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Wednesday, May 9, 2018

धर्म आधारित राष्ट्र लोकतंत्र विरोधी अवधारणा है ------ अफलातून अफ़लू / सांप्रदायिकता है साम्राज्यवाद की प्रहरी ------ विजय राजबली माथुर

 * किसी धर्म आधारित राष्ट्र में लोकतंत्र कभी पनप नहीं सकता । संविधान , न्यायपालिका , और प्रेस का हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर अपमान कट्टरपंथियों के लोकतंत्र विरोधी रुख की ही बानगी है । गोलवलकरपंथी राष्ट्रतोड़क ‘राष्ट्रवादियों’ के चंगुल में में देश चला गया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक होगा । इसलिए समय रहते इनके हिटलरी मंसूबों को उजागर करें और इनके खिलाफ़ चौतरफ़ा ढंग से सक्रिय हों ।
** एडवर्ड थाम्पसन ने 'एनलिस्ट इंडिया फार फ़्रीडम के पृष्ठ 50 पर लिखा है-"मुस्लिम संप्रदाय वादियों  और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों मे गोलमेज़ सम्मेलन के दौरान अपवित्र गठबंधन रहा। "
*** अफलातून साहब की इस चेतावनी " गोलवलकरपंथी राष्ट्रतोड़क ‘राष्ट्रवादियों’ के चंगुल में मे देश चला गया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक होगा । इसलिए समय रहते इनके हिटलरी मंसूबों को उजागर करें और इनके खिलाफ़ चौतरफ़ा ढंग से सक्रिय हों ।" के मद्देनजर देश की जागरूक जनता और देश हितैषी दलों की मनसा - वाचा - कर्मणा एकता की महती आवश्यकता है।
Aflatoon Afloo
Varanasi
राष्ट्र की हिटलरी कल्पना फासीवाद के नाम से कुख्यात है । हिटलर ने ‘नस्ल’ की कथित शुद्धता और यहूदी विद्वेष की विक्षिप्तता को फैलाकर जर्मनी को भीषण बर्बरता और रक्तपात में डुबो दिया और विश्व भर की लांछना का पात्र बना दिया । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का धर्म आधारित राष्ट्र भी उसी प्रकार का एक बर्बर उद्देश्य है । हिटलर से तुलना करके या हिटलर का उदाहरण देकर हम संघ-परिवार पर कोई काल्पनिक आरोप नहीं लगा रहे हैं । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गौरव-पुरुष गुरु गोलवलकर ने खुद १९३९ में लिखी अपनी पुस्तक ‘ वी ऑर आवर नेशनहुड डिफाइन्ड ‘ ( हम या हमारी राष्ट्रीयता परिभाषित ) ( अब उनके चेले अधिकृत रूप से कहने लगे हैं कि यह उनकी लिखी किताब नहीं है , उनका अनुवाद है ) में कहा था –

” नस्ल और इसकी संस्कृति की पवित्रता को बनाए रखने के लिए जर्मनी ने यहूदियों से अपने देश को रिक्त कर दुनिया को स्तम्भित कर दिया । नस्ल का गर्व यहाँ अपनी उच्चतम अभिव्यक्ति पाता है। जर्मनी ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि संस्कृतियों और नस्लों के फर्क जो बुनियाद तक जाते हैं , एक संपूर्ण इकाई में जज़्ब नहीं किए जा सकते । हम भारतीयों के लिए यह एक अच्छा सबक है जिससे लाभ उठाना चाहिए । “

यह सचमुच बड़े शर्म की बात है कि जिस विद्वेष और क्रूरता के लिए हिटलर का जर्मनी पूरी दुनिया में लांछित हुआ , गोलवलकर ने उसी की प्रशंसा की और भारत के लिए उसी हिटलरी रास्ते की सिफारिश की । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गुरु गोलवलकर के बताए हुए फासीवाद के रास्ते पर चल रहा है । वह जिस हिन्दू राष्ट्र की बात करता है , वह सिर्फ मुस्लिम विद्वेष तक सीमित नहीं है । स्त्रियों और शूद्र कही जाने वाली जातियों , जिन्हें सबसे अधिक धर्माचार्यों द्वारा अनुमोदित क्रूर प्रथाओं और परम्परागत ऊँच-नीच का शिकार होना पड़ा है , की दुर्दशा कम होने के बजाए , धर्म आधारित राष्ट्र में काफ़ी बढ़ जाएगी । सती प्रथा और बाल-विवाह पर रोक सम्बन्धी कानून हटाने और वर्ण व्यवस्था को स्थापित करने की मांग धर्म-संसद के प्रस्तावों में होने लगी थीं । स्त्रियों को सम्पत्ति में हक देने वाले हिन्दू कोड बिल का भी गोलवलकर ने विरोध किया था ।

इसलिए यदि आप कूप मंडूकता , धर्मान्धता , स्त्री उत्पीड़न और दलितों तथा पिछड़ों की सामाजिक दुर्दशा को देश की नियति नहीं बनाना चाहते तो हिन्दू राष्ट्र के नारे से सतर्क रहे। हम किस प्रकार पूजा पाठ करें , त्योहार किस ढंग से मनाएं , धार्मिक प्रतीकों का क्या अर्थ ग्रहण करें और दूसरे धर्म के अनुयायियों के साथ क्या व्यवहार करें , इन बातों को संघ परिवार और महंत मठाधीश नियंत्रित करने  की कोशिश करते हैं । इनके चलते हमारे धार्मिक आचरण की स्वाधीनता सुरक्षित नहीं है । ऐसे तत्वों को धार्मिक मान्यता और राजनैतिक समर्थन देना बन्द करें नहीं तो ये हमें एक अन्धी सुरंग में पहुंचा देंगे ।

दुनिया के कई धर्म आधारित राष्ट्रों में जनता का उत्पीड़न और रुदन हमसे छिपा नहीं है। धर्म आधारित राष्ट्र के रूप में हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के बारे में हम जानते हैं कि इस्लामियत के नाम पर कैसे कठमुल्लों , सामन्तों , फौजी अफसरों , भ्रष्ट नेताओं और असामाजिक तत्वों का वह चारागाह बन गया है । क्या हम भारत में भी उसी दुष्चक्र को स्थापित करना चाहता हैं ? धर्म आधारित राष्ट्र लोकतंत्र विरोधी अवधारणा है । किसी धर्म आधारित राष्ट्र में लोकतंत्र कभी पनप नहीं सकता । संविधान , न्यायपालिका , और प्रेस का हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर अपमान कट्टरपंथियों के लोकतंत्र विरोधी रुख की ही बानगी है । गोलवलकरपंथी राष्ट्रतोड़क ‘राष्ट्रवादियों’ के चंगुल में देश चला गया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक होगा । इसलिए समय रहते इनके हिटलरी मंसूबों को उजागर करें और इनके खिलाफ़ चौतरफ़ा ढंग से सक्रिय हों ।
https://www.facebook.com/aflatoon.afloo/posts/10156656715003646

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सांप्रदायिकता का आधुनिक इतिहास 1857 की क्रांति की विफलता के बाद शुरू होता है। चूंकि 1857 की क्रांति मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर के नेतृत्व मे लड़ी गई थी और इसे मराठों समेत समस्त भारतीयों की ओर से समर्थन मिला था सिवाय उन भारतीयों के जो अंग्रेजों के मित्र थे तथा जिनके बल पर यह क्रांति कुचली गई थी।ब्रिटेन ने सत्ता कंपनी से छीन कर जब अपने हाथ मे कर ली तो यहाँ की जनता को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने हेतु प्रारम्भ मे मुस्लिमों को ज़रा ज़्यादा  दबाया। 19 वी शताब्दी मे सैयद अहमद शाह और शाह वली उल्लाह के नेतृत्व मे वहाबी आंदोलन के दौरान इस्लाम मे तथा प्रार्थना समाज,आर्यसमाज,राम कृष्ण मिशन और थियोसाफ़िकल समाज के नेतृत्व मे हिन्दुत्व मे सुधार आंदोलन चले जो देश की आज़ादी के आंदोलन मे भी मील के पत्थर बने। असंतोष को नियमित करने के उद्देश्य से वाइसराय के समर्थन से अवकाश प्राप्त ICS एलेन आकटावियन हयूम ने कांग्रेस की स्थापना कारवाई। जब कांग्रेस का आंदोलन आज़ादी की दिशा मे बढ्ने लगा तो 1905 मे बंगाल का विभाजन कर हिन्दू-मुस्लिम मे फांक डालने का कार्य किया गया। किन्तु बंग-भंग आंदोलन को जनता की ज़बरदस्त एकता के आगे 1911 मे इस विभाजन को रद्द करना पड़ा। लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन  एवं सर आगा खाँ को आगे करके मुस्लिमों को हिंदुओं से अलग करने का उपक्रम किया जिसके फल स्वरूप 1906  मे मुस्लिम लीग की स्थापना हुई और 1920 मे हिन्दू महासभा की स्थापना मदन मोहन मालवीय को आगे करके करवाई गई जिसके सफल न हो पाने के कारण 1925 मे RSS की स्थापना कारवाई गई जिसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करना था । मुस्लिम लीग भी साम्राज्यवाद का ही संरक्षण कर रही थी जैसा कि,एडवर्ड थाम्पसन ने 'एनलिस्ट इंडिया फार फ़्रीडम के पृष्ठ 50 पर लिखा है-"मुस्लिम संप्रदाय वादियों  और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों मे गोलमेज़ सम्मेलन के दौरान अपवित्र गठबंधन रहा। "


