Showing posts with label हिन्दू. Show all posts
Showing posts with label हिन्दू. Show all posts

Wednesday, January 17, 2018

भारतवर्ष तो आर्य था हिन्दुत्व की राजनीति गुलामी का प्रतीक है ------ विजय राजबली माथुर

दुर्भाग्य से आज विद्वान कम्यूनिज़्म को धर्म विरोधी कहते हैं और कम्युनिस्ट भी इसी मे गर्व महसूस करते हैं। धर्म जिसका अर्थ 'धारण करने'से है को न मानने के कारण ही सोवियत रूस मे कम्यूनिज़्म विफल हुआ और चीन मे सेना के दम पर जो शासन चल रहा है वह कम्यूनिज़्म के सिद्धांतों पर नहीं है। 'कम्यूनिज़्म' एक भारतीय अवधारणा है और उसे भारतीय परिप्रेक्ष्य मे ही सफलता मिल सकती है।

 'नास्तिक ' स्वामी विवेकानंद के अनुसार वह है जिसका अपने ऊपर विश्वास नहीं है और 'आस्तिक' वह है जिसका अपने ऊपर विश्वास है। लेकिन पोंगापंथी उल्टा पाठ सिखाते हैं। परंतु कम्युनिस्ट सीधी बात क्यों नहीं समझाते?....................................................................यह देश का दुर्भाग्य ही है कि पढे - लिखे विद्वान तक 'सत्य ' कहने से बचते हैं और विदेशियों द्वारा हमारे देशवासियों को दिया गया नामकरण ही प्रयोग करते रहते हैं। उसकी हकीकत ...... कि, हिन्दुत्व वस्तुतः शोषण को मजबूत बनाने की एक व्यापारिक राजनीति है।.............................................. 
"गुरुडम में फंस कर जिसने सत्य से मुंह मोड़ लिया ;
पाखण्ड को ओढ़ लिया ...
इसी कारण भारत देश गुलाम हुआ ...
भाई-भाई का आपस में घोर संग्राम हुआ ;
मंदिर ..मस्जिद तोड़े संग्राम हुआ.....
बुत परस्ती में लगा हुआ देश बुरी तरह गुलाम हुआ ;
देश मेरा बदनाम हुआ....."






*************** यह देश का दुर्भाग्य ही है कि पढे - लिखे विद्वान तक 'सत्य ' कहने से बचते हैं और विदेशियों द्वारा हमारे देशवासियों को दिया गया नामकरण ही प्रयोग करते रहते हैं। उसकी हकीकत ऊपर और नीचे प्रस्तुत वीडियो देख कर समझी जा सकती है कि, हिन्दुत्व वस्तुतः शोषण को मजबूत बनाने की एक व्यापारिक राजनीति है। निम्नलिखित पूर्व प्रकाशित नोट्स इसे समझने में सहायक हो सकते हैं*************** 

December 21, 2011 ·

वेद प्रचारक ने कहा था
दौलत के दीवानों उस दिन को पहचानों ;
जिस दिन दुनिया से खाली हाथ चलोगे..
चले दरबार चलोगे....
ऊंचे-ऊंचे महल अटारे एक दिन छूट जायेंगे सारे ;
सोने-चांदी तुम्हारे बक्सों में धरे रह जायेंगे...
जिस दिन दुनिया से खाली हाथ चलोगे...
चले दरबार चलोगे.......
दो गज कपडा तन की लाज बचायेगा ;
बाकी सब यहाँ पड़ा रह जाएगा......
चार के कन्धों पर चलोगे..
.चले दरबार चलोगे......
पत्थर की पूजा न छोडी-प्यार से नाता तोड़ दिया...
मंदिर जाना न छोड़ा -माता-पिता से नाता तोड़ दिया...
बेटे ने बूढ़ी माता से नाता तोड़ दिया ;
किसी ने बूढ़े पिता का सिर फोड़ दिया....
पत्थर की पूजा न छोडी ;मंदिर जाना न छोड़ा....
दया धर्म कर्म के रिश्ते छूट रहे;
माता-पिता से नाता छोड़ दिया....
उल्टी सीधी वाणी बोलकर दिल तोड़ दिया;
बूढ़ी माता से नाता तोड़ दिया.....
पत्थर की पूजा न छोडी मंदिर जाना न छोड़ा 
बूढ़ी माँ का दिल तोड़ दिया.....
वे क्या जाने जिसने प्रभु गुण गाया नहीं ;
वेद-शास्त्रों से जिसका नाता नहीं..
जिसने घर हवन कराया नहीं...
गुरुडम में फंस कर जिसने सत्य से मुंह मोड़ लिया ;
पाखण्ड को ओढ़ लिया ...
इसी कारण भारत देश गुलाम हुआ ...
भाई-भाई का आपस में घोर संग्राम हुआ ;
मंदिर ..मस्जिद तोड़े संग्राम हुआ.....
बुत परस्ती में लगा हुआ देश बुरी तरह गुलाम हुआ ;
देश मेरा बदनाम हुआ.....

March 23, 2012 
साम्यवादी विद्वान आर एस एस की अफवाहों को सही क्यों मानते हैं ?
बेहद अफसोसनाक है साम्यवादी विद्वानों द्वारा आर एस एस की अफवाहों को सही मानना 

साम्राज्यवादी ब्रिटिश शासकों ने अपने चहेते पुराण वादियों के सहारे आर एस एस की स्थापना अफवाहों के जरिये देश को बांटने हेतु करवाई थी जिसमे वे पूरी तरह सफल रहे। आर एस एस ने अफवाह उड़ा दी कि नव-संवत हिंदुओं का केलेनडर है और साम्यवादी विद्वानों ने उसी को सच मान कर नव-संवत का विरोध आँखें बंद करके करना शुरू कर दिया। यह प्रवृति साम्यवाद के लिए आत्म-घाती है । 

