Tuesday, November 30, 2010

वास्तु -दोष कुछ प्रैक्टिकल उदाहरण

मैंने ८ .११ .१० की पोस्ट -"तोड़ फोड़ और प्लास्टिक पिरामिड वास्तविक समाधान नहीं" द्वारा अपने पूर्व प्रकाशित लेख क़े माध्यम से बताया था की किस प्रकार हम अपने भवन क़े वास्तु दोषों से बच सकते हैं.कुछ पाठक ब्लागर्स ने जानकारी क़े प्रति कृतज्ञता  प्रकट की थी.उन सब की और अधिक जानकारी क़े लिए "अग्रमंत्र",आगरा में अगस्त ०४ से जन.०५ क़े दो त्रैमासिकों में प्रकाशित पूर्व लेखों को एक पाठक की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया की स्कैन कापी समेत यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ.उम्मीद है की कुछ लोगों को इनसे लाभ उठाने का अवसर मिल जाएगा.सुप्रसिद्ध वास्तु शास्त्री पंकज अग्रवाल क़े विचार जो की राष्ट्रीय सहारा क़े २४ .८ .१९९९ क़े अंक में प्रकाशित हुए थे ,उनकी भी स्कैन कापी आप सब की जानकारी क़े लिए उपलब्ध करा रहा हूँ.:-

उत्तर की रसोई -गृहणी रोगिणी होई
सोई घर किसी भी भवन का मुख्य अंग है.यही वह स्थान है जहाँ से सम्पूर्ण परिवार का स्वास्थ्य सञ्चालन होता है.यह रसोई पकाने वाले पर निर्भर करता है कि वह सदस्यों को स्वस्थ एवं जीवंत रखने लायक भोजन उपलब्ध कराये.परन्तु रसोई की मालकिन गृहणी का स्वास्थ्य रसोई की दिशा  पर निर्भर करता है.वास्तु शास्त्र क़े अनुसार रसोई घर भवन की दक्षिण -पूर्व दिशा (S . E .) अर्थात आग्नेय कोण में स्थित होना चाहिए. ऐसे स्थान पर पकाया गया भोजन सुपाच्य और स्वास्थ्यवर्धक होता है तथा गृहणी का स्वास्थ्य भी उत्तम रखता है.आग्नेय कोण दिशा का स्वामी शुक्र ग्रह होता है और शुक्र स्त्रियों का कारक ग्रह है.आजकल लोग वास्तु शास्त्र क़े अज्ञान से तथा अन्य कारणों से मन चाहे  स्थानों पर रसोई निर्मित करा लेते हैं परिणाम स्वरूप गृहणी पर उसका दुष्प्रभाव भी पड़ सकता है.

उत्तर दिशा धन क़े देवता कुबेर की होती है.इस स्थान पर रसोई घर बनाने से धन का अपव्यय होता है.उत्तर दिशा पुरुष कारक वाली है अतः स्त्री का स्वास्थ्य क्षीण होता है.उत्तर दिशा की रसोई वाली गृहणियां अल्पायु में ही वीभत्स रोगों का शिकार हो जाती हैं.३० -३५ आयु वर्ग की गृहणियां गम्भीर ऑपरेशनों  का सामना कर चुकी हैं. प्रौढ़ महिलाएं ,अल्सर /कैसर से पीड़ित हैं.जिन लोगों ने बाद में उत्तर दिशा में रसोई स्थानांतरित कर दी है उनमे से एक गृहिणी  आये दिन अस्पताल क़े चक्कर काटने लगी है. एक साधन सम्पन्न परिवार की गृहिणी  जिनके घर क़े  ईशान कोण (N E ) में शौचालय क़े कारण पुरुष वर्ग प्रभावित था ही उत्तर में रसोई कर दिए जाने क़े बाद कमर व घुटनों क़े दर्द तथा मानसिक अवसाद से पीड़ित रहने लगी है.
सारांश यह कि उत्तर की रसोई न केवल गृहणी हेतु वरन सम्पूर्ण परिवार क़े लिए हानिदायक होती है.

उदाहरण  एक अहंकारी का
 मारे प्राचीन ऋषी -मुनियों ने अपने असीम ज्ञान से भवन -निर्माण कला को प्रस्तुत किया था जो वास्तु कला क़े नाम से जानी जाती है.लगभग एक हज़ार वर्षों की गुलामी ने हमारी इस प्राचीन विद्या को विलुप्तप्राय सा कर दिया है. इधर दस बारह (अब तक १५ -१७ ) वर्षों से चीन से आयातित फेंगशुई और उसी की तर्ज़ पर वास्तु -शास्त्र का प्रचलन  बढ़ा है.परन्तु पाश्चात्य आर्किटेक्चर तथा चीन की फेंगशुई हमारी प्राचीन वास्तु कला क़े पर्यायवाची नहीं हैं और इनसे मनुष्य की न तो भौतिक समस्यायों का हल  निकल पा रहा है और न ही यह मोक्ष -प्राप्ति क़े मार्ग में सहायक है.वास्तु शास्त्र क़े नियमों की अवहेलना अथवा अधूरे परिपालन से आज का मानव किस प्रकार दुखी है किसी से छिपी बात नहीं है और बाज़ार में उपलब्ध वास्तु -शास्त्र की पुस्तकें तथा समाधान मात्र व्यावसायिक हैं उनसे मानव -कल्याण संभव नहीं है .अतः सत्य घटनाओं एवं काल्पनिक नामों क़े द्वारा हम निम्न -लिखित उदाहरण प्रस्तुत कर अपने पाठकों को वास्तु -दोषों क़े दुष्परिणामों से सचेत करना चाहते हैं.:-

