Sunday, June 12, 2011

कम होते जीवन के दिन (भाग-२)

मनुष्य खुद ही अपने स्वास्थ्य को गिराने के लिए जिम्मेदार होता है.अक्सर जीवन-रेखा एवं मंगल रेखा से निकल कर हथेली की दूसरी ओर जाती हुई जो रेखाएं दिखाई पड़ती हैं वे असंयम व बदमिजाजी के कारण बिगड़े हुए खराब स्वास्थ्य का संकेत हैं.जिस व्यक्ति की हथेली में आधे भाग तक जीवन व मस्तिष्क रेखाएं एक-दुसरे को लगभग छूती  हुई सी दिखाए दें तो समझें इस तरह का व्यक्ति अत्यधिक संवेदनशील व शीघ्र उत्तेजित हो जाने वाला होता है.यदि जीवन-रेखा पतली व कमजोर लगती हो तो इस तरह का व्यक्ति छोटी-छोटी  बातों पर अत्यधिक चिंता करके अपना स्वास्थ्य ख़राब कर लेता है.ये लोग अत्यधिक डरपोक व जरूरत से ज्यादा सतर्कता बरतने वाले होते हैं,उनमें जीवन की सच्चाइयों का सामना करने का साहस नहीं होता.उसके विपरीत यदि जीवन व मस्तिष्क रेखाएं बस थोड़ी सी मिली हुई हों तो ऐसा व्यक्ति सतर्क व संवेदनशील तो होता है लेकिन बिना किसी कारण के नहीं.

कीरो लिखते हैं एक बार एक डरपोक किस्म के सज्जन जिनके पिता की मृत्यु हो चुकी थी और जो बहुत बड़ी फैक्टरी विरासत में छोड़ गए थे उनसे परामर्श लेने आये.उसकी हथेली में साफ़ था कि,उसकी चिंताओं के कारण शीघ्र ही उसका स्वास्थ्य खराब हो जाएगा अतः वह व्यवसाय न करे.वह सहमत था और धन्यवाद देकर चला गया.परन्तु एक वकील के परामर्श पर उसने व्यापार सम्हाल लिया और कीरो को पत्र लिख कर हस्त रेखा शास्त्र को 'बकवास' कहा.

इस घटना के बारह माह बाद कीरो को दूसरा पत्र भेज कर पूरी विनम्रता से उसने लिखा-"क्या आप एक ऐसे व्यक्ति से मिलना चाहेंगे ,जिसके जीवन के कुछ ही दिन शेष हैं. कीरो उसके अनुरोध को ठुकरा न सके और दिए गए पते पर नाइट्सब्रिज पहुंचे और एक सुन्दर कमरे में उसे तकियों के सहारे लेटे हुए पाया.उसने बहुत हल्की सी आवाज में कहा-"कीरो,यह आपकी विनम्रता है कि आपने यहाँ आने का कष्ट किया ,मैं जानता था कि आप   जरूर आयेंगे.मैंने आपकी बात नहीं मानी और मुझे उसका खामियाजा भुगतना पडा"
इसके तीन दिनों बाद उसकी मृत्यु हो गई.कीरो का दृढ अभिमत है कि ,लापरवाही व अड़ियलपन के कारण वे दुर्घटनाएं हो जाती हैं जिन्हें चेतावनियों के प्रति ध्यान देने व सावधानियां बरतने से टाला जा सकता है.

जब जीवन-रेखा अंगूठे की जड़ में या शुक्र पर्वत पर उसे संक्रा बनाती हुई दिखाई दे तो शारीरिक या जीवन की शक्तियां कभी बलशाली नहीं होतीं.ऐसे लोगों के प्रेम-सम्बन्धों में उत्तेजना नहीं होती .जो लोग विवाहित होते हैं वे या तो संतान जनने में सक्षम नहीं होते या कभी-कभार मुश्किल से ही उनके बच्चे होते हैं.

यदि जीवन-रेखा से निकल कर एक रेखा पहली उंगली की जड़ की ओर जा रही हो तो यह एक महत्वाकांक्षी जीवन का प्रतीक है.यदि मस्तिष्क रेखा भी सीधी व स्पष्ट हो तो ऐसा व्यक्ति दूसरों के लिए नियम बनाएगा और उनको आदेश देगा.यदि यही विशेषताएं किसी औरत के हाथ में दिखाई दें तो समझिये कि उसके पति की खैर नहीं ,क्योंकि तब यह निश्चित है कि वह उस पर हुक्म चलायेगी ,उस पर अपने नियम-कायदे थोपेगी और अपने गर्म मिजाज स्वभाव के कारण उसकी नाक में डीएम किये रहेगी. 

