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Wednesday, July 24, 2019

विचारों से समृद्ध एवं प्रारब्ध के धनी : कन्हैया कुमार ------ विजय राजबली माथुर




  

इस साक्षात्कार में कन्हैया कुमार की परिपक्वता का जो परिलक्षण हुआ है उसका अनुमान लगाते हुये 18 मार्च 2016 को एक लेख दिया था उसे पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है , पहले उनको भाकपा की राष्ट्रीय परिषद में और अब राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल कर लिया गया है जो पूर्व - व्यक्त अनुमानों का ही  स्पष्ट पुष्टीकरण है।  












Friday, 18 March 2016
प्रारब्ध के धनी व विचारों से समृद्ध कन्हैया कुमार ------ विजय राजबली माथुर
https://communistvijai.blogspot.com/2016/03/blog-post_18.html






वह वैचारिक प्रचलित आधार पर खुद को 'नास्तिक ' कहते हैं , किन्तु स्वामी विवेकानंद के अनुसार 'नास्तिक' वह है जिसका खुद अपने ऊपर विश्वास न हो जबकि 'आस्तिक' वह है जिसका अपने ऊपर पूर्ण विश्वास हो ।  जो लोग खुद पर नहीं किसी अदृश्य पर विश्वास करते हैं वे नास्तिक अथवा ढ़ोंगी हैं। हम स्वामी विवेकानंद की परिभाषा के अनुसार कन्हैया को 'पूर्ण आस्तिक' कह सकते हैं। वह पूर्ण आध्यात्मिक भी हैं क्योंकि अध्यात्म का अर्थ है अध्यन + आत्मा अर्थात अपनी आत्मा का अध्यन ; कन्हैया ने प्रत्येक भाषण में खुद अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति करने की बात कही है। स्पष्ट है वह अपना आत्मावलोकन करके ही वेदना व्यक्त कर रहे हैं।  जो लोग पाखंड और आडंबर को अध्यात्म बताते हैं वे भी वस्तुतः ढ़ोंगी ही हैं।

मानव जीवन को 'सुंदर, सुखद व समृद्ध' बनाने का मार्ग बताने वाला विज्ञान ही ज्योतिष है और इसका 'रेखा गणितीय' विश्लेषण 'हस्त रेखा विज्ञान' कहलाता है। जो लोग बाएँ हाथ को स्त्रियों  का व दायें को पुरुषों का बता कर विश्लेषण करते हैं वे पूर्णत :  सही विश्लेषण प्रस्तुत नहीं करते हैं। इसी प्रकार जो लोग बाएँ हाथ को बेरोजगारों व दायें हाथ को सरोजगारों के लिए निर्धारित करते हैं वे भी अपूर्ण निष्कर्ष तक ही पहुँचते हैं।

वस्तुतः स्त्री-पुरुष एवं रोजगार-बेरोजगार का विभेद किए बगैर बाएँ हाथ से किसी भी मनुष्य के  जन्मगत 'प्राब्ध'/भाग्य/LUCK का ज्ञान प्राप्त होता है और उसके दायें हाथ से व्यावहारिक तौर पर  कर्मगत उसने जो प्राप्त/अर्जित किया है उसका ज्ञान होता है। उपरोक्त चित्रों में कन्हैया का बायाँ हाथ जितना स्पष्ट है उतना ही दायाँ हाथ भी स्पष्ट है। उनकी भाग्य रेखा दोनों हाथों में मणिबन्ध से प्रारम्भ होकर शनि पर्वत तक स्पष्ट पहुँच रही है। उसकी एक शाखा की पहुँच गुरु पर्वत पर भी है। हस्तरेखा विज्ञान में ऐसी भाग्यरेखा 'सर्व-श्रेष्ठ' होती है। लाल बहादुर शास्त्री जी के हाथों में भी ऐसी ही भाग्यरेखा थी। ऐसी भाग्यरेखा के संबंध में डॉ नारायण दत्त श्रीमाली का निष्कर्ष है  :
" ऐसा व्यक्ति अपने देश की भलाई में अपने आप को न्योछावर कर देता है। यह व्यक्ति सबका प्रिय, स्वाभिमानी, दानी, सबकी सुनने वाला होता है। यह व्यक्ति उन्मुक्त सिंह की तरह अपने विचार धड़ल्ले के साथ व्यक्त करने वाला होता है। "

उनके प्रत्येक भाषण से डॉ श्रीमाँली के इस निष्कर्ष की स्पष्ट परिपुष्टि हो रही है। बड़ी बेबाकी के साथ उन्होने गाँव से लेकर समाज,राष्ट्र व विश्व की वृहद चर्चा की है और शक्तिशाली व बर्बर सरकार के उत्पीड़न की परवाह किए बगैर अपने विचारों को सुस्पष्ट तौर पर रखा है।

