Monday, April 14, 2014

दीवार पर लिखे को न समझा तो भारत झेलेगा प्रकृति का रौद्र रूप......




एक नज़र पूर्व प्रकाशित इस लेख पर भी डाल लें :


"Friday, July 8, 2011


विकास या विनाश

१९४७ में जब हमारा देश औपनिवेशिक गुलामी से आजाद हुआ था तो हमारे यहाँ सुई तक नहीं बंनती थी और आज हमारे देश में राकेट ,मिसाईलें तक बनने लगी हैं.विकास तो हुआ है जो दीख रहा है उसे झुठलाया नहीं जा सकता.लेकिन यह सारा विकास ,सारी प्रगति,सम्पूर्ण समृद्धि कुछ खास लोगों के लिए है शेष जनता तो आज भी भुखमरी,बेरोजगारी,कुपोषण आदि का शिकार है.गरीब और गरीब तथा अमीर और अमीर हुआ है.आजादी का अर्थ यह नहीं था.इसके लिए सरदार भगत सिंह,चंद्रशेखर आजाद,रामप्रसाद बिस्मिल,अश्फाक उल्लाह खां,रोशन लाल लाहिरी आदि अनेकों क्रांतिकारियों ने कुर्बानी नहीं दी थी.यह मार्ग विकास का नहीं ,विनाश का है.

विकास का लाभ आम जन को मिले इस उद्देश्य से प्रेरित नौजवानों नें नक्सलवाद का मार्ग अपना लिया और छत्तीस गढ की भाजपा सरकार ने इन्हें कुचलने हेतु 'सलवा-जुडूम' तथा एस पी ओ का गठन स्थानीय युवकों को लेकर कर लिया था जिसे भंग करने का आदेश देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि,"इस सशस्त्र विद्रोह के लिए सामजिक,आर्थिक विषमता,भ्रष्ट शासन तंत्र और 'विकास के आतंकवाद'  हैं".

जस्टिस बी.सुदर्शन रेड्डी का मत है-"मिडिल क्लास की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए हो रहे औद्योगिकीकरण व् अंधाधुंध माइनिंग के कारण किसान जमीन-जंगल से लगातार बेदखल हो रहे हैं.नक्सल आंदोलन के पैदल सिपाही यही किसान और आदिवासी हैं"

(Hindustan-08/07/2011-Lucknow-Page-16)


"कोरिया की पास्को कं.को उड़ीसा में ५० वर्ष तक लौह अयस्क ले जाने हेतु किसानों की उपजाऊ जमीन दे दी गयी है लेकिन किसान कब्ज़ा नहीं छोड़ रहे हैं और ऐसा करना उनका जायज हक है.२४ जून को सारे देश में किसानों के प्रति एकजुटता प्रदर्शित करने हेतु 'पास्को विरोधी दिवस' मनाया गया था (इस ब्लाग में इस आशय का एक लेख भी दिया था),किन्तु अधिकाँश लोग अपने-अपने में मस्त थे,उन्हें उड़ीसा के गरीब किसानों से कोई मतलब नहीं था .नंदीग्राम और सिंगूर में हल्ला बोलने वाली मुख्यमंत्री सुश्री ममता बनर्जी भी चुप्पी साधे रहीं.

'नया जमाना',सहारनपुर के संस्थापक संपादक स्व.कन्हैया लाल मिश्र'प्रभाकर' ने आर.एस.एस.नेता लिमये जी से एक बार कहा था कि शीघ्र ही दिल्ली की सत्ता के लिए सड़कों पर संघियों-कम्यूनिस्टों के मध्य संघर्ष होगा.दिल्ली नहीं तो छत्तीस गढ़ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पूर्व यह हो ही रहा था.१९२५ में आजादी के आंदोलन को गति प्रदान करने हेतु जब 'भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी' का गठन किया गया तो ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने अपने पृष्ठपोषक बुद्धिजीवियों को बटोर कर आर.एस.एस.का गठन करवा दिया जिसने साम्राज्यवाद की सहोदरी 'साम्प्रदायिकता' को पाला-पोसा और अंततः देश का विभाजन करा दिया.१९४७ में हुआ विभाजन १९७१ में एक और विभाजन लेकर आया जिसने दो राष्ट्रों की थ्योरी को ध्वस्त कर दिया.भारत के ये तीनों हिस्से भीषण असमानता के शिकार हैं.तीनों जगह सत्ताधीशों ने अवैध्य कमाई के जरिये जनता का खून चूसा है.तीनों जगह आम जनता का जीवन यापन करना बेहद मुश्किल हो रहा है.सरकारें साम्राज्यवाद के आधुनिक मसीहा अमेरिका के इशारे पर काम कर रही हैं न कि अपने-अपने देश की जनता के हित में.

