Monday, September 9, 2019
Saturday, September 7, 2019
रेमन मैगसेसे अवॉर्ड में रवीश कुमार का भाषण ------ पवन करण
https://khabar.ndtv.com/video/show/news/i-am-for-all-people-of-india-made-me-what-i-am-ravish-kumar-in-magsaysay-speech-526333
Pawan Karan
06-09-2019
नमस्कार, भारत चांद पर पहुंचने वाला है. गौरव के इस क्षण में मेरी नज़र चांद पर भी है और ज़मीन पर भी, जहां चांद से भी ज़्यादा गहरे गड्ढे हैं. दुनियाभर में सूरज की आग में जलते लोकतंत्र को चांद की ठंडक चाहिए. यह ठंडक आएगी सूचनाओं की पवित्रता और साहसिकता से, न कि नेताओं की ऊंची आवाज़ से. सूचना जितनी पवित्र होगी, नागरिकों के बीच भरोसा उतना ही गहरा होगा. देश सही सूचनाओं से बनता है. फेक न्यूज़, प्रोपेगंडा और झूठे इतिहास से भीड़ बनती है. रैमॉन मैगसेसे फाउंडेशन का शुक्रिया, मुझे हिन्दी में बोलने का मौका दिया, वरना मेरी मां समझ ही नहीं पातीं, कि क्या बोल रहा हूं. आपके पास अंग्रेज़ी में अनुवाद है और यहां सब-टाइटल हैं.दो महीने पहले जब मैं ‘Prime Time’ की तैयारी में डूबा था, तभी सेलफोन पर फोन आया. कॉलर आईडी पर फिलीपीन्स फ्लैश कर रहा था. मुझे लगा कि किसी ट्रोल ने फोन किया है. यहां के नंबर से मुझे बहुत ट्रोल किया जाता है. अगर वाकई वे सारे ट्रोल यहीं रहते हैं, तो उनका भी स्वागत है, मैं आ गया हूं.
ख़ैर, फिलीपीन्स के नंबर को उठाने से पहले अपने सहयोगियों से कहा कि ट्रोल की भाषा सुनाता हूं. मैंने फोन को स्पीकर फोन पर ऑन किया, लेकिन अच्छी-सी अंग्रेज़ी में एक महिला की आवाज़ थी, “May I please speak to Mr Ravish Kumar…?” हज़ारों ट्रोल में एक भी महिला की आवाज़ नहीं थी. मैंने फोन को स्पीकर फोन से हटा लिया. उस तरफ से आ रही आवाज़ मुझसे पूछ रही थी कि मुझे इस साल का रैमॉन मैगसेसे पुरस्कार दिया जा रहा है. मैं नहीं आया हूं, मेरी साथ पूरी हिन्दी पत्रकारिता आई है, जिसकी हालत इन दिनों बहुत शर्मनाक है. गणेश शंकर विद्यार्थी और पीर मूनिस मोहम्मद की साहस वाली पत्रकारिता आज डरी-डरी-सी है. उसमें कोई दम नहीं है. अब मैं अपने विषय पर आता हूं.
नागरिक पत्रकारिता..
यह समय नागरिक होने के इम्तिहान का है. नागरिकता को फिर से समझने का है और उसके लिए लड़ने का है. यह जानते हुए कि इस समय में नागरिकता पर चौतरफा हमला हो रहे हैं और सत्ता की निगरानी बढ़ती जा रही है, एक व्यक्ति और एक समूह के तौर पर जो इस हमले से ख़ुद को बचा लेगा और इस लड़ाई में मांज लेगा, वही नागरिक भविष्य के बेहतर समाज और सरकार की नई बुनियाद रखेगा. दुनिया ऐसे नागरिकों की ज़िद से भरी हुई है. नफ़रत के माहौल और सूचनाओं के सूखे में कोई है, जो इस रेगिस्तान में कैक्टस के फूल की तरह खिला हुआ है. रेत में खड़ा पेड़ कभी यह नहीं सोचता कि उसके यहां होने का क्या मतलब है, वह दूसरों के लिए खड़ा होता है, ताकि पता चले कि रेत में भी हरियाली होती है. जहां कहीं भी लोकतंत्र हरे-भरे मैदान से रेगिस्तान में सबवर्ट किया जा रहा है, वहां आज नागरिक होने और सूचना पर उसके अधिकारी होने की लड़ाई थोड़ी मुश्किल ज़रूर हो गई है. मगर असंभव नहीं है.
नागरिकता के लिए ज़रूरी है कि सूचनाओं की स्वतंत्रता और प्रामाणिकता हो. आज स्टेट का मीडिया और उसके बिज़नेस पर पूरा कंट्रोल हो चुका है. मीडिया पर कंट्रोल का मतलब है, आपकी नागरिकता का दायरा छोटा हो जाना. मीडिया अब सर्वेलान्स स्टेट का पार्ट है. वह अब फोर्थ एस्टेट नहीं है, बल्कि फर्स्ट एस्टेट है. प्राइवेट मीडिया और गर्वनमेंट मीडिया का अंतर मिट गया है. इसका काम ओपिनियन को डायवर्सिफाई नहीं करना है, बल्कि कंट्रोल करना है. ऐसा भारत सहित दुनिया के कई देशों में हो रहा है.
न्यूज़ चैनलों की डिबेट की भाषा लगातार लोगों को राष्ट्रवाद के दायरे से बाहर निकालती रहती है. इतिहास और सामूहिक स्मृतियों को हटाकर उनकी जगह एक पार्टी का राष्ट्र और इतिहास लोगों पर थोपा जा रहा है. मीडिया की भाषा में दो तरह के नागरिक हैं – एक, नेशनल और दूसरा, एन्टी-नेशनल. एन्टी नेशनल वह है, जो सवाल करता है, असहमति रखता है. असहमति लोकतंत्र और नागरिकता की आत्मा है. उस आत्मा पर रोज़ हमला होता है. जब नागरिकता ख़तरे में हो या उसका मतलब ही बदल दिया जाए, तब उस नागरिक की पत्रकारिता कैसी होगी. नागरिक तो दोनों हैं. जो ख़ुद को नेशनल कहता है, और जो एन्टी-नेशनल कहा जाता है.
दुनिया के कई देशों में यह स्टेट सिस्टम, जिसमें न्यायपालिका भी शामिल है, और लोगों के बीच लेजिटिमाइज़ हो चुका है. फिर भी हम कश्मीर और हांगकांग के उदाहरण से समझ सकते हैं कि लोगों के बीच लोकतंत्र और नागरिकता की क्लासिक समझ अभी भी बची हुई है और वे उसके लिए संघर्ष कर रहे हैं. आख़िर क्यों हांगकांग में लोकतंत्र के लिए लड़ने वाले लाखों लोगों का सोशल मीडिया पर विश्वास नहीं रहा. उन्हें उस भाषा पर भी विश्वास नहीं रहा, जिसे सरकारें जानती हैं. इसलिए उन्होंने अपनी नई भाषा गढ़ी और उसमें आंदोलन की रणनीति को कम्युनिकेट किया. यह नागरिक होने की रचनात्मक लड़ाई है. हांगकांग के नागरिक अपने अधिकारों को बचाने के लिए उन जगहों के समानांतर नई जगह पैदा कर रहे हैं, जहां लाखों लोग नए तरीके से बात करते हैं, नए तरीके से लड़ते हैं और पल भर में जमा हो जाते हैं. अपना ऐप बना लिया और मेट्रो के इलेक्ट्रॉनिक टिकट ख़रीदने की रणनीति बदल ली. फोन के सिमकार्ड का इस्तेमाल बदल लिया. कंट्रोल के इन सामानों को नागरिकों ने कबाड़ में बदल दिया. यह प्रोसेस बता रहा है कि स्टेट ने नागरिकता की लड़ाई अभी पूरी तरह नहीं जीती है. हांगकांग के लोग सूचना संसार के आधिकारिक नेटवर्क से ख़ुद ही अलग हो गए.