कन्हैया के दोनों हाथों में सभी ग्रहों के पर्वत उन्नत हैं अतः उनको पूर्ण फल प्राप्त होगा। मूल भाग्यरेखा के साथ-साथ चंद्र पर्वत से एक और सहायक भाग्यरेखा भी आ रही है अर्थात विवाहोपरांत उनका भाग्य और गति प्राप्त करेगा। उनकी हृदय रेखा स्पष्टतः गुरु पर्वत के नीचे पहुँच रही है जिसका फल उनकी इस सहृदयता में सबके सामने है कि, वह अपने आक्रांताओं के प्रति भी निर्मम नहीं उदार हैं।
हालांकि उन पर शारीरिक व मानसिक रूप से निष्ठुर प्रहार किए गए हैं उनको 'देशद्रोही' तक कह  कर उनके प्रति घृणा को प्रचारित किया गया है। परंतु उन्होने अपना संयम नहीं खोया है। स्वामी विवेकानंद का कहना है कि प्रारम्भ में जिस व्यक्ति या  पदार्थ का जितना तीव्र विरोध होता है कालांतर में वह व्यक्ति या पदार्थ उतना ही 'लोकप्रिय ' होता है। 
15 मार्च 2016 के संसद मार्च व जनसभा  में भाकपा के राष्ट्रीय सचिव कामरेड डी राजा साहब ( अब राष्ट्रीय महासचिव ) व माकपा के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड सीताराम येचूरी साहब की उपस्थिती कन्हैया की जनप्रियता के ही कारण थी। प्रख्यात लेखिका अरुंधति राय जी व अन्य महानुभाव उनके वैचारिक महत्व के कारण ही शामिल हुये हैं। 
उनके हाथों में मस्तिष्क रेखा स्पष्ट व गहरी है और चंद्र पर्वत की ओर ढलवां झुकी हुई है जो एक आदर्श रूप में उपस्थित है और इसी के कारण वह प्रत्येक बात को गहराई से अध्यन  करके सुस्पष्ट रूप में सार्वजनिक रूप से रखने में समर्थ रहते हैं। इसी कारण शक्तिशाली सर्वोच्च सत्ता से टकरा कर उनकी जनप्रियता उच्च सोपान को छू सकी है। 

उनकी गिरफ्तारी के समय की प्रश्न कुंडली प्राप्त करने पर ज्ञात होता है कि, उस समय नौ में से सात ग्रह उनके अनुकूल थे। केवल सूर्य तथा शनि ग्रह उनके प्रतिकूल थे। सूर्य की प्रतिकूलता के कारण उनका 'मान-भंग' हुआ जो उन पर 'देशद्रोह' का झूठा आरोप थोपा गया और शनि की प्रतिकूलता के कारण उनको कारागार की यात्रा करनी पड़ी। जैसा की न्यूज़ लाउंड्री को दिये साक्षात्कार में उन्होने बताया भी है कि 'जांच में सहयोग' करने के नाम पर धोखे में रख कर उनको गिरफ्तार किया गया यह भी शनि का ही प्रकोप रहा है। शुक्र व बुध ग्रहों के शक्तिशाली होने के कारण उनका बुद्धि,ज्ञान,विवेक संतुलित रहा एवं उनको कानूविदों का भी सहयोग प्राप्त हुआ जिससे वह अन्तरिम रूप से ही सही रिहा हो सके। शनि के स्त्रीकारक ग्रह होने के कारण जहां उनकी गिरफ्तारी में महिला मंत्री का हाथ रहा वहीं रिहाई में भी महिला न्यायाधीश का हाथ रहा है। स्त्रीकारक ग्रह शुक्र  के सर्वाधिक शक्तिशाली होने व माँ के भाव में होने के कारण सर्वप्रथम उनको अपनी माता जी का पूर्ण आशीर्वाद मिला है। उनकी अनुपस्थिति में महिला उपाध्यक्ष ने ही कुशलतापूर्वक उनके कार्यों का निष्पादन व आंदोलन का संचालन किया है। गुरु,राहू और केतू ग्रह भी उनको सुख दिलाने व हमलों से बचाने में समर्थ रहे हैं बल्कि यदि कहें कि सरकार का दांव सरकार को ही उल्टा पड़ने में इन सब ग्रहों की प्रमुख भूमिका रही है तो गलत न होगा । 
सिर्फ यह कह देने से कि हम नहीं मानते ग्रहों के प्रभाव से अछूता नहीं रहा जा सकता है। कन्हैया का इस समय जनता पर अनुकूल प्रभाव है और यदि वह जनता को सामाजिक रूप से जागरूक करने को कहें कि सरकार और उसके समर्थक अधार्मिक तत्व हैं जबकि वह जनता के धर्म की रक्षा का युद्ध लड़ रहे हैं। वस्तुतः 'धर्म' शब्द की व्युत्पति 'धृति' धातु से हुई है जिसका अर्थ है धारण करना। अर्थात मानव शरीर व समाज को धारण करने हेतु आवश्यक तत्व ही 'धर्म' हैं , यथा-
सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। इनका पालन ही धर्म है बाकी सब ढोंग-पाखंड-आडंबर है। 
यही उपयुक्त समय है जब जनता को समझाया जा सकता है कि, 'कृणवनतो विश्वमार्यम ' अर्थात सम्पूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाने वाला समष्टिवाद ही आज का साम्यवाद है जो विश्व के  मेहनतकशों  को एकजुट करने की बात उठाता है और उसका विरोध करने वाले ही वस्तुतः देशद्रोही हैं। 

