Thursday, April 11, 2013

वयं स्याम पतयो रयीणाम=हम एश्वर्यों के स्वामी बनें---आचार्य प्रेम भिक्षु वानप्रस्थ

विक्रमी संवत 2070 शुभ व मंगलमय हो---

( 'तपो भूमि',मथुरा के संपादक  सिद्धान्त शास्त्री प्रेम भिक्षु जी ने 'नित्य कर्म विधि' *पुस्तक का भी सम्पादन किया है और उसकी भूमिका मे उन्होने जो कुछ लिखा है उसको ज्यों का त्यों 11 अप्रैल 2013 विक्रमी नव संवत (आर्यसमाज स्थापना दिवस)के अवसर पर यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है । 'धर्म' के संबंध मे भ्रांतियों का निवारण करने व वास्तविक धर्म को समझने मे इससे सहायता मिल सकेगी ऐसी हम उम्मीद करते हैं। ---विजय राजबली माथुर)
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कहने को आज हमारे देश मे हमारा अपना राज्य है। किन्तु वह सुख और शान्ति जिसको लक्ष्य कर भारत माँ के एक दो नहीं सैंकड़ों और हजारों लाल बलि-वेदी पर सदैव  के लिए सो गए,आज उसकी छाया भी कहीं दीखती है?उल्टे चारों ओर दुख,अशांति और निराशा की काली-2 घटाएँ घनीभूत दीख पड़ती हैं। प्रश्न है क्यों?और एक ही उत्तर है,इस प्रश्न का --पश्चिम का अंधानुकरण!अंग्रेज़ चला गया,परंतु अंग्रेज़ियत अर्थात कोरे भौतिकवाद का एक छ्त्र साम्राज्य आज पहले की अपेक्षा भी अधिक उग्र रूप मे बना हुआ है। आम लोगों ने पैसे मे ही सुख मान लिया है। पैसा साधन तो है,पर उसे आज साध्य मान लिया गया है,यही भूल है। आज प्रत्येक सच्चाई का मूल्यांकन रुपए-पैसे मे होता है। चीजों मे मिलावट करना,रिश्वत देना और लेना आदि कुकर्म साधारण बातें हो चली हैं। एक दूसरे के सुख-दुख का किसी को रञ्च मात्र भी ध्यान नहीं है,पारस्परिक प्रेम सहानुभूति एवं सद्भावनाएं सभी कुछ एक-2 करके लुप्त होते जा रहे हैं तथा उनके स्थान पर एक दूसरे के प्रति अविश्वास,राग-द्वेष ,घृणा और प्रतिहिंसा की मात्रा प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। 

कैसी भयावह स्थिति है यह!और इसके मूल मे क्या है?सच्ची और व्यावहारिक आस्तिकता (प्रभु-भक्ति)का सर्वथा अभाव!वह वास्तविकता जो मनुष्य के वैयक्तिक और सामाजिक जीवन को निर्मल करती हुई उनके बीच सामञ्जस्य स्थापित कर सके,वह आसतिकता जो मनुष्य के नैतिक धरातल को ऊंचा उठाने मे सहायक बन कर उसे सही अर्थों मे मनुष्य बना सके तथा वह आस्तिकता जो मनुष्य को समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य पालन मे जागरूक बनाते हुये प्रभु की इस पावन विश्व-वाटिका का एक सुरभित और विकसित पुष्प बना सके,---आसतिकता का यह रूप ही उसका चिरंतन स्वरूप है। आज इसका अभाव है,इसलिए मनुष्य समाज दुखी है और इसलिए संसार का मार्ग-दर्शक भारत स्वम्य पथ -भ्रष्ट हो रहा है। 

यों कहने भर के लिए हमारे देश मे आज भी आस्तिकता संसार के सभी देशों से अधिक है। पर सच्ची और व्यावहारिक आस्तिकता की दृष्टि से हमारा देश अन्य देशों से कहीं बहुत पीछे है और सच तो यह है कि आज हमारे देश मे आसतिकता का जो विकृत रूप विद्यमान है उसे प्रच्छन्न (ढकी हुई)नास्तिकता कहना कहीं अधिक उपयुक्त होगा-हम मुंह से तो राम-2 कहें पर हमारे सारे काम राम के आदर्शों के विरुद्ध हों,हम घर पर नित्य हवन-यज्ञ करते हों किन्तु दुकान या आफिस मे बैठ कर लोगों की आँखों मे धूल झोंकने का प्रयत्न करते हों-यही प्रच्छ्न्न नास्तिकता है। आज हमारे देश मे जो प्रकट (खुले रूप मे )नास्तिकता की बाढ़ आ रही है,आज हमें जो ईश्वर -धर्म,सदाचार और संस्कृति के विरोधी नारे सुनाई पड़ रहे हैं-क्या हमने कभी सोचा है कि यह ढकी हुई नास्तिकता ही इसका मुख्य और एक मात्र कारण है?

वस्तुतः प्रच्छ्न्न (ढकी हुई)नास्तिकता ही प्रकट नास्तिकता को जन्म देती है।  कैसे?इतिहास के पन्ने उलटिए। गौतम को नास्तिक किसने बनाया?क्या आस्तिकता,ईश्वर और वेद की ओट मे गोमेध,अश्वमेध और नरमेध आदि यज्ञों के नाम पर निरपराध गायों,घोड़ों और मनुष्यों तक की अमानुषिक हत्या के वीभत्स दृश्य ने ही दयालु हृदय गौतम को ईश्वर,वेद और यज्ञ का विरोधी नहीं बनाया?क्या तत्कालीन ब्राह्मणों के मिथ्या जात्याभिमान ने ही उसके विरुद्ध झण्डा खड़ा करने वालों को प्रोत्साहित नहीं किया?स्पष्ट है कि उस समय के धर्माधिकारी लोग आस्तिकता के चोंगे मे घोर नास्तिक थे और इन्ही ढके हुये नास्तिकों ने गौतम तथा बुद्ध मत के रूप मे प्रकट नास्तिकता को जन्म दिया जिससे भारत-पतन हुआ। आज 2500 वर्ष के  बाद इतिहास ने फिर अपने को दुहराया है। प्रच्छ्न्न नास्तिकता अपनी सीमा को पहुँच चुकी है। धर्म और आस्तिकता के नाम पर जहां एक मनुष्य दूसरे मनुष्य की छाया अपने शरीर पर पड़ जाना पाप समझता हो,जहां प्रभु की सर्वश्रेष्ठ रचना एक मनुष्य को इसलिए समस्त सामान्य मानवीय अधिकारों से वंचित किया जाता हो,क्योंकि उसके परिवारी चमड़े के जूते बनाते अथवा मैले आदि की सफाई करते अथवा इसी प्रकार का कोई अन्य श्रम-साध्य काम करते हैं,जहां पर बुड्ढे और दुधमुंहे बच्चों तक के विवाह धर्मविहित हों,धर्म के नाम पर जहां एक-2 वर्ष तक की हजारों बच्चियाँ वैधव्य की आग मे जलती हों,धर्म के नाम पर जहां अराष्ट्रीयता और अनैतिकता की मनोवृत्ति के जनक पाखंड और अन्ध-विश्वास का पोषण होता हो,धर्म के नाम पर जहां नारी के सतीत्व के साथ खिलवाड़ होता हो तथा राष्ट्र के ज्योति स्तम्भ राम-कृष्ण आदि महापुरुषों का स्वांग बनाया जाता हो और धर्म जहां स्वार्थपूर्ती का साधन मात्र बन कर रह गया हो,वहाँ ये बातें सुनाई पड़ना कोई आश्चर्य की बात नही कि 'धर्म और ईश्वर ढोंग तथा पाखंड है' या धर्म और ईश्वर ही हमारी सभी मुसीबतों की जड़ है। अतः देश को सुखी और समृद्ध बनाने के लिए हमे धर्म,ईश्वर आदि को जल्दी से जल्दी देश निकाला दे देना चाहिए। ' हमारे देश का नौजवान आज बहुत कुछ इसी ढंग से सोचता है,जो स्व्भाविक ही है। 