कश्मीर में दूसरी कहानी है. वहां कई दिनों के लिए सूचना तंत्र बंद कर दिया गया. एक करोड़ से अधिक की आबादी को सरकार ने सूचना संसार से अलग कर दिया. इंटरनेट शटडाउन हो गया. मोबाइल फोन बंद हो गए. सरकार के अधिकारी प्रेस का काम करने लगे और प्रेस के लोग सरकार का काम करने लग गए. क्या आप बग़ैर कम्युनिकेशन और इन्फॉरमेशन के सिटिज़न की कल्पना कर सकते हैं…? क्या होगा, जब मीडिया, जिसका काम सूचना जुटाना है, सूचना के तमाम नेटवर्क के बंद होने का समर्थन करने लगे, और वह उस सिटिज़न के खिलाफ हो जाए, जो अपने स्तर पर सूचना ला रहा है या ला रही है या सूचना की मांग कर रहा है.
यह उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत के सारे पड़ोसी प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में निचले पायदान पर हैं. पाकिस्तान, चीन, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और भारत. नीचे की रैंकिंग में भी ये पड़ोसी हैं. पाकिस्तान में एक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी है, जो अपने न्यूज़ चैनलों को निर्देश देता है कि कश्मीर पर किस तरह से प्रोपेगंडा करना है. कैसे रिपोर्टिंग करनी है. इसे वैसे तो सरकारी भाषा में सलाह कहते हैं, मगर होता यह निर्देश ही है. बताया जाता है कि कैसे 15 अगस्त के दिन स्क्रीन को खाली रखना है, ताकि वे कश्मीर के समर्थन में काला दिवस मना सकें. जिसकी समस्या का पाकिस्तान भी एक बड़ा कारण है.
दूसरी तरफ, जब ‘कश्मीर टाइम्स’ की अनुराधा भसीन भारत के सुप्रीम कोर्ट जाती हैं, तो उनके खिलाफ प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया कोर्ट चला जाता है. यह कहने कि कश्मीर घाटी में मीडिया पर लगे बैन का वह समर्थन करता है. मेरी राय में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और पाकिस्तान के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया रेगुलेटरी अथॉरिटी का दफ्तर एक ही बिल्डिंग में होना चाहिए. गनीमत है कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने कश्मीर में मीडिया पर लगी रोक की निंदा की और प्रेस कांउंसिल ऑफ इंडिया की भी आलोचना की. पी.सी.आई. बाद में स्वतंत्रता के साथ हो गया. दोनों देशों के नागरिकों को सोचना चाहिए, लोकतंत्र एक सीरियस बिज़नेस है. प्रोपेगंडा के ज़रिये क्या वह एक दूसरे में भरोसा पैदा कर पाएंगे…? होली नहीं है कि इधर से गुब्बारा मारा, तो उधर से गुब्बारा मार दिया. वैसे, भारत के न्यूज़ चैनल परमाणु हमले के समय बचने की तैयारी का लेक्चर दे रहे हैं. बता रहे हैं कि परमाणु हमले के वक्त बेसमेंट में छिप जाएं. आप हंसें नहीं. वे अपना काम काफी सीरियसली कर रहे हैं.
अब आप इस संदर्भ में आज के विषय के टॉपिक को फ्रेम कीजिए. यह तो वही मीडिया है, जिसने अपने खर्चे में कटौती के लिए ‘सिटिज़न जर्नलिज़्म’ को गढ़ना शुरू किया था. इसके ज़रिये मीडिया ने अपने रिस्क को आउटसोर्स कर दिया. मेनस्ट्रीम मीडिया के भीतर सिटिज़न जर्नलिज़्म और मेनस्ट्रीम मीडिया के बाहर के सिटिज़न जर्नलिज़्म दोनों अलग चीज़ें हैं. लेकिन जब सोशल मीडिया के शुरुआती दौर में लोग सवाल करने लगे, तो यही मीडिया सोशल मीडिया के खिलाफ हो गया. न्यूज़रूम के भीतर ब्लॉग और वेबसाइट बंद किए जाने लगे. आज भी कई सारे न्यूज़रूम में पत्रकारों को पर्सनल ओपिनियन लिखने की अनुमति नहीं है. यह अलग बात है कि उसी दौरान बगदाद बर्निंग ब्लॉग के ज़रिये 24 साल की छात्रा रिवरबेंड (असल नाम सार्वजनिक नहीं किया गया) की इराक पर हुए हमले, युद्ध और तबाही की रोज की स्थिति ब्लॉग पोस्ट की शक्ल में आ रही थी और जिसे साल 2005 में ‘Baghdad Burning: Girl Blog from Iraq’ शीर्षक से किताब की शक्ल में पेश किया गया, तो दुनिया के प्रमुख मीडिया संस्थानों ने माना कि जो काम सोशल मीडिया के ज़रिये एक लड़की ने किया, वह हमारे पत्रकार भी नहीं कर पाते. यह सिटिजन ज़र्नलिज़्म है, जो मेनस्ट्रीम मीडिया के बाहर हुआ.
आज कोई लड़की कश्मीर में ‘बगदाद बर्निंग’ की तरह ब्लॉग लिख दे, तो मेनस्ट्रीम मीडिया उसे एन्टी-नेशनल बताने लगेगा. मीडिया लगातार सिटिज़न जर्नलिज़्म के स्पेस को एन्टी-नेशनल के नाम पर डि-लेजिटिमाइज़ करने लगा है, क्योंकि उसका इंटरेस्ट अब जर्नलिज़्म में नहीं है. ज़र्नलिज़्म के नाम पर मीडिया स्टेट का कम्प्राडोर है, एजेंट है. मेरे ख़्याल से सिटिज़न ज़र्नलिज़्म की कल्पना का बीज इसी वक्त के लिए है, जब मीडिया या मेनस्ट्रीम जर्नलिज़्म सूचना के खिलाफ हो जाए. उसे हर वह आदमी देश के खिलाफ नज़र आने लगे, जो सूचना पाने के लिए संघर्ष कर रहा होता है. मेनस्ट्रीम मीडिया नागरिकों को सूचना से वंचित करने लगे. असमहति की आवाज़ को गद्दार कहने लगे. इसीलिए यह टेस्टिंग टाइम है.
जब मीडिया ही सिटिज़न के खिलाफ हो जाए, तो फिर सिटिज़न को मीडिया बनना ही पड़ेगा. यह जानते हुए कि स्टेट कंट्रोल के इस दौर में सिटिज़न और सिटिज़न जर्नलिज़्म दोनों के ख़तरे बहुत बड़े हैं और सफ़लता बहुत दूर नज़र आती है. उसके लिए स्टेट के भीतर से इन्फॉरमेशन हासिल करने के दरवाज़े पूरी तरह बंद हैं. मेनस्ट्रीम मीडिया सिटिज़न जर्नलिज़्म में कॉस्ट कटिंग और प्रॉफिट का स्कोप बनाना चाहता है और इसके लिए उसका सरकार का PR होना ज़रूरी है. सिटिज़न जर्नलिज़्म संघर्ष कर रहा है कि कैसे वह जनता के सपोर्ट पर सरकार और विज्ञापन के जाल से बाहर रह सके.
भारत का मेनस्ट्रीम मीडिया पढ़े-लिखे नागरिकों को दिन-रात पोस्ट-इलिटरेट करने में लगा है. वह अंधविश्वास से घिरे नागरिकों को सचेत और समर्थ नागरिक बनाने का प्रयास छोड़ चुका है. अंध-राष्ट्रवाद और सांप्रदायिकता उसके सिलेबस का हिस्सा हैं.
यह स्टेट के नैरेटिव को पवित्र-सूचना (प्योर इन्फॉरमेशन) मानने लगा है. अगर आप इस मीडिया के ज़रिये किसी डेमोक्रेसी को समझने का प्रयास करेंगे, तो यह एक ऐसे लोकतंत्र की तस्वीर बनाता है, जहां सारी सूचनाओं का रंग एक है. यह रंग सत्ता के रंग से मेल खाता है. कई सौ चैनल हैं, मगर सारे चैनलों पर एक ही अंदाज़ में एक ही प्रकार की सूचना है. एक तरह से सवाल फ्रेम किए जा रहे हैं, ताकि सूचना के नाम पर धारणा फैलाई जा सके. इन्फॉरमेशन में धारणा ही सूचना है. (perception is the new information), जिसमें हर दिन नागरिकों को डराया जाता है, उनके बीच असुरक्षा पैदा की जाती है कि बोलने पर आपके अधिकार ले लिए जाएंगे. इस मीडिया के लिए विपक्ष एक गंदा शब्द है.
