Friday, June 28, 2013

असल में मार्क्स के स्वयंभू ठेकेदारों से ही सबसे ज्यादा नुकसान मार्कसिज़्म को पहुंचा है ---प्रस्तुतकर्ता : विजय राजबली माथुर



25 june 2013 
 Sudhakar Reddy Suravaram
Tuesday
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भाकपा महासचिव कामरेड सुधाकर रेड्डी की यह अपील पार्टी के अधिकृत पेज पर प्रसारित हुई है। लेकिन कुछ ऐसे भी पदाधिकारी हैं जो यह कहते हैं कि,फेसबुक,ट्विटर और ब्लाग्स से कुछ नहीं होता है। वस्तुतः जड़ बुद्धि और संकीर्ण मनोवृत्ति के लोग पार्टी को प्रगतिशील नहीं बनने देना चाहते हैं। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को गलत ठहरा कर ऐसे लोग खुद को खुदा तो समझ सकते हैं लेकिन पार्टी को क्षति पहुंचा रहे हैं। इसी प्रकार कुछ लोग खुद को पार्टी सिद्धांतों का पैरोकार बताते हैं,NRI हैं,विदेशी संचार माध्यमों के मुलाज़िम रहे हैं और फेसबुक पर ऐलान करते हैं कि जो 'नास्तिक' नहीं है वह कम्युनिस्ट नहीं हो सकता ,कम्युनिस्ट होने का मतलब ही 'नास्तिक' होना है। 

पार्टी और इसकी सदस्यता के संबंध में धारा 1 से 13 तक विषद विवेचन 'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का संविधान' में दिया हुआ है। इसमें कहीं भी उल्लेख नहीं है कि कम्युनिस्ट होने के लिए 'नास्तिक' होना एक शर्त है। संविधान की प्रस्तावना के अंतिम अनुच्छेद में स्पष्ट कहा गया है-"पूंजीवाद से समाजवाद में संतरण के इस नए युग में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी तथा इसके सभी सदस्यों का कर्तव्य है कि वे सफलता में दृढ़ विश्वास के साथ राष्ट्रीय जनवादी क्रान्ति के कर्तव्यों को,जैसा कि पार्टी के कार्यक्रम में बताया गया है,पूरा करने तथा जनता को समाजवाद व कम्युनिज़्म के पाठ पर अग्रसर करने के लिए सक्रियता से कार्य करें। " 





रायगढ़ की  इस कार्यशाला में बोलते हुये कामरेड अनिल  राजिम वाले ने कहा-" बुद्धिजीवी का यह कर्तव्य हो सकता है, होना चाहिए कि वह झंडे लेकर जुलूस में शामिल हो, और नारे लगाए ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ के, लेकिन मैं यह नहीं समझता हूँ कि इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगा देने से ही बुद्धिजीवी क्रांतिकारी हो जाता है। क्रांति की परिभाषा ये है - औद्योगिक क्रांति ने जो सारतत्व हमारे सामने प्रस्तुत किया कि क्या हम परिवर्तन को समझ रहे हैं! समाज एक परिवर्तनशील ढाँचा है, प्रवाह है।".................................................... 
" बुद्धिजीवियों की भूमिका इतिहास में घटी नहीं है, बल्कि बढ़ी है, उनकी संख्या बढ़ी है। विज्ञान और तकनीक के विकास में, अर्थतंत्र और अर्थशास्त्र के विकास ने हमारे सामने नए तथ्य लाए हैं। इन तथ्यों का अध्ययन करना बुद्धिजीवियों की बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। और इसीलिए विचारधारा की लड़ाई चलती है।"........................ 
 "पिछले दस वर्षों में भारत बदल चुका है। अगर हम प्रगतिशील हैं (प्रगतिशील वह है, जो सबसे पहले परिवर्तनों को पहचानता है) तो शर्त यह है कि इस परिवर्तन को हमें समझना पड़ेगा। यह परिवर्तन चीन में हो रहा है, नेपाल में हो रहा है, वेनेजुएला में, ब्राजील, क्यूबा में हो रहा है और योरोप और अमेरिका में तो हो ही रहा है। इसीलिए आज के आंदोलनों का चरित्र दूसरा है। आज मध्यम वर्ग बड़ी तेज़ी से बेहिसाब फैल गया है। इसलिए पुराने सूत्रों को ज्यों का त्यों लागू करना सही नहीं होगा। उसमें परिवर्तन, सुधार, जोड़-घटाव करना पड़ेगा।"................................................................................................................... 
" आज हमारे यहाँ कितने प्रगतिशील दैनिक अखबार निकलते हैं? कितने चैनल्स हैं, कितने ब्लॉग्स हैं? कितने ई-मेल और ई-स्पेस पर हमारा दखल है? हम प्रगतिशील साहित्य को कितने लोगों तक पहुँचा रहे हैं? या लोगों तक केवल त्रिशूल ही पहुँच रहा है? क्योंकि हमने जगह खाली छोड़ रखी है त्रिशूल पहुँचाने के लिए, कि पहुँचाओ भाई त्रिशूल! जतिवाद करने के लिए खुला मैदान छोड़ा हुआ है, इसकी जिम्मेदारी हमारे ऊपर भी है।"
http://iptanama.blogspot.in/2013/05/blog-post_31.html 

