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Monday, March 30, 2026

भारत की राजधानियों का ऐतिहासिक क्रम ------ डॉ. गिरीश कुमार वर्मा

 
भारत की राजधानियों का ऐतिहासिक क्रम
(एकरेखीय विकास यात्रा)
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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा
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भारत  का  इतिहास अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और विविधतापूर्ण   है, जिसमें सत्ता के केंद्र —अर्थात् राजधानियाँ—समय-समय पर बदलती  रही  हैं। इन  परिवर्तनों  के  पीछे राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारण निहित थे। यदि हम इन राजधानियों को एकरेखीय क्रम में देखें, तो भारतीय इतिहास की एक स्पष्ट और सतत धारा हमारे सामने उभरती है।
प्राचीन भारत में पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) एक अत्यंत   महत्त्वपूर्ण   एवं प्रभावशाली राजधानी रही। इसे एक सुदृढ़ राजधानी के रूप में स्थापित करने में महापद्मनंद का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने सोलह महाजनपदों को अपने अधीन कर एक विशाल और सशक्त राज्य की आधारशिला रखी। बाद   में   मौर्य  और  गुप्त   जैसे   महान साम्राज्यों ने यहीं से शासन किया। चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के काल में यह नगर अपनी चरम   उन्नति   पर पहुँचा। गंगा के किनारे स्थित होने   के   कारण   यह   व्यापार, प्रशासन और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बना रहा।
प्राचीन  भारत   में  जहाँ   पाटलिपुत्र जैसे   नगर व्यापक साम्राज्यों की राजधानी रहे, वहीं अनेक क्षेत्रीय   राजधानियाँ   भी अपने-अपने स्तर पर अत्यंत महत्त्वपूर्ण थीं। उदाहरणतः मथुरा शूरसेन जनपद   की   राजधानी   थी   और धार्मिक तथा सांस्कृतिक  दृष्टि  से  अत्यंत   समृद्ध  केंद्र  रहा, जबकि हस्तिनापुर  कुरु  राज्य  की राजधानी के रूप   में  विख्यात था। यद्यपि   ये  नगर  सम्पूर्ण  भारत  की   राजधानियाँ नहीं थे, तथापि इन्होंने प्राचीन भारतीय सभ्यता, राजनीति और संस्कृति के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मध्यकाल  में  दिल्ली सल्तनत के उदय के साथ सत्ता का  केंद्र   दिल्ली बना। हालांकि, मोहम्मद बिन   तुगलक   ने राजधानी को दक्षिण भारत के दौलताबाद (पूर्व नाम देवगिरि) स्थानांतरित करने का प्रयास किया था। इसका उद्देश्य साम्राज्य पर बेहतर  नियंत्रण   स्थापित  करना था, किंतु यह प्रयोग सफल नहीं हो सका और अंततः राजधानी पुनः दिल्ली लौटा दी गई।
मुगल काल में भी राजधानियों में परिवर्तन देखने को मिलता   है।   प्रारंभ में आगरा को राजधानी बनाया   गया,   जहाँ   से अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ   ने   शासन   किया।  इसके   पश्चात्   शाहजहाँ   ने दिल्ली में शाहजहाँनाबाद बसाकर उसे राजधानी   बनाया।   इस काल में इलाहाबाद  (प्रयाग)   भी   पूर्ण   राजधानी  न   होकर   एक महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक और सामरिक केंद्र के रूप में उभरा।
ब्रिटिश   काल   में    प्रारंभ   में कलकत्ता   (अब कोलकाता) को भारत की राजधानी बनाया गया, जो   व्यापार   और   प्रशासन    का प्रमुख   केंद्र    था। किन्तु 1911 में ब्रिटिश सरकार ने राजधानी को पुनः  दिल्ली  स्थानांतरित   कर  दिया, ताकि भारत  के  उत्तरी और मध्य भागों पर प्रशासनिक नियंत्रण और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके।
15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी दिल्ली को ही भारत की राजधानी बनाए रखा गया। आज   नई   दिल्ली भारत का राजनीतिक,  प्रशासनिक  और कूटनीतिक केंद्र है। यदि भारत की राजधानियों   का   एकरेखीय  क्रम निर्धारित किया जाए, तो वह इस प्रकार उभरता है—
पाटलिपुत्र → दिल्ली → दौलताबाद (अल्पकालिक) → दिल्ली →
आगरा → दिल्ली → कलकत्ता → दिल्ली (वर्तमान)
अंततः   कहा   जा‌  सकता   है   कि भारत  की राजधानियों   का ‌ यह   परिवर्तन   केवल   स्थान परिवर्तन   नहीं था, बल्कि  यह समय-समय पर बदलती  राजनीतिक   परिस्थितियों, प्रशासनिक आवश्यकताओं   और   साम्राज्य   विस्तार  की रणनीतियों का दर्पण भी था। यह क्रम भारतीय इतिहास   की   गतिशीलता,   निरंतरता   और विकासशीलता   को  स्पष्ट   रूप  से प्रतिबिंबित करता है।
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 ~विजय राजबली माथुर ©
 

