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Saturday, March 25, 2017

पुलिस और गुंडा दलों को सजा देने का अधिकार वही समाज देता है जो ग़ुलामी को स्वीकार करता है! ------ मुकेश त्यागी

 वैसे तो सभी देशों में पुलिस शासक सत्ता की हिफ़ाजत का औज़ार होता है लेकिन भारत में तो पुलिस व्यवस्था आज भी वही है जो 1861 में विदेशी उपनिवेशवादी सत्ता ने अपराध रोकने के लिए नहीं, लूट और दमन के लिए बनाई थी। आज भी इसका काम वही है। इसके बारे में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज आनंद नारायण मुल्ला ने एक फैसले में लिखा था कि पुलिस इस देश में अपराधियों का सबसे संगठित और ताक़तवर गिरोह है। पुलिस तो खुद ही बलात्कारों और स्त्रियों से दुर्व्यवहार करने की सबसे ज्यादा जिम्मेदार है, यहाँ तक कि इस वजह से सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा नियम भी बनाया कि दिन के अतिरिक्त किसी महिला को गिरफ़्तार नहीं किया जायेगा! 
जिस पुलिस ने इन अपराधियों को सारे 'सशक्त' क़ानून रहते बढ़ावा दिया अब वो एंटी-रोमियो स्क्वाड बनाने से इन्हें रोकेगी यह उम्मीद ही या तो भोलापन है या मूर्खता। इतना ही होगा कि पुराने ग़िरोह की जगह नए गिरोह ग़िरोह संरक्षण पाएंगे और संरक्षण के रेट बढ़ जायेंगे। वैसे पुराने गिरोह वाले फिर जल्दी ही सत्ता के क़रीबी नए गिरोहों के सदस्य बन जायेंगे। दूसरे, इस तरह पैदा किया गया डर पुलिस के लिए निर्दोष लोगों से उगाही का बड़ा जरिया बन जाता है। अगर असल में ही पुलिस को इन अपराधों को रोकना होता तो ये बढ़ते ही क्यों? और अन्य राज्यों में क्यों ऐसे ही बढे हैं? 

फिर किसी भी जनतांत्रिक समाज में पुलिस का काम अपराधियों को गिरफ्तार कर फैसले और सजा के लिए अदालत में पेश करना होता है, सड़क पर सजा-गालियाँ देना, मरना-पीटना, हत्या करना नहीं। पुलिस को ऐसा अधिकार सिर्फ तानाशाही या फासीवादी सत्ता देती है, जहाँ जनता ग़ुलामी की ज़िन्दगी जी रही होती है। कुछ लोगों का कहना है कि अदालत में सजा नहीं मिलती। पर क्या जाँच, मुकदमे, गवाही की कमजोरी या हेराफेरी होने के लिए यही लुटेरी-भ्रष्ट पुलिस व्यवस्था जिम्मेदार नहीं है? फिर वही पुलिस कैसे सही सजा देगी? पुलिस और गुंडा दलों को किसी को सजा देने का अधिकार वही समाज देता है जो ग़ुलामी को स्वीकार करता है! 
25 मार्च 2017 
Mukesh Tyagi

