्य-श्रेष्ठ गुणों से युक्त पुत्र व पुत्रियों को ही जन्म दो,तभी आपकी ,समाज,राष्ट्र एवं विश्व की समस्त समस्याओं का समाधान होकर नवयुग-निर्माण होकर संसार स्वर्ग धाम बन जायेगा.आज संसार को 'मिस इण्डिया'या 'मिस यूनिवर्स'की नहीं बल्कि हजारों लाखों मदाल्साओं एवं दुर्गों की आवश्यकता है.

मथुरा के आर्य भजनोपदेशक श्री विजय सिंह जी के अनुसार-


हमें उन वीर माओं की कहानी याद आती है
मरी जो धर्म की खातिर कहानी याद आती है
बरस चौदह रही वन में पति के संग सीता जी
पतिव्रत धर्म मर्यादा निभानी याद आती है
कहा सरदार ने रानी निशानी चाहिए मुझ को
दिया सर काट रानी ने निशानी याद आती है
हज़ारों जल गयीं चित्तोड़ में व्रत धर्म का लेकर
चिता पद्मावती तेरी सजानी याद आती है
कमर बाँध कर बेटा लड़ी अंग्रेजों से डट कर
हमें वह शेरनी झांसी की रानी याद आती है. 


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विश्व महिला दिवस पर समस्त नारी समाज को मंगलकामनाएं.
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Sunday, March 6, 2011

आपकी पत्नी / पति का स्वभाव कैसा होगा ?









पूरे शरीर में ह्रदय एक विचित्र सा अवयव है.एक तरफ यह समस्त शरीर को खून पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य करता है,तो दूसरी तरफ यह अपने आप में इतनी सूक्ष्म और कोमल कल्पनाएँ रखता है कि जिसको समझना किसी के बूते की बात नहीं.


यह कोमल इतना होता है कि छोटी -सी बात से इसको इतनी अधिक ठेस लगती है कि यह बिल्लौरी कांच की तरह टूट कर चूर-चूर हो जाता है.यह एक प्रतीक है अनुभूतियों का ,सुन्दर स्वप्न है मानवीय कल्पनाओं का और कोष है-सद्भावना,करुणा,ममत्व,सहानुभूति और स्नेह का.
ह्रदय की पूर्ति होती है एक-दुसरे ह्रदय से ,जो उसी की तरह कोमल कल्पनाओं से ओत-प्रोत हो,जिसमें प्यार का सागर ठाठें मार रहा हो और जिसकी अनुभूति रोम-रोम में गुदगुदी मचा देने में समर्थ हो.इसी लिए भारतीय आर्य -ऋषियों ने वर्णाश्रम की व्यवस्था करते हुए गृहस्थाश्रम को सर्वाधिक महत्त्व दिया है.


ये उदगार हैं एक महान और उद्भट विद्वान के.वस्तुतः मानव-जीवन तभी सफल कहा जाता है ,जब उसका अर्द्धांग भी पूर्णतः उसके साथ एकाकार हो गया हो .जिसके घर में सुलक्षणा ,सुशील,सुन्दर और शिक्षित पत्नी हो,वह घर निश्चय ही इंद्र-भवन से बढ़ कर है.लेकिन क्या वास्तव में सबको ऐसी पत्नी मिल सकती है?प्रत्येक मनुष्य जन्म के समय प्रारब्ध में अपने पूर्व-जन्मों के संचित कर्म-फल के आधार पर पत्नी या पति कैसा मिलेगा ये लक्षण साथ लाता है.जन्म के समय उस स्थान के पूर्वीय क्षितिज पर जिस राशि की लग्न उदित हो रही होती है वही जन्म-लग्न कहलाती है.इस लग्न के आधार पर भविष्य कथन की सत्यता ९० प्रतिशत तक सटीक पाई जाती है.तो आइये देखें किस जन्म  लग्न में उत्पन्न स्त्री/पुरुष को कैसा पति/पत्नी मिलने के योग हैं.


मेष-जिस मनुष्य का जन्म मेष लग्न में हुआ है उसे सुन्दर,सुशील एवं शिक्षित पत्नी/पति मिलने के योग रहते हैं.तीखे नाक-नक्श,गौर वर्ण एवं चुम्बकीय मुस्कराहट से युक्त ऐसे स्त्री/पुरुष सहज ही लोगों का ध्यान आकर्षित करते हैं.धार्मिक कार्यों में इनकी रूचि रहती है तथा उपवास रखने,दान-पुण्य करने में वे तत्पर रहते हैं.उदार स्वभावना ऐसे व्यक्ति करने को तत्पर रहता है.जीवन में संघर्ष यह देख सकता है और पत्नी/पति के लिए सच्चा सहायक सिद्ध होता है .इन्हें संतान सुख भी श्रेष्ठ मिलता है.


वृष-जिस जातक का जन्म वृष लग्न में हुआ हो उसकी पत्नी/पति के कम शिक्षित होने के योग रहते हैं.भाग्य भी उसका साथ नहीं देता .बाल्यावस्था से ही इसे जीवन की कठोर वास्तविकताओं का सामना करना पड़ता है तथा जो भी कार्य करना चाहता है उसमें कुछ न कुछ बाधा उपस्थित हो ही जाती है.सिर-पीड़ा एवं उदर-पीड़ा के रोग होने की संभावना रहेगी.