Wednesday, November 25, 2015

इतिहास के झरोखों से नये पदचाप को दिशा देने की तमन्ना ------ विजय राजबली माथुर





यादों के झरोखों से ------


स्पष्ट रूप से पढ़ने के लिए इमेज पर डबल क्लिक करें (आप उसके बाद भी एक बार और क्लिक द्वारा ज़ूम करके पढ़ सकते हैं )




https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/972778176117492

पाँच वर्ष पूर्व मैंने एक पोस्ट में लिखा था :

http://vidrohiswar.blogspot.in/2010/10/blog-post.html
:चार वर्ष पूर्व की एक पोस्ट का अंश : 



http://vijaimathur.blogspot.in/2011/11/blog-post.html
 प्रस्तुत यह कविता दीवान सिंह जी ने मुझे 'सप्तदिवा ' के लिए दी थी किन्तु फिर जब मैं ही अलग हो गया तो न छप सकी थी।इसे अब इस ब्लाग -पोस्ट में प्रकाशित कर रहे हैं। :




'मैं गरिमा हूँ ' 

एक समय था 
जब मैं मैले-कुचैले  सुकरात की मुकुट थी 
बहुजन हिताय व बहुजन सुखाय के निकट थी। 
कंटकाकीर्ण पथ गमनकारी मेरा श्रिंगार करते थे 
त्याग तपस्या की तपन के बावजूद मेरे लिए मचलते थे। 
क्योंकि मैं गरिमा हूँ। 
        ***
लेकिन अफसोस हो रहा है 
समय के साथ मेरा निवास भी बदल रहा है 
आजकल मैं अट्टालिकाओं में बहार करती हूँ। 
सेठ-साहूकारों के पैरों में निवास करती हूँ । 
आज मैं बड़ों की बड़ाई का अस्त्र हूँ। 
क्योंकि मैं गरिमा हूँ। 

--- ( दीवान सिंह बघेल, ग्राम-बास अचलू, टर्र्म्पुर, आगरा )  
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Comments
Narendra Parihar wah sir ji ......yaado ko sametna yane naye ki padchaap ko ansuna karna hi maane ya itihaas ke jharokho se nayi padchaap ko disha dene ki tamannaSee Translation
Vijai RajBali Mathur जैसा आप मानें।

बंधु नरेंद्र जी ने जानना चाहा था कि उपरोक्त 'यादों के झरोखों से' का तात्पर्य क्या लगाया जाये अतः पुरानी ब्लाग-पोस्ट्स के जरिये उसे स्पष्ट करने का प्रयास किया है। 

एक नैतिक प्रश्न सामने था कि ,


इस 'राईटर एंड जर्नलिस्ट ' फोरम से आदरणीय शेष नारायण सिंह जी ने सितंबर 2011 में सम्बद्ध तब किया था जब भड़ास में उन्होने सुब्रमनियम स्वामी वाला लेख प्रकाशित करवाया था। तब -

इन लोगों की व्याख्या से केवल और केवल ब्रहमनवाद तथा संघ के मंसूबे ही पूरे होंगे 

 http://krantiswar.blogspot.in/2015/11/blog-post_13.html

पोस्ट के जरिये उनके सुझाए लेखकों की व्याख्याओं पर संदेह करना क्या उचित था ?
ऊपर जो पुराने पोस्ट्स या अखबार की स्कैन कापी दी गई है वे यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि मैं 1982 से ही राजनीतिक/धार्मिक विषयों पर दृढ़ता व स्पष्टता के साथ विचार रखता आया हूँ और किसी भी प्रकार का समझौता करके मूल चरित्र को नहीं बदला है भले ही 1991 में उस अखबार से अलग ही हो गया था। अब जब बात 'हिन्दू धर्म' पर इन लेखकों की व्याख्या की थी तब फिर स्पष्ट विचार देना ही मुनासिब समझा भले ही सिंह साहब नाराज़ हो लें। लेकिन सही बात तो सबके सामने आनी  ही चाहिए।  

