Saturday, February 19, 2011

सीता का विद्रोह ------





विद्रोह या क्रांति कोई ऐसी चीज़ नहीं होती जिसका विस्फोट एकाएक होता हो,बल्कि इसके अनन्तर अन्तर क़े तनाव को बल मिलता रहता है और जब यह अन्तर असह्य हो जाता है तभी इसका विस्फोट हो जाता है.अयोध्यापति राम क़े विरुद्ध सीता का विद्रोह ऐसी ही एक घटना थी.परन्तु पुरुष-प्रधान समाज ने इतनी बड़ी घटना को क्षुद्र रूप में इस प्रकार प्रचारित किया कि,एक धोबी क़े आक्षेप करने पर राम ने लोक-लाज की मर्यादा की रक्षा क़े लिये महारानी सीता को निकाल दिया.कितना बड़ा उपहास है यह वीरांगना सीता का जिन्होंने राम क़े वेद-विपरीत अधिनायकवाद का कडा  प्रतिवाद किया और उनके राज-पाट को ठुकरा कर वन में लव और कुश दो वीर जुड़वां बेटों को जन्म दिया.सीता निष्कासन की दन्त-कथायें नारी-वर्ग और साथ ही समाज में पिछड़े वर्ग की उपेक्षा को दर्शाती हैं जो दन्त-कथा गढ़ने वाले काल की दुर्दशा का ही परिचय है.जबकि वास्तविकता यह थी कि,साम्राज्यवादी रावण क़े अवसान क़े बाद राम अयोद्ध्या क़े शासक क़े रूप में नहीं विश्वपति क़े रूप में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते थे.सत्ता सम्हालते ही राम ने उस समय प्रचलित वेदोक्त-परिपाटी का त्याग कर ऋषियों को मंत्री मण्डल से अपदस्थ कर दिया था.वशिष्ठ मुनि को हटा कर अपने आज्ञाकारी भ्राता भरत को प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया.विदेशमंत्री पद पर सुमन्त को हटा कर शत्रुहन को नियुक्त कर दिया और रक्षामंत्री अपने सेवक-सम भाई लक्ष्मण को नियुक्त कर दिया था.राम क़े छोटे भाई जानते हुये भी गलत बात का राम से विरोध करने का साहस नहीं कर पाते थे और अपदस्थ मंत्री अर्थात ऋषीवृन्द कुछ कहते तो राम को खड़यन्त्र  की बू आने लगती थी.महारानी सीता कुछ कहतीं तो उन्हें चुप करा देते थे.राम को अपने विरुद्ध कुछ भी सुनने की बर्दाश्त नहीं रह गई थी.उन्होंने कूटनीति का प्रयोग करते हुये पहले ही बाली की विधवा तारामणि से सुग्रीव क़े साथ विवाह करा दिया था जिससे कि,भविष्य में तारा अपने पुत्र अंगद क़े साथ सुग्रीव क़े विरुद्ध बगावत न कर सके.इसी प्रकार रावण की विधवा मंदोदरी का विवाह विभीषण क़े साथ करा दिया था कि,भविष्य में वह भी विभीषण क़े विरुद्ध बगावत न कर सके.राम ने तारा और मंदोदरी क़े ये विवाह वेदों में उल्लिखित "नियोग"विधान क़े अंतर्गत ही कराये थे अतः ये विधी-सम्मत और मान्य थे."नियोग विधान"पर सत्यार्थ-प्रकाश क़े चौथे सम्मुल्लास में महर्षि दयानंद ने विस्तार से प्रकाश डाला है और पुष्टि की है कि,विधवा को दे-वर अर्थात दूसरा वर नियुक्त करने का अधिकार वेदों ने दिया है.सुग्रीव और विभीषण राम क़े एहसानों तले दबे हुये थे वे उनके आधीन कर-दाता राज्य थे और  इस प्रकार उनके विरुद्ध संभावित बगावत को राम ने पहले ही समाप्त कर दिया था.इसलिए राम निष्कंटक राज्य चलाना चाहते थे.
महारानी सीता जो ज्ञान-विज्ञान व पराक्रम तथा बुद्धि में किसी भी प्रकार राम से कम न थीं उनकी हाँ में हाँ नहीं मिला सकती थीं.जब उन्होंने देखा कि राम उनके विरोध की परवाह नहीं करते हैं तो उन्होंने ऋषीवृन्द की पूर्ण सहमति एवं सहयोग से राम-राज्य को ठुकराना ही उचित समझा.राम क़े अधिनायकवाद से विद्रोह कर सीता ने वाल्मीकि मुनि क़े आश्रम में शरण ली वहीं लव-कुश को जन्म दिया और उन्हें वाल्मीकि क़े शिष्यत्व में शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करने का अवसर प्रदान किया.राम क़े भ्राता और विदेशमंत्री शत्रुहन यह सब जानते थे परन्तु उन्होंने अपनी भाभी व भतीजों क़े सम्बन्ध में राजा राम को बताना उचित न समझा क्योंकि वे सब भाई भी राम की कार्य-शैली से दुखी थे परन्तु मुंह खोलना नहीं चाहते थे.ऋषि-मुनियों का भी महारानी सीता को समर्थन प्राप्त था.लव और कुश को महर्षि वाल्मीकि ने लोकतांत्रिक राज-प्रणाली में पारंगत किया था और अधिनायकवाद क़े विरुद्ध लैस किया था.
                          