अनुपम उदाहरण 

न्यूयार्क में एक लम्बा-  तगड़ा रोबीले हाव-भाव वाला एक आदमी अपने विवाह से ठीक एक दिन पहले कीरो के पास आया और अपनी मंगेतर का हाथ दिखाने ले गया जो दिखने में बहुत नाजुक मिजाज थी.परन्तु उसकी जीवन-रेखा तर्जनी की जड़ से प्रारम्भ थी जबकि उस व्यक्ति की अंगूठे की जड़ से.वह महिला बहुत सख्त मिजाज थी और अच्छों-अच्छों को अपना गुलाम बना सकती थी.

छः माह बाद जब कीरो फिर न्यूयार्क लौटे तो मुरझाया चेहरा लेकर वह व्यक्ति उनसे मिला और बोला-"कीरो,आपने ठीक ही कहा था कि मेरी इच्छाशक्ति कमजोर है .मैंने कभी यह सोचा भी न था कि मुझे किसी औरत के सामने इस तरह झुकना पड़ेगा और वह भी किसी ऐसी दुबली-पतली औरत के सामने."वह बोलता गया-एक लम्बी आह लेकर -"हुक्म! वह तो मुझ पर राज करती है कीरो,मैं अपनी इच्छा से अपने ही घर में कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र नहीं.मेरी हैसियत तो एक मामूली कीड़े जैसी है.सबसे खराब बात तो यह है कि यह बात मेरे सारे पडौसी भी जानते हैं और मेरा मजाक उड़ाते हैं."

कीरो लिखते हैं अब वह इस समय क्या कहते दोनों की जीवन-रेखाएं तो झूठी नहीं थीं.जब चेताया तो माने नही.

अपने अहम् के कारण अक्सर लोग सत्परामर्श को स्वीकार नहीं करते है जबकि ठगी की लुभावनी बातें उन्हें खूब भाती हैं.फिर तो -
"पाछे पछताए होत क्या? जब चिड़ियाँ चुग गयीं खेत" 

Thursday, June 9, 2011

कम होते जीवन के दिन

"यह ख़ास तौर पर एक ध्यान देने योग्य बात है कि बहुत से लोग जान-बूझ कर ,उतावलेपन में या स्पष्ट चेतावनियों की उपेक्षा करके अपने जीवन की आयु को स्वंय ही घटा लेते हैं."

"जीवन का यह बहुमूल्य उपहार यूं ही बर्बाद करने के लिए नहीं मिला है.प्रतिभा,स्वास्थ्य,बौद्धिक उपलब्धियां व विभिन्न अवसरों के रूप में प्राप्त ये उपहार हमें इसलिए मिले हैं कि हम उनमें और भी वृद्धि करें.सफलताओं का ताज सिर पर पहने बुढापे से चाहे वह कितना छोटा ही क्यों न हो अधिक सुन्दर दृश्य और क्या हो सकता है?और नाकामयाबी से भी खराब वह मायूसी भला कैसी होगी जहां आदमी ने अपने पावों पर खुद ही कुल्हाड़ी मारी हो."

"हस्तरेखा -शास्त्र एक पूरा विज्ञान है.यह बहुत उपयोगी हो सकता है.लेकिन बहुत खतरनाक भी यदि कुछ बेईमान लोग इसका दुरूपयोग करने लगें."

ये कथन हैं काउंट कीरो साहब के जिन्होंने २१ वर्ष के अपने व्यवसायिक अनुभव के बाद पुस्तक-लेखन के माध्यम से यूरोपीय जनता को जाग्रत और प्रशिक्षित करने का महत्वपूर्ण कार्य संपादित किया था.हम देखते हैं कीरो को भी पाखंड का पर्दाफ़ाश करने हेतु घोर संघर्षों का सामना करना पड़ा था परन्तु वह मुस्तैदी से अपने सिद्धांतों पर डटे रहे और अपने मिशन में कामयाब भी हुए.इस ब्लॉग के माध्यम से परिणाम की चिंता किये बगैर मैं आप लोगों को कीरो साहब के विचारों से इसलिए अवगत करा रहा हूँ कि आप मानें या न मानें ,लाभ उठायें या न उठायें मेरा तो कर्तव्य पाखण्ड पर प्रहार करना ही है और मुझे अपना कर्तव्य पालन करना ही है.

पुस्तकों के माध्यम से कीरो साहब ने जनता को इसलिए समझाया था कि लोग स्वंय को समझ सकें.उनका दृढ विशवास था कि ये चिन्ह हमारी हथेली में होते ही इसलिए हैं कि उन्हें देखा व समझा जाये. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि बहुत कम लोग इन चिन्हों को समझते हैं. कीरो साहब के अनुसार वह प्रत्येक समस्या जो किसी भी समझदार व्यक्ति को परेशानी में डाले रहती है,इन रेखाओं व चिन्हों की मदद से समझी जा सकती है.

