~विजय राजबली माथुर ©
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Friday, April 2, 2021
Tuesday, May 1, 2012
काम के घंटे हों -चार --- विजय राजबली माथुर
पहली मई 'मजदूर दिवस' पर विशेष :
आज पूरी दुनिया मे हर जाति,संप्रदाय,धर्म के लोग 'मजदूर दिवस' के पर्व को अपने -अपने तरीके से मना रहे हैं। लगभग सवा सौ वर्षों पूर्व अमेरिका के शिकागो शहर मे मजदूरों ने व्यापक प्रदर्शन का आयोजन किया था ,तब से ही आज के दिन को प्रतिवर्ष 'मजदूर दिवस' के रूप मे मनाने की परिपाटी चली आ रही है। वस्तुतः आज का दिन उन शहीद मजदूरों की कुर्बानी को याद करने का दिन है जिन्हों ने अपने साथियों के भविष्य के कल्याण हेतु अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया था। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लोभ मे उद्योगपति मजदूरों से 12-12 और 14-14 घंटे काम लेते थे। उनका शोषण -उत्पीड़न तो करते ही थे उन्हें बंधक भी बना लेते थे। समय-समय पर मजदूर संगठित होकर अपने ऊपर हो रहे जुल्मों का विरोध करते थे। व्यापारियो -उद्योगपतियों की समर्थक सत्ता की गोली वर्षा से अनेकों मजदूर शहीद हुये और तभी से मजदूरों का सफ़ेद 'झण्डा' 'लाल' रंग मे तब्दील कर दिया गया जो इन वीरों की शहादत याद दिलाता है। इसी के फलस्वरूप बाद मे काम के घंटे -8 नियमित किए गए थे।
मजदूरों ने किसानों को भी अपने साथ मिलाया और दुनिया मे उनको पहली सफलता 1917 मे रूस मे मिली भी। रूसी क्रांति का ही असर था कि, भारत आदि कई उपनिवेशों को साम्राज्यवाद से मुक्ति मिली। 1949 मे चीन मे भी मजदूरों की सत्ता की स्थापना हुई। रूस और चीन मे मजदूरों का नेतृत्व करने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां जिस तरीके से साम्यवाद को लागू करती रहीं वह त्रुटिपूर्ण रहा। यही कारण है कि 1991 मे रूस से कम्युनिस्ट शासन विदा हो गया और अब वहाँ पुनः पूंजीवादी व्यवस्था लागू है। चीन मे भी कम्युनिस्ट पार्टी ने पूंजीवाद पर चलना चालू कर रखा है।
भारत मे भी आज मजदूर आंदोलन बिखरा हुआ है। मजदूरों के नाम पर पूँजीपतियों ने अपने हितैषी संगठन खड़े करवा लिए हैं जो मजदूर एकता मे बाधा हैं। वैसे भी जाति और धर्म भारत मे मजदूरों के संगठित होने मे बाधक रहे हैं। आबादी तेज़ी से बढ़ी है,वैज्ञानिक प्रगति खूब हुई है परंतु रोजगारों मे छ्टनी भी खूब हुई है। बेरोजगारी और गरीबी के कारण मनुष्यों का जीना दूभर हो गया है। जिन को रोजगार मिला भी है उनका शोषण बहुत बढ़ गया है। श्रम क़ानूनों के मौजूद होते हुये भी कामगारों से आज फिर 12-12 घंटे,14-14 घंटे काम लिया जा रहा है। दूसरी ओर अमीर और अमीर हुआ है। उद्योपातियों के मुनाफे मे बेतहाशा वृद्धि हुई है और मजदूरों का जीना मुहाल हुआ है।
मजदूरों का उत्पीड़न और शोषण बरकरार रखने के लिए उद्योगपतियों-पूँजीपतियों के दलाल-तथाकथित पुरोहित जनता को अधर्म का पाठ धर्म के नाम पर पढ़ा रहे हैं। हमारे कम्युनिस्ट मजदूर नेता धर्म के उसी गलत स्वरूप को धर्म मानते हुये धर्म का कडा विरोध करते हैं। नतीजा यह होता है कि मजदूर और गरीब जनता अधर्मिकों के मकड़-जाल मे उलझ कर रह जाती है।
आज इस मजदूर दिवस पर मजदूरों को संकल्प लेना चाहिए कि अधार्मिक पुरोहितों का पर्दाफाश करके वास्तविक 'धर्म' के मर्म को समझते हुये अपनी मुक्ति हेतु एकजुट संघर्ष करेंगे। बढ़ती बेरोजगारी पर काबू पाने और बेतहाशा मुनाफा ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए काम के घंटे कम करके 'चार' करवाने का संघर्ष प्रारम्भ करना होगा। 8 घंटे के कानूनी प्रविधान को 4 घंटे करने पर तत्काल दुगुने लोगों को रोजगार संभव होगा और वह मुनाफा इस प्रकार चंद हाथों से निकाल कर एक बड़े वर्ग की ज़िंदगी संवार सकेगा।
'काम के घंटे हों-चार 'इस आंदोलन को चलाने के लिए हमारे नेता अपने वेदिक विद्वानों के विचारों को साथ लें तो जनता का भला कर सकेंगे।मथुरावासी विजय सिंह जी का लिखा मेरे स्वर मे यह गीत सुनें और स्पष्ट समझें कियह मजदूर आंदोलन को संगठित करने मे बहुत मददगार होगा। काश नेतृत्व स्वीकार कर सके?