सर्व प्रथम बौद्धों ने अपने मठ उजाड़ने ,विहारों को जलाने,साहित्य को नष्ट करने वाले उग्रवादियों हेतु 'हिन्दू' शब्द का प्रयोग -'हिंसा देने वाले' के संदर्भ मे किया था। फिर जब विदेशी आक्रांता भारत मे शासन करने आए तो फारसी भाषा की एक गंदी गाली-हिन्दू का प्रयोग यहा के निवासियों हेतु करने लगे और आर एस एस जो विदेशी साम्राज्यवादियों की हितचिंतक संस्था है यहाँ के लोगों को 'गर्व से हिन्दू' कहने लगी। 


बौद्धों  को सताये जाने और फारसी आक्रांताओं के आने से बहुत पहले चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सिंहासन पर बैठने के उपलक्ष्य मे चंद्र गुप्त  ने 'विक्रमादित्य '  की उपाधि धारण की और इसी दिन से 'विक्रमी संवत' नामक नया कलेंडर  चालू किया था। भारतीय इतिहास मे गुप्त काल को 'स्वर्ण युग'कहा जाता है जिसमे चंद्र गुप्त 'विक्रमादित्य'का शासन जनता के हित मे श्रेष्ठ था। भारतीय खुद को श्रेष्ठ अर्थात 'आर्ष'कहते थे जो अब अपभ्रंश रूप मे 'आर्य' कहा जाता है। यूरोप के विदेशियों ने आर्यों को यूरोप का बता दिया और 'गुलाम प्रवृति' के विद्वानों ने उसे भी सही मान लिया । इसी कारण 'विक्रमी संवत' को साम्यवादी विद्वान भी  आर एस एस की भांति ही हिन्दू  संवत मानते हैं जो सर्वथा गलत है। हिन्दू शब्द की उत्पत्ति से बहुत पहले लागू 'विक्रमी संवत' हिंदुओं का नही भारत के श्रेष्ठ आर्य शासक चंद्र गुप्त 'विक्रमादित्य' की याद दिलाता है जिस पर प्रत्येक स्वाभिमानी भारतीय को गर्व करना चाहिए और साम्यवादी विद्वानों को इसका विरोध करके आर एस एस का दावा मजबूत नहीं करना चाहिए। 
शिव अर्थात भारतवर्ष : 
"ॐ नमः शिवाय च का अर्थ है-Salutation To That Lord The Benefactor of all "यह कथन है संत श्याम जी पाराशर का.अर्थात हम अपनी मातृ -भूमि भारत को नमन करते हैं.वस्तुतः यदि हम भारत का मान-चित्र और शंकर जी का चित्र एक साथ रख कर तुलना करें तो उन महान संत क़े विचारों को ठीक से समझ सकते हैं.शंकर या शिव जी क़े माथे पर अर्ध-चंद्राकार हिमाच्छादित हिमालय पर्वत ही तो है.जटा से निकलती हुई गंगा -तिब्बत स्थित (अब चीन क़े कब्जे में)मानसरोवर झील से गंगा जी क़े उदगम की ही निशानी बता रही है.नंदी(बैल)की सवारी इस बात की ओर इशारा है कि,हमारा भारत एक कृषि -प्रधान देश है.क्योंकि ,आज ट्रेक्टर-युग में भी बैल ही सर्वत्र हल जोतने का मुख्य आधार है.शिव द्वारा सिंह-चर्म को धारण करना संकेत करता है कि,भारत वीर-बांकुरों का देश है.शिव क़े आभूषण(परस्पर विरोधी जीव)यह दर्शाते हैंकि,भारत "विविधताओं में एकता वाला देश है."यहाँ संसार में सर्वाधिक वर्षा वाला क्षेत्र चेरापूंजी है तो संसार का सर्वाधिक रेगिस्तानी इलाका थार का मरुस्थल भी है.विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं तो पोशाकों में भी विविधता है.बंगाल में धोती-कुर्ता व धोती ब्लाउज का चलन है तो पंजाब में सलवार -कुर्ता व कुर्ता-पायजामा पहना जाता है.तमिलनाडु व केरल में तहमद प्रचलित है तो आदिवासी क्षेत्रों में पुरुष व महिला मात्र गोपनीय अंगों को ही ढकते हैं.पश्चिम और उत्तर भारत में गेहूं अधिक पाया जाता है तो पूर्व व दक्षिण भारत में चावल का भात खाया जाता है.विभिन्न प्रकार क़े शिव जी क़े गण इस बात का द्योतक हैं कि, यहाँ विभिन्न मत-मतान्तर क़े अनुयायी सुगमता पूर्वक रहते हैं.शिव जी की अर्धांगिनी -पार्वती जी हमारे देश भारत की संस्कृति (Culture )ही तो है.भारतीय संस्कृति में विविधता व अनेकता तो है परन्तु साथ ही साथ वह कुछ  मौलिक सूत्रों द्वारा एकता में भी आबद्ध हैं.हमारे यहाँ धर्म की अवधारणा-धारण करने योग्य से है

