Sunday, June 2, 2013

चतुर्थ वर्ष में ब्लाग,कुछ अनुभूतियाँ ---विजय राजबली माथुर

यों तो ब्लाग-लेखन किस प्रकार प्रारम्भ हुआ इसका वर्णन 'विद्रोही स्व-स्वर में'हो चुका है-http://vidrohiswar.blogspot.in/2013/05/blog-post_28.html 
परंतु कुछ लोगों के मन में उठ रहे अनेक संदेहों के निवारणार्थ निम्नाकित बातों को पुनः कहना चाहता हू :-
(1 )- पत्रकार स्व .शारदा पाठक ने स्वंय अपने लिए जो पंक्तियाँ लिखी थीं ,मैं भी अपने ऊपर लागू समझता हूँ :-


लोग कहते हम हैं काठ क़े उल्लू ,हम कहते हम हैं सोने क़े .
इस दुनिया में बड़े मजे हैं  उल्लू   होने   क़े ..

(2 ) ऐसा इसलिए समझता हूँ जैसा कि सरदार पटेल क़े बारदौली वाले किसान आन्दोलन क़े दौरान बिजौली में क्रांतिकारी स्व .विजय सिंह 'पथिक 'अपने लिए कहते थे मैं उसे ही अपने लिए दोहराता रहता हूँ :-

यश ,वैभव ,सुख की चाह नहीं ,परवाह नहीं जीवन न रहे .
इच्छा है ,यह है ,जग में स्वेच्छाचार  औ दमन न रहे ..


 आज से तीन वर्ष पूर्व इस ब्लाग का प्रारम्भ किया गया था मेरा उद्देश्य तो 'स्वांत: सुखाय,सर्वजन हिताय' ही था। किन्तु उच्च सरकारी पदों पर आसीन कुछ ब्लागर्स ने 'टिप्पणी' को विषय बना कर इसका मखौल भी खूब उड़ाया। आज फिर एक राजनीतिक ब्लागर् साहब की बात सामने आ चुकी है कि,बिना किसी महत्वाकांक्षा के कोई भी कोई कार्य नहीं करता है।एक और राजनीतिक ब्लागर साहब कहते हैं बिना किसी स्वार्थ के आज कल कोई भी किसी को एक ग्लास पानी को भी नहीं पूंछता है।  यदि कोई 'महत्वाकांक्षा'मुझे है तो वह यह है कि मृत्योपरांत लोग मुझे सद्कार्यों हेतु याद रखें। बस इससे अधिक किसी धन या मान प्राप्ति की महत्वाकांक्षा मुझे नहीं है। किसी स्वार्थ-वश मैं लेखन क्षेत्र में नहीं हूँ जैसा कि कुछ धृष्ट-भृष्ट-निकृष्ट धन-लोलुप  ब्लागर्स किए हुये है । 

परंतु पता नही क्यों लोग अपने जैसा ही मुझे भी समझते हैं। मैं खुद को भीड़ में शामिल करके 'भेड़-चाल'का हिस्सा नहीं बनना चाहता। मेरा लेखन इस तथ्य का साक्षी है। मैं 2+2 =4 ही कहता हूँ इसे पौने चार या सवा चार कहने की चालबाजी मैं नहीं कर सकता जैसा की अक्सर लोग करते और फिर फँसते हैं।  

1972 में नौकरी शुरू करने के बाद उस संपर्क के माध्यम से मेरठ में एक स्थानीय साप्ताहिक पत्र में मेरे लेख 1973 से ही छ्प रहे थे। फिर 1980 से आगरा के एक साप्ताहिक पत्र में लेख छ्पते रहे, जिसमें बाद में मुझे पहले सहायक सम्पादक और फिर उपसंपादक की हैसियत भी दी गई। दूसरे साप्ताहिक पत्रों ने भी लेख मुझसे लेकर छापे और इनके आधार पर वैश्य समुदाय की एक त्रैमासिक पत्रिका के सम्पादक ने  जातिसूचक शब्द हटा कर  मुझे उपसंपादक की हैसियत से उसमें मुझे मेरे लेखन के आधार पर ही जोड़ा था जिनसे कोई पूर्व परिचय भी न था। 