वस्तुतः मेरे विचार मे सांप्रदायिकता और साम्राज्यवाद सहोदरी ही हैं। इसी लिए भारत को आज़ादी देते वक्त भी ब्रिटश साम्राज्यवाद  ने पाकिस्तान और भारत  दो देश बना दिये। पाकिस्तान तो सीधा-सीधा वर्तमान साम्राज्यवाद के सरगना अमेरिका के इशारे पर चला जबकि अब भारत की सरकार  भी अमेरिकी हितों का संरक्षण कर रही है। भारत मे चल रही सभी आतंकी गतिविधियों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन अमेरिका का रहता है। हाल के दिनों मे जब बढ़ती मंहगाई ,डीजल,पेट्रोल,गैस के दामों मे बढ़ौतरी और वाल मार्ट को सुविधा देने के प्रस्ताव से जन-असंतोष व्यापक था अमेरिकी एजेंसियों के समर्थन से सांप्रदायिक शक्तियों ने दंगे भड़का दिये। इस प्रकार जनता को आपस मे लड़ा देने से मूल समस्याओं से ध्यान हट गया तथा सरकार को साम्राज्यवादी हितों का संरक्षण सुगमता से करने का अवसर प्राप्त  हो गया। 
यू एस ए के इशारे पर भारत विभाजन को धार्मिक आधार इसलिए प्रदान किया गया जिससे  इसके पीछे के साम्राज्यवादी मंसूबों को छिपाए रखा जा सके। कश्मीर के राजा हरी सिंह ने बेवजह ही नहीं भारत और पाकिस्तान से अलग एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में रहने का निर्णय किया था बल्कि उनको यू एस ए , ब्रिटेन व आर एस एस का समर्थन प्राप्त था। 




कश्मीर की बाह्य भौगोलिक स्थिति ही नहीं वरन इसके लद्दाख क्षेत्र में जोजीला दर्रे के नीचे पाया जाने वाला प्लेटिनम का आकर्षण भी यू एस ए को ललचा रहा था। ज्ञातव्य है कि प्लेटिनम न केवल स्वर्ण से भी अधिक मूल्यवान धातु है बल्कि यह यूरेनियम के निर्माण में भी सहायक है। यूरेनियम सिर्फ परमाणु बम ही नहीं परमाणु ऊर्जा में भी प्रयोग होता है इसलिए स्वतंत्र कश्मीर के शासकों को बहका कर यू एस ए इस यूरेनियम को भी हासिल करना चाहता था। किन्तु नेहरू, पटेल और शेख मोहम्मद अब्दुल्ला ने मिल कर हरी सिंह को भारत में विलय के लिए विवश कर दिया था और कश्मीर में बाहरी लोगों के भूमि - क्रय को प्रतिबंधित करने हेतु अनुच्छेद 370 का प्राविधान संविधान में रखवाया था। यही वजह है कि आर एस एस , हिंदूमहासभा, जनसंघ ( अब भाजपा ) आदि साम्राज्यवादियों के समर्थक दल भारतीय संविधान और इसके प्राविधान अनुच्छेद 370 का शुरू से ही विरोध कर रहे हैं। मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के एक मंत्री भी संविधान बदलने की बात कह चुके हैं और अब सरकार से बाकायदा प्रस्ताव देकर मांग की जा रही है।  





अतएव अफलातून साहब की इस चेतावनी " गोलवलकरपंथी राष्ट्रतोड़क ‘राष्ट्रवादियों’ के चंगुल में देश चला गया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक होगा । इसलिए समय रहते इनके हिटलरी मंसूबों को उजागर करें और इनके खिलाफ़ चौतरफ़ा ढंग से सक्रिय हों ।" के मद्देनजर देश की जागरूक जनता और देश हितैषी दलों की मनसा - वाचा - कर्मणा एकता की महती आवश्यकता है। 
~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, November 19, 2017

इंदिराजी की जल्दबाजी और अदूरदर्शी चूकों पर भी गौर कर लिया जाये ------ विजय राजबली माथुर

****** इंदिराजी के जन्मदिन पर   आज  उनको याद करने,नमन करने और उनकी प्रशंसा के गीत गाने के साथ-साथ ज़रा उनकी जल्दबाजी और अदूरदर्शी चूकों पर भी गौर कर लिया जाये और उनसे बचने का मार्ग ढूँढना शुरू किया जाये तो देशहित में होगा व इंदिराजी को भी सच्ची श्रद्धांजली होगी।****** 




 
इतिहासकार सत्य का अन्वेषक होता है उसकी पैनी निगाहें भूतकाल के अंतराल में प्रविष्ट होकर ' तथ्य के मोतियों ' को सामने लाती हैं । इन्दिरा जी का कार्यकाल इतना भी भूतकाल नहीं है जो उसको ज्ञात करने के लिए किसी विशेष अनुसंधान की आवश्यकता पड़े। खेद की बात है कि, प्रोफेसर मृदुला मुखर्जी साहिबा ने इन्दिरा जी के कार्यकाल के प्रथम भाग के आधार पर उनका चित्रण किया है जबकि, उनके कार्यकाल के दिवतीय भाग के अलग आचरण की अवहेलना नज़र आती है। दो वर्ष पूर्व प्रकाशित अपने एक लेख का ज़िक्र इस अवसर पर पुनः  करना अपना दायित्व समझता हूँ ------
इन्दिरा गांधी का वर्तमान केंद्र सरकार के निर्माण में योगदान  : 
VIJAI RAJBALI MATHUR·THURSDAY, NOVEMBER 19, 2015

1966 में लाल बहादुर शास्त्री जी के असामयिक निधन के बाद सिंडीकेट (के कामराज नाडार, अतुल घोष, सदाशिव कान्होजी पाटिल, एस निज लिंगप्पा, मोरारजी देसाई ) की ओर से मोरारजी देसाई कांग्रेस संसदीय दल के नेता पद के प्रत्याशी थे जबकि कार्यवाहक प्रधानमंत्री नंदा जी  व अन्य नेता गण की ओर से इंदिरा जी । अंततः इन्दिरा जी का चयन गूंगी गुड़िया समझ कर हुआ था और वह प्रधानमंत्री बन गईं थीं। 1967 के आम चुनावों में उत्तर भारत के राज्यों में कांग्रेस का पराभव हो गया व संविद सरकारों का गठन हुआ। पश्चिम बंगाल में अजोय मुखर्जी (बांग्ला कांग्रेस ),बिहार में महामाया प्रसाद सिन्हा (जन क्रांति दल ),उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह (जन कांग्रेस - चन्द्र् भानु  गुप्त के विरुद्ध बगावत करके ) , मध्य प्रदेश में गोविंद नारायण सिंह (द्वारिका प्रसाद मिश्र के विरुद्ध बगावत करके ) मुख्यमंत्री बने ये सभी कांग्रेस छोड़ कर हटे थे। केंद्र में फिर से मोरारजी देसाई ने इंदिरा जी को टक्कर दी थी लेकिन उन्होने उनसे समझौता करके उप-प्रधानमंत्री बना दिया था। 1969 में 111 सांसदों के जरिये सिंडीकेट ने कांग्रेस (ओ ) बना कर इन्दिरा जी को झकझोर दिया लेकिन उन्होने वामपंथ के सहारे से सरकार बचा ली। 1971 में बांगला देश निर्माण में सहायता करने से उनको जो लोकप्रियता हासिल हुई थी उसको भुनाने से 1972 में उनको स्पष्ट बहुमत मिल गया किन्तु 1975 में एमर्जेंसी के दौरान हुये अत्याचारों ने 1977 में उनको करारी शिकस्त दिलवाई। मोरारजी प्रधानमंत्री बन गए और उनके विदेशमंत्री ए बी बाजपेयी व सूचना प्रसारण मंत्री एल के आडवाणी। इन दोनों ने संघियों को प्रशासन में ठूंस डाला। इसके अतिरिक्त गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह के पीछे ए बी बाजपेयी,पी एम मोरारजी के पीछे सुब्रमनियम स्वामी तथा जपा अध्यक्ष चंद्रशेखर के पीछे नानाजी देशमुख छाया की तरह लगे रहे और प्रशासन को संघी छाप देते चले। संघ की दुरभि संधि के चलते मोरारजी व चरण सिंह में टकराव हुआ और इंदिराजी के समर्थन से चरण सिंह पी एम बन गए। 