मिथुन-जिस व्यक्ति का जन्म   मिथुन लग्न में हुआ हो उसे पत्नी/पति गर्वीला व अहंकारी मिलने के योग रहते हैं.उसके सम्मान को जरा सी ठेस लगी नहीं कि,वह सांपिन सा फुफकार उठता है.हालांकि जातक को धनी सुसराल मिलने के योग तो नहीं होते परन्तु फिर भी श्वसुर जीवन के आर्थिक पक्ष में कमोबेश सहायक ही होता है.पुत्र अच्छे व सद्गुणी पैदा होने के योग रहते हैं.


कर्क-जिस स्त्री/पुरुष का जन्म कर्क लग्न में होता है उसे पति/पत्नी क्रोधी स्वभाव का तथा जरूरत से ज्यादा टोटके बाज मिलने के योग रहते हैं.यह अपने सम्मान की रक्षा करने वाला होता है.यह स्वंय दूसरों से व्यंग्य करता है परन्तु दूसरों के व्यंग्य सहन नहीं करता है और जो इसके अहम् को ठेस पहुंचाता है उसके प्रति यह भयंकर बन जाता है.वैर(शत्रुत्व)यह भूलता नहीं और समय मिलने पर यह वैर निकाल कर ही दम लेने वाला होता है.


सिंह-जिस जातक का जन्म सिंह लग्न में होता है उसकी पत्नी/पति संघर्षशील एवं विपत्तियों का दृढ़तापूर्वक सामना करने वाला मिलता है.पुण्य-कार्य में इसकी रूचि होती है तथा प्रत्येक की यथा शक्ति सहायता करना इसका स्वभाव होता है.इस स्त्री/पुरुष में अहंकार की भावना भी प्रबल होती है,वह चाहता है कि जो कुछ भी वह कहे ,लोग उसे मानें,इसके विचारों को प्राथमिकता दें.सुन्दर,सुशील एवं गुणवान यह स्त्री/पुरुष श्रेष्ठ संतान को जन्म देने में सक्षम हैं.


कन्या-जिस जातक का जन्म कन्या लग्न में होता है उसकी पत्नी/पति कट्टर धार्मिक होता है.रंग गोरा न होते हुए भी यह सुन्दर ही होता है.चंचल व चपल ऐसा स्त्री/पुरुष समय एवं स्थिति के अनुसार उत्तर देने में पटु होता है तैराकी व स्नान का शौक़ीन भी हो सकता है.ऐसा पत्नी/पति भाग्यवर्धक तो होता ही है,गुणवान पुत्रों को भी उत्त्पन्न करने में समर्थ होता है.
तुला-जिस जातक का जन्म तुला लग्न में हुआ होता है उसे पत्नी/पति क्रूर एवं क्रोधी मिलने के योग होते हैं.बात-बात पर हाथ करना ,बात-बात पर रूठना,घर में अशांति बनाये रखना उसका स्वभाव होता है.हाँ ऐसी पत्नी/पति गहराई से सोचने एवं तदनुरूप कार्य करने का हौसला रखते हैं.परन्तु फिर भी उनका दृष्टिकोण स्वंय से ऊपर नहीं उठ पाटा.कुल मिला कर वैवाहिक जीवन मधुर रहता है.


वृश्चिक -जिस जातक का जन्म वृश्चिक लग्न में होता है उसे सुन्दर एवं गुणवान पत्नी/पति प्राप्त होता है.नाक-नक्श तीखा और रूपवान होता है.वार्तालाप करने में पटु एवं मधुर -भाषी होता है.सिलाई,कसीदा,चित्रकला,नृत्य-संगीत ,व्यंजन आदि बनाने किसी भी कला में निपुण हो सकता है.ऐसी पत्नी/पति भावुक,काम-कला(सेक्स) में प्रवीण एवं वात-वल्लभा होता है.


धनु-जिस जातक का जन्म धनु लग्न में होगा उसे पत्नी/पति सुशील एवं समझदार मिलने के योग होंगे.अधिक सुन्दर न होते हुए भी नाक-नक्श उभरे व स्वच्छ होने के कारण आकर्षक अवश्य होगा.धनु लग्न में जन्म लेने वाले को श्वसुर से बहुत अधिक लाभ तो नहीं मिलता परन्तु वह जातक के पक्ष में अवश्य होते हैं.ऐसे जातक के पति/पत्नी उच्च विचारों वाले व सौभाग्यशाली होते है. जीवन में सफल रहते हैं.


मकर-जिस स्त्री/पुरुष का जन्म मकर लग्न में होता है उसे पति/पत्नी सुन्दर ,तीखे नाक-नक्श वाली व मधुर स्वभाव के मिलते हैं.कठोरता तथा रूखेपन से इन्हें वश में नहीं किया जा सकता परन्तु भावनाओं के द्वारा इन्हें नियन्त्रण में लाया जा सकता है.जीवन की कठोर वास्तविकताओं को झेलने की इनमें क्षमता होती है.


कुम्भ-जिन जातकों का जन्म कुम्भ लग्न में होता है उन्हें पत्नी/पति तुनक-मिजाज और क्रोधी स्वभाव के मिलते हैं.जरा सा भी कार्य यदि उनकी इच्छा के अनुरूप नहीं होता तो वे रूठ जाते हैं और कलह से घर के वातावरण को विषाक्त बना देते हैं.वे व्यवस्थित रूप से रहने वाले नहीं होते हैं.पार्टियों में ये एक रस न होकर अलग-थलग रहने की प्रवृति रखते हैं.परन्तु ऐसे पति/पत्नी साहसी होते हैं और विपत्ति के समय भी धैर्य को अक्षुण रखते हैं.मानव मन की परख कर समय के अनुरूप ये अपने को ढाल लेते हैं.ये स्वस्थ और बुद्धीमान भी होते हैं.


