Monday, April 22, 2013

व्लादिमीर इलीइच लेनिन : जयंती पर स्मरण ---विजय राजबली माथुर

 
व्लादिमीर इलीइच लेनिन (1870-1924)


एक विद्यालय निरीक्षक पिता की संतान थे "उल्यानोव"उर्फ व्लादिमीर इलीइच लेनिन। 18 वर्ष की आयु मे इनके पिता का निधन हो जाने के कारण लालन-पालन माता द्वारा किया गया। वे सभी भाई-बहन क्रांतिकारी विचारों के थे। इनके बड़े भाई अलेग्जांदर को ज़ार की हत्या का षडयंत्र रचने में शरीक होने के आरोप में फाँसी दे दी गई थी।सुश्री क्रुप्सकाया से 1893 मे सेंट पीटर्सबर्ग मे मार्क्सवादियों के समूह मे परिचय होने के बाद वह इनकी सहयोगी रहीं और साईबेरिया मे निर्वासन के दौरान दोनों मे विवाह हो गया। इसी निर्वासन के दौरान लिखी तीन पुस्तकों मे महत्वपूर्ण है-"रूस में पूँजीवाद का विकास"जिसमें मार्क्सवादी सिद्धांतों के आधार पर रूस की आर्थिक उन्नति के विश्लेषण का प्रयत्न किया गया है और इसी समय  उन्होने  मन में रूस के निर्धन श्रमिकों या सर्वहारा वर्ग का एक दल स्थापित करने की योजना बना ली थी।

देश से बाहर जाकर उन्होने  "इस्क्रा" (चिनगारी) नामक समाचारपत्र का संपादन आरंभ किया।1905-07 की प्रथम क्रांति के दौरान रूस मे आकर उसमे भाग लिया और विफलता के बाद पुनः बाहर चले गए। अपनी पुस्तक "साम्राज्यवाद" (1916) में साम्राज्यवाद का विश्लेषण करते हुए उन्होने स्पष्ट रूप से  बतलाया कि यह पूँजीवाद के विकास की चरम और आखिरी मंजिल है। उन्होने  उन परिस्थितियों पर भी प्रकाश डाला जो साम्राज्यवाद के विनाश को  अनिवार्य बना देती हैं। उन्होने  यह भी  स्पष्ट कर दिया था  कि साम्राज्यवाद के युग में पूँजीवाद के आर्थिक एवं राजनीतिक विकास की गति सब देशों में एक सी नहीं होती।

