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Wednesday, November 18, 2015

स्वामी दयानन्द सरस्वती को हिन्दू बताना एक घोर साजिश ------ विजय राजबली माथुर


http://jagadishwarchaturvedi.blogspot.in/2015/11/blog-post_16.html









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उद्धृत कथन है मथुरा के मूल निवासी और जे एन यू छात्र  यूनियन के अध्यक्ष रहे एक प्रोफेसर साहब का। यह कथन सत्य से कोसों दूर और अप्रत्यक्ष रूप से आर एस एस को सहायता पहुंचाने वाला है । 

मूल नक्षत्र में जन्में मूल शंकर तिवारी को नौ वर्ष की अवस्था में जब यह भान हुआ कि, जिस शिव लिंग को ईश्वर बताया जा रहा था उस पर चढ़े फल-फूल, मिष्ठान्न को बड़े आराम से चूहा जैसा छोटा जीव उस पर चढ़ कर खा सकता है तो वह भ्रम है-ईश्वर नहीं और वह गृह त्याग कर 'गुरु' की खोज में निकल पड़े थे। 'गुरु' अर्थात 'गु' अंधकार से 'रू' प्रकाश की ओर ले जाने वाला। भटकते हुये वह जब वृन्दावन (मथुरा ) के स्वामी विरजानन्द जी के यहाँ पहुंचे तो उनकी खोज सम्पन्न हुई। नया जमाना ब्लाग के लेखक ने एक अन्य लेख द्वारा स्वामी विरजानन्द जी को हिन्दू-मुस्लिम एकता का पक्षधर घोषित किया है। 

वस्तुतः स्वामी विरजानन्द जी ने स्वामी दयानन्द सरस्वती जी को जो शिक्षा दी वह सम्पूर्ण मानवता को श्रेष्ठ =आर्ष=आर्य बनाने की थी और उसी पर दयानन्द जी चले भी। यह आर्य न कोई जाति है न धर्म न ही नस्ल न ही किसी मजहब की शाखा या प्रशाखा। न ही किसी क्षेत्र विशेष से संबन्धित। विश्व का कोई भी वह मनुष्य जो श्रेष्ठ कर्म करे वह आर्य है। अश्रेष्ठ या निकृष्ट कर्म करने वाला अनार्य । 

स्वामी दयानन्द जी का जन्म मूल शंकर तिवारी के रूप में हुआ था अर्थात प्रचलित ब्राह्मण जाति में लेकिन उन्होने घर-परिवार और दुनिया में जो देखा व अपने गुरु विरजानन्द जी से जो समझा-सीखा उससे वह जिस निष्कर्ष पर पहुंचे थे उनके ही शब्दों में प्रस्तुत है। ('सत्यार्थप्रकाश' : सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा , नई दिल्ली- 2 से प्रकाशित के पृष्ठ- 262 व 263 पर ) :

"जब ब्राह्मण लोग विद्द्याहीन हुए तब क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के अविद्वान होने में तो कथा ही क्या कहनी? जो परंपरा से वेदादि शास्त्रों का अर्थसहित पढ़ने का प्रचार था वह भी छूट गया। केवल जीविकार्थ पाठमात्र ब्राह्मण लोग पढ़ते रहे, सो पाठ्मात्र भी क्षत्रिय आदि को न पढ़ाया। क्योंकि जब अविद्वान हुये गुरु बन गए तब छल, कपट, अधर्म भी उनमें बढ़ता चला । ब्राह्मणों ने विचारा कि अपनी जीविका का प्रबंध बांधना चाहिए। सम्मति करके यही निश्चय कर क्षत्रिय आदि को उपदेश करने लगे कि हम हीं तुम्हारे पूज्यदेव हैं। बिना हमारी सेवा किए तुमको स्वर्ग या मुक्ति न मिलेगी। किन्तु जो तुम हमारी सेवा न करोगे तो घोर नरक में पड़ोगे। जो-जो पूर्ण विद्या वाले धार्मिकों का नाम ब्राह्मण और पूजनीय वेद और ऋषि-मुनियों के शास्त्र में लिखा था, उसको अपने मूर्ख, विषयी, कपटी, लमपट,अधर्मियों पर घटा बैठे। भला वे आप्त विद्वानों के लक्षण इन मूरखों में कब घट सकते हैं? परंतु जब क्षत्रियादी यजमान संस्कृत विद्या से अत्यंत रहित हुये तब उनके सामने जो-जो गप्प मारी, सो-सो बिचारों सब मान ली। जब मान ली तब इन नाम मात्र ब्राह्मणों की बन पड़ी। सबको अपने वचन जाल में बांध कर वशीभूत कर लिया और कहने लगे कि :--- 
ब्रह्मवाक्यं जनार्दन:  :। । 