हमारी शुभकामनायें  सदैव  कामरेड कन्हैया कुमार के साथ हैं। 



~विजय राजबली माथुर ©
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Saturday, April 13, 2019

समष्टिवाद के ध्वजावाहक कामरेड कन्हैया कुमार ------ विजय राजबली माथुर

  



 वह वैचारिक प्रचलित आधार पर खुद को 'नास्तिक ' कहते हैं , किन्तु स्वामी विवेकानंद के अनुसार 'नास्तिक ' वह है जिसका खुद अपने ऊपर विश्वास न हो जबकि 'आस्तिक' वह है जिसका अपने ऊपर पूर्ण विश्वास हो ।  जो लोग खुद पर नहीं किसी अदृश्य पर विश्वास करते हैं वे नास्तिक अथवा ढ़ोंगी हैं। हम स्वामी विवेकानंद की परिभाषा के अनुसार कन्हैया को 'पूर्ण आस्तिक ' कह सकते हैं। वह पूर्ण आध्यात्मिक भी हैं क्योंकि अध्यात्म का अर्थ है अध्यन + आत्मा अर्थात अपनी आत्मा का अध्यन ; कन्हैया ने प्रत्येक भाषण में खुद अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति करने की बात कही है। स्पष्ट है वह अपना आत्मावलोकन करके ही वेदना व्यक्त कर रहे हैं।  जो लोग पाखंड और आडंबर को अध्यात्म बताते हैं वे भी वस्तुतः ढ़ोंगी ही हैं।

मानव जीवन को 'सुंदर, सुखद व समृद्ध' बनाने का मार्ग बताने वाला विज्ञान ही ज्योतिष है और इसका 'रेखा गणितीय' विश्लेषण 'हस्त रेखा विज्ञान' कहलाता है। जो लोग बाएँ हाथ को स्त्रियों  का व दायें को पुरुषों का बता कर विश्लेषण करते हैं वे पूर्णत :  सही विश्लेषण प्रस्तुत नहीं करते हैं। इसी प्रकार जो लोग बाएँ हाथ को बेरोजगारों व दायें हाथ को सरोजगारों के लिए निर्धारित करते हैं वे भी अपूर्ण निष्कर्ष तक ही पहुँचते हैं।

वस्तुतः स्त्री-पुरुष एवं रोजगार-बेरोजगार का विभेद किए बगैर बाएँ हाथ से किसी भी मनुष्य के  जन्मगत 'प्राब्ध'/भाग्य/LUCK का ज्ञान प्राप्त होता है और उसके दायें हाथ से व्यावहारिक तौर पर  कर्मगत उसने जो प्राप्त/अर्जित किया है उसका ज्ञान होता है 



उपरोक्त चित्रों में कन्हैया का बायाँ हाथ जितना स्पष्ट है उतना ही दायाँ हाथ भी स्पष्ट है। उनकी भाग्य रेखा दोनों हाथों में मणिबन्ध से प्रारम्भ होकर शनि पर्वत तक स्पष्ट पहुँच रही है। उसकी एक शाखा की पहुँच गुरु पर्वत पर भी है। हस्तरेखा विज्ञान में ऐसी भाग्यरेखा 'सर्व-श्रेष्ठ' होती है। लाल बहादुर शास्त्री जी के हाथों में भी ऐसी ही भाग्यरेखा थी। ऐसी भाग्यरेखा के संबंध में डॉ नारायण दत्त श्रीमाली का निष्कर्ष है  :
" ऐसा व्यक्ति अपने देश की भलाई में अपने आप को न्योछावर कर देता है। यह व्यक्ति सबका प्रिय, स्वाभिमानी, दानी, सबकी सुनने वाला होता है। यह व्यक्ति उन्मुक्त सिंह की तरह अपने विचार धड़ल्ले के साथ व्यक्त करने वाला होता है। "

उनके प्रत्येक भाषण से डॉ श्रीमाँली के इस निष्कर्ष की स्पष्ट परिपुष्टि हो रही है। बड़ी बेबाकी के साथ उन्होने गाँव से लेकर समाज,राष्ट्र व विश्व की वृहद चर्चा की है और शक्तिशाली व बर्बर सरकार के उत्पीड़न की परवाह किए बगैर अपने विचारों को सुस्पष्ट तौर पर रखा है।