आज पूरी दुनिया मे हर जाति,संप्रदाय,धर्म के लोग 'मजदूर दिवस' के पर्व को अपने -अपने तरीके से मना रहे हैं। लगभग सवा सौ वर्षों पूर्व अमेरिका के शिकागो शहर मे मजदूरों ने व्यापक प्रदर्शन का आयोजन किया था ,तब से ही आज के दिन को प्रतिवर्ष 'मजदूर दिवस' के रूप मे मनाने की परिपाटी चली आ रही है। वस्तुतः आज का दिन उन शहीद मजदूरों की कुर्बानी को याद करने का दिन है जिन्हों ने अपने साथियों के भविष्य के कल्याण हेतु अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया था। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने के लोभ मे उद्योगपति मजदूरों से 12-12 और 14-14 घंटे काम लेते थे। उनका शोषण -उत्पीड़न तो करते ही थे उन्हें बंधक भी बना लेते थे। समय-समय पर मजदूर संगठित होकर अपने ऊपर हो रहे जुल्मों का विरोध करते थे। व्यापारियो -उद्योगपतियों की समर्थक सत्ता की गोली वर्षा से अनेकों मजदूर शहीद हुये और तभी से मजदूरों का सफ़ेद 'झण्डा' 'लाल' रंग मे तब्दील कर दिया गया जो इन वीरों की शहादत याद दिलाता है। इसी के फलस्वरूप बाद मे काम के घंटे -8 नियमित किए गए थे।
मजदूरों ने किसानों को भी अपने साथ मिलाया और दुनिया मे उनको पहली सफलता 1917 मे रूस मे मिली भी। रूसी क्रांति का ही असर था कि, भारत आदि कई उपनिवेशों को साम्राज्यवाद से मुक्ति मिली। 1949 मे चीन मे भी मजदूरों की सत्ता की स्थापना हुई। रूस और चीन मे मजदूरों का नेतृत्व करने वाली कम्युनिस्ट पार्टियां जिस तरीके से साम्यवाद को लागू करती रहीं वह त्रुटिपूर्ण रहा। यही कारण है कि 1991 मे रूस से कम्युनिस्ट शासन विदा हो गया और अब वहाँ पुनः पूंजीवादी व्यवस्था लागू है। चीन मे भी कम्युनिस्ट पार्टी ने पूंजीवाद पर चलना चालू कर रखा है।
भारत मे भी आज मजदूर आंदोलन बिखरा हुआ है। मजदूरों के नाम पर पूँजीपतियों ने अपने हितैषी संगठन खड़े करवा लिए हैं जो मजदूर एकता मे बाधा हैं। वैसे भी जाति और धर्म भारत मे मजदूरों के संगठित होने मे बाधक रहे हैं। आबादी तेज़ी से बढ़ी है,वैज्ञानिक प्रगति खूब हुई है परंतु रोजगारों मे छ्टनी भी खूब हुई है। बेरोजगारी और गरीबी के कारण मनुष्यों का जीना दूभर हो गया है। जिन को रोजगार मिला भी है उनका शोषण बहुत बढ़ गया है। श्रम क़ानूनों के मौजूद होते हुये भी कामगारों से आज फिर 12-12 घंटे,14-14 घंटे काम लिया जा रहा है। दूसरी ओर अमीर और अमीर हुआ है। उद्योपातियों के मुनाफे मे बेतहाशा वृद्धि हुई है और मजदूरों का जीना मुहाल हुआ है।
मजदूरों का उत्पीड़न और शोषण बरकरार रखने के लिए उद्योगपतियों-पूँजीपतियों के दलाल-तथाकथित पुरोहित जनता को अधर्म का पाठ धर्म के नाम पर पढ़ा रहे हैं। हमारे कम्युनिस्ट मजदूर नेता धर्म के उसी गलत स्वरूप को धर्म मानते हुये धर्म का कडा विरोध करते हैं। नतीजा यह होता है कि मजदूर और गरीब जनता अधर्मिकों के मकड़-जाल मे उलझ कर रह जाती है।
