Saturday, May 16, 2015

प्रकृति में क्षमा का नहीं कोई स्थान : (भूकंप) है केवल दंड का विधान .............. विजय राजबली माथुर

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22 अप्रैल यानी बुधवार को दुनिया के 192 देश 45वां विश्व पृथ्वी दिवस मना रहे हैं। इस मौके पर आइए देखें कि 1970 से 2015 के बीच पृथ्वी कहां से कहां पहुंची है। वायु प्रदूषण पर लगाम लगाने, जनसंख्या वृद्धि रोकने, अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाने और जीव-जंतुओं, वनों व जलस्रोतों के संरक्षण की दिशा में हमने कितनी सफलता अजिर्त की है।
इन मोर्चो पर कुछ संभले हम
वायु प्रदूषण
विश्व
- हवा में औसतन 60 फीसदी तक घटा छह प्रमुख प्रदूषकों का स्तर
- सीसा 80 फीसदी और कार्बन मोनोऑक्साइड 50 फीसदी कम हुआ
- नाइट्रोजन डाईऑक्साइड 52 फीसदी और सल्फर डाई-ऑक्साइड 40 फीसदी तक घटा
- पीएम 2.5 और पीएम 10 माइक्रोमीटर में क्रमश: 38 फीसदी और 27 फीसदी कमी आई

भारत
- 55 फीसदी से घटकर 25 फीसदी के करीब पहुंचा औद्योगिक प्रदूषण
- घरेलू स्रोतों से उत्पन्न प्रदूषण 21 फीसदी के मुकाबले 8 फीसदी हुआ
- पर पेट्रोल-डीजल वाहनों से होने वाले प्रदूषण में 60 फीसदी वृद्धि हुई
- 1970 में 19 लाख के करीब थी वाहनों की संख्या, अभी 20 करोड़ के पार पहुंची

सुधार की दरकार क्यों
- ग्रीनहाउस गैसों के उत्सजर्न में कमी लाने की जरूरत, ग्लोबल वॉर्मिग बढ़ने से कई द्वीपों के अस्तित्व पर खतरा
- भारत में दिल्ली समेत कई शहरों में वायु प्रदूषण का स्तर चिंताजनक हुआ, बढ़ रहे फेफड़े की बीमारियों के मामले

जनसंख्या
विश्व
- 3.75 अरब के करीब थी विश्व आबादी साल 1970 में
- 1980 में 18.5 फीसदी की वृद्धि से 4.5 अरब तक पहुंची
- 2012 में जनसंख्या वृद्धि दर घटकर 10.6 हुई, 7 अरब के पार पहुंची आबादी

भारत
- 54 करोड़ के करीब थी भारत की जनसंख्या साल 1970 में
- 1.2 अरब के पार पहुंच चुका है यह आंकड़ा मौजूदा समय में
- पिछले 90 दशक में पहली बार जनसंख्या वृद्धि दर में आई कमी
- 2000 के दशक में 17.6 फीसदी की दर से बढ़ी आबादी, 1990 के दशक में 21.5 फीसदी था यह आंकड़ा

सुधार की दरकार क्यों
- 9.4 अरब के करीब पहुंच सकती है विश्व आबादी साल 2050 में, 3 अरब लोगों को होगा खाने का संकट
- बढ़ती आबादी को छत मुहैया कराने और आद्योगिक विकास के लिए 11.2 करोड़ अरब हेक्टेयर वनों की करनी होगी कटाई

अक्षय ऊर्जा
विश्व
- बिजली उत्पादन के लिए सौर एवं पवन ऊर्जा का इस्तेमाल शुरू हुआ
-2035 तक अक्षय ऊर्जा स्रोतों का प्रयोग तीन गुना तक बढ़ने की उम्मीद

भारत
- 2008 में बिजली उत्पादन में 7.8 फीसदी थी अक्षय ऊर्जा स्नोतों की हिस्सेदारी
- 2013 में बढ़कर 12.3 फीसदी हुई, भारत पवन ऊर्जा से बिजली का पांचवा सबसे बड़ा उत्पादक बना

सुधार की दरकार क्यों
- वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कोयला, पेट्रोल, डीजल व अन्य पारंपरिक ऊर्जा स्नोतों पर निर्भरता घटाई जा सकेगी

यहां बिगड़ रहे हालात
पानी
विश्व
- 20 लाख टन मानव अपशिष्ट और 70 फीसदी कचरा बहाया जाता है जलस्नोतों में रोजाना
- 78.3 करोड़ लोग यानी विश्व में हर नौ में से एक व्यक्ति को स्वच्छ पेयजल मयस्सर नहीं

भारत
- 20 से 50 फीसदी जलस्नोत नाइट्रेट और आर्सेनिक जैसे हानिकारक रसायनों से दूषित
- 04 फीसदी स्वच्छ पेयजल ही उपलब्ध, गंगा-यमुना जैसी नदियों में बढ़ता प्रदूषण बड़ी चिंता

सुधार की दरकार क्यों
- 3 फीसदी पानी ही पीने लायक, जनसंख्या वृद्धि से बढ़ेगा संकट, नदियों की सफाई और वर्षा जल संचयन पर देना होगा जोर

