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Friday, March 3, 2017

पूँजी और मुनाफे के संकेन्द्रण से जीवन में गहन संकट पैदा होगा ------ Mukesh Tyagi

Mukesh Tyagi

"समाज में स्वतन्त्र चिंतन-विचार को भी नियंत्रित करने का अभियान चल रहा है क्योंकि पूँजी और मुनाफे के इस संकेन्द्रण से अधिकाँश लोगों के जीवन में जो गहन संकट पैदा होगा उसके ख़िलाफ़ होने वाले हर प्रतिरोध को पहले ही दबा देने की कोशिश की जा रही है। फासीवादी हमले को इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए। फासीवादी गुंडा दलों के पीछे असल में उद्योग, मीडिया, तकनीक, शिक्षा जगत, आदि को नियंत्रित करने वाले ये वित्तीय पूंजीपति ही हैं।"
बैंक में हम जो बचत (savings) या चालू (current) खाता खोलते हैं उसे माँग (demand) खाता भी कहा जाता है क्योंकि इसमें बैंक हमारा रुपया लेकर वादा करता है कि माँगते ही वह हमें वह रकम अदा करेगा। इन खातों में यही contract होता है। लेकिन अब कहा जा रहा है कि बैंक हमें रकम अपनी शर्तों पर देगा, नहीं तो दंड वसूल करेगा। क़ानूनी तौर इसे वादाखिलाफी माना जाना चाहिए, पर आज की स्थिति यही है कि हम बैंकों की इस खुली डकैती के सामने मजबूर हैं। क्यों?
इसके लिए हमें पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की 2 मुख्य अवस्थाओं को समझना चाहिए। पहली अवस्था में औद्योगिक पूँजी थी अर्थात उद्योग के मालिक अपनी पूँजी लगाकर उद्योग चलाते थे, श्रमिकों की श्रम शक्ति खरीदते थे, उसका अधिशेष (surplus value) हथिया कर मुनाफा बनाते थे। लेकिन इनकी स्थिति बाजार और समाज पर आधिपत्य करने की नहीं थी और इन्हें माँग/सप्लाई के बाज़ार नियमों पर प्रतिस्पर्धा करनी होती थी। उस समय बैंकों की भूमिका मुख्यतः भुगतान व्यवस्था को संचालित करना था। 
फिर उत्पादक शक्तियों के विकास के साथ उद्योगों को अधिक पूँजी की जरुरत हुई। भुगतान व्यवस्था में अपनी स्थिति के चलते बैंक इसमें मध्यस्थ बन गए। उन्होंने पुराने अभिजात वर्ग, व्यापारिक तबके और उभरते मध्य वर्ग के अनुत्पादक धन को इकठ्ठा कर उद्योगों को कर्ज देना शुरू किया, बाद में शेयरों के जरिये पूँजी भी बैंकों के माध्यम से जुटाई जाने लगी। बैंक या उनके विभिन्न रूपी वित्तीय संस्थान (म्यूच्यूअल फण्ड, बीमा कम्पनी, हेज / वेंचर / पेंशन फण्ड, आदि) ही आज उद्योगों के लिए पूँजी के मुख्य स्रोत हैं। ब्याज़ और लाभांश के रूप में यह पूँजी श्रम के अधिशेष में अपना हिस्सा वसूलती है। इस पूँजी को वित्तीय पूँजी कहा जाता है। 
लेकिन जहाँ पहले बहुत से पूँजीपति बाज़ार में मुकाबला करते थे वहाँ अब इस वित्तीय पूँजी के चंद बड़े खिलाडी संस्थान ही उद्योग/व्यापार के हर क्षेत्र को ही नहीं शिक्षा, मीडिया, फिल्म, कला-साहित्य से लेकर राजनीति तक पर अपनी विशाल पूँजी की ताक़त से नियंत्रण कर चुके हैं और बहुत सारे तथाकथित शोध संस्थान, थिंक टैंक और एनजीओ इनके पैसे से चलते हैं। नीति-कानून बनने से लेकर सामाजिक आंदोलनों तक को इनमें वेतनभोगी या फंड प्राप्त 'बुद्धिजीवी' प्रभावित करते हैं। 
यह वित्तीय पूँजी ही आज मुनाफे की अपनी अंतहीन भूख से अर्थव्यवस्था ही नहीं जीवन के उस प्रत्येक पहलू को नियंत्रित करना चाहती है जो अभी उससे बचा हुआ है जैसे छोटे उद्योगों-कारोबारों, खेती-बाड़ी, रेहड़ी-पटरी वालों, कुशल-अर्धकुशल श्रमिकों की सेवाओं की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था। इसी के लिए जीएसटी, डिजिटल, कैशलेस, आधार, आदि के नियंत्रण का पूरा जाल इतने हमलावर ढंग से बिछाया जा रहा है जिससे हर क्षेत्र से श्रम द्वारा पैदा अधिशेष का मुख्य हिस्सा यह वित्तीय पूँजी हथिया सके। 

इसी क्रम में समाज में स्वतन्त्र चिंतन-विचार को भी नियंत्रित करने का अभियान चल रहा है क्योंकि पूँजी और मुनाफे के इस संकेन्द्रण से अधिकाँश लोगों के जीवन में जो गहन संकट पैदा होगा उसके ख़िलाफ़ होने वाले हर प्रतिरोध को पहले ही दबा देने की कोशिश की जा रही है। फासीवादी हमले को इसी सन्दर्भ में देखा जाना चाहिए। फासीवादी गुंडा दलों के पीछे असल में उद्योग, मीडिया, तकनीक, शिक्षा जगत, आदि को नियंत्रित करने वाले ये वित्तीय पूंजीपति ही हैं।

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  ~विजय राजबली माथुर ©
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03-03-2017 
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