Monday, June 4, 2012

कबीर को क्यों याद करें?




            ( यह वीडियो अपर्णा मनोज जी की फेसबुक वाल से 02 मार्च 2012 को लिया गया है। )

संतकबीर 




गत वर्ष मैंने कबीर दास जी पर यह विचार दिये थे-

http://krantiswar.blogspot.in/2011/06/blog-post_15.html

आज 615वी कबीर जयंती पर भी उनको दोहराना उपयुक्त रहेगा ।



"चौदह सौ पचपन साल गये,चंद्रवार एक ठाट ठये.
जेठ सुदी बरसायत को ,पूरनमासी प्रगट भये .."   

'कबीर चरित्र बोध' ग्रन्थ के अनुसार कबीर-पंथियों ने सन्त कबीर का जन्म सम्वत १४५५ की जेठ शुक्ल पूर्णिमा को माना है.

कबीर की रचनाओं में काव्य के तीन रूप मिलते हैं-साखी,रमैनी और सबद .साखी दोहों में,रमैनी चौपाइयों में और सबद पदों में हैं.साखी और रमैनी मुक्तक तथा सबद गीत-काव्य के अंतर्गत आते हैं .इनकी वाणी इनके ह्रदय से स्वभाविक रूप में प्रवाहित है और उसमें इनकी अनुभूति की तीव्रता पाई जाती है.


वैसे सभी रोते रहते हैं भ्रष्टाचार को और कोसते रहते हैं राजनेताओं को ;लेकिन वास्तविकता समझने की जरूरत और फुर्सत किसी को भी नहीं है.भ्रष्टाचार-आर्थिक,सामजिक,राजनीतिक,आध्यात्मिक और धार्मिक सभी क्षेत्रों में है और सब का मूल कारण है -ढोंग-पाखंड पूर्ण धर्म का बोल-बाला.



कबीर के अनुसार धर्म  

कबीर का धर्म-'मानव धर्म' था.मंदिर,तीर्थाटन,माला,नमाज,पूजा-पाठ आदि बाह्याडम्बरों ,आचार-व्यवहार तथा कर्मकांडों की इन्होने कठोर शब्दों में निंदा की और 'सत्य,प्रेम,सात्विकता,पवित्रता,सत्संग (अच्छी सोहबत न कि ढोल-मंजीरा का शोर)इन्द्रिय -निग्रह,सदाचार',आदि पर विशेष बल दिया.पुस्तकों से ज्ञान प्राप्ति की अपेक्षा अनुभव पर आधारित ज्ञान को ये श्रेष्ठ मानते थे.ईश्वर की सर्व व्यापकता और राम-रहीम की एकता के महत्त्व को बता कर इन्होने समाज में व्याप्त भेद-भाव को मिटाने प्रयास किया.यह मनुष्य मात्र को एक समान मानते थे.वस्तुतः कबीर के धार्मिक विचार बहुत ही उदार थे.इन्होने विभिन्न मतों की कुरीतियों संकीर्णताओं  का डट कर विरोध किया और उनके श्रेयस्कर तत्वों को ही ग्रहण किया.

लोक भाषा को महत्त्व 

कबीर ने सहज भावाभिव्यक्ति के लिए साहित्य की अलंकृत भाषा को छोड़ कर 'लोक-भाषा' को अपनाया-भोजपुरी,अवधी,राजस्थानी,पंजाबी,अरबी ,फारसी के शब्दों को उन्होंने खुल कर प्रयोग किया है.यह अपने सूक्ष्म मनोभावों और गहन विचारों को भी बड़ी सरलता से इस भाषा के द्वारा व्यक्त कर लेते थे.कबीर की साखियों की भाषा अत्यंत सरल और प्रसाद गुण संपन्न है.कहीं-कहीं सूक्तियों का चमत्कार भी दृष्टिगोचर होता है.हठयोग और रहस्यवाद की विचित्र अनुभूतियों का वर्णन करते समय कबीर की भाषा में लाक्षणिकता आ गयी है.'बीजक''कबीर-ग्रंथावली'और कबीर -वचनावली'में इनकी रचनाएं संगृहीत हैं.
(उपरोक्त विवरण का आधार हाई-स्कूल और इंटर में चलने वाली उत्तर-प्रदेश सरकार की पुस्तकों से लिया गया है)



कबीर के कुछ  उपदेश 

ऊंचे कुल क्या जनमियाँ,जे करणी उंच न होई .
सोवन कलस सुरी भार्या,साधू निंदा सोई..

हिन्दू मूये राम कही ,मुसलमान खुदाई.
कहे कबीर सो जीवता ,दुई मैं कदे न जाई..

सुखिया सब संसार है ,खावै अरु सोवै.
दुखिया दास कबीर है ,जागे अरु रोवै..

दुनिया ऐसी बावरी कि,पत्थर पूजन जाए.
घर की चकिया कोई न पूजे जेही का पीसा खाए..