मीन-जिन जातकों का जन्म मीन लग्न में होता है उन्हें पत्नी/पति सुन्दर सुशील,मधुर-भाषी और सौभाग्यशाली मिलने के योग रहते हैं.इनकी संतान देर से होने के कारण इस और वे चिंतित रह सकते हैं.ये अपने जीवन साथी को सन्मार्ग पर ले जाने वाले होते हैं.दृढ चित्त के ऐसे पति/पत्नी एक-दुसरे का हर बाधा में दृढ़ता से साथ देते हैं.


उपर्युक्त बारह राशियों की लग्नों में जन्में जातकों के जीवन -साथी के स्वभाव के सम्बन्ध में संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत की गई है .इन लग्नों के अतिरिक्त जन्म-कुंडली में स्थित ग्रहों का भी व्यापक प्रभाव पड़ता है और उसी के अनुरूप प्रत्येक लग्न में जन्में हर स्त्री-पुरुष के जीवन-साथी का स्वभाव समरूप न होकर प्रथा- प्रथक होता है.परमात्मा ने जिस  रूप में आपका निर्माण किया है ,वह केवल आपका ही हुआ है ठीक उसी रूप में न तो कोई और हुआ है ,न है और न होगा ही. अतः आपका जीवन साथी भी जैसा है ठीक वैसा ह़ीआपकी लग्न में जन्में दुसरे जातक का नहीं हो सकता,यह सदा याद रखें.केवल स्वभावगत गुण-धर्म लगभग सामान हो सकते है,उन्हीं का अवलोकन उपरोक्त के आधार पर कर सकते हैं.






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Thursday, March 3, 2011

वामदेव महादेवं लोकनाथं जगत गुरुम ------ विजय राजबली माथुर

हमारा भारत विश्व गुरु कहलाता था ,जैसा कि पिछली पोस्ट में स्पष्ट किया है कि शिव ही भारत है और भारत ही शिव.अतः शिव-स्तुति में 'वामदेव महादेवं लोकनाथं जगत गुरुम' कहने का आशय भारत -देश से ही है.लोकनाथं अर्थात जन- कल्याणकारी कारी हैं -शिव और यही भारत की संस्कृति रही है- जनोन्मुखी.वामदेव महादेव भी इसी सन्दर्भ में शिव को कहा गया है कि वह अवाम (जनता) का ख्याल रखने वाले हैं.भारत की नीतियां सदा से ही जनता की सार्व-भौमिकता वाली रही हैं.यही कारण रहा है कि विदेशी विद्वान भारत  खिंचे चले आते थे और यहाँ से ज्ञान बटोर कर स्वदेश लौटते थे.वेदों की आध्यात्मिक और रहस्यात्मक व्याख्या करने वाले विदेशी विद्वानों  में प्रो.मैक्समूलर ,प्रो.ग्रिफ्थ ,प्रो.विल्सन,प्रो.ग्रासमान,प्रो.लुड्विश,प्रो.ओल्डेन बर्ग,प्रो.लान्गलवा,डॉ.मैक्डानल,डॉ.कीथ,प्रो.आर.रोठ,प्रो.बाटलिक,प्रो.व्लूम फील्ड ,प्रो.लुई रेन ,प्रो.वाकर नोगल ,प्रो.बेवर ,प्रो.हिव्ट्नी,प्रो.केलंड,प्रो.इंग्लिश,प्रो.स्टेन कोनो,प्रो.हिल ब्रांट,प्रो.जे.गोंड आदि के नाम प्रमुख हैं.(यह विवरण पदमश्री डॉ.कपिल देव दिवेदी के लेख "वेद और विज्ञान" से लिया गया है).

प्रो.मैक्समूलर तो भारत में ३० वर्ष रहे -संस्कृत सीखी और यहाँ से मूल पांडुलिपिया भी लेकर जर्मनी चले गये.उनकी खोजों के आधार पर जर्मन वैज्ञानिकों ने एटम बम ईजाद किया जिन्हें अमेरिका तथा रूस ने जर्मनी की पराजय के बाद अपने-अपने देश में पनाह दी.उन्हीं के विश्लेषण के आधार पर महर्षि कार्ल मार्क्स ने जनोन्मुखी नीतियों का प्रतिपादन किया.मार्क्स देख रहे थे किस प्रकार मजदूरों का शोषण किया जा रहा है उनकी दुर्दशा का निदान कैसे हो ,ये सिद्धांत उन्होंने ब्रिटेन और जर्मनी की स्थितियों के मद्दे नजर बनाये थे.वह जर्मनी से स्व-निष्कासन के बाद इंग्लैण्ड में रह रहे थे.१९१७ की रूसी क्रान्ती लेनिन के नेतृत्त्व में मार्क्स के सिद्धांतों पर आधारित थी.