तीनों देशों में फिरकापरस्त लोग अफरा-तफरी फैला कर जीवन की मूलभूत समस्याओं से ध्यान हटा रहे हैं.लोक-लुभावन नारे लगा कर पूंजीपतियों के पिट्ठू ही साधारण जन को ठग कर सत्ता में पहुँच जाते हैं.जाति,धर्म.सम्प्रदाय,गोत्र ,क्षेत्रवाद की आंधी चला कर सर्व-साधारण को गुमराह कर दिया जाता है.जो लोग गरीबों के रहनुमा हैं किसानों और मजदूरों के हक के लड़ाका हैं वे अपने अनुयाइयों के वोट हासिल नहीं कर पते हैं और सत्ता से वंचित रह जाते हैं.नतीजा साफ़ है जो प्रतिनिधि चुने जाते हैं वे अपने आकाओं को खुश करने की नीतियाँ और क़ानून बनाते हैं ,आम जन तो उनकी वरीयता में होता ही नहीं है.

क्या आम जनता इसके लिए उत्तरदायी है?कुछ हद तक तो है ही क्योंकि वही तो जाति,धर्म ,सप्रदाय के बहकावे में गलत लोगों को वोट देकर भेजती है.लेकिन इसके लिए जिम्मेदार मुख्य रूप से समाज में प्रचलित अवैज्ञानिक मान्यताएं और धर्म के नाम पर फैले अंध-विशवास एवं पाखण्ड ही हैं.विज्ञान के अनुयायी और साम्यवाद के पक्षधर सिरे से ही धर्म को नकार कर अधार्मिकों के लिए मैदान खुला छोड़ देते हैं जिससे उनकी लूट बदस्तूर जारी रहती है और कुल नुक्सान साम्यवादी-विचार धारा तथा वैज्ञानिक सोच को ही होता है.

धर्म=जो धारण करता है वही धर्म है -यह धारणा कैसे अवैज्ञानिक और मजदूर-किसान विरोधी हो गयी.लेकिन किसान-मजदूर विरोधी लोग जम कर धर्म की गलत व्याख्या प्रस्तुत करके किसान और मजदूर को उलटे उस्तरे से लूट ले जाते हैं क्योंकि हम सच्चाई बताते ही नहीं तो लोग झूठे भ्रम जाल में फंसते चले जाते हैं.

भगवान=भूमि का 'भ'+गगन का 'ग'+वायु का 'व्'+अनल(अग्नि)का अ ='I'+नीर(जल)का' न ' मिलकर ही भगवान शब्द बना है यह कैसे अवैज्ञानिक धारणा हुयी,किन्तु हम परिभाषित नहीं करते तो ठग तो भगवान के नाम पर ही जनता को लूटते जाते हैं.