जब मेनस्ट्रीम मीडिया में विपक्ष और असहमति गाली बन जाए, तब असली संकट नागरिक पर ही आता है. दुर्भाग्य से इस काम में न्यूज़ चैनलों की आवाज़ सबसे कर्कश और ऊंची है. एंकर अब बोलता नहीं है, चीखता है.
भारत में बहुत कुछ शानदार है, एक महान देश है, उसकी उपलब्धियां आज भी दुनिया के सामने नज़ीर हैं, लेकिन इसके मेनस्ट्रीम और TV मीडिया का ज़्यादतर हिस्सा गटर हो गया है. भारत के नागरिकों में लोकतंत्र का जज़्बा बहुत ख़ूब है, लेकिन न्यूज़ चैनलों का मीडिया उस जज़्बे को हर रात कुचलने आ जाता है. भारत में शाम तो सूरज डूबने से होती है, लेकिन रात का अंधेरा न्यूज चैनलों पर प्रसारित ख़बरों से फैलता है.
भारत में लोगों के बीच लोकतंत्र ख़ूब ज़िंदा है. हर दिन सरकार के खिलाफ ज़ोरदार प्रदर्शन हो रहे हैं, मगर मीडिया अब इन प्रदर्शनों की स्क्रीनिंग करने लगा है. इनकी अब ख़बरें नहीं बनती. उसके लिए प्रदर्शन करना, एक फालतू काम है. बगैर डेमॉन्स्ट्रेशन के कोई भी डेमोक्रेसी डेमोक्रेसी नहीं हो सकती है. इन प्रदर्शनों में शामिल लाखों लोग अब खुद वीडियो बनाने लगे हैं. फोन से बनाए गए उस वीडियो में खुद ही रिपोर्टर बन जाते हैं और घटनास्थल का ब्योरा देने लगते हैं, जिसे बाद में प्रदर्शन में आए लोगों के व्हॉट्सऐप ग्रुप में चलाया जाता है. इन्फॉरमेशन का मीडिया उन्हें जिस नागरिकता का पाठ पढ़ा रहा है, उसमें नागरिक का मतलब यह नहीं कि वह सरकार के खिलाफ नारेबाज़ी करे. इसलिए नागरिक अपने होने का मतलब बचाए रखने के लिए व्हॉट्सएप ग्रुप के लिए वीडियो बना रहा है. आंदोलन करने वाले सिटिज़न जर्नलिज़्म करने लगते हैं. अपना वीडियो बनाकर यूट्यूब पर डालने लगते हैं.
जब स्टेट और मीडिया एक होकर सिटिज़न को कंट्रोल करने लगें, तब क्या कोई सिटिज़न जर्नलिस्ट के रूप में एक्ट कर सकता है…? सिटिज़न बने रहने और उसके अधिकारों को एक्सरसाइज़ करने के लिए ईको-सिस्टम भी उसी डेमोक्रेसी को प्रोवाइड कराना होता है. अगर कोर्ट, पुलिस और मीडिया होस्टाइल हो जाएं, फिर सोसायटी का वह हिस्सा, जो स्टेट बन चुका है, आपको एक्सक्लूड करने लगे, तो हर तरह से निहत्था होकर एक नागरिक किस हद तक लड़ सकता है…? नागरिक फिर भी लड़ रहा है.
मुझे हर दिन व्हॉट्सएप पर 500 से 1,000 मैसेज आते हैं. कभी-कभी यह संख्या ज़्यादा भी होती है. हर दूसरे मैसेज में लोग अपनी समस्या के साथ पत्रकारिता का मतलब भी लिखते हैं. मेनस्ट्रीम न्यूज़ मीडिया भले ही पत्रकारिता भूल गया है, लेकिन जनता को याद है कि पत्रकारिता की परिभाषा कैसी होनी चाहिए. जब भी मैं अपना व्हॉट्सएप खोलता हूं, यह देखने के लिए कि मेरे ऑफिस के ग्रुप में किस तरह की सूचना आई है, मैं वहां तक पहुंच ही नहीं पाता. मैं हज़ारों लोगों की सूचना को देखने में ही उलझ जाता हूं, इसलिए मैं अपने व्हॉट्सएप को पब्लिक न्यूज़रूम कहता हूं. देशभर में मेरे नंबर को ट्रोल ने वायरल किया कि मुझे गाली दी जाए. गालियां आईं, धमकियां भी आईं. आ रही हैं, लेकिन उसी नंबर पर लोग भी आए. अपनी और इलाके की ख़बरों को लेकर. ये वे ख़बरें हैं, जो न्यूज़ चैनलों की परिभाषा के हिसाब से ख़त्म हो चुकी हैं, मगर उन्हीं चैनलों को देखने वाले ये लोग जब ख़ुद परेशानी में पड़ते हैं, तो उन्हें पत्रकार का मतलब पता होता है. उनके ज़हन से पत्रकारिता का मतलब अभी समाप्त नहीं हुआ है.
जब रूलिंग पार्टी ने मेरे शो का बहिष्कार किया था, तब मेरे सारे रास्ते बंद हो गए थे. उस समय यही वे लोग थे, जिन्होंने अपनी समस्याओं से मेरे शो को भर दिया. जिस मेनस्ट्रीम मीडिया ने सिटिज़न जर्नलिज़्म के नाम पर ज़र्नलिज़्म और सत्ता के खिलाफ बोलने वाले तक को आउटसोर्स किया था, जिससे लोगों के बीच मीडिया का भ्रम बना रहे, सिटिज़न के इस समूह ने मुझे मेनस्ट्रीम मीडिया में सिटिज़न जर्नलिस्ट बना दिया. मीडिया का यही भविष्य होना है. उसके पत्रकारों को सिटिज़िन जर्नलिस्ट बनना है, ताकि लोग सिटिज़न बन सकें.
ठीक उसी समय में, जब न्यूज़ चैनलों से आम लोग ग़ायब कर दिए गए, और उन पर डिबेट शो के ज़रिये पोलिटिकल एजेंडा थोपा जाने लगा, एक तरह के नैरेटिव से लोगों को घेरा जाने लगा, उसी समय में लोग इस घेरे को तोड़ने का प्रयास भी कर रहे थे. गालियों और धमकियों के बीच ऐसे मैसेज की संख्या बढ़ने लगी, जिनमें लोग सरकार से डिमांड कर रहे थे. मैं लोगों की समस्याओं से ट्रोल किया जाने लगा. क्या आप नहीं बोलेंगे, क्या आप सरकार से डरते हैं…? मैंने उन्हें सुनना शुरू कर दिया.
‘Prime Time’ का मिजाज़ (नेचर) बदल गया. हज़ारों नौजवानों के मैसेज आने लगे कि सेंट्रल गर्वनमेंट और स्टेट गर्वनमेंट सरकारी नौकरी की परीक्षा दो से तीन साल में भी पूरी नहीं करती हैं. जिन परीक्षाओं के रिज़ल्ट आ जाते हैं, उनमें भी अप्वाइंटमेंट लेटर जारी नहीं करती हैं. अगर मैं सारी परीक्षाओं में शामिल नौजवानों की संख्या का हिसाब लगाऊं, तो रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रहे नौजवानों की संख्या एक करोड़ तक चली जाती है. ‘Prime Time’ की ‘जॉब सीरीज़’ का असर होने लगा और देखते-देखते कई परीक्षाओं के रिज़ल्ट निकले और अप्वाइंटमेंट लेटर मिला. जिस स्टेट से मैं आता हूं, वहां 2014 की परीक्षा का परिणाम 2018 तक नहीं आया था. बस मेरा व्हॉट्सऐप नंबर पब्लिक न्यूज़रूम में बदल गया. सरकार और पार्टी सिस्टम में जब मेरे सीक्रेट सोर्स किनारा करने लगे, तब पब्लिक मेरे लिए ओपन सोर्स बन गई.