कन्हैया के दोनों हाथों में सभी ग्रहों के पर्वत उन्नत हैं अतः उनको पूर्ण फल प्राप्त होगा। मूल भाग्यरेखा के साथ-साथ चंद्र पर्वत से एक और सहायक भाग्यरेखा भी आ रही है अर्थात विवाहोपरांत उनका भाग्य और गति प्राप्त करेगा। उनकी हृदय रेखा स्पष्टतः गुरु पर्वत के नीचे पहुँच रही है जिसका फल उनकी इस सहृदयता में सबके सामने है कि, वह अपने आक्रांताओं के प्रति भी निर्मम नहीं उदार हैं।





हालांकि उन पर शारीरिक व मानसिक रूप से निष्ठुर प्रहार किए गए हैं उनको 'देशद्रोही' तक कह  कर उनके प्रति घृणा को प्रचारित किया गया है। परंतु उन्होने अपना संयम नहीं खोया है। स्वामी विवेकानंद का कहना है कि प्रारम्भ में जिस व्यक्ति या  पदार्थ का जितना तीव्र विरोध होता है कालांतर में वह व्यक्ति या पदार्थ उतना ही 'लोकप्रिय ' होता है।
15-03-2016 

15 मार्च  2016 के संसद मार्च व जनसभा  में भाकपा के राष्ट्रीय सचिव कामरेड डी राजा साहब व माकपा के राष्ट्रीय महासचिव कामरेड सीताराम येचूरी साहब की उपस्थिती कन्हैया की जनप्रियता के ही कारण थी। प्रख्यात लेखिका अरुंधति राय जी व अन्य महानुभाव उनके वैचारिक महत्व के कारण ही शामिल हुये हैं। 
उनके हाथों में मस्तिष्क रेखा स्पष्ट व गहरी है और चंद्र पर्वत की ओर ढलवां झुकी हुई है जो एक आदर्श रूप में उपस्थित है और इसी के कारण वह प्रत्येक बात को गहराई से अध्यन  करके सुस्पष्ट रूप में सार्वजनिक रूप से रखने में समर्थ रहते हैं। इसी कारण शक्तिशाली सर्वोच्च सत्ता से टकरा कर उनकी जनप्रियता उच्च सोपान को छू सकी है। 

उनकी गिरफ्तारी के समय की प्रश्न कुंडली प्राप्त करने पर ज्ञात होता है कि, उस समय नौ में से सात ग्रह उनके अनुकूल थे। केवल सूर्य तथा शनि ग्रह उनके प्रतिकूल थे। सूर्य की प्रतिकूलता के कारण उनका 'मान-भंग' हुआ जो उन पर 'देशद्रोह' का झूठा आरोप थोपा गया और शनि की प्रतिकूलता के कारण उनको कारागार की यात्रा करनी पड़ी। जैसा की न्यूज़ लाउंड्री को दिये साक्षात्कार में उन्होने बताया भी है कि 'जांच में सहयोग' करने के नाम पर धोखे में रख कर उनको गिरफ्तार किया गया यह भी शनि का ही प्रकोप रहा है। शुक्र व बुध ग्रहों के शक्तिशाली होने के कारण उनका बुद्धि,ज्ञान,विवेक संतुलित रहा एवं उनको कानूविदों का भी सहयोग प्राप्त हुआ जिससे वह अन्तरिम रूप से ही सही रिहा हो सके। शनि के स्त्रीकारक ग्रह होने के कारण जहां उनकी गिरफ्तारी में महिला मंत्री का हाथ रहा वहीं रिहाई में भी महिला न्यायाधीश का हाथ रहा है। स्त्रीकारक ग्रह शुक्र  के सर्वाधिक शक्तिशाली होने व माँ के भाव में होने के कारण सर्वप्रथम उनको अपनी माता जी का पूर्ण आशीर्वाद मिला है। उनकी अनुपस्थिति में महिला उपाध्यक्ष ने ही कुशलतापूर्वक उनके कार्यों का निष्पादन व आंदोलन का संचालन किया है। गुरु,राहू और केतू ग्रह भी उनको सुख दिलाने व हमलों से बचाने में समर्थ रहे हैं बल्कि यदि कहें कि सरकार का दांव सरकार को ही उल्टा पड़ने में इन सब ग्रहों की प्रमुख भूमिका रही है तो गलत न होगा । 
सिर्फ यह कह देने से कि हम नहीं मानते ग्रहों के प्रभाव से अछूता नहीं रहा जा सकता है। कन्हैया का इस समय जनता पर अनुकूल प्रभाव है और यदि वह जनता को सामाजिक रूप से जागरूक करने को कहें कि सरकार और उसके समर्थक अधार्मिक तत्व हैं जबकि वह जनता के धर्म की रक्षा का युद्ध लड़ रहे हैं। वस्तुतः 'धर्म' शब्द की व्युत्पति 'धृति' धातु से हुई है जिसका अर्थ है धारण करना। अर्थात मानव शरीर व समाज को धारण करने हेतु आवश्यक तत्व ही 'धर्म' हैं , यथा-
सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। इनका पालन ही धर्म है बाकी सब ढोंग-पाखंड-आडंबर है। 
यही उपयुक्त समय है जब जनता को समझाया जा सकता है कि, 'कृणवनतो विश्वमार्यम ' अर्थात सम्पूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाने वाला समष्टिवाद ही आज का साम्यवाद है जो विश्व के  मेहनतकशों  को एकजुट करने की बात उठाता है और उसका विरोध करने वाले ही वस्तुतः देशद्रोही हैं। 

