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Tuesday, August 15, 2017

श्री कृष्ण और स्वाधीन भारत : ज्योतिषीय समरूपता ------ विजय राजबली माथुर






 जबकि श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद की अष्टमी की अर्द्ध रात्रि मे होने के कारण रात्रिकालीन अष्टमी को मनाना चाहिए परंतु पोंगा-पंथ जैसे कहेगा वे वैसा ही मानेंगे,  वे सदियों से ऐसा ही करते आ रहे है-राम और कृष्ण के जन्म दिन धूम-धाम से मनाते हैं फिर उनके आदर्शों के विपरीत आचरण करते और अपनी दिनचर्या चलाते हैं। लेकिन राम और कृष्ण के नाम पर मार-काट करने को सदैव तैयार रहते है,उन्हें यही धर्म सिखाया गया है। 

वस्तुतः आवश्यकता है राम और कृष्ण के आदर्शों को अपने चरित्र मे उतारने की उन्हें हृदयंगम करने की,परंतु वह कोई नहीं करेगा। और क्यों नहीं करेगा?क्योंकि वे भगवान का अवतार थे हम मनुष्य हैं इसलिए नहीं कर सकते ,यह दलील पेश की जाती है। भगवान की परिभाषा क्या है कोई समझना ही नहीं चाहता है।यथा : 
धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। 
भगवान =भ (भूमि-ज़मीन  )+ग (गगन-आकाश )+व (वायु-हवा )+I(अनल-अग्नि)+न (जल-पानी)
चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इसलिए ये ही खुदा हैं। 

इनका कार्य G(जेनरेट )+O(आपरेट )+D(डेसट्राय) है अतः यही GOD हैं। 


प्रत्येक मनुष्य जीवन मे उत्तरोत्तर सुख की कामना करता है और कोई भी प्राणि स्वतः दुख नहीं उठाना चाहता,परंतु फिर भी संसार मे दुख है और यह सर्वव्यापक है। यदि यह आपको मालूम हो जाये कि आपके जीवन मे कितना दुख है और कब तक है तो आप उसका निराकरण करके सुख की प्राप्ति कर सकते हैं। राम और कृष्ण ने ऐसा ही किया था तो उन्हें दुख -दुख लगा ही नहीं। 
श्री कृष्ण :
प्रतिवर्ष श्री कृष्ण जन्माष्टमी को भारत तथा अन्यत्र भी धूम-धाम से मनाने वाले लोग यदि बुद्धि-विवेक का प्रयोग करते हुये ज्योतिष की दृष्टि से देखें तो श्री कृष्ण के चतुर्थ भाव पर 'मंगल'अपनी दशम दृष्टि डाल रहा है जिस कारण उन्हें जन्मते ही माता देवकी के सुख से वंचित होना पड़ा। बचपन से ही गोकुल मे कठोर श्रम करना पड़ा। लेकिन इसी मंगल के प्रभाव से उन्होने पिता वासुदेव व पिता कुल का नाम रोशन किया कंस,शिशुपाल आदि का संहार कर जनता को त्रास से मुक्ति दिलाकर। 

ज्योतिष के ग्रन्थों मे बताया गया है कि यदि 'मंगल' चतुर्थ भाव को देख रहा हो तो यह शुभ नहीं रहता,भाग्य साथ नहीं देता ,कठोर श्रम करना पड़ता है,बचपन मे ही मातृ सुख से वंचित रहना पड़ता है। 

इस सबके बावजूद जातक अपने पिता और अपने कुल का नाम रोशन करता है तथा समाज को ऊंचा उठाता है। 

 श्री कृष्ण के साथ बिलकुल ऐसा ही तो हुआ। 

ज्योतिष के ही अनुसार यदि चतुर्थ भाव पर 'चंद्र' की दृष्टि हो तो जातक सौम्य ,सरल एवं उन्नत्त विचारों का होता है  उसका घरेलू जीवन सुखद और सानन्द व्यतीत होता है। यदि चंद्रमा के साथ गुरु भी हो तो जातक के गजेटेड अधिकारी बनने के योग रहते हैं। यदि 'मंगल' एवं 'चंद्र' दोनों एक साथ चतुर्थ भाव को देखते हो  तो जातक को जीवन मे किसी भी प्रकार धन का आभाव नहीं रहता है। 