(चूंकि प्रकृति के ये पांचों तत्व(भगवान) खुद ही बने हैं इनको किसी ने बनाया नहीं है इसलिए ये ही सम्मिलित रूप से 'खुदा' हैं। इनका कार्य उत्पत्ति (GENERATE),पालन (OPRATE) और संहार (DESTROY)है अर्थात ये ही GOD हैं )
मंदिरों से प्राप्त खजाने इस बात का गवाह हैं कि ये मंदिर बैंकों की भूमिका में थे जहाँ समाज का धन सुरक्षित रखा गया था लेकिन आज इसे 'ट्रस्ट'के हवाले करके समृद्ध लोगों की मौज मस्ती का उपाय मुकम्मिल करने की बातें हो रही हैं.१९६२ में गोला बाजार,बरेली में हम लाला धरम प्रकाश जी के मकान में किराए पर रहते थे.जो दीवार कच्ची अर्थात मिट्टी की बनी थी उसे ढहा कर उन्होंने पक्की ईंटों की दीवार बनवाई .कच्ची दीवार से गडा खजाना निकला तुरंत पुलिस पहुँच गयी क्योंकि कानूनन पुराना खजाना सरकार  या समाज की संपत्ति है.पुलिस को भेंट चढा कर उन्होंने रिपोर्ट लगवा दी खजाने की खबर झूठी थी.लेकिन मंदिरों से प्राप्त खजाने की खबर तो झूठी नहीं है फिर इसे किसी ट्रस्ट को क्यों सौंपने की बातें उठ रही हैं ,यह क्यों नहीं सीधे सरकारी खजाने में जमा किया जा रहा है?यदि यह धन सरकारी खजाने में पहुंचे तो गरीब तबके के विकास और रोजगार की अनेकों योजनाएं परिपूर्ण हो सकती हैं.जो करोड़ों लोग भूख से बेहाल हैं उन्हें दो वक्त का भोजन नसीब हो सकता है.

कहीं भी किसी भी उपासना स्थल से प्राप्त होने वाला खजाना राष्ट्रीय धरोहर घोषित होना चाहिए न कि किसी विशेष हित -साधना का माध्यम बनना चाहिए.चाहे संत कबीर हों ,चाहे स्वामी दयानंद अथवा स्वामी विवेकानंद और चाहे संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन डाक्टर अम्बेडकर सभी ने आम जन के हित पर बल दिया है न कि वर्ग विशेष के हित पर.अतः यदि समय रहते आम जन का समाज ने ख्याल नहीं किया तो आम जन बल प्रयोग द्वारा समाज से अपना हक हासिल कर ही लेगा."

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उपर्युक्त लेख में सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों को ही शामिल किया गया है किन्तु यदि प्रकृति की 'प्रकृति' को न समझा गया तो जैसा  कि वैज्ञानिक खोजें बता रही हैं भारत को उत्तराखंड,कुम्भ,देवघर,आदि सरीखी प्राकृतिक विभीषीकाओं  का निश्चय ही सामना करना पड़ेगा। यदि इनसे बचाव करना है तो इस अवैज्ञानिक विकास (वस्तुतः विनाश ) की प्रक्रिया को पूर्ण विराम देकर मानवोचित समाज-व्यवस्था भी स्थापित करनी होगी,समानता पर आधारित राज-व्यवस्था भी स्थापित करनी होगी और प्रकृति से सामंजस्य वाली प्राचीन भारतीय पद्धती भी पुनर्स्थापित करनी होगी। ऐसी संभावनाएं फिलहाल अभी तो न के बराबर हैं। अतः तैयार रहना होगा प्राकृतिक प्रकोप झेलने को।
  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है। 
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28-04-2015 : 

Sunday, April 13, 2014

कौमी एकता और सांप्रदायिकता ---विजय राजबली माथुर

  
फेसबुक पर 09 अप्रैल को :