~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।
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Thursday, March 19, 2015

कामरेड जितेंद्र रघुवंशी की नज़र में कार्ल मार्क्स



उपरोक्त में एक तो कामरेड जितेंद्र रघुवंशी जी लिखित उनका लेख है जिससे उनके क्रांतिकारी विचारों का परिचय होता है दूसरा 'ताज महोत्सव' के परिप्रेक्ष्य में व्यक्त उनके नाट्य- कला के प्रति वेदनात्मक अभिव्यक्ति।
भाकपा,आगरा की कार्यकारिणी में मुझे जितेंद्र जी के साथ कार्य करने का अवसर मिला है IPTA के उनके कार्यक्रमों को देखने भी अधिकांशतः जाते ही थे। उनके साथ व्यक्तिगत रूप से भी विचारों का आदान-प्रदान होता रहता था।

 आगरा से मेरे लखनऊ आने के बाद भी वास्तविकता जानने हेतु मुझ पर ही उन्होने भरोसा किया जबकि बड़े-बड़े दिग्गजों से उनके यहाँ पर संपर्क पहले से ही मौजूद थे। पी एच डी होल्डर एक ब्राह्मण कामरेड ने 60-70 sms भेज कर राष्ट्रीय सचिव कामरेड अतुल अंजान साहब के बारे में अनर्गल-भ्रामक अफवाह उड़ा दी थी जो कि उनके आश्रयदाता वरिष्ठ ब्राह्मण कामरेड द्वारा एक इंगलिश मेगज़ीन में छ्पवाई गई थी :
  • January 11, 2014
  • Jitendra Raghuvanshi
    1/11, 10:53pm
    Jitendra Raghuvanshi

    Anjan ji kee kya nayee khabar hai?
  • January 12, 2014
  • Vijai RajBali Mathur
    1/12, 3:41pm
    Vijai RajBali Mathur

    भाई साहब, लाल सलाम , मैं आपके प्रश्न का आशय समझ नहीं पाया था इसलिए आपके मोबाईल व घर पर फोन किया था। आप शायद कार्यक्रम में होंगे। 10-12-2014 का उनका यह बयान जो उन्होने खुद शेयर किया है आपको संलग्न कर रहा हूँ। वैसे आपको कोई नई बात ज्ञात हो तो सूचित करने का कष्ट करें।

उनका फेसबुक पर लिखा  यह संदेश ही उनका अंतिम संदेश बन गया है। उनकी बातों व यादों को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। :
(विजय राजबली माथुर )
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यही लेख 'साम्यवाद (COMMUNIST)' ब्लाग पर भी उपलब्ध है :
http://communistvijai.blogspot.in/2015/03/blog-post_19.html
  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है। 
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Friday, August 24, 2012

जस्टिस काटजू और पत्रकारों का व्यवहार

हिंदुस्तान,लखनऊ,पृष्ठ 11 दिनांक 06 अगस्त 2012
प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस काटजू की चिंता निरर्थक नहीं है। एक समय आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी ने रेलवे की अधिक वेतन की नौकरी छोड़ कर अलाहाबाद मे 'सरस्वती' के संपादक के रूप मे मात्र रु 20/-माहवार की नौकरी पसंद की थी। उनका मानना था कि,पत्रकारिता के माध्यम से वह देश,समाज की सेवा साहित्य -सृजन द्वारा भली प्रकार कर सकेंगे। एक प्रसंग मे उन्होने लिखा है कि,'साहित्य' मे वह शक्ति छिपी रहती है जो तोप,तलवार और बम के गोलों मे भी नहीं पाई जाती'। आचार्य दिवेदी का आंकलन कितना सही था यह 1789 की फ्रांस की राज्य -क्रान्ति के प्रणेता 'जीन जेक रूसो' के लेखों को पढ़ने से ज्ञात होगा। रूसो से सम्राट ने जब पूछा कि 'आपने किस विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है?' तो रूसो का जवाब था ''विपत्ति के विश्वविद्यालय' से।