प्रश्न है-क्या वास्तव मे धर्म,ईश्वर और आस्तिकता की चर्चा करना देश को रसातल मे ले जाना है?उत्तर है नहीं,कदापि नहीं। सच्ची आस्तिकता तो विश्व मे प्राणी मात्र की सुख -शान्ति का एकमात्र आधार है। प्रभु -प्राप्ति तो मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य है। फिर यह झमेला कैसा?स्पष्ट है कि किसी भी अच्छी चीज का सदुपयोग संसार के लिए जितना कल्यांणकर उन्नति की ओर ले जाने वाला है,उसका दुरुपयोग उतना ही हानिकर तथा पतन के गड्ढे मे गिराने वाला है। तो आज आवश्यकता है आस्तिकता अथवा ईश्वर भक्ति का ठीक-ठीक अर्थ समझने की और उसे सही रूप  से व्यवहार मे लाने की। बस!यही आज की समस्याओं का एकमात्र हल है। 

आस्तिकता(ईश्वर भक्ति)का सच्चा स्वरूप  

आस्तिकता अथवा प्रभु भक्ति को ठीक-2 समझने के लिए हम उसे दो रूपों मे देख सकते हैं।  (अ)ईश्वर-विश्वास (कर्मकांड)प्रधान आस्तिकता। (ब  )आचार-प्रधान आस्तिकता।  उक्त दोनों रूपों मे से जब कभी ईश्वर-विश्वास प्रधान आस्तिकता,आचार प्रधान आस्तिकता को मार कर आगे बढ़ना चाहती है तो कालांतर मे वह अनेकों प्रकार केढोंग,पाखंड,दुराचार और अंधविश्वासों को जन्म देकर राष्ट्र को अवनति के गहरे गर्त मे धकेलने का कारण बन जाती है। ईश्वर-विश्वास प्रधान आस्तिकता के आवश्यक अंगों मे से श्रद्धा-अंधश्रद्धा मे बदल जाती है,भाग्यवाद-आलस्य का रूप ले लेता है,परलोकवाद -कल्पित किस्से कहानियों का और अध्यात्मवाद -जीवन और जगत से दूर जड़वत शून्यता का। समस्त पौराणिक काल हमारे इसी पतन की दुखभरी कहानी है। और तब उसकी प्रतिक्रिया मे आचार प्राधान आस्तिकता का युग आता है। परंतु वह भी प्रतिक्रिया के आवेश मे जब ईश्वर -विश्वास,कर्मफल,पुनर्रजन्म अध्यात्मवाद आदि को मार कर जीवित रहना चाहती है तो कालांतर मे कोरे भौतिकवाद,प्रत्यक्षवाद और शुष्क कर्मवाद की चोटों से मनुष्य की सरस भावनाओं का हनन करके उसे नरपिशाच बना देती है। 

यह सही है कि आचार प्रधान आस्तिकता ही वस्तुतः आस्तिकता का समग्र रूप है परंतु ईश्वर -विश्वास -प्रधान आस्तिकता का महत्व उससे भी कहीं अधिक इसलिए है क्योंकि पहली का आधार ही दूसरे प्रकार की आस्तिकता है। 'बौद्धमत'  ईश्वर-विश्वास प्रधान आस्तिकता के 'अतिवाद' की प्रतिक्रिया मे आचार प्रधान आस्तिकता का महत्व लेकर आया था। प्रतिक्रिया के आवेश मे बुद्ध ने ईश्वर,वेद,पुनर्जन्म आदि को उसमे स्थान नहीं दिया। परिणाम सामने है। बुद्ध के पश्चात बहुत थोड़े समय मे ही बौद्धमत मे ईश्वर के स्थान पर बुद्ध को ही ईश्वर बना देने के लिए विवश होना पड़ा। भारतीय इतिहास मे मूर्ती-पूजा तथा अवतारवाद की अवैदिक प्रथा का प्रारम्भ यहीं से होता है। 

बौद्धयुग की प्रतिक्रिया मे पौराणिक काल आया था और आज का युग पौराणिक काल की प्रतिक्रिया के रूप मे आया है। इस संसार के समस्त मतों का इतिहास आस्तिकता के एक अंग के अतिवाद के विरुद्ध दूसरे अंग की प्रतिक्रिया के अथवा सूक्ष्म और स्थूल के इस संघर्ष से भरा पड़ा है। परंतु किसी भी एक अंग को ही लेकर चलने वाली आस्तिकता एकांगी है,अपूर्ण है,लंगड़ी है,उल्टा परिणाम लाने वाली है। सच्ची आस्तिकता के लिए उक्त दोनों रूपों का समुचित समन्वय परमावश्यक है। यही वैदिक भक्तिवाद है। वैदिक भक्तिवाद मे अध्यात्मवाद एवं भौतिकवाद,प्रत्यक्ष  और परोक्ष ,लोक और परलोक,श्रद्धा तत्व एवं तर्क तत्व,भाग्यवाद एवं पुरुषार्थ तथा  त्याग और भोगवाद का समुचित साम्ञ्जस्य है। सच्ची आस्तिकता न तो आकाश की उड़ान है और न तलातल मे डुबकियाँ लगाने के समान है। वह तो पृथ्वी के ठोस धरातल पर आकाश की छाया मे पलतीहै। 
वैदिक भक्ति या सच्ची आस्तिकता न हो तो हमे यह सिखाएगी कि,'अरे बच्चा क्या है,संसार तो स्वप्न के समान है। झूठा झगड़ा है,दुनिया के सब नाते मिथ्या हैं। एक मात्र ब्रह्म ही सत्यहै इसलिए छोड़ो यह सब झमेला' और न सच्ची आस्तिकता एकमात्र संसार के इन चमकीले और लुभावने पदार्थों मे आसक्त होकर मानव जीवन के उच्चत्तम लक्ष्य को भूल जाने कहेगी वह संसार के माध्यम से संसार-पति को पाने का मार्ग है। उसमे तो एहिक और पारलौकिक उन्नत्ती के समन्वय का रूप धर्म का प्रतिपादन है। 'तेनत्यक्तेन भुञ्जीथा: ' और 'योग कर्मसु कौशलम ' इन सूक्तियों मे 'वैदिक भक्तिवाद' का रहस्य छिपा है। 

कौन कहता है?ऐश्वर्य,धन(अर्थ)हेय है,वह साधना मार्ग मे बाधक है। हम तो प्रतिदिन दो बार साँय प्रातः प्रार्थना करते हैं'वयं स्याम पतयो रयीणाम('हम एश्वर्यों के स्वामी बनें' 'भूखे भजन न होय गुपाला' वाली कहावत बहुत कुछ सारपूर्ण है। उसकी सत्यता को कोरे अध्यात्मवाद के नारों से झुठलाया नहीं जा सकता। परंतु रुको,ठहरो,ज़रा भी बहे कि समाप्त!(तभी तो धर्म-पथ को 'क्षु रस्य धारा' कहा है। )हमे ठीक इसी समय यह भी ध्यान रखना है कि कहीं हम सांसारिक ऐश्वर्यों का समर्थन करते-2 उसी को तो सब कुछ नहीं मान बैठे हैं। 'धन साधन है साध्य नहीं' तथा संसार के ऐश्वर्यों के ढक्कन के पीछे सत्य छिपा है,इस तथ्य को एक क्षण के लिए भी भूलने का अर्थ है वैदिक भक्तिवाद के स्वरूप को भूल कर आध्यात्मिक मृत्यु को प्राप्त हो जाना,जिस स्थिति मे आज हम हैं। इस संबंध मे हमे 'धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष'इस फल चतुष्टय को समझ लेना अधिक उपयोगी होगा। 'अर्थ' अर्थात धनोपार्जन और 'काम' अर्थात उसका उपभोग दोनों ही आवश्यक हैं किन्तु मूल मे 'धर्म' हो और उनका लक्ष्य हो 'मोक्ष'प्राप्ति। यह विशुद्ध वैदिक भक्ति मार्ग है। 