रूरी सिंह एक मकान में किरायेदार क़े रूप में वर्षों से निवास कर रहा था .मकान में कोई वास्तु दोष न था.अतः उसके परिवार ने अच्छी खासी तरक्की कर ली .उसके बच्चे भी पढ़ाई में होशियार निकले .परन्तु अपने मकान -मालिक को नाजायज दबा कर यह मकान बहुत सस्ता खरीद लिया .मकान अपना निज का हो जाने क़े बाद गरूरी ने उसमें कुछ अतिरिक्त निर्माण कार्य कराये .ईशान कोण में गरूरी ने शौचालयों का निर्माण करा लिया.बस,यहीं से इस परिवार की बुद्धि का विनाश होता चला गया.सर्वप्रथम तो स्वंय गरूरी को दिल का हल्का दौरा पड़ा.बुद्धि क्षय का परिणाम यह हुआ कि उसने रसोई -घर को उत्तर दिशा में परिवर्तित करा लिया .इस प्रकार उसकी पत्नी घमंडना को भी ब्लड -प्रेशर की शिकायत हो गई.घुटनों व कमर में दर्द रहना प्रारम्भ हो गया तथा क्रोध की मात्रा बढ़ गई.चूंकि ईशान का शौचालय पुरुष वर्ग पर भारी होता है ,अतः साथ रहने वाला गरूरी का अनुज -पुत्र भी लगातार दो वर्षों तक एक ही कक्षा में अनुत्तीर्ण होता रहा.बुद्धि -विपर्याय का ही यह परिणाम था कि,गरूरी ने एक बार जो निर्माण कराया था उसे तुड़वाकर पुनः नये -सिरे से बनवाया (लेकिन कोई दोष मिटाया नहीं बल्कि दोषों को और बढ़ाया ही ).इसमें उत्तर की रसोई -जो व्ययकारी होती है - का भी योगदान रहा.१६  सितम्बर २००३  को सांय गरूरी और घमंडना में ज़बरदस्त वाकयुद्ध हुआ और पहले शान्त रहने वाली गृहणी घमंडना उत्तर की रसोई क़े प्रभाव से अत्यंत उत्तेजित हुयी जो दूर -दूर तक चर्चा का विषय बना.ईशान क़े शौचालय ने गरूरी की बुद्धी को नष्ट कर चरित्र भी गिरा दिया.सड़क छाप लोगों से मित्रता करके गरूरी एक क़े बाद एक गलतियों पर गलतियाँ करता चला जा रहा हैऔर अपने सच्चे हितैषियों को खोता चला जा रहा है. कुछ उत्तर की रसोई का प्रभाव है और कुछ ईशान क़े शौचालय का बुद्धि -विकार घमंडना भी अपने परिवार का हित -अहित सोचना भूल गई है.अब यह परिवार शनै : शनै :अपने विनाश की ओर बढ़ रहा है.इस परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने पैरों पर स्वंय ही कुल्हाड़ी चलाने लगा है .कुछ ही वर्षों क़े अंतराल पर दुनिया इस परिवार का शीराज़ा बिखरते देखेगी .गलत आचरण क़े लोगों से मित्रता करके यह परिवार शीघ्र ही उलटे उस्तरे से मूढा जाने वाला है उस पर भी तुर्रा यह कि जो कोई भी उनके हित की बात कहता है उससे इस परिवार क़े सदस्य सम्बन्ध तोड़ लेते हैं.सर्वप्रथम अपने उत्तर दिशा क़े पडौसी जिसे स्वंय गरूरी ने ही अपने पडौस में बसाया था सम्बन्ध ख़राब कर लिए उसके पश्चात पूर्व दिशा क़े पडौसी से सम्बन्ध तोड़ लिए.दक्षिण दिशा क़े पडौसी से तो सम्बन्ध कभी ठीक थे ही नहीं.आग्नेय क़े कबाड़ी परिवार से आजकल गरूरी की खूब छन रही है.एक और महानुभाव जिनकी भूमिका अपने छोटे भाई को विधायकी क़े चुनाव में हरवाने में प्रमुख थी गरूरी क़े शुभचिंतक बने हुए हैं.यह नैरत्य (S W ) दिशा  क़े पडौसी कहे जा सकते हैं.


उपरोक्त लेख छपने क़े तीन वर्ष बाद २००८ ई .की जन . में गरूरी की इ .बेटी ने गरूरी पर दबाव बना कर दूसरी जाति क़े अपने सहपाठी रहे इ . से विवाह कर लिया. परन्तु इससे पूर्व पूरा परिवार तनाव -अशान्ति और बाहरी हस्तक्षेप से गुज़रा.घमंडना को सीवियर   बी .पी .अटैक पड़ा,गरूरी को इलाज क़े लिए उत्तर की पडौसी और अपनी पुरानी शिष्या गायीनालोजिस्ट को ही बुलाना पड़ा जिनसे सम्बन्ध बिगाड़ लिए थे.पुत्र -पुत्रवधु लन्दन छोड़ कर आ ही नहीं रहे,अब समाज में उनकी दबी -छिपी चर्चा खूब होने लगी है.
बेहतर है कि ,दूसरों की गलतियों से सबक लेकर औरों को अपना बचाव पहले ही कर लेना चाहिए.विशेषज्ञ वास्तु -शास्त्री श्री पंकज अग्रवाल क़े विचार इस स्कैन कापी में देखें.;-


दि तोड़ -फोड़ व्यवहारिक न हो तो हमारी प्राचीन वास्तु -शास्त्र विद्या में वास्तु दोषों क़े निवारणार्थ हवन की विधि उपलब्ध है. जिसका प्रति वर्ष वास्तु -हवन कराकर लाभ उठाया और दोषों का शमन किया जा सकता है.परन्तु जब बद्धि ही न काम करे तब ?