‘Prime Time’ अक्सर लोगों के भेजे गए मैसेज के आधार पर बनने लगा है. ये व्हॉट्सऐप का रिवर्स इस्तेमाल था. एक तरफ राजनीतिक दल का आईटी सेल लाखों की संख्या में सांप्रदायिकता और ज़ेनोफोबिया फैलाने वाले मैसेज जा रहे थे, तो दूसरी तरफ से असली ख़बरों के मैसेज मुझ तक पहुंच रहे थे. मेरा न्यूज़रूम NDTV के न्यूज़रूम से शिफ्ट होकर लोगों के बीच चला गया है. यही भारत के लोकतंत्र की उम्मीद हैं, क्योंकि इन्होंने न तो सरकार से उम्मीद छोड़ी है और न ही सरकार से सवाल करने का रास्ता अभी बंद किया है. तभी तो वे मेनस्ट्रीम में अपने लिए खिड़की ढूंढ रहे हैं. जब यूनिवर्सिटी की रैंकिंग के झूठे सपने दिखाए जा रहे थे, तब कॉलेजों के छात्र अपने क्लासरूम और टीचर की संख्या मुझे भेजने लगे. 10,000 छात्रों पर 10-20 शिक्षकों वाले कॉलेज तक मैं कैसे पहुंच पाता, अगर लोग नहीं आते. जर्नलिज़्म इज़ नेवर कम्प्लीट विदाउट सिटिज़न एंड सिटिज़नशिप. मीडिया जिस दौर में स्टेट के हिसाब से सिटिज़न को डिफाइन कर रहा था, उसी दौर में सिटिज़न अपने हिसाब से मुझे डिफाइन करने लगे. डेमोक्रेसी में उम्मीदों के कैक्टस के फूल खिलने लगे.
मुझे चंडीगढ़ की उस लड़की का मैसेज अब भी याद है. वह ‘Prime Time’ देख रही थी और उसके पिता TV बंद कर रहे थे. उसने अपने पिता की बात नहीं मानी और ‘Prime Time’ देखा. वह भारत के लोकतंत्र की सिटिज़न है. जब तक वह लड़की है, लोकतंत्र अपनी चुनौतियों को पार कर लेगा. उन बहुत से लोगों का ज़िक्र करना चाहता हूं, जिन्होंने पहले ट्रोल किया, गालियां दीं, मगर बाद में ख़ुद लिखकर मुझसे माफ़ी मांगी. अगर मुझे लाखों गालियां आई हैं, तो मेरे पास ऐसे हज़ारों मैसेज भी आए हैं. महाराष्ट्र के उस लड़के का मैसेज याद है, जो अपनी दुकान पर TV पर चल रहे नफरत वाले डिबेट से घबरा उठता है और अकेले कहीं जा बैठता है. जब घर में वह मेरा शो चलाता है, तो उसके पिता और भाई बंद कर देते हैं कि मैं देशद्रोही हूं. मेनस्ट्रीम मीडिया और आईटी सेल ने मेरे खिलाफ यह कैम्पेन चलाया है. आप समझ सकते हैं कि इस तरह के कैम्पेन से घरों में स्क्रीनिंग होने लगी है.
यह मैं इसलिए बता रहा हूं कि आज सिटिज़न जर्नलिस्ट होने के लिए आपको स्टेट और स्टेट की तरह बर्ताव करने वाले सिटिज़न से भी जूझना होगा. चुनौती सिर्फ स्टेट नहीं है, स्टेट जैसे हो चुके लोग भी हैं. सांप्रदायिकता और अंध-राष्ट्रवाद से लैस भीड़ के बीच दूसरे नागरिक भी डर जाते हैं. उनका जोखिम बढ़ जाता है. आपको अपने मोबाइल पर यह मैसेज देखकर घर से निकलना होता है कि मैसेज भेजने वाला मुझे लिंच कर देना चाहता है. आज का सिटिज़न दोहरे दबाव में हैं. उसके सामने चुनौती है कि वह इस मीडिया से कैसे लड़े. जो दिन-रात उसी के नाम पर अपना धंधा करता है.
हम इस मोड़ पर हैं, जहां लोगों को सरकार तक पहुंचने के लिए मीडिया के बैरिकेड से लड़ना ही होगा. वर्ना उसकी आवाज़ व्हॉट्सऐप के इनबॉक्स में घूमती रह जाएगी. पहले लोगों को नागरिक बनना होगा, फिर स्टेट को बताना होगा कि उसका एक काम यह भी है कि वह हमारी नागरिकता के लिए ज़रूरी निर्भीकता का माहौल बनाए. स्टेट को क्वेश्चन करने का माहौल बनाने की ज़िम्मेदारी भी सरकार की है. एक सरकार का मूल्यांकन आप तभी कर सकते हैं, जब उसके दौर में मीडिया स्वतंत्र हो. इन्फॉरमेशन के बाद अब अगला अटैक इतिहास पर हो रहा है, जिससे हमें ताकत मिलती है, प्रेरणा मिलती है. उस इतिहास को छीना जा रहा है.
आज़ादी के समय भी तो ऐसा ही था. बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, डॉ अम्बेडकर, गणेश शंकर विद्यार्थी, पीर मुहम्मद मूनिस – अनगिनत नाम हैं. ये सब सिटिज़न जर्नलिस्ट थे. 1917 ईस्वी में चंपारण सत्याग्रह के समय महात्मा गांधी ने कुछ दिनों के लिए प्रेस को आने से रोक दिया. उन्हें पत्र लिखा कि आप चंपारण सत्याग्रह से दूर रहें. गांधी ख़ुद किसानों से उनकी बात सुनने लगे. चंपारण में गांधी के आस-पास पब्लिक न्यूज़रूम बनाकर बैठ गई. वह अपनी शिकायतें प्रमाण के साथ उन्हें बताने लगी. उसके बाद भारत की आज़ादी की लड़ाई का इतिहास आप सबके सामने है.
मैं ऐसे किसी दौर या देश को नहीं जानता, जो ख़बरों के बग़ैर धड़क सकता है. किसी भी देश को ज़िंदादिल होने के लिए सूचनाओं की प्रामाणिकता बहुत ज़रूरी है. सूचनाएं सही और प्रामाणिक नहीं होंगी, तो नागरिकों के बीच का भरोसा कमज़ोर होगा. इसलिए एक बार फिर सिटिज़न जर्नलिज़्म की ज़रूरत तेज़ हो गई है. वह सिटिजन जर्नलिज्म, जो मेनस्ट्रीम मीडिया की कारोबारी स्ट्रेटेजी से अलग है. इस हताशा की स्थिति में भी कई लोग इस गैप को भर रहे हैं. कॉमेडी से लेकर इन्डिविजुअल यूट्यूब शो के ज़रिये सिटिजिन जर्नलिज़्म के एसेंस को ज़िंदा किए हुए हैं. उनकी ताकत का असर यह है कि भारत के लोकतंत्र में अभी सब कुछ एकतरफा नहीं हुआ है. जनता सूचना के क्षेत्र में अपने स्पेस की लड़ाई लड़ रही है, भले ही वह जीत नहीं पाई है.
