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Wednesday, May 9, 2018

धर्म आधारित राष्ट्र लोकतंत्र विरोधी अवधारणा है ------ अफलातून अफ़लू / सांप्रदायिकता है साम्राज्यवाद की प्रहरी ------ विजय राजबली माथुर

 * किसी धर्म आधारित राष्ट्र में लोकतंत्र कभी पनप नहीं सकता । संविधान , न्यायपालिका , और प्रेस का हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर अपमान कट्टरपंथियों के लोकतंत्र विरोधी रुख की ही बानगी है । गोलवलकरपंथी राष्ट्रतोड़क ‘राष्ट्रवादियों’ के चंगुल में में देश चला गया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक होगा । इसलिए समय रहते इनके हिटलरी मंसूबों को उजागर करें और इनके खिलाफ़ चौतरफ़ा ढंग से सक्रिय हों ।
** एडवर्ड थाम्पसन ने 'एनलिस्ट इंडिया फार फ़्रीडम के पृष्ठ 50 पर लिखा है-"मुस्लिम संप्रदाय वादियों  और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों मे गोलमेज़ सम्मेलन के दौरान अपवित्र गठबंधन रहा। "
*** अफलातून साहब की इस चेतावनी " गोलवलकरपंथी राष्ट्रतोड़क ‘राष्ट्रवादियों’ के चंगुल में मे देश चला गया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक होगा । इसलिए समय रहते इनके हिटलरी मंसूबों को उजागर करें और इनके खिलाफ़ चौतरफ़ा ढंग से सक्रिय हों ।" के मद्देनजर देश की जागरूक जनता और देश हितैषी दलों की मनसा - वाचा - कर्मणा एकता की महती आवश्यकता है।
Aflatoon Afloo
Varanasi
राष्ट्र की हिटलरी कल्पना फासीवाद के नाम से कुख्यात है । हिटलर ने ‘नस्ल’ की कथित शुद्धता और यहूदी विद्वेष की विक्षिप्तता को फैलाकर जर्मनी को भीषण बर्बरता और रक्तपात में डुबो दिया और विश्व भर की लांछना का पात्र बना दिया । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का धर्म आधारित राष्ट्र भी उसी प्रकार का एक बर्बर उद्देश्य है । हिटलर से तुलना करके या हिटलर का उदाहरण देकर हम संघ-परिवार पर कोई काल्पनिक आरोप नहीं लगा रहे हैं । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गौरव-पुरुष गुरु गोलवलकर ने खुद १९३९ में लिखी अपनी पुस्तक ‘ वी ऑर आवर नेशनहुड डिफाइन्ड ‘ ( हम या हमारी राष्ट्रीयता परिभाषित ) ( अब उनके चेले अधिकृत रूप से कहने लगे हैं कि यह उनकी लिखी किताब नहीं है , उनका अनुवाद है ) में कहा था –

” नस्ल और इसकी संस्कृति की पवित्रता को बनाए रखने के लिए जर्मनी ने यहूदियों से अपने देश को रिक्त कर दुनिया को स्तम्भित कर दिया । नस्ल का गर्व यहाँ अपनी उच्चतम अभिव्यक्ति पाता है। जर्मनी ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि संस्कृतियों और नस्लों के फर्क जो बुनियाद तक जाते हैं , एक संपूर्ण इकाई में जज़्ब नहीं किए जा सकते । हम भारतीयों के लिए यह एक अच्छा सबक है जिससे लाभ उठाना चाहिए । “

यह सचमुच बड़े शर्म की बात है कि जिस विद्वेष और क्रूरता के लिए हिटलर का जर्मनी पूरी दुनिया में लांछित हुआ , गोलवलकर ने उसी की प्रशंसा की और भारत के लिए उसी हिटलरी रास्ते की सिफारिश की । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गुरु गोलवलकर के बताए हुए फासीवाद के रास्ते पर चल रहा है । वह जिस हिन्दू राष्ट्र की बात करता है , वह सिर्फ मुस्लिम विद्वेष तक सीमित नहीं है । स्त्रियों और शूद्र कही जाने वाली जातियों , जिन्हें सबसे अधिक धर्माचार्यों द्वारा अनुमोदित क्रूर प्रथाओं और परम्परागत ऊँच-नीच का शिकार होना पड़ा है , की दुर्दशा कम होने के बजाए , धर्म आधारित राष्ट्र में काफ़ी बढ़ जाएगी । सती प्रथा और बाल-विवाह पर रोक सम्बन्धी कानून हटाने और वर्ण व्यवस्था को स्थापित करने की मांग धर्म-संसद के प्रस्तावों में होने लगी थीं । स्त्रियों को सम्पत्ति में हक देने वाले हिन्दू कोड बिल का भी गोलवलकर ने विरोध किया था ।

इसलिए यदि आप कूप मंडूकता , धर्मान्धता , स्त्री उत्पीड़न और दलितों तथा पिछड़ों की सामाजिक दुर्दशा को देश की नियति नहीं बनाना चाहते तो हिन्दू राष्ट्र के नारे से सतर्क रहे। हम किस प्रकार पूजा पाठ करें , त्योहार किस ढंग से मनाएं , धार्मिक प्रतीकों का क्या अर्थ ग्रहण करें और दूसरे धर्म के अनुयायियों के साथ क्या व्यवहार करें , इन बातों को संघ परिवार और महंत मठाधीश नियंत्रित करने  की कोशिश करते हैं । इनके चलते हमारे धार्मिक आचरण की स्वाधीनता सुरक्षित नहीं है । ऐसे तत्वों को धार्मिक मान्यता और राजनैतिक समर्थन देना बन्द करें नहीं तो ये हमें एक अन्धी सुरंग में पहुंचा देंगे ।

दुनिया के कई धर्म आधारित राष्ट्रों में जनता का उत्पीड़न और रुदन हमसे छिपा नहीं है। धर्म आधारित राष्ट्र के रूप में हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के बारे में हम जानते हैं कि इस्लामियत के नाम पर कैसे कठमुल्लों , सामन्तों , फौजी अफसरों , भ्रष्ट नेताओं और असामाजिक तत्वों का वह चारागाह बन गया है । क्या हम भारत में भी उसी दुष्चक्र को स्थापित करना चाहता हैं ? धर्म आधारित राष्ट्र लोकतंत्र विरोधी अवधारणा है । किसी धर्म आधारित राष्ट्र में लोकतंत्र कभी पनप नहीं सकता । संविधान , न्यायपालिका , और प्रेस का हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर अपमान कट्टरपंथियों के लोकतंत्र विरोधी रुख की ही बानगी है । गोलवलकरपंथी राष्ट्रतोड़क ‘राष्ट्रवादियों’ के चंगुल में देश चला गया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक होगा । इसलिए समय रहते इनके हिटलरी मंसूबों को उजागर करें और इनके खिलाफ़ चौतरफ़ा ढंग से सक्रिय हों ।
https://www.facebook.com/aflatoon.afloo/posts/10156656715003646