(इस   ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)


Sunday, November 28, 2010

१८० दिन तथा इदं न मम

ब श्रीलंका की राष्ट्रपति चन्द्रिका कुमार तुंगा ने अपनी माँ सिरीमावो भंडारनायके को प्रधान मंत्री पद की शपथ दिलाई थी तो मीडिया ने कहा था ,जिस माँ ने उंगली पकड़ कर चलना सिखाया उसी माँ को पुत्री ने शपथ दिलाई है.यह तो लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में हुआ था.कुछ ऐसा ही हमारे साथ भी हुआ.मई क़े अंतिम सप्ताह में मैंने पुत्र को साइबर कैफे खुलवा दिया.पहली जून से उसने अपना ब्लाग "जो मेरा मन कहे" प्रारम्भ किया और उसी ने मुझे भी ब्लाग प्रारम्भ करने को प्रेरित किया. दो जून से मेरा ब्लाग "क्रांति स्वर" व दो माह बाद "विद्रोही स्वर" प्रारम्भ हुए.चूंकि  मैं कंप्यूटर सञ्चालन से अनभिज्ञ था ,अतः टाइपिंग से लेकर पब्लिकेशन  तक सम्पूर्ण मेरा कार्य उसी क़े जिम्मे था. तीन माह बाद टाईप तो मैं करने लगा परन्तु अभी भी शेष कार्य संपादन करना उसी द्वारा होता है.कुल ब्लाग -लेखन को प्रारम्भ हुए १८० दिन पूर्ण हो गये हैं.इसका पूर्णांक नौ है.नौ सबसे बड़ा अंक होता है और ज्योतिष में इसका बहुत महत्त्व है.कुल ब्रह्मांड (खगोलीय वृत्त ) -३६० डिग्री है और सूर्य की ६० कलाएं हैं.इस प्रकार :-
३६० गुणक ६० =२१६०० एवं सूर्य वर्ष में १४ जन .से १५ जूलाई  तक उत्तरायण तथा १६ जुलाई  से १३ जनवरी तक दक्षिणायन रहता है.अतः २१६०० भाग २ =१०८०० और बाद क़े शून्य का महत्त्व नहीं है.इसी लिए १०८ को बड़ी सं माना जाता है और माला में मनके भी १०८ ही रखे गये हैं.१२ राशियाँ और ९ ग्रह का गुणनफल भी १०८ है तथा २७ नक्षत्रों और इनके चार चरणों का गुणनफल भी १०८ ही है.३६० डिग्री का अर्धव्यास १८० डिग्री होता है और हम लोगों क़े ब्लाग लेखन क़े १८० दिन बीत गये है तो विचार आया कि क्यों न अपने अनुभवों को सार्वजनिक रूप से आप सब क़े साथ बाँट लिया जाये.


सर्व -प्रथम तो यह कि,यशवन्त तो जो उसके मन में आ जाता है उसकी भावाभिव्यक्ति कर देता है और विद्रोही स्वर में मेरे संघर्षों की कुछ झलक है."क्रन्तिस्वर "में व्यक्त विचार मेरे नहीं हैं -इदं न मम.मैंने अपने बुजुर्गों ,शिक्षकों ,विद्वानों आदि से जो सुना या पुस्तकों में जो पढ़ा और मुझे ठीक से याद रहा अपनी भाषा -शैली में व्यक्त कर देता हूँ.शब्द -विन्यास मेरे होते हुए भी भाव और विचार विद्वानों क़े होते हैं.मैं तो डाकिये की भांति उन विचारों को ब्लाग -लेखन क़े माध्यम से बाँट रहा हूँ जो मेरे नहीं हैं.या कह लीजिये विद्युत् तार में बहते करंट की तरह विद्वानों क़े विचारों का सम्प्रेषण मात्र कर रहा हूँ.मेरा उद्देश्य सिर्फ समाज में व्याप्त ढोंग व पाखण्ड का विरोध करके उनका उन्मूलन करना है.इसी लिए जिन ब्लाग्स पर उत्पीडन ,ढोंग व पाखण्ड का विरोध होता है चाहे वे पद्य में हों ,गद्य में हों या व्यंग्य में अपनी सहमति व समर्थन दर्ज करा देता हूँ.मेरे लिए टिप्णी करना लेन -देन नहीं है.फिर भी जो लोग मेरे ब्लाग पर समर्थन व्यक्त कर रहे हैं उनका मैं ह्रदय से आभारी हूँ.परन्तु खेद है कि बीच में माडरेशन की दीवार खडी करनी पड़ गई है क्योंकि पुष्कर ,राजस्थान क़े एक पोंगापंथी जी मेरे दोनों ब्लाग पर टिप्णी क़े रूप में अपना पूरा का पूरा पाखण्ड आलेख छाप गये थे -दोनों ब्लाग्स से उनके ढोंगी लेख को हटा कर तत्काल माडरेशन लागू करना पड़ा.मैं अपने ब्लाग को युद्ध का अखाड़ा बना कर एक -दूसरे पर छींटाकशी  नहीं करवाना चाहता था इसीलिये मजबूरन माडरेशन की बैसाखी थामनी पडी.