फरवरी-मार्च, 1917 में रूस में क्रांति का आरंभ होने पर वह रूस लौट आये। उन्होने  क्रांति की व्यापक तैयारियों का संचालन किया और श्रमिकों तथा सैनिकों की बहुसंख्यक सभाओं में भाषण कर उनकी राजनीतिक चेतना बढ़ाने और संतुष्ट करने का प्रयत्न किया।
जुलाई, 1917 में क्रांतिविरोधियों के हाथ में सत्ता चली जाने पर बोलशेविक दल ने अपने नेता के अज्ञातवास की व्यवस्था की। इसी समय  उन्होने  "दि स्टेट ऐंड रिवाल्यूशन" (राज तथा क्रांति) नामक पुस्तक लिखी और गुप्त रूप से दल के संघटन और क्रांति की तैयारियों के निदेशन का कार्य जारी रखा। अक्टूबर में विरोधियों की कामचलाऊ सरकार का तख़्ता उलट दिया गया और 7 नवंबर, 1917 को लेनिन की अध्यक्षता में सोवियत सरकार की स्थापना कर दी गई। प्रारंभ से ही सोवियत शासन ने शांतिस्थापना पर बल देना शुरू किया। जर्मनी के साथ उन्होने संधि कर ली; जमींदारों से भूमि छीनकर सारी भूसंपत्ति पर राष्ट्र का स्वामित्व स्थापित कर दिया गया, व्यवसायों तथा कारखानों पर श्रमिकों का नियंत्रण हो गया और बैकों तथा परिवहन साधनों का राष्ट्रीकरण कर दिया गया। श्रमिकों तथा किसानों को पूँजीपतियों और जमींदारों से छुटकारा मिला और समस्त देश के निवासियों में पूर्ण समता स्थापित कर दी गई। नवस्थापित सोवियत प्रजातंत्र की रक्षा के लिए लाल सेना का निर्माण किया गया। लेनिन ने अब मजदूरों और किसानों के संसार के इस प्रथम राज्य के निर्माण का कार्य अपने हाथ में लिया। उन्होने  "दि इमीडिएट टास्क्स ऑफ दि सोवियत गवर्नमेंट" तथा "दि प्रोले टेरियन रिवाल्यूशन ऐंड दि रेनीगेड कौत्स्की" नामक पुस्तकें लिखीं (1918)। लेनिन ने बतलाया कि मजदूरों का अधिनायकतंत्र वास्तव में अधिकांश जनता के लिए सच्चा लोकतंत्र है। उसका मुख्य काम दबाव या जोर जबरदस्ती नहीं वरन् संघटनात्मक तथा शिक्षण संबंधी कार्य है।
बाहरी देशों के सैनिक हस्तक्षेपों तथा गृहकलह के तीन वर्षों 1928-20 में लेनिन ने विदेशी आक्रमणकारियों तथा प्रतिक्रांतिकारियों से दृढ़तापूर्वक लोहा लेने के लिए सोवियत जनता का मार्ग दर्शन किया। इस व्यापक अशांति और गृहयुद्ध के समय भी लेनिन ने युद्ध काल से हुई देश की बर्बादी को दूर कर स्थिति सुधारने, विद्युतीकरण का विकास करने, परिवहन के साधनों के विस्तार और छोटी छोटी जोतों को मिलाकर सहयोग समितियों के आधार पर बड़े फार्म स्थापित करने की योजनाएँ आरंभ कर दीं। उन्होने   शासन-तंत्र का आकार घटाने, उसमें सुधार करने तथा खर्च में कमी करने पर बल दिया। उन्होने  शिक्षित और मनीषी वर्ग से किसानों, मजदूरों के साथ सहयोग करते हुए नए समाज के निर्माणकार्य में सक्रिय भाग लेने का आग्रह किया।
जहाँ तक सोवियत शासन की विदेश नीति का प्रश्न है, लेनिन ने  अविकल रूप से शांति बनाए रखने का निरंतर प्रयत्न किया। उन्होने  कहा कि "हमारी समस्त नीति और प्रचार का लक्ष्य यह होना चाहिए कि चाहे कुछ भी हो जाए, हमारे देशवासियों को युद्ध की आग में न झोंका जाए। लड़ाई का खात्मा कर देने की ओर ही हमें अग्रसर होना चाहिए।" उन्होने  साम्यवाद के शत्रुओं से देश का बचाव करने के लिए प्रतिरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने पर बल दिया और सोवियत नागरिकों से आग्रह किया कि वे "वास्तविक" लोकतंत्र तथा समाजवाद के स्थापनार्थ विश्व के अन्य सभी देशों में रहनेवाले श्रमिकों के साथ अंतरराष्ट्रीय बंधुत्व की भावना बढ़ाने की ओर अधिक ध्यान दें।