MONDAY, MARCH 7, 2016
शिव का अर्थ है ‘कल्याण' अर्थात मानव मात्र के कल्याण हेतु जो संदेश दे वही शिव है। शिव बुद्धि,ज्ञान व विवेक का द्योतक है। 
हमारे विद्वान बुद्धिजीवी जिनमे बामपंथी भी शामिल हैं 'धर्म' का अर्थ ही नहीं समझते और न ही समझना चाहते हैं। पुरोहितवादियो ने धर्म को आर्थिक शोषण के संरक्षण का आधार बना रखा है और इसीलिए बामपंथी पार्टियां धर्म का विरोध करती हैं। जब कि वह धर्म है ही नहीं जिसे बताया और उसका विरोध किया जाता है। धर्म का अर्थ समझाया है 'शिवरात्रि' पर बोध प्राप्त करने वाले मूलशंकर अर्थात दयानंद ने। उन्होने 'ढोंग-पाखंड' का प्रबल विरोध किया है उन्होने 'पाखंड खंडिनी पताका' पुस्तक द्वारा पोंगापंथ का पर्दाफाश किया है। 
दयानन्द ने आजादी के संघर्ष को गति देने हेतु1875 मे  'आर्यसमाज' की स्थापना की थी ,उसे विफल करने हेतु ब्रिटिश शासकों ने 1885 मे  कांग्रेस की स्थापना करवाई तो आर्यसमाँजी उसमे शामिल हो गए और आंदोलन को आजादी की दिशा मे चलवाया।1906 मे अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग स्थापित करवाकर देश मे एक वर्ग को आजादी के आंदोलन से पीछे हटाया। 1920 मे हिन्दू महासभा की स्थापना करवा कर दूसरे वर्ग को भी आजादी के आंदोलन से पीछे हटाने का विफल प्रयास किया। 1925 मे साम्राज्यवादी हितों के पोषण हेतु आर एस एस का गठन करवाया जिसने मुस्लिम लीग के समानान्तर सांप्रदायिकता को भड़काया और अंततः देश विभाजन हुआ। आर्यसमाज के आर  एस एस के नियंत्रण मे जाने के कारण राष्ट्रभक्त आर्यसमाजी जैसे स्वामी सहजानन्द ,गेंदा लाल दीक्षित,राहुल सांस्कृत्यायन आदि 1925 मे स्थापित 'भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी' मे शामिल हुये जिसका गठन आजादी के क्रांतिकारी आंदोलन को गति देने हेतु हुआ था। सरदार भगत सिंह,राम प्रसाद 'बिस्मिल' सरीखे युवक 'सत्यार्थ प्रकाश'पढ़ कर ही क्रांतिकारी कम्युनिस्ट बने थे। 
दुर्भाग्य से आज विद्वान कम्यूनिज़्म को धर्म विरोधी कहते हैं और कम्युनिस्ट भी इसी मे गर्व महसूस करते हैं। धर्म जिसका अर्थ 'धारण करने'से है को न मानने के कारण ही सोवियत रूस मे कम्यूनिज़्म विफल हुआ और चीन मे सेना के दम पर जो शासन चल रहा है वह कम्यूनिज़्म के सिद्धांतों पर नहीं है। 'कम्यूनिज़्म' एक भारतीय अवधारणा है और उसे भारतीय परिप्रेक्ष्य मे ही सफलता मिल सकती है।

 'नास्तिक ' स्वामी विवेकानंद के अनुसार वह है जिसका अपने ऊपर विश्वास नहीं है और 'आस्तिक' वह है जिसका अपने ऊपर विश्वास है। लेकिन पोंगापंथी उल्टा पाठ सिखाते हैं। परंतु कम्युनिस्ट सीधी बात क्यों नहीं समझाते? 

~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, August 13, 2017

वेदों मे नारी की निंदा की बात ढूँढना हिंदुओं के दोषों को ढकना है ------ विजय राजबली माथुर

 वैदिक काल मे पुरुषों और स्त्रियॉं दोनों का ही यज्ञोपवीत संस्कार होता था। कालीदास ने महाश्वेता द्वारा 'जनेऊ' धारण करने का उल्लेख किया है।  नर और नारी समान थे। पौराणिक हिंदुओं ने नारी-स्त्री-महिला को दोयम दर्जे का नागरिक बना डाला है। 














 


विदेशी शासकों की चापलूसी मे 'कुरान' की तर्ज पर 'पुराणों' की संरचना करने वाले छली विद्वानों ने 'वैदिक मत'को तोड़-मरोड़ कर तहस-नहस कर डाला है। इनही के प्रेरणा स्त्रोत हैं शंकराचार्य। जबकि वेदों मे 'नर' और 'नारी' की स्थिति समान है। वैदिक काल मे पुरुषों और स्त्रियॉं दोनों का ही यज्ञोपवीत संस्कार होता था। कालीदास ने महाश्वेता द्वारा 'जनेऊ' धारण करने का उल्लेख किया है।  नर और नारी समान थे। पौराणिक हिंदुओं ने नारी-स्त्री-महिला को दोयम दर्जे का नागरिक बना डाला है। अपाला,घोशा,मैत्रेयी,गार्गी आदि अनेकों विदुषी महिलाओं का स्थान वैदिक काल मे पुरुष विद्वानों से  कम न था। अतः वेदों मे नारी की निंदा की बात ढूँढना हिंदुओं के दोषों को ढकना है। वस्तुतः 'हिन्दू' कोई धर्म है ही नही।बौद्धो के विरुद्ध क्रूर हिंसा करने वालों ,उन्हें उजाड़ने वालों,उनके मठों एवं विहारों को जलाने वाले लोगों को 'हिंसा देने' के कारण बौद्धों द्वारा 'हिन्दू' कहा गया था। फिर विदेशी आक्रांताओं ने एक भद्दी तथा गंदी 'गाली' के रूप मे यहाँ के लोगों को 'हिन्दू' कहा।साम्राज्यवादियों के एजेंट खुद को 'गर्व से हिन्दू' कहते हैं। 

' ब्रह्मसूत्रेण पवित्रीकृतकायाम् ' यह लिखा है कादम्बरी में सातवीं शताब्दी में आचार्य बाणभट्ट ने.अर्थात  महाश्वेता ने जनेऊ पहन रखा है, तब तक लड़कियों का भी उपनयन होता था.(अब तो सबका उपहास अवैज्ञानिक कह कर उड़ाया जाता है).श्रावणी पूर्णिमा अर्थात रक्षा बंधन पर उपनयन क़े बाद नया विद्यारम्भ होता था.लेकिन कालांतर में पोंगा-पंडितों ने अपने निजी स्वार्थ में इस रक्षा-सूत्र-बंधन  अर्थात जनेऊ धारण करने के पावन-पर्व को राखी बांधने-बँधवाने तथा बहन-भाई के बीच सीमित कर दिया .
 उपनयन अर्थात जनेऊ के लाभों से साधारण जनता को छल पूर्वक वंचित कर दिया गया है.
 उपनयन अर्थात जनेऊ क़े तीन धागे तीन महत्वपूर्ण बातों क़े द्योतक हैं-
१ .-माता,पिता,तथा गुरु का ऋण उतारने  की प्रेरणा.
२ .-अविद्या,अन्याय ,आभाव दूर करने की जीवन में प्रेरणा.
३ .-हार्ट,हार्निया,हाईड्रोसिल (ह्रदय,आंत्र और अंडकोष -गर्भाशय )संबंधी नसों का नियंत्रण ;इसी हेतु कान पर शौच एवं मूत्र विसर्जन क़े वक्त धागों को लपेटने का विधान था.आज क़े तथा कथित पश्चिम समर्थक विज्ञानी इसे ढोंग, टोटका कहते हैं क्या वाकई ठीक कहते हैं?
विश्वास-सत्य द्वारा परखा  गया तथ्य 
अविश्वास-सत्य को स्वीकार न  करना 
 अंध-विश्वास--विश्वास अथवा अविश्वास पर बिना सोचे कायम रहना 
विज्ञान-किसी भी विषय क़े नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध अध्ययन को विज्ञान कहते हैं.
इस प्रकार जो लोग साईंस्दा होने क़े भ्रम में भारतीय वैज्ञानिक तथ्यों को झुठला रहे हैं वे खुद ही घोर अन्धविश्वासी हैं.वे तो प्रयोग शाळा में बीकर आदि में केवल भौतिक पदार्थों क़े सत्यापन को ही विज्ञान मानते हैं.यह संसार स्वंय ही एक प्रयोगशाला है और यहाँ निरन्तर परीक्षाएं चल रहीं हैं.परमात्मा एक निरीक्षक (इन्विजीलेटर)क़े रूप में देखते हुए भी नहीं टोकता,परन्तु एक परीक्षक (एक्जामिनर)क़े रूप में जीवन का मूल्यांकन करके परिणाम देता है.इस तथ्य को विज्ञानी होने का दम्भ भरने वाले नहीं मानते.यही समस्या है.