कामरेड अनिल राजिम वाले का यह विस्तृत व्याख्यान 'इप्टानामा'  पर लिपिबद्ध रूप से उपलब्ध है। लेकिन खुद को खुदा समझने वाले  जड़ मति लोग 'नास्तिक' होना कम्युनिज़्म की पहचान है जैसे संकीर्ण  कुतर्कों के सहारे 'त्रिशूल'वालों के लिए जगह खाली रखना चाहते हैं। 'तर्क' को समझने की बुद्धि उनमें है नहीं और तर्कों को 'मूर्खता'कह कर उपहास उड़ाते हैं। ऐसे लोगों के संबंध में एक प्रगतिशील पत्रकार ने 25 जूलाई 2012 को बताया था कि,"Asal men Marx ke swaymbhoo thekedaron se hee sabse jyada nuksan marxism ko pahuncha hai."

वस्तुतः कार्ल मार्क्स ने जिस सन्दर्भ में 'धर्म' की आलोचना की है और भगत सिंह ने जिस सन्दर्भ में 'नास्तिक' शब्द का प्रयोग किया है वह यह है कि इन दोनों महान विद्वानों ने तत्कालीन तथाकथित धर्म को वास्तविक समझ लिया है जो कि वस्तुतः 'अधर्म' है न कि 'धर्म' । हमें इन विद्वानों के 'मर्म' को समझते हुये हुये जनता को 'धर्म' का 'मर्म' समझाना होगा यदि हम सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो। अन्यथा इन कूप मंडूकों की बातों को तवज्जो देने का मतलब है कि विरोधियों के लिए खुला मैदान छोड़ देना। जो कामरेड रेड्डी और कामरेड राजिम वाले के प्रयासों पर पानी फेरने के समान ही होगा। 

इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

2 comments:

विजय राज बली माथुर said...

फेसबुक ग्रुप -सीपीआई आन लाईन (बिहार)में प्राप्त टिप्पणी-
Ameeque Jamei:सही कहा कोमरेड, मेरा यह मानना है की ८४ में मासूम सिखों का क़त्ल आम,मस्जिद विध्वंस, उसके बाद बम्बई में हिंसा, फिर गोधरा, फिर गुजरात, इसके बाद अनगिनत होने वाली सांप्रदायिक हिंसा यह सही में चरस और अफीम की तरह ही तो थी जहा तहज़ीब पर वहशियाना हमले हुए, हमारे देश में ९० % हिन्दू भाई सेकुलर को अकलियतो की रक्षा के लिए लड़ते है , ९० % मुस्लिम भाई जो हिन्दू सेकुलर भाइयो को अपना कायद मानते रहे और अपने निजी जीवन में धर्म को भी मानते है यही तो असली रूप है धर्म का.
4 hours ago · Unlike · 1

Kuldeep Thakur said...

सुंदर प्रस्तुति...


उत्तरांचल तबाही पर कुछ दोहे...



क्या माँ धारी देवी को नाराज करने के कारण केदारनाथ में भीषण तबाही हुई??