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सांप्रदायिकता का आधुनिक इतिहास 1857 की क्रांति की विफलता के बाद शुरू होता है। चूंकि 1857 की क्रांति मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर के नेतृत्व मे लड़ी गई थी और इसे मराठों समेत समस्त भारतीयों की ओर से समर्थन मिला था सिवाय उन भारतीयों के जो अंग्रेजों के मित्र थे तथा जिनके बल पर यह क्रांति कुचली गई थी।ब्रिटेन ने सत्ता कंपनी से छीन कर जब अपने हाथ मे कर ली तो यहाँ की जनता को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने हेतु प्रारम्भ मे मुस्लिमों को ज़रा ज़्यादा  दबाया। 19 वी शताब्दी मे सैयद अहमद शाह और शाह वली उल्लाह के नेतृत्व मे वहाबी आंदोलन के दौरान इस्लाम मे तथा प्रार्थना समाज,आर्यसमाज,राम कृष्ण मिशन और थियोसाफ़िकल समाज के नेतृत्व मे हिन्दुत्व मे सुधार आंदोलन चले जो देश की आज़ादी के आंदोलन मे भी मील के पत्थर बने। असंतोष को नियमित करने के उद्देश्य से वाइसराय के समर्थन से अवकाश प्राप्त ICS एलेन आकटावियन हयूम ने कांग्रेस की स्थापना कारवाई। जब कांग्रेस का आंदोलन आज़ादी की दिशा मे बढ्ने लगा तो 1905 मे बंगाल का विभाजन कर हिन्दू-मुस्लिम मे फांक डालने का कार्य किया गया। किन्तु बंग-भंग आंदोलन को जनता की ज़बरदस्त एकता के आगे 1911 मे इस विभाजन को रद्द करना पड़ा। लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन  एवं सर आगा खाँ को आगे करके मुस्लिमों को हिंदुओं से अलग करने का उपक्रम किया जिसके फल स्वरूप 1906  मे मुस्लिम लीग की स्थापना हुई और 1920 मे हिन्दू महासभा की स्थापना मदन मोहन मालवीय को आगे करके करवाई गई जिसके सफल न हो पाने के कारण 1925 मे RSS की स्थापना कारवाई गई जिसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करना था । मुस्लिम लीग भी साम्राज्यवाद का ही संरक्षण कर रही थी जैसा कि,एडवर्ड थाम्पसन ने 'एनलिस्ट इंडिया फार फ़्रीडम के पृष्ठ 50 पर लिखा है-"मुस्लिम संप्रदाय वादियों  और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों मे गोलमेज़ सम्मेलन के दौरान अपवित्र गठबंधन रहा। "


वस्तुतः मेरे विचार मे सांप्रदायिकता और साम्राज्यवाद सहोदरी ही हैं। इसी लिए भारत को आज़ादी देते वक्त भी ब्रिटश साम्राज्यवाद  ने पाकिस्तान और भारत  दो देश बना दिये। पाकिस्तान तो सीधा-सीधा वर्तमान साम्राज्यवाद के सरगना अमेरिका के इशारे पर चला जबकि अब भारत की सरकार  भी अमेरिकी हितों का संरक्षण कर रही है। भारत मे चल रही सभी आतंकी गतिविधियों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन अमेरिका का रहता है। हाल के दिनों मे जब बढ़ती मंहगाई ,डीजल,पेट्रोल,गैस के दामों मे बढ़ौतरी और वाल मार्ट को सुविधा देने के प्रस्ताव से जन-असंतोष व्यापक था अमेरिकी एजेंसियों के समर्थन से सांप्रदायिक शक्तियों ने दंगे भड़का दिये। इस प्रकार जनता को आपस मे लड़ा देने से मूल समस्याओं से ध्यान हट गया तथा सरकार को साम्राज्यवादी हितों का संरक्षण सुगमता से करने का अवसर प्राप्त  हो गया। 
यू एस ए के इशारे पर भारत विभाजन को धार्मिक आधार इसलिए प्रदान किया गया जिससे  इसके पीछे के साम्राज्यवादी मंसूबों को छिपाए रखा जा सके। कश्मीर के राजा हरी सिंह ने बेवजह ही नहीं भारत और पाकिस्तान से अलग एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में रहने का निर्णय किया था बल्कि उनको यू एस ए , ब्रिटेन व आर एस एस का समर्थन प्राप्त था। 




कश्मीर की बाह्य भौगोलिक स्थिति ही नहीं वरन इसके लद्दाख क्षेत्र में जोजीला दर्रे के नीचे पाया जाने वाला प्लेटिनम का आकर्षण भी यू एस ए को ललचा रहा था। ज्ञातव्य है कि प्लेटिनम न केवल स्वर्ण से भी अधिक मूल्यवान धातु है बल्कि यह यूरेनियम के निर्माण में भी सहायक है। यूरेनियम सिर्फ परमाणु बम ही नहीं परमाणु ऊर्जा में भी प्रयोग होता है इसलिए स्वतंत्र कश्मीर के शासकों को बहका कर यू एस ए इस यूरेनियम को भी हासिल करना चाहता था। किन्तु नेहरू, पटेल और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने मिल कर हरी सिंह को भारत में विलय के लिए विवश कर दिया था और कश्मीर में बाहरी लोगों के भूमि - क्रय को प्रतिबंधित करने हेतु अनुच्छेद 370 का प्राविधान संविधान में रखवाया था। यही वजह है कि आर एस एस , हिंदूमहासभा, जनसंघ ( अब भाजपा ) आदि साम्राज्यवादियों के समर्थक दल भारतीय संविधान और इसके प्राविधान अनुच्छेद 370 का शुरू से ही विरोध कर रहे हैं। मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के एक मंत्री भी संविधान बदलने की बात कह चुके हैं और अब सरकार से बाकायदा प्रस्ताव देकर मांग की जा रही है।  





अतएव अफलातून साहब की इस चेतावनी " गोलवलकरपंथी राष्ट्रतोड़क ‘राष्ट्रवादियों’ के चंगुल में देश चला गया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक होगा । इसलिए समय रहते इनके हिटलरी मंसूबों को उजागर करें और इनके खिलाफ़ चौतरफ़ा ढंग से सक्रिय हों ।" के मद्देनजर देश की जागरूक जनता और देश हितैषी दलों की मनसा - वाचा - कर्मणा एकता की महती आवश्यकता है। 
~विजय राजबली माथुर ©

Friday, February 26, 2016

जनता बाजारवाद में मस्त और पुरोहितवाद देश को खंड-खंड करने पर आमादा

 जन-संस्कृति मंच के तत्वावधान में 23 जूलाई 2015 को सम्पन्न गोष्ठी :प्रो .डॉ मेनेजर पांडे ------


 विभिन्न अखबारों तथा विद्वानों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों में डॉ पांडे द्वारा व्यक्त कुछ महत्वपूर्ण विचार प्रकाशित होने से रह गए हैं जबकि उनके वक्तव्य में वे शामिल थे । ऐसे ही प्रमुख विचारों को यहाँ लेने का प्रयास किया जा रहा है। 

डॉ पांडे ने यह भी कहा था कि  हमारे देश में वर्तमान लोकतन्त्र सिर्फ चुनाव कराने तक ही सीमित है उसके बाद इसमें जन की भागीदारी नहीं है जबकि 1789 ई . की फ्रांसीसी राज्य -क्रान्ति द्वारा जिस जनतंत्र की स्थापना की गई थी वह 'स्वतन्त्रता', 'समता' और 'बंधुत्व' पर आधारित था। अब्राहम लिंकन ने भी जनतंत्र को 'जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए' शासन कहा था। लेकिन चुनावों के बाद हमारे यहाँ 'जन' उपेक्षित हो जाता है । संसद और विधायिकाओं में जो लोग चुन कर पहुँचते हैं वे करोड़पति व्यापारी व उद्योगपति होते हैं वे ही नीतियाँ बनाते हैं जो उनके व्यापारिक हितों की पूर्ती करती हैं उनका जन सरोकारों से कोई वास्ता नहीं होता है। उनके कथन की पुष्टि 25 जूलाई 2015 को 'हिंदुस्तान' में प्रकाशित रामचन्द्र गुहा के इस लेख से भी होती है। 