लगभग सभी बाम-पंथी विद्वान सबसे बड़ी गलती यही करते हैं कि हिन्दू को धर्म मान लेते हैं फिर सीधे-सीधे धर्म की खिलाफत करने लगते हैं। वस्तुतः 'धर्म'=शरीर को धारण करने हेतु जो आवश्यक है जैसे-सत्य,अहिंसा,अस्तेय,अपरिग्रह,और ब्रह्मचर्य।  इंनका  विरोध करने को आप कह रहे हैं जब आप धर्म का विरोध करते हैं तो। अतः 'धर्म' का विरोध न करके  केवल अधार्मिक और मनसा-वाचा- कर्मणा 'हिंसा देने वाले'=हिंदुओं का ही प्रबल विरोध करना चाहिए। 



वेद जाति,संप्रदाय,देश,काल, लिंग - भेद से परे सम्पूर्ण विश्व के समस्त मानवों के कल्याण की बात करते हैं। उदाहरण के रूप मे 'ऋग्वेद' के कुछ मंत्रों को देखें -

'संगच्छ्ध्व्म .....उपासते'=
प्रेम से मिल कर चलें बोलें सभी ज्ञानी बनें।
पूर्वजों की भांति हम कर्तव्य के मानी बनें। ।


'समानी मंत्र : ....... हविषा जुहोमी ' =


हों विचार समान सबके चित्त मन सब एक हों।
ज्ञान पाते हैं बराबर भोग्य पा सब नेक हों। ।


'समानी व आकूति....... सुसाहसती'=


हों सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा।
मन भरे हों प्रेम से जिससे बढ़े सुख सम्पदा। ।


'सर्वे भवनतु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पशयन्तु मा कश्चिद दुख भाग भवेत। । '=


सबका भला करो भगवान सब पर दया करो भगवान ।
सब पर कृपा करो भगवान ,सब का सब विधि हो कल्याण। ।
हे ईश सब सुखी हों कोई  न हो दुखारी।
सब हों निरोग भगवनधन-धान्यके भण्डारी। ।
सब भद्रभाव देखें,सन्मार्ग के पथिक हों।
दुखिया न कोई होवे सृष्टि मे प्राण धारी। ।   


ऋग्वेद न केवल अखिल विश्व की मानवता की भलाई चाहता है बल्कि समस्त जीवधारियों/प्रांणधारियों के कल्याण की कामना करता है। वेदों मे निहित यह समानता की भावना ही  वस्तुतः साम्यवाद का  भी मूलाधार  है ।


~विजय राजबली माथुर ©

*****************************************************************
फेसबुक कमेंट्स : 


Wednesday, November 18, 2015

स्वामी दयानन्द सरस्वती को हिन्दू बताना एक घोर साजिश ------ विजय राजबली माथुर


http://jagadishwarchaturvedi.blogspot.in/2015/11/blog-post_16.html









http://jagadishwarchaturvedi.blogspot.in/2015/11/blog-post_16.html

उद्धृत कथन है मथुरा के मूल निवासी और जे एन यू छात्र  यूनियन के अध्यक्ष रहे एक प्रोफेसर साहब का। यह कथन सत्य से कोसों दूर और अप्रत्यक्ष रूप से आर एस एस को सहायता पहुंचाने वाला है । 

मूल नक्षत्र में जन्में मूल शंकर तिवारी को नौ वर्ष की अवस्था में जब यह भान हुआ कि, जिस शिव लिंग को ईश्वर बताया जा रहा था उस पर चढ़े फल-फूल, मिष्ठान्न को बड़े आराम से चूहा जैसा छोटा जीव उस पर चढ़ कर खा सकता है तो वह भ्रम है-ईश्वर नहीं और वह गृह त्याग कर 'गुरु' की खोज में निकल पड़े थे। 'गुरु' अर्थात 'गु' अंधकार से 'रू' प्रकाश की ओर ले जाने वाला। भटकते हुये वह जब वृन्दावन (मथुरा ) के स्वामी विरजानन्द जी के यहाँ पहुंचे तो उनकी खोज सम्पन्न हुई। नया जमाना ब्लाग के लेखक ने एक अन्य लेख द्वारा स्वामी विरजानन्द जी को हिन्दू-मुस्लिम एकता का पक्षधर घोषित किया है। 

वस्तुतः स्वामी विरजानन्द जी ने स्वामी दयानन्द सरस्वती जी को जो शिक्षा दी वह सम्पूर्ण मानवता को श्रेष्ठ =आर्ष=आर्य बनाने की थी और उसी पर दयानन्द जी चले भी। यह आर्य न कोई जाति है न धर्म न ही नस्ल न ही किसी मजहब की शाखा या प्रशाखा। न ही किसी क्षेत्र विशेष से संबन्धित। विश्व का कोई भी वह मनुष्य जो श्रेष्ठ कर्म करे वह आर्य है। अश्रेष्ठ या निकृष्ट कर्म करने वाला अनार्य । 