हमारी शुभकामनायें  सदैव  कामरेड कन्हैया कुमार के साथ हैं।
https://communistvijai.blogspot.com/2016/03/blog-post_18.html 
सर्व- प्रथम प्रकाशित 
Friday, 18 March 2016

प्रारब्ध के धनी व विचारों से समृद्ध कन्हैया कुमार ------ विजय राजबली माथुर



~विजय राजबली माथुर ©

Saturday, November 11, 2017

विरोध की आवाज़ को सुनने की जगह दबाना शासकों के लिए ही घातक होता रहा है ------ विजय राजबली माथुर

  आज फिर मोदी सरकार उसी किस्म की हेंकड़ी पर चलते हुये बिना सेंसरशिप के चापलूस प्रेस के जरिये जनता को अंधेरे में रखने का प्रयत्न कर रही है। फिर भी मुखर होने वाले  पत्रकारों, चिंतकों, लेखकों, नेताओं की हत्यायें सरकार समर्थकों द्वारा की जा रही हैं।

यू एस ए के प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प साहब का कहना है भारत को मोदी साहब एक करने की कोशिश कर रहे हैं। 

असहमति की आवाज़ को कुचल कर दबा कर एक कैसे किया जा रहा है उसी का एक नमूना हि यु वाहिनी के लोगों ने तहज़ीब की नगरी लखनऊ में 10 नवंबर को छात्र नेता कन्हैया कुमार के साथ पेश किया। ------






देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू जी विरोध या असहमति का मान करते थे और इसे दबाने के प्रयासों को अच्छा नहीं मानते थे। डॉ राम मनोहर लोहिया को तो वह काफी ध्यान से सुनते ही थे। जनसंघ के  नए युवा सांसद ए बी बाजपेयी को भी उन्होने धैर्य पूर्वक सुना था।खुद बाजपेयी साहब ने इसका ज़िक्र किया था कि अपने जोरदार भाषण के जरिये उन्होने नेहरू जी व सरकार की कड़ी आलोचना लोकसभा में की थी और उसी रोज़ शाम को राष्ट्रपति भवन में भोज कार्यक्रम में वह नेहरू जी का सामना करने से बच रहे थे लेकिन नेहरू जी ने पास आ कर उनके कंधे पर हाथ रख कर कहा - ' शाबाश नौजवान इसी तरह जोश को कायम रखो तुम एक दिन ज़रूर देश के प्रधानमंत्री बनोगे। ' 
शुरू शुरू में इन्दिरा गांधी ने भी सब विपक्षी नेताओं को सुनने की परंपरा कायम रखी थी किन्तु 1975 में एमर्जेंसी लगाने के बाद उनके द्वारा प्रेस की स्वतन्त्रता का भी गला घोंट दिया गया। प्रमुख विपक्षी नेताओं यहाँ तक कि, डायलिसिस पर चल रहे जे पी को भी गिरफ्तार करवा लिया था। इंडियन एक्स्प्रेस की बिजली कटवाने पर तत्कालीन सूचना व प्रसारण मंत्री इंदर कुमार गुजराल द्वारा आपत्ति जतलाये जाने पर उनको मास्को राजदूत बना कर भेज दिया था। 
परिणाम यह हुआ कि, अखबारों के बजाए विरोध प्रचार के लिए साईकिलोस्टाईल पर्चों का इस्तेमाल होने लगा जिसकी भनक तक खुफिया विभागों को न लग सकी। सरकारी कर्मचारी और खुफिया विभाग के अधिकारी तक तानाशाही वाले फर्मानों से आजिज़ आ गए थे और वे भी सरकार तक सही सूचना नहीं पहुंचा रहे थे, अखबारों को तो खुद सरकार ने ही सेंसर कर रखा था। इन्दिरा जी अपनी ही धुन में मस्त थीं उन्होने लोकसभा के बढ़ाए हुये कार्यकाल के बावजूद एक वर्ष पूर्व ही चुनावों की घोषणा कर दी उनकी सोच थी कि वह पुनः भारी बहुमत से वापिस आ जाएंगी। 
उस वक्त मैं  निर्माणाधीन होटल मुगल,  आगरा के लेखा विभाग में कार्यरत था ।  हमारे सिक्यूरिटी आफिसर साहब रिटायर्ड DSP इंटेलिजेंस थे वह मुझसे मित्रवत व्यवहार रखते थे । क्यों ?  तो वही जानते होंगे मैं नहीं जान सका ।  उनके पास तत्कालीन इंटेलिजेंस इंस्पेक्टर्स मिलने आते रहते थे उनकी वजह से मेरी भी उन सबसे जान - पहचान हो गई थी। अतः हम लोगों को मालूम था कि, इन चुनावों में इन्दिरा जी अपनी पार्टी समेत बुरी तरह से हारने जा रही हैं और वही हुआ था। 
यदि प्रेस सेंसरशिप नहीं होती विपक्षी नेता गण जेल में न होते तो सारी गतिविधियों का सरकार को सही - सही पता रहता और वह अपना बचाव सुचारु रूप से कर सकती थी। 
आज फिर मोदी सरकार उसी किस्म की हेंकड़ी पर चलते हुये बिना सेंसरशिप के चापलूस प्रेस के जरिये जनता को अंधेरे में रखने का प्रयत्न कर रही है। फिर भी मुखर होने वाले  पत्रकारों, चिंतकों, लेखकों, नेताओं की हत्यायें सरकार समर्थकों द्वारा की जा रही हैं।कल 10 नवंबर को छात्र नेता कन्हैया कुमार के साथ सत्ताधीशों के चहेतों द्वारा जो बर्ताव किया गया और आगे का कार्यक्रम जिलाधिकारी द्वारा रद्द कर दिया गया वह सब 1975 वाली एमर्जेंसी की पुनरावृत्ति ही है। हो सकता है इस बार का गुजरात और फिर  2019 का  लोकसभा चुनाव सत्ताधारी गफलत से जीत भी लें  लेकिन तब जो जनाक्रोश पनपेगा उसका किंचित मात्र भी आभास सत्तारूढों को पहले से कतई नहीं लग सकेगा लेकिन वह इन  दमनकारियों  को भी रसातल में  पहुंचा ज़रूर देगा।  