इधर भारत में १८७५ में महर्षि दयानंद सरस्वती ने सशस्त्र क्रान्ति की विफलता के बाद आर्य समाज की स्थापना स्वराज्य प्राप्ति के लक्ष्य से की थी. १८८५ में ब्रिटिश सरकार ने आर्य -समाज आन्दोलन से भयभीत होकर अवकाश प्राप्त आई.सी.एस.एलेन आक्तावियन ह्युम की मार्फ़त वोमेश चन्द्र बनर्जी की अध्यक्षता में इन्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना इसलिए करवाई थी कि सरकार को जन-असंतोष की दिशा पता चलती रहे और वह बचाव करती रहे.महर्षि दयानंद ने आर्यसमाजियों को कांग्रेस में शामिल होकर स्वतंत्रता की मांग उठाने का निर्देश दिया. धीरे-धीरे कांग्रेस के मंच से आजादी की मांग होने लगी.अब ब्रिटिश सरकार ने १९०६ में मुस्लिम लीग की स्थापना ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को आगे करके की तथा कांग्रेस में दयानंद विरोधी नेताओं यथा पं.मदन मोहन मालवीय,लाला लाजपत राय आदि के द्वारा हिन्दू महासभा की स्थापना हुयी १९२० में.इसका मिलिटेंट संगठन आर.एस.एस.अस्तित्व में आया १९२५ में.इन दोनों नये राजनीतिक दलों ने देश के स्वतंत्रता आन्दोलन को क्षति पहुंचाई.कांग्रेस के भीतर आजादी के प्रबल पक्षधरों ने रूसी क्रान्ति से प्रभावित होकर २५ दिसंबर १९२५ को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन कानपुर में किया.चूंकि आर.एस.एस.ने आर्य समाज में भी घुसपैठ बना ली थी;अतः कम्युनिस्ट नेताओं ने पूरे तौर पर भारतीय दर्शन को छोड़ कर शुद्ध मार्क्सवाद को अपना लिया.जबकि नियम आर्य समाज से मिलते-जुलते हैं.'कर्तव्य-दर्पण'में आर्यसमाजियों को अपनी आमदनी का एक प्रतिशत अंश आर्य समाज को भेंट करने का प्राविधान रखा था उसे ज्यों का त्यों कम्युनिस्टों पर भी लागू किया गया.कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान में एक प्रतिशत आय का अंशदान करने का प्राविधान रखा गया है.

सरदार भगत सिंह का परिवार आर्य समाजी था,'सत्यार्थ-प्रकाश' पढ़ते हुए उन्हें पूर्ण स्वाधीनता का जो जूनून चढ़ा तो वह क्रांतिकारी बन गये.उन्होंने एच.आर.ए.और भारत नौजवान सभा के माध्यम से क्रांतिकारियों को संगठित किया.भगत सिंह आदि भारत में बाम-आन्दोलन कारी थे.आज भारत का बाम-आन्दोलन यदि भटक रहा है तो उसका कारण ही सिर्फ यह है कि भारतीय बाम - दर्शन का ख्याल नहीं रखा गया है.हमारे बाम-देव-महादेव शिव के कल्याणकारी सिद्धांतों को अपना कर बाम-पन्थ भारत में रक्त-हीन क्रान्ति करने में सफल हो सकता है.बाम-पंथी आन्दोलन की सफलता ;कोटि-कोटि भारतीयों के जीवन को सुन्दर-सुखद -समृद्ध बनाने के लिए परमावश्यक है.
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24 फरवरी 2017 


Tuesday, March 1, 2011

"ॐ नमः शिवाय च ------ विजय राजबली माथुर

"ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पाराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है."यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है.हमारे देश में धर्म का प्रवर्तन किसी महापुरुष विशेष द्वारा नहीं हुआ है जिस प्रकार इस्लाम क़े प्रवर्तक हजरत मोहम्मद व ईसाईयत क़े प्रवर्तक ईसा मसीह थे.हमारे यहाँ राम अथवा कृष्ण धर्म क़े प्रवर्तक नहीं बल्कि धर्म की ही उपज थे.राम और कृष्ण क़े रूप में मोक्ष -प्राप्त आत्माओं का अवतरण धर्म की रक्षा हेतु ही,बुराइयों पर प्रहार करने क़े लिये हुआ था.उन्होंने कोई व्यक्तिगत धर्म नहीं प्रतिपादित किया था.आज जिन मतों को विभिन्न धर्म क़े नाम से पुकारा जा रहा है ;वास्तव में वे भिन्न-भिन्न उपासना-पद्धतियाँ हैं न कि,कोई धर्म अलग से हैं.लेकिन आप देखते हैं कि,लोग धर्म क़े नाम पर भी विद्वेष फैलाने में कामयाब हो जाते हैं.ऐसे लोग अपने महापुरुषों क़े आदर्शों को सहज ही भुला देते हैं.आचार्य श्री राम शर्मा गायत्री परिवार क़े संस्थापक थे और उन्होंने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कहा था -"उन्हें मत सराहो जिनने अनीति पूर्वक सफलता पायी और संपत्ति कमाई."लेकिन हम देखते हैं कि,आज उन्हीं क़े परिवार में उनके पुत्र व दामाद इसी संपत्ति क़े कारण आमने सामने टकरा रहे हैं.गायत्री परिवार में दो प्रबंध समितियां बन गई हैं.अनुयायी भी उन दोनों क़े मध्य बंट गये हैं.कहाँ गई भक्ति?"भक्ति"शब्द ढाई अक्षरों क़े मेल से बना है."भ "अर्थात भजन .कर्म दो प्रकार क़े होते हैं -सकाम और निष्काम,इनमे से निष्काम कर्म का (आधा क) और त्याग हेतु "ति" लेकर "भक्ति"होती है.आज भक्ति है कहाँ?महर्षि दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना धर्म में प्रविष्ट कुरीतियों को समाप्त करने हेतु ही एक आन्दोलन क़े रूप में की थी.नारी शिक्षा,विधवा-पुनर्विवाह ,जातीय विषमता की समाप्ति की दिशा में महर्षि दयानंद क़े योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता.आज उनके द्वारा स्थापित आर्य समाज में क्या हो रहा है-गुटबाजी -प्रतिद्वंदिता .