प्रत्येक व्यक्ति में यह जिज्ञासा होती है कि वह यह जाने-"वे कौन सी शक्तियां हैं जो मेरे जीवन का संचालन करती हैं?उसे प्रभावित करती हैं?जो कुछ मेरे भाग्य में लिखा है,क्या उसे मुझे भुगतना पडेगा?क्या उससे बचने के कुछ उपाए भी हैं?" जहाँ तक मेरा विचार है मैं यह मानता हूँ कि प्रत्येक मनुष्य अपने भाग्य का स्वंय निर्माता है,यदि वह चाहे तो अपने अच्छे वक्त को ख़राब में तब्दील कर सकता है और करता भी है.यदि मनुष्य चाहे तो वह अपने खराब वक्त को अच्छे में भी बदल सकता है और पुराशार्थी व्यक्ति ऐसा ही करते हैं जबकि आलसी,निकम्मे और परोपजीवी व्यक्ति भाग्य और भगवान् के भरेसे बैठ कर दोनों को कोसते रहते हैं.मुझे आर्थिक लाभ इसी लिए नहीं होते क्योंकि मैं भगवान् वाद के फंदे में नहीं फंसता.जो लोग ज्ञान का दुरूपयोग करके पहले पीड़ित को दहशत में ला देते हैं फिर उसकी जेब के अनुसार उसे उलटे उस्तरे से मूढ़ते हैं व्यवहारिक जगत में कामयाब हैं.

हस्तरेखा शास्त्र का महत्त्व भी तभी है जब वह संभावित घटनाओं की हमें पहले से चेतावनी देती हो -

यदि जीवन -रेखा किसी जंजीर की तरह बनी हो या बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में बनी हो तो यह निश्चय ही ऐसे खराब स्वाथ्य का संकेत है जिसके प्रति सावधान रहना बहुत जरूरी है.सम्राट एडवर्ड जब प्रिंस आफ वेल्स थे तो मखमली परदे के पीछे उनका हाथ कीरो ने समाज की प्रतिष्ठित महिला के घर भोज पर देखा था बगैर परिचय जाने.अतः सन १८९१ में सम्राट एडवर्ड ने कीरो को बुला कर अपने सबसे बड़े पुत्र 'ड्यूक आफ क्लेरेंश'के हाथ में जीवन-रेखा को छोटे-छोटे भागों में टूटी होने की बात बताई थी.यह अशुभ लक्षण था और १४ जनवरी १८९२ को छोटी सी बीमारी के बाद उसकी मृत्यु हो गयी जिसके बारे में उसके चिकित्सक ने कहा-"जैसे कोई मोमबत्ती बुझ जाती है वह इस तरह से चला गया."
(अपार समदा एवं क्षमता के बावजूद राजकुमार की ऐसी मौत  केवल ठोस उपाए न करने के कारण ही   संभव हुयी )

कीरो साहब ने मिस्टर पीटर राबिन्सन के बेटे का हाथ जब देखा तो वह जरूरत से अधिक कपडे पहन कर उनके पास आया था.उसके हाथ में अपार धन-सम्पदा के योग थे और उन्हीं के कारण उसे बुद्धिमानी के अवसर भी मिले थे.,परन्तु उसके दाहिने हाथ में जीवन रेखा टूटती हुयी थी.अतः कीरो ने उससे कहा-"कुछ निश्चित संकेतों के आधार पर मैं आपको यह सलाह देता हूँ कि स्वास्थ्य को लेकर आप अत्यधिक सावधानी बरतें.वरना मुझे नहीं लगता कि आपकी बहुत लम्बी उम्र है.'

वह व्यक्ति उपेक्षा से मुस्कराते हुए बोला-"आप चिंता न करें, कीरो.मैं घोड़े की तरह तंदरुस्त हूँ.और पूरे नब्बे साल तक जीवित रहूँगा.हमारे परिवार में सभी लोग बूढ़े होकर मरते हैं."
कीरो ने बहुत जोर देकर कहा-"मेरी चेतावनी से सावधान हो जाइए और अति मत कीजिये.यदि आप सावधानियां बरतेंगे तो संकट टल जाएगा,वर्ना......"और उन्होंने अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया.

चूंकि वह एक बिगडैल रईसजादा था जिसके बाप ने मरते वक्त उसके लिए दस लाख पौंड की सम्पत्ति छोडी थी और तुरंत ही सारा धन उसके हाथ लग गया था. चमचों का झुण्ड उसके आस-पास मंडराने लगा थाजो उसका सारा धन हजम कर गए.उसके दोस्तों ने उसे 'मेंडनहेड'के जिस मकान में ठहराया हुआ था वहां वे उसके पैसों से मस्ती कर रहे थे.उसका स्वाथ्य इतनी तेजी से बिगड़ा कि वह मौत के दरवाजे तक पहुँच गया.हर अखबार में उसकी अंधाधुंध फिजूल खर्ची व तेजी से बिगड़ते हुए स्वाथ्य के समाचार छपने लगे. 