स्वतन्त्रता आंदोलन के दौरान तमाम पत्रकार अनेकों संघर्ष सह कर भी कर्तव्य पथ से नहीं डिगे थे। आज प्रेस परिषद के अध्यक्ष को ही पत्रकारों की भूमिका उचित नहीं लगी तो इसका कारण यह है कि अब पत्रकारिता मे लोग देश सेवा या समाज कल्याण की भावना से नहीं आए हैं। आज हर क्षेत्र की भांति इस क्षेत्र मे भी अधिकाधिक और शीघ्रता से शीघ्र धन कमाना ही अभीष्ट लेकर लोग आ रहे हैं। मालिक को खुश रख कर ही तरक्की के सुखद अवसर मिल सकते हैं। समाचार पत्र मालिक आजकल कारपोरेट घराने हैं। कारपोरेट कल्चर भ्रष्टाचार की जननी है। कारपोरेट भ्रष्टाचार सरकारी दफ्तरों के भ्रष्टाचार से भी कई गुना अधिक वीभत्स है। कारपोरेट व्यवसाय मे ईमानदारी को कोई स्थान प्राप्त नहीं है। मैं खुद भुक्तभोगी हूँ। 1983-84 मे ITC होटल मुगल की  फिक्स्ड़ एसेट  का इंटरनल आडिट  मैंने फाइनल किया था और पौने छह लाख का घपला पकड़ा था। रिपोर्ट फिजिकल वेरिफिकेशन पर आधारित थी। मुझे रिवार्ड देने की बजाए पहले सस्पेंड फिर टर्मिनेट कर दिया गया। लेबर कोर्ट के प्रेसाइडिंग आफिसर (जो रिटायर्ड़ IAS होते हैं) को मिला कर मेरे विरुद्ध एक्स पार्टी जजमेंट करा दिया गया। यह निजी उदाहरण तो कारपोरेट खेल को समझाने हेतु ही दिया है। (विस्तृत विवरण 'विद्रोही स्व-स्वर मे' उपलब्ध है। ) उस समय खरीददारी मे 8 प्रतिशत कमीशन पर्चेज मेनेजर द्वारा चलता था। जब तक मैं सुपरवाइज़र (फाईनेंस)रहा खुद खाता नहीं था खाने वालों को दिक्कत थी मुझे इंटरनल आडिट के नाम पर हटा दिया गया,वहाँ भी ईमानदारी की रिपोर्ट पेश करते ही कंपनी से बाहर कर दिया गया। यही हाल सभी कारपोरेट कंपनियों का है।

ऐसे ही कारपोरेट घरानों ने मिल कर NGOs (जिंनका नियंत्रण अधिकांशतः IAS आफिसर्स की पत्नियों के पास है) को चंदा-दान देकर और भड़का कर 'भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन' अन्ना के नेतृत्व मे खड़ा करा दिया। वे 'जन लोकपाल' के नाम पर आलोकतांत्रिक सत्ता केंद्र निर्मित करना चाहते थे। देशी-विदेशी कारपोरेट के दबाव मे हमारे पी एम साहब ने भी अन्ना को पर्दे के पीछे से समर्थन दिया एवं व्यापारियों-उद्योगपतियों के हितैषी RSS ने भी। चूंकि अखबारों के मालिक कारपोरेट हैं अतः कर्मचारी पत्रकारों को मालिकों की जी-हुज़ूरी करनी थी और उन्होने खुद को 'अन्ना आंदोलन का हिस्सा' बना लिया।  जैसा कि जस्टिस काटजू इसे गलत बता रहे   हैं उनका दृष्टिकोण सामाजिक और राष्ट्रीय हितों के मद्दे नज़र है लेकिन पत्रकारों का दृष्टिकोण यह अब कहाँ है?तगड़ी -तगड़ी फ़ीसें देकर जो छात्र पत्रकारिता कर के आ रहे हैं वे वेतन व सुविधा देखें या कि देश सेवा? आज समाज मे जब हर चीज़ को 'धन' के आधार पर देखा और तौला जा रहा है ,कोई यह नहीं पूंछ रहा है कि वह धन आ कहाँ से रहा है?'धन' है तो सब रिश्ते-नाते हैं नहीं तो सब फाखे हैं। अब बेचारे पत्रकार क्या करें?क्या वे सब मेरी तरह निशुल्क सेवा मे लग जाएँ ?मेरी ही तरह लोगों की मदद करके बदनाम हों और बुराई का तमगा बटोरें?