एमर्जेंसी के दौरान हुये मधुकर दत्तात्रेय 'देवरस'- इन्दिरा (गुप्त ) समझौते  को आगे बढ़ाते हुये चरण सिंह सरकार गिरा दी गई और 1980 में संघ के पूर्ण समर्थन से इन्दिरा जी की सत्ता में वापसी हुई। अब संघ के पास (पहले की तरह केवल जनसंघ ही नहीं था ) भाजपा के अलावा जपा और इन्दिरा कांग्रेस भी थी। संघ के इशारे पर केंद्र में सरकारें बनाई व गिराई जाने लगीं। सांसदों पर उद्योपातियों का शिकंजा कसता चला गया। 1996 में 13 दिन, 1998 में 13 माह फिर 1999 में पाँच वर्ष ए बी बाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र सरकार का भरपूर संघीकरण हुआ। 2004 से 2014 तक कहने को तो मनमोहन सिंह कांग्रेसी पी एम रहे किन्तु संघ के एजेंडा पर चलते रहे। 1991 में जब वह  वित्तमंत्री बन कर ‘उदारीकरण ‘ लाये थे तब यू एस ए जाकर आडवाणी साहब ने उसे उनकी नीतियों को चुराया जाना बताया था। स्पष्ट है कि वे नीतियाँ संघ व यू एस ए समर्थक थीं। जब सोनिया जी ने प्रणव मुखर्जी साहब को पी एम बना कर मनमोहन जी को राष्ट्रपति बनाना चाहा  था तब तक वह हज़ारे /रामदेव/केजरीवाल आंदोलन खड़ा करवा चुके थे। 2014 के चुनावों में 100 से अधिक कांग्रेसी मनमोहन जी के आशीर्वाद से भाजपा सांसद बन कर वर्तमान केंद्र सरकार के निर्माण में सहायक बने हैं। 

यदि इंदिरा जी ने 1975 में  'देवरस'से समझौता  नहीं किया होता व 1980 में संघ के समर्थन से चुनाव न जीता होता तब 1984 में राजीव जी भी संघ का समर्थन प्राप्त कर बहुमत हासिल नहीं करते। विभिन्न दलों में भी संघ की खुफिया घुसपैठ न हुई होती। 

इंदिराजी के जन्मदिन पर   आज  उनको याद करने,नमन करने और उनकी प्रशंसा के गीत गाने के साथ-साथ ज़रा उनकी जल्दबाजी और अदूरदर्शी चूकों पर भी गौर कर लिया जाये और उनसे बचने का मार्ग ढूँढना शुरू किया जाये तो देशहित में होगा व इंदिराजी को भी सच्ची श्रद्धांजली होगी। 
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प्रोफेसर मृदुला मुखर्जी साहिबा ने इस तथ्य को भी नहीं इंगित किया है कि, 1977 के  चुनावों में पराजित होने के बाद इंदिराजी भयभीत हो गईं थीं और उनको पुनः सत्ता वापिसी की उम्मीद नहीं थी इसलिए मोरारजी देसाई की सरकार को परेशान करने हेतु पंजाब में भिंडरावाला के माध्यम से खालिस्तान आंदोलन खड़ा करवाया था उनके सम्मेलन में भाग लेने अपने पुत्र संजय गांधी को भी भेजा था। परंतु संजय के प्रयासों से  1980 में पुनः सत्तासीन होने और फिर संजय के निधन के बाद वह चाह कर भी इस आंदोलन को ठंडा नहीं कर पाईं और अपने दूसरे पुत्र राजीव गांधी से भिंडरावाला को 'इस सदी के महान संत ' का खिताब दिलवाने के बावजूद भी उनके राज़ी न होने पर जून 1984 में सैनिक कारवाई के जरिये भिंडरावाला को खत्म किया गया जिसकी प्रतिक्रिया में उसी वर्ष अक्तूबर में उनकी हत्या हुई और जिसके बाद  देशव्यापी सिख विरोधी दंगे हुये। ये गतिविधियेँ निश्चित तौर पर ' सांप्रदायिक ' ही थीं। 
(होने जा रहे गुजरात के इन चुनावों में इन्दिरा जी के पौत्र और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जिस साफ्ट हिन्दुत्व का सहारा ले रहे हैं उसके पीछे भी आर एस एस से प्रभावित वहाँ की जनता और उस संगठन की सहानुभूति प्राप्त करना ही है। यदि वहाँ कांग्रेस सरकार गठित होती है तो 1980 व 1984 की भांति उसके पीछे आर एस एस का समर्थन ही होगा जो मोदी को नियंत्रित करने की उसकी एक चाल मात्र ही होगी। )
~विजय राजबली माथुर ©
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Friday, June 3, 2016

वेद,वैदिक संस्कृति,डॉ रोमिला थापर : भ्रम और निवारण ------ विजय राजबली माथुर/ध्रुव गुप्त

वेद और आर्य शब्दों की साम्राज्यवादी व्याख्या ने भ्रम की स्थिति उत्पन्न की है जिसका पूरा-पूरा लाभ उसकी सहोदरी सांप्रदायिकता ने उठाया है। हालांकि डॉ हरबंस मुखिया ने जे एन यू की राष्ट्रवाद की क्लास में स्पष्ट किया कि, अब अंग्रेजों ने अपने यहाँ इतिहास संशोधित कर लिया है परंतु भारत में अभी भी सांप्रदायिक आधार पर ही इतिहास चल रहा है जिसका लाभ सांप्रदायिक शक्तियों ने भरपूर उठाया है। अतः भ्रम का  शीघ्रातिशीघ्र निवारण होना उचित है ।
http://krantiswar.blogspot.in/2012/11/sampradayikta-dharam-nirpexeta.html
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जे एन यू में डॉ रोमिला थापर एवं डॉ हरबंस मुखिया 



प्रसिद्ध इतिहासकार और चिंतक रोमिला थापर से रणबीर चक्रवर्ती की इतिहास, समाज और संस्कृति पर बातचीत. साक्षात्कारकर्ता प्रो. रणबीर चक्रवर्ती सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज़, जे एन यू में प्राचीन इतिहास के शिक्षक हैं। प्रस्तुत साक्षात्कार, अंग्रेज़ी पाक्षिक फ्रंटलाइन में प्रकाशित, रोमिला थापर के लंबे साक्षात्कार “लिंकिंग द पास्ट एंड द प्रेजेंट” का कुछ संपादित रूप है और यहां इसका पहला आधा हिस्सा प्रकाशित किया जा रहा है। अनुवाद: शुभनीत कौशिक। 
1 ) उदाहरण के लिए, जब हम छात्र थे तो हमें यह बताया जाता था कि ऋग्वेद की भाषा इंडो-आर्यन भाषा ही है। पर आज यदि आप ऐसा वक्तव्य दें, तो वैदिक काल में विशेषज्ञता रखने वाले कुछ विद्वान इस कथन से जरूर अपनी असहमति जताएंगे क्योंकि भाषा-विज्ञान के सिद्धांतों के प्रयोग ने यह दर्शाया है कि ऋग्वेद में द्रविड़ भाषाओं के भी अंश सम्मिलित हैं। इन जानकारियों से इतिहासकार के प्रत्यक्षीकरण और स्रोतों के प्रति उसके दृष्टिकोण में भी बदलाव आते हैं। अब ऋग्वेद के संदर्भ में ही यह जानकारी इतिहासकार को ऐसे ऐतिहासिक संदर्भ के अध्ययन के लिए प्रेरित करती है, जो एकल संस्कृति का न होकर सह-अस्तित्व में विद्यमान उन संस्कृतियों का है, जिनमें एक का प्रभुत्त्व है। तो इतिहासकार को इन अन्य संस्कृतियों के बारे में भी जानकारी जुटानी होगी और उनका अध्ययन करना होगा। इतिहासकार को नदियों के जल तंत्र के अध्ययन (हाइड्रोलॉजी) और आनुवंशिकी के अध्ययन और रिपोर्टों से मिलने वाली जानकारियों का समावेश भी अपने अध्ययन में करना होगा। 

2 ) 
प्राचीन भारत पर काम करने वाले विद्वानों का मानना है कि आर्य भाषा मध्य एशिया से ईरान होते हुए भारत पहुँची। पर अब भारत में कुछ लोगों द्वारा इस दृष्टिकोण का प्रचार किया जा रहा है कि आर्यभाषा भाषी भारत के स्थानीय निवासी ही थे। कुछ तो हड़प्पा सभ्यता के निवासियों को भी आर्य साबित करते हुए यह सुझाना चाहते हैं कि भारतीय सभ्यता की उत्पत्ति में कोई गैर-आर्य तत्त्व था ही नहीं! यह ऐसा तर्क है जो मुझे विभिन्न कारणों से कतई स्वीकार नहीं। भाषाई और पुरातात्विक आधार पर भी यह किसी तरह से संभव नहीं जान पड़ता। हम कहते हैं कि ऋग्वैदिक संस्कृति उत्तर-हड़प्पाकालीन थी, तो जाहिर है कि इसका मतलब हुआ कि इसमें इसकी पूर्वतर संस्कृति परिलक्षित नहीं होगी। हड़प्पा संस्कृति का संपर्क ओमान और मेसोपोटामिया से था, जिनका जिक्र ऋग्वेद में नहीं मिलता।

3 )  
हाँ, ऋग्वेद में इस रूप में महापाषाणकालीन (मेगालिथिक) संस्कृति का जिक्र नहीं है। पर इस टेक्स्ट में अन्य समूहों की चर्चा जरूर की गयी है, जैसे असुर, दास, दस्यु आदि। ऋग्वेद दो वर्णों की चर्चा करता है – आर्य और दास। ‘दास’ कौन थे? उनके बारे में ऋग्वेद में जो विवरण मिलता है वह यह है कि वे उन कर्मकांडों और रीति-रिवाजों को मानने वाले थे, जो आर्यों से भिन्न थे। ‘दास’ अलग देवताओं की उपासना करते थे, और वे वैदिक ग्रंथों के लेखकों की भाषा से भिन्न भाषाएँ बोलते थे। वे समृद्ध थे, मवेशियों के रूप में उनकी संपत्ति ईर्ष्या का विषय थी और वे अलग बसावटों में रहते थे। इसलिए कुछ विद्वान यह भी सोचते हैं कि वे अलग संस्कृति के थे। इतिहासकार के रूप में हमें यह सवाल करना होगा कि ‘दास कौन थे’ और उनका मिथकीकरण क्यों किया गया?

