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Saturday, March 21, 2015

विक्रमी संवत,आर्यसमाज और साम्यवाद --- विजय राजबली माथुर



 (आर्यसमाज की एक स्तुति-प्रार्थना )

1857 की क्रांति विफल होने पर 1875 मे चैत्र शुक्ल प्रतिपदा (विक्रमी संवत के प्रथम दिवस ) पर  महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा 'आर्यसमाज' की स्थापना जनता को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध जाग्रत करने हेतु की गई थी और शुरू-शुरू मे इसके केंद्र छावनियों मे स्थापित किए गए थे। इसकी सफलता से भयभीत होकर रिटायर्ड ICS एलेन आक्टावियन हयूम (A .O. HUME) की सहायता से W.C.(वोमेश चंद्र) बनर्जी की अध्यक्षता मे इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना कराई गई जो प्रारम्भ मे ब्रिटिश साम्राज्य हेतु 'सेफ़्टी वाल्व' का काम करती थी। स्वामी दयानन्द के निर्देश पर आर्यसमाजियों ने राजनीतिक रूप से कांग्रेस मे प्रवेश करके इसे स्वाधीनता आंदोलन की ओर मोड दिया। खुद पट्टाभिसीता रमईय्या ने 'कांग्रेस का इतिहास' पुस्तक मे स्वीकार किया है कि स्वाधीनता आंदोलन मे जेल जाने वाले सत्याग्रहियों मे 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे। कांग्रेस के द्वारा आजादी की मांग करने पर 1906 मे मुस्लिम लीग और  1920 मे कुछ कांग्रेसी नेताओं को लेकर हिन्दू महासभा का गठन कांग्रेस को कमजोर करने हेतु ब्रिटिश साम्राज्य ने करवाया था। मुसलिम लीग की भांति हिन्दू महासभा शासकों के अनुकूल कार्य न कर पाई तब RSS का गठन 1925 मे करवाया गया जिसने विदेशी शासकों को खुश करने हेतु मुस्लिम लीग की तर्ज पर विद्वेष की आग को खूब भड़काया (जिसकी अंतिम परिणति देश विभाजन के रूप मे हुई)।

1925 मे ही राष्ट्र वादी कांग्रेसियों ने भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की स्थापना स्वाधीनता आंदोलन को गति प्रदान करने हेतु की थी। किन्तु 1930 मे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना भारत मे कम्यूनिस्ट आंदोलन को रोकने हेतु करवा दी गई। लेनिन और बाद मे स्टालिन की सलाह को ठुकराते हुये उस समय के कम्यूनिस्ट नेताओं ने हू- ब-हू सोवियत रूस की तर्जपर पार्टी को चलाया जिसका परिणाम यह हुआ कि वे जनता की नब्ज पर अपनी उंगली न रख सके। सोवियत रूस मे भी 'धर्म' की अवधारणा के आभाव मे साम्यवाद का वह स्टाईल असफल हो गया और चीन मे भी जो चल रहा है वह मूल साम्यवाद नहीं है। हमारे देश मे अभी भी कुछ दक़ियानूसी विद्वान 'धर्म' और 'साम्यवाद' मे अंतर मानते हैं क्योंकि वे पुरोहितवाद को ही धर्म मानने की गलती छोडना नहीं चाहते । कुल मिला कर नुकसान शोषित-पीड़ित जनता का ही है। धर्म के नाम पर उसे मिलता है पोंगावाद जो उसके शोषण को ही मजबूत करता है। पाखंडी तरह तरह से जनता को ठगते हैं और जन-हितैषी कहलाने वाले कम्यूनिस्ट धर्म -विरोध के नाम पर अडिग रहने के कारण 'धर्म' की वास्तविक व्याख्या बताने से परहेज करते हैं। 

'धर्म' के सम्बन्ध मे निरन्तर लोग लिखते और अपने विचार व्यक्त करते रहते हैं परंतु मतैक्य नहीं है। ज़्यादातर लोग धर्म का मतलब किसी मंदिर,मस्जिद/मजार ,चर्च या गुरुद्वारा अथवा ऐसे ही दूसरे स्थानों  पर जाकर  उपासना करने से लेते हैं। इसी लिए इसके एंटी थीसिस वाले लोग 'धर्म' को अफीम और शोषण का उपक्रम घोषित करके विरोध करते हैं । दोनों दृष्टिकोण अज्ञान पर आधारित हैं। 'धर्म' है क्या? इसे समझने और बताने की ज़रूरत कोई नहीं समझता।

धर्म=शरीर को धारण करने के लिए जो आवश्यक है वह 'धर्म' है। यह व्यक्ति सापेक्ष है और सभी को हर समय एक ही तरीके से नहीं चलाया जा सकता। उदाहरणार्थ 'दही' जो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है किसी सर्दी-जुकाम वाले व्यक्ति को नहीं दिया जा सकता। ऐसे ही स्वास्थ्यवर्धक मूली भी ऐसे रोगी को नहीं दी जा सकती। क्योंकि यदि सर्दी-जुकाम वाले व्यक्ति को मूली और दही खिलाएँगे तो उसे निमोनिया हो जाएगा अतः उसके लिए सर्दी-जुकाम रहने तक दही और मूली का सेवन 'अधर्म' है। परंतु यही एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए 'धर्म' है।

मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध बनाने के लिए जो प्रक्रियाएं हैं वे सभी 'धर्म' हैं। लेकिन जिन प्रक्रियाओं से मानव जीवन को आघात पहुंचता है वे सभी 'अधर्म' हैं। देश,काल,परिस्थिति का विभेद किए बगैर सभी मानवों का कल्याण करने की भावना 'धर्म' है।

ऋग्वेद के इस मंत्र को देखें-


सर्वे भवनतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया :
सर्वे भद्राणि पशयनतु मा कश्चिद दु : ख भाग भवेत। ।


इस मंत्र मे क्या कहा गया है उसे इसके भावार्थ से समझ सकते हैं-


सबका भला करो भगवान ,सब पर दया करो भगवान।
सब पर कृपा करो भगवान,सब का सब विधि हो कल्याण। ।
हे ईश सब सुखी हों ,कोई न हो दुखारी।
सब हों निरोग भगवान,धन धान्य के भण्डारी। ।
सब भद्र भाव देखें,सन्मार्ग के पथिक हों।
दुखिया न कोई होवे,सृष्टि मे प्राण धारी । ।


ऋग्वेद का यह संदेश न केवल संसार के सभी मानवों अपितु सभी जीव धारियों के कल्याण की बात करता है। क्या यह 'धर्म' नहीं है?क्या इसकी आलोचना करके किसी वर्ग विशेष के हितसाधन की बात नहीं सोची जा रही है। जिन पुरोहितों ने धर्म की गलत व्याख्या प्रस्तुत की है उनकी आलोचना और विरोध करने के बजाये धर्म की आलोचना करके शोषित-उत्पीड़ित मानवों की उपेक्षा करने वालों (शोषकों ,उत्पीड़को) को ही लाभ पहुंचाने का उपक्रम है।


भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)।
 क्या इन तत्वों की भूमिका को मानव जीवन मे नकारा जा सकता है?और ये ही पाँच तत्व सृष्टि,पालन और संहार करते हैं जिस कारण इनही को GOD कहते हैं  ...