Friday, August 3, 2012

'विद्रोही स्व-स्वर मे' का तीसरा वर्ष प्रारम्भ

दो वर्ष पूर्व 03 अगस्त 2010 को इस ब्लाग को शुरू किया गया था ,उद्देश्य था 'लखनऊ से लखनऊ' तक के सफर का विवरण संकलित करना। जितना जो याद है और जितना लिखना आवश्यक है उतना अलग-अलग पोस्ट मे देता जा रहा हूँ। बीच-बीच मे कुछ असाधारण परिस्थितियों ने लेखन-क्रम को सिलसिलेवार रूप से हट कर लिखने पर विवश किया है। कभी-कभी न चाहते हुये भी बाहरी परिस्थितियाँ आंतरिक परिस्थितियों को प्रभावित कर ही देती हैं। लोगों को सहायता देना उनकी मदद करना एक शौक रहा है ,हालांकि इससे खुद को हानि ही हुई है। ब्लाग और फेसबुक से संबन्धित लोगों को निशुल्क ज्योतिषीय परामर्श देना भी इसी श्रेणी मे आता है। पूना मे प्रवास कर रही एक ब्लागर महोदया ने अपने बच्चों की चार कुंडलियों बनवाने के बाद एक दूसरे ब्लाग पर मेरे ज्योतिषीय विश्लेषण की खिल्ली उड़ाई । 19 अप्रैल 2012 को रेखा -राजनीति मे आने की सम्भावना के अंतर्गत 'रेखा जी' की कुंडली का विश्लेषण दिया था और 26अप्रैल 2012 को राष्ट्रपति महोदया ने उनको राज्यसभा मे मनोनीत कर दिया था। 

 रेखा के मनोनयन पर ही वह खिल्ली उड़ाई गई थी। उस खिल्ली की चेतावनी देने के लिए X-Y कुंडलियों का विश्लेषण दिया था। तब तमाम लोगों ने अपना-अपना भविष्य जानने के लिए मुझसे अपने विश्लेषण करवाए थे जिनमे चार कम्युनिस्ट विचारधारा के बड़े लोग भी शामिल थे। उनमे एक ने अपना विश्लेषण हासिल करने के बावजूद विदेश मे प्रवास करते हुये पूना प्रवासी का अनुसरण किया बल्कि और दस कदम आगे निकल गए ।उन महाशय ने रुप से'लाल झण्डा यूनिटी सेंटर' ग्रुप मे  मुझे ब्लाक कर दिया जबकि वह और मैं दोनों ही प्रवर्तक द्वारा एडमिन बनाए गए थे। जिन पोस्ट को आधार बना कर मुझे ब्लाक किया गया उनमे कुछ और जोड़ कर उनकी एक ई-बुक 'जन-क्रान्ति' मुंशी प्रेम चंद जी के जन्मदिन 31 जूलाई पर प्रकाशित की जा चुकी है।

 यह ब्लाग हमारी बड़ी भांजी की बेटी के जन्मदिन पर शुरू किया गया था। पहले हम उन सबके जन्मदिन पर हवन करते थे। अप्रैल  2011 मे बहन जी के हमारे घर आगमन के बाद जो खुलासे हुये उनके मद्दे नज़र अब इस प्रक्रिया को स्थगित कर दिया गया है। कुछ लोगों को हमारा लेखन खूब अखरता है और कुछ लोगों को जीवन। अतः 17 जूलाई 2012 को 'श्रद्धांजली सभा की सैर' शीर्षक से किसके क्या विचार मेरे बारे मे हैं अपने को श्रद्धांजली के रूप मे प्रकाशित कर दिये थे। उसका विवरण भी उन ढ़ोंगी साम्यवादी पोंगा पंडित को पीड़ादायक लगा था। उनके संबंध मे लिखे मेरे नोट्स और लेख फेसबुक के दूसरे ग्रुप्स मे साम्यवादी चिंतकों द्वारा सराहे गए हैं। उस ग्रुप के प्रवर्तक ने भी अप्रत्यक्ष रूप से मेरा समर्थन किया है-'आप अपना लेखन जारी रखें,RSS के कुत्ते दम दबा कर भाग जाएँगे...'। वाशिंगटन स्थित एक भारतीय परमाणु वैज्ञानिक ने मुझे सुझाव दिया है की जिस ग्रुप मे मेरे निष्कर्षों को महत्व और मुझे सम्मान दिया जाये उसी मे मैं सक्रिय रहूँ उनका सुझाव सहर्ष स्वीकार कर लिया है।  27 जूलाई 2012 को 'जनहित' नामक एक  नए ग्रुप का गठन भी कर दिया है।