 1857 के स्वातंत्र्य समर में भाग लेने वाली वन-जातियों को कुचलने हेतु 1871 में क्रिमिनल  ट्राईबल एक्ट   बनाया गया था जिसे बाद में  नेहरू जी ने  डिनोटिफाईड करवाया  था तब से अब ये  जातियाँ डिनोटिफाईड ट्राईब्स कहलाती हैं इनको नागरिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं वे मतदाता नहीं हैं।
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'सरस्वती' का संपादक बनने हेतु आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी जी ने  अपनी जमी जमाई सुविधा सम्पन्न  रेलवे की रु 50/-मासिक वेतन की नौकरी छोड़ कर रु 20/- मासिक की नौकरी कर ली थी। उनका कहना था कि, "साहित्य में वह शक्ति छिपी रहती है जो तोप,तलवार और बम के गोलों में भी नहीं पाई जाती। " साहित्य साधना के लिए उन्होने 'पत्रकारिता' को अपनाया था।
आज के माहौल में साहित्यकारों पर जो साम्राज्यवादी/ब्राह्मण वादी हमले हो रहे हैं और नरेंद्र डोभाल, गोविंद पानसरे व एम एम काल्बुर्गी सरीखे विद्वानों को मौत के घाट उतारा गया है शोद्ध छात्र रोहित वेमुला को मौत के मुंह में धकेला गया है  तथा कुछ पत्रकार फासिस्टों के दलाल बन कर जन-विरोधी कार्यों में संलग्न हैं जैसा कि नामचीन TV चेनल्स ने फर्जी वीडियो चला कर JNUSU अध्यक्ष कन्हैया कुमार को षड्यंत्र पूर्वक जेल भिजवाया है उनको आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी के व्यक्तिव व कृतित्व से प्रेरणा लेनी चाहिए कि, ब्राह्मण कुल में जन्मने के बावजूद वह लिंग-भेद व दक़ियानूसी विचारों के विरोधी रहे।
केवल ब्राह्मण वाद का उन्मूलन ही आज देश को एकजुट रखने में सहायक हो सकता है अन्यथा ये पुरोहितवाद देश को खंड-खंड करने पर आमादा है ही।
आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी सरीखे विद्वानों के विचारों का सहारा लेकर ब्राह्मण वाद/साम्राज्यवाद पर प्रहार किया जाए तो जन-समर्थन हासिल करने में सहायता मिल सकती है।


~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Monday, February 8, 2016

लोकतन्त्र, राजनीति,आस्था,अध्यात्म,धर्म : सत्यार्थ का आभाव ------ विजय राजबली माथुर

*****'डार्विन वाद ' ने मतस्य से मनुष्य तक की विकास -गाथा को रचा व माना है। इस सिद्धान्त में 'पहले अंडा ' या 'पहले मुर्गी' वाला विवाद चलता रहता है और उसका व्यावहारिक समाधान नहीं हो पाने के बावजूद उसी के अनुसार सारी व्याख्याएँ की जाती हैं।  'युवा - पुरुष ' और 'युवा - स्त्री ' वाला सिद्धान्त 'तर्कसंगत' व 'व्यावहारिक' है किन्तु इसका मखौल इसलिए उड़ाया जाता है कि, इससे सफ़ेद जाति के मध्य - यूरोपीय मनुष्यों की श्रेष्ठता का सिद्धान्त और उनका 'डार्विन वाद ' थोथा सिद्ध हो जाता है। 

'डार्विन वाद ' के अनुसार जब मानव विकास माना जाता है तब यह जवाब नहीं दिया जाता है कि शिशु मानव का पालन और विकास कैसे संभव हुआ था ? जबकि 'युवा - पुरुष ' और 'युवा - स्त्री ' वाला सिद्धान्त इसलिए  'तर्कसंगत' व 'व्यावहारिक' है क्योंकि युवा नर- व नारी न केवल अपना खुद का अस्तित्व बचाने में बल्कि  'प्रजनन' में भी सक्षम हैं और नई संतान का पालन -पोषण करने में भी। 

मध्य -यूरोपीय सफ़ेद मनुष्यों की जाति शोषण पर चल कर ही सफल हुई है और उस शोषण को निरंतर मजबूत बनाने के लिए नित्य नए-नए अनुसंधान करके नई-नई कहानियाँ गढ़ती रहती है। उसी में एक कहानी है भारत पर 'आर्यों के आक्रमण ' की जबकि आर्य कोई जाति या धर्म नहीं है।  श्रेष्ठता का प्रतीक है 'आर्ष ' जिसका अपभ्रंश है -'आर्य' अर्थात कोई भी मनुष्य जो श्रेष्ठ कर्म करता है वह आर्ष अर्थात आर्य है चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो या किसी भी नस्ल का चाहे किसी भी आस्था को अपनाने वाला।*****  मानव जीवन को सुंदर- सुखद- समृद्ध  बनाने  की धारणा वालों ने खुद को धर्म-निरपेक्ष अर्थात सद्गुणों  से रहित घोषित कर रखा है और नास्तिक भी ; साथ ही डॉ अंबेडकर के अनुयाई कहलाने वालों ने खुद को  सफ़ेद जाति के षड्यंत्र में फंस कर मूल निवासी घोषित कर रखा है। स्पष्ट है इन परिस्थितियों का पूरा-पूरा लाभ शोषणकारी  - साम्राज्यवादी /सांप्रदायिक  - ब्राह्मण वादी शक्तियाँ  उठा कर खुद को मजबूत व शोषितों को विभक्त करने में उठाती हैं। यदि हम शब्दों के खेल में न फंस कर उनके सत्य अर्थ  को समझें व समझाएँ  तो सफल हो सकते हैं अन्यथा भारत का संविधान व लोकतन्त्र नष्ट हुये बगैर नहीं रह सकता। *****




डॉ अंबेडकर द्वारा संविधान सभा में दिये गए समापन भाषण का जो अंश  इस वर्ष गणतंत्र  दिवस पर प्रकाशित हुआ है उससे साफ झलकता है कि, आज जो कुछ संविधान को नष्ट किया जा रहा है उसका उनको पूर्वानुमान था और उन्होने तभी सचेत भी कर दिया था। किन्तु निहित स्वार्थी तत्वों ने जान-बूझ कर उस चेतावनी को नज़रअंदाज़ किया जिससे मुट्ठी भर लोगों के लाभ के लिए असंख्य लोगों का अबाध शोषण व उत्पीड़न किया जा सके।इसके लिए  लोकतन्त्र, राजनीति,आस्था,अध्यात्म,धर्म सबकी मनमानी झूठी व्याख्याएँ गढ़ी गईं । विरोध व प्रतिक्रिया स्वरूप जो तथ्य सामने लाये गए स्व्भाविक तौर पर वे भी गलत ही हुये क्योंकि वे गलत व्याख्याओं पर ही तो आधारित थे। महर्षि कार्ल मार्क्स, शहीद भगत सिंह व डॉ अंबेडकर ने इसी कारण धर्म का गलत आधार पर विरोध किया है जिसके परिणाम स्वरूप पोंगापंथी, शोषण वादी पुरोहितों की गलत व्याख्याएँ और भी ज़्यादा मजबूत हो गईं हैं। हम मनुष्य तभी हैं जब 'मनन' करें किन्तु आज मनन के बजाए 'आस्था' पर ज़्यादा ज़ोर दिया जा रहा है और अदालतों तक से आस्था के आधार पर निर्णय दिये जा रहे हैं। आज 08 फरवरी, 2016 के हिंदुस्तान का जो सम्पादकीय प्रस्तुत किया गया है उसमें भी आस्था को अक्ल (मनन ) से ज़्यादा तरजीह दी गई है। 