एक छत्र राजा बनने को रामचंद्र-हुंकारे.
                          प्रजातंत्र पर राजतंत्र क़े मणिधारी फुन्कारे..
                                                                              ---"भूमिजा "से

इसलिए जब राम ने अश्वमेध्य यज्ञ को विकृत रूप में चक्रवर्ती सम्राट बनने हेतु सम्पन्न कराना चाहा तो सीता-माता क़े संकेत पर लव और कुश नामक नन्हें वीर बालकों ने राम क़े यज्ञ अश्व को पकड़ लिया.
                       
                       उधर शस्त्र थे और इधर थे-
                         बालक सीना ताने.
                      निर्माणों की रक्षा क़े हित
                       आगे   थे     परवाने..
                                                       
                          ---"भूमिजा" से


राम की सेना का मुकाबला करने क़े लिये लव-कुश ने अपने नेतृत्व में बाल-सेना को सबसे आगे रखा ,उनके पीछे महिलाओं की सैन्य-टुकड़ी थी और सबसे पीछे चुनिन्दा पुरुषों की टुकड़ी थी.
राम की सेना बालकों और महिलाओं पर आक्रमण करे ऐसा आदेश तो रक्षामंत्री लक्ष्मण भी नहीं दे सकते थे,फलतः बिना युद्ध लड़े ही उन्होंने आत्म-समर्पण कर दिया और इस प्रकार लव-कुश विजयी हुये एवं राम को पराजय स्वीकार करनी पडी.
                  राम!तुम्हारे ही ये बेटे,
                राम !तुम्हारी सीता.
                खेतों क़े पीछे रोती है-
              राम !बिचारी सीता..
           ---           *              *   --- 
      युद्ध सरल है,किन्तु युद्ध का है परिणाम भयंकर.
     इतने मत हुंकारों जिससे -जाग उठे प्रलयंकर ..
                                                              "भूमिजा"से