आज इस मजदूर दिवस पर मजदूरों को संकल्प लेना चाहिए कि अधार्मिक पुरोहितों का पर्दाफाश करके वास्तविक 'धर्म' के मर्म को समझते हुये अपनी मुक्ति हेतु एकजुट संघर्ष करेंगे। बढ़ती बेरोजगारी पर काबू पाने और बेतहाशा मुनाफा ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए काम के घंटे कम करके 'चार' करवाने का संघर्ष प्रारम्भ करना होगा। 8 घंटे के कानूनी प्रविधान को 4 घंटे करने पर तत्काल दुगुने लोगों को रोजगार संभव होगा और वह मुनाफा इस प्रकार चंद हाथों से निकाल कर एक बड़े वर्ग की ज़िंदगी संवार सकेगा।
'काम के घंटे हों-चार 'इस आंदोलन को चलाने के लिए हमारे नेता अपने वेदिक विद्वानों के विचारों को साथ लें तो जनता का भला कर सकेंगे।मथुरावासी विजय सिंह जी का लिखा मेरे स्वर मे यह गीत सुनें और स्पष्ट समझें कियह मजदूर आंदोलन को संगठित करने मे बहुत मददगार होगा। काश नेतृत्व स्वीकार कर सके?
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| 01-05-2016 |
Wednesday, April 25, 2012
अधर्म को 'धर्म' मानने की गलती
![]() |
| हिंदुस्तान,लखनऊ,23-04-2012 ,पृष्ठ-7 |
मुद्रा जी से दूसरी गलती यह हो गई है कि उन्होने आदि शंकराचार्य के बाद 'ज्ञान-विज्ञान'की रचना न किए जाने की बात कही।एक हद तक 'बुद्ध' के विचार 'वैज्ञानिक'थे किन्तु शंकराचार्य ने अविज्ञान का भ्रम फैला कर उन्हें धूलि-धूसरित कर दिया है। आज भारत जो गारत हो गया है वह इन्हीं शंकराचार्य की देंन है। इन लोगों के बारे मे हकीकत यह है देखें -
मुद्रा जी ने तीसरी गलती यह कर दी है कि उन्होने कहा कि 'ऋग वेद और अथर्व वेद' मे महिलाओं के लिए निंदनीय शब्द हैं। लगता है कि मुद्रा जी ने आचार्य श्री राम शर्मा सरीखे अवैज्ञानिक लोगों की व्याख्याओं को अपने निष्कर्ष का आधार बनाया है।
लगभग सभी बाम-पंथी विद्वान सबसे बड़ी गलती यही करते हैं कि हिन्दू को धर्म मान लेते हैं फिर सीधे-सीधे धर्म की खिलाफत करने लगते हैं। वस्तुतः 'धर्म'=शरीर को धारण करने हेतु जो आवश्यक है जैसे-सत्य,अहिंसा,अस्तेय,अपरिग्रह,और ब्रह्मचर्य। इंनका का विरोध करने को आप कह रहे हैं जब आप धर्म का विरोध करते हैं तो। अतः 'धर्म' का विरोध न करके केवल अधार्मिक और मनसा-वाचा- कर्मणा 'हिंसा देने वाले'=हिंदुओं का ही प्रबल विरोध करना चाहिए।
विदेशी शासकों की चापलूसी मे 'कुरान' की तर्ज पर 'पुराणों' की संरचना करने वाले छली विद्वानों ने 'वैदिक मत'को तोड़-मरोड़ कर तहस-नहस कर डाला है। इनही के प्रेरणा स्त्रोत हैं शंकराचार्य। जबकि वेदों मे 'नर' और 'नारी' की स्थिति समान है। वैदिक काल मे पुरुषों और स्त्रियॉं दोनों का ही यज्ञोपवीत संस्कार होता था। कालीदास ने महाश्वेता द्वारा 'जनेऊ'धरण करने का उल्लेख किया है। नर और नारी समान थे। पौराणिक हिंदुओं ने नारी-स्त्री-महिला को दोयम दर्जे का नागरिक बना डाला है। अपाला,घोशा,मैत्रेयी,गार्गी आदि अनेकों विदुषी महिलाओं का स्थान वैदिक काल मे पुरुष विद्वानों से कम न था। अतः वेदों मे नारी की निंदा की बात ढूँढना हिंदुओं के दोषों को ढकना है।