~विजय राजबली माथुर ©

Saturday, March 19, 2016

हमारी लड़ाई सीधे तौर पर तानाशाही के खिलाफ है ------ कन्हैया कुमार


कन्हैया का मोदी सरकार पर वार, आप अंग्रेज है तो हम भगत सिंह के सिपाही
मार्च 19, 2016 भारत
JNUSU president Kanhaiya Kumar

केंद्र की मोदी सरकार पर एक बार फिर हमला बोलते हुए जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने कहा कि वे तानाशाही के खिलाफ सीधी लड़ाई छेड़ेंगे। कन्हैया ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि वह देश भर के विश्वविद्यालयों को निशाना बना रही है। उन्होंने सभी लोकतांत्रिक ताकतों का समर्थन मांगते हुए कहा कि यह देश को बचाने की मुहिम है।

कन्हैया ने कहा कि संविधान की बात करने वालों को राजद्रोह के उस मामले में कानून को अपना काम करने देना चाहिए जिसमें उनके साथ-साथ जेएनयू के छात्र उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को भी आरोपी बनाकर गिरफ्तार किया गया था। कन्हैया ने कहा कि सड़क पर इंसाफ करना स्वीकार्य नहीं है। इंडिया टुडे कॉनक्लेव में कन्हैया ने कहा, ‘हो सकता है कि आप मेरी राजनीति से सहमत न हों। यह सिर्फ जेएनयू की बात नहीं है। देश भर में विश्वविद्यालयों को निशाना बनाया जा रहा है। अब हमारी लड़ाई सीधे तौर पर तानाशाही के खिलाफ है। सभी लोकतांत्रिक ताकतों को साथ आना होगा। देश में इस एकता की जरूरत है’।

कन्हैया ने कहा कि लोगों के सामने आज सबसे बड़ा सवाल देश को बचाने का है, लेकिन जेएनयू विवाद में मामले को देशभक्त बनाम देशद्रोही का रंग दे दिया गया। उन्होंने कहा कि देशभक्त का काम यह नहीं होता कि अपने ही देश के लोगों, युवाओं और छात्रों के खिलाफ राजद्रोह जैसे काले कानून का इस्तेमाल करे। उन्होंने कहा, ‘आप ऐसे बर्ताव कर रहे हैं जैसे आप अंग्रेज बन गए हैं और हम भगत सिंह के सिपाही हैं। यदि आपको राजद्रोह जैसे काले कानून के इस्तेमाल में कोई हिचक नहीं है तो हमें भी भगत सिंह का सिपाही बनने में कोई दिक्कत नहीं है।

इस मौके पर जेएनयू छात्र संघ की उपाध्यक्ष शहला राशिद शोरा ने कहा कि सबको साथ लेकर चलने वाला भारत का विचार आज खतरे में है। शहला ने कहा, ‘चूंकि राजनीति हमारा भविष्य तय करती है, ऐसे में हम ही अपनी राजनीति तय करेंगे । विश्वविद्यालय लोकतांत्रिक स्थान होते हैं। हमें उन्हें आरएसएस से बचाना होगा’।