रेमन मैगसेसे अवॉर्ड लेक्चर सीरीज़ में भाषण देते रवीश कुमार
महात्मा गांधी ने 12 अप्रैल, 1947 की प्रार्थनासभा में अख़बारों को लेकर एक बात कही थी. आज के डिवाइसिव मीडिया के लिए उनके प्रवचन काम आ सकते हैं. गांधी ने एक बड़े अख़बार के बारे में कहा, जिसमें ख़बर छपी थी कि कांग्रेस की वर्किंग कमेटी में अब गांधी की कोई नहीं सुनता है. गांधी ने कहा था कि यदि अख़बार दुरुस्त नहीं रहेंगे, तो फिर हिन्दुस्तान की आज़ादी किस काम की. आज अख़बार डर गए हैं. वे अपनी आलोचना को देश की आलोचना बना देते हैं, जबकि मैं मेनस्ट्रीम मीडिया और खासकर न्यूज़ चैनलों की आलोचना अपने महान देश के हित के लिए ही कर रहा हूं. गांधी ने कहा था – आप इन निकम्मे अखबारों को फेंक दें. कुछ ख़बर सुननी हो, तो एक दूसरे से पूछ लें. अगर पढ़ना ही चाहें, तो सोच-समझकर अख़बार चुन लें, जो हिन्दुस्तानवासियों की सेवा के लिए चलाए जा रहे हों. जो हिन्दू और मुसलमान को मिलकर रहना सिखाते हों. भारत के अखबारों और चैनलों में हिन्दू-मुसलमान को लड़ाने-भड़काने की पत्रकारिता हो रही है. गांधी होते, तो यही कहते, जो उन्होंने 12 अप्रैल, 1947 को कहा था और जिसे मैं यहां आज दोहरा रहा हूं.
आज बड़े पैमाने पर सिटिज़न जर्नलिस्ट की ज़रूरत है, लेकिन उससे भी ज्यादा ज़रूत है सिटिज़न डेमोक्रेटिक की…
DEMOCRACY NEED MORE CITIZEN JOURNALISTS, MORE THAN THAT, DEMOCRACY NEEDS DEMOCRATIC CITIZEN .
मैं NDTV के करोड़ों दर्शकों का शुक्रिया अदा करता हूं. NDTV के सभी सहयोगी याद आ रहे हैं. डॉ प्रणय रॉय और राधिका रॉय ने कितना कुछ सहा है. मैं हिन्दी का पत्रकार हूं, मगर मराठी, गुजराती से लेकर मलयालम और बांग्लाभाषी दर्शकों ने भी मुझे ख़ूब प्यार दिया है. मैं सबका हूं. मुझे भारत के नागरिकों ने बनाया है. मेरे इतिहास के श्रेष्ठ शिक्षक हमेशा याद आते रहेंगे. मेरे आदर्श महानतम अनुपम मिश्र को याद करना चाहता हूं, जो मनीला चंडीप्रसाद भट्ट जी के साथ आए थे. अनुपम जी बहुत ही याद आते हैं. मेरा दोस्त अनुराग यहां है. मेरी बेटियां और मेरी जीवनसाथी. मैं नॉयना के पीछे चलकर यहां तक पहुंचा हूं. काबिल स्त्रियों के पीछे चला कीजिए. अच्छा नागरिक बना कीजिए.
– रवीश कुमार
ट्रूथ एंड डेयर से
Ajit Anjum जी ने लिखा है कि :
"रवीश कुमार को कोसने वाले , गाली देने वाले अपनी कुंठा निकालकर भी उसकी लंबी लकीर को छोटा नहीं कर पाएंगे ..15 साल में रवीश ने सैकडों ऐसी स्टोरी की है ,जिसे TV वाले चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करते .उसने उन विषयों को उठाया है , जो इस लोकतंत्र में चौथे दर्जे के नागरिक की दर्दनाक कहानी है ..बदरंग ज़िंदगी की हकीकत है ..उसने खोड़ा कॉलोनियों की जमीनी हकीकत दिखाकर हुक्मरानों से सवाल किया है , उसने पचासों ऐसी स्पेशल स्टोरी की है , जो उसे बिना किसी अवार्ड के भी बहुत ऊपर उठा देता है .. 10 -15 साल पहले चाहता तो वो भी नेताओं के दरबार वाली पत्रकारिता का शॉर्टकट रास्ता पकड़ सकता था ,बहुत आसान था लेकिन उसने गांवों और गलियों की खाक छानी ..जब सारे चैनल TRP के बुलडोजर से NDTV पर चलने वाले उसके कॉन्टेंट को रौंद रहे थे तब भी वो खुद को जीरो TRP वाला एंकर कहकर अपने ही बनाए रास्ते पर चल रहा था ..
सत्ता के सामने लेटने और लोटने के हर दौर में रवीश कुमार जैसों का होना ज़रूरी है ..
चाटूकारिता का रिकॉर्ड बनाकर पत्रकारिता को सत्ता की बांदी बनाने के हर दौर में रवीश कुमार जैसों का होना ज़रूरी है ..
जब पत्रकारों की बड़ी फौज किसी सत्ता के लिए मुनादी ब्रिगेड का काम करने लगे तो ऐसी आवाज़ें भी ज़रूरी हैं ..
जब 10 बार चाटूकारिता करके एक बार निष्पक्षता का ढोंग करने का दौर हो तो ऐसे पत्रकार भी ज़रूरी हैं ..
कई बार रवीश से असहमत रहा हूं .आज भी होता हूँ . कई बार लगता है कि वो भी अतिवादी हो जाते हैं कई मामलों में, लेकिन जब चाटूकारिता का अतिवाद हिमालय से ऊंचा हो चुका हो तो रवीश कुमार जैसों का होना ज़रूरी है ..
मैं कभी उसके दोस्तों की दुनिया का हिस्सा भी नहीं रहा लेकिन मानने में गुरेज नहीं कि पत्रकारिता में तनकर खड़े रहने के लिए नैतिक ताकत चाहिए .. दरबारी ऐसा नहीं कर सकते . चाहे किसी दौर के दरबारी हों ..
हां , हिन्दू -मुसलमान वाली पत्रकारिता को लेकर वो हमेशा मुखर रहा है . आप उसके कहे से असहमत होने और गाली देकर खारिज करने से पहले कुछ शाम तो गुजारिए चैनलों के सामने ..
आज Ravish Kumar को बधाई देने का दिन है .. और उसकी तारीफ में कुछ लिखकर मेरे लिए गाली खाने का भी दिन है ..
तो स्वागत है आपका .."
