Monday, June 8, 2026

युवा आक्रोश को भटकाने का नया खेल ------ रश्मि दीक्षित

 




स्क्रिप्टेड गुस्सा और दिशाहीन नेतृत्व: युवा आक्रोश को भटकाने का नया खेल
देश में बदहाली और बेरोजगारी का दौर कोई आज की पैदाइश नहीं है, और न ही नीट (NEET) का पेपर पहली बार लीक हुआ है। यह युवाओं के भविष्य पर बरसों से लगा एक ऐसा घाव है, जिसका दर्द वही समझ सकता है जिसने अपनी रातों की नींद और माता-पिता की खून-पसीने की कमाई को सिस्टम की भेंट चढ़ते देखा है। जब सालों का यह दबा हुआ गुस्सा अचानक फूटता है, तो वह पूरी तरह स्वाभाविक और जायज है। लेकिन आज जब मुख्य विपक्ष सड़क से संसद तक इस मुद्दे पर पूरी ताकत से सरकार से लोहा ले रहा है, ठीक उसी वक्त एक समानांतर 'नए मोर्चे' का उभरना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
बारीकी से देखें तो समझ आता है कि यह नया उबाल युवाओं की उस वास्तविक बदहाली को न्याय दिलाने के लिए नहीं आया, बल्कि न्यायपालिका की एक टिप्पणी में उछाले गए 'कॉकरोच' शब्द की चोट और तात्कालिक आवेश से पैदा हुआ है। युवाओं का भविष्य तो बरसों से दांव पर लगा था, तब इस नए मोर्चे का यह दर्द क्यों नहीं जागा?
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की कड़ियों को जोड़ें तो एक अलग ही खेल नज़र आता है। इस मुहिम के मुख्य चेहरों का अतीत और उनके तार कहीं न कहीं घूम-फिरकर एक खास राजनीतिक सोच और दलीय पृष्ठभूमि से जुड़ते रहे हैं। भले ही खुद को 'स्वतंत्र' और 'गैर-राजनीतिक' कहकर पेश किया जाए, लेकिन जब किसी मोर्चे की वैचारिक रीढ़ ही सीधे तौर पर स्थापित राजनीतिक दलों के पूर्व सिपहसालारों और सोशल मीडिया हैंडलर्स से जुड़ी हो, तो यह बात साफ़ हो जाती है कि इस पूरे गुस्से की दिशा कहीं और तय की जा रही है।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इस पूरे उभार के पीछे युवाओं, छात्रों या देश के भविष्य को लेकर कोई सोची-समझी नीति या विज़न है ही नहीं। यह किसी लंबी वैचारिक लड़ाई या ज़मीनी संघर्ष का नतीजा नहीं है। यह तो महज एक अदालती टिप्पणी के बाद हंसी-मजाक और तात्कालिक आवेश में खड़ी कर दी गई एक वेबसाइट और कुछ सोशल मीडिया पेजों का 'संयोग' है। जो ताकत खुद एक 'इत्तेफाक' या हादसे की तरह पैदा हुई हो, वह भला इतने बड़े और जटिल हालातों से जूझ रहे देश और युवाओं को संभालने का खाका कैसे पेश कर सकती है? जब आंदोलन का मुख्य नेतृत्व खुद सरेआम यह स्वीकार करता दिखे कि उसे समझ नहीं आ रहा कि आगे क्या करना है, तो समझ आता है कि नींव कितनी खोखली है। जहां नेतृत्व ही दिशाहीन हो, वहां योजनाएं बाद में सोची जाती हैं और राजनीति पहले शुरू हो जाती है।
सत्ता और व्यवस्था के चरित्र को समझने के लिए किसी समाजशास्त्रीय शोध की आवश्यकता नहीं होती, बस किसी भी शहर के धरना स्थल पर एक चक्कर लगा आना काफी है। लोकतांत्रिक देशों में विरोध प्रदर्शन का अधिकार एक बुनियादी हक माना गया है, लेकिन हकीकत यह है कि अमूमन एक अदद धरने की अनुमति पाने में आम इंसान की चप्पलें घिस जाती हैं। पुलिस रिपोर्ट और न जाने कितने दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद भी 'कानून-व्यवस्था' का हवाला देकर फाइल बंद कर दी जाती है। लेकिन जब व्यवस्था अचानक इतनी दरियादिल हो जाए कि इन नए नवेले चेहरों को मांगते ही हाथों-हाथ धरने की अनुमति का परवाना थमा दिया जाए, तो माथा ठनकना स्वाभाविक है। जब प्रशासन खुद आगे बढ़कर लाल कालीन बिछाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि यह गुस्सा जनता का नहीं, बल्कि व्यवस्था द्वारा ही प्रायोजित एक स्क्रिप्ट का हिस्सा है।