स्वामी दयानन्द जी का जन्म मूल शंकर तिवारी के रूप में हुआ था अर्थात प्रचलित ब्राह्मण जाति में लेकिन उन्होने घर-परिवार और दुनिया में जो देखा व अपने गुरु विरजानन्द जी से जो समझा-सीखा उससे वह जिस निष्कर्ष पर पहुंचे थे उनके ही शब्दों में प्रस्तुत है। ('सत्यार्थप्रकाश' : सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा , नई दिल्ली- 2 से प्रकाशित के पृष्ठ- 262 व 263 पर ) :

"जब ब्राह्मण लोग विद्द्याहीन हुए तब क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के अविद्वान होने में तो कथा ही क्या कहनी? जो परंपरा से वेदादि शास्त्रों का अर्थसहित पढ़ने का प्रचार था वह भी छूट गया। केवल जीविकार्थ पाठमात्र ब्राह्मण लोग पढ़ते रहे, सो पाठ्मात्र भी क्षत्रिय आदि को न पढ़ाया। क्योंकि जब अविद्वान हुये गुरु बन गए तब छल, कपट, अधर्म भी उनमें बढ़ता चला । ब्राह्मणों ने विचारा कि अपनी जीविका का प्रबंध बांधना चाहिए। सम्मति करके यही निश्चय कर क्षत्रिय आदि को उपदेश करने लगे कि हम हीं तुम्हारे पूज्यदेव हैं। बिना हमारी सेवा किए तुमको स्वर्ग या मुक्ति न मिलेगी। किन्तु जो तुम हमारी सेवा न करोगे तो घोर नरक में पड़ोगे। जो-जो पूर्ण विद्या वाले धार्मिकों का नाम ब्राह्मण और पूजनीय वेद और ऋषि-मुनियों के शास्त्र में लिखा था, उसको अपने मूर्ख, विषयी, कपटी, लमपट,अधर्मियों पर घटा बैठे। भला वे आप्त विद्वानों के लक्षण इन मूरखों में कब घट सकते हैं? परंतु जब क्षत्रियादी यजमान संस्कृत विद्या से अत्यंत रहित हुये तब उनके सामने जो-जो गप्प मारी, सो-सो बिचारों सब मान ली। जब मान ली तब इन नाम मात्र ब्राह्मणों की बन पड़ी। सबको अपने वचन जाल में बांध कर वशीभूत कर लिया और कहने लगे कि :--- 
ब्रह्मवाक्यं जनार्दन:  :। । 

अर्थात जो कुछ ब्राह्मणों के मुख से वचन निकलता है, वह जानों साक्षात भगवान के मुख से निकला। जब क्षत्रियादी वर्ण 'आँख के अंधे और गांठ के पूरे' अर्थात भीतर विद्या की आँख फूटी हुई और जिनके पास धन पुष्कल है, ऐसे-ऐसे चेले मिले, फिर इन व्यर्थ ब्राह्मण नामवालों को विषयानंद का उपवन मिल गया। यह भी उन लोगों ने प्रसिद्ध किया कि जो कुछ पृथिवी में उत्तम पदार्थ हैं, वे सब ब्राह्मणों के लिए हैं। अर्थात जो गुण,कर्म,स्वभाव से ब्राहमणादि वर्णव्यवस्था थी, उसको नष्ट कर जन्म पर रखी और मृतक पर्यंत का भी दान यजमानों से लेने लगे। जैसी अपनी इच्छा हुई वैसा करते चले "   

स्वामी दयानन्द जी ने महाभारत काल के बाद से वैदिक व्यवस्था का पतन माना है जो ऐतिहासिक रूप से भी सत्य है। राम और कृष्ण के समय में उनके लिए 'आर्यपुत्र' शब्द प्रयुक्त होता था। बाद में बौद्धों के विहार व मठ उजाड़ने वालों को ( हिंसा देने वालों को  बौद्धों द्वारा )हिन्दू  कहा गया। जब ईरानी यहाँ आए तो अपनी फारसी भाषा की एक गंदी और भद्दी गाली के रूप में यहाँ के निवासियों को 'हिन्दू' कह कर पुकारा तब से ही यह शब्द प्रचालन में आया है जिसको ब्रिटिश शासकों ने एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में पोषित किया था। 

स्वामी दयानन्द जी ने भी सन 1857 ई ॰ की क्रान्ति में सक्रिय भाग लिया था और क्रांति के विफल होने पर 1875 में उन्होने 'आर्यसमाज' की स्थापना पूर्ण स्वराज्य प्राप्ति के हेतु की थी और उसकी प्रारम्भिक शाखाएँ ब्रिटिश छवानी वाले शहरों में स्थापित की थीं। 

एम एम अहलूवालिया साहब ने अपनी पुस्तक :FREEDOM STRUGGLE IN INDIA के पृष्ठ 222 पर लिखा है-

"The Government was never quite happy about the Arya Samaj. They disliked it for its propaganda of self-confidence,self-help and self-reliance.The authorities,sometimes endowed it with fictitious power by persecuting to members whose Puritanism became political under intolerable conditions." 