GOD=G(generator)+O(operator)+D(destroyer)।
खुदा=और चूंकि ये तत्व' खुद ' ही बने हैं इन्हे किसी प्राणी ने बनाया नहीं है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं।

'भगवान=GOD=खुदा' - मानव ही नहीं जीव -मात्र के कल्याण के तत्व हैं न कि किसी जाति या वर्ग-विशेष के।

पोंगा-पंथी,ढ़ोंगी और संकीड़तावादी तत्व (विज्ञान और प्रगतिशीलता के नाम पर) 'धर्म' और 'भगवान' की आलोचना करके तथा पुरोहितवादी 'धर्म' और 'भगवान' की गलत व्याख्या करके मानव द्वारा मानव के शोषण को मजबूत कर रहे हैं। ऐसे तथा-कथित प्रगतिशीलों का मखौल सुधीश पचौरी जी ने 'हिंदुस्तान,लखनऊ,के 20 नवंबर 2011 के इस लेख मे उड़ाया है जिसका स्कैन आप नीचे  देख रहे हैं।:

'ज्योतिष'=वह विज्ञान जो मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध ' बनाने मे सहायक है। अखिल ब्रह्मांड मे असंख्य तारे,ग्रह और नक्षत्र हैं जिनसे निकलने वाला प्रकाश समस्त जीवधारियों तथा वनस्पतियों सभी को प्रभावित करता है। मानव जीवन पर इस प्रभाव का अध्यन करके लाभकारी स्थिति बताना 'ज्योतिषी' का कर्तव्य होता है और जो इस से हट कर गलत कार्य करता है वह ज्योतिषी नहीं है केवल उसी की आलोचना और विरोध होना चाहिए। परंतु प्रगतिशीलता के नाम पर ढ़ोंगी व्यक्ति का विरोध न करके ज्योतिष का विरोध करने का मतलब है 'मानव' को प्रकृति सुलभ ज्ञान से वंचित करना और यह भी उतना ही गलत और बुरा है जितना ज्योतिष के नाम पर ठगना।

'साम्यवाद'=समष्टिवाद है जिसमे व्यक्ति विशेष का नहीं समाज का सामूहिक कल्याण सोचा और किया जाता है। अतः साम्यवाद ही परम मानव-धर्म है। साम्यवाद के तत्व वेदों मे मौजूद हैं। ऋग्वेद के अंतिम सूक्त मे मंत्रों  द्वारा दिशा-निर्देश दिये गए हैं।

'सं ....... वसून्या भर' अर्थात-

हे प्रभों तुम शक्तिशाली हो बनाते सृष्टि को ।
वेद सब गाते तुम्हें हैं कीजिये धन वृष्टि को। ।

'संगच्छ्ध्व्म ....... उपासते' अर्थात-

प्रेम से मिल कर चलें बोलें सभी ज्ञानी बने।
पूर्वजो की भांति हम कर्तव्य के मानी बने। ।

'समानी मंत्र : ....... हविषा जुहोमि' अर्थात-


हो विचार समान सबके चित्त मन सब एक हो।
ज्ञान पाते हैं बराबर भोग्य पा सब नेक हों। ।

'समानी व आकूति: ..... सुसहासति'

हो सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा।
मन भरे हो प्रेम से जिससे बढ़े सुख संपदा। ।

कोई भी प्रगतिशीलता के नाम पर यदि उपरोक्त मानव-कल्याण के संदेशों की उपेक्षा करता है और उससे दूर रहने की बात करता है तो स्पष्ट है कि वह समष्टिवादी-साम्यवादी नहीं है। 'साम्यवाद' मूलतः भारतीय अवधारणा है जिसका उल्लेख सम्पूर्ण वेदिक साहित्य मे है। जर्मनी के मैक्स मूलर साहब भारत आए 30 वर्ष यहाँ रह कर संस्कृत का अध्यन करके 'मूल पांडुलिपियाँ' लेकर जर्मनी रवाना हो गए और वहाँ जाकर उनका जर्मनी भाषा मे अनुवाद प्रकाशित करवाया। 'परमाणु विज्ञान' पर जर्मनी मे ही खोज हुई थी और द्वितीय महायुद्ध मे जर्मनी की पराजय पर उसके वैज्ञानिकों को रूस एवं अमेरिका अपने-अपने देश ले गए थे जिनहोने उन देशों को 'परमाणु बम' उपलब्ध करवाए थे -यह अभी कुछ  वर्ष ही पुरानी बात है।

इसी प्रकार मानव कल्याण के तत्वों को सहेज कर 'मानव-विज्ञानी' महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'दास कैपिटल' 'एवं 'कम्यूनिस्ट मेनीफेस्टो' नामक ग्रंथ दिये। उस समय जर्मनी और इंग्लैंड के समाज मे जैसा धर्म प्रचलित था उसका तीव्र विरोध महर्षि  मार्क्स ने किया है जो बिलकुल वाजिब है । वस्तुतः वह धर्म था ही नहीं वह तो पुरोहितवाद था किन्तु लोग उसे धर्म कहते थे इसलिए मार्क्स ने भी उसे धर्म कह दिया। इसका यह मतलब नहीं है कि मार्क्स ने मानव-कल्याण हेतु प्रपादित 'धर्म' का विरोध किया है। दुर्भाग्य से अहंकार ग्रस्त नेता लोग मार्क्स के मर्म को न समझ कर शब्दजाल मे उलझाना चाहते और मनुष्य कल्याण की धर्म की भावना का सतत विरोध करके अंततः शोषकों का ही हितसाधन करते हैं। यह तो शोषकों की ही चाल है कि उन्होने ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा हेतु RSS को धर्म का अलमबरदार बना कर खड़ा कर दिया जो 'धर्म' पर ही प्रहार करके 'ढोंग व पाखंड' को धर्म के नाम पर परोसता है। प्रगतिशील तथा साम्यवादी चिंतकों का यह नैतिक दायित्व है कि वे 'धर्म' की वास्तविक अवधारणा से जनता को अवगत कराकर उन्हें शोषण और उत्पीड़न से बचाएं। किन्तु विज्ञान और प्रगतिशीलता का नाम लेकर वे धर्म का ही विरोध करते हैं और इस प्रकार पुरोहितवाद को संरक्षण प्रदान कर देते हैं। 

चूंकि मै सत्य को समझाने का प्रयास करता हूँ इसलिए कुछ बड़े विद्वान अपने अहम के कारण उसका विरोध करते हैं और प्रकारांतर से 'साम्यवाद' विरोधियों का ही पृष्ठ-पोषण करते हैं। पश्चिम बंगाल के ऐसे ही नेताओं के कारण 34 वर्ष का बामपंथी शासन समाप्त हो गया क्योंकि उन्होने 'पश्चिम बंगाल के बंधुओं से एक बेपर की उड़ान' की ओर ध्यान ही नहीं दिया। सी पी एम के लोग अपने व्यक्तिगत मामलों का ज्योतिषीय समाधान मुझ से करवाते हैं और अपने बड़े नेताओं को उकसा कर 'ज्योतिष' एवं 'धर्म' पर कटाक्ष भी करवाते हैं यह दोहरी नीति 'जनहित' की विरोधी है और साम्यवाद की अवधारणा से जनता को दूर करने वाली है। 
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Tuesday, July 3, 2012

साम्राज्यवाद को मजबूत करने मे 'साम्यवाद 'का कितना योगदान?