वैदिक भक्ति हमे सिखाती है कि समष्टि रूप मे ब्राह्मण ज्ञान-शक्ति से राष्ट्र के अज्ञान को,क्षत्रिय अपनी क्षात्र -शक्ति से राष्ट्र मे अथवा राष्ट्र पर होने वाले अन्याय को,वैश्य अपनी धनोपार्जन कला से राष्ट्र के अभाव को चुनौती देकर और शूद्र उक्त तीनों को अपना पावन सहयोग देकर कर्तव्य -भाव से अपने-अपने राष्ट्र धर्म का पालन करें और उनमे से प्रत्येक अपने-2 कर्तव्य कर्मों के द्वारा समान रूप से आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति कर सकें। इसी प्रकार व्यष्टि रूप मे एक मानव ब्रह्मचर्य ,गृहस्थ,वानप्रस्थ तथा सन्यास आश्रमों की सफल साधना द्वारा अपने व्यक्तिगत जीवन को समुज्ज्वल बनाते हुये उसे राष्ट्र -जीवन के साथ जोड़ सके तो वह सच्चा आस्तिक होगा। अपने-अपने परिवार ,समाज,राष्ट्र एवं अखिल विश्व के प्राणिमात्र के प्रति अपने-अपने आश्रम और वर्ण की मर्यादानुसार सम्यक रूपेण कर्तव्य -पालन करना ही ईश्वर भक्ति है। 

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ईश्वर के प्रति कर्तव्य-पालन का जहां तक संबंध है उसके रिझाने के लिये किसी पृथक कर्तव्य या अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं। वह खुशामद पसंद नहीं है। ईश्वर के दरबार में ब्लैक और रिश्वत नहीं चलती। वहाँ तो उपर्युक्त आश्रम और मर्यादानुसार यम -नियमों की दिव्य साधना ही काम आती है। अज्ञान और अविद्या के कारण अथवा ईश्वर -विश्वास प्रधान भक्ति के 'अतिवाद' के कारण आज हमारे देश में फल-फरक-भक्ति प्रचलित है। मंदिरों में हम भोग प्रसाद आदि इसलिए रखते हैं अथवा देवी पर बकरा इसलिए काटते और कटवाते अथवा कीर्तन,तीर्थ यातर,व्रतोपवास इसीलिए करते हैं कि ऐसा कराने  से हमें धन की या संतान की प्राप्ति हो या फिर किसी मुकदमे में ही जीत हो जावे। कई विद्यार्थी भी इसलिए भोग प्रसाद आदि रखते देखे गए हैं क्योंकि वे बिना परिश्रम किए ही परीक्षा मे उत्तीर्ण हो जाना चाहते हैं। कैसी विचित्र भक्ति है!गंगा यमुना का स्नान,तीर्थ यात्रा,काशीमरण आदि से मोक्ष प्राप्ति रूप अनेकों,मिथ्या,माहात्स्य इसी फलपरक भक्ति के ही नमूने हैं। इनसे संसार में घोर पाप और आलस्य ही बढ़ा है और बढ़ रहा है। वस्तुतः यह सब खुशामद ईश्वर के निकट कोई महत्व नहीं रखती। वहाँ तो ‘अवश्यमेव भोक्त-व्यं कृतं कर्म शुभाsशुभम’ का सिद्धांत ही चलता है। माफी मुल्तबी का कोई प्रश्न ही नहीं। शुभ और अशुभ कर्मों का फल अवश्य मिलेगा ही। जब ऐसा है तो प्रश्न उठता है कि फिर हम ईश्वर-भक्ति क्यों करें ? ईश्वर-भक्ति से क्या लाभ ?
    वस्तुतः उक्त प्रश्न भक्ति क्या है और उसका ठीक रूप क्या है,यह न समझने के कारण ही उठता है। यदि हम यह समझ सकें कि केवल प्राणिमात्र के प्रति अपने कर्तव्य-कर्मों का सम्यक पालन ही [न कि कोई अन्य विशेष अनुष्ठान] सच्ची प्रभु भक्ति है,तो यह प्रश्न ही नहीं पैदा होता। तब तो हम विचारेंगे कि मानव पूजा ही सच्ची ईश्वर पूजा है। मंदिर के भीतर स्थापित कल्पित ईश्वर की मूर्ति की अपेक्षा मंदिर की बाहर की चौखट से प्रताड़ित मानव मूर्ति [अछूत] की उपासना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। दरिद्र दुख भजन आर्त मानवता की सेवा तथा व्यवहार की शुद्धता और सात्विकता ही सच्चा यजन,भजन और पूजन है। काश! हमारा देश आस्तिकता के इस आचार प्रधान रूप को ठीक-ठीक समझ सकता!

    परंतु इसे ठीक-ठीक समझने पर भी सत्यता से निभा सकने के लिए सजग ईश्वर विश्वास,अनंत आत्म-बल,आत्म-निरीक्षण,दृढ़ पुरुषार्थ,विनम्रता,निर्भयता सब प्राणियों में स्वात्मवत भावना आदि गुण अपेक्षित हैं। उक्त गुणों को प्राप्त  कर सकने ,कुसंस्कारों के मल को धो कर सुसंस्कारों को जागृत करने तथा पापों के कारण रूप अभिमान और अवमान की भावना को मिटाने के लिए यह परम आवश्यक है कि मनुष्य अपना संबंध शक्ति के महान स्त्रोत प्रभु से स्थापित करे। यही भक्ति का ईश्वर विश्वास प्रधान रूप है। भक्ति का यह रूप जिससे साधक में उक्त गुणों का विकास हो कर वह लोक-संग्रह कार्य में प्रवृत्त होता है,भक्ति का चिंतन,शाश्वत,और सार्वभौम स्वरूप है।