इसी तरह ‘दासी-पुत्र ब्राह्मणों’ का भी उल्लेख मिलता है। जिन्हें पहले तो अस्वीकार्य माना गया, पर बाद में जब इन लोगों ने अपनी शक्ति दिखाई तो उन्हें ब्राह्मण के रूप में स्वीकार कर लिया गया। ‘दासी-पुत्र ब्राह्मण’ स्वयं में ही एक विरोधाभाषी शब्द है क्योंकि ‘दासी-पुत्र’ (यानि एक दासी से उत्पन्न हुआ पुत्र) होना और ब्राह्मण की हैसियत दोनों में विरोध भाव है। वैदिक ग्रंथों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि देवों और असुरों में अक्सर संघर्ष होते रहते थे। यह एक स्तर पर मिथक है, पर यह मिथक भी तत्कालीन समाज की अवधारणाओं से बिलकुल अलग नहीं है। इतिहासकारों के मत में, वैदिक ग्रंथों में उत्तर-हड़प्पा काल से लेकर ईसापूर्व पाँचवी सदी के ऐतिहासिक नगरों के रूप में नगरीय संस्कृति के उदय तक का उल्लेख मिलता है। ऐसी स्थिति में क्या यह कहना संभव है कि ये वैदिक ग्रंथ संस्कृति के एक पैटर्न के उद्विकास के परिचायक भर हैं!

4 ) एक प्रचलित तर्क यह भी है कि आर्य मूल रूप से भारत के ही निवासी थे और भारत से ही वे दुनिया के अन्य हिस्सों में गए और यूरोप में भी सभ्यता लेकर आर्य ही गए। इस सिद्धांत की खोज की गयी 19वीं सदी में, पर यह आज भी उतना ही लोकप्रिय है। सबसे पहले अमेरिका के थिओसोफिस्ट, कर्नल हेनरी एस ओलकाट ने इसे प्रतिपादित किया और यह सिद्धांत थिओसोफिस्टों ने अपना लिया। यद्यपि थिओसोफिस्ट कुछ समय के लिए आर्य समाज के निकट थे, पर स्वयं आर्य समाज के संस्थापक दयानन्द सरस्वती का मानना था कि आर्य तिब्बत से आए थे। 

ये वे सिद्धांत हैं जो भारत के प्राचीनतम अतीत से जुड़े ऐतिहासिक विवादों से गहरे जुड़े हुए हैं। इनकी शुरुआत 19वीं सदी में हुई। हमें यह भी ध्यान में रखना होगा कि यह वही समय था जब ‘नस्ल विज्ञान’ के अधीन यूरोपीय सर्वोच्चता पर, आर्य उत्पत्ति को आधार बनाकर चर्चा की जा रही थी। इनमें से कुछ सिद्धांत, बीसवीं सदी के यूरोप में ‘आर्यवाद’ को विनाशकारी दिशा की ओर ले गए। अतिरेक राष्ट्रवाद और अस्मिता की राजनीति के साथ ऐतिहासिक सिद्धांतों की जुगलबंदी के भयानक नतीजे हो सकते हैं, इसलिए यह ज़रूरी है इन सिद्धांतों पर चर्चा की जाए। 

स्त्रोत :
http://hashiya.blogspot.in/2015/11/blog-post_24.html
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भ्रम निवारण : 
Dhruv Gupt
 02-06-2016  

क्या वैदिक ऋषि सचमुच गोमांस खाते थे ? :

फेसबुक पर और अन्यत्र भी कई मित्रों ने वैदिक साहित्य का हवाला देते हुए बार-बार यह साबित करने की कोशिश की है कि वैदिक ऋषि और उस कालखंड के लोग गोमांस का भक्षण किया करते थे। इस विषय पर मेरे भी मन में भी कुछ उलझनें थीं। कहीं भी अपने प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं पाकर अंततः मैंने देश के कुछ गिने-चुने वेद मर्मज्ञों में एक 'मातृसदन', कनखल, हरिद्वार के संस्थापक अध्यक्ष स्वामी शिवानंद जी के सामने अपनी जिज्ञासा रखी। उन्होंने बताया कि ज्ञान जब अधकचरा हो तो वेद की ऋचाओं और उपनिषद के मंत्रों के शाब्दिक अर्थ लेकर लोग ऐसी ही स्थापनाएं निकालते हैं। वेद और उपनिषद मूलतः यौगिक साहित्य हैं जिनमें योग की गूढ़ और रहस्यमय क्रियाओं को लौकिक शब्दों और उपमाओं के माध्यम से समझाने के प्रयास किए गए हैं। यह गुरू और शिष्यों के बीच का हजारों वर्षों तक श्रुति परंपरा में चला संवाद है जिसे योग विद्या में प्रवेश करने वाले जिज्ञासु ही समझ सकते हैं। आमलोग जब इन ऋचाओं और मन्त्रों के शाब्दिक अर्थ लगाएंगे तो अर्थ का अनर्थ तो होगा ही। उन्होंने वृहदकारण्य उपनिषद से यह उद्धरण सुनाकर मेरी तमाम जिज्ञासाओं का शमन कर दिया। 

वाचं धेनुमुपासीत तस्याश्चतवारहः स्तनाः स्वाहाकारो वषट्कारो हंतकारहः स्वधाकारस्तस्यै द्वौ स्तनौ देवा उपजीवन्ति स्वाहाकारं च वषट्कारं च हंतकारं मनुष्याः स्वधाकारं पितरस्तस्याः प्राण ऋषभो मनो वत्सः। (छा. उ. 5/8/1) 

अर्थात वाक् ही धेनु या गाय है। उस धेनु का प्राण वृषभ है और बछड़ा उसका मन। उसके चार स्तन हैं-स्वाहाकार, वषट्कार, हन्तकार और स्वाधाकार। उसके दो स्तनों- स्वाहाकार और वषट्कार उपजीवी देवगण हैं जो उनका उपभोग करते हैं। हन्तकार का उपभोग मनुष्य करते हैं और स्वाधाकार का पितृगण। यह एक रूपक है जिसके द्वारा यौगिक क्रिया प्राणोपासना की व्याख्या की गई है। ऐसे कई मंत्रों और ऋचाओं के सतही अर्थ लगाने वाले लोगों ने यह भ्रांति फैलाई है कि वैदिक ऋषि और आमजन गोमांस का भक्षण करते थे।
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********************************************************जी हाँ इसी प्रकार 5 वर्ष से अधिक पुराना वह 'जौ ' जिसे बोने से उगे नहीं को 'अश्व ' कहा जाता था और उसकी हवन में आहुतियाँ दी जाती थीं। पोंगा पंडितों ने अश्व का अर्थ 'घोडा ' लगा कर घोड़े की आहुती देने की बेसुरी तान छेड़ दी । वैदिक संस्कृत को साहित्यिक रूप में न लेकर बीज गणित के सूत्रों की भांति लेंगे तभी सही समाधान पर पहुंचेंगे। लेकिन क्या पोंगा-पंथी और एथीस्ट सच को स्वीकार करेंगे?