अबसे दस लाख वर्ष पूर्व  पृथ्वी पर जब 'मनुष्य की उत्पति ' हुई  तो वह 'युवा - पुरुष ' और 'युवा - स्त्री ' के रूप तीन क्षेत्रों - अफ्रीका, मध्य - यूरोप व 'त्रि वृष्टि' (तिब्बत ) में एक साथ हुई थी। भौगोलिक प्रभाव से तीनों क्षेत्रों के मनुष्यों के रंग क्रमशः काला, सफ़ेद व गेंहुआ हुये। प्रारम्भ में तीनों क्षेत्रों की मानव - जाति का विकास प्रकृति द्वारा उपलब्ध सुविधाओं पर निर्भर था। किन्तु कालांतर में सफ़ेद रंग के मध्य यूरोपीय मनुष्यों ने खुद को सर्व- श्रेष्ठ घोषित करते हुये तरह- तरह की कहानियाँ गढ़ डालीं और उनकी पुष्टि के लिए मानव-विकास के क्रम को अपने अनुसार लिख डाला। 

'डार्विन वाद ' ने मतस्य से मनुष्य तक की विकास -गाथा को रचा व माना है। इस सिद्धान्त में 'पहले अंडा ' या 'पहले मुर्गी' वाला विवाद चलता रहता है और उसका व्यावहारिक समाधान नहीं हो पाने के बावजूद उसी के अनुसार सारी व्याख्याएँ की जाती हैं।  'युवा - पुरुष ' और 'युवा - स्त्री ' वाला सिद्धान्त 'तर्कसंगत' व 'व्यावहारिक' है किन्तु इसका मखौल इसलिए उड़ाया जाता है कि, इससे सफ़ेद जाति के मध्य - यूरोपीय मनुष्यों की श्रेष्ठता का सिद्धान्त और उनका 'डार्विन वाद ' थोथा सिद्ध हो जाता है। 

'डार्विन वाद ' के अनुसार जब मानव विकास माना जाता है तब यह जवाब नहीं दिया जाता है कि शिशु मानव का पालन और विकास कैसे संभव हुआ था ? जबकि 'युवा - पुरुष ' और 'युवा - स्त्री ' वाला सिद्धान्त इसलिए  'तर्कसंगत' व 'व्यावहारिक' है क्योंकि युवा नर- व नारी न केवल अपना खुद का अस्तित्व बचाने में बल्कि  'प्रजनन' में भी सक्षम हैं और नई संतान का पालन -पोषण करने में भी। 

मध्य -यूरोपीय सफ़ेद मनुष्यों की जाति शोषण पर चल कर ही सफल हुई है और उस शोषण को निरंतर मजबूत बनाने के लिए नित्य नए-नए अनुसंधान करके नई-नई कहानियाँ गढ़ती रहती है। उसी में एक कहानी है भारत पर 'आर्यों के आक्रमण ' की जबकि आर्य कोई जाति या धर्म नहीं है।  श्रेष्ठता का प्रतीक है 'आर्ष ' जिसका अपभ्रंश है -'आर्य' अर्थात कोई भी मनुष्य जो श्रेष्ठ कर्म करता है वह आर्ष अर्थात आर्य है चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो या किसी भी नस्ल का चाहे किसी भी आस्था को अपनाने वाला।  

किन्तु आर्य को एक जाति और भारत में आक्रांता घोषित करने वाले सिद्धान्त ने यहाँ के निवासियों को अंत हींन  विवादों व संघर्षों में उलझा कर रख दिया है  'मूल निवासी आंदोलन ' भी उसी की एक कड़ी है। ' नास्तिक वाद' भी उसी  थोथे सिद्धान्त का खड़ा हुआ विभ्रम है। वस्तुतः शब्दों के खेल को समझ कर  'मनन' करने व सच्चा  मनुष्य बनने की ज़रूरत है और मानव-मानव में  विभेद करने वालों को बेनकाब करने की । 

मनुष्य   = जो मनन कर सके। अन्यथा 'नर-तन' धारी पशु। 
आस्तिक = जिसका स्वम्य  अपने ऊपर विश्वास हो। 
नास्तिक = जिसका अपने ऊपर विश्वास न हो। 
अध्यात्म = अध्यन  अपनी  आत्मा का । न कि  अपनी आत्मा से परे। 
धर्म = जो मनुष्य तन व समाज को धारण  करने हेतु आवश्यक है , यथा --- सत्य, अहिंसा (मनसा - वाचा - कर्मणा ), अस्तेय, अपरिग्रह व ब्रह्मचर्य। 
भगवान = भ (भूमि-पृथ्वी )+ ग (गगन -आकाश )+ व (वायु - हवा )+I ( अनल - अग्नि ) + न  (नीर - जल )। 
खुदा = चूंकि ये पांचों तत्व खुद ही बने हैं इनको किसी मनुष्य ने नहीं बनाया है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं। 
GOD = G (जेनरेट )+ O (आपरेट ) + D (डेसट्राय )। इन तत्वों का कार्य  उत्पति - पालन - संहार = GOD है। 

मानव जीवन को सुंदर- सुखद- समृद्ध  बनाने  की धारणा वालों ने खुद को धर्म-निरपेक्ष अर्थात सद्गुणों  से रहित घोषित कर रखा है और नास्तिक भी ; साथ ही डॉ अंबेडकर के अनुयाई कहलाने वालों ने खुद को  सफ़ेद जाति के षड्यंत्र में फंस कर मूल निवासी घोषित कर रखा है। स्पष्ट है इन परिस्थितियों का पूरा-पूरा लाभ शोषणकारी  - साम्राज्यवादी /सांप्रदायिक  - ब्राह्मण वादी शक्तियाँ  उठा कर खुद को मजबूत व शोषितों को विभक्त करने में उठाती हैं। यदि हम शब्दों के खेल में न फंस कर उनके सत्य अर्थ  को समझें व समझाएँ  तो सफल हो सकते हैं अन्यथा भारत का संविधान व लोकतन्त्र नष्ट हुये बगैर नहीं रह सकता। 


  ~विजय राजबली माथुर ©
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Saturday, February 8, 2014

