Friday, August 24, 2012

जस्टिस काटजू और पत्रकारों का व्यवहार

हिंदुस्तान,लखनऊ,पृष्ठ 11 दिनांक 06 अगस्त 2012
प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस काटजू की चिंता निरर्थक नहीं है। एक समय आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी ने रेलवे की अधिक वेतन की नौकरी छोड़ कर अलाहाबाद मे 'सरस्वती' के संपादक के रूप मे मात्र रु 20/-माहवार की नौकरी पसंद की थी। उनका मानना था कि,पत्रकारिता के माध्यम से वह देश,समाज की सेवा साहित्य -सृजन द्वारा भली प्रकार कर सकेंगे। एक प्रसंग मे उन्होने लिखा है कि,'साहित्य' मे वह शक्ति छिपी रहती है जो तोप,तलवार और बम के गोलों मे भी नहीं पाई जाती'। आचार्य दिवेदी का आंकलन कितना सही था यह 1789 की फ्रांस की राज्य -क्रान्ति के प्रणेता 'जीन जेक रूसो' के लेखों को पढ़ने से ज्ञात होगा। रूसो से सम्राट ने जब पूछा कि 'आपने किस विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की है?' तो रूसो का जवाब था ''विपत्ति के विश्वविद्यालय' से।

स्वतन्त्रता आंदोलन के दौरान तमाम पत्रकार अनेकों संघर्ष सह कर भी कर्तव्य पथ से नहीं डिगे थे। आज प्रेस परिषद के अध्यक्ष को ही पत्रकारों की भूमिका उचित नहीं लगी तो इसका कारण यह है कि अब पत्रकारिता मे लोग देश सेवा या समाज कल्याण की भावना से नहीं आए हैं। आज हर क्षेत्र की भांति इस क्षेत्र मे भी अधिकाधिक और शीघ्रता से शीघ्र धन कमाना ही अभीष्ट लेकर लोग आ रहे हैं। मालिक को खुश रख कर ही तरक्की के सुखद अवसर मिल सकते हैं। समाचार पत्र मालिक आजकल कारपोरेट घराने हैं। कारपोरेट कल्चर भ्रष्टाचार की जननी है। कारपोरेट भ्रष्टाचार सरकारी दफ्तरों के भ्रष्टाचार से भी कई गुना अधिक वीभत्स है। कारपोरेट व्यवसाय मे ईमानदारी को कोई स्थान प्राप्त नहीं है। मैं खुद भुक्तभोगी हूँ। 1983-84 मे ITC होटल मुगल की  फिक्स्ड़ एसेट  का इंटरनल आडिट  मैंने फाइनल किया था और पौने छह लाख का घपला पकड़ा था। रिपोर्ट फिजिकल वेरिफिकेशन पर आधारित थी। मुझे रिवार्ड देने की बजाए पहले सस्पेंड फिर टर्मिनेट कर दिया गया। लेबर कोर्ट के प्रेसाइडिंग आफिसर (जो रिटायर्ड़ IAS होते हैं) को मिला कर मेरे विरुद्ध एक्स पार्टी जजमेंट करा दिया गया। यह निजी उदाहरण तो कारपोरेट खेल को समझाने हेतु ही दिया है। (विस्तृत विवरण 'विद्रोही स्व-स्वर मे' उपलब्ध है। ) उस समय खरीददारी मे 8 प्रतिशत कमीशन पर्चेज मेनेजर द्वारा चलता था। जब तक मैं सुपरवाइज़र (फाईनेंस)रहा खुद खाता नहीं था खाने वालों को दिक्कत थी मुझे इंटरनल आडिट के नाम पर हटा दिया गया,वहाँ भी ईमानदारी की रिपोर्ट पेश करते ही कंपनी से बाहर कर दिया गया। यही हाल सभी कारपोरेट कंपनियों का है।

ऐसे ही कारपोरेट घरानों ने मिल कर NGOs (जिंनका नियंत्रण अधिकांशतः IAS आफिसर्स की पत्नियों के पास है) को चंदा-दान देकर और भड़का कर 'भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन' अन्ना के नेतृत्व मे खड़ा करा दिया। वे 'जन लोकपाल' के नाम पर आलोकतांत्रिक सत्ता केंद्र निर्मित करना चाहते थे। देशी-विदेशी कारपोरेट के दबाव मे हमारे पी एम साहब ने भी अन्ना को पर्दे के पीछे से समर्थन दिया एवं व्यापारियों-उद्योगपतियों के हितैषी RSS ने भी। चूंकि अखबारों के मालिक कारपोरेट हैं अतः कर्मचारी पत्रकारों को मालिकों की जी-हुज़ूरी करनी थी और उन्होने खुद को 'अन्ना आंदोलन का हिस्सा' बना लिया।  जैसा कि जस्टिस काटजू इसे गलत बता रहे   हैं उनका दृष्टिकोण सामाजिक और राष्ट्रीय हितों के मद्दे नज़र है लेकिन पत्रकारों का दृष्टिकोण यह अब कहाँ है?तगड़ी -तगड़ी फ़ीसें देकर जो छात्र पत्रकारिता कर के आ रहे हैं वे वेतन व सुविधा देखें या कि देश सेवा? आज समाज मे जब हर चीज़ को 'धन' के आधार पर देखा और तौला जा रहा है ,कोई यह नहीं पूंछ रहा है कि वह धन आ कहाँ से रहा है?'धन' है तो सब रिश्ते-नाते हैं नहीं तो सब फाखे हैं। अब बेचारे पत्रकार क्या करें?क्या वे सब मेरी तरह निशुल्क सेवा मे लग जाएँ ?मेरी ही तरह लोगों की मदद करके बदनाम हों और बुराई का तमगा बटोरें?

1 comment:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

हर बात पर भारी है धन बटोरने की सोच..... यही सोच मार्ग से भटकाती नज़र आती है