उसे कीरो की चेतावनी याद आई तो उसने सावधानियां बरतीं और उसका स्वास्थ्य भी सुधरने लगा.लेकिन फिर उसे पुराने ढर्रे पर ले आया गया और अपने जीवन का आधा समय जिए बिना ही उसकी मृत्यु हो गई.

ये दोनों उदाहरण हाथ की लकीरों की उपेक्षा करने के परिणाम हैं.वस्तुतः मैं पहले भी इसी ब्लॉग में ज्योतिष सम्बन्धी आलेखों के माध्यम से बता चुका हूँ कि कृत्रिम पूजा-पद्धति अपनाने और ढोंग-पाखण्ड पर चलने के कारण लोग अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी चलाते हैं.उसी की पुष्टि इनसे होती है.मनुष्य मनन करने के कारण होता है.परन्तु यदि मनन की बजाए 'आस्था' और अंध-विशवास को महत्त्व दिया जाये जैसा कि एक उद्योगपति,एक नेता और एक अभिनेता ने निकट अतीत में हमारे देश में किया है -क्या वह मनुष्यत्व के दायरे में आता है?शीघ्र आपको उसके दुष्परिणाम देखने को मिलेंगे.       

Monday, June 6, 2011

एक बिल्ली की याचना भरी पुकार

याचना वह बोली है जो किसी के समक्ष झुक कर उसका एहसान मानते हुए की जाती है.केवल मनुष्य ही नहीं जानवर भी जरूरत पड़ने पर ऐसा ही करते हैं.अभी गत माह हमारे कुछ रिश्तेदार आये थे उनके रहने के दौरान रात में बिजली गुल होने पर कुछ लेने हेतु सबसे ऊपर के कमरे को खोलते ही एक बिल्ली चुप-चाप दुबक गई होगी और वहीं छिपी बैठी रही.जब पता चला तो उसके निकलने हेतु द्वार खुला छोड़ दिया गया.परन्तु बिल्ली ने एक भूरा और एक काला बच्चा वही दे दिया अब वे उसी में उछल-कूद करते थे निकलते नहीं थे.एक दिन बिल्ली और उसका भूरा बच्चा बाहर था और जैसे ही काला वाला बहार निकला उस कमरे का द्वार बंद कर दिया तो उन सबने गैलरी में ही डेरा डाल लिया.तीन दिन पहले सुबह के समय बिली के साथ उसके दोनों बच्चे भी बाहर थे तब गैलरी का भी द्वार बंद कर दिया.अब उन सबको खुले आँगन में रहना पड़ रहा है.बिली के बच्चों को पीने का पानी दिया और श्रीमतीजी ने छोटे दीयों में रख कर दूध भी पीने को दिया, हमें यह देख कर आश्चर्य हुआ कि,काला और भूरा दोनों बिल्ली बच्चे पहले उस दूध की इन्क्वायरी करने लगे और फिर एक साथ एक ही पात्र से ग्रहण किया. इंसान को जब जहाँ जो मिल जाता है बिना सोचे-समझे मुंह के हवाले कर देता है.एक बार झांसी में किसी मंदिर के सामने रोडवेज बस ड्राइवर ने रोक दी और किसी ने आकर प्रशाद के नाम पर कुछ बांटना शुरू कर दिया हमारे उन रिश्तेदार समेत लगभग सभी यात्रियों ने उसे मुंह में ठूंस लिया.चूंकि मैं ढोंग-पाखण्ड का विरोधी हूँ अतः मैंने एवं श्रीमतीजी ने उसे बस से उतरने पर एक वृक्ष के समक्ष रख दिया और ग्रहण नहीं किया था.



अक्सर बस और रेल में विषाक्त प्रशाद खा कर लुटने और जान गवां देने के किस्से अखबारों में छपते रहते हैं परन्तु इंसान गलती-दर-गलती करता जाता है.लेकिन इन बिल्ली के बच्चों से इंसान को बहुत कुछ सीखने की आवश्यकता है कि चाहे भूखे भी हों जिस-तिस से मिली चीज मुफ्त में यों ही नहीं गटकते.जब बिल्ली  को पता चला कि उसके बच्चों पर रहम किया गया तो वह 'बेहद याचना'भरी बोली में मिमयाने लगी है,जैसे शायद वह कहना चाहती होगी कि उसके बच्चों के लिए कमरा या गैलरी खोल दिया जाए.हालांकि वे आँगन में ही हैं परन्तु उन बच्चों को दूध दो-तीन बार मुहैय्या करा देने से अब वे चौथी मंजिल पर बांस की   सीडी के जरिये चढ़ने-उतरने लगे हैं.हम लोग यही इंतज़ार  कर रहे हैं वे शीघ्र ताकतवर हो कर प्रस्थान कर जाएँ.