जब महर्षि वाल्मीकि ने लव-कुश का सम्पूर्ण परिचय दिया तो राम भविष्य में वेद -सम्मत लोकतांत्रिक पद्धति से शासन चलाने पर सहमत हो गये तथा लव-कुश को अपने साथ ही ले गये.परन्तु सीता ने विद्रोह क़े पश्चात पुनः राम क़े साथ लौट चलने का आग्रह स्वीकार करना उपयुक्त न समझा क्योंकि वह पति की पराजय भी न चाहतीं थीं.अतः उन्होंने भूमिगत परमाणु विस्फोट क़े जरिये स्वंय की इह-लीला ही समाप्त कर दी.सीता वीरांगना थीं उन्हें राजा राम ने निष्कासित नहीं किया था उन्होंने वेद-शास्त्रों की रक्षा हेतु स्वंय ही विद्रोह किया था जिसका उद्देश्य मानव-मात्र का कल्याण था.अन्ततः राम ने भी सीता क़े दृष्टिकोण को ही सत्य माना और स्वीकार तथा अंगीकार किया.अतः सीता का विद्रोह सार्थक और सफल रहा जिसने राम की मर्यादा की ही रक्षा की.
*                             *                                *                                                                        
विशेष -मेरे निष्कर्षों एवं दृष्टिकोण का लोगों द्वारा मखौल बनाने पर मैंने अपने माता-पिता से कहा था--एक दिन लोग इन पर डाक्टरेट हासिल करेंगें.मेरी छोटी बहन श्रीमती शोभा माथुर(पत्नी श्री कमलेश बिहारी माथुर,अवकाश-प्राप्तफोरमैन,बी.एच.ई.एल.,झाँसी) ने अपनी संस्कृत क़े राम विषयक नाटक की थीसिस में मेरे 'रावण-वध एक पूर्व निर्धारित योजना 'को उधृत किया है.इस प्रकार माता-पिता क़े  जीवन काल में ही मेरे लेखों को आगरा विश्वविद्यालय से   डाक्टरेट हासिल करने में बहन ने प्रयोग कर लिया और मेरा अनुमान सही निकला.
सत्य,सत्य होता है और इसे अधिक समय तक दबाया नहीं जा सकता.एक न एक दिन लोगों को सत्य स्वीकार करना ही पड़ेगा तथा ढोंग एवं पाखण्ड का भांडा फूटेगा ही फूटेगा.राम और कृष्ण को पूजनीय बना कर उनके अनुकरणीय आचरण से बचने का जो स्वांग ढोंगियों तथा पाखंडियों ने रच रखा है उस पर प्रहार करने का यह मेरा छोटा सा प्रयास था.
***************************************************************
फेसबुक पर प्राप्त टिप्पणी :
28-11-2015 

19 comments:

मनोज कुमार said...

बहुत सुंदर और तर्क संगत विवेचना। आभार इस प्रस्तुति के लिए।

Patali-The-Village said...

बहुत सुंदर और तर्क संगत लेख| धन्यवाद|

Rajesh Kumar 'Nachiketa' said...

सीता का वन गमन क्यों हुआ? जब राम को बनवास हुआ तब राम ने तो हर तरह से सीता को समझाया ही था की वन में न जाए. और १४ साल तक राम वन में क्यों रहे? और सीता को बचाया क्यों?
क्या राम के चरित्र में कुछ भी ग्रहण करने योग्य आप नहीं मानते?

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

विद्रोह या क्रांति कोई ऐसी चीज़ नहीं होती जिसका विस्फोट एकाएक होता हो....

आलेख के प्रथम वाक्य ने ही बाँध लिया..... बहुत सुंदर सार्थक विवेचना ..आभार

राज भाटिय़ा said...

राम!तुम्हारे ही ये बेटे,
राम !तुम्हारी सीता.
खेतों क़े पीछे रोटी है-
राम !बिचारी सीता..
बहुत सुंदर लगा आप का यह लेख, धन्यवाद

mahendra verma said...

राम कथा के एक महत्वपूर्ण प्रसंग की सटीक व्याख्या की है आपने।
इस तार्किक विश्लेषण के लिए आभार।

Vijai Mathur said...

आप सभी विद्वजनों का आभार .
राजेश नचिकेता जी को अपने सभी प्रश्नों के उत्तर इसी ब्लाग में 'रावण वध एक पूर्व-निर्धारित योजना'में मिल जायेंगे. खुद राजेश जी बहुत अच्छा लिखते है,आसानी से समझ लेंगे.
सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद.

Dr. shyam gupta said...