जंगल
विश्व
- 3.9 अरब हेक्टेयर है जंगलों का मौजूदा दायरा
- 45 साल पहले यह 6 अरब हेक्टेयर से ज्यादा था

भारत
- 7.9 करोड़ हेक्टेयर भूमि जंगलों से घिरी है
- 10 करोड़ हेक्टेयर के करीब जंगल थे 45 साल पहले

सुधार की दरकार क्यों
- जहरीली गैसों को सोखने के साथ-साथ प्राणदायिनी ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं वन, वन्यजीवों को भी देते हैं आशियाना

जीव-जंतु आबादी
विश्व
- 52 फीसदी की कमी आई जीव-जंतुओं की संख्या में पिछले चार दशक में
- जल जीवों की तादाद 79 फीसदी और वन्यजीवों की 40 फीसदी तक घटी

भारत
- जीव-जंतुओं की 172 नस्लें विलुप्तिकरण की कगार पर खड़ी हैं
- इनमें 53 स्तनपायी, 69 पक्षी और 26 समुद्री जीवों की नस्लें शामिल

सुधार की दरकार क्यों
- जैविक संतुलन बनाए रखने और बढ़ती आबादी की खाद्य जरूरतों को पूरा करने के लिए जीव-जंतुओं का सुरक्षित रहना बेहद जरूरी
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 विश्व पृथ्वी दिवस की उपरोक्त रिपोर्ट अखबार में पढ़ कर चले थे और जब  25 अप्रैल 2015 को जब हम पटना जंक्शन पर लखनऊ आने हेतु ट्रेन में बैठ चुके थे अचानक बोगी दोनों ओर तेजी से झुकने डोलने लगी पहले तो इलेक्ट्रिक इंजन लगने का शक हुआ फिर बगल की लाईन पर खड़ी पूरी की पूरी ट्रेन इसी प्रकार हिलती नज़र आई तब लोगों को भूकंप आने का बोध हुआ। फिर तो परिचितों के फोन भी कुशल-क्षेम जानने हेतु आए । भूकंप के बाद वहाँ बारिश भी तेज हुई जबकि तीन दिन पहले ही वहाँ ज़बरदस्त आंधी-तूफान आ चुका था। वैज्ञानिकों/विद्वानों की चेतावनियाँ लोग बाग किस्से-कहानियों की तरह पढ़ कर अनदेखा कर देते हैं सावधानी न तो जनता की ओर से न ही सरकार की ओर से बरती जाती है। पंचांग गणितीय गणना द्वारा पहले ही चेतावनी जारी कर देते हैं लेकिन उन पर गौर करना तो दूर उनका मखौल ही उड़ाया जाता है। :
*April 28 at 3:29pm · Lucknow ·
25 व 26 अप्रैल को आए भूकंप के झटके भी प्राकृतिक प्रकोप की झलकी मात्र हैं।इस समय सूर्य अपनी उच्च राशि 'मेष'में तथा शनि अपनी शत्रु राशि वृश्चिक में थे अर्थात दोनों में परस्पर 6 व 8 के संबंध थे। 
*(05 अप्रैल से 04 मई 2015 तक वैशाख माह में पाँच रविवार पड़ रहे हैं। इनका भी प्रभाव इस भूकंप पर तथा हालिया नक्सल पंथी हमलों में रहा है जिसमें सुरक्षा बलों की क्षति हुई थी।)
03 मई 2015 की रात्रि 11:52 पर मंगल वृष राशि पर आएगा और 15 जून 2015 की रात्रि 01:08 तक रहेगा अर्थात परस्पर शत्रु ग्रह पूर्ण 180 डिग्री के कोण पर रहेंगे।**++**

***** *************************************निम्नांकित खबरों से स्पष्ट होगा कि उपरोक्त चेतावनी पर यदि ध्यान दिया जाता तो क्षति को कम किया जा सकता था। परंतु ध्यान कौन  और क्यों दे?:
"लेकिन इसके लिए जिम्मेदार मुख्य रूप से समाज में प्रचलित अवैज्ञानिक मान्यताएं और धर्म के नाम पर फैले अंध-विशवास एवं पाखण्ड ही हैं.विज्ञान के अनुयायी और साम्यवाद के पक्षधर सिरे से ही धर्म को नकार कर अधार्मिकों के लिए मैदान खुला छोड़ देते हैं जिससे उनकी लूट बदस्तूर जारी रहती है और कुल नुक्सान साम्यवादी-विचार धारा तथा वैज्ञानिक सोच को ही होता है".http://krantiswar.blogspot.in/2014/04/blog-post_14.html