कंकर-पत्थर जोरी कर लई मस्जिद बनाये.
ता पर चढ़ी मुल्ला बांग दे,क्या बहरा खुदाय

..इस प्रकार हम देखते हैं कि,सन्त कबीर की वाणी आज भी ज्यों की त्यों जनोपयोगी है.तमाम तरह की समस्याएं ,झंझट-झगडे  ,भेद-भाव ,ऊँच-नीच का टकराव ,मानव द्वारा मानव का शोषण आदि अनेकों समस्याओं का हल कबीर द्वारा बताये गए धर्म-मार्ग में है.कबीर दास जी ने कहा है-

दुःख में सुमिरन सब करें,सुख में करे न कोय.
जो सुख में सुमिरन करे,तो दुःख काहे होय..


अति का भला न बरसना,अति की भली न धुप.
अति का भला न बोलना,अति की भली न चूक..

मानव जीवन को सुन्दर,सुखद और समृद्ध बनाने के लिए कबीर द्वारा दिखाया गया मानव-धर्म अपनाना ही एकमात्र विकल्प है-भूख और गरीबी दूर करने का,भ्रष्टाचार और कदाचार समाप्त करने का तथा सर्व-जन की मंगल कामना का.

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जैसा कि शोषक वर्ग दूसरे जन-हितैषी सुधारकों के साथ छल करता आया है उसने कबीर दास जी के साथ भी किया है । उनके मंदिर बना दिये गए हैं उनकी मूर्तियाँ स्थापित कर दी गई हैं। खुद कबीर दास जी जीविकोपार्जन हेतु श्रम करते थे-कपड़ा बुनते थे,सूत कातते थे।उन्होने हर तरह के ढोंग का विरोध किया-

कंकर-पत्थर जोड़   कर लई मस्जिद        बनाए। 
ता पर चढ़ी मुल्ला बांग दे क्या बहरा हुआ खुदाय । । 


दुनिया ऐसी  बावरी कि          पत्थर पूजन जाये। 
घर की चकिया कोई न पूजे जेही का पीसा खाये। ।  

कबीर दास जी के बाद स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी जनता को जागरूक करने का बीड़ा उठाया था। किन्तु आज इन दोनों महात्माओं को भी जातिगत खांचे मे डाल कर उनकी आलोचना का फैशन चला हुआ है। ढोंग-पाखंड और आडंबर का जबर्दस्त बोल-बाला है। स्वामी,बापू,भगवान न जाने क्या-क्या बन कर लुटेरे जनता को ठग रहे हैं और जनता खुशी से लुट रही है। सीधी-सच्ची बात किसी को समझ नहीं आ रही है जो जितना ज्यादा खुद को काबिल बता रहा है वही उतना ही कूपमंडूकता पर चल रहा है। तथा-कथित प्रगतिशील और आधुनिक विज्ञानी होने का दावा करने वाले ही ढोंग-पाखंड-आडंबर को बढ़ावा देने मे आगे-आगे हैं।

आज भी मानवता को यदि बचाना है तो 'संत कबीर 'को याद करना ही पड़ेगा ,उनकी सीख पर ध्यान देना ही पड़ेगा। 










7 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

मानव जीवन को सुन्दर,सुखद और समृद्ध बनाने के लिए कबीर द्वारा दिखाया गया मानव-धर्म अपनाना ही एकमात्र विकल्प है-भूख और गरीबी दूर करने का,भ्रष्टाचार और कदाचार समाप्त करने का तथा सर्व-जन की मंगल कामना का.

इसी अनुकरणीय सोच की आवश्यकता है आज.....

डॉ.सुनीता said...

जीवन के अनुगुंजित भावों को खूबसूरती से आधार देते कबीर अब भी है और सदैव रहेंगे...

VIJAY KUMAR VERMA said...

बहुत ही ज्ञानवर्धक ..बिलकुल सही कबीर के विचार हमेशा प्रासंगिक रहेगें

Vibha Rani Shrivastava said...

(1 ) “पत्थर पूजे हरी मिले ,तो मैं पुजू पहार ....
ताते यह चक्की भली ,पीस खाए संसार .... !!

(२) कंकर पत्थर जोड़ कर मस्जिद लेई बनाय ....
ताहि पर मूला बांग दे क्या बहिरा हुआ खुदाया .... !!

आज भी मानवता को यदि बचाना है तो 'संत कबीर 'को याद करना ही पड़ेगा ,उनकी सीख पर ध्यान देना ही पड़ेगा।

100 % सच है .... पूरी तरह से सहमत हूँ .... !!

Bharat Bhushan said...

बहुत सार्थक आलेख. कबीर की शिक्षा का अभी तक कोई विकल्प नहीं है क्योंकि इसकी सादगी और पवित्रता की अपनी गुणवत्ता अद्वितीय है.

seema said...

very nice

डॉ० डंडा लखनवी said...

सत्य कथन ........