काफी अरसा पूर्व आगरा में आर्य समाज क़े वार्षिक निर्वाचन में गोलियां खुल कर चलीं थीं.यह कौन सी अहिंसा है?जिस पर स्वामी जी ने सर्वाधिक बल दिया था. स्वभाविक है कि, यह सब नीति-नियमों की अवहेलना का ही परिणाम है,जबकि आर्य समाज में प्रत्येक कार्यक्रम क़े समापन पर शांति-पाठ का विधान है.यह शांति-पाठ यह प्रेरणा देता है कि, जिस प्रकार ब्रह्माण्ड में विभिन्न तारागण एक नियम क़े तहत अपनी अपनी कक्षा (Orbits ) में चलते हैं उसी प्रकार यह संसार भी जियो और जीने दो क़े सिद्धांत पर चले.परन्तु एरवा कटरा में गुरुकुल चलाने  वाले एक शास्त्री जी ने रेलवे क़े भ्रष्टतम व्यक्ति जो एक शाखा क़े आर्य समाज का प्रधान भी रह चुका था क़े भ्रष्टतम सहयोगी क़े धन क़े बल पर एक ईमानदार कार्यकर्ता पर प्रहार किया एवं सहयोग दिया पुजारी व पदाधिकारियों ने तो क्या कहा जाये कि, आज सत्यार्थ-प्रकाश क़े अनुयायी ही सत्य का गला घोंट कर ईमानदारी का दण्ड देने लगे हैं.यह सब धर्म नहीं है.परन्तु जन-समाज ऐसे लोगों को बड़ा धार्मिक मान कर उनका जय-जयकारा करता है.आज जो लोगों को उलटे उस्तरे से मूढ़ ले जाये उसे ही मान-सम्मान मिलता है.ऐसे ही लोग धर्म व राजनीति क़े अगुआ बन जाते हैं.ग्रेषम का अर्थशास्त्र में एक सिद्धांत है कि,ख़राब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है.ठीक यही हाल समाज,धर्म व राजनीति क़े क्षेत्र में चल रहा है.


दुनिया लूटो,मक्कर से.
रोटी खाओ,घी-शक्कर से.
   एवं
अब सच्चे साधक धक्के खाते हैं .
फरेबी आज मजे-मौज  उड़ाते हैं.
आज बड़े विद्वान,ज्ञानी और मान्यजन लोगों को जागरूक होने नहीं देना चाहते,स्वजाति बंधुओं की उदर-पूर्ती की खातिर नियमों की गलत व्याख्या प्रस्तुत कर देते हैं.राम द्वारा शिव -लिंग की पूजा किया जाना बता कर मिथ्या सिद्ध करना चाहते हैं कि, राम क़े युग में मूर्ती-पूजा थी और राम खुद मूर्ती-पूजक थे. वे यह नहीं बताना चाहते कि राम की शिव पूजा का तात्पर्य भारत -भू की पूजा था. वे यह भी नहीं बताना चाहते कि, शिव परमात्मा क़े उस स्वरूप को कहते हैं कि, जो ज्ञान -विज्ञान का दाता और शीघ्र प्रसन्न होने वाला है. ब्रह्माण्ड में चल रहे अगणित तारा-मंडलों को यदि मानव शरीर क़े रूप में कल्पित करें तो हमारी पृथ्वी का स्थान वहां आता है जहाँ मानव शरीर में लिंग होता है.यही कारण है कि, हम पृथ्वी -वासी शिव का स्मरण लिंग रूप में करते हैं और यही राम ने समझाया भी होगा न कि, स्वंय ही  लिंग बना कर पूजा की होगी. स्मरण करने को कंठस्थ करना कहते हैं न कि, उदरस्थ करना.परन्तु ऐसा ही समझाया जा रहा है और दूसरे विद्वजनों से अपार प्रशंसा भी प्राप्त की जा रही है. यही कारण है भारत क़े गारत होने का.


जैसे सरबाईना और सेरिडोन क़े विज्ञापनों में अमीन सायानी और हरीश भीमानी जोर लगते है अपने-अपने उत्पाद की बिक्री का वैसे ही उस समय जब इस्लाम क़े प्रचार में कहा गया कि हजरत सा: ने चाँद क़े दो टुकड़े  कर दिए तो जवाब आया कि, हमारे भी हनुमान ने मात्र ५ वर्ष की अवस्था में सूर्य को निगल लिया था अतः हमारा दृष्टिकोण श्रेष्ठ है. परन्तु दुःख और अफ़सोस की बात है कि, सच्चाई साफ़ करने क़े बजाये ढोंग को वैज्ञानिकता का जामा ओढाया जा रहा है.

