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Tuesday, March 15, 2011

तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु

श्री रघुनाथ वैदिक भूषण एटा से आकर वेद-प्राचार कार्यक्रम में जो भजन प्रस्तुत कर रहे थे और जैसा लाउड स्पीकर से सुनायी दे रहा था उसमें कुछ वाक्य इस प्रकार थे :-

बन्दे तू मन के गंदे.-धन दौलत जोड़ कर
नौकर चाकर पास तेरे बड़ा है कारोबार 
भरा पूरा बड़ा है  तेरा परिवार
करेगा क्या खाली हाथ जाना है सब छोड़ कर.
बन्दे तू मन के गंदे जिसने तुम्हें जन्म दिया
उसका न तूने कभी  नाम लिया
जाने   किस बात में तू इतना फूल गया
जिससे इतना पाया उस परमेश्वर को तू भूल गया
बन्दे तू मन के गंदे दिन तो कटे धन की धुन में
रात कैसे कटे तू तू जागे टैक्स बचाने  की धुन में
पाप में तेरा दिल है  तो ईश्वर का मिलना मुश्किल में
बन्दे तू मन के गंदे  है  तेरी तो जगह जहन्नुम में.

आखिर क्यों कहा भजनोपदेशक जी ने ऐसा ? तो आइये जाने जिन्दगी में मन का रहस्य -

आत्मा ,मन एवं शरीर का समन्वय ही मनुष्य है.शरीर सृजन का आरम्भ अंतःकरण से होता है जिसमें चेतना(आत्मा) प्रकट होती है.बुद्धी एवं अहंकार के विकास के कारण वासना का उदय होता है जिसके संकल्प से शरीर रचना का कार्य आरम्भ होता है.वासना एवं संकल्प का नाम ही 'मन' है जो भौतिक (जड़) पदार्थों से सामग्री लेकर कारण  शरीर का निर्माण करता है.पहले इसके विकास से 'सूक्ष्म शरीर ' बनता है जो बाद में 'स्थूल शरीर' का रूप लेता है.अर्थात 'कारण' ,'सूक्ष्म 'व 'स्थूल'शरीर केवल मन की वासना के कारण बनते हैं.'क्रिया' एवं 'भोग' स्थूल शरीर से होते हैं जिनका कारण मन ही है.इन्हीं क्रियाओं से संस्कार निर्मित होकर मन में ही संग्रहीत होते हैं जो भावी जीवन का कारण बनते हैं.'मन'का यही चक्र अनंत जीवन तक चलता रहता है.जीवन की समस्त क्रियाओं का कारण मन और माध्यम शरीर है.शरीर 'मन' की इच्छानुसार ही समस्त कर्म करता रहता है.शरीर,मन एवं आत्मा अभिन्न हैं.'दृश्य आत्मा ' ही शरीर है और 'अदृश्य शरीर' ही आत्मा है .मन के ही कारण तीन रूप प्रतीत होते हैं.

भौतिक शरीर-पंचभूतों से निर्मित है और जड़ होने के कारण क्रिया या व्यवस्था नहीं कर सकता है.(पंचभूत =भूमि,गगन,वायु,अग्नि,नीर).

मन-शरीर और आत्मा को जोड़ने वाली कड़ी है जो जड़ पदार्थ और चेतन आत्मा के संयोग से निर्मित है.
आत्मा-ज्ञान एवं क्रिया की शक्ति का एकमात्र कारण है परन्तु स्वंय कोई क्रिया नहीं करता.