इन दो खबरों की चर्चा क्यों ज़रूरी है ?---विजय राजबली माथुर







Face Book:06 Feb.2014 ---




उपरोक्त तीन चित्रों से ही सारी स्थिति स्पष्ट है। परंतु प्रत्येक व्यक्ति अपनी सोच व समझ के अनुसार अलग-अलग विश्लेषण करता है। जहां एक ओर परस्पर एकजुट 11 दल इसके महत्व को रेखांकित करते हैं वहीं दूसरी ओर इनके विरोधी इनके अंतर्विरोधों को उजागर करते हैं। जहां इन ग्यारह दलों का एका सांप्रदायिकता को रोकने के विरोध में बताया जा रहा है वहीं इस बीच में ही इनमें से एक महत्वपूर्ण दल-भाकपा के लखनऊ -ज़िला मंत्री रह चुके ,बाद में राष्ट्रवादी  कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वे-सर्वा बने,मुलायम सिंह मंत्रीमंडल के पूर्व सदस्य कौशल किशोर जी ने अपनी पार्टी का भाजपा में विलय करते हुये भाजपा को कांग्रेस,बसपा व सपा से कम सांप्रदायिक बताया है।

निश्चय ही अपने-अपने स्वार्थों के अनुसार परिस्थितियों का विश्लेषण किया जाएगा। तब भी जो महत्वपूर्ण बात है वह यह है कि भाकपा में महत्वपूर्ण पदाधिकारी रहा व्यक्ति भाजपा में सहर्ष कैसे चला गया? हालांकि पहले भी भाकपा छोड़ कर एक महिला वकील भाजपा सरकार में मंत्री रही हैं । ऐसा क्यों होता है क्या सिर्फ व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण ही? फिर कम्युनिस्ट नैतिकता का क्या हुआ? साम्राज्यवाद के विरोधी साम्यवाद का सिपाही कैसे साम्राज्यवाद की सहोदरी सांप्रदायिकता का वरण कर लेता है? इस प्रश्न का जवाब देने से बचने हेतु स्वार्थ-लोलुपता का आरोप लगा देना बेहतर रहता है और वही किया गया है।

चन्द्र्जीत यादव भाकपा छोड़ कर कांग्रेस सरकार में मंत्री बने तब भी यही आरोप था। मित्रसेन यादव  और रामचन्द्र बख्श सिंह भाकपा से अलग हुये तब भी यही आरोप था। लेकिन इस आरोप पर भी ध्यान देने की नितांत आवश्यकता है:

Face Book : 06-02-2014 ---

'आत्मालोचना' की चर्चा कम्युनिस्टों में आम बात है। लेकिन दलितों-पिछड़ों की उपेक्षा  से संबन्धित आत्मालोचना की आवश्यकता शायद  उचित नहीं  समझी गई है। डॉ अंबेडकर क्यों नहीं कम्युनिस्ट बन सके इस बात की आत्मालोचना करने के बजाए उनको ही साम्राज्यवाद का पोषक घोषित कर दिया गया है। क्यों डॉ अंबेडकर को यह कहना पड़ा कि हिन्दू के रूप में उनका जन्म न होता यह तो उनके बस में न था किन्तु हिन्दू के रूप में मृत्यु न हो यह उनके बस में है? और इसी लिए मृत्यु से छह माह पूर्व उन्होने 'बौद्ध मत'ग्रहण कर लिया था। गौतम बुद्ध को क्यों प्रचलित कुरीतियों के विरोध में मुखर होना पड़ा और वे कुरीतियाँ क्यों और किसके हित में प्रचलित की गई थीं इस तथ्य पर ध्यान दिये बगैर केवल 'एथीस्ट' कहने या 'मार्क्स' का जाप करते रहने से भारत में 'साम्यवाद' को स्थापित नहीं किया जा सकता -न ही संसदीय लोकतन्त्र के जरिये और न ही सशस्त्र क्रान्ति के जरिये। यदि पारस्परिक फूट से साम्राज्यवाद 1857 की क्रांति को कुचलने में कामयाब न होता तो महात्मा गांधी को 'सत्य-अहिंसा' की आवाज़ न बुलंद करनी पड़ती। जब साम्राज्यवाद विरोधी आपस में भिड़ कर खुद को कमजोर करते जाएँगे तब साम्राज्यवाद को खुद को मजबूत करने का अधिक प्रयत्न  भी नहीं करना पड़ेगा और जनता आसानी से गुमराह होती जाएगी। 

देशी-विदेशी कारपोरेट/RSS/मनमोहन गठजोड़ ने बड़ी चालाकी से आ आ पा/केजरीवाल को विकल्प के रूप में साम्राज्यवादी हितों के मद्देनजर खड़ा कर दिया है तथा साम्यवादी दलों में शामिल 'ब्राह्मणवादी' खुल कर उनका समर्थन कर रहे हैं । उत्तर-प्रदेश भाकपा का तिवारी/पांडे गुट जो मुलायम सिंह की आड़ में वरिष्ठ कामरेड बर्द्धन जी एवं प्रदेश के ही जुझारू नेता अनजान साहब के विरुद्ध अनर्गल अभियान चलाये हुये था अब आ आ पा /केजरीवाल के समर्थन में अभियान चलाये हुये है।  इसी गुट ने दिवंगत कामरेड जंग बहादुर व कामरेड झारखण्डे राय की मूर्तियों का मुलायम सिंह जी द्वारा अनावरण होने से रुकवा दिया जबकि दिवंगत कामरेड सरजू पांडे की मूर्ती का अनावरण मुलायम सिंह जी द्वारा पूर्व में सम्पन्न हो चुका था। इसके पीछे कौन सी मनोदशा हो सकती है समझना कठिन नहीं है। वैसे एथीस्ट कम्युनिस्ट कैसे मूर्ती-पूजक हो गए? यह भी विचारणीय होना चाहिए क्योंकि 'पदार्थ-विज्ञान (MATERIAL-SCIENCE) पर आधारित यज्ञ-हवन का तो मखौल एथीस्ट के नाम पर ही उड़ाया जाता है। 

1925 में जबसे भारत में कम्युनिस्ट पार्टी का प्रादुर्भाव हुआ है तभी से ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपने हितार्थ RSS का गठन इसकी काट के लिए करवा लिया था। 1930 में डॉ लोहिया/जयप्रकाश नारायण/आचार्य नरेंद्र देव की 'कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी' (जिसकी उत्तराधिकारी आज की 'सपा' है) भी कम्युनिस्ट प्रभाव को क्षीण करने हेतु ही गठित हुई थी। डॉ लोहिया और जयप्रकाश जी की मदद से ही RSS भारतीय राजनीति में प्रभावी भूमिका में आ सका है फिर भी उनके उत्तराधिकारी जिनके संबंध भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह व बाबरी ध्वंस के लिए उत्तरदाई कल्याण सिंह से मधुर बने हुये हैं को साप्रदायिकता का प्रबल प्रतिरोधक बताया जा रहा है क्यों?  क्यों केरल की जन्मना ब्राह्मण जयललिता जी को अघोषित  रूप से भावी पी एम बनाने की पहल है? क्यों नहीं उनके बजाए मायावती जी को पी एम बनाने की पहल हुई?  यह चुनाव एक ऐतिहासिक अवसर लेकर आ रहा है जब कम्युनिस्ट आंदोलन डॉ अंबेडकर की उपेक्षा के आरोप से उबरने हेतु मायावती का समर्थन करके लाभान्वित होने की कोशिश कर सकता था। 

तामिलनाड में यदि इन्दिरा कांग्रेस ने राज्यसभा सदस्य रेखा जी  जिनका  राजनीतिक समय अभी काफी अच्छा चल रहा है को प्रचार में आगे कर दिया तो सी एन अन्नादुराई का 1967 से स्थापित चमत्कार इस बार  समाप्त हो सकता है । क्या एक मार्क्सवादी विचारक जेमिनी गणेशन की पुत्री होने के कारण रेखा साम्यवादी दलों का समर्थन नहीं प्राप्त कर सकती थीं?