यदि हम अपने देश  व समाज को पिछड़ेपन से निकाल कर ,अपने खोये हुए गौरव को पुनः पाना चाहते हैं,सोने की चिड़िया क़े नाम से पुकारे जाने वाले देश से गरीबी को मिटाना चाहते हैं,भूख और अशिक्षा को हटाना चाहते हैंतो हमें "ॐ नमः शिवाय च "क़े अर्थ को ठीक से समझना ,मानना और उस पर चलना होगा तभी हम अपने देश को "सत्यम,शिवम्,सुन्दरम"बना सकते हैं.आज की युवा पीढी ही इस कार्य को करने में सक्षम हो सकती है.अतः युवा -वर्ग का आह्वान है कि, वह सत्य-न्याय-नियम और नीति पर चलने का संकल्प ले और इसके विपरीत आचरण करने वालों को सामजिक उपेक्षा का सामना करने पर बाध्य कर दे तभी हम अपने भारत का भविष्य उज्जवल बना सकते हैं.काश ऐसा हो सकेगा?हम ऐसी आशा तो संजो ही सकते हैं.
" ओ ३ म *नमः शिवाय च" कहने पर उसका मतलब यह होता है.:-
*अ +उ +म अर्थात आत्मा +परमात्मा +प्रकृति 
च अर्थात तथा/ एवं / और 
शिवाय -हितकारी,दुःख हारी ,सुख-स्वरूप 
नमः नमस्ते या प्रणाम या वंदना या नमन 


शिव-रात्रि पर ही मूल शंकर को बोद्ध  हुआ था और वह शिव अर्थात कल्याणकारी की खोज में निकल पड़े थे और आचार्य डॉ.रविदत्त शर्मा के शब्दों में उन्हें जो बोद्ध हुआ वह यह है :-


जिस में शिव का दर्शन हो,वही रात्रि है शिवरात्रि.
करे कल्याण जीवन का,वही रात्रि है शिवरात्रि..
कभी मन में विचार ही नहीं,शिव कौन है क्या है?
जो दिन में ही भटकते हैं;सुझाए  क्या उन्हें रात्रि..
शिव को खोजने वाला,फकत स्वामी दयानंद था.
उसी ने हमको बतलाया,कि होती क्या है शिवरात्रि..
शिव ईश्वर है जो संसार का कल्याण करता है.
आत्म कल्याण करने के लिए आती है शिवरात्रि..
धतूरा भांग खा कर भी,कहीं कल्याण होता है?
जो दुर्व्यसनों में खोये,उनको ठुकराती है शिवरात्रि..
सदियाँ ही नहीं युग बीत जायेंगे जो अब भी न संभले.
जीवन भर रहेगी रात्रि,न आयेगी शिवरात्रि..
आर्यों के लिए यह पर्व एक पैगाम देता है.
उपासक सच्चे शिव के बनने से होती है शिव रात्रि..
प्रकृति में लिप्त भक्तों  ,नेत्र  तो    खोलो.
ज्ञान के नेत्र से देखोगे,तो समझोगे शिवरात्रि..
ऋषि की बात मानो अब न भटको रहस्य को समझो.
यह तो बोद्ध रात्रि है,जिसे  कहते हो शिवरात्रि..


हम देखते हैं ,आज आर्य समाज को भी आर.एस.एस.ने जकड लिया है और वहां से भी 'आर्य'की बजाये विदेशियों द्वारा दिए गए नाम का उच्चारण होने लगा है.1875 में महर्षि स्वामी दयानंद ने (१८५७ की क्रांति में भाग लेने और उसकी विफलता से सबक के बाद)'आर्यसमाज'की स्थापना देश की आजादी के लिए की थी.कलकत्ता में कर्नल नार्थ ब्रुक से भेंट कर शीघ्र स्वाधीनता की कामना करने पर उसने रानी विक्टोरिया को लिखे पत्र में कहा-"दयानंद एक बागी फ़कीर है (Revolutionary Saint )"इलाहबाद हाई कोर्ट में उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलाया गया.महर्षि ने अपने जीवन काल में जितने भी आर्य समाजों की स्थापना की वे छावनियों वाले शहर थे.दादा भाई नौरोजी ने कहा है-"सर्व प्रथम स्वराज्य शब्द महर्षि दयानंद के "सत्यार्थ प्रकाश"में पढ़ा". 'कांग्रेस का इतिहास ' में डॉ.पट्टाभी सीता राम्माय्या ने लिखा है स्वतंत्रता आन्दोलन के समय जेल जाने वालों में ८५ प्रतिशत व्यक्ति आर्य समाजी होते थे.


आर्य समाज को क्षीण करने हेतु रिटायर्ड आई.सी.एस. जनाब ए.ओ.ह्युम की मार्फ़त वोमेश चन्द्र बेनर्जी के नेतृत्त्व में इन्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना सेफ्टी वाल्व के रूप में हुयी थी लेकिन दयान्द के इशारे पर आर्य समाजी इसमें प्रवेश करके स्वाधीनता की मांग करने लगे.


१९०५ में बंगाल का असफल विभाजन करने के बाद १९०६ में ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को मोहरा बना कर मुस्लिम लीग तथा १९२० में कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेताओं (मदन मोहन मालवीय,लाला लाजपत राय आदि) को आगे कर हिन्दू महासभा का गठन फूट डालो और राज करो की नीति के तहत (ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दुर्नीति ) हुआ एवं एच.एम्.एस.के मिलिटेंट संगठन के रूप में आर.एस.एस.अस्तित्व में आया जो आज आर्य समाज को विचलित कर रहा है.नतीजा फिर से ढोंग-पाखंड को बढ़ावा मिल रहा है.
अब यदि देश को फिर गुलाम होने से बचाना है तो ढोंग-पाखंड को ठुकरा कर दयानंद के बताये मार्ग पर चलना ही होगा.'आर्याभी विनय ' के एक मन्त्र की व्याख्या करते हुए महर्षि लिखते हैं-"हे परमात्मन हमारे देश में कोई विदेशी शासक न हो आर्यों का विश्व में चक्रवर्त्ति साम्राज्य हो" (ये सम्पूर्ण तथ्य श्री रामावतार शर्मा द्वारा "निष्काम परिवर्तन "पत्रिका के मार्च १९९९ में लिखित लेख से लिए गए हैं)