~विजय राजबली माथुर ©
Tuesday, September 3, 2019
रिजर्व बैंक ने दांव पर लगाया अपना भविष्य ------ भरत झुनझुनवाला
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| http://epaper.navbharattimes.com/details/57310-77040-2.html |
संकटकालीन बचत का एक हिस्सा सरकार को देकर सरकार के बैंकर ने अपने हाथ बांध लिए हैं
व्यापारी अपने प्रॉफिट का एक हिस्सा ‘रिजर्व’ में डालता है, जैसे बैंक के फिक्स्ड डिपॉजिट में अथवा सोना खरीदने में। इस रकम का उपयोग वह संकट के समय करता है। प्रॉफिट के दूसरे हिस्से से व्यापारी अपने घर का खर्च चलाता है या दुकान को बढ़ाता है या किसी और काम में निवेश करता है। व्यापारी को तय करना होता है कि मुनाफे में से कितना अंश वह रिजर्व में रखेगा और कितना अंश वर्तमान में खपत अथवा निवेश के लिए उपयोग करेगा। इसी तरह रिजर्व बैंक को हर साल प्रॉफिट होता है। उस प्रॉफिट का एक हिस्सा रिजर्व बैंक रिजर्व में डाल देता है जैसे सोना, विदेशी बांड, सरकारी बांड अथवा अन्य निवेशों में। इस निवेश का उपयोग रिजर्व बैंक किसी भी संभावित संकट के समय कर सकता है। प्रॉफिट का शेष अंश वह भारत सरकार को लाभांश के रूप में दे सकता है।• तरल पूंजी नहीं
संकट के समय यह प्रक्रिया पलट जाती है। रिजर्व बैंक पूर्व में बनाए गए रिजर्व से पैसा निकाल कर देश की अर्थव्यवस्था को संभालने में उसका उपयोग कर सकता है। जैसे बैंकों पर यदि संकट आया तो उन्हें मदद देने के लिए रिजर्व बैंक अपने रिजर्व का इस्तेमाल कर सकता है। पिछले पांच वर्षों में रिजर्व बैंक ने अपने रिजर्व में धन डालना बंद कर दिया है। वर्ष 2012 में रिजर्व बैंक ने 27,000 करोड़ रुपये रिजर्व में डाले, वर्ष 2013 में 28,000 करोड़ रुपये डाले लेकिन वर्ष 2014 के बाद रिजर्व बैंक ने अपने रिजर्व में रकम डालना पूर्णतया बंद कर दिया है। इतना ही नहीं, जो रिजर्व थे, उनमें से 52,000 करोड़ की रकम निकालकर भी इस वर्ष सरकार को दे दिया है।
रिजर्व बैंक ने आकलन किया कि उसके पास जरूरत से अधिक रिजर्व उपलब्ध हैं और उस अनावश्यक रिजर्व को उसने भारत सरकार को दे दिया। भारत सरकार ने रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर बिमल जालान की अध्यक्षता में एक कमेटी बनायी थी, जिसने कहा था कि रिजर्व बैंक को अपनी कुल पूंजी का 24.5 से 20.0 प्रतिशत तक रिजर्व रखना चाहिए। वर्तमान में रिजर्व बैंक के रिजर्व 23.3 प्रतिशत थे। ये जालान समिति द्वारा बताए गए दायरे में थे लेकिन रिजर्व बैंक ने निर्णय किया कि इन्हें 23.3 प्रतिशत से घटाकर 20.0 प्रतिशत के न्यूनतम स्तर पर ले जाया जाए। ऐसा करने पर बची 52,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त रकम को रिजर्व बैंक ने इस वर्ष भारत सरकार को हस्तांतरित किया है। रिजर्व बैंक दवारा अपने रिजर्वों को पर्याप्त मानने के पीछे उसकी सोच में आया एक मौलिक परिवर्तन है।
भारतीय रिजर्व बैंक के रिजर्व दो प्रकार के होते हैं। पहला सोना, अमेरिकी सरकार के बांड, विदेशी करेंसी इत्यादि हैं। दूसरी श्रेणी में भारत सरकार के बांड अथवा अन्य घरेलू निवेश आते है। इनमें पहले प्रकार के रिजर्व को वास्तविक रिजर्व मानने में संकट है क्योंकि इन्हें तात्कालिक आवश्यकता के अनुसार नगदी में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। जैसे भारी मात्रा में सोना बेचने से अंतराष्ट्रीय बाज़ार में सोने के दाम गिर जाएंगे। कुछ वर्ष पूर्व कई देशों ने अपने सोने का भंडार बेचा था और विश्व बाजार में सोने के दाम गिर गए थे।
निकट भविष्य में अगर कभी ऐसी नौबत आई तो इन रिजर्व की वास्तविक कीमत आज से बहुत कम हो जाएगी। अमेरिकी सरकार के बांड बेचने से भारत और अमेरिका के सामरिक संबंधों पर प्रभाव पड़ेगा। इसलिए इन पूंजियों को तरल नहीं माना जा सकता है। पर इन्हें ही रिजर्व मानकर रिजर्व बैंक ने अपने रिजर्वों की मात्रा कम कर दी है जिससे कि वह सरकार को अधिक से अधिक रकम मुहैया करा सके।
रिजर्व बैंक के इस कदम से कई प्रकार के संकट उत्पन्न हो गए हैं। पहली बात यह कि अब तक प्रॉफिट का एक हिस्सा भविष्य के संकटों को संभालने के लिए रिजर्व में डाला जाता रहा है। अब उस नीति को पलटकर पूर्व में अर्जित रिजर्व का उपयोग वर्तमान खर्चों को पोषित करने के लिए किया जाने लगा है। जैसे व्यापारी घर के सोने को बेच कर फाइव स्टार होटल में ऐयाशी करे। यह देश की अर्थव्यवस्था के संकट को इंगित करता है।
दूसरे, पिछले पांच वर्षों में सरकार को रिजर्व बैंक से मिले लाभांश का उपयोग सराहनीय नहीं रहा है। सरकार ने अपने कुल घाटे यानी वित्तीय घाटे में सराहनीय कटौती हासिल की है। हमारा कुल घाटा जीडीपी का सात प्रतिशत था जो वर्तमान में लगभग तीन प्रतिशत हो गया है। लेकिन यह कमी मुख्यत: पूंजी खर्चों में कटौती करके हासिल की गई है। पूंजी खर्चों में कटौती से तीन प्रतिशत वित्तीय घाटा कम हुआ है जबकि चालू खर्चों में कटौती से केवल एक प्रतिशत कम हुआ है।
यह बताता है कि सरकार अपने चालू खर्चों पर नियंत्रण करने में नाकाम है और इन्हें पोषित करने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा वितरित लाभांश का उपयोग किया जाएगा।
तीसरे, जालान कमिटी ने 24.5 से 20.0 प्रतिशत तक रिजर्व रखना उचित माना था, लेकिन रिजर्व बैंक ने इसको मध्य स्तर पर रखने के स्थान पर न्यून स्तर पर रखा है, यानी हमारा सुरक्षा कवच न्यून हो गया है।
चौथे, रिजर्व का विदेशी हिस्सा त्वरित रूप से नगद में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है, इसलिए संकट के समय देश की परिस्थिति और गंभीर हो जाएगी।
• क्षितिज पर संकट :
पांचवें, वर्तमान अर्थव्यवस्था में कई प्रकार के संकट क्षितिज पर दिख रहे हैं। पकिस्तान से हमारे संबंध बिगड़ रहे हैं, ईरान से सस्ता तेल आयात करने में संकट है, बैंकों के खटाई में पड़े लोन बढ़ रहे हैं, अर्थव्यवस्था में मंदी बढ़ रही है, इत्यादि। इन परिस्थितियों से जूझने के लिए हमें रिजर्व की अधिक जरूरत पड़ेगी न कि कम। सरकार ने अपने तात्कालिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए रिजर्व बैंक को इस दिशा में प्रेरित किया है और सरकार के दबाव में रिजर्व बैंक ने देश के भविष्य को दांव पर लगाया है।
~विजय राजबली माथुर ©
Thursday, August 29, 2019
अब ताकत में हैं, तो इतिहास की किताबें बदल रहे है ------ मनीष सिंह / रश्मि त्रिपाठी
Rashmi Tripathi
August 26 at 8:49 AM1757 में प्लासी की लड़ाई के पचास साल बाद तक अंग्रेजो ने भारत की सामाजिक व्यवस्था को छुवा नही। पर जब यकीन होने लगा, की यहां उनको लम्बा टिकना है तब अपने सेवक तैयार करने की जरूरत महसूस हुई।