यहाँ एक अजीब विरोधाभास दिखाई देता है। ये चेहरे मौजूदा सत्ता की नीतियों और कमियों पर उतने मुखर नहीं हैं, जितनी ऊर्जा वे व्यवस्था के खिलाफ लड़ रही मुख्य विपक्षी ताकतों की कमियां ढूंढने में लगा रहे हैं। अगर यह वाकई सत्ता की नीतियों से परेशान आम नागरिकों का कोई संगठन है, तो इनके तीखे सवाल सीधे शासन से होने चाहिए थे। लेकिन ज़मीनी हकीकत को समझने के बजाय, ये चेहरे अपने सोशल मीडिया फॉलोअर्स की संख्या के बूते अकेले ही पूरी जंग जीतने का भ्रम पालकर बैठ गए हैं। इस बिखराव का सीधा नुकसान उस लड़ाई को होगा जो लंबे समय से ज़मीन पर लड़ी जा रही है, और इसका सीधा फायदा अंततः सत्तासीन दल की झोली में जाकर गिरेगा। यह कोई साधारण चूक नहीं, बल्कि एक ऐसी रणनीति है जो बदलाव की हर गंभीर कोशिश को भीतर से कमज़ोर करती है।
इस तमाशे का सबसे दुखद पहलू यह है कि इसमें हमारे देश का भोला युवा वर्ग सबसे आसानी से इस्तेमाल हो जाता है। जिस ऊर्जा, जोश और आक्रोश को बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी अधिकारों के लिए एक ठोस नीतिगत लड़ाई में बदलना चाहिए था, वह भीड़ बनकर किसी शॉर्ट-कट एजेंडे के पीछे दौड़ रही है। युवाओं को लगता है कि वे क्रांति कर रहे हैं, जबकि असल में वे केवल उस बड़े खेल के मोहरे मात्र बन जाते हैं, जिसका रिमोट कंट्रोल किसी और के हाथ में है।
जब तक देश का युवा और आम नागरिक इन अचानक पैदा हुए आंदोलनों और तथाकथित 'सांस्कृतिक या सामाजिक लड़ाइयों' के कृत्रिम शोर में उलझा रहेगा, तब तक पर्दे के पीछे बैठे नीति-नियंताओं का काम बेहद आसान हो जाता है। व्यवस्था की नजर में आम जनता की हैसियत कॉकरोच से ज्यादा कुछ नहीं है। उन्हें लगता है कि इन्हें एक सुरक्षित कोना दे दो, जहाँ ये बैठकर चिल्लाते रहें और खुश रहें कि इन्हें अभिव्यक्ति की आजादी मिली हुई है। जब तक यह शोर एक तय दायरे के अंदर है और सत्ता की जड़ों को नहीं हिलाता, तब तक ऐसी हर अनुमति हाथों-हाथ मिलती रहेगी।
लेकिन युवाओं को अब यह अक्ल लानी होगी कि वे इस व्यवस्था के सुरक्षित कोने में रेंगने वाले मोहरे नहीं हैं। बदलाव रातों-रात किसी वायरल पोस्ट या बिना विज़न के खड़े हुए मंचों से नहीं आता। अगर वाकई देश की तस्वीर बदलनी है, तो युवाओं को 'शोर' और 'ठोस नीति' के बीच का अंतर समझना होगा। उन्हें किसी प्रायोजित स्क्रिप्ट का हिस्सा बनने से इंकार करना होगा। असली क्रांति सोशल मीडिया के फॉलोअर्स की गिनती में नहीं, बल्कि ज़मीनी संघर्ष, स्पष्ट रोडमैप और व्यवस्था को हिला देने वाली वैचारिक एकजुटता में होती है। जब युवा केवल आक्रोश दिखाना छोड़, एक स्पष्ट विज़न के साथ डटना सीख जाएगा, तब व्यवस्था उसे कॉकरोच समझने की भूल कभी नहीं कर पाएगी।




 ~विजय राजबली माथुर ©
 

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