    वैदिक भक्तिवाद में पंच महायज्ञों का विधान विशेषतः इसी उद्देश्य से किया गया है। 1-ब्रह्मयज्ञ[संध्या] 2-देवयज्ञ[हवन] 3-पितृयज्ञ[जीवित माता-पिता एवं गुरुजनों की सेवा] 4-अतिथियज्ञ [आप्त विद्वानों,निष्काम देश भक्तों की सेवा] 5-भूतयज्ञ[प्राणिमात्र के प्रति सदभावना] यही पंच महायज्ञ हैं। इनमें से संध्या-आस्तिकता के ईश्वर-विश्वास प्रधान रूप से संबन्धित है तथा शेष महायज्ञ आचार प्रधान रूप से। संध्या से साधक अपने प्यारे प्रभु की गोद में बैठा हुआ आत्म-निरीक्षण करते हुए मानव जीवन के उद्देश्य पर विचार करता है और उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने,समाज तथा प्रभु के प्रति जो उसका कर्तव्य है। उसके पालन करने के लिए वह कृतसंकल्प होता है। संध्या के मंत्रों द्वारा प्रभु की स्तुति,प्रार्थना और उपासना **करते हुए साधक उन मंत्रों में गुंथे हुए दिव्य संदेश को अपने क्रियात्मक जीवन में ढालने के लिए संकल्पशील होता है। प्रातः सायं संध्या में बैठा हुआ साधक मानो सुरक्षित किले में बैठे हुए उस सिपाही के समान है जो निश्चिंत भाव से अपने दिन भर के संघर्ष क्षेत्र का चित्र तैयार करता है,पिछले दिन की भूलों के प्रति सावधानी बर्तने का निश्चय करता है और कर्म क्षेत्र में उतर पड़ता है। सायंकाल पुनः किले में वापिस आकर अपने कर्तव्य कर्मों की समीक्षा करता है।  इस क्रम से साधक नित्यशः अपने लक्ष्य के समीपतर होता जाता है। संध्या के 19 मंत्रों को केवल मात्र दुहरा लेने वाले सज्जन संध्या के इस रहस्य और मंत्रों में सन्निहित अलौकिक आनंद को कहाँ समझ सकते हैं ?

    देवयज्ञ द्वारा जहां साधक व्यक्तिगत हितों को राष्ट्र हित के लिए आहूत कर देने का महान संदेश प्राप्त करता है,वहाँ वह अपने शरीर द्वारा फैलाई हुई दुर्गंध को दूर करने के लिए किसी अंश में वायुमण्डल को सुगंधित कर अपने मनुष्यपन रूप धर्म का पालन भी करता है। इसी प्रकार पितृयज्ञ,अतिथियज्ञ और भूतयज्ञ द्वारा अपने “स्व” का उत्तरोत्तर विकास करता हुआ वह ‘आत्मवत सर्वभूतेषु.’ के आदर्श को अपने जीवन में चरितार्थ करता है अर्थात उसका जीवन ‘यशमय’ हो जाता है। संसार से कम से कम लेकर अधिक से अधिक देने की पवित्र भावना उसके जीवन का एक आवश्यक अंग बन जाती है। ऐसा कर्मशील मनुष्य जीवन-मुक्त हो कर अपने समस्त व्यवहारों को अनासक्त भाव से एवं ‘वसुधैवकुटुम्बकम’ के आदर्श अनुप्राणित होकर करता है। यही ‘गुर’ विश्वशांति का मूल है।

    पंच महायज्ञ ही ईश्वर भक्ति या आस्तिकता का सर्वांगीण स्वरूप हैं। आस्तिकता के दोनों रूपों  का सम्यक समन्वय इनमें मिलता है। अतः पंच महायज्ञों का श्रद्धापूर्वक पालन करना एक आर्य [श्रेष्ठ मनुष्य] का नित्यकर्म है। भगवान मनु ने इसके विषय में कहा है-

    ब्रह्मयज्ञम,देवयज्ञम,पितृयज्ञम च सर्वदा।
    नृयज्ञम अतिथियज्ञम च यथाशक्तिं न हाषयेत॥

    जो मनुष्य (स्त्री-पुरुष) इनके व्यावहारिक रूप को समझ कर इन्हें अपने जीवन (दिनचर्या) में स्थान देते हैं वही सच्चे अर्थों में ईश्वर भक्त हैं। भारत को आज ऐसे ही ईश्वर भक्तों की आवश्यकता है। इसी भावना से प्रेरित हो यह लघु प्रयास ईश्वर भक्तों के चरणों में सादर समर्पित है।        
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*नित्य कर्म विधि
 लेखक-आचार्य प्रेम भिक्षु वानप्रस्थ
प्रकाशक-
सत्य प्रकाशन
वृन्दावन मार्ग,मथुरा,उत्तर प्रदेश
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 ईश्वर स्तुति,स्वस्ति वाचन और शांति प्रकरण के 'भवानी दयाल सन्यासी'जी द्वारा किए भावानुवाद दिये गए लिंक्स पर सुने जा सकते हैं-
ईश्वर स्तुति-प्रार्थना-- http://janhitme-vijai-mathur.blogspot.in/2011/10/blog-post_28.html

स्वसतीवाचनम-- http://janhitme-vijai-mathur.blogspot.in/2011/11/blog-post.html

शांति प्रकरणम-- http://janhitme-vijai-mathur.blogspot.in/2011/11/blog-post_06.html



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Monday, April 8, 2013

भगत सिंह का पत्र सुखदेव के नाम---भगतसिंह (1929)

 असेंबली बम कांड की 85 वी वर्षगांठ पर विशेष---

भगत सिंह का पत्र सुखदेव के नाम


भगत सिंह लाहौर के नेशनल कॉलेज के छात्र थे। एक सुंदर-सी लड़की आते जाते उन्हें देखकर मुस्कुरा देती थी और सिर्फ भगत सिंह की वजह से वह भी क्रांतिकारी दल के करीब आ गयी। जब असेंबली में बम फेंकने की योजना बन रही थी तो भगत सिंह को दल की जरूरत बताकर साथियों ने उन्हें यह जिम्मेदारी सौपने से इंकार कर दिया। भगत सिंह के अंतरंग मित्र सुखदेव ने उन्हें ताना मारा कि तुम मरने से डरते हो और ऐसा उस लड़की की वजह से है। इस आरोप से भगत सिंह का हृदय रो उठा और उन्होंने दोबारा दल की मीटिंग बुलाई और असेंबली में बम फेंकने का जिम्मा जोर देकर अपने नाम करवाया। आठ अप्रैल, 1929 को असेंबली में बम फेंकने से पहले सम्भवतः 5 अप्रैल को दिल्ली के सीताराम बाजार के घर में उन्होंने सुखदेव को यह पत्र लिखा था जिसे शिव वर्मा ने उन तक पहुँचाया। यह 13 अप्रैल को सुखदेव के गिरफ़्तारी के वक्त उनके पास से बरामद किया गया और लाहौर षड्यंत्र केस में सबूत के तौर पर पेश किया गया।