इस शिव रात्रि पर लोग सही संकल्प ले सकें तो देश का भविष्य सुखद हो सकता है.वर्ना तो सर्वत्र ढोंग-पाखण्ड का प्रचार हो ही रहा है ,रसातल में जाने से कोई रोक नहीं सकता.
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24 फरवरी 2017 








Monday, February 28, 2011

चिकित्सा समाज सेवा है -व्यवसाय नहीं ------ विजय राजबली माथुर

 ब मैंने 'आयुर्वेदिक दयानंद मेडिकल कालेज,'मोहन नगर ,अर्थला,गाजियाबाद  से आयुर्वेद रत्न किया था तो प्रमाण-पत्र के साथ यह सन्देश भी प्राप्त हुआ था-"चिकित्सा समाज सेवा है-व्यवसाय नहीं".मैंने इस सन्देश को आज भी पूर्ण रूप से सिरोधार्य किया हुआ है और लोगों से इसी हेतु मूर्ख का ख़िताब प्राप्त किया हुआ है.वैसे हमारे नानाजी और बाबाजी भी लोगों को निशुल्क दवायें दिया करते थे.नानाजी ने तो अपने दफ्तर से अवैतनिक छुट्टी लेकर  बनारस जा कर होम्योपैथी की बाकायदा डिग्री हासिल की थी.हमारे बाबूजी भी जानने वालों को निशुल्क दवायें दे दिया करते थे.मैंने मेडिकल प्रेक्टिस न करके केवल परिचितों को परामर्श देने तक अपने को सीमित रखा है.इसी डिग्री को लेकर तमाम लोग एलोपैथी की प्रेक्टिस करके मालामाल हैं.एलोपैथी हमारे कोर्स में थी ,परन्तु इस पर मुझे भी विशवास नहीं है.अतः होम्योपैथी और आयुर्वेदिक तथा बायोकेमिक दवाओं का ही सुझाव देता हूँ.


एलोपैथी चिकित्सक अपने को वरिष्ठ मानते है और इसका बेहद अहंकार पाले रहते हैं.यदि सरकारी सेवा पा गये तो खुद को खुदा ही समझते हैं.जनता भी डा. को दूसरा भगवान् ही कहती है.आचार्य विश्वदेव जी कहा करते थे -'परहेज और परिश्रम' सिर्फ दो ही वैद्द्य है जो इन्हें मानेगा वह कभी रोगी नहीं होगा.उनके प्रवचनों से कुछ चुनी हुयी बातें यहाँ प्रस्तुत हैं-

उषापान-उषापान करके पेट के रोगों को दूर कर निरोग रहा जा जा सकता है.इसके लिए ताम्बे के पात्र में एक लीटर पानी को उबालें और ९९० मि.ली.रह जाने पर चार कपड़ों की तह बना कर छान कर ताम्बे के पात्र में रख लें इसी अनुपात में पानी उबालें.प्रातः काल में सूर्योदय से पहले एक ग्लास से प्रारम्भ कर चार ग्लास तक पियें.यही उषा पान है.

बवासीर-बवासीर रोग सूखा  हो या खूनी दस से सौ तक फिर सौ से दस तक पकी निम्बोली का छिलका उतार कर प्रातः काल निगलवा कर कल्प करायें,रोग सदा के लिए समाप्त होगा.

सांप का विष-सांप द्वारा काटने पर उस स्थान को कास कर बाँध दें,एक घंटे के भीतर नीला थोथा तवे पर भून कर चने के बराबर मात्रा में मुनक्का का बीज निकल कर उसमें रख कर निगलवा दें तो विष समाप्त हो जायेगा.
बिच्छू दंश-बिच्छू के काटने पर (पहले से यह दवा तैयार कर रखें) तुरंत लगायें ,तुरंत आराम होगा.दवा तैयार करने के लिये बिच्छुओं को चिमटी से जीवित पकड़ कर रेक्तीफायीड स्प्रिट में डाल दें.गलने पर फ़िल्टर से छान कर शीशी में रख लें.बिच्छू के काटने पर फुरहरी से काटे स्थान पर लगायें.

डायबिटीज-मधुमेह की बीमारी में नीम,जामुन,बेलपत्र की ग्यारह-ग्यारह कोपलें दिन में तीन बार सेवन करें अथवा कृष्ण गोपाल फार्मेसी ,अजमेर द्वारा निर्मित औषधियां  -(१)शिलाज्लादिव्री की दो-दो गोली प्रातः-सायं दूध के साथ तथा (२) दोपहर में गुद्च्छादिबूरीके अर्क के साथ सेवन करें.

थायराड-इस रोग में दही,खट्टे ,ठन्डे,फ्रिज के पदार्थों से परहेज करें.यकृतअदि लौह पानी के साथ तथा मंडूर भस्म शहद के सेवन करें.लाभ होगा.

श्वेत दाग-श्वेत्रादी रस एक-एक गोली सुबह -शाम बापुच्यादी चूर्ण पानी से सेवन करें.
(मेरी राय में इसके अतिरिक्त बायोकेमिक की साईलीशिया 6 X का 4 T D S  सेवन शीघ्र लाभ दिलाने में सहायक होगा)

आज रोग और प्रदूषण वृद्धि  क्यों?-आचार्य विश्वदेव जी का मत था कि नदियों में सिक्के डालने की प्रथा आज फिजूल और हानिप्रद है क्योंकि अब सिक्के एल्युमिनियम तथा स्टील के बनते हैं और ये धातुएं स्वास्थ्य के लिये हानिप्रद हैं.जब नदियों में सिक्के डालने की प्रथा का चलन हुआ था तो उसका उद्देश्य नदियों के जल को प्रदूषण-मुक्त करना था.उस समय सिक्के -स्वर्ण,चांदी और ताम्बे के बनते थे और ये धातुएं जल का शुद्धीकरण करती हैं.अब जब सिक्के इनके नहीं बनते हैं तो लकीर का फ़कीर बन कर विषाक्त धातुओं के सिक्के नदी में डाल कर प्रदूषण वृद्धी नहीं करनी चाहिए.