कानपुर की एक ब्लागर ने ब्लाग जगत पर धर्म -युद्ध की निंदा की है,मैंने उनका समर्थन कर दिया है.मैं उनके इसानियत क़े धर्म वाली बात से पूर्ण सहमत हूँ मेरी पत्नी पूनम ने भी "मानवता की सेवा "शीर्षक से इसी इंसानियत की अपील की है.अपने ब्लाग में सम्पूर्ण विश्व क़े मानव -कल्याण हेतु विचारों को ही अग्रसारित करता हूँ .कुछ ब्लागर्स की व्यक्तिगत समस्या पर उनके ई .मेल पर उन्ही की सहमति लेकर उनके हितार्थ वांछित स्तुति भी इसी उद्देश्य से भेज दीं कि सब का हित होना चाहिए."सब क़े भला में हमारा भला "


डा .दराल सा :ने अपने पिताजी क़े निधन क़े बाद एक महत्वपूर्ण समस्या समाज में कुरीतियों की उठाई-वहां भी मैंने न केवल ढोंग व पाखण्ड का विरोध किया वरन ज्योतिष क़े आधार पर उपलब्ध ज्ञान सार्वजनिक करने का प्रयास किया.मेरे  समान विचार वाले कम ही निकले,अधिकाँश "जो चलता है ,चलने दो "की मानसिकता क़े ही हैं.कुछ ने आर्थिक क्षमता या सामर्थ्य की बात सामने राखी.मेरा फ़र्ज़ बनता है कि बता दूँ -सूर्य की किरणें पशु,पक्षी ,मनुष्य में ही भेद नहीं करतीं,तो मनुष्यों में गरीब -अमीर का भेद भी नहीं करतीं ,वर्षा का जल भी गरीब -अमीर का भेद नहीं करता फिर समाज में गरीब और अमीर क़े लिए अलग -अलग मान्यताएं चलने का क्या औचित्य होगा ?जो गलत है वह गरीब क़े लिए भी गलत है और अमीर क़े लिए भी गलत है.गलत प्रथा का प्रचलन तो मानव मात्र  हित में समाप्त होना ही चाहिए हर हाल में और जल्दी से जल्दी ही. //


एक ब्लॉगर सा :ने मेरी एक पोस्ट पर विचारों का समर्थन तो किया लेकिन मेरी किसी भी पोस्ट से ताल्लुक न रखने वाला एक वाक्य -A make new friends but remember old ,New are silver old are gold - भी लिख दिया.इसका क्या आशय है वह ही जानें ;परन्तु निजी जीवन में मैंने किसी को मित्र नहीं बनाया है और शत्रु तो कोई भी बन जाये उसी क़े अनुरूप उससे व्यवहार हो सकता है.मित्र तो सुग्रीव और राम थे या फिर सुदामा और कृष्ण थे ,इनके अलावा कौन किसका मित्र था मेरे संज्ञान में नहीं है.जब कोई मेरा मित्र ही नहीं है तो नया या पुराना होने का प्रश्न भी नहीं है .फिर भी यदि किसी को मित्र बताना ज़रूरी ही हो तो मैं सिर्फ अपनी पत्नी पूनम (जो स्व बिलास्पति सहाय जी )की पुत्री हैं को ही बता सकता हूँ ,अन्य कोई मेरा मित्र नहीं हो सकेगा.यदि उन ब्लागर सा : का इशारा ब्लाग्स फालो /अनफौलो करने से हो तो इतना ही कहना चाहूँगा कि जो ब्लॉग अनफौलो  किया उसका कारण उस ब्लाग पर एक अभद्र टिप्णी जो अन्य टिप्णी कारों क़े बारे में एक काबिल -ए -आज़म टिप्णीकार ने मधुमक्खी ,तितली और डरपोक कह कर की उसका पुरजोर समर्थन उस ब्लागर ने खुद किया था;अतः उस ब्लाग से स्वंय को असम्बद्ध करना ही एक -मात्र विकल्प था.
पहले भी स्पष्ट कर चुका हूँ "स्वान्तः सुखाय ,सर्वजन हिताय "ब्लाग लेखन प्रारम्भ किया है ,उसी पर चलता रहूँगा.सहमति ,असहमति,समर्थन या विरोध से कोई फर्क नहीं है क्योंकि,मैं सिर्फ माध्यम हूँ,कोई विचार मेरे नहीं हैं.परमात्मा और प्रकृति प्रदत्त जो ज्ञान विद्वानों ने उपलब्ध कराया है,उसी में से चुन -चुन कर प्रस्तुत कर देता हूँ.आप चाहें तो यह भी कह लें -"कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा ,भानुमती ने कुनबा जोड़ा."
"जीवन परिचय " ब्लाग द्वारा यशवन्त ने ब्लाग -लेखकों से अपना -अपना जीवन -परिचय कि वे कैसे लेखन क्षेत्र में आये ?और उनके लेखन का उद्देश्य क्या है ?उस ब्लाग में लिखने की अपील की थी.मेरा आप सब से अनुरोध है कि ,यशवन्त क़े उत्साह -वर्धन हेतु उस ब्लाग पर अपने विचार प्रकाशित करने का कष्ट करें.


जो देता है ,वह देवता होता है.परमात्मा और प्रकृति मानव मात्र को निशुल्क सब कुछ देते हैं .हम जो मूल्य देते हैं वह एक मानव द्वारा दूसरे मानव को दिया जा रहा है,परमात्मा या प्रकृति को नहीं .परमात्मा और प्रकृति को उनके दिए हुए उपकार क़े बदले में देने क़े लिए "हवन "की वैज्ञानिक पद्धति को पुनः अपनाये जाने पर बार  -बार जोर देता हूँ .एक विद्वान क़े शब्दों को सुनें और समझें ;-





 (इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

Friday, November 26, 2010

लड़का घर से भागा क्यों ?