"MAN HAS CREATED THE GOD FOR HIS MENTAL SECURITY ONLY"---
                                                                                                               KARL  MARX

अर्थात कार्ल मार्क्स का कथन है कि,"मनुष्य ने अपनी दिमागी सुरक्षा के लिए भगवान की उत्पत्ति  की है"।

महर्षि कार्ल मार्क्स ने  किस संदर्भ और परिस्थितियों मे यह लिखा इसे समझे बगैर एयर कंडीशंड कमरों मे बैठ कर उदभट्ट विद्वान 'धर्म' की चर्चा को भटकाने वाला तथ्य कहते हैं और उनमे से कुछ यह भी घोषणा करते हैं कि,;हिन्दू','इस्लाम','ईसाई'आदि ही धर्म हैं एवं धर्म की अन्य कोई परिभाषा मान्य नहीं है। इसका सीधा-सादा अर्थ है कि 'तर्क'और ज्ञान के आभाव मे ये विद्वान ढोंग-पाखंड-आडंबर जिसे साम्राज्यवादी धर्म बताते हैं उसी को धर्म स्वीकारते हैं और तभी धर्म पर प्रहार करके जनता से कटे रहते हैं। हालांकि कुछ प्रगतिशील और जागरूक साम्यवादी नेता तो धर्म को सही परिप्रेक्ष्य मे समझ कर जनता से संवाद करने लगे हैं और वे लोकप्रिय भी हैं।मुस्लिम वर्ग के एक कामरेड तो श्री कृष्ण को 'साम्यवाद ' का प्रयोग करने वाला बताते हैं और उनका जनता पर अनुकूल प्रभाव भी पड़ता है।  किन्तु बुद्धिजीवी विद्वान अभी भी 18वीं सदी की सोच से साम्यवाद लाने के नाम पर नित्य ही साम्राज्यवाद के हाथ मजबूत कर रहे हैं  फेसबुक पर अपने थोथे  बयानों से।और तो और मजदूर नेता एवं विद्वान कामरेड ने तो तब हद ही कर दी जब RSS की वकालत वाला एक लेख ही शेयर कर डाला। देखें-
Shriram Tiwari shared a link.

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साम्यवाद की विचारधारा क्या भारतीय संस्कृति के अनुकूल है? या साम्यवाद का भारतीय संस्कृति, धर्म और इतिहास से भी कोई संबंध है? यदि इन जैसे प्रश्नों के उत्तर खोजे जाऐं तो ज्ञात होता है कि वास्तविक साम्यवाद भारतीय संस्कृति में ही है। संसार का कम्युनिस्ट समाज भारतीय साम्यवाद को समझ नहीं पाया है और ना ही स...
· · · 2 hours ago ·


    • Vijai RajBali Mathur लेख मे मुद्दो की बात उठाते-उठाते अंततः RSS का समर्थन करके गुमराह किया गया है। 1857 की क्रांति मे भाग ले चुके महर्षि दयानन्द को अंग्रेज़-REVOLUTIONARY SAINT कहते थे और उनके संगठन को क्षति पहुँचने के उद्देश्य से RSS की स्थापना कराई थी जो आज आर्यसमाज को ही नियंत्रित करता प्रतीत होता है।


तो आइये सबसे पहले आर एस एस क्यों बनवाया गया इसे जानें फिर समझें कि 'साम्यवाद है ही भारतीय अवधारणा'। 'महाभारत काल'के बाद भारत का सांस्कृतिक पतन तीव्र गति से हुआ और आंतरिक फूट के कारण यह विदेशियों का गुलाम बना । विदेशी सत्ता ने यहाँ के तत्कालीन विद्वानों को अपनी ओर मिलाकर ऐतिहासिक संदर्भों को संदेहास्पद बनाने हेतु 'पुराणों' की रचना करवाई। आम जनता ने इन विद्वानों से गुमराह होकर पुराणों को धार्मिक ग्रंथ मान लिया और आज तक वही विभ्रम पूजा जा रहा है। हमारे साम्यवादी विद्वान भी इन ग्रन्थों को ही धार्मिक ग्रंथ की संज्ञा देते हैं जो उनकी ज़िद्द और जड़ता का प्रतीक है।हवाला तो ये मार्क्स का देते हैं किन्तु ये सब महर्षि कार्ल मार्क्स के पैर के अंगूठे के नाखून की नोक के बराबर भी नहीं ठहरते ज्ञान के मामले मे।

सर्वप्रथम बौद्धों पर अत्याचार करने वाले लोगों यथा उनके मठों को उजाड़ने,विहारों और उनके ग्रन्थों को जलाने वाले लोगों को 'हिंसा देने' के कारण 'हिन्दू' की संज्ञा दी गई थी। उसके बाद फारसियों ने एक गंदी और भद्दी गाली के रूप मे यहाँ के लोगों को 'हिन्दू' कहा। यहाँ के लोगों ने अपने तत्कालीन पुरोहितो,पुजारियों और विदेशी सत्ता के लालच मे फंसे विद्वानों की बातों को सिर -माथे पर लिया और खुद को 'हिन्दू' कहलाने लगे।

अब चूंकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने सत्ता 'मुस्लिम शासकों' से छीनी थी इसलिए उसने इन हिंदुओं को बढ़ावा देकर मुसलमानों को कुचला जिससे वे शिक्षा और रोजगार मे पिछड़ गए। कंपनी शासन ने मुस्लिमों और हिंदुओं मे खाई गहराने हेतु 'बाबरी मस्जिद' प्रकरण खड़ा कराया।

ब्रिटिश अत्याचारों और शोषण से त्रस्त होकर मुगल शासक 'बहादुर शाह जफर' के नेतृत्व मे 1857 मे तथाकथित हिंदुओं और मुसलमानों ने मिल कर क्रांति कर दी जो आंतरिक फूट के कारण निर्ममता से कुचल दी गई। पंजाब के सिखों,ग्वालियर के सिंधिया,भोपाल की बेगम,नेपाल के राणा ने 'आज़ादी की प्रथम क्रान्ति'को कुचलने मे अंग्रेजों का भरपूर साथ दिया और बहादुर शाह जफर को मांडले मे कैद करके भारत से निर्वासित कर दिया गया। इस क्रांति के बाद मुसलमानों का और भी दमन किया गया क्योंकि मुगल शासक ने इसका नेतृत्व किया था।

अपनी युवावस्था मे महर्षि दयानंद 'सरस्वती'ने भी इस क्रांति मे भाग लिया था और रानी लक्ष्मी बाई से भी उनका संपर्क था। 'क्रांति' के दमन की क्रूरता को देख कर दयानन्द ने ईस्वी सन 1875 की चैत्र प्रतिपदा को (क्रांति के 18 वर्ष बाद),'आर्यसमाज'का गठन किया जिसका उद्देश्य जनता को जागरूक करके देश को आज़ादी दिलाना था। प्रारम्भ मे जितने भी आर्यसमाज स्थापित हुये ब्रिटिश छावनी वाले नगरों मे ही हुये थे। ब्रिटिश सरकार ने उन पर कई मुकदमे भी चलवाये उनको REVOLUTIONARY SAINT कहा गया। महर्षि दयानंद 'सरस्वती' ने विदेशियों द्वारा प्रदत्त  'हिन्दू' संज्ञा का प्रबल विरोध किया। उन्होने देशवासियों को 'सनातन आर्यत्व' पर लौटने का आहवाहन किया।