अर्थात जो कुछ ब्राह्मणों के मुख से वचन निकलता है, वह जानों साक्षात भगवान के मुख से निकला। जब क्षत्रियादी वर्ण 'आँख के अंधे और गांठ के पूरे' अर्थात भीतर विद्या की आँख फूटी हुई और जिनके पास धन पुष्कल है, ऐसे-ऐसे चेले मिले, फिर इन व्यर्थ ब्राह्मण नामवालों को विषयानंद का उपवन मिल गया। यह भी उन लोगों ने प्रसिद्ध किया कि जो कुछ पृथिवी में उत्तम पदार्थ हैं, वे सब ब्राह्मणों के लिए हैं। अर्थात जो गुण,कर्म,स्वभाव से ब्राहमणादि वर्णव्यवस्था थी, उसको नष्ट कर जन्म पर रखी और मृतक पर्यंत का भी दान यजमानों से लेने लगे। जैसी अपनी इच्छा हुई वैसा करते चले "   

स्वामी दयानन्द जी ने महाभारत काल के बाद से वैदिक व्यवस्था का पतन माना है जो ऐतिहासिक रूप से भी सत्य है। राम और कृष्ण के समय में उनके लिए 'आर्यपुत्र' शब्द प्रयुक्त होता था। बाद में बौद्धों के विहार व मठ उजाड़ने वालों को ( हिंसा देने वालों को  बौद्धों द्वारा )हिन्दू  कहा गया। जब ईरानी यहाँ आए तो अपनी फारसी भाषा की एक गंदी और भद्दी गाली के रूप में यहाँ के निवासियों को 'हिन्दू' कह कर पुकारा तब से ही यह शब्द प्रचालन में आया है जिसको ब्रिटिश शासकों ने एक राजनीतिक विचारधारा के रूप में पोषित किया था। 

स्वामी दयानन्द जी ने भी सन 1857 ई ॰ की क्रान्ति में सक्रिय भाग लिया था और क्रांति के विफल होने पर 1875 में उन्होने 'आर्यसमाज' की स्थापना पूर्ण स्वराज्य प्राप्ति के हेतु की थी और उसकी प्रारम्भिक शाखाएँ ब्रिटिश छवानी वाले शहरों में स्थापित की थीं। 

एम एम अहलूवालिया साहब ने अपनी पुस्तक :FREEDOM STRUGGLE IN INDIA के पृष्ठ 222 पर लिखा है-

"The Government was never quite happy about the Arya Samaj. They disliked it for its propaganda of self-confidence,self-help and self-reliance.The authorities,sometimes endowed it with fictitious power by persecuting to members whose Puritanism became political under intolerable conditions." 