प्रिय भाई,
जैसे ही यह पत्र तुम्हे मिलेगा, मैं जा चुका होगा-दूर एक मंजिल की तरफ। मैं तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि आज बहुत खुश हूं। हमेशा से ज्यादा। मैं यात्रा के लिए तैयार हूं, अनेक-अनेक मधुर स्मृतियों के होते और अपने जीवन की सब खुशियों के होते भी, एक बात जो मेरे मन में चुभ रही थी कि मेरे भाई, मेरे अपने भाई ने मुझे गलत समझा और मुझ पर बहुत ही गंभीर आरोप लगाए- कमजोरी का। आज मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं। पहले से कहीं अधिक। आज मैं महसूस करता हूं कि वह बात कुछ भी नहीं थी, एक गलतफहमी थी। मेरे खुले व्यवहार को मेरा बातूनीपन समझा गया और मेरी आत्मस्वीकृति को मेरी कमजोरी। मैं कमजोर नहीं हूं। अपनों में से किसी से भी कमजोर नहीं।
भाई! मैं साफ दिल से विदा होऊंगा। क्या तुम भी साफ होगे? यह तुम्हारी बड़ी दयालुता होगी, लेकिन ख्याल रखना कि तुम्हें जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। गंभीरता और शांति से तुम्हें काम को आगे बढ़ाना है, जल्दबाजी में मौका पा लेने का प्रयत्न न करना। जनता के प्रति तुम्हारा कुछ कर्तव्य है, उसे निभाते हुए काम को निरंतर सावधानी से करते रहना।
सलाह के तौर पर मैं कहना चाहूँगा की शास्त्री मुझे पहले से ज्यादा अच्छे लग रहे हैं। मैं उन्हें मैदान में लाने की कोशिश करूँगा,बशर्ते की वे स्वेच्छा से, और साफ़ साफ़ बात यह है की निश्चित रूप से, एक अँधेरे भविष्य के प्रति समर्पित होने को तैयार हों। उन्हें दूसरे लोगों के साथ मिलने दो और उनके हाव-भाव का अध्यन्न होने दो। यदि वे ठीक भावना से अपना काम करेंगे तो उपयोगी और बहुत मूल्यवान सिद्ध होंगे। लेकिन जल्दी न करना। तुम स्वयं अच्छे निर्णायक होगे। जैसी सुविधा हो, वैसी व्यवस्था करना। आओ भाई, अब हम बहुत खुश हो लें।
खुशी के वातावरण में मैं कह सकता हूं कि जिस प्रश्न पर हमारी बहस है, उसमें अपना पक्ष लिए बिना नहीं रह सकता। मैं पूरे जोर से कहता हूं कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर हूं और जीवन की आनंदमयी रंगीनियों ओत-प्रोत हूं, पर आवश्यकता के वक्त सब कुछ कुर्बान कर सकता हूं और यही वास्तविक बलिदान है। ये चीजें कभी मनुष्य के रास्ते में रुकावट नहीं बन सकतीं, बशर्ते कि वह मनुष्य हो। निकट भविष्य में ही तुम्हें प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जाएगा।
किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में बातचीत करते हुए एक बात सोचनी चाहिए कि क्या प्यार कभी किसी मनुष्य के लिए सहायक सिद्ध हुआ है? मैं आज इस प्रश्न का उत्तर देता हूँ – हाँ, यह मेजिनी था। तुमने अवश्य ही पढ़ा होगा की अपनी पहली विद्रोही असफलता, मन को कुचल डालने वाली हार, मरे हुए साथियों की याद वह बर्दाश्त नहीं कर सकता था। वह पागल हो जाता या आत्महत्या कर लेता, लेकिन अपनी प्रेमिका के एक ही पत्र से वह, यही नहीं कि किसी एक से मजबूत हो गया, बल्कि सबसे अधिक मजबूत हो गया।
जहां तक प्यार के नैतिक स्तर का संबंध है, मैं यह कह सकता हूं कि यह अपने में कुछ नहीं है, सिवाए एक आवेग के, लेकिन यह पाशविक वृत्ति नहीं, एक मानवीय अत्यंत मधुर भावना है। प्यार अपने आप में कभी भी पाशविक वृत्ति नहीं है। प्यार तो हमेशा मनुष्य के चरित्र को ऊपर उठाता है। सच्चा प्यार कभी भी गढ़ा नहीं जा सकता। वह अपने ही मार्ग से आता है, लेकिन कोई नहीं कह सकता कि कब?
हाँ, मैं यह कह सकता हूँ कि एक युवक और एक युवती आपस में प्यार कर सकते हैं और वे अपने प्यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं, अपनी पवित्रता बनाये रख सकते हैं। मैं यहाँ एक बात साफ़ कर देना चाहता हूँ की जब मैंने कहा था की प्यार इंसानी कमजोरी है, तो यह एक साधारण आदमी के लिए नहीं कहा था, जिस स्तर पर कि आम आदमी होते हैं। वह एक अत्यंत आदर्श स्थिति है, जहाँ मनुष्य प्यार-घृणा आदि के आवेगों पर काबू पा लेगा, जब मनुष्य अपने कार्यों का आधार आत्मा के निर्देश को बना लेगा, लेकिन आधुनिक समय में यह कोई बुराई नहीं है, बल्कि मनुष्य के लिए अच्छा और लाभदायक है। मैंने एक आदमी के एक आदमी से प्यार की निंदा की है, पर वह भी एक आदर्श स्तर पर। इसके होते हुए भी मनुष्य में प्यार की गहरी भावना होनी चाहिए, जिसे की वह एक ही आदमी में सिमित न कर दे बल्कि विश्वमय रखे।
मैं सोचता हूँ,मैंने अपनी स्थिति अब स्पष्ट कर दी है.एक बात मैं तुम्हे बताना चाहता हूँ की क्रांतिकारी विचारों के होते हुए हम नैतिकता के सम्बन्ध में आर्यसमाजी ढंग की कट्टर धारणा नहीं अपना सकते। हम बढ़-चढ़ कर बात कर सकते हैं और इसे आसानी से छिपा सकते हैं, पर असल जिंदगी में हम झट थर-थर कांपना शुरू कर देते हैं।
मैं तुम्हे कहूँगा की यह छोड़ दो। क्या मैं अपने मन में बिना किसी गलत अंदाज के गहरी नम्रता के साथ निवेदन कर सकता हूँ की तुममे जो अति आदर्शवाद है, उसे जरा कम कर दो। और उनकी तरह से तीखे न रहो, जो पीछे रहेंगे और मेरे जैसी बिमारी का शिकार होंगे। उनकी भर्त्सना कर उनके दुखों-तकलीफों को न बढ़ाना। उन्हें तुम्हारी सहानभूति की आवशयकता है।
क्या मैं यह आशा कर सकता हूं कि किसी खास व्यक्ति से द्वेष रखे बिना तुम उनके साथ हमदर्दी करोगे, जिन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत है? लेकिन तुम तब तक इन बातों को नहीं समझ सकते जब तक तुम स्वयं उस चीज का शिकार न बनो। मैं यह सब क्यों लिख रहा हूं? मैं बिल्कुल स्पष्ट होना चाहता था। मैंने अपना दिल साफ कर दिया है।
तुम्हारी हर सफलता और प्रसन्न जीवन की कामना सहित,

तुम्हारा भाई
भगत सिंह

Date Written: 5th April, 1929
Author: Bhagat Singh
Title: Letter to Sukhdev (Bhagat Singh ka patra Sukhdev ke nam)
Source: This letter deals with the views of Bhagat Singh on the question of love and sacrifice in the life of a revolutionary. It was written on April 5, 1929 in Sita Ram Bazaar House, Delhi. The letter was taken to Lahore by Shri Shiv Verma and handed over to Sukhdev it was recovered from him at the time of his arrest on April 13 and was produced as one of the exhibits in Lahore Conspiracy Case.


 प्रस्तुत दुर्लभ चित्र पंकज चतुर्वेदी जी की फेसबुक वाल से उपलब्ध हुये हैं। 

क्रांतिकारी  बटुकेश्‍वर दत्‍त्‍ जी  की तबियत बहुत खराब थी उन्‍हें पंजाब सरकार की मदद से दिल्‍ली में अस्‍पताल में भर्ती करवाया गया थाा कामरेड भगत सिंह की मां बटुकेश्‍वरजी को अपना बेटा मानती थींा बूढी विद्रयावतीजी अपने 'बेटे' से मिलने दिल्‍ली आ गईंा अस्‍पताल में बटुकदा के पास भगत सिंह की माताजी


 असेंबली बम मामले में नई दिल्‍ली पुलिस थाने में भगत सिंह व बटुकेश्‍वर दत्‍त के खिलाफ उर्दू में दर्ज प्रथम सूचना रपट यानी एफआईआर की दुर्लभ प्रति यह मुकदमा 8 अप्रेल 1929 को एक्‍सप्‍लोसिव सब्‍सटेंस एक्‍ट की धारा तीन व चार के तहत दर्ज हुआ था। 




 (दोनों चित्र साभार पंकज चतुर्वेदी जी)