इसी दौरान दिल्ली के राम लीला मैदान में रामदेव ने भी एक याचना देश के नागरिकों से की और असंख्य लोग योग के नाम पर इकट्ठा करके अनशन प्रारंभ कर दिया. पहले तो झूठ बोल कर मैदान लिया गया फिर सरकार से सौदे बाजी की गई और जनता को मूर्ख बनाया गया.जब जनता के बीच सरकार ने वह चिट्ठी सार्वजानिक कर दी तो सरकार के विरुद्ध गर्जना कर दी.

Hindustan-Lucknow-05/06/2011


फिर औरताना वेश-भूषा धारण करके औरतों के झुण्ड में छिप कर भागने की कोशिश और पकडे जाने पर दहशत में आ जाना -ये सब किस संन्यास-धर्म के लक्षण हैं?लेकिन अफ़सोस कि अखबार और ब्लाग्स इस ढोंगी और पाखंडी के समर्थन में भरे पड़े हैं.मुलायम सिंह यादव यह जानते हुए भी कि यह आर.एस.एस. का खेल था रामदेव के यादव होने के कारण समर्थन में प्रेस-कान्फरेन्स करने लगे तो कुछ इनके हरियाणवी होने के कारण समर्थन करने लगे.किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि सन्यासी महाराज का यह खर्चा आया कहां से?-
Hindustan-Lucknow-06/06/2011
Hindustan-Lucknow-04/06/2011

Hindustan-06/06/2011




Hindustan-Lucknow-4 June-2011
रामदेव ने कहा है कि अन्ना हजारे के अनशन -आन्दोलन पर हुए खर्च को 'हिन्दुस्तान लीवर लि.'ने उठाया था.उनका इतना खर्च किसने उठाया ?२००९ के लोकसभा चुनावों में भाजपा को नौ लाख का चेक रामदेव ने चंदे के रूप में दिया था वह धन कहाँ से आया था?

लूट के बंटवारे का झगडा

गुरुदेव रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने एक कहानी में बताया है कि दूध में पानी की मिलावट पर जब नौकर के ऊपर पहरा बैठाया तो दूध वाले ,नौकर के साथ उस पहरेदार का हिस्सा शामिल होने के कारण पानी की मात्रा और बढ़ गई.अतः ज्ञातव्य है कि अन्ना हजारे और रामदेव जनता को मूर्ख बना कर मूल समस्या को छिपाने में सरकार की मदद कर रहे हैं.एक सरकार की कमेटी में शामिल है और दूसरा उससे सौदेबाजी करता है.दोनों में से एक भी धार्मिक भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहा है जो कि आर्थिक भ्रष्टाचार की जननी है.जब तक मजारों पर चादर चढ़ाना और मंदिरों में प्रशाद चढ़ाना जारी रहेगा सरकारी दफ्तरों में नजराना चढ़ाना भी रोका नहीं जा सकता.अन्ना ,रामदेव या कोई भी इन धार्मिक भ्रष्टाचारों के विरुद्ध आवाज उठाना ही नहीं चाहता केवल आर्थिक भ्रष्टाचार की बात करना थोथी लफ्फाजी है.

एक ग्रह-जनित दोष के निवारणार्थ एक नेता,एक अभिनेता और एक उद्योगपति मिल कर डेढ़ करोड़ रुपया एक मंदिर में चढाते हैं क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है?किसने इसके विरुद्ध आवाज उठायी ?मंदिर में दान देने से ग्रहों के दोष नहीं मिटते हैं उनका वैज्ञानिक उपचार करना चाहिए था जो कर्मकांडी,ढोंगी-पाखंडी नहीं करवाते हैं.उनका ध्येय -'मेरा पेट हाउ मैं न जानूं काऊ'होता है.ऐसे लोग ही भ्रष्टाचार के जनक होते हैं.जब तक आप मूल पर प्रहार नहीं करते हैं पत्तों -डालियों को छांटने का हल्ला मचाते रहिये कुछ भी सुधार होने वाला नहीं है.