इसी प्रकार पश्चिम बंगाल में यदि वामपंथी मोर्चा ममता बनर्जी से तालमेल करके चुनाव लड़ता तो वहाँ की सभी सीटों पर जीत हासिल करता। सहृदयता और सादगी की छाप ममता जी में निम्न चित्र में उनकी हस्त-रेखाओं द्वारा स्पष्ट समझी जा सकती है। फिर ब्राह्मण जयललिता के मुक़ाबले ब्राह्मण ममता बनर्जी क्यों कुबूल नहीं हुईं?:
यदि यहाँ भी चतुर कांग्रेस ने ममता बनर्जी से अंदरूनी ही सही तालमेल कर लिया और उत्तर प्रदेश में मायावती से  तो क्या स्थिति वही रहेगी जिसकी 11 दलीय मोर्चा की स्थापना में कल्पना की गई है? जनार्दन दिवेदी जी का यह बयान कि 2009 में कांग्रेस को सरकार बनाने की बजाए विपक्ष में बैठना चाहिए था यों ही नहीं दिया गया है। इसके निहितार्थ समझे जाने चाहिए कि इस कार्यकाल में जो कुछ भी गलत हुआ है उसके लिए केवल और केवल मनमोहन जी उत्तरदाई हैं न कि इंदिरा कांग्रेस। 2009 में सोनिया जी ने प्रणव मुखर्जी साहब को पी एम बनाना चाहा था किन्तु मनमोहन जी दुबारा बनने के लिए अड़े हुये थे और भय यह भी था कि वह बदले जाने की स्थिति में भाजपा के समर्थन से डटे रह सकते हैं। बीच में भी जब उनको राष्ट्रपति बनाने की कोशिश हुई तो ममता जी के सहज भाव से प्रेस में कह देने के कारण वह एलर्ट हो गए और जापान से लौटते में विमान में ही पत्रकार वार्ता में कह दिया कि वह जहां हैं वहीं ठीक हैं अर्थात यदि उनको हटाने का प्रयास हुआ तो वह भाजपा के समर्थन से डटे रहेंगे। उन्होने बड़ी चतुराई  से हज़ारे द्वारा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन खड़ा  करवा दिया जिसकी उपज आ आ पा/केजरीवाल हैं। उनसे मुक्ति पाने के लिए इस बार कांग्रेस के पास विकल्प किसी अन्य दल के नेता को समर्थन देना ही बचता है और इस दृष्टि से ममता बनर्जी ज़्यादा अनुकूल स्थिति में रहेंगी। इस तथ्य पर ज़रा सा भी गौर नहीं किया गया है। 

संसदीय साम्यवादी आंदोलन के कमजोर होने का अर्थ क्रांतिकारी गुटों को सबलता प्रदान करना है जिनको कुचलना कारपोरेट समर्थक सरकारों के लिए बहुत आसान होगा। आने वाले समय में उत्पीड़ित -शोषित जनता यदि इन क्रांतिकारी साम्यवादियों के समर्थन में खड़ी हो जाये तो ये सफलता की ओर भी बढ़ सकते हैं किन्तु उस दशा में कारपोरेट के समर्थन से RSS खुल कर इनके प्रतिरोध में हिंसा भड़का देगा और देश गृह-युद्ध की विभीषिका में फंस सकता है जिसका सीधा-सीधा लाभ अंतर्राष्ट्रीय साम्राज्यवादी शक्तियों को मिलेगा। अभी भी समय है कि संसदीय साम्यवादी आंदोलन समय की नज़ाकत को पहचान कर कदम बढ़ा सकता है और संसदीय लोकतन्त्र व देश की रक्षा कर सकता है।
  ~विजय राजबली माथुर ©
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Sunday, January 19, 2014

वास्तविकता से मुंह मोड़ना है -'राजनीति' और 'राजनीतिज्ञों' पर प्रहार---विजय राजबली माथुर

  

आज जब अराजनीति की घोषणा करते करते आ आ पा (AAP) दिल्ली विधानसभा के जरिये सरकार बना चुकी है राजेन्द्र घोड़पकर जी का प्रस्तुत लेख वास्तविकता का ध्यानाकर्षण करता है। लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व जब हज़ारे/केजरी आंदोलन 'राजनीति' और 'राजनीतिज्ञों' पर प्रहार  करके जनता को गुमराह कर रहा था तब मैंने फेसबुक पर निम्नांकित  यह स्टेटस दे कर लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया था। प्रस्तुत लेख मेरे प्रयास को सकारात्मक सिद्ध करता है।

वास्तविकता से मुंह मोड़ना है -'राजनीति' और 'राजनीतिज्ञों' पर प्रहार:

July 14, 2012 at 10:27am


गुवाहाटी,लखनऊ के पुलिस थाना  और बागपत की खाप पंचायत की आड़ मे उदभट्ट विद्वान 'राजनीति' और 'राजनीतिज्ञों' को जम कर कोस रहे हैं और इस प्रकार प्रकारांतर से वे RSS तथा भ्रष्ट IAS आफ़ीसर्स द्वारा देश मे अर्द्ध-सैनिक तानाशाही स्थापित होने पर जनता को उसका स्वागत करने हेतु तैयार कर रहे हैं।

समाज मे व्याप्त 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' जिसे धर्म के नाम पर पूजा जा रहा है ही वस्तुतः उच्श्रंखलता हेतु उत्तरदाई है। धन और धनवानों को अनावश्यक सम्मान उसमे और इजाफा कर देता है। दक़ियानूसी और संकीर्ण सोच वाले साम्यवादी विद्वान सिर्फ और सिर्फ 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' को ही धर्म मानते हैं। अतः वे सिरे से ही धर्म को खारिज करते हुये उसे अफीम कह कर आलोचना करते हैं परिणामतः पाखंडियों को लूट का खुला मैदान मिल जाता है।

अज्ञान या न समझने की ज़िद्द के कारण ये विद्वान जनता को वास्तविक 'धर्म' से परिचित नहीं होने देना चाहते हैं। यदि जनता को समझाया जाए कि 'धर्म' वह नहीं है जिसे पाखंडी पुरोहितवादी/ब्राह्मणवादी कहते हैं तो सभी समस्याओं पर काबू पाया जा सकता है। जड़ पर प्रहार न करके राजनीति और राजनीतिज्ञों पर हमला करना लोकतन्त्र/जनतंत्र की जड़ों मे 'मट्ठा' डालना है।

~विजय राजबली माथुर ©
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Sunday, August 5, 2012

सीमा आज़ाद और उनके पति को रिहा किया जाये

सीमा आज़ाद के जन्मदिवस 05 अगस्त पर ---

हम सीमा आज़ाद को जन्मदिन की मुबारकवाद देते हैं और उनके सुखद,सुंदर,स्वस्थ,समृद्ध और उज्ज्वल पारिवारिक,सामाजिक,राजनीतिक भविष्य  एवं दीर्घायुष्य  की मंगलकामना तथा उनके और उनके पति की शीघ्र रिहाई की आशा करते हैं। 



 सीमा-विश्वविजय रिहाई मंच के द्वारा 19 जूलाई 2012 को जारी प्रेस नोट मे  अध्यक्ष की 04 जूलाई की प्रेस कान्फरेंस के हवाले से कहा गया है कि-
“पत्रकार सीमा आजाद और विश्वविजय के पास वास्तव में कोई माओवादी साहित्य था ही नहीं. पुलिस ने जो भी आपत्तिजनक साहित्य बरामद दिखाया, वह सब उन्हें झूठा फंसाने की उच्च-स्तरीय साज़िश के तहत फर्जी तरीके से दिखाया गया था.”