जम्मू-कश्मीर की रहने वाली शहला ने कहा कि वे भारत की बेहद हिंसक छवि देखते हुए पली-बढ़ी हैं, लेकिन जेएनयू ने उन्हें लोकतांत्रिक जगह मुहैया कराई। इससे पहले, कन्हैया ने राजद्रोह कानून को निरस्त करने के लिए लड़ाई छेड़ने का संकल्प जताया। इसी कानून के तहत एक विवादास्पद कार्यक्रम के सिलसिले में पिछले महीने कन्हैया और विश्वविद्यालय के दो अन्य पीएचडी छात्रों को गिरफ्तार किया गया था। उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य को जमानत दिए जाने का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि सभी पार्टियों और लोकतंत्र का समर्थन करने वाले लोगों को ब्रिटिश युग के कानून को खत्म करने की मांग को लेकर आगे आना चाहिए।
साभार :

http://www.hindkhabar.in/india/1536-kanhaiya-war-british-and-bhagat-singh-soldiers

सौजन्य से :

Sindhu Khantwal

कामरेड कन्हैया के अभियान को निम्नांकित लेख भी पुष्ट करता है -------



 ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Saturday, March 12, 2016

वर्तमान बहस को विकल्पों पर विचार की तरफ ले जाया जाए ------ सत्येंद्र रंजन

कन्हैया के भाषण को आधुनिक भारत के सपने का समर्थन
March 6, 2016, 3:22 PM IST सत्येंद्र रंजन in प्रतिपक्ष | सोसाइटी, राजनीति, देश-दुनिया