काला धन सिर्फ वह ही नहीं है जो सरकारी टैक्स बचा कर एकत्रित किया गया है.बल्कि उत्पादक और उपभोक्ता का शोषण करके जमा किया गया धन भी काला धन ही है.किसानों  की जमीनें छीन कर उद्योगपतियों को सौंपना और फिर मजदूरों का शोषण करवाना भी भ्रष्टाचार ही है.इन्हीं भ्रष्ट उद्योगपतियों के चंदे से आन्दोलन करके भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने को दिखाना फैशन भर है.पूरी भ्रष्ट-व्यवस्था को बदलने हेतु गरीबों,मजदूरों और किसानों को एकत्र कर उन्हें जागरूक करने से ही भ्रष्टाचार दूर होगा -हो हल्ले से नहीं.

Sunday, June 5, 2011

स्वर्ण मंदिर कांड : एक विडंबना ------ विजय राजबली माथुर


05 जून 1984 को स्वर्ण मंदिर,अमृतसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा जी के आदेश पर सेना का आक्रमण हुआ और भिंडरावाले साहब का खात्मा तोप के गोले से उखड़े प्लास्टर के टुकड़े  के उनके सर में घुसने से हुआ.स्वर्ण मंदिर एक धार्मिक -स्थल माना जाता है और इस पर सैनिक आक्रमण की निंदा करने वालों में बांग्ला देश युद्ध के नायक लेफ्टिनेंट जेनरल सरदार जगजीत सिंह अरोरा भी मुख्य रूप से थे.इस कदम की सराहना करने वालों में प्रमुख नाम पूर्व प्रधानमंत्री पं.मोरारजी देसाई का है जिन्होंने अमेरिका से इंदिराजी के इस कदम को साहसिक कहा था. मोरार जी उस समय अमेरिका में खुद पर अमेरिकी पत्रकार द्वारा सी.आई.ए.एजेंट होने के आरोप के विरुद्ध मुक़दमे के सिलसिले में डा.सुब्रमनियम स्वामी के कहने पर उनके साथ गए हुए थे.उस पत्रकार ने शायद जिसका नाम हर्षमेन था इंदिराजी के मंत्रीमंडल में एक सी.आई.ए.एजेंट होने का दावा किया था और इशारा मोरारजी पर था.मोरारजी बाद में यह मुकदमा हार गए थे.

जब इमरजेंसी के बाद जनता सरकार के प्रधानमंत्री मोरारजी बने तो उनकी सरकार को परेशान  करने के लिए इंदिराजी ने भिंडरावाला को खुद आगे किया था उनके एक अधिवेंशन में संजय गांधी को भी भेजा था.इंदिराजी मान कर चल रही थीं अब वह कभी सत्ता में वापिस नहीं आ पाएंगी.परन्तु वह 1980 में पुनः प्रधानमंत्री बन गईं और संजय की मृत्यु के बाद राजीव गांधी ने भी भिंडरावाला को इस सदी का महान संत बताया था.लेकिन इन सब बातों का भिंडरावाला पर असर नहीं पड़ा जो अभियान मोरारजी के विरुद्ध इंदिरा जी ने उनसे शुरू कराया था उसे उन्होंने इंदिरा जी के विरुद्ध भी जारी रखा.बचाव के लिए उनके अनुयायी स्वर्ण मंदिर में छिप गए और वहीं से अपनी गतिविधियाँ चलाने लगे जिसके कारण इंदिराजी को स्वर्ण मंदिर पर आक्रमण का आदेश देना पड़ा.

दावा किया गया था कि सेना को स्वर्ण मंदिर में कंडोम ,मादक पदार्थ और शस्त्र भारी मात्रा में मिले थे.कहा तो यह भी गया था वहां घड़ों में मल -मूत्र भी पाया गया था.बताया गया स्वर्ण मंदिर अराजकता का अड्डा बन गया था.

प्रश्न यह है कि जिन मोरारजी के विरुद्ध भिंडरावाला का अभियान शुरू कराया गया वह तो उन्हें प्रेरणा देने वाली इंदिराजी का समर्थन करते हैं.जिन इंदिराजी ने उन्हें खडा किया वह उनका इस हद तक विरोध करती हैं.वस्तुतः मोरारजी सी.आई.ए.एजेंट के आरोप से घबराए हुए थे और उन्हें उस वक्त इंदिराजी की सहायता की जरूरत थी इसीलिए उनके अलोकतांत्रिक कदम की सराहना करने लगे.नैतिकता के अलमबरदार की यह अनोखी नैतिकता थी.

इस स्वर्ण मंदिर काण्ड ने इंदिराजी के प्रति सिक्खों में नफरत भर दी और बावजूद सिक्ख राष्ट्रपति ज्ञानी जेल सिंह की इंदिरा -भक्ति के ,सिक्ख सुरक्षा कर्मियों ने ही इंदिराजी की कुछ माह बाद हत्या कर दी.