सांप्रदायिकता ---

सांप्रदायिकता का आधुनिक इतिहास 1857 की क्रांति की विफलता के बाद शुरू होता है। चूंकि 1857 की क्रांति मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर के नेतृत्व मे लड़ी गई थी और इसे मराठों समेत समस्त भारतीयों की ओर से समर्थन मिला था सिवाय उन भारतीयों के जो अंग्रेजों के मित्र थे तथा जिनके बल पर यह क्रांति कुचली गई थी।ब्रिटेन ने सत्ता कंपनी से छीन कर जब अपने हाथ मे कर ली तो यहाँ की जनता को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने हेतु प्रारम्भ मे मुस्लिमों को ज़रा ज़्यादा  दबाया। 19 वी शताब्दी मे सैयद अहमद शाह और शाह वली उल्लाह के नेतृत्व मे वहाबी आंदोलन के दौरान इस्लाम मे तथा प्रार्थना समाज,आर्यसमाज,राम कृष्ण मिशन और थियोसाफ़िकल समाज के नेतृत्व मे हिन्दुत्व मे सुधार आंदोलन चले जो देश की आज़ादी के आंदोलन मे भी मील के पत्थर बने। असंतोष को नियमित करने के उद्देश्य से वाइसराय के समर्थन से अवकाश प्राप्त ICS एलेन आकटावियन हयूम ने कांग्रेस की स्थापना कारवाई। जब कांग्रेस का आंदोलन आज़ादी की दिशा मे बढ्ने लगा तो 1905 मे बंगाल का विभाजन कर हिन्दू-मुस्लिम मे फांक डालने का कार्य किया गया। किन्तु बंग-भंग आंदोलन को जनता की ज़बरदस्त एकता के आगे 1911 मे इस विभाजन को रद्द करना पड़ा। लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन  एवं सर आगा खाँ को आगे करके मुस्लिमों को हिंदुओं से अलग करने का उपक्रम किया जिसके फल स्वरूप 1906  मे मुस्लिम लीग की स्थापना हुई और 1920 मे हिन्दू महासभा की स्थापना मदन मोहन मालवीय को आगे करके करवाई गई जिसके सफल न हो पाने के कारण 1925 मे RSS की स्थापना कारवाई गई जिसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करना था । मुस्लिम लीग भी साम्राज्यवाद का ही संरक्षण कर रही थी जैसा कि,एडवर्ड थाम्पसन ने 'एनलिस्ट इंडिया फार फ़्रीडम के पृष्ठ 50 पर लिखा है-"मुस्लिम संप्रदाय वादियों  और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों मे गोलमेज़ सम्मेलन के दौरान अपवित्र गठबंधन रहा। "

वस्तुतः मेरे विचार मे सांप्रदायिकता और साम्राज्यवाद सहोदरी ही हैं। इसी लिए भारत को आज़ादी देते वक्त भी ब्रिटश साम्राज्यवाद  ने पाकिस्तान और भारत  दो देश बना दिये। पाकिस्तान तो सीधा-सीधा वर्तमान साम्राज्यवाद के सरगना अमेरिका के इशारे पर चला जबकि अब भारत की सरकार  भी अमेरिकी हितों का संरक्षण कर रही है। भारत मे चल रही सभी आतंकी गतिविधियों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन अमेरिका का रहता है। हाल के दिनों मे जब बढ़ती मंहगाई ,डीजल,पेट्रोल,गैस के दामों मे बढ़ौतरी और वाल मार्ट को सुविधा देने के प्रस्ताव से जन-असंतोष व्यापक था अमेरिकी एजेंसियों के समर्थन से सांप्रदायिक शक्तियों ने दंगे भड़का दिये। इस प्रकार जनता को आपस मे लड़ा देने से मूल समस्याओं से ध्यान हट गया तथा सरकार को साम्राज्यवादी हितों का संरक्षण सुगमता से करने का अवसर प्राप्त  हो गया।