01 जूलाई को नैनी जेल मे मिलने गए प्रतिनिधिमंडल से  सीमा आजाद ने  कहा कि उनके पास कोई माओवादी साहित्य था ही नहीं. जो किताबें वह दिल्ली स्थित विश्व पुस्तक मेले से खरीद लायी थीं उनमें उम्दा किस्म की साहित्यिक रचनाएँ थीं. जिनकी सूची उन्होंने उक्त जेल मुलाकात के दौरान नोट भी करा दी।  इसी आधार पर उक्त प्रतिनिध-मंडल में शामिल ‘सीमा-विश्वविजय रिहाई मंच’ के तदर्थ अध्यक्ष जीपी मिश्र ने पत्रकार वार्ता में यह बयान दिया था।

हिमांशु कुमार जी ने अपने फेसबुक स्टेटस द्वारा जागरूक छात्रों, महिलाओं, मजदूरों, किसानों और लोकतंत्र-पसंद बुद्धिजीवियों से  UAPA और 121, 121A, 124A आईपीसी जैसे काले कानूनों के तहत तमाम बेक़सूर युवाओं, साहसी पत्रकारों एवं समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं को फर्जी मुकदमों में फंसाये जाने के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए सीमा आज़ाद के जन्मदिन 05 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंत्र मे साँय 05 बजे एकत्र होने का आह्वान किया है।

हम जो लोग दिल्ली नहीं पहुँच सके  सीमा आज़ाद के जन्मदिन पर उनके और उनके पति की रिहाई की मांग करते हैं।  8 जून को अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश श्री सुनील कुमार सिंह की अदालत द्वारा ढाई साल से नैनी केन्द्रीय कारागार में निरुद्ध रही सीमा आजाद और उनके पति विश्वविजय को विभिन्न धाराओं में उम्र कैद की सज़ा सुना दी थी जबकि हकीकत यह थी कि सीमा आज़ाद अवैध्य खनन माफिया के विरुद्ध अभियान चला रही थीं। गैर कानूनी कारोबारियों को बचाने के लिए कानून का गलत प्रयोग करके सीमा आज़ाद और उनके पति को जेल मे रखा गया है। आज सीमा आज़ाद के जन्मदिन पर उनकी ही आवाज़ मे ये पाँच क्रांतिकारी गीत सुनिए-




   

Thursday, April 5, 2012

संसदीय लोकतन्त्र और साम्यवाद


कल 06 अप्रैल - दंतेवाड़ा त्रासदी की वर्षगांठ के अवसर पर हम आज  यह बताना चाहते हैं कि 'हिंसा' को छोड़ कर अपने संसदीय लोकतन्त्र के माध्यम से ही हम 'मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध' बनाने हेतु प्रयास करके सफल हो सकते हैं। दो वर्ष पूर्व इस त्रासदी पर मैंने समाधान हेतु विचार प्रस्तुत किए थे ,पहले उनमे से कुछ का अवलोकन करें जो इस प्रकार हैं-

दंतेवाडा आदि नक्सली आन्दोलनों का समाधान हो सकता है सर्वप्रथम दोनों और की हिंसा को विराम देना होगा फिर वास्तविक धर्म अथार्त सत्य,अहिंसा,अस्तेय,अपरिग्रह,ब्रहम्चर्य का वस्तुतः पालन करना होगा.

सत्य-सत्य यह है कि गरीब मजदूर-किसान का शोषण व्यापारी,उद्योगपति,साम्राज्यवादी सब मिलकर कर रहे हैं.यह शोषण अविलम्ब समाप्त किया जाये.
अहिंसा-अहिंसा मनसा,वाचा,कर्मणा होनी चाहिए.शक्तिशाली व सम्रद्द वर्ग तत्काल प्रभाव से गरीब किसान-मजदूर का शोषण और उत्पीडन बंद करें.
अस्तेय-अस्तेय अथार्त चोरी न करना,गरीबों के हकों पर डाका डालना व उन के निमित्त सहयोग –निधियों को चुराया जाना तत्काल  प्रभाव से बंद किया जाये.कर-अप्बंचना समाप्त की जाये.
अपरिग्रह-जमाखोरों,सटोरियों,जुअरियों,हवाला व्यापारियों,पर तत्काल प्रभाव से लगाम कसी जाये और बाज़ार में मूल्यों को उचित स्तर पर आने दिया जाये.कहीं नोटों को बोरों में भर कर रखने कि भी जगह नहीं है तो अधिकांश गरीब जनता भूख से त्राहि त्राहि कर रही है इस विषमता को तत्काल दूर किया जाये.
ब्रह्मचर्य -धन का असमान और अन्यायी वितरण ब्रहाम्चर्य व्यवस्था को खोखला कर रहा हैऔर इंदिरा नगर लखनऊ के कल्याण अपार्टमेन्ट जैसे अनैतिक व्यवहारों को प्रचलित कर रहा है.अतः आर्थिक विषमता को अविलम्ब दूर किया जाये.चूँकि हम देखते हैं कि व्यवहार में धर्मं का कहीं भी पालन नहीं किया जा रहा है इसीलिए तो आन्दोलनों का बोल बाला हो रहा है. दंतेवाडा त्रासदी खेदजनक है किन्तु इसकी प्रेरणा स्त्रोत वह सामाजिक दुर्व्यवस्था है जिसके तहत गरीब और गरीब तथा अमीर और अमीर होता जा रहा है.कहाँ हैं धर्मं का पालन कराने वाले?पाखंड और ढोंग तो धर्मं नहीं है,बल्कि यह ढोंग और पाखण्ड का ही दुष्परिणाम है  कि शोषण और उत्पीडन की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं.जब क्रिया होगी तो प्रतिक्रिया होगी ही.


शुद्द रहे व्यवहार नहीं,अच्छे आचार नहीं.
इसीलिए तो आज ,सुखी कोई परिवार नहीं.