कल 02 अगस्त को रक्षाबंधन पर्व था। 19 वर्ष पूर्व 1993 मे भी 02 अगस्त को यही पर्व था जिस दिन हमारी बहन जी फरीदाबाद से (मुझसे छोटे भाई अजय के पास से  उनको राखी बांध कर ) हमारे घर कमला नगर,आगरा  आई थीं । स्टेशन हम लोग लेने गए थे ,टिकट उनका गिर गया और उनके पैर के नीचे दब गया ,पर्स ,अटेची सब खोल कर देख लिया नहीं मिला जगह से हिल नहीं रही थीं एक ही रट कि पेनल्टी दे देंगे। समय खराब हो रहा था घर पर बउआ-बाबू जी इंतज़ार कर रहे थे। मैंने ज़बरदस्ती  हटाने के इरादे से कहा कि जब पेनल्टी देना ही है तो चलो तो ,जैसे ही आगे पैर बढ़ाया टिकट सामने दीख गया। शाम को हमने मोपेड़ खरीदने का तय किया हुआ था ले आए। बहन जी को चुभ गया। बउआ द्वारा मँगवाई मिठाई उन्होने नहीं खाई,अगले दिन खाने को कह कर टाल दिया। और अगले दिन यह कह कर तमक गई कि हम मीठा खा कर सफर नहीं कर सकते अतः न खाया। झांसी स्टेशन पर कमलेश बाबू उनको लेने पहुंचे थे परंतु दोनों एक-दूसरे को ढूंढते रहे और डॉ शोभा अकेले घर पहुँचीं। पूरी ट्रेन देख लेने और ट्रेन छूट जाने के बाद कमलेश बाबू घर पहुंचे। हमारी सहूलियत देख कर चिढ़ी थीं खुद तकलीफ उठाई। ऐसे ही दुनिया के और लोग हैं जाने क्यों उनको हमारी खुशी से कोफ्त होती है?                                          


आगरा से लखनऊ आने तक लगभग 15 वर्ष का विवरण लिखना शेष है। इस दौरान इस वर्ष जनवरी मे 'विद्रोही स्व-स्वर मे-प्रथम भाग' को ई बुक के रूप मे संकलित भी किया जा चुका है। उम्मीद है कि शीघ्र सम्पन्न कर सकूँगा।


रिश्तेदार जलन के कारण मुझे सफल नहीं देखना चाहते,सांप्रदायिक तत्व अपने पर चोट के कारण और प्रगतिशील एवं वैज्ञानिक होने का दावा करने वाले इसलिए नहीं कि वस्तुतः उनकी कथनी और करनी मे अन्तर है। मेरा प्रयास 'धर्म' की वास्तविक व्याख्या प्रस्तुत करके सांप्रदायिक शक्तियों के नीचे से ज़मीन खींच लेने का था परंतु वह नक्कारखाने मे तूती की आवाज़ बन कर रह गाया है। जहां एक ओर कारपोरेट लाबी का पसंदीदा  'कबीर'; नामक NGO  का कर्ता जनता की वाहवाही बटोर रहा है वहीं 'कबीर कला मंच' की शीतल साठे भूमिगत रह कर जनता की सेवा मे तत्पर हैं ,सुनिए उनकी आवाज़ मे देश की दशा-


Aye Bhagat singh tu Zinda hai by Hashiya सटी

 शहीदे आजम भगत सिंह 'सत्यार्थ प्रकाश' के अध्यन के बाद क्रांतिकारी बने थे। उन्होने खुद कॉ 'नास्तिक' घोषित किया था क्योंकि उस समय नास्तिक का अभिप्राय जिसका ईश्वर पर विश्वास न हो से लिया जाता था। स्वामी विवेकानंद ने बताया था कि 'आस्तिक=जिसका खुद पर विश्वास हो' और 'नास्तिक=जिसका खुद पर विश्वास न हो'। भगत सिंह जी कॉ खुद पर विश्वास था अतः वह आस्तिक हुये न कि नास्तिक। मैं  अपने ऊपर आस्था और विश्वास रखते हुये अर्थात आस्तिक होते हुये अपने सीमित अवसरों एवं साधनों से जन-कल्याण के कार्यों मे तत्पर रहता हूँ क्योंकि अपने लिए जिये तो क्या जिये?   'बाजारवाद ' के विरुद्ध संजीव कुमार जी की अदाकारी भरा संघर्ष देखें-