आत्मा अल्पज्ञ होती है और वह जन्म-जन्मान्तर क़े अपने कर्म -अकर्म को याद नहीं रख सकती,परन्तु उसके साथ चल रहे सूक्ष्म व कारण शरीर उसे उन कर्म -अकर्म क़े परिणामों से साक्षात्कार करते चलते हैं.याद रखें -आत्मा और शरीर का सम्बन्ध अन्धे और लंगड़े क़े समान है.आत्मा चैतन्य है लेकिन वह शरीर क़े बगैर लंगड़ा है और स्वतन्त्र रूप से कर्म नहीं कर सकता है. उसी प्रकार शरीर अचेतन होने क़े कारण बगैर आत्मा क़े कोई कर्म नहीं कर सकता.जब आत्मा का अपने पूर्व कर्मानुसार किसी शरीर में प्रवेश होता है तभी वह उस शरीर क़े अनुसार कर्म करने में सक्षम होती है. ज्योतिष ज्ञान क़े अनुसार उस व्यक्ति क़े जन्मकालीन ग्रह नक्षत्रों क़े आधार पर उसके भविष्य का अनुमान लगाया जा सकता है.यह अलग बात है कि,सम्बंधित व्यक्ति अथवा उसके परिवार क़े सदस्य ज्योतिष पर विश्वास न करते हों,पुनर्जन्म या पूर्व जन्म क़े सिद्धांतों को न मानते हों,परन्तु उन ग्रह -नक्षत्रों का प्रभाव हर हाल में उस पर पड़ेगा ही पड़ेगा और उसकी विचार -धरा व मान्यता का ग्रह -नक्षत्रों की चाल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. समझिये ०२ .०८ १९८३ की सायं ०५ .१५ पर मुम्बई में जन्मे पुनीत क़े जन्मांग को और उस पर पड़े ग्रहों क़े चमत्कारिक प्रभाव को :-

जन्म लग्न -धनु है,,पंचम में मेष का चंद्रमा,षष्ठम में वृष का राहू ,सप्तम में मिथुन का मंगल अष्टम में कर्क का सूर्य ,नवम में सिंह क़े बुध और शुक्र ,एकादश में तुला  का शनि अर्थात उच्च का है;द्वादश में वृश्चिक का ब्रहस्पत और केतु भी जो गुरु -चांडाल योग बना रहा है.
१० .४ .१९९७ ई .को दोपहर १२ और १२ .३०  बजे क़े मध्य मुम्बई से अपने चाचा की मामूली फटकार पर घर से भाग गया और लगभग छ :वर्ष बाद सकुशल घर वापिस आ गया -परन्तु कैसे ? जैसा कि स्वभाविक था बालक क़े गायब होने क़े बाद उसके माता -पिता ने पुलिस /टी .वी .का तो सहारा लिया ही अनेक ज्योतिषियों व पंडितों की शरण में भी गये.ज्योतिष क़े नाम पर उलटे उस्तरे से मूढ्ने वालों ने जो उपाए बताये -उन्हें कर -कर क़े थक हार कर उसके माता -पिता ने भगवान् पर से  भरोसा उठा लिया .घर में रखे देवी -देवताओं क़े चित्र और मूर्तियाँ समुद्र में बहा दिए.वे यह मान कर बैठ गये कि यह सब ढोंग और पाखण्ड हैऔर उनका बेटा अब शायद जीवित भी नहीं होगा .
उस बालक क़े ताउजी ने २००१ ई . में आगरा में मुझसे संपर्क किया तब उन्हें स्थिति का वैज्ञानिक आंकलन करके कुछ सरल उपाए उन्हें दिए और यह भी आश्वस्त किया कि उनका भतीजा जीवित है और लौट आएगा.लेकिन समस्या यह उत्पन्न हो गई कि बालक क़े माता -पिता पहले ही इतने लुट -पिट और थक  गये थे कि उनमें अब कोई उपाय करने की हिम्मत भी नहीं थी और ललक भी ख़त्म हो गई थी.तब मैंने उसके ताउजी को ही कहा कि वह अपने भतीजे का संकल्प लेकर खुद वही उपाय करें.हालाँकि उन्होंने सब नहीं कुछ ही उपाय किये ,लेकिन पूरी श्रद्धा और विश्वास क़े साथ.उनके छ :माह उपाय करने क़े उपरान्त बालक क़े मन में हलचल होने लगी और घर वापसी की सोचने लगा.अन्तत: उस सोच क़े छ : माह बाद (उपाय करते हुए एक वर्ष होते -होते )वह वर्ष २००२ ई .की होली क़े पश्चात अपनी मौसी क़े घर अजमेर पहुँच गया जहाँ से उसके माता -पिता उसे मुम्बई ले आये .उसने आगे अपनी पढ़ाई भी पूरी की.प्रश्न यह उठता है कि वह भागा क्यों ?और लौट क्यों  आया ?

आइए इसका ज्योतिषीय विश्लेषण करें.बालक का जन्म द्वि स्वभाव  राशि की धनु लग्न में हुआ था.उसके पंचम भाव में ही शत्रु -क्षेत्रीय चन्द्र भी स्थित है.चन्द्र मन का कारक होता है.अतः ऐसा बालक अपने लिए शत्रुतापूर्ण अर्थात मूर्खतापूर्ण कार्य करता है,और इस बालक ने यही तो किया.खुद की गलती क़े लिए मामूली सी फटकार पड़ने पर उसने घर छोड़ने का दुस्साहसिक निर्णय ले लिया.लग्नेश और सुख भाव क़े स्वामी ब्रहस्पति की व्ययेश भाव में स्थिति ने आग में घी का कम किया.जब यह बालक चौदहवें वर्ष में ब्रहस्पति की एक -चरण दृष्टि से युक्त था ,घर से भाग निकला.बारहवां ब्रहस्पति जातक को व्याभिचारी और रोगी बनता है.अब एक नज़र उसकी पलायन कुंडली पर डालें.