धर्म निरपेक्षता---

धर्म निरपेक्षता एक गड़बड़ शब्द है। इसे मजहब या उपासना पद्धतियों के संदर्भ मे प्रयोग किया जाता है । संविधान मे भी इसका उल्लेख इसी संदर्भ मे  है । इसका अभिप्राय यह था कि,राज्य किसी भी उपासना पद्धति या मजहब को संरक्षण नही देगा। जबकि व्यवहार मे केंद्र व राज्य सरकारें कुम्भ आदि मेलों के आयोजन मे भी योगदान देती हैं और हज -सबसीडी के रूप मे भी। वास्तविकता यह है कि ये कर्म धर्म नहीं हैं। धर्म का अर्थ है जो मानव शरीर और मानव सभ्यता को धारण करने के लिए आवश्यक हो। जैसे -सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। धर्म निपेक्षता की आड़ मे इन सद्गुणों का तो परित्याग कर दिया गया है और ढोंग-पाखण्ड-आडंबर को विभिन्न सरकारें खुद भी प्रश्रय देती हैं और उन संस्थाओं को भी बढ़ावा देती हैं जो ऐसे पाखंड फैलाने मे मददगार हों। इन पाखंडों से किसी भी  आम जनता का  भला  नहीं होता है किन्तु व्यापारी/उद्योगपति वर्ग को भारी आर्थिक लाभ होता है। अतः कारपोरेट घरानों के अखबार और चेनल्स पाखंडों का प्रचार व प्रसार खूब ज़ोर-शोर से करते हैं। 

एक ओर धर्म निरपेक्षता की दुहाई दी जाती है और दूसरी ओर पाखंडों को धर्म के नाम पर फैलाया जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि धर्म को उसके वास्तविक रूप मे समझ-समझा कर उस पर अमल किया जाए और ढोंग-पाखंड चाहे वह किसी भी मजहब का हो उसका प्रतिकार किया जाये। पहले प्रबुद्ध-जनों को समझना व खुद को सुधारना  होगा फिर जनता व सरकार को समझाना होगा तभी उदेश्य साकार हो सकता है। वरना तो धर्म निरपेक्षता के नाम पर सद्गुणों को ठुकराना और सभी मजहबों मे ढोंग-पाखंड को बढ़ाना जारी रहेगा और इसका पूरा-पूरा लाभ शोषक-उत्पीड़क वर्ग को मिलता रहेगा। जनता आपस मे सांप्रदायिकता के भंवर जाल मे फंस कर लुटती-पिसती रहेगी। 
 http://krantiswar.blogspot.in/2012/11/sampradayikta-dharam-nirpexeta.html
  ~विजय राजबली माथुर ©
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Monday, April 7, 2014

ज्योतिष का विरोध :कितना तार्किक कितना .....?---विजय राजबली माथुर

"राहू काल से डरे हुये राजनेता"शीर्षक लेख की अंतिम पंक्तियों में कहा गया है -"आखिर लोगों की निजी 'आस्था' की आड़ में धर्म और राजनीति के इस घालमेल पर आप क्या कहेंगे?"

'धर्म'=सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। 
काश राजनीति में धर्म का समन्वय होता तो कोई संकट ही न खड़ा होता। धर्म विहीन राजनीति ही समस्त संकटों की जड़ है। व्यापारिक शोषण पर आधारित विभाजनकारी,विखंडंनकारी,उत्पीड़क 'ढोंग-पाखंड-आडंबर' कतई धर्म नहीं है जबकि लेख में उसी को धर्म की संज्ञा दी गई है । राजनेता ढोंग-पाखंड-आडंबर में अपने-अपने व्यापारिक/आर्थिक हितों के मद्दे नज़र उलझे हैं उसे राजनीति में धर्म का घालमेल कह कर बड़ी चालाकी से उद्योगपतियों,व्यापारियों और कारपोरेट घरानों के शोषण-उत्पीड़न को ढका गया है। 

ज्योतिष=ज्योत + इष=प्रकाश का ज्ञान । 
ज्योतिष का उद्देश्य मानव जीवन को सुंदर,सुखद और समृद्ध बनाना है। 