अर्थात-"आर्यसमाज से सरकार को कभी भी खुशी नहीं हुई। शासकों ने आर्यसमाज को इसलिए नहीं चाहा कि यह आत्मविश्वास,स्व-सहाय और आत्म-निर्भरता का प्रचार करता था। कभी-कभी तो अधिकारियों ने इसकी शक्ति को इतना अधिक महत्व दिया कि उसके सदस्यों को दंडित किया और असहनीय दशाओं में उनके सुधारवादी आंदोलन ने राजनीतिक रूप ले लिया। "
 ब्रिटिश शासकों ने महर्षि दयानन्द को 'क्रांतिकारी सन्यासी' (REVOLUTIONARY SAINT) की संज्ञा दी थी। आर्यसमाज के 'स्व-राज्य'आंदोलन से भयभीत होकर वाईस राय लार्ड डफरिन ने अपने चहेते अवकाश प्राप्त ICS एलेन आकटावियन (A. O.)हयूम के सहयोग से वोमेश चंद्र (W.C.)बेनर्जी जो परिवर्तित क्रिश्चियन थे की अध्यक्षता में 1885 ई .में  इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य के 'सेफ़्टी वाल्व'के रूप मे करवाई थी। किन्तु महर्षि दयानन्द की प्रेरणा पर आर्यसमाजियों ने कांग्रेस में प्रवेश कर उसे स्वाधीनता आंदोलन चलाने पर विवश कर दिया। 'कांग्रेस का इतिहास' नामक पुस्तक में लेखक -डॉ पट्टाभि सीता रमईय्या ने स्वीकार किया है कि देश की आज़ादी के आंदोलन में जेल जाने वाले 'सत्याग्रहियों'में 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे।  


यही वजह है कि आज भी 'साम्राज्यवाद' के हितैषी लोग समय-समय पर महर्षि स्वामी दयानन्द पर हमले करते रहते हैं। दयानंद जी को 'महान हिन्दू' घोषित करना ब्राह्मणवादी षड्यंत्र के सिवा और कुछ नहीं है । आर्यसमाज प्रभावित गांधी जी के असहयोग आंदोलन को छिन्न -भिन्न करने हेतु प्रयासों में  (मुस्लिम लीग : स्थापित 1906 , हिंदूमहासभा : स्थापित 1920 ) विफल रहने के उपरांत 1925 में आर एस एस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा हेतु करवाई गई थी जो तब 'दंगों की भट्टी' में देश को झोंक कर 1947 में साम्राज्यवादी विभाजन कराने में सफल रहा था और आज यू एस ए के साम्राज्यवादी हितों की रक्षा में अग्रणी और पुनः देश के कई विभाजन कराने की ओर अग्रसर है।  ऐसे संगठन की हौसला अफजाई का ही काम करेगा दयानन्द जी को हिन्दू घोषित करने का घृणित अभियान । आज आर्यसमाज पर भी वह आर एस एस जो उसके विरोध में गठित हुआ था हावी है इसलिए उस ओर से प्रतिरोध की आवाज़ उठने की संभावना क्षीण है जिससे दयानन्द के निंदकों व विरोधियों के हौसले बुलंद हैं जो उनको हिन्दू का खिताब दे डाला। 

1925 में आर्यसमाज प्रभावित क्रांतिकारी कांग्रेसियों ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन आज़ादी के आंदोलन को तीव्र करने के लिए किया था। इस साम्यवादी आंदोलन में उत्तर-प्रदेश से गेंदालाल दीक्षित, बिहार से स्वामी सहजानन्द और राहुल सांस्कृत्यायन व पंजाब से सरदार भगत सिंह जैसे प्रबुद्ध आर्यसमाजियों ने अपना प्रबल योगदान दिया है। लेकिन एथीज़्म के नाम पर उनकी ओर से भी दयानन्द जी के प्रति हो रहे अन्याय के प्रति प्रतिरोध की संभावना क्षीण ही है। फिर भी अपना फर्ज़ पूरा करना मेरा ध्येय था ही। 

~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Friday, September 18, 2015

क्या हम इतने कमजोर हो चुके हैं कि इन आतंक फैलाने वालों से डरते हैं ? --- अनिल पुष्कर



(अनिल पुष्कर)

Anil Pushker

हिंदुत्व की राजनीति करने वाले और हिन्दू होने का दावा करने वाले कुछ सवालों के जवाब दें या बताएं कि -
'हिन्दू' शब्द धर्म कब, किन, सन-शताब्दी, ईसा-पूर्व में बना? रामायण में हिन्दू और मुसलमान नहीं मिलते, गीता में हिन्दू और मुसलमान नहीं मिलते, वेदों में 'हिन्दू' और 'मुसलमान' नहीं मिलते तो हिन्दू शब्द राम के नाम पर राजनीति करने वालों ने कहाँ से लिया?
'हिंदुत्व' केवल मनुष्य के हत्या की राजनीति है. वरना हिंदुत्व धर्म कब, किस महाकाव्य और ग्रन्थ में लिखा गया. रामायण, महाभारत, गीता? किसमें?
'रामराज्य' कब भगवा रंग में रंगा गया? सीता ने कब भगवा रंग के वस्त्र पहने? केसरिया कहने वाले जो राजनीतिक पार्टी हिन्दू राजनीति क्र रही हैं वह इस बात को इतिहास में प्रमाणित करें.
'भगवा' रंग यानी 'केसरिया' रंग 'राम' के साथ क्या बाल्मीकि लेकर आये? तुलसीदास ने कहीं केसरिया रंग में क्या 'राम' का चरित्र दिखाया है? क्या मनुस्मृति में हिन्दू शब्द आया है? क्या मनुस्मृति में राम केसरिया/भगवा दिखाए गये हैं?
दरअसल केसरिया रंग तो सूफी परम्परा से आया है उनके गीतों में. वहां तो हिन्दू जैसा कोई कांसेप्ट नहीं था.
तो क्या हिन्दू होने का दावा करने वाले सूफी परम्परा से आये हैं? क्या श्रीराम कहीं भी सूफी परम्परा में दीखते हैं? अगर ऐसा नहीं है तो हिन्दू और हिंदुत्व को केसरिया में रंगने वाले लोग, सम्प्रदाय, केसरिया राम की राजनीति कब शुरू हुई?
जो खुद को हिन्दू और राम से जोडकर देखते हैं. जो इन शब्दों पर राजनीति करते हैं. वो चाहते क्या हैं? इस बात को समझना होगा. ये हत्या और दंगों की राजनीति करना चाहते हैं. ये दो सम्प्रदायों में हिंसा चाहते हैं, ये दो अलग ईश्वर को मानने वालों में खूनी जंग चाहते हैं. राम ने कब हिन्दू मुसलमान की लड़ाई लड़ी? मनुस्मृति ने कब हिन्दू मुसलमान की लड़ाई लड़ी? रामायण ने कब हिन्दू और महाभारत और गीता और वेदों में कब हिन्दू-मुसलमान की लड़ाई चली?
हिन्दू-मुसलमान की लड़ाई में 'राम' और 'अल्लाह' किस युग/शताब्दी/सन में आया?
जब मालूम हो जाय तो ये इतिहास मुझे भी पढ़ा देना. वरना हिन्दू और हिंदुत्व की राजनीति करने वालों का मकसद समझो. राम के नाम पर इनकी चाहत केवल सत्ता हासिल करना है. सियासत करना है. आदमियों की हत्यायों से केवल आतंक का शासन करना है? एक शब्द राम का आतंक. एक शब्द भगवा का आतंक. क्या हम इतने कमजोर हो चुके हैं कि इन आतंक फैलाने वालों से डरते हैं.
हिन्दू और हिंदुत्व के नाम पर जो लोग आतंक की राजनीति करना चाहते हैं उन्हें इन सभी सवालों के जवाब देने पड़ेंगे. वरना हिन्दू, हिंदुत्व और 'राम' का नाम लेना बंद करें. ये हत्या की राजनीति अब नहीं चलेगी. दंगों की राजनीति अब नहीं चलेगी. धार्मिक हिंसा की राजनीति अब नहीं चलेगी.
हमारे यहाँ इतिहास की परम्परा में राम के नाम पर कई तरह के रूप हैं एक कबीर के राम, जो इन हिन् हिन्दू राजनीतिक पार्टियों की तरह कतई दंगाई नहीं थे, एक तुलसीदास के राम जो इन हिन्दू ब्रिगेडियर्स की तरह कतई साम्प्रदायिक नहीं थे, एक बाल्मीकी के 'राम' जो इन हिन्दू राजनीतिक पार्टियों की तरह राम को लाखों मनुष्यों की हत्याओं में लिप्त नहीं होने देते.