अर्थात-"आर्यसमाज से सरकार को कभी भी खुशी नहीं हुई। शासकों ने आर्यसमाज को इसलिए नहीं चाहा कि यह आत्मविश्वास,स्व-सहाय और आत्म-निर्भरता का प्रचार करता था। कभी-कभी तो अधिकारियों ने इसकी शक्ति को इतना अधिक महत्व दिया कि उसके सदस्यों को दंडित किया और असहनीय दशाओं में उनके सुधारवादी आंदोलन ने राजनीतिक रूप ले लिया। "
 ब्रिटिश शासकों ने महर्षि दयानन्द को 'क्रांतिकारी सन्यासी' (REVOLUTIONARY SAINT) की संज्ञा दी थी। आर्यसमाज के 'स्व-राज्य'आंदोलन से भयभीत होकर वाईस राय लार्ड डफरिन ने अपने चहेते अवकाश प्राप्त ICS एलेन आकटावियन (A. O.)हयूम के सहयोग से वोमेश चंद्र (W.C.)बेनर्जी जो परिवर्तित क्रिश्चियन थे की अध्यक्षता में 1885 ई .में  इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य के 'सेफ़्टी वाल्व'के रूप मे करवाई थी। किन्तु महर्षि दयानन्द की प्रेरणा पर आर्यसमाजियों ने कांग्रेस में प्रवेश कर उसे स्वाधीनता आंदोलन चलाने पर विवश कर दिया। 'कांग्रेस का इतिहास' नामक पुस्तक में लेखक -डॉ पट्टाभि सीता रमईय्या ने स्वीकार किया है कि देश की आज़ादी के आंदोलन में जेल जाने वाले 'सत्याग्रहियों'में 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे।  


यही वजह है कि आज भी 'साम्राज्यवाद' के हितैषी लोग समय-समय पर महर्षि स्वामी दयानन्द पर हमले करते रहते हैं। दयानंद जी को 'महान हिन्दू' घोषित करना ब्राह्मणवादी षड्यंत्र के सिवा और कुछ नहीं है । आर्यसमाज प्रभावित गांधी जी के असहयोग आंदोलन को छिन्न -भिन्न करने हेतु प्रयासों में  (मुस्लिम लीग : स्थापित 1906 , हिंदूमहासभा : स्थापित 1920 ) विफल रहने के उपरांत 1925 में आर एस एस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा हेतु करवाई गई थी जो तब 'दंगों की भट्टी' में देश को झोंक कर 1947 में साम्राज्यवादी विभाजन कराने में सफल रहा था और आज यू एस ए के साम्राज्यवादी हितों की रक्षा में अग्रणी और पुनः देश के कई विभाजन कराने की ओर अग्रसर है।  ऐसे संगठन की हौसला अफजाई का ही काम करेगा दयानन्द जी को हिन्दू घोषित करने का घृणित अभियान । आज आर्यसमाज पर भी वह आर एस एस जो उसके विरोध में गठित हुआ था हावी है इसलिए उस ओर से प्रतिरोध की आवाज़ उठने की संभावना क्षीण है जिससे दयानन्द के निंदकों व विरोधियों के हौसले बुलंद हैं जो उनको हिन्दू का खिताब दे डाला। 

1925 में आर्यसमाज प्रभावित क्रांतिकारी कांग्रेसियों ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का गठन आज़ादी के आंदोलन को तीव्र करने के लिए किया था। इस साम्यवादी आंदोलन में उत्तर-प्रदेश से गेंदालाल दीक्षित, बिहार से स्वामी सहजानन्द और राहुल सांस्कृत्यायन व पंजाब से सरदार भगत सिंह जैसे प्रबुद्ध आर्यसमाजियों ने अपना प्रबल योगदान दिया है। लेकिन एथीज़्म के नाम पर उनकी ओर से भी दयानन्द जी के प्रति हो रहे अन्याय के प्रति प्रतिरोध की संभावना क्षीण ही है। फिर भी अपना फर्ज़ पूरा करना मेरा ध्येय था ही। 