एक मूर्खतापूर्ण कथा है--
----कहां लिखा है कि राम ने वेद-विरुद्ध कार्य किया, जगह जगह विरोधी व असत्य वक्तव्य हैं--
---जब राम वेद-विरोधी थे तो उन्होंने वेदिक परिपाटी की यग्य क्यों की
---जब उन्होंने वेद के विरुद्ध मन्दोदरी( कहां लिखा है भाई?) व बाली की पत्नी का विवाह कराया तो सीता ने उनके साथ आने से उसी समय इन्कार क्यों नहीं किया...
--- जब वेदों के अनुसार नियोग प्रथा है , जैसा आपने कहा तो राम वेद-विरोधी कैसे हुए
---नियोग प्रथा सिर्फ़ सन्तान हीनता की स्थिति में सन्तान उत्पत्ति के लिये प्रयोग होती थी...विवह के लिये नही...
सारी कथा हिन्दू-धर्म( जिसके अर्थार्थ समझ्ना सबके बस की बात नही है) के विरुद्ध जहर उगलने के सदियों पुराने षदयन्त्र का भाग है...

Dr (Miss) Sharad Singh said...

राम-कथा को आपने एक नए दृष्टिकोण से व्याख्यायित किया है.... लेख बहुत अच्छा और विचारणीय है।

आपको बहुत-बहुत बधाई !

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

माथुर साहब!
विलम्ब के लिये क्षमा!! आपकी यही बात शरद जोशी ने अपनी एक हास्य रचना में लिखी थी.. किंतु वो हास्य का विषय था.. आपकी व्याख्या बिल्कुल सार्थक है और पुनर्विचार के वातायन खोलती है!!

Vijai Mathur said...

धन्यवाद डॉ.शरद सिंह जी एवं सलिल वर्मा जी -आप के सकारात्मक दृष्टिकोण के लए.
डॉ.श्याम गुप्ता जी ने न तो लेख को पढ़ा न समझा केवल अपने नारी-विरोधी पूर्वाग्रहों के कारण अनर्गल,आधारहीन.असंगत,असभ्य ,अभद्र एवं अश्लील टिप्पणी करके फुल्फुलाने लगे.उनके विषय में महिलायें/नारियें ही न्याय कर सकती हैं वह कितने सही हैं.मेरी पत्नी पूनम तो उनकी सीता-विरोधी इस टिप्पणी को समस्त नारी जगत का अपमान बता रहीं हैं.
संत श्याम जी पराशर की पुस्तक-'रामायण का ऐतिहासिक महत्त्व',डॉ.रघुवीर शरण मित्र की पुस्तक-'भूमिजा'तथा कविवर श्याम नारायण पाण्डेय के खंड काव्य-'जय हनुमान'से प्रेरित इस विश्लेषण में राम या वेदों का अपमान कहाँ किया गया है जैसा की डॉ.श्याम गुप्ता जी झूठा इल्जाम लगा रहे हैं.यह पूरा ब्लाग दकियानूसी पोंगा पंथियों का विरोध करता है न की राम या वेदों का.गुप्ता जी को आँखों तथा दिमाग के इलाज की सख्त जरूरत है.नारी विरोधी इस शख्स को जब सीताजी की महिमा का वर्णन गवारा नहीं हुआ तो यह अपनी विभागीय मंत्री सुश्री ममता बनर्जी के बारे में कैसे ख्यालात रखते होंगें-कहने की आवश्यकता नहीं है.
यदि इस लेख तथा डॉ. श्याम गुप्ता जी की टिप्पणी को महिला संगठनों के पास भेज दिया जाए तो शायद डॉ. सा :को असलियत का पता चल सकेगा.उनकी बुद्धी और अज्ञान पर मुझे बेहद तरस आता है.

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

बढ़िया विश्लेषण , महत्वाकांक्षा आम इन्सान तो क्या महापुरुषों को भी डगमगा देती है !

dr.aalok dayaram said...

भारतीय समाज आदि अनादि काल से पुरुष प्रधान रहा है। नारी की महता के कुछ श्लोक कुछ बातें कहीं कहीं शास्त्रों में उल्लेख किये गये हैं जो केवल आदर्श वचन तक ही मर्यादित रहे यथार्थ विपरीत ही रहा। सीता और राम के विषय मे लीक से हटकर आपने जो कुछ प्रतिपादित किया है गंभीर सोच का परिचायक है,लेकिन लोक मान्यता के विरुद्ध आलेखों को अपेक्छित स्वीकार्यता हासिल नहीं हो पाती है। गवेषणात्मक लेख के लिये बधाई।

BrijmohanShrivastava said...