(अनिल पुष्कर)
********************************************************************
17 सितंबर 2015 :

एक ओर पोंगापंथी और दूसरी ओर एथीस्ट वादी दोनों अपने -अपने तरीके से जनता को गुमराह करते रहते हैं। जहां पोंगापंथी 'गणेश' को चमत्कारी व पूज्य बनाए हुये हैं वहीं एथीस्ट वादी 'गणेश' को अपमानित करने में गौरान्वित महसूस कर रहे हैं। 
वास्तविकता स्वीकारना व समझाना दोनों में से कोई नहीं चाहता क्योंकि 'सत्य ' प्रचारित होने पर दोनों का गोरख-धंधा चौपट हो जाएगा। 
गणेश = गण + ईश अर्थात जो गण यानि जनता का ईश यानि नायक हो। 
जो स्वरूप गणेश का चित्रित किया गया है वह एक राजनेता के गुणों को स्पष्ट करता है। हाथी सरीखे कान सबकी सुनने वाला हो इसका प्रतीक हैं तो सूँड सूंघने अर्थात अनुमान से समझने की शक्ति का प्रतीक है। खाने के दाँत और दिखाने के दाँत एक राजनेता के उस गुण पर प्रकाश डालते हैं जिसके द्वारा वह प्रशासनिक गतिविधियों को 'गोपनीय' रखे तथा वही बोले जो आवश्यक हो। कुप्पा ऐसा पेट यह जतलाने के लिए है कि एक राजनेता में तमाम विपरीत बातों को भी हजम करने की क्षमता होनी चाहिए। 
चूहे की सवारी यह सिद्ध करने के लिए है कि घर,समाज,देश को कुतरने वाले पंचमारगियों को दबा कर रखना चाहिए उनको कुतरने का मौका नहीं मिलने देना चाहिए। 
लोकतन्त्र में जनता का नायक देश का राष्ट्रपति हुआ। अतः जब कहा जाता है-ॐ गनेशाय नमः तब उसका अर्थ होता है-THE FIRST SALUTATION TO THE "PRSIDENT" OF THE NATION केकिन आज हो क्या रहा है चतुर्दिक 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' का बोलबाला और व्यापारियों की मौज। गरीब का शोषण-उत्पीड़न एवं धन्ना-सेठों का मनोरंजन। 
'सत्य' को कब स्वीकार करके अनुसरण किया जाएगा। या फिर पढे-लिखे मूर्ख व अनपढ़ मूर्ख एक सी हरकतें करके जनता को त्राहिमाम-त्राहिमाम करने को मजबूर करते रहेंगे ?




  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Wednesday, April 25, 2012

अधर्म को 'धर्म' मानने की गलती

हिंदुस्तान,लखनऊ,23-04-2012 ,पृष्ठ-7

मुद्रा राक्षस जी बुजुर्ग और उच्च कोटि के विद्वान हैं। वह जो कहना चाहते थे उसे समझे बगैर लोगों ने उनका विरोध कर दिया। किन्तु थोड़ी सी गलती उनकी भी यह है कि उन्होने 'हिन्दू धर्म' शब्द का प्रयोग किया है। वस्तुतः 'हिन्दू' कोई धर्म है ही नही।बौद्धो के विरुद्ध क्रूर हिंसा करने वालों ,उन्हें उजाड़ने वालों,उनके मठों एवं विहारों को जलाने वाले लोगों को 'हिंसा देने' के कारण बौद्धों द्वारा 'हिन्दू' कहा गया था। फिर विदेशी आक्रांताओं ने एक भद्दी तथा गंदी 'गाली' के रूप मे यहाँ के लोगों को 'हिन्दू' कहा।साम्राज्यवादियों के एजेंट खुद को 'गर्व से हिन्दू' कहते हैं। 

मुद्रा जी से दूसरी गलती यह हो गई है कि उन्होने आदि शंकराचार्य के बाद 'ज्ञान-विज्ञान'की रचना न किए जाने की बात कही।एक हद तक 'बुद्ध' के विचार 'वैज्ञानिक'थे किन्तु शंकराचार्य ने अविज्ञान का भ्रम फैला कर उन्हें धूलि-धूसरित कर दिया है। आज भारत जो गारत हो गया है वह इन्हीं शंकराचार्य की देंन  है। इन लोगों के बारे मे हकीकत यह है देखें -