~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

Thursday, December 1, 2011

स्वेतलाना स्टालिन और साम्यवाद


Hindustan-01/12/2011
कालाकांकर राजघराने के राजा बृजेश सिंह मेहनतकश जनता के हितैषी थे और इसीलिए वह सब कुछ त्याग कर कम्यूनिस्ट बने थे। कैसरबाग ,लखनऊ स्थित अपनी निजी संपत्ति उन्होने भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी को दान कर दी थी और उत्तर-प्रदेश भाकपा का कार्यालय आज भी वहाँ है। ऐसे कामरेड बृजेश सिंह ने रूस प्रवास के दौरान वहाँ के शासक रहे जोसफ स्टालिन की छोटी पुत्री 'स्वेतलाना' से विवाह किया था। उनके निधन के बाद उनकी पत्नी स्वेतलाना भारत आई और यहाँ से अमेरिका वाया स्विट्जरलैंड चली गई तथा वहीं उनका 85 वर्ष की आयु मे गुमनामी मे निधन हो गया। जिस प्रकार डॉ हरगोविंद खुराना के निधन का समाचार देर से आया था उसी प्रकार स्वेतलाना के निधन का समाचार भी बहुत देर से ही आया। स्वेतलाना अपने पिता की 'तानाशाहीपूर्ण' नीतियों की घोर विरोधी थीं। इसी कारण उन्हें रूस छोडना पड़ा था। एक भारतीय कम्यूनिस्ट नेता की पत्नी और रूसी तानाशाह (अपने पिता की विरोधी) स्वेतलाना का निधन एक ऐसे समय मे हुआ है जब पूंजीवादी अमेरिका आर्थिक संकट से जूझ रहा है और उसे उबारने के लिए भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 'वालमार्ट' सरीखी कंपनियों के लिए भारतीय बाजार खोल रहे हैं। भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी ने उत्तर प्रदेश मे तीन दूसरे बामपंथी दलों से मिल कर एक मोर्चा बनाया है और उसके तहत आगामी विधान सभा चुनाव 2012 मे लड़ने का निर्णय लिया है। भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी,उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव डा. गिरीश ने एक वक्तव्य जारी कर  कहा है  कि ,"चूंकि इस समय पूंजीवादी दल अपनी कारगुजारियों के चलते पूरी तरह बेनकाब हो गये हैं, अतएव उत्तर प्रदेश की जनता एक साफ सुथरे नये विकल्प की तलाश में है। एक हद तक इस कमी को वामपंथी दल पूरा कर सकते हैं जो आम जनता की समस्याओं पर लगातार संघर्ष करते रहे हैं, भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त हैं और उनके पास संगठन का एक ठीक-ठाक ताना-बाना पूरे प्रदेश में मौजूद हैं। इस उद्देश्य से भाकपा, माकपा, फारवर्ड ब्लाक और आरएसपी पहले ही एकजुट हो चुके हैं और अब दूसरे वाम समूहों का आह्वान किया गया है कि ऐतिहासिक इस घड़ी में मोर्चे के साथ आयें। कुछ धर्मनिरपेक्ष और भ्रष्टाचार से मुक्त छोटे दलों को भी साथ लेने पर विचार किया जा रहा है।"


भारत मे कम्यूनिस्ट आंदोलन को सबसे अधिक नुकसान डॉ राम मनोहर लोहिया के राजनीतिक दर्शन से हुआ है ,इस संबंध मे जून 2011 मे सत्य नारायण ठाकुर साहब ने डा. लोहिया के विचारों के विरोधाभास को उजागर करते हुए तीन कड़ियों में विस्तार से बताया है उस पर ध्यान देने की पर्मावाश्यक्ता है.साथ ही साथ निम्न-लिखित तथ्यों पर भी यदि ध्यान दिया जाये तो भारत मे कम्यूनिस्ट आंदोलन को लाभ हो सकता है-




वस्तुतः डा.लोहिया ने १९३० में 'कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी'की स्थापना १९२५ में स्थापित भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी'और इसके आंदोलन को विफल करने हेतु की थी.


स्वामी दयानंद के नेतृत्व में 'आर्य समाज'के माध्यम से देश की आजादी की जो मांग १८७५ में उठी थी उसे दबाने हेतु १८८५ में कांग्रेस की स्थापना रिटायर्ड आई .सी.एस.श्री ह्यूम द्वारा वोमेश बेनर्जी की अध्यक्षता में हुयी थी जिसमें आर्य समाजियों ने घुस कर आजादी की मांग उठाना शुरू कर दिया था.बाद में कम्यूनिस्ट भी कांग्रेस में घुस कर ही स्वाधीनता आंदोलन चला रहे थे.