1813 में कम्पनी के बजट में एक लाख रुपए शिक्षा के लिए रखे गए। कम्पनी सरकार को स्किल डेवलपमेंट करना था ताकि सस्ते पीए, मुंशी, स्टोरकीपर, अर्दली, मुंसिफ और डिप्टी कलेक्टर मिल सकें।
कलकत्ता, बम्बई और मद्रास में यूनिवर्सिटी खुली। कलकत्ता यूनिवर्सिटी की जो पहली बैच के ग्रेजुएट निकले, उनमे बंकिम चन्द्र चटर्जी थे। वही सुजलाम सुफलाम, मलयज शीतलाम वाले .. । अंग्रेजी पढ़े छात्र आनन्दमठ लिखने लगे, तो खेल कम्पनी सरकार के हाथ से फिसलने लगा।
दरअसल इंडियन्स ने अंग्रेजी पढ़ी,तो वैश्विक ज्ञान के दरवाजे खुले। नए नवेले पढ़े लिखो ने योरोपियन सोसायटी को देखा, उनके विचारको की किताबें पढ़ी। लिबर्टी, सिविल राइट, डेमोक्रेसी, होमरूल .. जाने क्या क्या।
कुछ तो लन्दन तक गए, बैरिस्टरी छान डाली और अंग्रेजो को कानून सिखाने लगे। कुछ सिविल सर्विस में आ गए, कुछ ने अखबार खोल लिया। दादा भाई नोरोजी ब्रिटिश संसद में पहुंच गए "अधिकार" मांगने लगे। सरकारों को जब जनता की समझ और ज्ञान से डर लगे तो लोगो को लड़वाना शुरू करती हैं। समुदायों को फेवर और डिसफेवर इसके औजार होते हैं।
1857 की क्रांति के लिए अंग्रेजो ने मुस्लिम शासकों को दोषी माना, और लगभग इग्नोर किया। हिन्दू राजे और बौद्धिको पर सरकार के फेवर रहे। जनता के असन्तोष के सेफ पैसेज के लिए एक सभा बनवा दी, जिसमे देश भर के सभी ज्ञानी ध्यानी आते, अपनी मांग रखते, सरकार दो चार बातें मान लेती।
सभा को इंग्लिश में "कांग्रेस" कहते है। सालाना बैठक को कांग्रेस का अधिवेशन कहा जाता। इस कॉंग्रेस में हिन्दू ज्यादा संख्या में थे। आबादी के हिसाब से स्वाभाविक था, पर जो अब तक राज में थे, उनमे कुंठा बढ़ी।
सैयद अहमद खान ने कौम को समझाया- अंग्रेज़ी पढ़ो, सरकार में घुसो। वरना जो अपर हैंड पांच सात सौ सालों से है, खत्म हो जाएगा। आज के लीडरान की तरह बात सिर्फ ज़ुबानी नही थी। एक कॉलेज खोला, शानदार ... जो अपने वक्त से काफी आगे का था। मुस्लिम जनता ने मदद की, मगर ज्यादा मदद नवाबो से आई। उच्चवर्गीय मुस्लिम और नवाब एक साथ आये।
नवाबो को इसका एक नया फायदा मिला। ताकतवर होती कांग्रेस में रियाया के लोग थे, कई मांगे ऐसी रखते थे जिनमे उनकी जेब कटती थी। सैय्यद साहब और उनके सम्भ्रांत साथी, नवाबो के हित-अहित से जुड़ी मांगों पर दबाव बनाते थे। 1906 आते आते उन्ही के बीच से मुस्लिम लीग बनी। ढाका नवाब चेयरमैन हुए, भोपाल नवाब सचिव। बंगाल विभाजन हुआ था। कांग्रेस बंग-भंग के विरोध में थी, लीग ने समर्थन किया। मुस्लिम अब अंग्रेजो के प्यारे हो चले थे।
रह गए हिन्दू राजे रजवाडे। कांग्रेस का फेवर पाते नही थे, अंग्रेज सुनते नही थे। अपना कोई जनसंघठन न था। कुछ करने की उनकी बारी थी। तो देश भर में कई छोटे छोटे संगठन थे, जो हिन्दू पुनर्जागरण और सामाजिक सुधार कर रहे थे। बहुतेरी हिन्दू सभाएं-संस्थाये थी। जोड़ने वाला कोई चाहिए था। मिला- पण्डित मदन मोहन मालवीय।
पंडितजी ने अलीगढ़ से बड़ा, बेहतर, हिन्दू विश्वविद्यालय का बीड़ा उठाया था। जनता के बीच जा रहे थे। राजाओ ने खुलकर दान दिया, सभाएं करवायीं। मालवीय साहब पूरे देश मे घूमे, हिन्दू संगठनों को एक छतरी तले लेकर आये। काशी हिन्दू विश्विद्यालय बना , और अखिल भारतीय हिन्दू महासभा भी बन गयी। यह 1915 का वर्ष था। अब तीन संगठन अस्तित्व में आ चुके थे।
पहला, कामन पीपुल के लिए बात करने वाली कांग्रेस, जो सिविल लिबर्टी, इक्वलिटी, सेकुलरिज्म की बात करती थी। इसको ताकत जनता से मिलती थी, धन मध्यवर्ग के साथ नए जमाने के उद्योगपति व्यापारी पूंजीपतियों से मिलता था। इसके नेता भारत के भविष्य को ब्रिटेन के बर-अक्स देखते थे।
दूसरी ताकत, मुस्लिम समाज, उसके धार्मिक सांस्कृतिक विशेषाधिकार की पैरोकार मुस्लिम लीग, जिसकी ताकत मुस्लिम कौम थी, और फंडिग नवाबो, निज़ामों की थी। ये भारत का सपना उस मुगलकाल के बर-अक्स देखते थे, जिसमे सारी ताकत उनके हाथ मे थी।
तीसरी ताकत, हिन्दू समाज, उसके धार्मिक सांस्कृतिक विशेषाधिकार की पैरोकार और हिन्दू रजवाड़ों के हितों को ध्यान रखने करने वाली महासभा थी। जिसके लिए भारत का भविष्य मौर्य काल से लेकर शिवाजी की हिन्दू पादशाही के बीच झूलता था।
आगे चलकर अंग्रेज चुनावी सुधार करते हैं, सत्ता में भागीदारी खुलनी शुरू हो जाती है। मार्ले मिंटो सुधार और 1935 के इंडिया गवर्नेस एक्ट के आने के साथ, तीनो प्रेशर ग्रुप चुनावी दलों के रूप में तब्दील हो जाते हैं।
समय के साथ नए नेता इन संगठनो की लीडरशीप लेते हैं। ये गांधी, जिन्ना और सावरकर की धाराएं हो जाती हैं। दो धाराएं देश की घड़ी को, अपने अपने तरीके से पीछे ले जाना चाहती थी, एक आगे की ओर...।। पीछे ले जाने वाली धाराएं मिलकर विधानसभाओं में मिलकर सरकारें बनाती हैं, और सड़कों पर अपने समर्थकों से दंगे भी करवाती हैं। सत्ता की गंध से संघर्ष में खून का रंग मिल जाता है।
1947 में इस रंग ने भारत का इतिहास ,भूगोल , नागरिकशास्त्र, सब बदल दिया। एक धारा पाकिस्तान चली गयी, मगर अवशेष बाकी है। दूसरी सत्ता में बैठे बैठे सड़ गयी, उसके भी अवशेष ही बाकी हैं। तीसरी पर गांधी के लहू के छींटे थे। बैन लगा, तो चोला बदल लिया, नाम बदल लिया। अब ताकत में हैं, तो इतिहास की किताबें बदल रहे है। अजी हां, स्किल डेवलमेंट पर भी फोकस है।
उधर कलकत्ता, अलीगढ़ और बनारस की यूनिवर्सिटीज आज भी खड़ी हैं। लेकिन हिंदुस्तान का मुस्तकबिल बनाने वाले छात्र नदारद हैं।
Manish Singh
साभार :
https://www.facebook.com/rashmi.tripathi.73113/posts/1362771200565084
~विजय राजबली माथुर ©
Wednesday, August 28, 2019
जम्मू-कश्मीर में आगे कैसे होगा विकास ------ अजेय कुमार
*जम्मू-कश्मीर ने अपनी उलझी राजनीतिक परिस्थितियों और सीमा पार से आतंकी घुसपैठ के बावजूद कई हिंदीभाषी राज्यों से बेहतर प्रदर्शन किया है
** अब तक यानी 5 अगस्त, 2019 तक, जब अनुच्छेद 370 लागू था, कश्मीर के विकास संबंधी आंकड़े क्या दर्शाते हैं। जम्मू-कश्मीर न केवल मानव विकास सूचकांकों में अन्य राज्यों के साथ कदम मिलाकर चलता रहा है, बल्कि साक्षरता, औसत आयु, पांच साल तक के बच्चों की मृत्यु दर, स्कूली शिक्षा, न्यूनतम मजदूरी आदि कई संकेतकों में वह उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और बहु-प्रचारित विकास मॉडल वाले राज्य गुजरात से बेहतर स्थिति में रहा है।
***यह तब है जब पिछले वर्षों में अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे विशेष दर्जा वाले राज्यों के मुकाबले जम्मू-कश्मीर को दी गई केंद्रीय सहायता एक-तिहाई से भी कम रही है।
****इसलिए यह कहना कि अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू-कश्मीर में विकास अवरुद्ध रहा है, गलत है।
***** पूरे देश में जब कोई विकास नहीं हुआ तो भला जम्मू-कश्मीर में विकास कैसे संभव है, जब देश के कर्ता-धर्ता हर जगह एक से ही होंगे।
जब पूरी अर्थव्यवस्था में ही सुस्ती है तो घाटी में निवेश कहां से आएगा और रोजगार कैसे बढ़ेंगे ------