Mukesh Tyagi
इस बात में कोई शक नहीं कि उप्र में स्त्रियों के साथ छेड़छाड़ से लेकर बलात्कार जैसे अपराध खूब बढ़े हुए हैं; छत्तीसगढ़, झारखंड, मप्र, हरयाना, कर्नाटक, दिल्ली, बंगाल, बिहार, पंजाब, गुजरात, आदि अन्य राज्यों में भी ऐसा ही है। यह भी सच है कि उप्र में सपा की सरकार और पुलिस का इन अपराधियों को संरक्षण था; ऐसे ही अन्य राज्यों की बीजेपी, कांग्रेस, अकाली, तृणमूल, आदि सरकारों का है। पुलिस ऐसा संरक्षण राजनीतिक दबाव की वजह से देती है, इस से बड़ा कुतर्क क्या हो सकता है! पुलिस का अमला नेताओं, अपराधियों के इस गिरोह का ही अंग है, इस लूट की पूरी हिस्सेदार है। वैसे तो सभी देशों में पुलिस शासक सत्ता की हिफ़ाजत का औज़ार होता है लेकिन भारत में तो पुलिस व्यवस्था आज भी वही है जो 1861 में विदेशी उपनिवेशवादी सत्ता ने अपराध रोकने के लिए नहीं, लूट और दमन के लिए बनाई थी। आज भी इसका काम वही है। इसके बारे में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज आनंद नारायण मुल्ला ने एक फैसले में लिखा था कि पुलिस इस देश में अपराधियों का सबसे संगठित और ताक़तवर गिरोह है। पुलिस तो खुद ही बलात्कारों और स्त्रियों से दुर्व्यवहार करने की सबसे ज्यादा जिम्मेदार है, यहाँ तक कि इस वजह से सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा नियम भी बनाया कि दिन के अतिरिक्त किसी महिला को गिरफ़्तार नहीं किया जायेगा! 
जिस पुलिस ने इन अपराधियों को सारे 'सशक्त' क़ानून रहते बढ़ावा दिया अब वो एंटी-रोमियो स्क्वाड बनाने से इन्हें रोकेगी यह उम्मीद ही या तो भोलापन है या मूर्खता। इतना ही होगा कि पुराने ग़िरोह की जगह नए गिरोह ग़िरोह संरक्षण पाएंगे और संरक्षण के रेट बढ़ जायेंगे। वैसे पुराने गिरोह वाले फिर जल्दी ही सत्ता के क़रीबी नए गिरोहों के सदस्य बन जायेंगे। दूसरे, इस तरह पैदा किया गया डर पुलिस के लिए निर्दोष लोगों से उगाही का बड़ा जरिया बन जाता है। अगर असल में ही पुलिस को इन अपराधों को रोकना होता तो ये बढ़ते ही क्यों? और अन्य राज्यों में क्यों ऐसे ही बढे हैं? 
फिर किसी भी जनतांत्रिक समाज में पुलिस का काम अपराधियों को गिरफ्तार कर फैसले और सजा के लिए अदालत में पेश करना होता है, सड़क पर सजा-गालियाँ देना, मरना-पीटना, हत्या करना नहीं। पुलिस को ऐसा अधिकार सिर्फ तानाशाही या फासीवादी सत्ता देती है, जहाँ जनता ग़ुलामी की ज़िन्दगी जी रही होती है। कुछ लोगों का कहना है कि अदालत में सजा नहीं मिलती। पर क्या जाँच, मुकदमे, गवाही की कमजोरी या हेराफेरी होने के लिए यही लुटेरी-भ्रष्ट पुलिस व्यवस्था जिम्मेदार नहीं है? फिर वही पुलिस कैसे सही सजा देगी? पुलिस और गुंडा दलों को किसी को सजा देने का अधिकार वही समाज देता है जो ग़ुलामी को स्वीकार करता है! 
फिर अपराध क्या है? बलात्कार, अपहरण, छेड़छाड़ या सहमति वाले जोड़े? लेकिन पुलिस का मुख्य निशाना ये अपराधी नहीं, पार्कों-रेस्टोरेंट में बैठे, बाइक पर जा रहे जोड़े हैं जिन्हें पुलिस और उसके संरक्षण में सत्ता धारी दल के गुंडों द्वारा नैतिकता की शिक्षा दी जा रही है। किसी की नैतिकता की परिभाषा कुछ भी हो, स्त्री-पुरुष को दोस्ती-बात करते देख उनको कितना भी धक्का क्यों न लगता हो, जब तक किसी के खिलाफ अपराध नहीं हो रहा, सहमति से दो स्त्री-पुरुष कुछ कर रहे हैं, वह एक सामाजिक मुद्दा हो सकता है, लेकिन उसमें पुलिस या किसी तीसरे को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार कैसे? पर अभी स्थिति यह है कि बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं और पुलिस इन सहमति वाले जोड़ों को सबक सिखाने और वसूली करने में जुटी है।
वैसे भी यह वही सरकार है जिसके मुख्य और उपमुख्य मंत्री हत्या, अपहरण, डकैती आदि के बहुत से मामलों के आरोपी हैं, खुल कर बलात्कार, आदि का समर्थन करते आये हैं, आम गरीब लोग छोड़िये तो विपक्षी पार्टी की नेता, महिला कार्यकर्ताओं, पत्रकारों को गली-गलौज, बलात्कार की धमकियाँ देना जिनकी राजनीति की ज़बान है, जो कब्रें खोदकर लाशों के साथ बलात्कार करने को कहते हैं! यह पार्टी, अन्य पार्टियों की ही तरह, बलात्कार के आरोपी को केंद्र सरकार में मंत्री भी बना चुकी है। 

ऐसे लोग जब स्त्री के सम्मान की बात करते हैं तो अफ़ग़ानिस्तान के उन तालिबानियों और ईरानी मुल्लाओं के जुड़वाँ भाई नजर आते हैं जिन्होंने ठीक यही तर्क देकर वहाँ की स्त्रियों को जीवन के हर क्षेत्र से बाहर कर पूरी तरह परदे में कैद करने का अभियान चलाया था। उस ISIS से यह कैसे भिन्न है जो स्त्रियों को परदे की नैतिकता सिखाते हुए बलात्कारियों की फ़ौज खड़ी करता है? इन सब ने भी इन जुर्मों की शुरुआत इन्हीं बातों से की थी कि स्त्रियों को घर से निकलने, प्रेम करने, अपनी मर्जी से विवाह करने का अधिकार नहीं है; उन्हें घरेलू दासी और बच्चे पैदा करने की मशीन बनने के अलावा और कोई अधिकार नहीं! और दूर न जायें तो पाकिस्तान में पिछले 40 साल का इतिहास ही देख लें कि यह रास्ता किस मंजिल तक ले जाता है। इन गुंडा दलों और इनके नियंत्रण वाली पुलिस को स्त्री सम्मान का रक्षक सिर्फ भक्त, मुर्ख या वास्तविकता भूल भोले बने लोग ही कर सकते हैं। अफ़सोस कि कई जनवादी बातें करने वाले लोग भी ऐसा कर रहे हैं।
https://www.facebook.com/MukeshK.Tyagi/posts/1718175274875613



25 मार्च 2017 

हिंदुस्तान, लखनऊ , 25 मार्च 2017 के अंक में प्रकाशित इन कुछ  समाचारों से भी मुकेश त्यागी जी के लेख की पुष्टि होती है जो लगभग रोजाना ही पढ़ने को मिल रहे हैं। :


  ~विजय राजबली माथुर ©