****** आर्य न कोई जाति थी न है  : ******
Vijai RajBali Mathur
May 29, 2012 · 
आर्य न कोई जाति थी न है। आर्य=आर्ष=श्रेष्ठ। अर्थात श्रेष्ठ कार्यों को करने वाले सभी व्यक्ति आर्य हैं। 'कृंणवनतों विश्वार्यम' के अनुसार सम्पूर्ण विश्व को आर्य अर्थात श्रेष्ठ बनाना है। लेन पूल,कर्नल टाड आदि-आदि विदेशी और आर सी मजूमदार सरीखे भारतीय इतिहासकारों ने साम्राज्यवादी उद्देश्यों की पूर्ती हेतु आर्यों को एक जाति के रूप मे निरूपित करके बेकार का झगड़ा खड़ा किया है।
अब से लगभग 10 लाख वर्ष पूर्व जब मानव-सृष्टि इस पृथ्वी पर हुई तो विश्व मे तीन स्थानों-
1-मध्य यूरोप,
2- मध्य अफ्रीका ,
3-मध्य एशिया –मे एक साथ ‘युवा स्त्री और युवा पुरुषों’के जोड़े सृजित हुये। भौगोलिक स्थिति की भिन्नता से तीनों के रूप-रंग ,कद-काठी मे भिन्नता हुई। इन लोगों के माध्यम से जन-संख्या वृद्धि होती रही। जहां-जहां प्रकृति ने राह दी वहाँ-वहाँ सभ्यता और संस्कृति का विकास होता गया और जहां प्रकृति की विषमताओं ने रोका वहीं-वहीं रुक गया। 
मध्य एशिया के ‘त्रिवृष्टि’जो अब तिब्बत कहलाता है उत्पन्न मानव तीव्र विकास कर सके जबकि दूसरी जगहों के मानव पिछड़ गए। आबादी बढ्ने पर त्रिवृष्टि के लोग दक्षिण के निर्जन प्रदेश आर्यावृत्त मे आकर बसने लगे।जब ‘जंबू द्वीप’उत्तर की ओर ‘आर्यावृत्त’ से जुड़ गया तो यह आबादी उधर भी फ़ेल गई। चूंकि आबादी का यह विस्तार निर्जन प्रदेशों की ओर था अतः किसी को उजाड़ने,परास्त करने का प्रश्न ही न था। साम्राज्यवादियों ने फूट परस्ती की नीतियों के तहत आर्य को जाति बता कर व्यर्थ का बखेड़ा खड़ा किया है। त्रिवृष्टि से आर्यावृत्त आए इन श्रेष्ठ लोगों अर्थात आर्यों ने सम्पूर्ण विश्व को ज्ञान-विज्ञान से परिचित कराने का बीड़ा उठाया। इस क्रम मे जिन विद्वानों ने पश्चिम से प्रस्थान किया उनका पहला पड़ाव जहाँ स्थापित हुआ उसे ‘आर्यनगर’ कहा गया जो बाद मे एर्यान और फिर ईरान कहलाया। ईरान के अंतिम शासक तक ने खुद को आर्य मेहर रज़ा पहलवी कहा। आगे बढ़ कर ये आर्य मध्य एशिया होकर यूरोप पहुंचे। यूरोपीयो ने खुद को मूल आर्य घोषित करके भारत पर आक्रमण की झूठी कहाने गढ़ दी जो आज भी यहाँ जातीय वैमनस्य का कारण है। 
‘तक्षक’ और ‘मय’ऋषियों के नेतृत्व मे पूर्व दिशा से विद्वान वर्तमान साईबेरिया के ब्लादिवोस्तक होते हुये उत्तरी अमेरिका महाद्वीप के अलास्का (जो केनाडा के उत्तर मे यू एस ए के कब्जे वाला क्षेत्र है)से दक्षिण की ओर बढ़े। ‘तक्षक’ ऋषि ने जहां पड़ाव डाला वह आज भी उनके नाम पर ही ‘टेक्सास’ कहलाता है जहां जान एफ केनेडी को गोली मारी गई थी। ‘मय’ ऋषि दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप के जिस स्थान पर रुके वह आज भी उनके नाम पर ‘मेक्सिको’ कहलाता है। 
दक्षिण दिशा से जाने वाले ऋषियों का नेतृत्व ‘पुलत्स्य’ मुनि ने किया था जो वर्तमान आस्ट्रेलिया पहुंचे थे। उनके पुत्र ‘विश्रवा’मुनि महत्वाकांक्षी थे। वह वर्तमान श्रीलंका पहुंचे और शासक ‘सोमाली’ को आस्ट्रेलिया के पास के द्वीप भेज दिया जो आज भी उसी के नाम पर ‘सोमाली लैंड’कहलाता है। विश्रवा के बाद उनके तीन पुत्रों मे सत्ता संघर्ष हुआ और बीच के रावण ने बड़े कुबेर को भगा कर और छोटे विभीषण को मिला कर राज्य हसगात कर लिया। वह साम्राज्यवादी था। उसने साईबेरिया के शासक (जहां 06 माह का दिन और 06 माह की रात होती है अर्थात उत्तरी ध्रुव प्रदेश)’कुंभकर्ण’तथा पाताल-वर्तमान यू एस ए के शासक ‘एरावन’ को मिला कर भारत –भू के आर्यों को चारों ओर से घेर लिया और खुद अपने गुट को ‘रक्षस’=रक्षा करने वाले (उसका दावा था कि यह गुट आर्य सभ्यता और संस्कृति की रक्षा करने वाला है)कहा जो बाद मे अपभ्रंश होकर ‘राक्षस’कहलाया। 
राम-रावण संघर्ष आर्यों और आर्यों के मध्य राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद का संघर्ष था जिसे विदेशी इतिहासकारों और उनके भारतीय चाटुकारों ने आर्य-द्रविड़ संघर्ष बता कर भारत और श्रीलंका मे आज तक जातीय तनाव /संघर्ष फैला रखा है। 
जब अब आपने यह विषय उठाया है तो विदेशियों के कुतर्क और विकृति को ठुकराने का यही सही वक्त हो सकता है। जनता के बीच इस विभ्रम को दूर किया जाना चाहिए कि ‘आर्य’ कोई जाति थी या है। विश्व का कोई भी व्यक्ति जो श्रेष्ठ कर्म करे आर्य था और अब भी होगा।

https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/364918650236784

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Sunday, November 22, 2015

इन लोगों की व्याख्या से केवल और केवल ब्रहमनवाद तथा संघ के मंसूबे ही पूरे होंगे ------ विजय राजबली माथुर





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इन 30 में 8 अर्थात 26 ॰66 प्रतिशत लोग  घोषित रूप से जन्मगत ब्राह्मण हैं और बाकी भी ब्रहमनवाद द्वारा फैलाये 'विभ्रम' को ही 'धर्म' की संज्ञा देकर 'धर्म' की आलोचना करते हैं। इनमें से एक का भी प्रभाव जन-मानस पर नहीं पड़ सकता है। जहां तक 'हिन्दू' शब्द की बात है यह एक ब्रिटिश राजनीति के तहत प्रचारित-प्रसारित शब्द है कोई भी धर्म नहीं। जिनको सबसे अधिक जानकारी वाला घोषित किया गया है उन्होने तो स्वामी दयानन्द तक को 'महान हिन्दू' लिख डाला है। इन लोगों की व्याख्या से केवल और केवल ब्रहमनवाद तथा संघ के मंसूबे ही पूरे होंगे, सच्चाई पर पर्दा ही पड़ा रहेगा। पांचवे नंबर पर जिन जनाब का नाम है वह तो राम के सबसे बड़े निंदक हैं और इस प्रकार वह रावण (जो साम्राज्यवाद का पुरोधा था और जिसके  विस्तारवाद व शोषण का राम ने खात्मा किया था ) के पुजारी हुये। उनकी व्याख्या किसको लाभ पहुंचाने वाली होगी स्पष्ट है। तीन वर्ष पूर्व लिखे एक पोस्ट को ज्यों का त्यों दे रहा हूँ जिसमें इसी विषय को उठाया था। मशहूर हस्ती न होने के कारण मेरे दृष्टिकोण का उपहास उड़ाया तो जाता है लेकिन देखिये उपरोक्त महानुभावों की प्रचार-शैली ने केंद्र में फासिस्ट सरकार गठित करा दी है। उससे छुटकारा पाना है तो उसे अधार्मिक, ढ़ोंगी, पाखंडी, लुटेरा साबित करने के लिए'धर्म  के मर्म ' का सहारा लेना ही होगा अन्यथा फिर वही 'ढाक के तीन पात' ।  

1989-90 में उत्तर-प्रदेश के प्रत्येक ज़िले में सांप्रदायिकता विरोधी रैलियों का आयोजन हुआ था जिसका पूरा-पूरा लाभ सांप्रदायिक शक्तियों को ही मिला और 1991 में उनकी पूर्ण बहुमत की सरकार बन गई जिसने 1992 में अयोध्या में विवादास्पद ढांचा 06 दिसंबर (डॉ अंबेडकर परिनिर्वाण दिवस पर ) गिरा कर वर्तमान संविधान के खात्मे की ओर संकेत कर दिया था। 2011-12 के हज़ारे/रामदेव/केजरीवाल/मनमोहन सिंह प्रेरित आंदोलन ने 2014 में केंद्र में जिस फासिस्ट सरकार का गठन करवा दिया है उसी को अपनी गलत व्याख्याओं से उद्धृत विद्वान मजबूती प्रदान करने का ही कार्य करेंगे ( जैसी कि उनसे अपेक्षा की गई है ) यदि हिन्दू को धर्म की संज्ञा देंगे तो। 


Friday, November 30, 2012
सांप्रदायिकता और धर्म निपेक्षता ---विजय राज बली माथुर
http://krantiswar.blogspot.in/2012/11/sampradayikta-dharam-nirpexeta.html


सांप्रदायिकता ---

सांप्रदायिकता का आधुनिक इतिहास 1857 की क्रांति की विफलता के बाद शुरू होता है। चूंकि 1857 की क्रांति मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर के नेतृत्व मे लड़ी गई थी और इसे मराठों समेत समस्त भारतीयों की ओर से समर्थन मिला था सिवाय उन भारतीयों के जो अंग्रेजों के मित्र थे तथा जिनके बल पर यह क्रांति कुचली गई थी।ब्रिटेन ने सत्ता कंपनी से छीन कर जब अपने हाथ मे कर ली तो यहाँ की जनता को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने हेतु प्रारम्भ मे मुस्लिमों को ज़रा ज़्यादा  दबाया। 19 वी शताब्दी मे सैयद अहमद शाह और शाह वली उल्लाह के नेतृत्व मे वहाबी आंदोलन के दौरान इस्लाम मे तथा प्रार्थना समाज,आर्यसमाज,राम कृष्ण मिशन और थियोसाफ़िकल समाज के नेतृत्व मे हिन्दुत्व मे सुधार आंदोलन चले जो देश की आज़ादी के आंदोलन मे भी मील के पत्थर बने। असंतोष को नियमित करने के उद्देश्य से वाइसराय के समर्थन से अवकाश प्राप्त ICS एलेन आकटावियन हयूम ने कांग्रेस की स्थापना करवाई। जब कांग्रेस का आंदोलन आज़ादी की दिशा मे बढ्ने लगा तो 1905 मे बंगाल का विभाजन कर हिन्दू-मुस्लिम मे फांक डालने का कार्य किया गया। किन्तु बंग-भंग आंदोलन को जनता की ज़बरदस्त एकता के आगे 1911 मे इस विभाजन को रद्द करना पड़ा। लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन  एवं सर आगा खाँ को आगे करके मुस्लिमों को हिंदुओं से अलग करने का उपक्रम किया जिसके फल स्वरूप 1906  मे मुस्लिम लीग की स्थापना हुई और 1920 मे हिन्दू महासभा की स्थापना मदन मोहन मालवीय को आगे करके करवाई गई जिसके सफल न हो पाने के कारण 1925 मे RSS की स्थापना करवाई गई जिसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करना था । मुस्लिम लीग भी साम्राज्यवाद का ही संरक्षण कर रही थी जैसा कि,एडवर्ड थाम्पसन ने 'एनलिस्ट इंडिया फार फ़्रीडम के पृष्ठ 50 पर लिखा है-"मुस्लिम संप्रदाय वादियों  और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों मे गोलमेज़ सम्मेलन के दौरान अपवित्र गठबंधन रहा। "

