Monday, June 20, 2016

विजय माथुर द्वारा ‘क्रांति स्वर‘ के माध्यम से अनाधिकार चेष्टा ...................................

 ..................................."विजय माथुर जी ने ‘क्रांति स्वर‘ के माध्यम से अपनी विचारधारा को पेश करने की एक अनाधिकार चेष्टर की है। वर्तमान काल में यह देखने में आ रहा है कि जो आदमी धर्म के बुनियादी सिद्धांतों तक से कोरा है और जिसके आचरण में धर्म कम और पश्चिमी कल्चर ज़्यादा है , वह भी नए नए मत खड़े करने की कोशिश कर रहा है। यही वजह है कि विजय माथुर जी सत्य को न पा सके।
दयानंद जी देवी भागवत पुराण सहित सभी पुराणों के विरूद्ध थे। इन्हें वे नदी में डुबोने की प्रेरणा देते थे और मानते थे कि इनमें ईश्वर और ऋषियों की निंदा भरी हुई है। एक ओर तो विजय माथुर दयानंद जी के सिद्धांतों को स्वीकार करते हैं और दूसरी ओर वे पुराणों से प्रमाण देते हैं जिन्हें नदी में डुबाने के बाद ही दयानंद जी को उनके गुरू बिरजानंद जी ने अपने शिष्यत्व में स्वीकार किया था। यह एक खुला विरोधाभास है।
विजय माथुर जी की कोशिश तो यह रही होगी कि रामायण के अनेक प्रसंगों पर उठने वाली आपत्तियों का निराकरण कर दिया जाए और यह प्रयास वाक़ई स्वागतयोग्य है । इसका तरीक़ा यह है कि जो भी प्रसंग श्रीरामचंद्र जी या सीता माता के प्रति लांछन लगाने वाला सिद्ध हो, उसे एक क्षेपक मानकर रामायण का अंश न माना जाए, बस। हरेक आपत्ति का निराकरण हो जाएगा। मैं ऐसे ही करता हूं और इसीलिए मुझे श्रीरामचंद्र जी, उनके पूर्वजों या उनके वंशजों के प्रति कोई भी अश्रृद्धा पैदा नहीं होती।
जो व्यक्ति मेरे मार्ग से हटकर चलेगा, वह पुरानी चली आ रही आपत्तियों का निराकरण तो कर नहीं पाएगा बल्कि नई और खड़ी कर देगा, जैसे कि विजय माथुर जी ने कर डाली हैं और कह दिया है कि
‘साम्राज्यवादी रावण क़े अवसान क़े बाद राम अयोध्‍या क़े शासक क़े रूप में नहीं विश्वपति क़े रूप में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते थे।"
http://www.ghrelunuskhe.tk/2011/04/don-be-confused.html

ये उद्गार हैं एक ब्राह्मण विद्वान के जो खुद को स्वामी दयानन्द का सच्चा अनुयाई बता रहे हैं। लेकिन एक और ब्राह्मण विद्वान तथा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के तत्कालीन निदेशक डॉ सुधाकर अदीब साहब का इस पर कथन है :


एक पत्रकार बंधु कहते हैं :


सबसे पहले यह लेख  Wednesday, June 30, 2010 को 

"रावण वध एक पूर्वनिर्धारित योजना"  शीर्षक से इसी ब्लाग में  दिया था जो दो किश्तों मे 1982 में 'सप्तदिवा', आगरा में प्रकाशित हो चुका था। जिसे इस लिंक पर देखा जा सकता है ---
http://krantiswar.blogspot.in/2010/06/blog-post_30.html

 मैंने कहीं भी इसे अपना मौलिक लेख नहीं बताया है और न ही किसी विचारधारा का वाहक फिर भी पोंगापंथी ब्राह्मण विद्वान नामोल्लेख के साथ व्यक्तिगत प्रहार करते हैं। 
इस लेख की भाषा-शैली, वाक्य - विन्यास मेरे हैं लेकिन विषय -वस्तु संत श्यामजी पाराशर की पुस्तक 'रामायण का ऐतिहासिक महत्व '  तथा डॉक्टर  रघुवीर शरण मित्र के खण्ड काव्य  'भूमिजा'से ली गई है। उनके तर्कों की पुष्टि के लिए वैज्ञानिक प्रमाण मैंने संकलित किए हैं। 
वस्तुतः आर्यसमाज में जो रियूमर स्पीच्युटिंग सोसाइटी के लोग घुसपैठ कर गए हैं उनका कार्य ही पोंगा-पंथ का संरक्षण व झूठ का प्रचार करना है। जैसा कि, अपने ब्लाग के माध्यम से उन ढ़ोंगी ब्राह्मण विद्वान द्वारा किया गया है। ऐसे लोग जनता को जागरूक करने वाले हर प्रयास का विरोध व निंदा करके गफलत फैलाते हैं जिससे शोषकों की लूट को नैतिक व वैध ठहराया जा सके। ऐसे लोगों को मोदीईस्ट /कार्पोरेटी ब्राह्मण कामरेड्स का भी परोक्ष समर्थन रहता है। 

 ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (22-06-2016) को ""वर्तमान परिपेक्ष्य में योग की आवश्यकता" (चर्चा अंक-2381) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'