" 'धर्म', 'आस्तिक' और 'नास्तिक ' : इन शब्दों को गलत अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है जिस वजह से गलतफहमिया होती हैं व सर्वाधिक नुकसान भी। वस्तुतः ये हैं :
आस्तिक= जिसका अपने ऊपर विश्वास हो।
नास्तिक= जिसको अपने ऊपर विश्वास न हो।
धर्म = जो शरीर व समाज को धारण करने हेतु आवश्यक हो अर्थात 'सत्य, अहिंसा (मनसा-वाचा-कर्मणा ), अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य'।
उदाहरणार्थ -एक स्वस्थ व्यक्ति के लिए तो मूली व दही का सेवन करना 'धर्म' है किन्तु वही एक जुकाम-खांसी के रोगी के लिए 'अधर्म' क्योंकि इनके सेवन से उसे निमोनिया हो जाएगा। 'धर्म' व्यक्ति सापेक्ष व समय सापेक्ष होता है न कि चर्च, मंदिर, मज़ार, मस्जिद, गुरुद्वारा आदि जाना। विभिन्न संप्रदायों के परिप्रेक्ष्य में 'धर्म' शब्द उच्चारण करना ही सभी समस्याओं व झगड़े का मूल है।

https://www.facebook.com/vijai.mathur/posts/879535992108378?pnref=story

कुछ लोग आधुनिकता के नाम पर, कुछ लोग वैज्ञानिकता के नाम पर और कुछ लोग 'नास्तिकता' : 'एथीस्ट्वाद ' के नाम पर 'ज्योतिष' व 'वास्तु ' विज्ञान का विरोध, निंदा  व आलोचना  करके जन साधारण को उसका लाभ उठाने से वंचित कर देते हैं। इस कारण शोषकों-लुटेरों के हितैषी पोंगा-पंडित जनता को उल्टे उस्तरे से लूटने में कामयाब हो जाते हैं।
किसी के मानने या न मानने का ग्रह- नक्षत्रों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है बल्कि पृथ्वी वासियों द्वारा किए गए और किए जा रहे कृत्यों का उन पर पूर्ण प्रभाव पड़ता है और उसी प्रभाव के कारण ये प्राकृतिक प्रकोप - भूकंप, तूफान, सुनामी आदि-आदि के रूप में सामने आ रहे हैं।पर्यावरण विद अनिल प्रकाश जोशी जी ने वनों के विनाश को भी भूकंप आने का एक कारण बताया है। खनन एवं विद्युत परियोजनाओं के संबंध में उनका कहना है कि ये परियोजनाएं किसी आपदा की स्थिति में हमारी अवैज्ञानिक अदूरदर्शिता का नमूना भी बन सकती हैं। इसी कड़ी में मेरे विचार से यूरोप में सुरंग के जरिये आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा GOD पार्टकिल का खोज अभियान भी भू-गर्भ में अनावश्यक हलचल मचा कर भूकंप लाने का हेतु हो सकता है।
उदाहरणार्थ :
*यदि हम एक ग्लास या एक बाल्टी पानी में कोई छोटी सी भी गिट्टी डालेंगे तो हमें उसमें 'तरंगे' साफ नज़र आएंगी।
*जब तालाब या नदी गिट्टी डालेंगे तो तरंगे हल्की और क्षणिक नज़र आएंगी।
*लेकिन जब हम समुद्र में उसी गिट्टी को डालेंगे तो तरंगे बिलकुल भी नज़र नहीं आएंगी। लेकिन तरंगे बनेंगी तो ज़रूर ही भले ही हमें दीख न पाएँ।
*इसी प्रकार ग्रह- नक्षत्रों का प्रभाव सभी जीवधारियों एवं वनस्पतियों पर भी पड़ता है और जीवधारियों के कृत्यों का प्रभाव  ग्रह- नक्षत्रों पर भी पड़ता है। 05 अप्रैल से 15 जून 2015की स्थिति का उद्धृण ऊपर दिया गया है जिसकी पुष्टि 15 मई 2015 के इस समाचार से हो रही है कि 25 अप्रैल से 14 मई तक नेपाल में 211 झटके भूकंप के आ चुके हैं। 15 व 16 मई को भी वहाँ भूकंप के झटकों के समाचार हैं।
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उपाय : 

फिलहाल शनि व मंगल मंत्रों का जाप व इनके ही मंत्रों से हवन-यज्ञ द्वारा इन ग्रहों के प्रकोप को थामा जा सकता है। निश्चय ही एथीस्ट, आधुनिक वैज्ञानिक और ढ़ोंगी-पाखंडी सतसंगी गण इसका मखौल उदाएंगे। किन्तु यह विधि है पूर्ण वैज्ञानिक ही। कैसे?
जाप सस्वर करने से बनने वाली तरंगे संबन्धित ग्रहों तक पहुँचती हैं व 'पदार्थ-विज्ञान' : MATERIAL-SCIENCE के अनुसार अग्नि में डाले गए पदार्थों को वह परमाणुओं- ATOMS में विभक्त कर देती है एवं वायु उन सूक्ष्म कणों को उन ग्रहों तक पहुंचा कर उनके प्रकोप शमन में सहायक होती है।  
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  ~विजय राजबली माथुर ©
 इस पोस्ट को यहाँ भी पढ़ा जा सकता है।

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (17-05-2015) को "धूप छाँव का मेल जिन्दगी" {चर्चा अंक - 1978} पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
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Kavita Rawat said...

सार्थक चिंतनशील प्रस्तुति। .