 नदी जल के प्रदूषित होने का एक बड़ा कारण आचार्य विश्वदेव जी मछली -शिकार को भी मानते थे.उनका दृष्टिकोण था कि कछुआ और मछली जल में पाए जाने वाले बैक्टीरिया और काई को खा जाते थे जिससे जल शुद्ध रहता था.परन्तु आज मानव इन  प्राणियों  का  शिकार कर लेता है जिस कारण नदियों का जल प्रदूषित रहने लगा है.

क्षय रोग की त्रासदी-आचार्य विश्वदेव जी का दृष्टिकोण था कि मुर्गा-मुर्गियों का इंसानी भोजन के लिये शिकार करने का ही परिणाम आज टी.बी.त्रासदी के रूप में सामने है.पहले मुर्गा-मुर्गी घूरे,कूड़े-करकट से चुन-चुन कर कीड़ों का सफाया करते रहते थे.टी.बी. के थूक,कफ़ आदि को मुर्गा-मुर्गी साफ़ कर डालता था तो इन रोगों का संक्रमण नहीं हो पाटा था.किन्तु आज इस प्राणी का स्वतंत्र घूमना संभव नहीं है -फैशनेबुल लोगों द्वारा इसका तुरंत शिकार कर लिया जाता है.इसी लिये आज टी. बी. के रोगी बढ़ते जा रहे हैं.

क्या सरकारी और क्या निजी चिकित्सक आज सभी चिकित्सा को एक व्यवसाय के रूप में चालक रहे हैं.आचार्य विश्वदेव जी समाज सेवा के रूप में अपने प्रवचनों में रोगों और उनके निदान पर प्रकाश डाल कर जन-सामान्य के कल्याण की कामना किया करते थे और काफी लोग उनके बताये नुस्खों से लाभ उठा कर धन की बचत करते हुए स्वास्थ्य लाभ करते थे जो आज उनके न रहने से अब असंभव सा हो गया है.


विश्व देव  के एक प्रशंसक के नाते मैं "टंकारा समाचार",७ अगस्त १९९८ में छपे मेथी के औषधीय गुणों को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ.अभी ताजी मेथी पत्तियां बाजार में उपलब्ध हैं आप उनका सेवन कर लाभ उठा सकते हैं.मेथी में प्रोटीन ,वसा,कार्बोहाईड्रेट ,कैल्शियम,फास्फोरस तथा लोहा प्रचुर मात्रा  में पाया जाता है.यह भूख जाग्रत करने वाली है.इसके लगातार सेवन से पित्त,वात,कफ और बुखार की शिकायत भी दूर होती है.
पित्त दोष में-मेथी की उबली हुयी पत्तियों को मक्खन में तल  कर खाने से लाभ होता है.

गठिया में-गुड,आटा और मेथी से बने लड्डुओं से सर्दी में लाभ होता है.


प्रसव के बाद-मेथी बीजों को भून कर बनाये लड्डुओं के सेवन से स्वास्थ्य-सुधार तथा स्तन में दूध की मात्र बढ़ती है.


कब्ज में-रात को सोते समय एक छोटा चम्मच मेथी के दाने निगल कर पानी पीने से लाभ होता है.यह
एसीडिटी ,अपच,कब्ज,गैस,दस्त,पेट-दर्द,पाचन-तंत्र की गड़बड़ी में लाभदायक है.

आँतों की सफाई के लिये-दो चम्मच मेथी के दानों को एक कप पानी में उबाल कर छानने के बाद चाय बना कर पीने से लाभ होता है.

पेट के छाले-दूर करने हेतु नियमित रूप से मेथी का काढ़ा पीना चाहिए.

बालों का गिरना-रोकने तथा बालों की लम्बाई बढ़ने के लिये दानों के चूर्ण का पेस्ट लगायें.

मधुमेह में-मेथी पाउडर का सेवन दूध के साथ करना चाहिए.
मुंह के छाले-दूर करने हेतु पत्ते के अर्क से कुल्ला करना चाहिए.

मुंह की दुर्गन्ध -दूर करने हेतु दानों को पानी में उबाल कर कुल्ला करना चाहिए.

आँखों के नीचे का कालापन -दूर करने के लिये दानों को पीस कर पेस्ट की तरह लगायें.

कान बहना-रोकने हेतु दानों को दूध में पीस कर छानने के बाद हल्का गर्म करके कान में डालें.

रक्त की कमी में-दाने एवं पत्तों का सेवन लाभकारी है.

गर्भ-निरोधक-मेथी के चूर्ण तथा काढ़े से स्नायु रोग,बहु-मूत्र ,पथरी,टांसिल्स,रक्त-चाप तथा मानसिक तनाव और सबसे बढ़ कर गर्भ-निरोधक के रूप में लाभ होता है.

आज के व्यवसायी करण के युग में निशुल्क सलाह देने को हिकारत की नजर से देखा जाता है.आप भी पढ़ कर नजर-अंदाज कर सकते हैं.