दयानन्द के प्रचार से भयभीत होकर ब्रिटिश गवर्नर जनरल ने रिटायर्ड ICS एलेन आकटावियन हयूम की मदद से वोमेश चंद्र बेनर्जी (जो ईसाई थे)की अध्यक्षता मे इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना कारवाई जो सम्पूर्ण आज़ादी नही केवल 'डोमिनियन स्टेट' चाहती थी। अतः दयानन्द के निर्देश पर आर्यसमाजी इस कांग्रेस के सदस्य बन गए और उन लोगों के प्रयास से कांग्रेस को 'सम्पूर्ण' आज़ादी को ध्येय बनाना पड़ा।डॉ पट्टाभि सीता रमय्या ने 'कांग्रेस का इतिहास' मे लिखा है कि स्वतन्त्रता आंदोलन मे भाग लेने वाले सत्याग्रहियों मे 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे।

अतः अब इस कांग्रेस को कमजोर बनाने हेतु मुसलमानों का सहारा लिया गया और ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन के माध्यम से 1906 मे  'मुस्लिम लीग'की स्थापना ब्रिटिश सरकार ने करवाई दूसरी ओर 'मुस्लिम सांप्रदायिकता' के जवाब मे मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व मे 1920 मे 'हिन्दू महासभा' का गठन करवाया गया। अभी तक महर्षि दयानन्द   के बाद भी उनका प्रभाव समाप्त नहीं हुआ था अतः आर्यसमाजियों के प्रभाव से हिंदूमहासभा 'हिन्दू सांप्रदायिकता' को उभाड़ने मे विफल रही। लेकिन कांग्रेस मे सांप्रदायिक आधार पर धड़ेबंदी शुरू हो गई। इन परिस्थितियों मे 'राष्ट्र्वादी कांग्रेसियों' ने 25/26 दिसंबर 1925 को कानपुर मे कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की। स्वामी सहजानन्द 'सरस्वती',क्रांतिकारी गेंदा लाल दीक्षित और महा पंडित राहुल सांस्कृत्यायन सरीखे आर्यसमाजियों ने कम्युनिस्ट पार्टी को मजबूत बनाने मे अपना अमित योगदान दिया।

आर्यसमजी और कम्युनिस्ट मिल कर कहीं ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ न फेंके इस लिए पूर्व क्रांतिकारी सावरकर साहब जो खुद को नास्तिक कहते थे के माध्यम से RSS का गठन करवाया गया। शासकों के साथ दुरभि संधि के तहत इस संगठन को नाजी हिटलर के 'स्टार्म फोर्स' की भांति रखा गया जिससे जनता को गुमराह किया जा सके क्योंकि हिटलर शुद्ध आर्य होने का दावा करता था और उसका वारिस यह संगठन भारत मे खुद को घोषित करने लगा। इससे यह शक नहीं पैदा हो सका कि इसके पीछे ब्रिटिश सरकार का हाथ है जबकि यह उसी के मंसूबे पूरे करने हेतु ही गठित हुआ था। RSS की जूते से टोपी तक पोशाक और परेड की गतिविधियां जर्मनी के 'स्टार्म फोर्स' की तर्ज पर रखी गईं। यह नस्लवादी तौर पर मुस्लिमों के विरुद्ध घृणा फैलाता था । मुस्लिम लीग -RSS के प्रयासों से देश 'हिन्दू-मुस्लिम दंगों'की आग मे झुलसा दिया गया और अंततः 'पाकिस्तान' एवं 'भारत' दो देशों मे बाँट दिया गया। यह साम्राज्यवाद के नए मसीहा अमेरिका की नीतियों और योजनाओं का परिणाम था।

पूंजीवाद के समर्थक नेहरू जी ने बड़ी ही चालाकी से रूस से मित्रता करके भारतीय कम्युनिस्टों को प्रभाव हींन कर दिया।  आज कम्युनिस्ट आंदोलन कई पार्टियों मे विभक्त होकर पूरी तरह बिखर गया है। कांग्रेस जहां कमजोर पड़ती है वहाँ RSS समर्थित भाजपा को आगे बढ़ा देती है। दोनों साम्राज्यवादी अमेरिका समर्थक पार्टियां हैं। ऐसे मे साम्यवाद के मजबूत होकर उभरने की आवश्यकता है परंतु सबसे बड़ी बाधा वे 'साम्यवादी विद्वान और नेता' खड़ी करते हैं जो आज भी अनावश्यक और निराधार ज़िद्द पर अड़े हुये हैं कि 'मार्क्स' ने धर्म को अफीम कह कर विरोध किया है अतः साम्यवाद धर्म विरोधी  है।

'एकला चलो रे ' की नीति पर चलते हुये इस ब्लाग के माध्यम से मैं सतत 'धर्म' की वास्तविक व्याख्या बताने का प्रयास करता रहता हूँ जो वस्तुतः 'नक्कारखाने मे तूती की आवाज़' की तरह है। फिर भी एक बार और-

'धर्म'=जो शरीर को धरण करने के लिए आवश्यक है जैसे-'सत्य','अहिंसा','अस्तेय','अपरिग्रह'और 'ब्रह्मचर्य'।
(क्या मार्क्स ने इन सद्गुणों को अफीम बताया है?जी नहीं मार्क्स ने उस समय यूरोप मे प्रचलित 'ईसाई पाखंडवाद'को अफीम कह कर उसका विरोध किया था। पाखंडवाद चाहे ईसाइयत का हो,इस्लाम का हो या तथाकथित हिन्दुत्व का उन सब का प्रबल विरोध करना ही चाहिए परंतु 'विकल्प' भी तो देते चलिये। )

'भगवान'=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल) का समन्वय।

'खुदा'=चूंकि ये पाँच तत्व खुद ही बने हैं इन्हे किसी ने बनाया नहीं है इसलिए इन्हे खुदा भी कहते हैं।

GOD=G(जेनेरेट)+O(आपरेट)+D(देसट्राय)। 'भगवान' या 'खुदा' सम्पूर्ण सृष्टि का सृजन,पालन और 'संहार' भी करते हैं इसलिए इन्हें GOD भी कहा जाता है।

क्या मार्क्स ने प्रकृति के इन पाँच तत्वों को अफीम कहा था?'साम्यवाद' को संकुचित करने वाले वीर-विद्वान क्या जवाब देंगे?  


देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-वृक्ष ,नदी,समुद्र,वायु,अग्नि,आकाश,ग्रह-नक्षत्र आदि न कि कोई व्यक्ति विशेष। क्या मार्क्स ने प्रकृति प्रदत्त इन उपादानों का कहीं भी विरोध किया है?'साम्यवाद' के नाम पर साम्यवाद का अवमूल्यन करने वाले दिग्गज विद्वान क्या जवाब देंगे?