कन्हैया कुमार ने अपनी रिहाई के बाद जेएनयू में जो भाषण दिया, वह बहुचर्चित हो चुका है। उसके बाद अलग-अलग टीवी चैनलों को उन्होंने कई इंटरव्यू दिए। मीडिया की चर्चाओं में स्वाभाविक रूप से उनके वक्तव्यों के उन हिस्सों की ज्यादा चर्चा हुई, जिनमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक पर निशाना साधा। यह हमला इतना तीखा था कि उससे भारतीय जनता पार्टी विचलित हुई। इसकी मिसाल उसके नेताओं के बयान हैँ। संघ खेमे की की प्रतिक्रिया तो उसके अपेक्षा के अनुरूप ही हिंसक बयानबाजी रही।
लेकिन इनसे अलग कन्हैया कुमार ने कुछ ऐसा भी कहा, जिसका संदर्भ दूरगामी है। उन्होंने कहा कि इस वक्त संघर्ष की रेखाएं साफ खिंची हुई हैँ।kanhaiya इसमें एक तरफ आरएसएस और उसकी सोच से सहमत ताकतें हैं और दूसरी तरफ प्रगतिशील शक्तियां। कहा जा सकता है कि मौजूदा समय में भारत के मुख्य सामाजिक अंतर्विरोध के बारे में किसी और नेता ने ऐसी साफ समझ बेहिचक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं रखी है। इसीलिए कन्हैया ने एक स्वर में सीताराम येचुरी से लेकर राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल और उन तमाम लोगों का आभार जताया जो जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय तथा राजद्रोह के मामले में उनके समर्थन में सामने आए। इस सिलसिले में कन्हैया कुमार ने यह महत्त्वपूर्ण बात बार-बार कही कि इस लड़ाई में कई दायरे टूटे हैँ। इस पर उन्होंने संतोष जताया। इसे भविष्य की उम्मीद बताया।
यह दायरा टूटने की ही झलक थी कि जेएनयू के मुद्दे पर दिल्ली में निकले बहुचर्चित जुलूस में एनएसयूआई, एसएफआई, एआईएसएफ, आइसा तथा दूसरे छात्र संगठन एक साथ शामिल हुए। किसी पार्टी या संगठन से ना जुड़े हजारों नौजवानों एवं बुद्धिजीवियों-कलाकारों की वहां उपस्थिति राष्ट्रवाद की भगवा समझ थोपने की एनडीए सरकार की कोशिशों से फैलती उद्विग्नता और आक्रोश का प्रमाण थी। इस सिलसिले में एक घटना खास उल्लेखनीय है।
30 जनवरी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि के दिन राहुल गांधी हैदराबाद में रोहित वेमुला की आत्महत्या के खिलाफ छात्रों के विरोध कार्यक्रम में शामिल हुए। शाम को उन्होंने वहां मौजूद नौजवानों को संबोधित किया। उपस्थित श्रोताओं में अंबेडकरवादी व्यक्तियों की बहुसंख्या थी। मगर वहां राहुल गांधी ने अपना भाषण गांधीजी को श्रद्धांजलि देते हुए शुरू किया। गुजरे दशकों में गांधी के प्रति अंबेडकरवादी समूहों का कड़ा आलोचनात्मक रुख जग-जाहिर रहा है। लेकिन वहां राहुल गांधी के भाषण के बीच कोई टोका-टाकी नहीं हुई। अबेंडकरवादी श्रोता समूह ने धीरज और सहिष्णुता के साथ गांधी की तारीफ में कहे गए शब्द सुने।
कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के बाद राहुल गांधी जेएनयू पहुंचे तो वहां श्रोता समूह में बहुसंख्या वाम रुझान वाले छात्रों-शिक्षकों की थी। राहुल गांधी सीताराम येचुरी और डी राजा जैसे नेताओं के साथ बैठे। फिर भाषण दिया। एक बार फिर सबका ध्यान मुद्दे पर रहा। आपसी राजनीतिक मतभेद वहां गौण हो गए।
kanhaiyaकन्हैया कुमार ने अपनी रिहाई के बाद जब मीडिया को दिए इंटरव्यू में मार्क्स, अंबेडकर, पेरियार, फुले, गांधी, नेहरू के नाम एक क्रम में लिए, तो जाहिर है उनके ध्यान में देश में होता वही ध्रुवीकरण रहा होगा, जो इस वक्त का तकाजा है। आधुनिक भारत का विचार इन तमाम और अन्य कई (मसलन, बिरसा मुंडा) विरासतों का साझा परिणाम है। भारत के इस विचार के जन्म और आगे बढ़ने का इतिहास 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम से शुरू होता है। इस विचार के सार-तत्व को एक वाक्य में कहना हो तो वो यह होगा कि भारतीय भूमि पर जन्मा हर व्यक्ति भारतीय है और उसका दर्जा समान है। सबके आर्थिक हित समान हैं, विचारों का खुलापन, एक-दूसरे की जीवन-शैली के प्रति सहिष्णुता, लोकतंत्र, सामाजिक-आर्थिक न्याय और प्रगति का एजेंडा भारतीय राष्ट्रवाद की इस विचारधारा के आधार हैँ।
धर्म आधारित राष्ट्रवाद के विचार से उपरोक्त भारतीय राष्ट्रवाद का संघर्ष स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों से जारी है। 2014 के आम चुनाव में उभरे जनादेश से हिंदू राष्ट्रवाद का विचार देश की केंद्रीय सत्ता पर काबिज हो गया। इससे न्याय एवं स्वतंत्रता की दिशा में हुई वह तमाम प्रगति खतरे में पड़ गई है, जो भारतीय जनता ने अपने लंबे संघर्ष से हासिल की। इस पृष्ठभूमि को ध्यान में रखें तो कन्हैया कुमार की बातों का महत्त्व स्वयंसिद्ध हो जाता है।
यह संकट का समय है, लेकिन उम्मीद की किरण यह है कि भारतीय जन के एक बड़े हिस्से ने समय रहते इसकी पहचान कर ली है। सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के बरक्स न्याय और प्रगति की विचारधाराओं से प्रेरित राष्ट्रवाद की शक्तियां जाग्रत हो रही हैँ। कन्हैया कुमार से जुड़े घटनाक्रम ने इस विश्वास को मजबूती दी है। कन्हैया के भाषणों को मिली लोकप्रियता मिसाल है कि आधुनिक भारत के सपने को नया जन-समर्थन मिल रहा है।
रोहित वेमुला और कन्हैया कुमार के मामलों से सामाजिक विषमता एवं विभाजनों पर परदा डालकर अन्याय और गैर-बराबरी की व्यवस्था को कायम रखने के प्रयोजन बेनकाब हुए हैँ। जेएनयू में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के तीन नेताओं का अपने संगठन से इस्तीफा इसकी ही मिसाल था। वे तीनों मनुस्मृति जलाना चाहते थे, लेकिन उनके संगठन ने उसकी इजाजत नही दी। यह घटना बताती है कि हिंदुत्व के नाम पर जातीय (प्रकारांतर में आर्थिक) शोषण को मजबूत रखने की कोशिशों का सफल होना आज कठिन है। बाबा साहेब अंबेडकर के सपनों और उद्देश्य को नाकाम करने के लिए उनकी जय बोलने का पाखंड ज्यादा देर तक नहीं चल सकता।   

फिर भी यह एक लंबी राजनीतिक लड़ाई है। बेशक इसका तात्कालिक परिणाम आने वाले सभी चुनाव नतीजों से तय होगा। मगर इसके साथ उस आधार पर प्रहार करना भी जरूरी है जिस वजह से पुराने आधिपत्य को कायम रखने पर आमादा ताकतें आधुनिक समय में भी अपनी चुनाव प्रणाली के अंदर राजनीतिक बहुमत बना लेने में सफल हो जाती हैँ। यह आधार वर्ग-विभाजन, जातिवाद और अज्ञानता के कारण कायम है। इस बुनियाद तो तोड़ना तभी संभव है जब वर्तमान बहस को विकल्पों पर विचार की तरफ ले जाया जाए। कन्हैया कुमार ने इसमें योगदान किया है। रोहित वेमुला और जेएनयू प्रकरणों से इस दिशा में आगे बढ़ने की संभावना बनी है।
साभार  : 
http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/satyendraranjan/support-to-kanhaiyas-speech-indicates-to-modern-india/

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14-03-2016 




 ~विजय राजबली माथुर ©
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