लेकिन लेख में जिस प्रक्रिया को ज्योतिष और धर्म की संज्ञा दी गई है वह ढोंग-पाखंड-विभ्रम है 'ज्योतिष' नहीं।यदि वास्तविक ज्योतिष ज्ञान के आधार पर राय दी गई होती तो एक ही व्यक्ति अनेक राजनेताओं को एक से मुहूर्त नहीं दे सकता था। किसी भी व्यक्ति पर उसके जन्मकालीन ग्रह-नक्षत्रों, उनके आधार पर उसकी महादशा-अंतर्दशा,तथा उसकी जन्म-कुंडली पर गोचर-कालीन ग्रहों का व्यापक प्रभाव पड़ता है फिर सबके लिए एक ही समय के मुहूर्त का क्या मतलब?और यह भी कि नामांकन निरधारित समयावधि में ही किया जा सकता है चाहे उस बीच मुहूर्त हो या न हो। एवं एक स्थान -क्षेत्र से एक ही प्रतिनिधि चुना जाएगा फिर परस्पर प्रतिद्वंदी मुहूर्त निकलवा कर क्या सिद्ध करेंगे?यह मूरखों को मूर्ख बनाने का गोरख धनदा है 'ज्योतिष' नहीं। 
कुछ अति प्रगतिशील वैज्ञानिक 'ग्रह-नक्षत्रों'के प्रभाव को ही नहीं मानते हैं वैसे लोगों की मूर्खता के ही परिणाम हैं विभिन्न प्राकृतिक-प्रकोप। 

यदि ग्रह-नक्षत्रों का प्राणियों पर प्रभाव पड़ता है तो वहीं प्राणियों का सामूहिक प्रभाव भी ग्रह-नक्षत्रों पर पड़ता है। एक बाल्टी में पानी भर कर उसमें गिट्टी फेंकेंगे तो 'तरंगे'दिखाई देंगी। यदि एक तालाब में उसी गिट्टी को डालेंगे तो हल्की तरंग मालूम पड़ सकती है किन्तु नदी या समुद्र में उसका प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होगा परंतु 'तरंग' निर्मित अवश्य होगी । इसी प्रकार  सीधे-सीधी तौर पर मानवीय व्यवहारों का प्रभाव ग्रहों या नक्षत्रों पर दृष्टिगोचर नहीं हो सकता उसका एहसास तभी होता है जब प्रकृति दंडित करती है जैसे-उत्तराखंड त्रासदी,नर्मदा मंदिर ,कुम्भ आदि की भगदड़। क्योंकि ये सारे ढोंग-पाखंड-आडंबर झूठ ही धर्म का नाम लेकर होते हैं इसलिए इनमें भाग लेने वाले प्राकृतिक प्रकोप का शिकार होते हैं। ढोंग-पाखंड-आडंबर फैलाने का दायित्व केवल पुरोहितों-पंडे,पुजारी,मुल्ला-मौलवी,पादरी आदि का ही नहीं है बल्कि इनसे ज़्यादा तथाकथित 'प्रगतिशील' व 'वैज्ञानिक' होने का दावा करने वाले 'अहंकारी विद्वानों' का है जो उसी ढोंग-पाखंड-आडंबर को धर्म से संबोधित करते हैं बजाए कि जनता को समझाने व जागरूक करने के। यह लेख ऐसे विद्वानों का ही प्रतिनिधित्व करता है। 





  ~विजय राजबली माथुर ©
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Saturday, March 15, 2014

सन्त कामरेड अब्दुल हफीज साहब---विजय राजबली माथुर

 15 मार्च जयंती दिवस पर विशेष स्मरण :

 आगरा भाकपा के नए  कार्यालय का नामकरण जिन कामरेड महादेव नारायण टंडन के नाम पर है वह आगरा में पार्टी के संस्थापक के रूप में जाने जाते हैं। टंडन जी ने आगरा मे भाकपा की स्थापना के बाद दूसरे शहरों से कई प्रतिभाशाली युवाओं को आगरा लाकर पार्टी को मजबूत किया था। इनमे से  दो का सान्निध्य मुझे भी मिला था। एक थे कामरेड अब्दुल हफीज साहब  जो टंडन जी की ही तरह स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे और पार्टी कार्यालय मे ही स्वास्थ्य ठीक रहने तक रहे। मजदूरों मे ही नहीं आम जनता मे भी वह  'चचे' नाम से जाने जाते थे। इनको टंडन जी झांसी से विद्यार्थी काल मे लाये थे।