मन को पहचानें :-

जड़ पदार्थों से निर्मित होने के कारण भोगों कामनाओं,वासनाओं,इच्छाओं के माध्यम से लोभ,मोह,घृणा,राग,द्वेष ०को उत्पन्न करता है किन्तु सत्संग,स्वाध्याय ,ईश्वर प्रेरणा,गुरु कृपा से आत्मिक स्वरूप जाग्रत हो सकता है.मन की संरचना में 'सत्व,रज एवं तम' की प्राकृतिक शक्तियां विद्यमान हैं. सत्व और तंम तो स्थिर रहते हैं जबकि रज में गति होती है.जब रज की गति सत्व की और हो जाए तो सत्व तत्व की प्रधानता  हो जाती है और शुभ कर्म संपादित होते है तथा जब रज की गति तंम की और हो जाए तो तामसिक गुणों की वृद्धी हो जाती है और बुरे कार्य संपन्न होते हैं.  मन की अभिव्यक्ति चार प्रकार की वाणी से होती है-(१) बेखरी -बोलकर शब्दों द्वारा अभिव्यक्ति देना,(२)मध्यमा -शारीरिक हाव-भावों को अभिव्यक्त करना,(३)पश्यन्ति-प्रेम,करुना,दया,अहिंसा आदि ह्रदय में उत्पन्न सूक्ष्म तरंगों द्वारा जिन्हें दूसरा ह्रदय ग्रहण कर लेता है और (४)परा-यह आत्मा की वाणी है और इसे शून्यावस्था में सुना जा सकता है.

खाना-पीना,उठना-बैठना,चलना-फिरना,कार्य करना,सेवा-व्यवसाय,रूचि कार्य,सामजिक,राजनीतिक,बुरे व अनैतिक कार्य,कला-संस्कृत,साहित्य,विज्ञान का विकास और मोक्ष प्राप्ति की साधना मनुष्य शरीर द्वारा तो करता है परन्तु उनकी उत्पत्ति मन द्वारा ही होती है.मन की स्वीकृति के बिना न सत्संग होता है न स्त्री संग,संतानोत्पत्ति का कारण भी मन है.हत्या-बलात्कार,सेवा-सुश्रूषा मन की ही उपज हैं.सभी विचार सर्व-प्रथम मन में उपजते हैं तभी कोई शारीरिक कर्म होते हैं.समस्त कर्मों का कारण मन है अर्थात मन ही मनुष्य है ,मनन करने के कारण ही यह प्राणी मनुष्य है और यही जिन्दगी का रहस्य है.

न को शुद्ध करने ,बलिष्ठ बनाने,सद्कर्मों में लगाने हेतु वेदों में यह छः मन्त्र बताये गए है जिनका श्री मराल जी द्वारा किया गया  भावानुवाद आप भी सुन सकते हैं-




Wednesday, January 12, 2011

स्वामी विवेकानंद का अपहरण ------ विजय राजबली माथुर



आज १२ जनवरी है स्वामी विवेकानंद का जन्म-दिन और आप चौंक गये होंगे उनके अपहरण की बात से.दरअसल मेरा आशय उनके विचारों क़े अपहरण से है.विवेकानंद जी एक क्रांतिकारी संत थे और उन्होंने अपने देश क़े युवकों का आह्वान  किया था-उठो,जागो और महान बनो.उन्होंने कहा है-नास्तिक वह व्यक्ति है जिसका अपने पर विश्वास नहीं है.विश्व का इतिहास उन गिने चुने व्यक्तियों का इतिहास है जिनको अपने ऊपर विश्वास एवं आस्था थी.इस महान शक्ति क़े बल पर संसार का कोई भी कार्य किया जा सकता है .अपने ऊपर आस्था एवं विश्वास खोने पर किसी भी राष्ट्र का जीवन मृतप्राय हो जाता है.कभी अपने को असहाय असमर्थ मत समझो .तुम्हारी शक्ति असीम है ,संसार में कोई भी कार्य करना तुम्हारे सामर्थ्य में है.
स्वामी विवेकानंद ने युवकों से स्पष्ट कहा था-"धनी कहलाने वाले लोगों का विश्वास मत करो."दुखीजनों से सहानुभूति रख कर प्रभु से सहायता मांगो अवश्य मिलेगी.उनका लक्ष्य युवजनों क़े हृदयों में दरिद्रों,अज्ञानियों  एवं दलितों क़े लिये सहानुभूति एवं संघर्षशील वृति  उत्त्पन्न करना था.लेकिन आज हम देखते हैं कि,"विवेकानंद विचार मंच" बना कर उद्योगपतियों,पूंजीपतियों तथा सरमायेदारों क़े दलालों ने रियुमर स्पिचुयेटेड सोसाईटी की पालिसी क़े तहत स्वामी विवेकानंद क़े मूल विचारों क़े विपरीत मनगढ़ंत बातों को उनके नाम से परोस कर समाज में विषमता ,वैमनस्य और विद्वेष फ़ैलाने का ही काम किया है.महात्मा बुद्ध ने वैदिक हवन पद्धति में आई विकृतियों  का तीव्र विरोध किया था ,अवतारवाद की आलोचना की थी. किन्तु उनके बाद ढोंगियों-पाखंडियों ने उन्हें ही दशावतारों में शामिल करके उनकी ही मूर्तियाँ गढ़ क़े उनके  मूल उपदेशों को ध्वस्त कर दिया .इसी प्रकार स्वामी विवेकानंद जो चाहते थे उस भावना को समाप्त करने हेतु उनके दर्शन को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है.१९७२ में मेरठ विश्वविद्यालय द्वारा कन्वोकेशन क़े अवसर पर प्रदत्त पुस्तक "भारत क़े नवयुवकों से" स्वामी विवेकानंद क़े विचार उद्घृत करके मैं यह बताना चाहता हूँ कि,उनके नाम पर संगठन बना कर उनके मूल विचारों को नष्ट करने का जो अभियान चलाया जा रहा है उससे कम से कम युवकों को तो बचने की आवश्यकता है ही.