वेद जाति,संप्रदाय,देश,काल से परे सम्पूर्ण विश्व के समस्त मानवों के कल्याण की बात करते हैं। उदाहरण के रूप मे 'ऋग्वेद' के कुछ मंत्रों को देखें -
'संगच्छ्ध्व्म .....उपासते'=
प्रेम से मिल कर चलें बोलें सभी ज्ञानी बनें।
पूर्वजों की भांति हम कर्तव्य के मानी बनें। ।
'समानी मंत्र : ....... हविषा जुहोमी ' =
हों विचार समान सबके चित्त मन सब एक हों।
ज्ञान पाते हैं बराबर भोग्य पा सब नेक हों। ।
'समानी व आकूति....... सुसाहसती'=
हों सभी के दिल तथा संकल्प अविरोधी सदा।
मन भरे हों प्रेम से जिससे बढ़े सुख सम्पदा। ।
'सर्वे भवनतु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पशयन्तु मा कश्चिद दुख भाग भवेत। । '=
सबका भला करो भगवान सब पर दया करो भगवान ।
सब पर कृपा करो भगवान ,सब का सब विधि हो कल्याण। ।
हे ईश सब सुखी हों कोई न हो दुखारी।
सब हों निरोग भगवनधन-धान्यके भण्डारी। ।
सब भद्रभाव देखें,सन्मार्ग के पथिक हों।
दुखिया न कोई होवे सृष्टि मे प्राण धारी। ।
ऋग्वेद न केवल अखिल विश्व की मानवता की भलाई चाहता है बल्कि समस्त जीवधारियों/प्रांणधारियों के कल्याण की कामना करता है। वेदों मे निहित यह समानता की भावना ही साम्यवाद का मूलाधार है । जब मैक्स मूलर साहब भारत से मूल पांडुलिपियाँ ले गए तो उनके द्वारा किए गए जर्मन भाषा मे अनुवाद के आधार पर महर्षि कार्ल मार्क्स ने 'दास केपिटल'एवं 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो'की रचना की। महात्मा हेनीमेन ने 'होम्योपैथी' की खोज की और डॉ शुसलर ने 'बायोकेमी' की। होम्योपैथी और बायोकेमी हमारे आयुर्वेद पर आधारित हैं और आयुर्वेद आधारित है 'अथर्ववेद'पर। अथर्ववेद मे मानव मात्र के स्वास्थ्य रक्षा के सूत्र दिये गए हैं फिर इसके द्वारा नारियों की निंदा होने की कल्पना कहाँ से आ गई। निश्चय ही साम्राज्यवादियो के पृष्ठ-पोषक RSS/भाजपा/विहिप आदि के कुसंस्कारों को धर्म मान लेने की गलती का ही यह नतीजा है कि,कम्युनिस्ट और बामपंथी 'धर्म' का विरोध करते हैं । मार्क्स महोदय ने भी वैसी ही गलती समझने मे की जैसी कि मुद्रा राक्षस जी ने यथार्थ को समझने मे कर दी। यथार्थ से हट कर कल्पना लोक मे विचरण करने के कारण कम्युनिस्ट जन-समर्थन प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि शोषक -उत्पीड़क वर्ग और-और शक्तिशाली होता जाता है।
आज समय की आवश्यकता है कि 'धर्म' को व्यापारियों/उद्योगपतियों के दलालों (तथाकथित धर्माचार्यों)के चंगुल से मुक्त कराकर जनता को वास्तविकता का भान कराया जाये।संत कबीर, दयानंद,विवेकानंद,सरीखे पाखंड-विरोधी भारतीय विद्वानों की व्याख्या के आधार पर वेदों को समझ कर जनता को समझाया जाये तो जनता स्वतः ही साम्यवाद के पक्ष मे आ जाएगी। काश साम्यवादी/बामपंथी विद्वान और नेता समय की नजाकत को पहचान कर कदम उठाएँ तो सफलता उनके कदम चूम लेगी।
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Saturday, January 7, 2012