आज जब सोवियत रूस का पतन हो चुका है और वहाँ 'साम्यवादी' व्यवस्था समाप्त कर दी गई है तब 'लेनिन' का स्मरण करने का अभिप्राय यह है कि,हम यह देखें कि वहाँ ऐसा क्यों हुआ? लेनिन ने कहा तो यह था-"मजदूरों का अधिनायकतंत्र वास्तव में अधिकांश जनता के लिए सच्चा लोकतंत्र है। उसका मुख्य काम दबाव या जोर जबरदस्ती नहीं वरन् संघटनात्मक तथा शिक्षण संबंधी कार्य है।"परंतु ऐसा हुआ नहीं विरोधियों का दमन किया गया बजाए समझाने या सुधारने के। विदेशमंत्री 'ट्राटसकी' की विदेश मे हत्या खुद लेनिन ने ही करा दी थी। उनके बाद 'स्टालिन' ने तो और भी अधिक क्रूरता से दमनात्मक शासन चलाया था। क्रांति के निर्यात के नाम पर रूसी जनता का धन बर्बाद किया गया और लड़ाई मे झोंका गया ; बजाए देश का ठोस विकास करने के। पार्टी पदाधिकारी कार्यकर्ताओं और जनता का शोषण करके 'धन-संग्रह' करते रहे और यही कारण है कि उनही लोगों ने अपने निजी हित मे 'साम्यवादी-व्यवस्था' को समाप्त कर दिया वे ही आज वहाँ के उद्योगपति हैं। इसका मूल कारण यह है मार्क्स के इस कथन-'MAN HAS CREATED THE GOD FOR HIS MENTAL SECURITY ONLY'का गलत निहितार्थ लिया गया  और 'धर्म' को अफीम कह कर ठुकरा दिया गया था। जबकि  मेरे अनुसार वास्तविकता यह है-

'धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य'को ठुकरा कर, इसे अफीम बता कर जब 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' को धर्म का नाम दिया जाएगा और शोशकों -लुटेरों -व्यापारियों- उद्योगपतियों के दलालों को साधू-सन्यासी माना जाएगा एवं पूंजी (धन)को पूजा जाएगा तो समाज वैसा ही होगा जैसा चल रहा है। आवश्यकता है उत्पीडंकारी व्यापारियों/उद्योगपतियों तथा उनके दलाल पुरोहितों/पुरोहित् वादियों का पर्दाफाश करके जनता को उनसे दूर रह कर वास्तविक 'धर्म' का पालन करने हेतु समझाने की।
'देवता=जो देता है और लेता नहीं है जैसे-वृक्ष,नदी,समुद्र,आकाश,मेघ-बादल,अग्नि,जल आदि' और 'भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)'चूंकि ये प्रकृति तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी ने बनाया नहीं है इसीलिए ये ही 'खुदा' हैं। इन प्रकृति तत्वों का कार्य G(जेनरेट-उत्पत्ति)+O(आपरेट-पालन)+D (डेसट्राय-संहार)। अतः झगड़ा किस बात का?यदि है तो वह व्यापारिक/आर्थिक हितों के टकराव का है अतः 'शोषण/उत्पीड़न'को समाप्त कर वास्तविक 'धर्म' के 'मर्म' को समझना और समझाना ही एकमात्र हल है।


यदि रूस के साम्यवादी शासक मनसा-वाचा-कर्मणा एक होते सत्य के धारक होते अवैध धनसंग्रह (अपरिग्रह)न करते अहिंसक होते और ब्रह्मचर्य के सच्चे पालक होते तो रूस से तो शासन समाप्त होने का प्रश्न ही नहीं था अब तक विश्व मे उनका अनुकरण निर्विवादित रूप से हो चुका होता। लेकिन जब जाग जाओ तभी सबेरा के अनुसार हम भारत मे उन कमियों से सबक लेकर एक स्थाई साम्यवादी शासन स्थापित करके विश्व का नेतृत्व कर सकते हैं। ज़रूरत है तो यह खुद साम्यवादी ही 'मनसा-वाचा-कर्मणा' पहले एकजुट हो तभी जनता को समझा सकते हैं और तभी जन-कल्याण भी हो सकता है। 

इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है। 
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Comment from facebook:(22-04-2015 )
 

2 comments:

विजय राज बली माथुर said...

फेसबुक पर प्राप्त टिप्पणी---

Rajyashree Tripathi---
This is the point I made once discussing with Mohan Shrotriya Ji. He thought I was being critical. My take in this is that when a seemingly good system fails, we need to re-visit as to what was either intrinsically wrong with it or went wrong in spite of it
39 minutes ago · Like

कश्मीर उप्पल said...

This statement of Lenin is right that man has created the God for his mental security. Nowadays people Creating there own God for their properties. Assets and pòlitiçalpower? That's why's they criticized lenin.