जनता को सही राह दिखाना किस प्रकार 'भटकाव' है?जो भटकाव करते हैं उनको तो धर्म कह कर ये विद्वान सिर पर चढ़ाते हैं और उसी प्रकार मार्क्स को बदनाम करने की कोशिश करते हैं जिस प्रकार साम्राज्यवादियों के पिट्ठू विद्वान राम को बदनाम करने का साहित्य सृजन करते हैं। राम ने नौ लाख वर्ष पूर्व साम्राज्यवादी रावण को परास्त किया और उसका साम्राज्य ध्वस्त किया था। लेकिन साम्यवाद के मसीहा कहलाने वाले ये विद्वान राम-रावण युद्ध को कपोल कल्पना कह कर राम को साम्राज्यवादी RSS का खिलौना बना देते हैं। साम्राज्यवादियों ने दो धाराएँ फैला कर वास्तविकता को ढकने का स्वांग रचा है। पहले कहा गया कि वेद गड़रियों के गीत हैं और खुद 'मेक्समूलर' के माध्यम से यहाँ से मूल पांडुलिपियाँ ले गए। अंनुसन्धान किए और वेदों का भरपूर लाभ उठाया। दूसरे RSS,मूल निवासी,आदिवासी,आदि तमाम संगठनों के माध्यम से वेद और आर्यों के विरुद्ध दुष्प्रचार करवाया । कोई हिटलर की तर्ज पर हिन्दुत्व को नस्लवादी आर्य बताता है तो कोई आर्यों को यहाँ के मूल निवासियों का शोषक आक्रांता। दुर्भाग्य यह है कि साम्यवादी विद्वान इनमे से ही किसी न किसी बात को सही मानते हैं और अपना दिमाग लगा कर कुछ सोचना व समझना ही नहीं चाहते हैं। यदि कोई ऐसा प्रयास करता है तो तत्काल उसे प्रतिगामी घोषित कर देते हैं जबकि खुद कार्ल मार्क्स ने 'साम्यवाद' को देश-काल-परिस्थितियों के अनुसार लागू करने की बात कही थी। भारत मे कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना होने पर स्टालिन ने भी इसके संस्थापकों से ऐसा ही कहा था। किन्तु इन लोगों ने न तो मार्क्स के सिद्धांतों का पालन किया न ही स्टालिन के सुझाव माने और रूसी पैटर्न की नकल कर डाली। भारतीय वांगमय से मेल न खाने के कारण यहाँ की जनता के बीच साम्राज्यवादियों के सहयोग से यह प्रचारित किया गया कि साम्यवाद विदेशी विचार-धारा है और देश के अनुकूल नहीं है। डॉ राम मनोहर लोहिया और लाल बहादुर शास्त्री सरीखे नेताओं ने इसी आधार पर साम्यवाद को अत्यधिक क्षति पहुंचाई। स्टालिन ने हिटलर से समझौता  कर लिया तो ठीक था लेकिन नेताजी सुभाष बोस ने हिटलर का सहयोग लेकर जापान मे पनाह ली तो उनको 'तोजो का कुत्ता' कह कर इन साम्यवादी विद्वानों ने संभोधित किया और अपेक्षा करते हैं कि जनता उनको सहयोग दे । हालांकि अब यह स्वीकार कर लिया गया है कि नेताजी का विरोध करना तब गलत था।

'रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना' के माध्यम से मैंने बताने का प्रयास किया है कि किस प्रकार राम ने रावण के 'साम्राज्यवाद' को नष्ट किया था। यदि आज भी साम्यवाद को कामयाब करना है तो राम की नीतियों को अपनाना पड़ेगा ,राम की आलोचना करके या अस्तित्व को नकार के कामयाब न अभी तक हुये हैं न ही आगे भी हो सकेंगे। योगी राज श्री कृष्ण ने तो सर्वाधिकार का बचपन से ही विरोध किया था गावों की संपत्ति का शहरी उपभोग समाप्त करने के लिए उन्होने 'मटका फोड़' आंदोलन चलाया था और गावों का मक्खन शहर आने से रोका था। गो-संवर्द्धन पर अनुसंधान करवाया और सफलता प्राप्त की लेकिन ढ़ोंगी गोवर्धन-परिक्रमा के नाम पर इस उपलब्धि पर पलीता लगाते हैं क्योंकि उसी मे साम्राज्यवादियों का हित छिपा हुआ है। किन्तु साम्यवादी क्यों नही 'सत्य' को स्वीकार करते हैं? क्यों साम्यवादी विद्वान ढोंगियों के कथन पर ध्यान देते हैं और वास्तविकता से आँखें मूँद लेते हैं। 

अभी तक सभी साम्यवादी विद्वानों ने साम्राज्यवादियों के षड्यंत्र मे फंस कर 'नकारात्मक' सोच को सच माना है। किन्तु अब आवश्यकता है कि इस सोच को सकारात्मक बना कर 'सच' को स्वीकार करें और सफलता हासिल करें। अन्यथा पूर्व की भांति 'साम्राज्यवाद को ही मजबूत' करते रहेंगे। मार्क्स ने जिस GOD का विरोध किया वह पाखंडियों की सोच वाला था वास्तविक नहीं। हमे जनता को बताना चाहिए वास्तविक GOD,खुदा या भगवान प्रकृति के पाँच तव हैं और कुछ नहीं। जनता को धर्म का मर्म बताना पड़ेगा तब ही वह ढोंग-पाखंड-आडंबर से दूर हो पाएगी। कृपया साम्यवाद का चोला ओढ़ कर 'मार्क्स' को बदनाम करना और इस प्रकार 'साम्राज्यवाद को' मजबूत करना बंद करें।

Saturday, May 5, 2012

जन्म कुंडली मे 'राज राजेश्वर योग' ने मार्क्स को 'बेताज बादशाह' बनाया

(05 मई ,1818 को जर्मन मे जन्मे कार्ल मार्क्स की कुंडली मे -कुम्भ लग्न का शनि 'राज राजेश्वर योग' बना रहा है)



(जन्म-05-05-1818 एवं मृत्यु-14-03-1818 )



जन्म कुंडलियों मे विभिन्न योगों को दर्शाने वाली एक पुस्तक से महर्षि कार्ल मार्क्स की यह जन्म कुंडली उपलब्ध हुई है। उक्त पुस्तक मे मात्र इतना ही बताया गया है कि,धनु,मीन,तुला,मेष,मकर या कुम्भ लग्न मे 'शनि'स्थित हो तो 'राज राजेश्वर योग'होता है। इस प्रकार का योग कार्ल मार्क्स की कुंडली मे 'कुम्भ लग्न'मे शनि की स्थिति से बन रहा है। इस पर मंगल की पूर्ण-आठवीं दृष्टि भी पड़ रही है।


