Wednesday, September 14, 2011

जन-भाषा हिन्दी

'हिन्दी' को भारत की राष्ट्र भाषा /राज भाषा का दर्जा प्राप्त है परंतु व्यवहार मे अभी भी हिन्दी अपना स्थान नहीं प्राप्त कर सकी है। प्रति वर्ष 14 सितंबर को 'हिन्दी दिवस' के रूप मे मनाया जाता है क्योंकि संविधान सभा ने इसी दिन इसे राष्ट्र भाषा बनाने का प्रस्ताव पारित किया था। आज कल हमारे देश मे दिखावा और तड़क -भड़क को अतीव महत्व दिया जाने लगा है जिस कारण कुछ लोग हिन्दी सप्ताह एवं कुछ हिन्दी पखवाड़ा भी मनाते हैं।


हिन्दी को खतरा हिन्दी भाषियों से

27 अगस्त को सुविख्यात ब्लागर डा ज़ाकिर अली रजनीश साहब ने 'तसलीम ' और उ प्र हिन्दी संस्थान द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित 'हिन्दी मे नव बाल साहित्य लेखन' गोष्ठी मे बुलाया था ,हम गए थे और विद्वानों के विचारों को सुना था। दिल्ली से पधारे डा श्याम सिंह 'शशि' जी ने चिंता व्यक्त की थी कि आज हिन्दी को खतरा हिन्दी वालों से ही है। उन्होने बताया कि 'मैथिली' को संविधान की आठवीं सूची मे स्थान मिल चुका है और 'राजस्थानी','हरियाणवी','गढ़वाली,''छत्तीसगढ़ी','भोजपुरी','संथाली''बुंदेलखंडी' आदि बोलियों को भी संविधान की आठवीं सूची मे डालने की मांग उठ रही है। उनके अनुसार ऐसा हो जाने पर हिन्दी केवल उ प्र की ही भाषा रह जाएगी और यदि 'अवधी'तथा 'ब्रज' को भी आठवीं सूची मे डालने की मांग हो जो ज्यादा समृद्ध भी हैं तो हिन्दी कहीं बचेगी ही नहीं। उनका मत है कि यह सब हिन्दी को राष्ट्र भाषा के दर्जे से हटाने का षड्यंत्र है। तमिलनाडू जहां कभी हिन्दी का मुखर विरोध था अब हिन्दी को प्रोत्साहन दे रहा है। बांग्ला के रवीन्द्र नाथ टैगोर,नेताजी सुभाष चंद्र बॉस  ,तमिल के सुब्रमनियम भारती,गुजराती के स्वामी दयानंद सरस्वती एवं महात्मा गांधी मराठी के  तिलक ,पंजाबी के लाला लाजपत राय आदि ने हिन्दी को महत्व दिया था जिस कारण संविधान सभा ने 'हिन्दी' को राष्ट्र भाषा/राज भाषा स्वीकृत किया था।

जनता पार्टी सरकार के विदेश मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ मे हिन्दी मे सर्व-प्रथम भाषण दिया था। आज हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त है। परंतु हिन्दी भाषी लोग ही क्षुद्र स्वार्थों के चलते विभिन्न बोलियों को भाषा का दर्जा दिलाने की मांग करके हिन्दी के महत्व को कम कर रहे हैं। 'हिन्दी दिवस' मनाते समय यह भी संकल्प लिया जाये कि हिन्दी के मान-सम्मान को कम नहीं होने दिया जाएगा।

28/08/2011-Hindustan-Lucknow
रोमन हिन्दी

11 सितंबर को कर्मठ ब्लागर द्वय रणधीर सिंह 'सुमन' जी एवं रवीन्द्र प्रभात जी ने 'समाज मे न्यू मीडिया की भूमिका' नामक गोष्ठी मे बुलाया था । हमने विद्वानों के विचार सुने,एक विद्वान ने हिन्दी को रोमन लिपी मे लिखने का सुझाव दिया जिसे दूसरे विद्वानों ने उचित नहीं बताया। हिंदुस्तान ,लखनऊ के 12 ता की इस समाचार से संबन्धित स्कैन प्रस्तुत है-

12/09/2011-Hindustan-Lucknow


आजादी से पहले हिन्दी स्व-स्वाभिमान की भाषा थी। क्रांतिकारियों तथा सत्याग्रहियों दोनों ने हिन्दी को जन-जन तक फैलाया था और आज भी 'हिन्दी' 'जन-भाषा' ही है। क्षेत्र वादी,विदेश से सहाता प्राप्त एन जी ओज आदि मिल कर हिन्दी को क्षीण करके इसे राष्ट्र भाषा/राज भाषा के दर्जे से हटाना चाहते हैं। हमे इस दुष्चक्र से सावधान रहने की आवश्यकता है। कारपोरेट कंपनियाँ हिन्दी का एक विकृत रूप पेश कर रही हैं उससे भी सचेत रहना होगा। आज हिन्दी दिवस पर हम हिन्दी के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे को निर्मूल करने का संकल्प लेकर उस   की रक्षा,संरक्षण एवं संवर्धन करने का प्रयास् करें तभी हमारा 'हिन्दी दिवस' मनाना सार्थक हो सकता है।

7 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

हिंदी का मान बना रहे ..... हमारा स्वाभिमान बना रहे.... सुंदर पोस्ट

डॉ टी एस दराल said...

सरकार हिंदी को प्रोत्साहन तो दे रही है । लेकिन कितना कामयाब होंगे , कहना मुश्किल है । क्षेत्रीय भाषाओँ से हिंदी को खतरा नहीं होना चाहिए ।

Dr (Miss) Sharad Singh said...

बहुत अच्छा मुद्दा उठाया आपने...
पूर्वाग्रह त्याग कर इस पर सभी को विचार करना चाहिए...

मनोज कुमार said...

हिंदी के समक्ष मुख्यत: दो चुनौतियां हैं – पहली भूमंडलीकरण के विरुद्ध सार्थक प्रतिरोध दर्ज करने की और दूसरी नवसाक्षरों में उभरी चेतना के उबाल को किन्हीं बड़े मूल्यों से जोड़ने की।
हिंदी तो दो पाटों को जोड़ता पुल है। इसी कारण से इसे उस भाषा की अनुगामिनी बनने की नियति प्रदान की गई जिसके खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में हिंदी तन कर खड़ी हुई थी।

Vijai Mathur said...

मनोज कुमार जी की बात 'मुद्रा राक्षस'जी के विचारों का समर्थन कर रही है। परंतु डा द्राल की बात 400 पुस्तकों के रचयिता और विदेश-भ्रमण रतविद्वान डा श्याम सिंह 'शशि' की बात को झुठला रही है। मै तो डा 'शशि' के सामने कुछ भी नहीं हूँ अतः उनकी बात का प्रतिवाद नहीं कर सकता। एक नौजवान ब्लागर ने अभद्र,असभ्य,बर्बर शब्दों मे उनकी बात पर प्रहार किया था उसकी टिप्पणी भी प्रकाशित नहीं की है। वैसे डा शशि की बात से सहमत भी हूँ।

Maheshwari kaneri said...

विजय जी आप ने सही मुद्दा उठाया है..हिन्दी भाषा को पूर्ण रुपेण सम्मान मिलना ही चाहिए......

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सार्थक चिंतन ..