उत्तर प्रदेश और पंजाब के पिछले विधान सभा चुनावों मे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने बाम-पंथी मोर्चा बना कर चुनाव लड़े थे किन्तु जनता का समर्थन न मिल सका। अब पटना सम्मेलन के बाद यू पी मे सत्तारूढ़ सपा को लेकर तीसरा मोर्चा बनाने का प्रयास भाकपा द्वारा किया जा रहा है। संसदीय लोकतन्त्र मे ऐसे प्रयास ठीक हैं। परंतु बाम-पंथी और साम्यवादी सपनों का देश बनाने मे इन प्रयासों से कुछ भी भला न हो सकेगा,उल्टे साम्यवादी दल एवं बाम-पंथ भी बदनाम होगा जिससे अब तक बचा हुआ है। 

जातिगत,सांप्रदायिक आधार लेकर कारपोरेट जगत के सहारे से सत्तारूढ़ सपा व्यवहारिक सोच मे 'समाजवादी' नहीं है। 
न तो सपा डॉ लोहिया के आदर्शों पर ही चल रही है और न ही डॉ लोहिया के विचार साम्यवाद के लिए सहायक हैं जैसा कि सत्यनारायन ठाकुर साहब ने अपने लेखों की श्रंखला मे स्पष्ट किया था। उस पर मैंने यह टिप्पणी दी थी-

"सत्य नारायण ठाकुर साहब ने डा. लोहिया के विचारों के विरोधाभास को उजागर करते हुए तीन कड़ियों में विस्तार से बताया है उस पर ध्यान देने की पर्मावाश्यक्ता है.
वस्तुतः डा.लोहिया ने १९३० में 'कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी'की स्थापना १९२५ में स्थापित भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी'और इसके आंदोलन को विफल करने हेतु की थी.
स्वामी दयानंद के नेतृत्व में 'आर्य समाज'के माध्यम से देश की आजादी की जो मांग १८७५ में उठी थी उसे दबाने हेतु १८८५ में कांग्रेस की स्थापना रिटायर्ड आयी.सी.एस.श्री ह्यूम द्वारा वोमेश बेनर्जी की अध्यक्षता में हुयी थी जिसमें आर्य समाजियों ने घुस कर आजादी की मांग उठाना शुरू कर दिया था.बाद में कम्यूनिस्ट भी कांग्रेस में घुस कर ही स्वाधीनता आंदोलन चला रहे थे.
१९२० में स्थापित हिन्दू महासभा के विफल रहने पर १९२५ में आर.एस.एस. की स्थापना अंग्रेजों के समर्थन और प्रेरणा से हुयी जिसने आर्य समाज को दयानंद के बाद मुट्ठी में कर लिया तब स्वामी सहजानंद एवं गेंदा लाल दीक्षित सरीखे आर्य समाजी कम्यूनिस्ट आंदोलन में शामिल हो गए थे.
सी.एस. पी की वजह से जनता भ्रमित रही और क्रांतिकारी ही कम्यूनिस्ट हो सके.
डा.लोहिया ने अपनी पुस्तक'इतिहास चक्र'में साफ़ लिखा है 'साम्यवाद' और पूंजीवाद'सरीखा कोई भी वाद भारत के लिए उपयोगी नहीं है .
हम कम्यूनिस्ट जनता को यह नहीं समझाते थे -कम्यूनिज्म भारतीय अवधारणा है जिसे मैक्समूलर साहब की मार्फ़त महर्षि मार्क्स ने ग्रहण करके 'दास केपिटल'लिखा था.हमने धर्म को अधर्मियों के लिए खुला छोड़ दिया और कहते रहे-'मैन हेज क्रियेटेड गाड फार हिज मेंटल सिक्यूरिटी आनली'.हम जनता को यह नहीं समझा सके -जो शरीर को धारण करे वह धर्म है.नतीजा यह रहा जनता को भटका कर धर्म के नाम पर शोषण को मजबूत किया गया. डा.लोहिया भी रामायण मेला आदि शुरू कराकर जनता को जागृत करने के मार्ग में बाधक रहे.

आज यदि हम धर्म की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करके जनता को स्वामी दयानद,विवेकानंद,कबीर और कुछ हद तक गौतम बुद्ध का भी सहारा लेकर समझा सकें तो मार्क्सवाद को भारत में सफल कर सकते हैं जो यहीं सफल हो सकता है.यूरोपीय दर्शन जो रूस में लागू हुआ विफल हो चुका है.केवल और केवल भारतीय दर्शन ही मार्क्सवाद को उर्वर भूमि प्रदान करता है,यदि हम उसका लाभ उठा सकें तो जनता को राहत मिल सके.व्यक्तिगत स्तर पर मैं अपने 'क्रांतिस्वर' के  माध्यम से ऐसा ही कर रहा हूँ.परन्तु यदि सांगठनिक-तौर पर  किया जा सके तभी सफलता मिल सकती है।" 



हमारे कामरेड्स के बीच यह बड़ी गलतफहमी है कि धर्म कम्यूनिज़्म का विरोधी है। चूंकि वे पोंगा-पंथियों के प्रलाप को ही धर्म मानते हैं इसलिए ऐसा सोचते हैं। बात-बात मे चीन का उदाहरण देने वाले हमारे कामरेड्स बंधु इस समाचार पर गौर करके अमल करें तो लाभान्वित हो सकते हैं-


हिंदुस्तान,आगरा,23 फरवरी,2007
इसी ब्लाग के माध्यम से व्यक्तिगत-स्तर पर मै तो  'धर्म' की वास्तविक व्याख्या बार-बार समझाने का प्रयास करता रहूँगा तथा ढोंग-पाखंड का प्रबल विरोध करता रहूँगा किन्तु दुख और खेद के साथ कहना चाहता हूँ कि हमारे कामरेड साथी ही जो धर्म को सिरे से ही खारिज करते हैं अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन मे धर्म के नाम पर प्रदूषित पोंगा-पंथ का खूब अनुसरण करते है-मंदिर,मस्जिद और मजारों,चर्च और गुरुद्वारों  तक जाते हैं। जबकि मै केवल वैज्ञानिक 'हवन' ही करता हूँ और किसी भी प्रकार के  ढ़ोंगी स्थानो  पर जाने से परहेज करता हूँ। 


भारत मे लोकतान्त्रिक रूप से साम्यवादी -सत्ता स्थापित करने हेतु जनता को वास्तविक -वैज्ञानिक 'धर्म' से परिचय कराना ही होगा -आज नहीं तो कल। अन्यथा तीसरे-चौथे मोर्चे के नाम पर फिर वही लुटेरे राज करते रहेंगे।सी पी आई और सी पी एम के विलय के प्रयास भी हो रहे हैं केवल इतने मात्र से साम्यवादी विचार -धारा को 'हिन्दी क्षेत्र' मे समर्थन नहीं हासिल हो सकेगा। डॉ राम मनोहर लोहिया,राजर्षि पुरुषोत्तम दास  टंडन,सरदार पटेल,लाल बहादुर शास्त्री जी,चौ.चरण सिंह  आदि ऐसे ख्याति प्राप्त राष्ट्रीय नेता रहे हैं जिनहोने बड़े ही सुनियोजित ढंग से हिन्दी क्षेत्र मे साम्यवादी आंदोलन को कुचला और दबाया था। जब हम हिन्दी क्षेत्र मे साम्यवादी आंदोलन की पुनः प्रतिष्ठा करने का प्रयास करेंगे तो हमे जनता को यह भी समझाना पड़ेगा कि इन प्रसिद्ध नेताओ ने 'धर्म की गलत व्याख्या' को समर्थन देने के कारण साम्यवाद का विरोध किया था। ऐसा करने से ही हम जनता का समर्थन सत्ता हेतु प्राप्त कर सकेंगे। अन्यथा जनता अपनी मूलभूत समस्याओ का निराकरण साम्यवादियों से कराती रहेगी और चुनावो मे वोट जातीय और धार्मिक आधार पर देती रहेगी। आखिर क्या वजह है कि हम जनता को 'धर्म' के वास्तविक अर्थ समझा कर उसका ठोस समर्थन हासिल नहीं कर सकते?