उक्त पुस्तक मार्क्स के बारे मे इससे अधिक प्रकाश नहीं डालती है। स्व्भाविक रूप से आप यह प्रश्न उठा सकते हैं कि,मार्क्स को इस राजयोग से कौन सी गद्दी मिली?मार्क्स की कुंडली मे तीसरे भाव मे उच्च का सूर्य उन्हें पराक्रमी,भाग्यशाली व विद्वान बना रहा है।राहू भी वहीं बैठ कर उनमे साहस व पराक्रम का संचार कर रहा है किन्तु उनके कुटुम्ब सुख को नष्ट कर रहा है। वहीं बैठा चंद्र राहू के साथ ग्रहण योग बनाते हुये कुटुम्ब सुख से उन्हें वंचित रखने मे योगदान कर रहा है। चतुर्थ भाव मे बैठे बुध और शुक्र उन्हें  कूटनीतिज्ञता से पूरित कर रहे हैं तथा मित्रों से लाभ के अवसर उत्पन्न कर रहे हैं साथ ही नवम  भाव मे उपस्थित 'केतू' भी मित्र लाभ प्रदान कर रहा है । 'एंजेल्स' का सहयोग एवं साहचर्य सर्व विदित ही है। एकादश भाव मे बैठा स्व-ग्रही ब्रहस्पति उन्हें यशस्वी बना रहा है। षष्ठम भाव मे बैठा नीच का मंगल उन्हें रोगी बना रहा है।


कार्ल मार्क्स का जो जीवन वृतांत उपलब्ध है वह इन ग्रहों के फल को ही स्पष्ट करता है। 'राज राजेश्वर योग' एक राज योग है। भले ही किसी देश की शासन व्यवस्था का संचालन मार्क्स ने नहीं किया किन्तु उन्होने शासन व्यवस्था का जो नया 'दर्शन'(फिलासफ़ी) प्रस्तुत किया उसके अनुसार कई देशों का संचालन हुआ और आज भी हो रहा है। आज भी कार्ल मार्क्स विश्व की कोटि-कोटि जनता के 'बेताज बादशाह 'हैं और जनता के दिलों पर उनका राज चल रहा है ।जनता आज भी कार्ल मार्क्स द्वारा दिखाये गए मार्ग से अपने कल्याण की उम्मीद लगाए है। 




पिछले वर्ष मार्क्स जयंती पर आगरा के एक साप्ताहिक अखबार मे पूर्व प्रकाशित अपने लेख को दिया था आज फिर उसी को उद्धृत कर रहा हूँ। ऊपर जो मार्क्स का ज्योतिषीय विश्लेषण दिया है  उससे प्रस्तुत लेख के संदर्भ समझने मे सहूलियत होगी।







बृहस्पतिवार, 5 मई 2011



समाजवाद और महर्षि कार्लमार्क्स

05  मई जयन्ति के अवसर पर १९९० में सप्तदिवा,आगरा में पूर्व प्रकाशित आलेख 




जब-जब धरा विकल होती,मुसीबत का समय आता.
किसी न किसी रूप में कोई न कोई महामानव चला आता ..


ये पंक्तियाँ महर्षि कार्ल मार्क्स पर पूरी तरह खरी उतरती हैं.मार्क्स का आविर्भाव एक ऐसे समय में हुआ जब मानव द्वारा मानव का शोषण अपने निकृष्टतम रूप में भयावह रूप धारण कर चुका था.औद्योगिक क्रान्ति के बाद जहाँ समाज का धन-कुबेर वर्ग समृद्धि की बुलंदियां छूता चला जा रहा था वहीं दूसरी ओर मेहनत करके जीवन निर्वाह करने वाला गरीब मजदूर और फटे हाल होता जा रहा था,यह परिस्थिति यूरोप में तब आ चुकी थी और भारत तब तक सामन्तवाद में पूरी तरह जकड चुका था.हमारे देश में जमींदार भूमिहीन किसानों पर बर्बर अत्याचार कर रहे थे.
Man is the product of his Environment .
मार्क्स का पितृ देश जर्मन था,परन्तु उन्हें निर्वासित होकर इंग्लैण्ड में अपना जीवन यापन करना पड़ा.जर्मन के लोग सदा से ही चिंतन-मनन में  अन्य यूरोपीय समाजों से आगे रहे हैं और उन पर भारतीय चिंतन का विशेष प्रभाव पड़ा है.मैक्समूलर सा :तीस वर्ष भारत में रहे और संस्कृत का अध्ययन करके वेद,वेदान्त,उपनिषद और पुरानों की तमाम पांडुलिपियाँ तक प्राप्त करके जर्मन वापिस लौटे.मार्क्स जन्म से ही मेधावी रहे उन्होंने मैक्समूलर के अध्ययन का भरपूर लाभ उठाया और समाज व्यवस्था के लिए नए सिद्धांतों का सृजन किया.
मार्क्स का तप और त्याग 
हालांकि एक गरीब परिवार में जन्में और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा,परन्तु मार्क्स ने हार नहीं मानी,उन्होंने अपने कठोर तपी जीवन से गहन अध्ययन किया.समाज के विकास क्रम को समझा और भावी समाज निर्माण के लिए अपने निष्कर्षों को निर्भीकता के साथ समाज के सम्मुख रखा.व्यक्तिगत जीवन में अपने से सात वर्ष बड़ी प्रेमिका से विवाह करने के लिए भी उन्हें सात वर्ष तप-पूर्ण प्रतीक्षा करनी पडी.उनकी प्रेमिका के पिता जो धनवान थे मार्क्स को बेहद चाहते थे और अध्ययन में आर्थिक सहायता भी देते थे पर शायद अपनी पुत्री का विवाह गरीब मार्क्स से न करना चाहते थे.लेकिन मार्क्स का प्रेम क्षण-भंगुर नहीं था उनकी प्रेमिका ने भी मार्क्स की तपस्या में सहयोग दिया और विवाह तभी किया जब मार्क्स ने चाहा.विवाह के बाद भी उन्होंने एक आदर्श पत्नी के रूप में सदैव मार्क्स को सहारा दिया.जिस प्रकार हमारे यहाँ महाराणा प्रताप को उनकी रानी ने कठोर संघर्षों में अपनी भूखी बच्चीकी परवाह न कर प्रताप को झुकने नहीं दिया ठीक उसी प्रकार मार्क्स को भी उनकी पत्नी ने कभी निराश नहीं होने दिया.सात संतानों में से चार को खोकर और शेष तीनों बच्चियों को भूख से बिलखते पा कर भी दोनों पति-पत्नी कभी विचलित नहीं हुए और आने वाली पीढ़ियों की तपस्या में लीं रहे.देश छोड़ने पर ही मार्क्स की मुसीबतें कम नहीं हो गईं थीं,इंग्लैण्ड में भी उन्हें भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता था.लाईब्रेरी में अध्ययनरत मार्क्स को समय समाप्त हो जाने पर जबरन बाहर निकाला जाता था.
बेजोड़ मित्र 
इंग्लैण्ड के एक कारखानेदार एन्जेल्स ने मार्क्स की उसी प्रकार सहायता की जैसी सुग्रीव ने राम को की थी.एन्जेल्स धन और प्रोत्साहन देकर सदैव मार्क्स के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर खड़े रहे.मार्क्स का दर्शन इन्हीं दोनों के त्याग का प्रतिफल है.विपन्नता और संकटों से झूजते मार्क्स को सदैव एन्जेल्स ने आगे बढ़ते रहने में सहायता की और जिस प्रकार सुग्रीव के सैन्य बल से राम ने साम्राज्यवादी रावण पर विजय प्राप्त की थी.ठीक उसी प्रकार मार्क्स ने एन्जेल्स के सहयोग बल से शोषणकारी -उत्पीडनकारी साम्राज्यवाद पर अपने अमर सिद्धांतों से विजय का मार्ग प्रशस्त किया.गरीब और बेसहारा लोगों के मसीहा के रूप में मार्क्स और एन्जेल्स तब तक याद किये जाते रहेंगें जब तक आकाश में सूरज-चाँद और तारे दैदीप्यमान रहेंगें.
भारतीय संस्कृति और मार्क्सवाद 
हमारे प्राच्य ऋषि-मुनियों नें 'वसुधैव कुटुम्बकम'का नारा दिया था,वे समस्त मानवता में समानता के पक्षधर थे और मनुष्य द्वारा मनुष्य के उत्पीडन और शोषण के विरुद्ध.यही सब कुछ मार्क्स ने अपने देश -काल की परिस्थितियों के अनुरूप नए निराले ढंग से कहा है.कुछ विद्वान मार्क्स के दर्शन को भारतीय वांग्मयके अनुरूप मानते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि,मार्क्सवाद भारतीय संस्कृति में ही सही ढंग से लागू हो सकता है.यूरोप में मार्क्स के दर्शन पर क्रांतियाँ हुईं और मजदूर वर्ग की राजसत्ता स्थापित हुयी और वहां शोषण को समाप्त करके एक संता पर आधारित समाज संरचना हुयी,परन्तु इस प्रक्रिया में यूरोपीय संस्कृति के अनुरूप मार्क्स के अनुयाई शासकों से कुछ ऐसी गलतियां हुईं जो मार्क्स और एन्जेल्स के दर्शन से मेल नहीं खातीं थीं.रूसी राष्ट्रपति मिखाईल गोर्बाचोव ने इस कमी को महसूस किया और सुधारवादी कार्यक्रम लागू कर दिया जिससे समाज मार्क्स-दर्शन का वास्तविक लाभ उठा सके.यूरोप के ही कुछ शासकों ने सामंती तरीके से इसका विरोध किया,परिणामस्वरूप उन्हें जनता के कोप का भाजन बनना पडा.आज विश्व के आधे क्षेत्रफल और एक तिहाई आबादी में मार्क्सवादी शासन सत्ता विद्यमान है जो सतत प्रयास द्वारा जड़ता को समाप्त कर यथार्थ मार्क्सवाद की ओर बढ़ रही है.                                                                                                                                          
स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि,नास्तिक वह नहीं है जिसका ईश्वर पर विशवास नहीं है,बल्कि' नास्तिक वह है जिसका अपने ऊपर विशवास नहीं है' मार्क्सवाद बेसहारा गरीब मेहनतकश वर्ग को अपने ऊपर विशवास करने की प्रेरणा देता है.विवेकानंद ने यह भी कहा था जब तक संसार में झौंपडी में निवास करने वाला हर आदमी सुखी नहीं होता यह संसार कभी सुखी नहीं होगा.मार्क्स ने जिस समाज-व्यवस्था का खाका प्रस्तुत किया उसमें सब व्यक्ति सामान होंगें और प्रत्येक व्यक्ति से उसकी क्षमता व योग्यतानुसार काम लिया जाएगा और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी आवश्यकतानुसार दिया जाएगा जिससे उसका बेहतर जीवन निर्वाह हो सके.श्री कृष्ण ने भी गीता में यही बताया कि,मनुष्य को लोभवश परिग्रह नहीं करना चाहिए,अर्थात किसी मनुष्य को अपनी आवश्यकता से अधिक कुछ नहीं रखना चाहिए.यह आवश्यकता से अधिक रखने की लालसा अर्थात कृष्ण के बताये गए अपरिग्रह मार्ग का अनुसरण न करना ही शोषण है.और इसी शोषण को समाप्त करने का मार्ग मार्क्स ने आधुनिक काल में हमें दिखाया है.
भारत में गलत धारणा 
हमारे देश में साधन सम्पन्न शोषक वर्ग ने धर्म की आड़ में मार्क्सवाद के प्रति विकृत धारणा का पोषण कर रखा है जब कि यह लोग स्वंय ही 'धर्म से अनभिग्य 'हैं.प्रसिद्ध संविधान शास्त्री  और महात्मा गांधी के अनुयाई डा. सम्पूर्णानन्द ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है :-सत्य,अहिंसा,अस्तेय,अपरिग्रहऔर ब्रह्मचर्य के समुच्य का नाम है-धर्म.अब देखिये यह सोचने की बात है कि,धर्म की दुहाई देने वाले इन पर कितना आचरण करते हैं.यदि समाज में शोषण विहीन व्यवस्था ही स्थापित हो जाए जैसा कि ,मार्क्स की परिकल्पना में-