प्रश्न यह भी है कि,क्या सिर्फ राजनीतिक विरोध के लिए इंदिराजी द्वारा देशद्रोही कदम को समर्थन देना उचित था अथवा नहीं ? जो भी हो गलत का नतीजा गलत ही हुआ करता है और हुआ भी.

भिंडरावाला इंदिरा जी के लिए भस्मासुर साबित हुए .तालिबान अमेरिका के लिए भस्मासुर बने हुए हैं.चाहे राजनीति हो या सामजिक क्षेत्र ,साहित्य हो या आध्यात्मिक क्षेत्र,सभी में नैतिकता पालन की महती आवश्यकता है.अहंकार में डूब कर जो गलत करते हैं उन्हें एक न एक दिन उसकी सजा भुगतनी ही पड़ती है.

स्वर्ण मंदिर काण्ड हमें हमेशा बुरे कर्मों का बुरा नतीजा प्राप्त होने की याद दिलाता रहेगा.काश लोग सबक भी ले सकें तो बेहतर है.

Thursday, June 2, 2011

'क्रान्तिस्वर' का एक वर्ष

हालांकि यों तो मैं सन १९७३ ई.में मेरठ प्रवास के समय से ही विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अपने विचार लिखने लगा था और आगरा में तो एक साप्ताहिक पत्र तथा एक त्रैमासिक पत्रिका में सहायक संपादक भी रहा.ख्याल खुद अपने दो अखबार -'क्रन्तिस्वर' एवं 'विद्रोही स्व-स्वर में' निकालने का भी था. परन्तु अखबार निकालने के खर्च  की कमी तथा उन्हें व्यापारिक स्तर पर चलाने की कला न ज्ञात होने के कारण वैसा न कर सका. गत वर्ष सन २०१० में ०२ जून से यह ब्लॉग प्रारम्भ किया जिसका एक वर्ष पूर्ण हो गया है और आज से दुसरे वर्ष में प्रवेश हुआ है.अपने एक वर्ष के ब्लॉग लेखन की स्व-समीक्षा में पाया कि चूंकि खोने को कुछ था ही नहीं सो आत्म-संतोष तो पाया ही पाया कुछ प्रशंसा और सम्मान भी प्राप्त हुआ .विद्वेष-प्रवृति के लोगों से व्यंग्य बाणों तथा कटाक्ष का सामना भी किया.इसी कारण जो स्तुतियाँ मैं सर्वजन के हित में सार्वजानिक करने वाला था नहीं किया ,जिन ब्लागर्स ने व्यक्तिगत रूप से स्तुतियों से लाभ उठाया उन्हीं ने सार्वजानिक प्रकाशन में बाधा उपस्थित की.किन्तु मेरे ऊपर किये गए कटाक्षों का जिन लोगों ने माकूल जवाब दिया उनमें सर्वश्री पवन मिश्रा,प्रवीण पांडे,दीबक बाबा के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं.

सबसे बड़ा लाभ जो हुआ वह यह है कि प्रारम्भिक टिप्पणीकारों के संकेत पर अन्य ब्लाग्स से परिचय हुआ जिनमें बहुत से बहुत अच्छी-अच्छी बातों के खजाना निकले.अच्छे ब्लागर्स से ई.मेल और कुछ से फोन पर भी   संपर्क हुआ.'विद्रोही स्व-स्वर' पर कुछ ब्लागर्स की प्रशंसा की थी जिनमें से कुछ बाद में गडबडी कर गए ,कुछ को उनकी सहमति से ई.मेल द्वारा उनके भले हेतु कुछ स्तुतियाँ भी भेजीं जिनमे से आर.एस.एस.से सम्बंधित तीन ब्लागर्स बेहद प्रतिगामी और ईर्ष्यालू निकले जिनमें से एक ने तो हमारे ब्लाग पर प्रकाशित एक पोस्ट का तर्जुमा भी अपने हित में किया था.इन बातों को देखते हुए तारीफ़ करना और एहसान जताना खतरे से खाली तो नहीं लगता फिर भी जोखिम उठाना ही चाहिए.

मुझे जिन ब्लागर्स की रचनाओं ने प्रभावित किया या जो मुझे पसंद रहें उनमें एक निष्पक्ष डा.टी.एस.दराल सा :हैं(उन्होंने वाई नेट कम्प्यूटर्स की वर्षगाँठ पर जो सद्भावनाएं व्यक्त कीं उनके लिए विशेष आभार).डा.डंडा लखनवी सा :की रचनाएं सदा ही प्रेरणादायी लगीं.उनसे व्यक्तिगत मुलाक़ात कराने वाले कुंवर कुसुमेश जी की रचनाएं और उनकी सदभावनाएँ सराहनीय हैं,उन्हीं के माध्यम से अलका सर्वत मिश्रा जी से भी परिचय हुआ जिनके ब्लॉग पर वर्णित औषाद्धियों का लाभ लेने हेतु  अपने दो रिश्तेदारों को प्रेरित कर चुका हूँ.ये  मुलाकातें कुसुमेश जी द्वारा मुम्बई से पधारे एस.एम्.मासूम साहब के सम्मान में की गयी चाय -पार्टी के दौरान हुईं. अलका जी ने २३ मई को 'आइ .पी.आर.'की बैठक में आमंत्रित करा कर सर्वत जमाल जी समेत और ब्लागर्स से भी परिचय करवाया. 