चुनावी तमाशा और भ्रष्टाचार का रोना
![]() |
| (सभी स्कैन कापियाँ 04 जनवरी 2012 को हिंदुस्तान ,लखनऊ मे प्राकाशित समाचारों की हैं ) |
नेहरू जी के मंत्रीमंडल मे डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी बानिज्य मंत्री थे जिन्होने 'मिश्रित अर्थ-व्यवस्था' का सूत्र-पात किया था। वह आर एस एस से संबन्धित थे और जब उन्हे अपनी नीतियो को लागू करने मे दिक्कत हुई तो उन्होने स्तीफ़ा देकर 'जनसंघ' बना लिया जो आर एस एस का राजनीतिक विंग था। 1925 मे आर एस एस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्यवाद को सहयोग देने एवं 1925 मे ही स्थापित कम्यूनिस्ट पार्टी के आजादी के आंदोलन मे क्रांतिकारी संघर्ष को विफल करने हेतु की गई थी।
1977 मे यह जनसंघ 'जनता पार्टी' मे विलय हो गया था। अतः उससे अलग होकर 1980 मे अटल/आडवाणी ने 'भाजपा' की स्थापना की जिसने पहले 'गांधीवादी समाजवाद' का नारा उछाल कर जनता को पक्ष मे करना चाहा और असफल रहने पर 'राम मंदिर' आंदोलन चला कर 'मण्डल' की सिफ़ारिशों पर लागू आरक्षण को धता बता कर 1991 मे यू पी मे अपने बहुमत की सरकार बना ली। फिर दूसरी पार्टियों के सहयोग से 1998 से 2004 तक केंद्र की सत्ता अमेरिकी साम्राज्यवाद के हित मे चलाई। पोखरण विस्फोट की सूचना बाकायदा अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन साहब को भारतीय प्रधानमंत्री बाजपाई साहब ने लिखित मे भेजी।
वर्तमान मनमोहन सरकार भी अमेरिकी साम्राज्यवाद के ही हित मे कार्य कर रही है। जनता के दृष्टिकोण से भाजपा/कांग्रेस की नीतियाँ एक ही हैं। विदेशी शक्तियाँ भारत मे भी ब्रिटेन और अमेरिका की भांति अलग-अलग लेबल वाली दो समान पार्टियों की मौजूदगी चाहती हैं। इसलिए अमेरिका ने पहले मानेका गांधी फिर कांशी राम को आगे करने के प्रयास किए थे। अब अभी हाल मे अन्ना हज़ारे को आगे किया गया था जिन्हें आर एस एस/भाजपा और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का समान समर्थन प्राप्त था।
गरीब-मेहनत कश जनता के अन्ना के छलावे मे न आने के कारण केवल साधन-सम्पन्न और खाते-पीते मद-मस्त शोषक अमीरों के सहारे अन्ना को जन-नेता नहीं बनाया जा सका। इसी कारण अमेरिका को उनसे हाथ खींचना पड़ा। इसका दूसरा कारण यह था कि, CIA का एक सहयोगी संगठन ISCON साईबेरिया की अदालत मे उसके संस्थापक द्वारा व्याख्यायित 'गीता' (जो योगीराज श्री कृष्ण के उपदेशों से भिन्न है)पर प्रतिबंध का सामना कर रहा था। अमेरिका ने अपने भारतीय संपर्कों का लाभ उठा कर संसद मे इसका शोर मचवा दिया । सभी दलों के लोगों ने(जिनमे सपा,राजद,बसपा भी शामिल हैं) बगैर कुछ भी समझे-बूझे सरकार पर दबाव बनाया कि वह रूसी अदालत के संभावित निर्णय को बद्ल् वाये और हमारे विदेशमंत्री कृष्णा साहब ने रूसी राजदूत को बुला कर समझा दिया भारत की जनता रूस के खिलाफ हो जाएगी यदि वहाँ की सरकार ने अपनी याचिका वापिस न ली तो। रूसी प्रधानमंत्री अपने देश की जनता द्वारा चुनाव-धांधली के असंतोष का सामना कर रहे थे उन्होने याचिका की कमजोर पैरवी करवाई और अदालत ने सरकारी याचिका खारिज कर दी। इस प्रकार अमेरिकी साम्राज्यवाद के मंसूबों को हमारे देश की सरकार ने यहाँ के विपक्षी दलों के सहयोग से पूरा कर दिया।