मुद्रा जी ने तीसरी गलती यह कर दी है कि उन्होने कहा कि 'ऋग वेद और अथर्व वेद' मे महिलाओं के लिए निंदनीय शब्द हैं। लगता है कि मुद्रा जी ने आचार्य श्री राम शर्मा सरीखे अवैज्ञानिक लोगों की व्याख्याओं को अपने निष्कर्ष का आधार बनाया है।

लगभग सभी बाम-पंथी विद्वान सबसे बड़ी गलती यही करते हैं कि हिन्दू को धर्म मान लेते हैं फिर सीधे-सीधे धर्म की खिलाफत करने लगते हैं। वस्तुतः 'धर्म'=शरीर को धारण करने हेतु जो आवश्यक है जैसे-सत्य,अहिंसा,अस्तेय,अपरिग्रह,और ब्रह्मचर्य।  इंनका का विरोध करने को आप कह रहे हैं जब आप धर्म का विरोध करते हैं तो। अतः 'धर्म' का विरोध न करके  केवल अधार्मिक और मनसा-वाचा- कर्मणा 'हिंसा देने वाले'=हिंदुओं का ही प्रबल विरोध करना चाहिए।

विदेशी शासकों की चापलूसी मे 'कुरान' की तर्ज पर 'पुराणों' की संरचना करने वाले छली विद्वानों ने 'वैदिक मत'को तोड़-मरोड़ कर तहस-नहस कर डाला है। इनही के प्रेरणा स्त्रोत हैं शंकराचार्य। जबकि वेदों मे 'नर' और 'नारी' की स्थिति समान है। वैदिक काल मे पुरुषों और स्त्रियॉं दोनों का ही यज्ञोपवीत संस्कार होता था। कालीदास ने महाश्वेता द्वारा 'जनेऊ'धरण करने का उल्लेख किया है।  नर और नारी समान थे। पौराणिक हिंदुओं ने नारी-स्त्री-महिला को दोयम दर्जे का नागरिक बना डाला है। अपाला,घोशा,मैत्रेयी,गार्गी आदि अनेकों विदुषी महिलाओं का स्थान वैदिक काल मे पुरुष विद्वानों से  कम न था। अतः वेदों मे नारी की निंदा की बात ढूँढना हिंदुओं के दोषों को ढकना है।


वेद जाति,संप्रदाय,देश,काल से परे सम्पूर्ण विश्व के समस्त मानवों के कल्याण की बात करते हैं। उदाहरण के रूप मे 'ऋग्वेद' के कुछ मंत्रों को देखें -

'संगच्छ्ध्व्म .....उपासते'=
प्रेम से मिल कर चलें बोलें सभी ज्ञानी बनें।
पूर्वजों की भांति हम कर्तव्य के मानी बनें। ।


'समानी मंत्र : ....... हविषा जुहोमी ' =


हों विचार समान सबके चित्त मन सब एक हों। 
ज्ञान पाते हैं बराबर भोग्य पा सब नेक हों। । 


'समानी व आकूति....... सुसाहसती'=


हों सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा। 
मन भरे हों प्रेम से जिससे बढ़े सुख सम्पदा। । 


'सर्वे भवनतु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामयाः। 
सर्वे भद्राणि पशयन्तु मा कश्चिद दुख भाग भवेत। । '=


सबका भला करो भगवान सब पर दया करो भगवान । 
सब पर कृपा करो भगवान ,सब का सब विधि हो कल्याण। । 
हे ईश सब सुखी हों कोई  न हो दुखारी। 
सब हों निरोग भगवनधन-धान्यके भण्डारी। । 
सब भद्रभाव देखें,सन्मार्ग के पथिक हों। 
दुखिया न कोई होवे सृष्टि मे प्राण धारी। ।    

ऋग्वेद न केवल अखिल विश्व की मानवता की भलाई चाहता है बल्कि समस्त जीवधारियों/प्रांणधारियों के कल्याण की कामना करता है। वेदों मे निहित यह समानता की भावना ही साम्यवाद का मूलाधार है । जब मैक्स मूलर साहब भारत से मूल पांडुलिपियाँ ले गए तो उनके द्वारा किए गए जर्मन भाषा मे अनुवाद के आधार पर महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'दास केपिटल'एवं 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो'की रचना की। महात्मा हेनीमेन ने 'होम्योपैथी' की खोज की और डॉ शुसलर ने 'बायोकेमी' की। होम्योपैथी और बायोकेमी हमारे आयुर्वेद पर आधारित हैं और आयुर्वेद आधारित है 'अथर्ववेद'पर। अथर्ववेद मे मानव मात्र के स्वास्थ्य रक्षा के सूत्र दिये गए हैं फिर इसके द्वारा नारियों की निंदा होने की कल्पना कहाँ से आ गई। निश्चय ही साम्राज्यवादियो के पृष्ठ-पोषक RSS/भाजपा/विहिप आदि के कुसंस्कारों को धर्म मान लेने की गलती का ही यह नतीजा है कि,कम्युनिस्ट और बामपंथी 'धर्म' का विरोध करते हैं । मार्क्स महोदय ने भी वैसी ही गलती समझने मे की जैसी कि मुद्रा राक्षस जी ने यथार्थ को समझने मे कर दी। यथार्थ से हट कर कल्पना लोक मे विचरण करने के कारण कम्युनिस्ट जन-समर्थन प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि शोषक -उत्पीड़क वर्ग और-और शक्तिशाली होता जाता है। 

आज समय की आवश्यकता है कि 'धर्म' को व्यापारियों/उद्योगपतियों के दलालों (तथाकथित धर्माचार्यों)के चंगुल से मुक्त कराकर जनता को वास्तविकता का भान कराया जाये।संत कबीर, दयानंद,विवेकानंद,सरीखे पाखंड-विरोधी भारतीय विद्वानों की व्याख्या के आधार पर वेदों को समझ कर जनता को समझाया जाये तो जनता स्वतः ही साम्यवाद के पक्ष मे आ जाएगी। काश साम्यवादी/बामपंथी विद्वान और नेता समय की नजाकत को पहचान कर कदम उठाएँ तो सफलता उनके कदम चूम लेगी।

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

नोट -पिछली पोस्ट पर फुट नोट देखना न भूलें।    और यह लिंक भी देखने का कष्ट करें ।