चैत्र शुक्ल चतुर्थी गुरूवार को आयुष्मान योग और कृतिका नक्षत्र में यह बालक घर छोड़ कर भगा था.उस समय की गोचर ग्रह -स्थिति क़े अनुसार राहू ने सुख में बढ़ा उपस्थित की तथा परिवार से बैर -भाव मन में ला दिया.अष्टम क़े ब्रहस्पति ने पीड़ा,दशम क़े शुक्र ने दुःख ,केतु ने शोक व शनि ने बाधाएं उपस्थित कीं.मन का कारक चन्द्र व्यय भाव में था परन्तु उच्च का था तथा पलायन दिस्वभाव की राशी की लग्न में (मिथुन )में हुआ था .दशमस्थ सूर्य सिद्धिदायक तथा मंगल साहस -पराक्रम को बनाने वाला तथा बुध लाभदायक स्थिति में था.इसी कारण बालक घर से भागने क़े बाद भी पुरुषार्थ द्वारा जीविकोपार्जन कर गुजारा चलाता रहा.कृतिका नक्षत्र क़े प्रभाव क़े कारण वह उत्तर दिशा -अहमदाबाद चला गया और अजमेर में जाकर प्रकट हुआ.

जन्मकालीन  चन्द्र व ब्रहस्पति की स्थिति -आयु खंड में क्रमशः दसवीं व तीसरी दृष्टि तथा गोचर कालीन  चन्द्र ,ब्रहस्पति,शुक्र ,शनि ,राहू व केतु क़े प्रभाव से बालक ने घर से भागने का दुस्साहसिक कदम उठा तो लिया.फिर वह लौटा कैसे ?देखिये ,जन्मकालीन राहू शत्रु भाव में शुक्र की राशि वृष में स्थित है जो उसे धैर्यवान बना रहा है.ऐसा राहू शत्रु का संहार भी करता है.अतः बालक निरापद ढंग से पूर्ण साहस व पराक्रम क़े साथ पुरुषार्थ में जुटा रहा . भाग्य भाव में सिंहस्थ बोध पिता को सुख पहुचाने वाला होता है.अब यदि यह बालक घर से भगा ही रहता तो पिता को सुख किस प्रकार पहुंचाता ?इसी हेतु इसके ताऊजी को आश्वस्त किया था मैंने कि ,बालक लौटेगा अवश्य और वह लौटा भी और पिता की इच्छानुसार पुनः पठन -पाठन  भी किया.

भले ही बालक क़े माता -पिता का ज्योतिष और ग्रह -नक्षत्रों से विश्वास पोंगा -पंथियों क़े भटकाव क़े कारण उठ गया हो ,परन्तु ग्रह -नक्षत्रों की चाल का उसके जीवन पर सटीक और भरपूर प्रभाव पड़ा है.ख़राब प्रभाव को उसके ताउजी द्वारा मन्त्रों क़े सस्वर पाठ से ग्रह -नक्षत्रों पर तरंगों (वायबरेशन) द्वारा ठीक किया गया था.हमारी प्रार्थना और सद्प्रयासों का अन्तरिक्ष पर पूरा प्रभाव पड़ता है.

आगे यह करेगा क्या ?-धन भाव का स्वामी शनि आय भाव में उच्च का होकर तुला राशि में स्थित है. दिव्तीय भाव में मकर राशि की उपस्थिति इसमें गज़ब की प्लानिंग -शक्ति दर्शाता है.पत्थर ,खान अथवा जल से सम्बंधित वस्तुओं क़े व्यापार में यह सफल रहेगा.उच्च वाहन सुख की प्राप्ति होगी.धनाढ्य रहेगा परन्तु या तो निसंतान रहेगा,अथवा पुत्री संतान ही होगी.पुत्र संतान से यह वंचित ही रहेगा.ऐसा संतान भाव में शत्रु -क्षेत्रीय चन्द्र की उपस्थिति तथा शनि की पूर्ण दृष्टि क़े कारण होगा.पत्नी भाव में ,प्रेम व व्यय भाव का स्वामी होकर मंगल भी शत्रु  क्षेत्रीय है;अतः इसकी दो पत्नियाँ होंगी और  उन दोनों का ही नाश होगा.पत्नी व संतान सुख से वंचित होकर यह जातक भारी ऐय्याश होगा और व्यभिचार में संलिप्त रहेगा .यदि इसे सही दिशा -निर्देश प्राप्त हो जाये और यह कुपित ग्रहों की विधानपूर्वक वैज्ञानिक पद्धति से शांति कराये,अरिष्टों क़े शमन हेतु स्तुति पाठ नियमित करे तो इसके जीवन में घटित होने वाले अनिष्ट का प्रकोप संभवतः कम हो जाएगा और इसकी श्रद्धा व विश्वास क़े अनुपात में वह क्षीण एवं समाप्त हो जाएगा.मनुष्य मननशील (विवेकशील )प्राणी है और अपने सत्कर्मों द्वारा अपने भाग्य को अपने अनुकूल मोड़ सकता है लेकिन क्या धन की प्रमुखता वाले समय मे ऐसा  हो सकेगा ?