आगामी विधान सभा चुनावों मे अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने हेतु भाजपा ने बसपा सरकार के भ्रष्टाचार मे निष्कासित नेताओं को अपनाना शुरू कर दिया जैसा कि उपरोक्त स्कैन कापियों से स्पष्ट होता है।बाबरी मस्जिद कांड के समय भाजपा के मुख्यमंत्री रहे कल्याण सिंह जी ने बाबू सिंह कुशवाहा को भाजपा मे शामिल करने को करोड़ों की डील एक प्रेस कान्फरेंस मे बताया है। केरल,पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के अपने शासन काल मे कम्युनिस्टों ने आम जनता के हितों का ध्यान रखा और वे किसी भ्रष्टाचार मे नहीं फंसे। पंजाब ,उत्तर प्रदेश आदि के इन चुनावों मे जहां जितने भी 'बामपंथी प्रत्याशी' हैं उन्हें जितवाने का प्रयास किया जाये तो चुनावों के बाद भ्रष्टाचार पर अंकुश लगने की संभावना रहेगी वर्ना तो ये चुनाव भी तमाशा ही साबित होंगे और भ्रष्टाचार का रोना वैसे ही रोया जाता रहेगा।
(हिंदुस्तान,लखनऊ के 07 जनवरी 2012 अंक मे प्रकाशित)
उपरोक्त दोनों स्कैन कापियों को पढ़ने के बाद अन्ना भक्त ब्लागर्स जिनहोने अपने-अपने ब्लाग्स मे अन्ना और उनकी टीम की तारीफ़ों के पुल बांधे थे और उनकी पोल खोलने वालों को कोसा था अब क्या कहना चाहेंगे?'आज तक डाट काम ' मे साहिल जोशी साहब ने लिखा है कि इस संबंध मे प्रश्न पूछने पर अन्ना प्रेस कान्फरेंस छोड़ कर भाग खड़े हुये थे और उसे सब ने लाईव टेलीकास्ट मे देखा था।
शांतिभूषण स्टांप घोटाला मे फंसे हैं तो उनके पुत्र प्रशांत काश्मीर को देश से हटाना चाहते हैं और खुद उन्होने नियम विरुद्ध हिमाचल प्रदेश मे भाजपा सरकार से चाय बागान लिए हैं और नोयडा मे बसपा सरकार से जमीन ले चुके हैं -ये दोनों दल अन्ना के गीत गा रहे थे। किरण बेदी हवाई टिकटों के गोलमाल मे पकड़ी जा चुकी हैं और अरविंद केजरीवाल 09 लाख रुपया अवैध्य वेतन ले चुके थे जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय मे अंडर प्रोटेस्ट वापिस किया है। खुद अन्ना को 'भाजपा/शिव सेना' सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोप मर जेल भेजा था। महाराष्ट्र की जनता ने अन्ना को आईना साफ-साफ दिखा दिया है। अन्न-भक्त ब्लागर्स/फेसबुकिए अपना चेहरा कब आईने मे देखेंगे? * * *
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महत्वपूर्ण सूचना -
अन्ना-भक्त ब्लागर्स ने अपने -अपने ब्लाग्स मे टिप्पणियॉ के संबंध मे लिखा है कि जो लोग टिप्पणियों पर निर्भर नहीं करते हैं वे अपने ब्लाग्स मे टिप्पणी बाक्स बंद क्यों नहीं कर देते?उनकी चुनौती सिरोधार्य करके आज से इस ब्लाग मे टिप्पणी बाक्स बंद किया जा रहा है।
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