वस्तुतः मेरे विचार मे सांप्रदायिकता और साम्राज्यवाद सहोदरी ही हैं। इसी लिए भारत को आज़ादी देते वक्त भी ब्रिटश साम्राज्यवाद  ने पाकिस्तान और भारत  दो देश बना दिये। पाकिस्तान तो सीधा-सीधा वर्तमान साम्राज्यवाद के सरगना अमेरिका के इशारे पर चला जबकि अब भारत की सरकार  भी अमेरिकी हितों का संरक्षण कर रही है। भारत मे चल रही सभी आतंकी गतिविधियों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन अमेरिका का रहता है। हाल के दिनों मे जब बढ़ती मंहगाई ,डीजल,पेट्रोल,गैस के दामों मे बढ़ौतरी और वाल मार्ट को सुविधा देने के प्रस्ताव से जन-असंतोष व्यापक था अमेरिकी एजेंसियों के समर्थन से सांप्रदायिक शक्तियों ने दंगे भड़का दिये। इस प्रकार जनता को आपस मे लड़ा देने से मूल समस्याओं से ध्यान हट गया तथा सरकार को साम्राज्यवादी हितों का संरक्षण सुगमता से करने का अवसर प्राप्त  हो गया।

धर्म निरपेक्षता---

धर्म निरपेक्षता एक गड़बड़ शब्द है। इसे मजहब या उपासना पद्धतियों के संदर्भ मे प्रयोग किया जाता है । संविधान मे भी इसका उल्लेख इसी संदर्भ मे  है । इसका अभिप्राय यह था कि,राज्य किसी भी उपासना पद्धति या मजहब को संरक्षण नही देगा। जबकि व्यवहार मे केंद्र व राज्य सरकारें कुम्भ आदि मेलों के आयोजन मे भी योगदान देती हैं और हज -सबसीडी के रूप मे भी। वास्तविकता यह है कि ये कर्म धर्म नहीं हैं। धर्म का अर्थ है जो मानव शरीर और मानव सभ्यता को धारण करने के लिए आवश्यक हो। जैसे -सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। धर्म निपेक्षता की आड़ मे इन सद्गुणों का तो परित्याग कर दिया गया है और ढोंग-पाखण्ड-आडंबर को विभिन्न सरकारें खुद भी प्रश्रय देती हैं और उन संस्थाओं को भी बढ़ावा देती हैं जो ऐसे पाखंड फैलाने मे मददगार हों। इन पाखंडों से किसी भी  आम जनता का  भला  नहीं होता है किन्तु व्यापारी/उद्योगपति वर्ग को भारी आर्थिक लाभ होता है। अतः कारपोरेट घरानों के अखबार और चेनल्स पाखंडों का प्रचार व प्रसार खूब ज़ोर-शोर से करते हैं। 

एक ओर धर्म निरपेक्षता की दुहाई दी जाती है और दूसरी ओर पाखंडों को धर्म के नाम पर फैलाया जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि धर्म को उसके वास्तविक रूप मे समझ-समझा कर उस पर अमल किया जाए और ढोंग-पाखंड चाहे वह किसी भी मजहब का हो उसका प्रतिकार किया जाये। पहले प्रबुद्ध-जनों को समझना व खुद को सुधारना  होगा फिर जनता व सरकार को समझाना होगा तभी उदेश्य साकार हो सकता है। वरना तो धर्म निरपेक्षता के नाम पर सद्गुणों को ठुकराना और सभी मजहबों मे ढोंग-पाखंड को बढ़ाना जारी रहेगा और इसका पूरा-पूरा लाभ शोषक-उत्पीड़क वर्ग को मिलता रहेगा। जनता आपस मे सांप्रदायिकता के भंवर जाल मे फंस कर लुटती-पिसती रहेगी। 


http://dlvr.it/60WrY9
बाबा ने की विदेश महिला से छेड़छाड़, गिरफ्तार
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 समाज को संवेदनशील कैसे बनाया जाएगा जब ढोंगियों,पाखंडियों,आडंबरकारियों को 'बाबा','साधू','सन्यासी','धार्मिक प्रचारक','बापू'  आदि-आदि उपाधियाँ दी जाती रहेंगी। 
वस्तुतः पाँच हज़ार वर्ष पूर्व महाभारत काल के बाद 'धर्म' ='सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य' का लोप हो गया और उसके स्थान पर 'ढोंग-पाखंड-आडंबर-शोषण-उत्पीड़न' को धर्म कहा जाने लगा। 'वेदों' का जो मूल मंत्र -'कृणवंतों  विश्वमार्यम  ...' था अर्थात समस्त विश्व को 'आर्य'=आर्ष=श्रेष्ठ बनाना था उसे ब्राह्मणों द्वारा शासकों की मिली-भगत से ठुकरा दिया गया। 'अहं','स्वार्थ','उत्पीड़न'को महत्व दिया जाने लगा। 'यज्ञ'=हवन में जीव हिंसा की जाने लगी। इन सब पाखंड और कुरीतियों के विरुद्ध गौतम बुद्ध ने लगभग ढाई हज़ार वर्ष पूर्व बुलंद आवाज़ उठाई और लोग उनसे प्रभावित होकर पुनः कल्याण -मार्ग पर चलने लगे तब शोषकों के समर्थक शासकों एवं ब्राह्मणों ने षड्यंत्र पूर्वक महात्मा बुद्ध को 'दशावतार' घोषित करके उनकी ही पूजा शुरू करा दी। 'बौद्ध मठ' और 'विहार' उजाड़ डाले गए बौद्ध साहित्य जला डाला गया। परिणामतः गुमराह हुई जनता पुनः 'वेद' और 'धर्म' से विलग ही रही और लुटेरों तथा ढोंगियों की 'पौ बारह' ही रही।
यह अधर्म को धर्म बताने -मानने का ही परिणाम था कि देश ग्यारह-बारह सौ वर्षों तक गुलाम रहा। गुलाम देश में शासकों की शह पर ब्राह्मणों ने  'कुरान' की तर्ज पर 'पुराण' को महत्व देकर जनता के दमन -उत्पीड़न व शोषण का मार्ग मजबूत किया था जो आज भी बदस्तूर जारी है। पुराणों के माध्यम से भारतीय महापुरुषों का चरित्र हनन बखूबी किया गया है। उदाहरणार्थ 'भागवत पुराण' में जिन राधा के साथ कृष्ण की रास-लीला का वर्णन है वह राधा 'ब्रह्म पुराण' के अनुसार भी  योगीराज श्री कृष्ण की मामी  ही थीं जो माँ-तुल्य हुईं परंतु पोंगापंथी ब्राह्मण राधा और कृष्ण को प्रेमी-प्रेमिका के रूप में प्रस्तुत करते हैं । आप एक तरफ भागवत पुराण को पूज्य मानेंगे और समाज में बलात्कार की समस्या पर चिंता भी व्यक्त करेंगे तो 'मूर्ख' किसको बना रहे हैं?चरित्र-भ्रष्ट,चरित्र हींन लोगों के प्रिय ग्रंथ भागवत के लेखक के संबंध में स्वामी दयानन्द 'सरस्वती' ने सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है कि वह गर्भ में ही क्यों नहीं मर गया था जो समाज को इतना भ्रष्ट व निकृष्ट ग्रंथ देकर गुमराह कर गया। क्या छोटा और क्या मोटा व्यापारी,उद्योगपति व कारपोरेट जगत खटमल और जोंक की भांति दूसरों का खून चूसने  वालों के भरोसे पर 'भागवत सप्ताह' आयोजित करके जनता को उल्टे उस्तरे से मूढ़ने का उपक्रम करता रहता है जबकि प्रगतिशील,वैज्ञानिक विचार धारा के 'एथीस्टवादी' इस अधर्म को 'धर्म' की संज्ञा देकर अप्रत्यक्ष रूप से उस पोंगापंथ को ही मजबूत करते रहते हैं। 


'मूल निवासी' आंदोलन :