शहीदों के सपनों का भारत-http://krantiswar.blogspot.in/2013/04/blog-post_7.html

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Sunday, April 7, 2013

शहीदों के सपनों का भारत ---सुधीर विद्यार्थी जी का विश्लेषण



दैनिक जागरण,आगरा के 26 जनवरी,1994 के गण तंत्र दिवस विशेषांक मे प्रकाशित इस लेख को उद्धृत करने का उद्देश्य इस बात की याद दिलाना है कि भगत सिंह जी और उनके क्रांतिकारी साथी भारत मे एक शोषण विहीन समाजवादी समाज की स्थापना करना चाहते थे जो अब तक न हो सका है। इन शहीदों को सच्ची श्रद्धांजली उनके सपनों का भारत निर्माण ही हो सकती है। अतः प्रवचनों एवं सत्संगों से काम नहीं चलेगा हमे मनसा-वाचा-कर्मणा संगठित होकर उनके आचरण व आदर्शों को क्रियान्वित करना चाहिए तभी उनके स्मरण की सार्थकता है अन्यथा तो केवल पाखंड-ढोंग व आडंबर ही है। ---विजय राजबली माथुर


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Friday, April 5, 2013

स्क्रीन पर लाल सलाम---विजय राजबली माथुर


आज फेसबुक पर आदरणीय डॉ मोहन श्रोतरीय साहब की यह टिप्पणी पढ़ी---
 http://www.facebook.com/mohan.shrotriya.1/posts/180761168743029

***यह बहु-दलीय प्रणाली को नष्ट करने की साज़िश तो नहीं है?***...............

सवाल यह है कि दूसरी पार्टियां इस खतरे को भांप क्यों नहीं पा रही हैं.?

-मोश्रो
मुझे प्रतीत होता है कि सभी पार्टियां और राजनीतिज्ञ सब कुछ समझ रहे हैं किन्तु जान बूझ कर सब कुछ होने दे रहे हैं। दूसरों की बात कहना अच्छा नहीं रहेगा इसलिए अपनी व्यक्तिगत बात से स्पष्ट करना चाहूँगा। परसों 3 अप्रैल को यशवन्त के पास अपनी पुस्तक टाईप कराने आए एक पूर्व विधायक महोदय ने उससे अपने विचारों पर राय देने को कहा था जिस पर उसने उनसे कहा कि आप जो बोल रहे हैं उसे वैसा ही टाईप करना मेरा ध्येय है किन्तु उस पर गौर करना मेरा लक्ष्य नहीं है। इस बात पर उन साहब का कहना था कि तुम ध्यान से नहीं कर रहे हो और तुमको मेरी बातों पर ध्यान देना चाहिए। रौब दिखाने के लिए उन्होने अपने क्षेत्रीय और सजातीय थानेदार से फोन पर बात करने के बीच मे अचानक फोन उसको देकर कहा इनसे बात कर लो। थानेदार साहब ने उससे कहा कि यह बहुत अच्छे हैं और इंनका काम ध्यान से करना। 

उनके जाने के बाद यशवन्त ने अपने कम्यूटर के स्क्रीन पर 'हंसिया और हथौड़ा' का निशान लोगो के रूप मे लगा दिया और पावर सेवर के रूप मे 'लाल सलाम' लिख दिया। अगले दिन अर्थात कल जब वह विधायक पुनः आए तो इतने परिवर्तन से उनको अपनी बात का जवाब मिल गया प्रतीत हुआ। इत्तिफ़ाकन उत्तर प्रदेश फारवर्ड ब्लाक के प्रदेश अध्यक्ष कामरेड राम किशोर जी भी अपने कार्य से आ गए उनको पहले उन पूर्व विधायक महोदय ने बरगलाना चाहा किन्तु उनके उत्तर से निरुत्तर हो गए। आज वह महोदय बिलकुल शांत रहे और एक कस्टमर की भांति ही अपने काम से मतलब रखा। 

यह दृष्टांत इसलिए दे रहा हूँ क्योंकि उन पूर्व विधायक महोदय को उनके ज़िले से ताल्लुक रखने वाले हमारी भाकपा के एक प्रादेशिक नेता जो जन्मना ब्राह्मण है ने हमे परेशान व भयभीत करने के उद्देश्य से हमारे पीछे लगाया है। (http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/04/blog-post.html ---ब्लागर की श्वसुराल से संबन्धित दो ब्राह्मण राजनेताओं को भी हमारे परिवार को नुकसान पहुंचाने हेतु नियुक्त किया गया है।)

उक्त  पू विधायक महोदय अपनी पुस्तक मे 'एकांत मानव वाद' का बार-बार उल्लेख कर रहे हैं और पहले मुझसे राय मांगते रहे हैं। मैं अपनी निश्चित राय अपने ब्लाग पर देता रहता हूँ जो संकीर्ण और पोंगापंथी कामरेड्स तथा शोषणवादी पुरोहितों को एक साथ पीड़ादायक लगती है। इसी कारण भाकपा के वरिष्ठ पदाधिकारी ने अपने सजातीय संघी को बतौर कस्टमर बना कर हमारे यहाँ भेजा है। अतः मैं किसी कस्टमर को अपनी राय अलग से नहीं दे सकता यही उनको कहा था जिसके बाद उन्होने यशवन्त को घेरना चाहा था। 

इस क्षुद्र कृत एवं विगत  कटु अनुभव  के आधार पर मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूँ कि साम्यवादी दल स्वतः सत्ता मे आना ही नहीं चाहते हैं अतः डॉ श्रोतरीय साहब द्वारा उठाई गई पीड़ादायक बात का असर कहीं नहीं होने वाला है। 

जनता साम्यवादियों की ओर आशा भरी निगाहें रखती है किन्तु सम्पूर्ण बामपंथी वर्ग संकुचित दायरे से बाहर आना ही नहीं चाहता जिस कारण उसे जनता का सहयोग और 'मत'नहीं मिल पाता। पूंजीपति आज जातीय आधार पर खुद 'ट्रेड यूनियन्स' गठित करवाने लगे http://vidrohiswar.blogspot.in/2012/11/blog-post.htmlहैं;जमींदार/बिल्डर्स किसानों के संगठन अपने हित मे बनवाने लगे हैं। बामपंथियों के  आधार भूत जन-संगठन हुआ करते थे अब वे इसलिए शक्तिशाली नहीं हैं क्योंकि उनके प्रतिद्वंदी बन कर पूंजीपति समर्थक जन संगठन लोकप्रिय हैं। 
'लकीर के फकीर' के रूप मे साम्यवाद/बामपंथ 'धर्म' को नकारता है और पोंगापंथ-ढोंग-पाखंड को धर्म के रूप मे निरूपित करके स्वतः ही पूँजीपतियों/साम्राज्यवादियों को शक्ति प्रदान करता है। 'धर्म'='सत्य,अहिंसा(मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य'होता है जिसे 'अफीम' कह कर ठुकरा दिया जाता है नतीजतन साधारण जनता 'पूंजी' की 'पूजा' पद्धति को अपना कर लुटती -पिटती रहती है । क्यों नहीं हम सामाजिक सुधार तक अपना दायरा बढ़ा कर जनता को अपने साथ लाते?दोषी कौन?
बामपंथ 'भगवान'या गाड को नहीं मानते और नहीं समझना चाहते इस वैज्ञानिक तथ्य को कि-
'भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर -जल)' इन प्राकृतिक   पाँच तत्वों का समुच्य ही भगवान है और चूंकि ये तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी ने बनाया नहीं है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं। इन तत्वों का कार्य है-
G(जेनरेट)+O(आपरेट)+D(डेसट्राय) अतः ये ही गाड हैं। 
जब खुद समझेंगे तभी तो जनता को समझाएँगे?खुद को समझना ही नहीं है ;दक़ियानूसी ज़िद्द छोड़ नहीं सकते तो जनता को साम्राज्यवादियों/पूँजीपतियों के हितैषी पुरोहितवादियों के चंगुल से कौन छुड़ाएगा?दोषी कौन?