सत्य-पूंजीपति शोषक वर्ग सत्य बोल और उस पर चल कर समृद्धत्तर नहीं हो सकता .

अहिंसा-मनसा-वाचा-कर्मणा अहिंसा का पालन करने वाला शोषण कर ही नहीं सकता.
अस्तेय-अस्तेय का पालन करके पूंजीपति वर्ग अपनी पूंजी नष्ट कर देगा.गरीब का हक चुराकर ही धनवान की पूंजी सृजित होती है.
अपरिग्रह-जिस पर वेदों से लेकर श्रीकृष्ण और स्वामी विवेकानन्द सभी मनीषियों ने ज्यादाजोर दिया यदि समाज में अपना लिया जाए तो कोई किसी का हक छीने ही नहीं और स्वतः समानता स्थापित हो जाए.
ब्रह्मचर्य-जिसकी जितनी उपेक्षा पूंजीपति वर्ग में होती है ,गरीब तबके में यह संभव ही नहीं है.अपहरण,बलात्कार और वेश्यालय पूंजीपति समाज की संतुष्टि का माध्यम हैं.

आखिर फिर क्यों धर्म का आडम्बर दिखा कर पूंजीपति वर्ग जनता को गुमराह करता है?ज़ाहिर है कि,ऐसा गरीब और शोषित वर्ग को दिग्भ्रमित करने के लिए किया जाता है,जिससे धर्म की आड़ में शोषण निर्बाध गति से चलता रहे.

कसूरवार मार्क्सवादी भी हैं
हमारे देश में धर्म का अनर्थ करके जहां पूंजीपति वर्ग शोषण को मजबूत कर लेता है;वहीं साम्राज्यवादी  उसे इसके लिए प्रोत्साहित करते हैं जबकि मार्क्स के अनुयायी  अंधविश्वास में जकड कर और शब्द जाल में फंस कर भारतीय जनता को भारतीय संस्कृति और धर्म से परिचित नहीं कराते.ऐसा करना वे मार्क्सवाद के सिद्धांतों के विपरीत समझते हैं.और यही कारण है अपनी तमाम लगन और निष्ठा के बावजूद भारत में मार्क्सवाद को  विदेशी विचार-धारा समझा जाता है और यही दुष्प्रचार  करके साम्राज्यवादी-साम्प्रदायिक शक्तियां विभिन्न धर्मों के झण्डे उठा कर जनता को उलटे उस्तरे से मूढ़ती  चली जा रहीं हैं.इस परिस्थिति के लिए १९२५ से आज तक का हमारा मार्क्सवादी आन्दोलन स्वंय जिम्मेदार है.
अब समय आ गया है 
जब हम प्रति वर्ष २२अप्रैल से ०५ मई तक मार्क्सवाद-लेनिनवाद के सिद्धांतों को भारतीय संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में 'चेतना पक्ष' के रूप में मनाएं और स्वंय मार्क्स के अनुयाई भी भारतीय वांग्मय के अनुकूल भाषा-शैली अपना कर राष्ट्र को प्राचीन 'वसुधैव कुटुम्बकम'की भावना फैलाने के लिए महर्षि कार्ल मार्क्स की चेतना से अवगत कराएं,अन्यथा फिर वही 'ढ़ाक के तीन पात'.