होटल मुगल शेरटन,आगरा से 'सुपर वाईजर  अकाउंट्स' की पोस्ट से बर्खास्तगी को कानूनी चुनौती देने के दौरान कामरेड अब्दुल हफीज साहब से संपर्क हुआ था जो त्याग की सच्ची मूर्ती थे और उनको संत कामरेड की संज्ञा प्राप्त थी। उनको लोग प्यार से 'चचे' भी पुकारते थे और वह आगरा में भाकपा के पर्यायवाची थे। कम्युनिस्ट पार्टी से अभिप्राय आम जनता में चचे की पार्टी से था। यह ठीक उसी प्रकार था जैसे कि लखनऊ में कम्युनिस्ट पार्टी से अभिप्राय यहाँ के आम नागरिक कामरेड अतुल अंजान की पार्टी से लेते हैं। हफीज साहब ने पार्टी के आडिटर कामरेड हरीश आहूजा एडवोकेट के पास मुझे भेज दिया जिन्होने मेरा केस तैयार कराया। कामरेड आहूजा ने मुझे भाकपा में शामिल कर लिया।

1985 में जब मेरा चचे से संपर्क हुआ था तब भाकपा कार्यालय सुंदर होटल राजा-की-मंडी बाज़ार में स्थित था। चचे पार्टी के AITUC से सम्बद्ध होने के कारण मजदूरों के हितार्थ कार्य करते थे और उनके बारे में सुना था कि जब तक वह पूर्ण सक्रिय रहे खुद ही टाईप राईटर से मजदूरों की अर्ज़ियाँ टाईप करते व केस तैयार करते थे उनकी सक्रियता के दौरान मजदूरों को न्यायालयों  से बराबर न्याय मिलता रहा था। उनको जो स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी के रूप में सरकारी पेंशन मिलती थी उससे गुज़ारा चलाते हुये वह पार्टी कामरेड्स तथा आगंतुकों को भी अक्सर खुद चाय बना कर अपने हाथों से बड़े प्यार से पिलाया करते थे। 

बाहर से आने वाले बड़े नेता गण चाहे वे  आज के वयोवृद्ध कामरेड बर्द्धन जी हों  या पूर्व के  काली शंकर शुक्ला जी,राम नारायण उपाध्याय जी,जगदीश नारायण त्रिपाठी जी अथवा लल्लू सिंह चौहान साहब हों सभी चचे का सम्मान करने वाले रहे हैं। आगरा के सभी बड़े स्थानीय नेतागण तो उनका स्वभाविक सम्मान करते ही थे। कार्यकर्ताओं और मजदूरों के तो वह संरक्षक समान थे। कोई भी व्यक्ति जो एक भी बार उनके संपर्क में आ गया वह उनसे प्रभावित हुये बगैर नहीं रह सकता था।  अंतिम समय में उनको उनके भतीजे झांसी ले गए थे जो अक्सर पहले भी ले जाते रहे थे जबकि  उससे पहले कई बार वह पार्टी कार्यालय,आगरा लौट आते थे। 
आज के समय में चचे-कामरेड अब्दुल हफीज साहब सदृश्य नेताओं का सर्वथा आभाव है और यही कारण है कि पार्टी अपना पुराना गौरव भुला बैठी है। आज उनके जन्मदिन पर हम उनको हार्दिक श्रद्धांजली अर्पित करते हैं।


 ~विजय राजबली माथुर ©
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Monday, March 10, 2014

काश लोग बतबना पन छोड़ कर सच को स्वीकारें व मानवता की रक्षा हेतु तत्पर हों!---विजय राजबली माथुर




कुदरत का कहर: महाराष्ट्र में दिखा कश्मीर जैसा नजारा, हजारों किसान हुए बर्बाद

http://www.bhaskar.com/article/MH-PUN-heavy-rain-in-maharashtra-and-pune-4545627-PHO.html?seq=3 

भास्कर.कॉम | Mar 10, 2014, 18:31PM IST

पुणे। महाराष्ट्र के पुणे और आसपास के शहरों में पिछले 24 घंटो के दौरान तूफानी बारिश और ओलावृष्टि का कहर देखने को मिला है। भीषण ओलावृष्टि के चलते जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। खेतों में खड़ी फसल बर्बाद हो गई। कहीं पर पेड़ गिरे तो कहीं पर बिजली के खंभे गिर जाने से बिजली चली गई। ओलावृष्टि के कारण कई जानवरों की मौत हो गई। पश्‍चिम विदर्भ में भीषण ओलावृष्टि ने एक युवक की जान ले ली और तीन दर्जन से अधिक लोगों को घायल कर दिया।............................... 
 