लगातार तीन चार दफे पढने और सहेज कर रखने वाला लेख ।असल में माथुर साहब क्या है िकवह रामायण जिसमें लवकुश काण्ड हो वह हमारे घरों में रखने की मुमानियत थी । वैक्टेश्वर प्रेस की रामायण मे से थोडा बहुत पढा था ।किंवदन्तियां सुनी थी । आपकी सोच वाकई निराली है और सही भी है । कितना गहरा अध्ययन है आपका आश्चर्य चकित रह गया ।एसी थीसिस को तो किसी पव्लिकेशन से प्रकाशित होना चाहिये थी ।क्यों कि आपके लेख से पता नहीं चलता कि कोई प्रकाशन हुआ या नहीं ।वैसे श्री नरेन्द्र कोहली ने भी बहुत से तथ्यों पर काफी प्रकाश डाला है। आपको बहुत बहुत धन्यवाद ऐसे ज्ञानवर्धक लेख के लिये

Er. सत्यम शिवम said...

बहुत सुंदर प्रस्तुति...लाजवाब।

*गद्य-सर्जना*:-“तुम्हारे वो गीत याद है मुझे”

निर्मला कपिला said...

विचारणीय पोस्ट है तर्कसम्मत विस्श्लेशण के लिये धन्यवाद।

amarnath 'madhur' said...

माथुर भाई
आपका सीता का विद्रोह लेख बहुत जानकारी देने वाला है| तीस साल पहले भूमिजा काव्य पढ़ा था किन्तु तब इस तरह समझ में नहीं आया अब फिर पढूंगा लेकिन आपके लेख में परमाणु विस्फोट वाली बात असंगत है| कृपया jalesmeerut.blogspot.com पर 'राम का अंतर्द्वंद' कविता देखें |
--- अमरनाथ 'मधुर'

amarnath madhur said...

माथुर भाई
आपका सीता का विद्रोह लेख बहुत जानकारी देने वाला है| तीस साल पहले भूमिजा काव्य पढ़ा था किन्तु तब इस तरह समझ में नहीं आया अब फिर पढूंगा लेकिन आपके लेख में परमाणु विस्फोट वाली बात असंगत है| कृपया jalesmeerut.blogspot.com पर 'राम का अंतर्द्वंद' कविता देखें |
--- अमरनाथ 'मधुर'

Vijai Mathur said...

प्रिय साथी अमरनाथ जी ,
धन्यवाद ब्लाग फालो करने एवं विचार प्रस्तुत करने के लिए.'राम का अंतद्वंद' आपके ब्लाग पर दृष्टिगोचर नहीं हुआ.
४० वर्ष पूर्व भूमिजा पढ़ाते हुए प्रो.डॉ.विष्णु शरण इंदु जी की व्याख्या भाग ६ के अंतिम छंद की आज भी याद है उसे मैंने तो असंगत इसलिए नहीं माना था क्योंकि संत श्याम जी पराशर ने भी 'रामायण का ऐतिहासिक महत्त्व' में वैसा ही बताया था और मैंने पहले ही पढ़ रखा था .-
"टपक पड़ा सीता का आंसू,
धरा फट गयी तत्क्षण.
सीता समां गयी धरती में,
प्राण बन गए कण कण .."
यहाँ आंसू शब्द प्रतीकात्मक है धरती अश्रु-बूँद से नहीं परमाणु के भूमिगत विस्फोट से फटी थी.सीता स्वयं वैज्ञानिक थीं,उन्होंने मेग्नेटिक की रिंग से शिव-धनुष अर्थात प्रथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से बंधे मेग्नेटिक मिसाईल का स्थान्तरण किया था;जिसे बाद में विश्वमित्र जी की आज्ञा पर राम ने उसी की रिंग (जो सीता ने उन्हें फूल चुनते वक्त पुष्प वाटिका में भेंट की थी) से ही उस मिसाईल को डीफ्यूज़ किया था.इसका उल्लेख मैंने 'रावण वध एक पूर्व निर्धारित योजना' में भी किया है.