(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)

Thursday, November 25, 2010

ज्वलंत सामाजिक समस्या-अशांति

समाज वह व्यवस्था है जिसमे रहने वाले लोग परस्पर संबंधों क़े आधार पर एक -दूसरे पर अन्योन्याश्रित  रहते हैं .समाज में शांति व व्यवस्था बनाए रखने क़े लिए ,उस समाज द्वारा कुछ नियम व मर्यादाएं निरूपित की जाती हैं जिनका पालन उसमे रहने वाले लोग स्वेच्छा से करते हैं और सुखी जीवन व्यतीत करते हैं .लेकिन आज यों तो अशांति एक विश्व -व्यापी समस्या बन चुकी है परन्तु भारतीय समाज क़े सन्दर्भ में यह विकराल रूप धारण किये हुए खडी है. क्या बच्चे ,क्या बूढ़े और क्या नौजवान सभी किसी न किसी समस्या से ग्रस्त अशांत जीवन जीने को बाध्य है.प्राचीन काल में विश्व गुरु और सोने की चिड़िया नामों से विभूषित हमारे भारतीय समाज को आज क्या हो गया है जो आज हमें सर्वत्र अशांति क़े ही दर्शन होते हैं .वैज्ञानिक प्रगति ,आर्थिक विकास ,शोध -अनुसंधान किसी भी क्षेत्र में हम विश्व क़े किसी भी अन्य समाज से कतई पीछे नहीं हैं .जहाँ हम कभी सुई का भी आयात करते थे ,आज न केवल वायुयान और राकेट बना रहे हैं बल्कि निर्यात क़े क्षेत्र में भी कदम बढ़ा चुके हैं .कभी हम अमेरिकी पी .एल .चार सौ अस्सी की बैसाखी क़े सहारे अपने समाज की क्षुधा शान्त कर रहे थे ,आज हम न केवल अन्न क़े निर्यातक हैं बल्कि प्राद्योगिकी तक का निर्यात कर रहे हैं.हर क्षेत्र में अपनी अग्रणी पताका फहराने क़े बावजूद हम जिस एक समस्या से ग्रसित हैं वह है चतुर्दिक अशांति और इसका निदान बड़े -बड़े समाजशास्त्री ,राजनेता ,धर्म गुरु ,समाज सुधारक आदि कोई भी नहीं कर पा रहे हैं .प्रातः काल आँख खुलने से रात्रि में सोते समय तक प्रायः हर मनुष्य किसी न किसी समस्या से ग्रस्त होकर अशांत हैं,बल्कि इसी अशांति क़े चलते कईयों की तो रात की नींद और दिन का चैन तक उड़ चुका है .छोटे -छोटे संस्कारों पर भी भव्य प्रीती -भोज तो आयोजित किये जा रहे हैं परन्तु लोगों में प्रीत -भाव का सर्वथा अभाव हैएक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ और अपने अहं की तुष्टि में ही गौर्न्वावित होना आज का सामाजिक चलन हो गया है. आज क्या ज्ञानी क्या पंडित सभी हाय -पैसा ,हाय -पैसा करते घूम रहे हैं .फिर चाहे यह पैसा वैध -विधि से हासिल हो या अनीति द्वारा सारे प्रवचन पर -उपदेश कुशल बहुतेरे सिद्ध हो रहे हैं.एक ओर भीषण बेरोजगारी है और परिवार क़े परिवार भूखे मरने को बाध्य हैं तो दूसरी ओर एक परिवार क़े पति -पत्नी और कहीं -कहीं उनके बच्चे भी ऊँची सोर्स से रोजगार संपन्न हैं.कहीं इलाज क़े लिए पैसा भी नहीं है और कहीं करोड़ों रूपये फूंक कर फाईव स्टार होटलों सरीखे अस्पतालों में इलाज चल रहा है.कोई दहेज़ न होने क़े कारण अपनी लडकी की शादी में विलम्ब से अशान्त है तो कोई लड़के की बेरोजगारी क़े कारण पुत्र -वधु लाने से वंचित हो रहा है.भूख से व्याकुल तड़पते परिवार अशान्त हैं तो गोदामों भरा अनाज सड़ाकर फेंका जा रहा है और व्यापारी इस घाटे क़े कारण अशान्त है.एक ओर कुपोषण क़े कारण करोड़ों बच्चों का भविष्य अधर में है और दूसरी ओर साधन -सम्पन्न और समृद्ध परिवारों में रक्तचाप ,ह्रदय ,मधुमेह ,गुर्दा आदि रोगों क़े कारण भोजन प्रतिबन्धित और नियन्त्रित हो रहा है.आखिर क्या है इस अशान्ति का कारण और इसे कैसे दूर किया जा सकता है ? उत्तर सरल है भारतीय समाज द्वारा अपनी पुराणी संस्कृति का विस्मरण किया जाना ही सर्वत्र अशान्ति का हेतु है और इसका निदान प्राच्य संस्कृति को अपनाने में ही है.
बहुत देख लिया आधुनिक सभ्यता और संस्कृति को जहाँ नग्न -नृत्य क़े अलावा और धरा ही क्या है ?अब तो अगर हम शान्ति चाहते हैं और दिल से सच्ची शान्ति की चाह है तो फिर देर किस बात की ? अपनी पुराणी संस्कृति को अपनाना ही होगा क्योंकि OLD is GOLD आज क़े बुजुर्ग आज की समस्याओं क़े लिए पूरी तरह उत्तरदायी हैं ,अतः नौजवानों को ही अब आगे आना होगा और अपनी पुराणी संस्कृति को गले लगाना होगा जो ----"सर्वे सन्तु निरामयः "वाली है ,"वसुधैव कुटुम्बकम "ही जिसका अभीष्ट है.सम्पूर्ण विश्व और उसके परम -पिता से प्यार करना ही अशान्ति का निदान करना है.

परम पिता से प्यार नहीं ,शुद्ध रहे व्यवहार नहीं.
इसीलिये तो आज देख लो ,सुखी कोई परिवार नहीं..
फल और फूल अन्न इत्यादि ,समय समय पर देता है.
लेकिन है अफ़सोस यही बदले में कुछ नहीं लेता है..
करता है इनकार नहीं ,भेद भाव तकरार नहीं.
ऐसे दानी का ओ बन्दे ,करो जरा विचार नहीं..
परम पिता से प्यार नहीं ,शुद्ध रहे व्यवहार नहीं.
इसी लिए तो आज देख लो ,सुखी कोई परिवार नहीं..