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| http://epaper.navbharattimes.com/details/55923-77248-2.html |
पिछले दिनों संसद में गृह मंत्री अमित शाह ने कश्मीर और अनुच्छेद 370 पर दिए अपने भाषण में कहा- ‘अनुच्छेद 370 के कारण कश्मीर घाटी के लोग गुरबत में रह रहे थे।’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि 370 खत्म होने से प्रदेश का विकास होगा और लोगों को रोजगार मिलेगा। आइए देखें, अब तक यानी 5 अगस्त, 2019 तक, जब अनुच्छेद 370 लागू था, कश्मीर के विकास संबंधी आंकड़े क्या दर्शाते हैं। जम्मू-कश्मीर न केवल मानव विकास सूचकांकों में अन्य राज्यों के साथ कदम मिलाकर चलता रहा है, बल्कि साक्षरता, औसत आयु, पांच साल तक के बच्चों की मृत्यु दर, स्कूली शिक्षा, न्यूनतम मजदूरी आदि कई संकेतकों में वह उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और बहु-प्रचारित विकास मॉडल वाले राज्य गुजरात से बेहतर स्थिति में रहा है।• विशेष दर्जे के लाभ :
गरीबी रेखा के सरकारी आंकड़ों को देखें तो पूरे देश में 21 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे है, जबकि जम्मू-कश्मीर में केवल 10 प्रतिशत लोग ही गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करते हैं। 2001 में प्रदेश की साक्षरता दर 55.52 फीसदी थी जो 2011 में बढ़कर 68.74 हो गई। जहां तक महिलाओं द्वारा अपने बैंक खाते खुलवाने का प्रश्न है, अखिल भारतीय स्तर पर यह संख्या 2005-06 में 15.5 प्रतिशत थी, जो 2015-16 में बढ़कर 53 प्रतिशत हो गई, जबकि जम्मू-कश्मीर में यह 22 प्रतिशत से बढ़कर 60 प्रतिशत हो गई जो कि गुजरात के समान है और कई उत्तर भारतीय राज्यों से ज्यादा है। गर्भ निरोधकों का इस्तेमाल जम्मू-कश्मीर में 57 प्रतिशत जनता करती है, जबकि गुजरात में यह आंकड़ा मात्र 46.9 है। 5 वर्ष से कम आयु की औसत शिशु मृत्यु दर जम्मू-कश्मीर में 35 प्रति हजार है जबकि गुजरात में 36.5 प्रति हजार। इसी तरह बिजली, स्वच्छ पेयजल, साफ-सफाई और खाना बनाने में पर्यावरण-अनुकूल ईंधन के इस्तेमाल में भी जम्मू व कश्मीर छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश और झारखंड जैसे कई राज्यों से कहीं बेहतर है।
यह तब है जब पिछले वर्षों में अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे विशेष दर्जा वाले राज्यों के मुकाबले जम्मू-कश्मीर को दी गई केंद्रीय सहायता एक-तिहाई से भी कम रही है। इसलिए यह कहना कि अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू-कश्मीर में विकास अवरुद्ध रहा है, गलत है। बल्कि जम्मू-कश्मीर ने अपने तमाम राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों और सीमा पार से आतंकी घुसपैठ के बावजूद कई हिंदीभाषी राज्यों से बेहतर प्रदर्शन करके दिखाया है। इसके पीछे, सबसे बड़ा कारण शेख अब्दुल्ला द्वारा राज्य में भूमि सुधारों को लागू करना है, जिससे साधारण जनता की आमदनी बढ़ी और उसके परिणाम स्वरूप सारे विकास संकेतकों में सुधार हुआ। भारत में वामपंथी शासन वाले राज्यों केरल, प. बंगाल, त्रिपुरा और कुछ हद तक कर्नाटक को छोड़कर अन्य किसी भी राज्य में भूमि सुधार लागू नहीं किए गए। इसके विपरीत शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में सबसे पहले जम्मू-कश्मीर में जमीदारों की जमीनें बिना उनको कोई मुआवजा दिए किसानों को बांटी गई।
इससे पहले राज्य के कुल सिंचित क्षेत्र का अधिकांश भाग महाराजा और उनके चेले-चपाटों के हाथ में था। शेख अब्दुल्ला के प्रयासों के कारण ही जम्मू-कश्मीर में मात्र दो प्रतिशत से कम परिवार भूमिहीन हैं जबकि देश के अन्य भागों में कुल ग्रामीण परिवारों का एक तिहाई हिस्सा भूमिहीनों का है। यह संभव हो पाया अनुच्छेद 370 के कारण, जिसके चलते जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान के दायरे से कुछ हद तक बाहर रहने का विशेषाधिकार हासिल था। शेष भारत में कानून था कि सरकार जमींदारों को मुआवजा दिए बिना उनकी जमीन का अधिग्रहण नहीं कर सकती थी। 26 मार्च, 1952 को जम्मू व कश्मीर संविधान सभा ने बिना किसी मुआवजे के सभी बड़ी-बड़ी जागीरें जब्त कर लीं। यह नीति कांग्रेस और केंद्र सरकार की नीति के भी उलट थी।
भूमि-सुधारों का असर राज्य के सामाजिक ताने-बाने और भूमि वितरण पर तो पड़ा ही, इससे वहां आय की असमानताओं पर भी थोड़ा अंकुश लगा। 2010-11 में जम्मू-कश्मीर में ग्रामीण गरीबी अनुपात 8.1 प्रतिशत था, जबकि पूरे देश के लिए यह 33.8 फीसदी था। जम्मू-कश्मीर राज्य में भारत के कुल सेब उत्पादन का 77 प्रतिशत पैदा होता है। आम लोगों की धारणा यह है कि जम्मू-कश्मीर में पर्यटन के अलावा कुछ नहीं है जबकि यहां कई प्रकार के खनिज काफी बड़ी मात्रा में पाए जाते हैं। जैसे चूना पत्थर, संगमरमर, जिप्सम, ग्रेनाइट, बॉक्साइट, डोलोमाइट, कोयला, सीसा इत्यादि। देश के उद्योगपतियों की नजरें इन पर हैं। उन्हें कश्मीर सोने की खान लग रहा है। कश्मीर की जमीन की उन्हें बड़ी फिक्र है, कश्मीरियों की नहीं।
आज जब कश्मीर के विकास के बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाए जा रहे हैं, तब प्रश्न उठता है कि कश्मीर को छोड़कर भारत के अन्य भागों में पूंजी-निवेश, रोजगार और तथाकथित विकास का हाल कैसा है/ सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में बेरोजगारी की दर पिछले 45 वर्षों में सबसे ऊपर है। ऑटोमोबाइल सेक्टर का कहना है कि मंदी के कारण उसे 3 लाख 50 हजार श्रमिकों की छंटनी करनी होगी। मोबाइल हैंडसेट बनाने वाली कंपनियां भी यही करने जा रही हैं। मंदी का आलम यह है कि 5 रुपये के बिस्कुट के पैकेट बेचने वाली पार्ले ने 10,000 मजदूरों को निकालने की धमकी दी है। शिवसेना ने हाल ही में केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि पिछले वर्षों की आर्थिक-औद्योगिक नीतियों के कारण लगभग 2 करोड़ नौकरियां खत्म हो चुकी हैं।
• बढ़ती हुई मंदी :
जब हर जगह तमाम छोटे-बड़े कारखाने बंद हो रहे हों तो यह उम्मीद करना कि कश्मीर में नए कारखाने खुलने वाले हैं, एक दिवास्वप्न ही हो सकता है। पिछले 5 वर्षों में पूरे भारत में एक भी नया सरकारी विश्वविद्यालय नहीं खुला, एकाध नमूनों को छोड़कर एक भी नई रेलगाड़ी नहीं चली, एक भी नए हवाई अड्डे की स्थापना नहीं हुई। पूरे देश में जब कोई विकास नहीं हुआ तो भला जम्मू-कश्मीर में विकास कैसे संभव है, जब देश के कर्ता-धर्ता हर जगह एक से ही होंगे।
http://epaper.navbharattimes.com/details/55923-77248-2.html
~विजय राजबली माथुर ©
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