१९२० में स्थापित हिन्दू महासभा के विफल रहने पर १९२५ में आर.एस.एस. की स्थापना अंग्रेजों के समर्थन और प्रेरणा से हुयी जिसने आर्य समाज को दयानंद के बाद मुट्ठी में कर लिया तब स्वामी सहजानंद एवं गेंदा लाल दीक्षित सरीखे आर्य समाजी कम्यूनिस्ट आंदोलन में शामिल हो गए थे.
सी.एस. पी की वजह से जनता भ्रमित रही और क्रांतिकारी ही कम्यूनिस्ट हो सके.


डा.लोहिया ने अपनी पुस्तक'इतिहास चक्र'में साफ़ लिखा है 'साम्यवाद' और पूंजीवाद'सरीखा कोई भी वाद भारत के लिए उपयोगी नहीं है .
हम कम्यूनिस्ट जनता को यह नहीं समझाते थे -कम्यूनिज्म भारतीय अवधारणा है जिसे मैक्समूलर साहब की मार्फ़त महर्षि मार्क्स ने ग्रहण करके 'दास केपिटल'लिखा था.हमने धर्म को अधर्मियों के लिए खुला छोड़ दिया और कहते रहे-'मैन हेज क्रियेटेड गाड फार हिज मेंटल सिक्यूरिटी आनली'.हम जनता को यह नहीं समझा सके -जो शरीर को धारण करे वह धर्म है.नतीजा यह रहा जनता को भटका कर धर्म के नाम पर शोषण को मजबूत किया गया. डा.लोहिया भी रामायण मेला आदि शुरू कराकर जनता को जागृत करने के मार्ग में बाधक रहे.

आज यदि हम धर्म की वैज्ञानिक व्याख्या प्रस्तुत करके जनता को स्वामी दयानद,विवेकानंद,कबीर और कुछ हद तक गौतम बुद्ध का भी सहारा लेकर समझा सकें तो मार्क्सवाद को भारत में सफल कर सकते हैं जो यहीं सफल हो सकता है.यूरोपीय दर्शन जो रूस में लागू हुआ विफल हो चुका है.केवल और केवल भारतीय दर्शन ही मार्क्सवाद को उर्वर भूमि प्रदान करता है,यदि हम उसका लाभ उठा सकें तो जनता को राहत मिल सके.व्यक्तिगत स्तर पर मैं अपने 'क्रान्ति स्वर 'के माध्यम से ऐसा ही कर रहा हूँ.परन्तु यदि सांगठनिक-तौर पर किया जाए तो सफलता सहज है.

भारत मे कम्यूनिस्ट आंदोलन के एक बड़े संगठनकर्ता कामरेड बृजेश सिंह की पत्नी स्वेतलाना के निधन के बाद अब तो यह स्वीकार कर ही लिया जाना चाहिए कि,रूस मे जिस तरीके से साम्यवाद को लागू किया गया था वह गलत था तभी स्टालिन की पुत्री स्वेतलाना को ही विद्रोह करना पड़ा था और इसी कारण रूस मे साम्यवाद विफल हो गया था। साम्यवाद जो मूलतः भारतीय अवधारणा है भारतीय संदर्भों से ही भारत मे प्रसार पा सकेगा। जो लोग आज भी संकीर्ण(दक़ियानूसी) सिद्धांतों पर कम्यूनिस्ट आंदोलन को चलाने की जिद्द करते हैं वे वास्तव मे 'साम्यवाद' के हितैषी नहीं हैं और न ही भारत मे साम्यवाद को सफल होते देखना चाहते हैं चाहे संगठन मे वे कितने ही प्रभावशाली पदों पर क्यों न आसीन हों।