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Monday, April 1, 2013

श्रद्धांजली कैंसर ग्रसित एक कामरेड को ---विजय राजबली माथुर


का. शालिनी
('जनचेतना' पुस्‍तक प्रतिष्‍ठान की सोसायटी की अध्‍यक्ष, 'अनुराग ट्रस्‍ट' के न्‍यासी मण्‍डल की सदस्‍य, 'राहुल फ़ाउण्‍डेशन' की कार्यकारिणी सदस्‍य और परिकल्‍पना प्रकाशन की निदेशक का. शालिनी का 29 मार्च की रात निधन हो गया। शालिनी पिछले तीन महीनों से कैंसर से लड़ रही थीं। 27 मार्च की शाम उन्‍हें दिल्‍ली के धर्मशिला अस्‍पताल में भरती किया गया था जहां पिछले जनवरी से उनका इलाज चल रहा था। 28 मार्च की सुबह ब्‍लडप्रेशर बहुत कम हो जाने के कारण उन्‍हें आईसीयू में ले जाया गया था जहां 29 मार्च की रात लगभग 11.15 बजे उन्‍होंने अंतिम सांस ली।)



 कल जब उपरोक्त समाचार पढ़ा तो नितांत दुख व अफसोस हुआ कि एक जुझारू एवं योग्य-कर्मठ कामरेड असमय ही काल के कराल गाल मे समा गया। जिस कामरेड ने पीड़ित जनता के दुख-दर्द को दूर करने के लिए अपने जनक पिता तक से संघर्ष किया और उनसे इसी मुद्दे पर संपर्क-संबंध समाप्त किया उसका जीवन बहुत मूल्यवान था और भौतिक रूप से हर संभव प्रयास उन कामरेड के साथियों द्वारा उसे बचाने के लिए किया भी गया किन्तु सफलता न मिल सकी। 
यहाँ पर एक प्रश्न मन को उद्वेलित करता है कि तमाम गुणों से सम्पन्न होने के बावजूद हमारे विद्वान कामरेड्स जीवन के इस यथार्थ को क्यों अनदेखा करते हैं कि मात्र आर्थिक सुधार ही पर्याप्त नहीं हैं जब तक कि सामाजिक रूप से जनता को जाग्रत नहीं किया जाएगा इन आर्थिक सुधारों/व्यवस्था परिवर्तन से भी जन-कल्याण न हो सकेगा जैसा कि रूस मे इसे उलट दिया गया। संकीर्ण-पोंगापंथी ज़िद्द को हमारे कामरेड्स को छोड़ देना चाहिए और 'धर्म' के वास्तविक अर्थ को समझ कर साधारण जनता को समझाना चाहिए। हम लोगों के ऐसा न करने से ही शोषणकारी -लुटेरी शक्तियाँ जनता को 'भ्रम' मे उलझा कर उसे धर्म बता देती हैं और हमारे कामरेड्स भी उससे दूर रहने का उपदेश देकर एक प्रकार से 'भ्रम' को ही 'धर्म' की मान्यता दे देते हैं। 

'धर्म'=धारण करने वाला। जो शरीर व समाज को धारण  करने हेतु आवश्यक है वही धर्म है बाकी सब कुछ अधर्म है उसे धर्म की संज्ञा देना ही अज्ञान को बढ़ावा देना है। धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। कृपया ढोंग-पाखंड-आडंबर को धर्म की संज्ञा न दें।
 वास्तविकता यही है कि ,मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध बनाने के लिए जो प्रक्रियाएं हैं वे सभी 'धर्म' हैं। लेकिन जिन प्रक्रियाओं से मानव जीवन को आघात पहुंचता है वे सभी 'अधर्म' हैं। देश,काल,परिस्थिति का विभेद किए बगैर सभी मानवों का कल्याण करने की भावना 'धर्म' है।

ऋग्वेद के इस मंत्र को देखें-
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे संतु निरामया :
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद दु : ख भाग भवेत। ।
इस मंत्र मे क्या कहा गया है उसे इसके भावार्थ से समझ सकते हैं- --

सबका भला करो भगवान ,सब पर दया करो भगवान।
सब पर कृपा करो भगवान,सब का सब विधि हो कल्याण। ।
हे ईश सब सुखी हों ,कोई न हो दुखारी।
सब हों निरोग भगवान,धन धान्य के भण्डारी। ।
सब भद्र भाव देखें,सन्मार्ग के पथिक हों।
दुखिया न कोई होवे,सृष्टि मे प्राण धारी । ।
ऋग्वेद का यह संदेश न केवल संसार के सभी मानवों अपितु सभी जीव धारियों के कल्याण की बात करता है।

 भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)।
 क्या इन तत्वों की भूमिका को मानव जीवन मे नकारा जा सकता है?और ये ही पाँच तत्व सृष्टि,पालन और संहार करते हैं जिस कारण इन्ही को GOD कहते हैं  ...
GOD=G(generator)+O(operator)+D(destroyer)। खुदा=और चूंकि ये तत्व' खुद ' ही बने हैं इन्हे किसी प्राणी ने बनाया नहीं है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं। 'भगवान=GOD=खुदा' - मानव ही नहीं जीव -मात्र के कल्याण के तत्व हैं न कि किसी जाति या वर्ग-विशेष के।  

आज सर्वत्र पोंगा-पंथी,ढ़ोंगी और संकीर्णतावादी  तत्व (विज्ञान और प्रगतिशीलता के नाम पर) 'धर्म' और 'भगवान' की आलोचना करके तथा पुरोहितवादी 'धर्म' और 'भगवान' की गलत व्याख्या करके मानव द्वारा मानव के शोषण को मजबूत कर रहे हैं।
'मनुष्य' मात्र के लिए सृष्टि के प्रारम्भ मे 'धर्म,अर्थ,काम एवं मोक्ष' हेतु कार्य करने का निर्देश विद्वानों द्वारा दिया गया था। किन्तु आज 'धर्म' का तो कोई पालन करना ही नहीं चाहता और ढोंग -पाखंड-आडंबर को 'पूंजी' ने 'पूजा' अपने शोषण-उत्पीड़न को मजबूत करने हेतु बना दिया है तथा उत्पीड़ित गरीब-मजदूर/किसान इन पूँजीपतियों के दलालों द्वारा दिये गए खुराफाती वचनों को प्रवचन मान कर भटकता व अपना शोषण खुशी-खुशी कराता रहता है। 

'काम'=समस्त मानवीय कामनाए होता है किन्तु आज काम को वासना-सेक्स के अर्थ मे प्रयुक्त किया जा रहा है यह भी पूँजीपतियों/व्यापारियों की ही तिकड़म का नतीजा है जो निरंतर 'संस्कृति' का क्षरण कर रहा है। समाज मे व्याप्त सर्वत्र त्राही इसी निर्लज्ज  पूंजीवादी सड़ांध के कारण है। 