स्वामी विवेकानंद युवकों से कहते हैं-"अपनी दुर्बलताओं पर बार-बार मत सोचो,शक्ति का ध्यान करो,शक्ति की साधना करो............समस्त वेदों एवं वेदान्त का सार यही है-अभयम-शक्ति,सामर्थ्य....मेरे युवा मित्रों!शक्तिवान बनो.यही मेरा तुम्हें परामर्श है.फ़ुटबाल क़े खेल द्वारा बलवान हो कर तुम प्रभु क़े निकट शीघ्र आ सकते हो-निर्बल रह कर गीता अध्ययन से तुम्हें ब्रह्म की प्राप्ति नहीं हो सकेगी.यह मैं तुमसे पूरी निष्ठां से कह रहा हूँ क्योंकि मेरा तुम पर स्नेह है.मुझे तुम्हारी तीव्र जिज्ञासा का ज्ञान है.शारीरिक बल ,सामर्थ्य एवं शक्ति क़े द्वारा गीता का ज्ञान सरल,सुलभ एवं सहज हो जाता है."

"समझ लो ,सत्य की साधना ही शक्ति देती है और शक्ति ही संसार क़े सब रोगों-क्लेशों की दवा है.यह एक महान तथ्य है कि,शक्ति ही जीवन है;शक्तिहीनता ही मृत्यु.शक्ति क़े द्वारा ही सुख,समृद्धि एवं जीवन की अमरता प्राप्त होती है.दुर्बलता से अशान्ति,कष्ट,क्लेश जन्म लेते हैं.यह दुर्बलता ही तो मृत्यु है."

"चारों ओर से पुकार है 'मनुष्य चाहिये मनुष्य',फिर सब कुछ प्राप्त हो जायेगा.पर कैसे मनुष्य?ऐसे मनुष्य जो दृढ संकल्प -शक्ति क़े धनी हों-गहरी अटूट आस्था वाले हों-ऐसे मनुष्य केवल एक सौ भी हों तो सारे विश्व में क्रांति की लहर दौड़ जायेगी."उन्होंने वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था क़े सम्बन्ध में कहा है कि,इसके परिणामस्वरूप हमारी संकल्प शक्ति,पीढी दर पीढी हुए तीव्र आक्रमणों क़े कारण ,आज बिलकुल निर्जीव एवं मृतप्राय हो गई है.जिसके कारण नये विचार ही नहीं वरन पुराने विचार भी लुप्त होते जा रहे हैं.कठोर ब्रहमचर्य  की साधना से समस्त ज्ञान को ग्रहण करना थोड़े समय में ही सम्भव हो जायेगा.केवल एक बार का सुना हुआ और ग्रहण किया हुआ ज्ञान सर्वदा स्मृति में बना रहता है.इस ब्रह्मचर्य  क़े व्रत की साधना क़े अभाव में सारा देश नष्ट-भ्रष्ट हो रहा है.