एक और आंदोलन है 'मूल निवासी' जो आर्य को 'ब्रिटिश साम्राज्यवादियों' द्वारा  कुप्रचारित षड्यंत्र के तहत  यूरोप की एक आक्रांता जाति ही मानता है । जबकि आर्य विश्व के किसी भी भाग का कोई भी व्यक्ति अपने आचरण व संस्कारों के आधार पर बन सकता है। आर्य शब्द का अर्थ ही है 'आर्ष'= 'श्रेष्ठ' । जो भी श्रेष्ठ है वह ही आर्य है। आज स्वामी दयानन्द सरस्वती का आर्यसमाज ब्रिटिश साम्राज्य के हित में गठित RSS द्वारा जकड़ लिया गया है इसलिए वहाँ भी आर्य को भुला कर 'हिन्दू-हिन्दू' का राग चलने लगा है। बौद्धों के विरुद्ध हिंसक कृत्य करने वालों को सर्व-प्रथम बौद्धों ने 'हिन्दू' संज्ञा दी थी फिर फारसी शासकों ने एक गंदी और भद्दी गाली के रूप में इस शब्द का प्रयोग यहाँ की गुलाम जनता के लिए किया था जिसे RSS 'गर्व' के रूप में मानता है। अफसोस की बात यह है कि प्रगतिशील,वैज्ञानिक लोग भी इस 'सत्य' को स्वीकार नहीं करते हैं और RSS के सिद्धांतों को ही मान्यता देते रहते हैं। 'एथीस्ट वादी' तो 'धर्म'='सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह,अस्तेय और ब्रह्मचर्य' का विरोध ही करते हैं तब समाज को संवेदनशील कौन बनाएगा?
यदि हम समाज की दुर्व्यवस्था से वास्तव में ही चिंतित हैं और उसे दूर करना चाहते हैं तो अधर्म को धर्म कहना बंद करके वास्तविक धर्म के मर्म को जनता को स्पष्ट समझाना होगा तभी सफल हो सकते हैं वर्ना तो जो चल रहा है और बिगड़ता ही जाएगा।  
सत्य क्या है?:
'धर्म'='सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह,अस्तेय और ब्रह्मचर्य'। 
अध्यात्म=अध्ययन +आत्मा =अपनी 'आत्मा' का अध्ययन। 
भगवान=भ (भूमि)+ग (गगन-आकाश)+व (वायु-हवा)+I(अनल-अग्नि)+न (नीर-जल)। 
खुदा=चूंकि ये पांचों तत्व खुद ही बने हैं किसी ने बनाया नहीं है इसलिए ये ही 'खुदा' हैं।  
गाड=G(जेनरेट)+O(आपरेट)+D(डेसट्राय) करना ही इन तत्वों का कार्य है इसलिए ये ही GOD भी हैं। 
व्यापारियों,उद्योगपतियों,कारपोरेट कारोबारियों के हितों में गठित रिलीजन्स व संप्रदाय जनता को लूटने व उसका शोषण करने हेतु जो ढोंग-पाखंड-आडंबर आदि परोसते हैं वह सब 'अधर्म' है 'धर्म' नहीं। अतः अधर्म का विरोध और धर्म का समर्थन जब तक साम्यवादी व वामपंथी नहीं करेंगे तब तक जन-समर्थन हासिल नहीं कर सकेंगे बल्कि शोषकों को ही मजबूत करते रहेंगे जैसा कि 2014 के चुनाव परिणामों से सिद्ध भी हो चुका है। 


~विजय राजबली माथुर ©
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Friday, December 5, 2014

साम्राज्यवाद हितैषी सांप्रदायिकता पर इस तरह फतह कैसे हासिल करेंगे? --- विजय राजबली माथुर

वास्तविकता तो यह है कि 'आर्य ' न तो कोई जाति है न ही नस्ल या धर्म। आर्य शब्द 'आर्ष' का पर्यायवाची है जिसका अर्थ है-'श्रेष्ठ' अर्थात 'श्रेष्ठ कर्म' करने वाले सभी मनुष्य आर्य हैं चाहें वे जिस भी क्षेत्र के हों ,नस्ल के हों या मजहब/संप्रदाय/रिलीजन को मानते हों। यह तो पाश्चात्य साम्राज्यवादियो का षड्यंत्र है कि आर्य को एक नस्ल या जाति और मध्य यूरोप का वासी तथा भारत पर आक्रांता घोषित कर दिया और इसी धारणा को ही सही मानते हुये ' मूलनिवासी आंदोलन' चल पड़ा है। कंवल भारती जी का यह निष्कर्ष सही है कि सभी मनुष्य एक ही जैसे हैं।





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फिरकापरस्तों के हवाले वतन साथियो
(कँवल भारती)
मुरादाबाद के कांठ में जनता और पुलिस के संघर्ष से बचा जा सकता था. किन्तु, जिला प्रशासन ने मुजफ्फरनगर के दंगों से भी कोई सबक नहीं लिया और सरकार की मंशा के अनुरूप एक गुट को खुश करने के लिए दूसरे गुट के खिलाफ कार्यवाही करके पूरी फिजा बिगाड़ दी. प्रशासन को तब तो और भी सावधानी बरतनी चाहिए थी, जब उसे पता था कि हिन्दू-मुस्लिम की दृष्टि से मुरादाबाद एक संवेदनशील जिला है, जहाँ पहले भी कई सांप्रदायिक संघर्ष हो चुके हैं. क्या जरूरत थी जिला प्रशासन को अकबरपुर चैदरी गाँव में मन्दिर से लाउडस्पीकर उतारने की? क्या लाउडस्पीकर उतारने का यह काम पुलिस ने मुस्लिम गुट को खुश करने के लिए नहीं किया था? प्रशासन के इसी कारनामे ने कांठ में भाजपा के नेतृत्व वाले हिन्दू संगठनों को उत्तेजित-आन्दोलित करने का काम किया. जब संविधान ने सेकुलरिज्म के अंतर्गत हर धर्म के समुदाय को अपनी आस्था के अनुसार पूजा-उपासना करने का अधिकार दिया है, तो प्रशासन इसके खिलाफ क्यों गया? चैदरी गाँव में मन्दिर पर लगाया लाउडस्पीकर कोई अनोखी घटना नहीं थी, बल्कि यह बहुप्रचलित परम्परा है. भारत में कौन सा धार्मिक स्थल ऐसा है, जिस पर लाउडस्पीकर न लगा हो? यह वह देश है, जहाँ लाउडस्पीकर के बिना न मन्दिर में आरती होती है, न मस्जिद में अजान और न गुरूद्वारे में पाठ. रात-रात भर चलने वाले देवी-जागरण और मजलिशों पर क्या लाउडस्पीकर की पाबन्दी आयद होती है? क्या ये लाउडस्पीकर दूसरे गुटों के लिए परेशानी पैदा नहीं करते हैं? लेकिन न कोई शिकायत करता है और न प्रशासन उन्हें उतारता है, क्योंकि मामला धर्म से जुड़ा होता है और संवेदनशील होता है. पर जिस तरह जिला प्रशासन ने अकबरपुर चैदरी गाँव में मन्दिर से लाउडस्पीकर उतारने में दिलचस्पी दिखाई, वह मुझे कहीं से भी प्रशासनिक कार्यवाही नहीं लगती. उसके पीछे जरूर कोई सियासी मकसद नजर आता है. कहा जा रहा है कि इसके पीछे सपा विधायक का दलित-द्वेष था. वह दलितों का मन्दिर था, जिससे लाउडस्पीकर उतारा गया था. और सुना है कि चैदरी गाँव के दलित लोकसभा के चुनावों में सपा के पक्ष में नहीं थे. सपा विधायक ने सोचा होगा कि दलितों में कहाँ इतनी हिम्मत है कि वे सपा-सरकार से टक्कर लेंगे, सो उन्होंने अपने दबाव से दलित-मन्दिर से लाउडस्पीकर उतरवा दिया. पर वे यह भूल गये कि ऐसे ही मामलों में भाजपा की हिन्दू-अस्मिता जागृत हो जाती है. जो दलित उसके सामाजिक अजेंडे में नहीं होते, वे उसके राजनीतिक अजेंडे में सबसे ऊपर होते हैं. इसलिए यह समझने की जरूरत है कि भले ही सपा-सरकार में दलितों की लड़ने की हिम्मत नहीं है, पर जिस तरह धर्म के सवाल पर हिन्दू संगठनों ने उन्हें हिन्दू चेतना से जोड़ने में जरा भी देर नहीं लगायी, उससे यह जरूर साबित हो गया है कि दलित हिंदुत्व के नाम पर भाजपा के साथ खड़े हो गये हैं. अत: कहना न होगा कि प्रशासन की एक गलती से एक ही झटके में दो काम हो गये—(1) भाजपा की हिन्दू राजनीति को दलितों का साथ मिल गया और (2) भाजपा यह सन्देश देने में कामयाब हो गयी कि सपा-सरकार हिन्दू-विरोधी है, जो मुसलमानों को खुश करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है. क्या मुरादाबाद का सपा-नेतृत्व भी यही चाहता था कि राजनीति हिन्दू-मुस्लिम के बीच (दूसरे शब्दों में फिरकापरस्त ताकतों के बीच) में विभाजित हो जाये, ताकि सपा को लाभ मिले? इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि लोकसभा के नतीजों के बाद सपा हाई कमान को मुसलमानों का ही एकमात्र सहारा रह गया है, हिन्दू वोट तो उससे अलग हो ही गया है, उसका अपना पिछड़ा वोट भी खिसक गया है.
आज सपा और भाजपा भले ही कांठ के संघर्ष में अपने राजनीतिक फायदे देख रही हों, पर यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है कि मुरादाबाद में फिरकापरस्त ताकतें फिर से जिंदा हो रही हैं.
(5 जुलाई 2014)
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 वस्तुतः 'शिव धनुष' वह मिसाईल था जो कि धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति पर आधारित था और इसीलिए कोई भी उसे बिना चुम्बकीय चाबी (मेग्नेटिक रिंग) के हिला तक नहीं सकता था जिसे ऋषियों ने सिर्फ सीता को ही सौंपा था और उसे सीता ने 'पुष्प वाटिका' में राम को हस्तांतरित कर दिया था जिसके जरिये राम ने उस शिव-धनुष अर्थात मेग्नेटिक मिसाईल को उठा कर डिफ्यूज - निष्क्रिय कर दिया था। ढ़ोंगी-पाखंडी-पोंगापंथियों ने विदेशी शासकों को खुश करने के लिए सीता द्वारा झाड़ू लगाने की मनगढ़ंत बात लिख दी तो क्या हमें मान लेना चाहिए कि एक राजकुमारी झाड़ू लगाती थी? हम 'मनुष्य ' हैं अतः 'मनन' द्वारा हमें सच्चाई ज्ञात करके सबको बताना ही चाहिए। लेकिन हो क्या रहा है:
04 Dec. 2014 :