 




15 फरवरी से 16 मार्च 2014  हेतु पृष्ठ संख्या-52 ,'निर्णय सागर,चंड-मार्तण्ड' पंचांग पर पहले ही से आगाह किया हुआ था ।:



 किन्तु वस्तु-स्थिति यह है कि प्रशासनिक अधिकारियों(IAS/PCS) को इस तरफ ध्यान देने की क्या ज़रूरत? और तो और पंडे-पुजारी भी अपना पेट भरने तथा जनता का खून चूसने (खटमल और जोंक की भांति) में ही संलिप्त रहते हैं। उनको ही ज्योतिषी मानते हुये 'वैज्ञानिकता-प्रगतिशीलता' का लबादा ओढ़े प्रबुद्ध जन 'ज्योतिष' को ही फिजूल और व्यर्थ बताते रहते हैं। तब परिणाम इससे भिन्न कैसे हो सकते हैं?चाहे वह उत्तराखंड त्रासदी हो अथवा कुम्भ -भगदड़ अथवा देवघर आदि मंदिरों की भगदड़।  जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ते रहने तथा उनका निर्बाध शोषण-उत्पीड़न करते रहने हेतु व्यापारी/उद्योगपति वर्ग 'पोंगापंथ-आडम्बर-ढोंग' को बढ़ावा देता रहता है-फिल्मों के माध्यम से भी और मंदिरों -मेलों -तमाशों के माध्यम से भी। 'शिवरात्रि' पर अखबारों में सुर्खियों के साथ छ्पा था कि ब्राह्मण पुजारी ने एक दलित महिला को मंदिर प्रवेश नहीं करने दिया था। क्यों जाते हैं लोग इन मंदिरों में? क्यों नहीं लोगों को समझाया जाता है कि 'भगवान' मंदिर में नहीं सर्वत्र व्यापक है। कैसे-






  मानव ही नहीं विश्व के सभी प्राणियों व वनस्पतियों के जीवन हेतु जिन पाँच तत्वों की विशद आवश्यकता है उनका समन्वय ही भगवान-खुदा-गाड है। देखिये कैसे?:

भ(भूमि) +ग(गगन-आकाश)+व (वायु)+I(अनल-अग्नि)+न(नीर-जल)=भगवान।
 
अध्यात्म=अध्ययन अपनी आत्मा का ।

धर्म=जो शरीर व समाज को धारण करने हेतु आवश्यक हैं ;जैसे-

सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य।

लेकिन अफसोस यही है कि लोग सच्चाई को समझना और समझाना तो चाहते ही नहीं हैं बल्कि ऊपर से मखौल और उड़ाते हैं। यदि पंचांग में दी गई चेतावनी पर ध्यान देते हुये प्रशासनिक स्तर पर पहले ही सुरक्षात्मक उपाए कर लिए जाया करें तो इस तरह अपार जन-धन की क्षति को कम तो किया ही जा सकता है। 
01 मार्च ,शनिवार के दिन अमावस्या थी और 16 मार्च रविवार को पूर्णिमा है जो कि पर्यावरण हेतु सुखद नहीं है साथ ही निर्धनों,पशुओं व साधारण जनता हेतु पीड़ादायक स्थिति उत्पन्न करने वाली आदि  चेतावनी स्पष्ट रूप से उपरोक्त स्कैन डबल क्लिक करके पढ़ी जा सकती हैं। 

काश लोग बतबना पन छोड़ कर सच को स्वीकारें व मानवता की रक्षा हेतु तत्पर हों!

  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।