श्री कृष्ण की जन्म कुंडली मे 'चंद्रमा' अपनी चतुर्थ दृष्टि से उनके चतुर्थ भाव को देख रहा है है जिस कारण श्री कृष्ण का स्वभाव सौम्य,सरल व उन्नत्त विचारों वाला रहा। उनका घरेलू जीवन सुखी व सानन्द रहा। पत्नी रुक्मणी उनकी सहायिका रहीं तो पुत्र प्रद्युम्न तो उनकी छाया कृति ही कहे जा सकते हैं। 

'मंगल' और 'चंद्र' दोनों ही ग्रहों का श्री कृष्ण की कुंडली के चतुर्थ भाव को देखने का ही परिणाम था कि श्री कृष्ण सर्व ऐश्वर्य सम्पन्न द्वारिकापुरी की स्थापना कर सके। 

स्वाधीन भारत :

15 अगस्त 2017 को हम अपनी स्वाधीनता की 71 वी वर्षगांठ मना रहे हैं  ।  आजादी के 70 वर्षों बाद भी हमारा देश समृद्ध नहीं हो सका तो इसका कारण है कि हमारे देश की स्वाधीनता की कुंडली के चतुर्थ भाव पर 'मंगल' की तृतीय दृष्टि  जिसने आजादी की शैशवावस्था मे ही आर्थिक व सामाजिक क्षेत्र मे देश को रुग्ण बना दिया। साथ ही चतुर्थ भाव पर 'केतू' की भी दशम दृष्टि पड़ रही है पुनः यह आजादी की शैशवावस्था मे  रुग्णता को ही बढ़ा रही है।पडौसी राष्ट्रों का असहयोग तथा राष्ट्र को बाधाओं का सामना भी चतुर्थ भाव पर इसी केतू की दृष्टि का परिणाम रहा। 

इसी केतू की दृष्टि का प्रभाव है कि आज भी हमारा देश ऋण जाल मे फंसा हुआ है । भारत के मित्र समझे जाने वाले राष्ट्र भी इसका हित सम्पादन नहीं करते हैं। 'केतू' की चतुर्थ भाव पर  दृष्टि का ही परिणाम है कि भारत के मस्तक भाग 'कश्मीर' पर गहरी चोट पड़ी है। और वह आज भी समस्याग्रस्त है। 

ज्योतिष के अनुसार कुंडली के चतुर्थ भाव को  केतू देख रहा हो तो वह बचपन से ही बीमार रहता है। स्वभाव मे झल्लाहट व चिड़चिड़ापन रहता है,बाधाओं का सामना करना पड़ता है। धन की चिंता मे कठोर श्रम करना पड़ता है। 


इस प्रकार हम देखते हैं कि कुंडली का चतुर्थ भाव  जो सुख भाव है न केवल सामान्य मनुष्य वरन योगीराज 'श्री कृष्ण' तथा  ‘स्वाधीन भारत’ राष्ट्र पर भी ग्रहों का भरपूर प्रभाव पड़ा है। देश की प्रगति व विकास हेतु और स्वाधीन भारत की कुंडली के आधार पर ‘मंगल’ व ‘केतू’ ग्रहों के दुष्प्रभाव से बचाव के वैज्ञानिक (पोंगापंथ के अनुसार नहीं) उपाए हमारे शासकों को करने ही पड़ेंगे तभी हम अपने देश को ऋण जाल से मुक्त कराने तथा ‘कश्मीर’ समस्या का समाधान कराने मे सफल हो सकेंगे अन्यथा जो जैसे चल रहा है,चलता ही रहेगा। ग्रहों का प्रभाव अमिट है और उनकी शांति ही एकमात्र उपाय है।

हमारा देश पहले सोने की चिड़िया कहलाता था। तब भी इसका भूगोल वास्तु दोष पर आधारित था। किन्तु हमारे देशवासी वैज्ञानिक वेदिक मतानुसार हवन पद्धति जो पूर्ण रूप से मेटेरियल साईंस पर अवलंबित है का अनुपालन करते थे। आज पौराणिकों (जिन्हें विदेशी शासकों के हितार्थ ढाला गया) के बहकावे मे इस वेदिक पद्धति का परित्याग कर दिया गया है और परिणाम सबके सामने हैं। अन्ना का ढ़ोल-तमाशा उसी कहानी का हिस्सा था  जिससे वर्तमान सरकार सत्तारूढ़ हो सकी है। 


 ~विजय राजबली माथुर ©

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