लेकिन जब दो राजनीतिक ब्लागर्स अपनी विपरीत राय देते हैं तो वह वैसे ही अंनजाने में कुछ नहीं कहते हैं। वस्तुतः शुरू-शुरू से ही हमारी छोटी भांजी जो अब पूना में बस गई है ने ब्लाग्स में प्राप्त टिप्पणियों के माध्यम  से टिप्पणी दाताओं की प्रोफाईल खोजते-खोजते कुछ ब्लागर्स को चुना और उसके पिता हमारे बहनोई साहब ने उन ब्लागर्स को हमारे विरुद्ध उकसाया। दो वर्ष पूर्व तक उनकी कारगुजारियाँ छिपी रहीं और घरेलू रिश्ता भी चलता रहा। किन्तु अब वह स्थिति नहीं है। वे लोग मेरे साथ-साथ यशवन्त को भी तबाह करना चाहते हैं और पूनम तो शुरू से ही उनके निशाने पर रही हैं। बल्कि इसीलिए पटना से संबन्धित श्रीवास्तव ब्लागर (जो अब पूना प्रवासी है)का चयन किया गया था। दरियाबाद और पटना से संबन्धित श्रीवास्तव ब्लागर्स ने ही ब्लाग जगत में हमारे विरुद्ध लामबंदी कर रखी है। इन ब्लागर्स  ने अपने रिश्ते व संपर्कों के आधार पर राजनीतिक ब्लागर्स को गुमराह कर रखा है जो वे अनर्गल राय प्रकट करते हैं। छोटे मियां तो छोटे मियां बड़े मियां सुभान अल्लाह की तर्ज़ पर एक दूसरे दल के प्रादेशिक राजनेता  श्रीवास्तव साहब जो दरियाबाद  से संबन्धित ब्लागर के रिश्तेदार भी हैं और उनके भाईयों के मोहल्लेदार भी ने तो हद ही कर दी कि यशवन्त से मुफ्त या कन्सेशनल काम करवाते हुये भी हमारे परिवार के तीनों सदस्यों पर नाहक तोहमत भी लगा दी। आस-पास के वकीलों और अपने रिशतेदारों को हमारी खुफियागिरी करने के लिए तैनात कर दिया। जबकि पूना प्रवासी ब्लागर की भांति ही (जिसने चार-चार जन्मपत्रियों का निशुल्क विश्लेषण प्राप्त किया था) यह साहब भी दो जन्मपत्रियों का मुझसे निशुल्क विश्लेषण प्राप्त कर चुके हैं  तब भी एहसान फरामोशी की इंतिहा कर दी ,अंततः मुझे अपने घर  पर उनके आने को प्रतिबंधित ही करना पड़ा है। 

अध्यन-लेखन का बचपन से शौक होने के कारण ब्लाग्स के माध्यम से लेखन जारी रखे हुये हूँ जिस आधार पर कुछ सार्वजनिक सहयोग की भी मुझसे अपेक्षा की गई है और मैंने निस्वार्थ भाव से उसे सहर्ष स्वीकार भी कर लिया है। हो सकता है कि इससे मेरा निजी लेखन कुछ प्रभावित हो किन्तु समाप्त नहीं होगा,इस ब्लाग के चतुर्थ वर्ष में प्रवेश के अवसर पर आज मेरा यही संकल्प है। 


इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

3 comments:

विजय राज बली माथुर said...

फेसबुक पर प्राप्त टिप्पणी---
Kirtivardhan Agarwal: - vijay ji ,logo ka kaam hai kahanaa , haan hamaraa aapka swarth hai ,' aatm sukh", kyun dard hota hai kisi koo, apna samay , dhan kharch karate hain ,apna blog banate hain , achchha banane ka prayas karate hain , hamari shaanti , aur swarth . jise taklif ho vah yahan na likhe , jise achchha lage uska swagat .,, aap nirash na hon , apna kaam jaari rakhen ham aapke saath hain , hamare swarth hain ...jan hitarth , aatm pranshansa ya anya jo bhi kuchh , hame un par garv hai
6 hours ago · Unlike · 1

विजय राज बली माथुर said...

फेसबुक ग्रुप-कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया पर प्राप्त टिप्पणी---
Shamim Shaikh : - aarop paratyarop hote rahte rahte hain, lekin jo apni samajh se upyukt lge vo bat kahni chahiye.
5 hours ago · Unlike · 1

halchal said...

माथुर जी,
आज मैने आप का यह लेख पढा ! बलॉग के चौथे बर्ष में सफलतापुर्वक प्रवेश अत्यन्त हर्ष का बिषय है।इसलिए कि आज के समय में दुनियाँ भर के कुकूरमुत्ते की तरह ब्लॉगर्स उग आये है जिनका कार्य होता है -मेहनतकश अवाम की चेतना की धार को कुंठीत करना और पूंजीवाद - कॉरपोरेट की सेवा में समर्पित रहना।ठीक इसके बिपरित कुछ ऐसे ब्लॉगर्स हैं जो सच मायने में सुसंगत दिशा के साथ लेखन के माध्यम से जनता को उनके अधिकारों व कर्तब्यों का बोध करा कर उसमें सामाजिक- राजनीतिक चेतना से लैस करना और इस कार्य को करनेवाले लोंगों को इस ब्यवस्था के पोषक तत्वों का कोपभाजन का शिकार होना पडता है। ऐसे में तो मै ...
फरेब रचने लगे हैं वो मेरी कलम रोकने के लिए।
मैने जब कलम को संगीन बनाया बनाया यारो।

फिर सुसंगत जनवादी दिशा में कोई छोटा प्रयास भी समाज में काफी महत्व और अर्थवान होता है :-
इस नदी की धार से ठंढी हवा आती तो है।
नाव जर्जर ही सही ,लहरों से टकराती तो है।

अंत में मेरी कामना है कि आप अपने लक्षित मंजील और मिशन के लिए निरन्तर आगे बढते रहेंगें तमाम बाधा- बिध्न को भेदते हुए तथा समाज में फैले चारो तरफ अंधेरे के बीच प्रकाश की किरण की तरह जगमगाते रहीयेगा।