'मोक्ष' की बात तो अब कोई करता ही नहीं है। कभी विज्ञान के नाम पर तो कभी नास्तिकता के नाम पर जन्म-जन्मांतर को नकार दिया जाता है। या फिर अंधकार मे  अबोध जनता को भटका दिया जाता है और वह मोक्ष प्राप्ति की कामना के नाम पर कभी गया मे 'पिंड दान' के नाम पर लूटी जाती है तो कभी अतीत मे 'काशी करवट'मे अपनी ज़िंदगी कुर्बान करती रही है। यह सारा का सारा अधर्म किया गया है धर्म का नाम लेकर और इसे अंजाम दिया है व्यापारियों और पुरोहितों ने मिल कर। सत्ता ने भी इन लुटेरों का ही साथ पहले भी दिया था और आज भी दे रही है। 

'अर्थ' का स्थान 'धर्म' के बाद था किन्तु आज तो-"इस अर्थ पर 'अर्थ' के बिना जीवन का क्या अर्थ "सूत्र सर्वत्र चल रहा है । इसी कारण मार-काट,शोषण-उत्पीड़न,युद्ध-संहार चलता रहता है। हर किसी को धनवान बनने की होड लगी है कोई भी गुणवान बनना नहीं चाहता। सद्गुणों की बात करने पर उपहास उड़ाया जाता है और भेड़चाल का हिस्सा न बनने पर प्रताड़ित किया जाता है। अर्थतन्त्र केवल धनिकों/पूँजीपतियों के संरक्षण की बात करता है उसमे साधारण 'मानव' को कोई स्थान नहीं दिया गया है। 'मानवता'की स्थापना हेतु 'कर्मवाद' पर चलना होगा तभी विश्व का कल्याण हो सकता है।   
आज से दस लाख वर्ष पूर्व जब मानव इस रूप मे आया जैसा कि आज है तब मानव जीवन को प्रकृति के अनुरूप सुचारू रूप से संचालित करने हेतु कुछ नियमों को निरूपित किया गया जिंनका संकलन 'वेद' हैं। 'अथर्व वेद' मानव के स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान को उद्घाटित करता है। 13 अप्रैल,2008 को हिंदुस्तान,आगरा के अंक मे प्रकाशित एक लेख मे किशोर चंद चौबे जी ने इसी अथर्व वेद से विकसित 'मार्कन्डेय चिकित्सा पद्धति' का विवेचन किया है। उसमे उन्होने सिद्ध किया है-
रक्तबीज-कैंसर ---
 "मार्कन्डेय चिकित्सा पद्धति मे 'रक्तबीज' कैंसर का कारक है जिसके दो रूप हैं 'चंड'और 'मुंड'।चंड रक्त कैंसर का रूप है तथा मुंड शरीर मे बनने वाले गांठों वाले कैंसर का। मुंड का तात्पर्य भी गांठ से है जो रक्त की श्वेत कणिकाओं के जमाव से बनती है। कैंसर प्रोटीन कोशिकाओं का तेजी से विभाजन है जिसके कारक रक्तबीज नामक विषाणु हैं। स्पृका,मूर्वा,बंध्याकर्कोटी,असारक,शतवार,माचिका,कमल और गिलोय जिन्हे देवी,अंबिका,नारायणी,पद्यमिनी कहते हैं।"
कालक-AIDS---
"मार्कन्डेय चिकित्सा पद्धति मे एड्स कालक (माइक)रोग है। एड्स जो जीवन लीला को क्षीण कर निसंदेह मौत दे देता है वह कालक है। इसके कारण शरीर मे स्थित रोग रक्षक प्रोटीन कण अपनी रोग रक्षण शक्ति खो बैठते है और रोगी मौत का ग्रास बन जाता है। 
जिनको एड्स हो चुका है या जिनको इसकी शंका है उन्हे दुर्गा कवच मे वर्णित सभी दवाओं का प्रयोग क्रमशः अवश्य करना चाहिए। इन दवाओं के साथ शहद मे मिला कर आंवले का रस पीना चाहिए।"
चैत्र प्रतिपदा से विक्रमी संवत का प्रारम्भ होता है (जो इस वर्ष 11 अप्रैल 2013 है)जिसके प्रारम्भ के नौ दिनों को 'नवरात्र'कहते हैं और इनमे विभिन्न औषद्धियों का सेवन करने का प्रविधान था जिसको 'भ्रमित' लोगों ने अपने लूट तंत्र को मजबूत करने हेतु अधार्मिक तरीके से विकृत कर दिया और जनता को नाच तमाशे मे उलझा दिया जिससे जनता का नितांत अहित होता है। परंतु दुर्भाग्य यह है कि साम्यवादी कामरेड्स जनता को जाग्रत करने के स्थान पर 'भ्रम=अधर्म'को 'धर्म'कह कर 'धर्म' से दूर रहने को कहते अर्थात अप्रत्यक्ष रूप से पोंगा-पंथ को ही 'धर्म' की मान्यता दे देते हैं और खुद भी भटकते हैं तथा जन-कल्याण भी न हो पाता है। कितने ही मूल्यवान कामरेड्स अपने जीवन को जीवन का यथार्थ न समझ पाने के ही कारण असमय गंवा देते हैं। 
प्रस्तुत चार्ट मे दी गई औषद्धियों का सेवन करने से रोगों का बचाव हो सकता है किन्तु पोंगापंथी तो भटकाते ही हैं हमारे अपने साथी भी यथार्थ सत्य को उद्घाटित होने से रोक कर अपने सिद्धांतों पर ही कुठाराघात कर लेते हैं जो कि दुखद स्थिति है। 


कैंसर (cancer) और ज्योतिष---
हिन्दी मे इसे अर्बुद कहते हैं।इस रोग का संबंध शनि व मंगल ग्रहों से है। शनि का संबंध प्रथम भाव व अष्टम भाव से हो और साथ ही मंगल ग्रह से  शनि का संबंध हो तो कैंसर रोग होता है। लग्न भाव स्वास्थ्य  का परिचायक है तथा अष्टम भाव मृत्यु का। कैंसर होने पर अधिकांश व्यक्तियों की मृत्यु हो जाती है। शनि व मंगल दोनों कैंसर रोग के सूचक हैं। अतः प्रथम भाव व अष्टम भाव से शनि का संबंध होने पर व मंगल से शनि का संबंध होने पर कैंसर रोग होता है।
हम मनुष्य=मननशील प्राणी हैं अतः हमारे मनीषियों ने 'ज्योतिष' मे इसका समाधान 'शनि' व 'मंगल'ग्रहों की शांति द्वारा बताया है। 'ॐ अं अंगरकाय नमः' का दस हज़ार जाप एवं 'ॐ शम शनेश्चराय नमः' का तेईस हज़ार जाप पश्चिम दिशा की ओर मुंख करके व धरती से इंसुलेशन बना कर करना चाहिए। एक-एक ग्रह का जाप समाप्त होने पर उसके दशमांश अर्थात मंगल के लिए एक हज़ार व शनि के लिए तेईस सौ बार हवन करना चाहिए। हवन हेतु 'नमः' के स्थान पर 'स्वाः'का उच्चारण करना चाहिए।

खेद की बात यह है कि हमारे कामरेड्स बंधु भी ज्योतिष की आलोचना करते हैं और विभिन्न अधार्मिक संगठन जिनको शोषण वादी और साम्यवादी दोनों ही नाहक धार्मिक संगठन कहते हैं भी ज्योतिष की आलोचना करते हैं। साम्यवादी तो गलत ज़िद्द के कारण किन्तु पूंजीवादी अधार्मिक संगठन और उनके दलाल अपनी लूट को पुख्ता बनाए रखने के कारण ज्योतिष की आलोचना करते हैं। 

काश साम्यवादी कामरेड्स युवा क्रांतिकारी कामरेड शालिनी को श्रद्धांजली हेतु यथार्थ-सत्य को अंगीकार कर लें तो मानव-कल्याण का हमारा मार्ग सुगम व साकार हो सकता है।