धर्म क्या है?-"हम मानव समाज को उस स्थल पर ले जाना चाहते हैं जहाँ न वेद हों,न बाईबिल,न कुरआन ,परन्तु यह बाईबिल एवं कुरान का परस्पर समन्वय प्रस्थापित करके कर सकते हैं.मनुष्यों को केवल यह बताना होगा कि,नाना प्रकार क़े धर्म केवल एक महान धर्म क़े विभिन्न रूप ही हैं और यह महान धर्म है ,एकात्मकता जिससे कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी वृत्ति और रूचि क़े अनुसार अपना मार्ग चुन सके."यह तो हुई स्वामी विवेक नन्द की बात .अब जरा देखिये कि,उनके विचारों का अपहरण करने वाले उनके नाम क़े संगठन क़े अनुयायी क्या करते हैं.पादरियों पर हमले ,मस्जिदों पर हमले,विध्वंस और दुष्प्रचार.
स्वामी जी का प्रश्न है-शरीर में शक्ति नहीं ,ह्रदय में उत्साह नहीं ,मस्तिष्क में कोई मौलिकता नहीं.फिर ऐसे मट्टी क़े लौंदे मानव क्या कर पायेंगे?संख्या बल प्रभावी नहीं होता,न संपत्ति,न दरिद्रता ;मुट्ठी भर लोग  सारे संसार को उखाड़ फेंक सकते है यदि  वे लोग मनसा -वाचा-कर्मणा संगठित हों -इस निश्चित विश्वास को कभी मत भूलो जितना ही अधिक विरोध होगा,उतना ही अच्छा है.क्या बाधाओं को पार किये बिना सरिता वेग ग्रहण कर सकती है?जितनी नवीन और उत्तम एक वस्तु होगी उतना ही प्रारम्भ में उसे अधिक विरोध सहना होगा.विरोध क़े आधार पर ही तो सफलता की भविष्यवाणी होती है.समाज को ही सत्य की उपासना करनी होगी अथवा यह समाप्त हो जायेगा.वह समाज श्रेष्ठतम है जहाँ उच्चतम सत्य व्यवहार में प्रकट होते हैं.और यदि समाज उच्चतम सत्य को ग्रहण करने को तत्पर नहीं है तो हमें उसे इसके लिये उद्यत करना होगा और यह कार्य जितना जल्दी हो जाये उतना ही अच्छा है.निकृष्टत्तम वस्तु का भी सुधार सम्भव है.जीवन का सम्पूर्ण रहस्य समन्वय है;इसी समन्वय क़े द्वारा जीवन का सम्पूर्ण विकास होता है.दमनकारी वाह्य शक्तियों क़े विरुद्ध स्वंय क़े संघर्ष का परिणाम ही समन्वय है.यह समन्वय जितना प्रभावशाली होगा,जीवन उतना ही दीर्घायु हो जायेगा.

किसी भी व्यक्ति अथवा राष्ट्र की उन्नत्ति क़े लिये तीन बातों की आवश्यकता है:-
१ .अच्छाई की शक्तियों में आस्था.
२ .द्वेष एवं संदेह रहित होना.
३ .उन सब की सहायता करना जो अच्छा बनना एवं अच्छे कर्म करने का प्रयास कर रहे हैं.

स्वामी विवेकानंद का दृढ मत था -जब तक निर्धन की झोंपड़ी में दीपक नहीं जलेगा ,कोई भूँखा  नहीं सोयेगा तब तक देश की स्वाधीनता का कोई अर्थ नहीं होगा.अब आप ही तय करें क्या हम स्वामी विवेकनन्द क़े बताये मार्ग पर चल सकते हैं?या उनके विचारों का यों ही अपहरण होता रहेगा?

सम्पादन समन्वय -यशवन्त माथुर 
 (इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)
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