'शास्त्रों' से यदि अभिप्राय 'पुराणों ' से है तो वे शोषकों/उतपीडकों के हित मे सत्ताधीशों द्वारा विद्वानों को खरीद कर लिखवाये गए हैं अतः उन में जन-विरोधी बातें होना स्वभाविक है। उन पर विश्वास करना घातक है। साम्राज्यवाद हितैषी सांप्रदायिकता पर इस तरीके से फतह नहीं हासिल हो पाएगी। उसके लिए विषद विवेचन व अध्यन का आश्रय लेकर ही मुक़ाबला किया जा सकता है 'हास्य तीरों' से नहीं। ढोंगवाद से जनता को 'मुक्त' करने के लिए जनता को समझाना होगा कि लुटेरे पोंगा-पंडित जनता को गुमराह कर रहे हैं और जनता को 'रामायण पाठ',भागवत पाठ,देवी जागरण आदि में भाग न लेने के लिए तैयार करना होगा जिसके लिए वैज्ञानिक व्याख्या समझाना होगा । 'व्यंग्य' का सहारा लेकर  अथवा विवेक हीन  विरोध कर आप जनता को अपने पीछे लामबंद नहीं कर सकते।

'एकला चलो रे' के सिद्धान्त पर मैंने पूर्व लेखों द्वारा वैज्ञानिक विश्लेषण उपलब्ध कराये हैं जिनको विद्वजन इसलिए नहीं स्वीकार कर सकते क्योंकि मैं कोई मशहूर हस्ती नहीं हूँ।  

Monday, August 20, 2012

वैज्ञानिक परम्पराएँ-वेद और हवन

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Sunday, April 13, 2014

कौमी एकता और सांप्रदायिकता ---विजय राजबली माथुर

  
फेसबुक पर 09 अप्रैल को :


सांप्रदायिकता ---

सांप्रदायिकता का आधुनिक इतिहास 1857 की क्रांति की विफलता के बाद शुरू होता है। चूंकि 1857 की क्रांति मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर के नेतृत्व मे लड़ी गई थी और इसे मराठों समेत समस्त भारतीयों की ओर से समर्थन मिला था सिवाय उन भारतीयों के जो अंग्रेजों के मित्र थे तथा जिनके बल पर यह क्रांति कुचली गई थी।ब्रिटेन ने सत्ता कंपनी से छीन कर जब अपने हाथ मे कर ली तो यहाँ की जनता को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने हेतु प्रारम्भ मे मुस्लिमों को ज़रा ज़्यादा  दबाया। 19 वी शताब्दी मे सैयद अहमद शाह और शाह वली उल्लाह के नेतृत्व मे वहाबी आंदोलन के दौरान इस्लाम मे तथा प्रार्थना समाज,आर्यसमाज,राम कृष्ण मिशन और थियोसाफ़िकल समाज के नेतृत्व मे हिन्दुत्व मे सुधार आंदोलन चले जो देश की आज़ादी के आंदोलन मे भी मील के पत्थर बने। असंतोष को नियमित करने के उद्देश्य से वाइसराय के समर्थन से अवकाश प्राप्त ICS एलेन आकटावियन हयूम ने कांग्रेस की स्थापना कारवाई। जब कांग्रेस का आंदोलन आज़ादी की दिशा मे बढ्ने लगा तो 1905 मे बंगाल का विभाजन कर हिन्दू-मुस्लिम मे फांक डालने का कार्य किया गया। किन्तु बंग-भंग आंदोलन को जनता की ज़बरदस्त एकता के आगे 1911 मे इस विभाजन को रद्द करना पड़ा। लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने ढाका के नवाब मुश्ताक हुसैन  एवं सर आगा खाँ को आगे करके मुस्लिमों को हिंदुओं से अलग करने का उपक्रम किया जिसके फल स्वरूप 1906  मे मुस्लिम लीग की स्थापना हुई और 1920 मे हिन्दू महासभा की स्थापना मदन मोहन मालवीय को आगे करके करवाई गई जिसके सफल न हो पाने के कारण 1925 मे RSS की स्थापना कारवाई गई जिसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करना था । मुस्लिम लीग भी साम्राज्यवाद का ही संरक्षण कर रही थी जैसा कि,एडवर्ड थाम्पसन ने 'एनलिस्ट इंडिया फार फ़्रीडम के पृष्ठ 50 पर लिखा है-"मुस्लिम संप्रदाय वादियों  और ब्रिटिश साम्राज्यवादियों मे गोलमेज़ सम्मेलन के दौरान अपवित्र गठबंधन रहा। "

वस्तुतः मेरे विचार मे सांप्रदायिकता और साम्राज्यवाद सहोदरी ही हैं। इसी लिए भारत को आज़ादी देते वक्त भी ब्रिटश साम्राज्यवाद  ने पाकिस्तान और भारत  दो देश बना दिये। पाकिस्तान तो सीधा-सीधा वर्तमान साम्राज्यवाद के सरगना अमेरिका के इशारे पर चला जबकि अब भारत की सरकार  भी अमेरिकी हितों का संरक्षण कर रही है। भारत मे चल रही सभी आतंकी गतिविधियों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन अमेरिका का रहता है। हाल के दिनों मे जब बढ़ती मंहगाई ,डीजल,पेट्रोल,गैस के दामों मे बढ़ौतरी और वाल मार्ट को सुविधा देने के प्रस्ताव से जन-असंतोष व्यापक था अमेरिकी एजेंसियों के समर्थन से सांप्रदायिक शक्तियों ने दंगे भड़का दिये। इस प्रकार जनता को आपस मे लड़ा देने से मूल समस्याओं से ध्यान हट गया तथा सरकार को साम्राज्यवादी हितों का संरक्षण सुगमता से करने का अवसर प्राप्त  हो गया।

धर्म निरपेक्षता---

धर्म निरपेक्षता एक गड़बड़ शब्द है। इसे मजहब या उपासना पद्धतियों के संदर्भ मे प्रयोग किया जाता है । संविधान मे भी इसका उल्लेख इसी संदर्भ मे  है । इसका अभिप्राय यह था कि,राज्य किसी भी उपासना पद्धति या मजहब को संरक्षण नही देगा। जबकि व्यवहार मे केंद्र व राज्य सरकारें कुम्भ आदि मेलों के आयोजन मे भी योगदान देती हैं और हज -सबसीडी के रूप मे भी। वास्तविकता यह है कि ये कर्म धर्म नहीं हैं। धर्म का अर्थ है जो मानव शरीर और मानव सभ्यता को धारण करने के लिए आवश्यक हो। जैसे -सत्य,अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य। धर्म निपेक्षता की आड़ मे इन सद्गुणों का तो परित्याग कर दिया गया है और ढोंग-पाखण्ड-आडंबर को विभिन्न सरकारें खुद भी प्रश्रय देती हैं और उन संस्थाओं को भी बढ़ावा देती हैं जो ऐसे पाखंड फैलाने मे मददगार हों। इन पाखंडों से किसी भी  आम जनता का  भला  नहीं होता है किन्तु व्यापारी/उद्योगपति वर्ग को भारी आर्थिक लाभ होता है। अतः कारपोरेट घरानों के अखबार और चेनल्स पाखंडों का प्रचार व प्रसार खूब ज़ोर-शोर से करते हैं। 

एक ओर धर्म निरपेक्षता की दुहाई दी जाती है और दूसरी ओर पाखंडों को धर्म के नाम पर फैलाया जाता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि धर्म को उसके वास्तविक रूप मे समझ-समझा कर उस पर अमल किया जाए और ढोंग-पाखंड चाहे वह किसी भी मजहब का हो उसका प्रतिकार किया जाये। पहले प्रबुद्ध-जनों को समझना व खुद को सुधारना  होगा फिर जनता व सरकार को समझाना होगा तभी उदेश्य साकार हो सकता है। वरना तो धर्म निरपेक्षता के नाम पर सद्गुणों को ठुकराना और सभी मजहबों मे ढोंग-पाखंड को बढ़ाना जारी रहेगा और इसका पूरा-पूरा लाभ शोषक-उत्पीड़क वर्ग को मिलता रहेगा। जनता आपस मे सांप्रदायिकता के भंवर जाल मे फंस कर लुटती-पिसती रहेगी। 
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  ~विजय राजबली माथुर ©
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