Thursday, March 3, 2011

वामदेव महादेवं लोकनाथं जगत गुरुम ------ विजय राजबली माथुर

हमारा भारत विश्व गुरु कहलाता था ,जैसा कि पिछली पोस्ट में स्पष्ट किया है कि शिव ही भारत है और भारत ही शिव.अतः शिव-स्तुति में 'वामदेव महादेवं लोकनाथं जगत गुरुम' कहने का आशय भारत -देश से ही है.लोकनाथं अर्थात जन- कल्याणकारी कारी हैं -शिव और यही भारत की संस्कृति रही है- जनोन्मुखी.वामदेव महादेव भी इसी सन्दर्भ में शिव को कहा गया है कि वह अवाम (जनता) का ख्याल रखने वाले हैं.भारत की नीतियां सदा से ही जनता की सार्व-भौमिकता वाली रही हैं.यही कारण रहा है कि विदेशी विद्वान भारत  खिंचे चले आते थे और यहाँ से ज्ञान बटोर कर स्वदेश लौटते थे.वेदों की आध्यात्मिक और रहस्यात्मक व्याख्या करने वाले विदेशी विद्वानों  में प्रो.मैक्समूलर ,प्रो.ग्रिफ्थ ,प्रो.विल्सन,प्रो.ग्रासमान,प्रो.लुड्विश,प्रो.ओल्डेन बर्ग,प्रो.लान्गलवा,डॉ.मैक्डानल,डॉ.कीथ,प्रो.आर.रोठ,प्रो.बाटलिक,प्रो.व्लूम फील्ड ,प्रो.लुई रेन ,प्रो.वाकर नोगल ,प्रो.बेवर ,प्रो.हिव्ट्नी,प्रो.केलंड,प्रो.इंग्लिश,प्रो.स्टेन कोनो,प्रो.हिल ब्रांट,प्रो.जे.गोंड आदि के नाम प्रमुख हैं.(यह विवरण पदमश्री डॉ.कपिल देव दिवेदी के लेख "वेद और विज्ञान" से लिया गया है).

प्रो.मैक्समूलर तो भारत में ३० वर्ष रहे -संस्कृत सीखी और यहाँ से मूल पांडुलिपिया भी लेकर जर्मनी चले गये.उनकी खोजों के आधार पर जर्मन वैज्ञानिकों ने एटम बम ईजाद किया जिन्हें अमेरिका तथा रूस ने जर्मनी की पराजय के बाद अपने-अपने देश में पनाह दी.उन्हीं के विश्लेषण के आधार पर महर्षि कार्ल मार्क्स ने जनोन्मुखी नीतियों का प्रतिपादन किया.मार्क्स देख रहे थे किस प्रकार मजदूरों का शोषण किया जा रहा है उनकी दुर्दशा का निदान कैसे हो ,ये सिद्धांत उन्होंने ब्रिटेन और जर्मनी की स्थितियों के मद्दे नजर बनाये थे.वह जर्मनी से स्व-निष्कासन के बाद इंग्लैण्ड में रह रहे थे.१९१७ की रूसी क्रान्ती लेनिन के नेतृत्त्व में मार्क्स के सिद्धांतों पर आधारित थी.

इधर भारत में १८७५ में महर्षि दयानंद सरस्वती ने सशस्त्र क्रान्ति की विफलता के बाद आर्य समाज की स्थापना स्वराज्य प्राप्ति के लक्ष्य से की थी. १८८५ में ब्रिटिश सरकार ने आर्य -समाज आन्दोलन से भयभीत होकर अवकाश प्राप्त आई.सी.एस.एलेन आक्तावियन ह्युम की मार्फ़त वोमेश चन्द्र बनर्जी की अध्यक्षता में इन्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना इसलिए करवाई थी कि सरकार को जन-असंतोष की दिशा पता चलती रहे और वह बचाव करती रहे.महर्षि दयानंद ने आर्यसमाजियों को कांग्रेस में शामिल होकर स्वतंत्रता की मांग उठाने का निर्देश दिया. धीरे-धीरे कांग्रेस के मंच से आजादी की मांग होने लगी.अब ब्रिटिश सरकार ने १९०६ में मुस्लिम लीग की स्थापना ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन को आगे करके की तथा कांग्रेस में दयानंद विरोधी नेताओं यथा पं.मदन मोहन मालवीय,लाला लाजपत राय आदि के द्वारा हिन्दू महासभा की स्थापना हुयी १९२० में.इसका मिलिटेंट संगठन आर.एस.एस.अस्तित्व में आया १९२५ में.इन दोनों नये राजनीतिक दलों ने देश के स्वतंत्रता आन्दोलन को क्षति पहुंचाई.कांग्रेस के भीतर आजादी के प्रबल पक्षधरों ने रूसी क्रान्ति से प्रभावित होकर २५ दिसंबर १९२५ को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन कानपुर में किया.चूंकि आर.एस.एस.ने आर्य समाज में भी घुसपैठ बना ली थी;अतः कम्युनिस्ट नेताओं ने पूरे तौर पर भारतीय दर्शन को छोड़ कर शुद्ध मार्क्सवाद को अपना लिया.जबकि नियम आर्य समाज से मिलते-जुलते हैं.'कर्तव्य-दर्पण'में आर्यसमाजियों को अपनी आमदनी का एक प्रतिशत अंश आर्य समाज को भेंट करने का प्राविधान रखा था उसे ज्यों का त्यों कम्युनिस्टों पर भी लागू किया गया.कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान में एक प्रतिशत आय का अंशदान करने का प्राविधान रखा गया है.

सरदार भगत सिंह का परिवार आर्य समाजी था,'सत्यार्थ-प्रकाश' पढ़ते हुए उन्हें पूर्ण स्वाधीनता का जो जूनून चढ़ा तो वह क्रांतिकारी बन गये.उन्होंने एच.आर.ए.और भारत नौजवान सभा के माध्यम से क्रांतिकारियों को संगठित किया.भगत सिंह आदि भारत में बाम-आन्दोलन कारी थे.आज भारत का बाम-आन्दोलन यदि भटक रहा है तो उसका कारण ही सिर्फ यह है कि भारतीय बाम - दर्शन का ख्याल नहीं रखा गया है.हमारे बाम-देव-महादेव शिव के कल्याणकारी सिद्धांतों को अपना कर बाम-पन्थ भारत में रक्त-हीन क्रान्ति करने में सफल हो सकता है.बाम-पंथी आन्दोलन की सफलता ;कोटि-कोटि भारतीयों के जीवन को सुन्दर-सुखद -समृद्ध बनाने के लिए परमावश्यक है.
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24 फरवरी 2017