कविवर नरदेव जी की सीख को अपनाएँ हम और परम -पिता से प्यार रखते हुए हवन की वैज्ञानिक पद्धति को पुनः अपनाएँ हम तो कोई कारण नहीं कि ,अशान्ति दूर होकर सर्वत्र शान्ति स्थापित न हो.


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Tuesday, November 23, 2010

"आँगन तुलसी ,द्वारे नीम -फिर क्यों आये वैद्य -हकीम "

(Imege:Google Search)
यह शीर्षक उस स्लोगन से लिया गया है जिसका प्रयोग एन .सी .ई .आर .टी .,पटना में कार्य -काल क़े दौरान मेरी श्रीमतीजी (पूनम ) ग्रामीणों को समझाने में अपने ग्रुप क़े साथ करती थीं.यह बात बिलकुल ठीक है कि नीम स्वंय हकीम है .नीम न केवल पर्यावरण शुद्ध करता है,बल्कि यह एक उच्च कोटि का रक्तशोधक भी है.त्वचा और वायु -प्रकोप में तो नीम राम -बाण औषधी ही है.इस सम्बन्ध में अपने आयुर्वेद -रत्न अध्यन में आये एक किस्से का वर्णन करना प्रासंगिक रहेगा.६०० ई .पूर्व हमारे देश क़े सुप्रसिद्ध वैद्य सुश्रुत (जो कि दिवोदास जी क़े शिष्य और सुश्रुत संहिता क़े रचयिता थे )की परीक्षा उनके समकालीन यूनानी हकीम पाईथागोरस ने अद्भुत तरीके से लेनी चाही. पाईथागोरस ने एक यात्री( जो भारत आ रहा था ) से कहा कि ,वहां  जा कर सुश्रुत को मेरा सन्देश दे देना.जब उस यात्री ने सन्देश पूछा तो पाईथागोरस ने कह दिया कि कुछ नहीं ,बस तुम जाते समय रोजाना रात को इमली क़े पेड़ क़े नीचे सो जाया करना. उस यात्री ने ऐसा ही किया और सुश्रुत से जब मिला तो उनसे कहा पाईथागोरस ने आपके लिए सन्देश देने को कहा है पर कुछ बताया नहीं है. सुश्रुत ने पूछा कि फिर भी क्या कहा था ,उस यात्री ने जवाब दिया कि उन्होंने कहा था कि रोजाना रात को इमली क़े पेड़ क़े नीचे सो जाया करना और मैंने वैसा ही किया है.यह सुन कर सुश्रुत ने कहा कि ठीक है अब तुम लौटते में रोजाना नीम क़े पेड़ क़े नीचे सोते हुए जाना. उस यात्री ने अब वैसा ही किया.पाईथागोरस ने जब उस यात्री से सुश्रुत क़े बारे में पूंछा तो उसने कहा कि उन्होंने भी कुछ नहीं कहा सिवाए इसके कि लौटते में नीम क़े नीचे

(Photo:Google Imege Search)
सोते हुए जाना.

पाईथागोरस ने सुश्रुत का लोहा मान लिया. कारण स्पष्ट है कि इमली क़े पेड़ क़े नीचे सोने से उस व्यक्ति में वात का प्रकोप हो गया था.लौटते में नीम क़े नीचे सोने से वह वात -प्रकोप नष्ट हो गया.सिर्फ वात -प्रकोप ही नहीं अनेक रोगों का इलाज नीम से होता है. :-
डायबिटीज़ -नीम,जामुन और बेल -पत्र की तीन -तीन कोपलें मिला कर प्रातः काल शौचादि क़े बाद मिश्री मिलकर चबाते रहने से डायबिटीज़ रोग जड़ से समाप्त हो जाता है.
बवासीर -नीम की निम्बोली पकी होने पर गुठली समेत साबुत निगल लें.प्रातः काल ३ से शुरू करके २१ तक ले जाएँ पुनः घटाते हुए तीन पर लायें .इस प्रयोग से बवासीर रोग जड़ से समाप्त हो जाता है.
रोग अनेक -औषद्धि एक -वात व पित्त क़े प्रकोप से होने वाले रोग ,बिगड़े हुए घाव ,कृमि जान रोग ,बवासीर तथा श्वास -कास सभी रोगों में 'नीम ' मिश्रित घृत (घी )लाभ करता करता ही है कुष्ठ रोग दूर करने में भी सहायक है इसे पञ्च तिक्त घृत क़े नाम से बाजार से भी खरीद सकते हैं.
निर्माण विधि -(१)नीम की छाल ,पटोल पत्र ,कटेरी पंचांग ,वासा का पंचांग ,गिलोय इन पाँचों को ५० -५० ग्रा .की मात्रा में लें और मोटा -मोटा कूट कर उबालें पानी लीटर लें.जब चौथाई भाग अर्थात ७४० मि .ली .बचे तो उतार कर कपडे से छान लें.
(२ )अब इसमें गाय का घी १५० ग्रा .और त्रिफला चूर्ण २० ग्रा .की मात्रा में मिला कर पुनः तब तक उबालें जब तक कि समस्त पानी जलकर मात्र घी न बच जाये.
(३ )एक चम्मच घृत मिश्री मिला कर चाटें और गुनगुना गर्म दूध पीयें.
पहले सड़कों क़े किनारे जो छायादार वृछ लगाये जाते थे उनमे नीम प्रमुख था ,तब वातावरण इसी कारण शुद्ध रहता था .क्या हम फिर उसी परंपरा को नहीं अपना कर सुखी रहने का अवसर खोते जा रहे हैं ?



(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)