'जंतर मंतर'के शेष नारायण सिंह जी से परिचय रवीश कुमार जी की समीक्षा पढ़ कर हुआ था उन्होंने बड़ी सहृदयता पूर्वक आर.एस.एस.सम्बंधित अपने विचारों को मुझे उद्धृत करने का अधिकार-'अनुमति ही अनुमति है' लिख कर ई.मेल द्वारा  दिया था अतः उनका बेहद आभारी हूँ.रवीश जी की समीक्षा से ही श्री श्री राम तिवारी के ब्लाग से परिचित हुआ जिनके माध्यम से अमर नाथ मधुर जी और उनके माध्यम से निर्मल गुप्ता जी के ब्लाग्स  तक पहुंचा एवं उनके ज्ञान से लाभान्वित हुआ.

शुरुआत में जिन ब्लागर्स का इससे  पहले भी  उल्लेख हो चुका है उनमें से वीणा श्रीवास्तव जी(वाई नेट की वर्षगांठ पर विशेष सद्भावनाएं व्यक्त करने हेतु विशेष आभार),अल्पना वर्मा जी.के.आर.जोशी सा :(Patali The Village ),डा.मोनिका शर्मा जी(मोनिका जी एवं जोशी जी ने भी  भी २८ मई को उत्तम सद्भावनाएं व्यक्त कीं और उस हेतु उन्हें भी विशेष आभार)  की रचनाएं आज भी प्रभावित करती हैं.डा.शरद सिंह जी  द्वारा प्रदत्त ऐतिहासिक जानकारियाँ तथा मनोज कुमार जी द्वारा प्रदत्त विभिन्न विचार और गंभीर ज्ञान सदैव लाभकारी लगता है.जाकिर अली रजनीश सा : एवं कृति बाजपेयी जी भी कई अच्छी जानकारियाँ देते हैं जिनमें कुछ से मैं भी सहमत हूँ.इन्द्रनील भटचार जी  भी बहुत ज्ञानवर्धक जानकारियाँ लिखते हैं तथा जी.एन शा साहब भी.
  
प्रमोद जोशी जी एवं राजेन्द्र तिवारी जी के ब्लॉग से भी महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिलती हैं.प्रदीप तिवारी जी के ब्लॉग सूचनाओं और अमूल्य विचारों का खजाना हैं उनके माध्यम से ही रणधीर सिंह 'सुमन'जी के ब्लाग 'लोक संघर्ष ' से परिचय हुआ जो जन हित के मुद्दों को मजबूती से उठाता हैऔर ज्ञानार्जन में वृद्धि  करता है .

सुमन जी ने ३१ मई २०११ को दोपहर दो बजे मुझे फोन पर सूचित किया की मैं रवीन्द्र प्रभात जी के कार्यालय में सायं ४ बजे पहुंचूं जहाँ बेलफास्ट से पधारे दीपक मशाल जी से भेंट करने का कार्यक्रम था. उनसे पूर्व ज़ाकिर सा :एवं रवीन्द्र जी यशवंत को फोन पर बता चुके थे.वहाँ रवीन्द्र जी,कुसुमेश जी,सुमन जी और पुष्पेन्द्र जी मिले फिर हम सब को रवीन्द्र जी गोमती नगर मशाल जी के ठहराव स्थल ले गए जहाँ प्रतिभा कटियार जी भी थीं.मुलाक़ात और चर्चा अच्छी रही.

हेमाभ , चैतन्य शर्मा,माधव, अनुष्का,चिन्मयी,पाखी आदि  -बच्चों के  ब्लाग भी मैं फालो करता हूँ उनके प्रयास अच्छे हैं एवं उनके तथा जिन बच्चों के ब्लाग मैं नियमित नहीं पढ़ पाता हूँ उनके भी  उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ .


मेरे ब्लॉग पर मेरी श्रीमती जी (पूनम माथुर) की भी कई रचनाएं जो पूर्व में अखबारों में भी छप चुकीं थीं प्रकाशित हुयी हैं जिनमें 'इंसान केन्ने........'को इ.सत्यम शिवम सा :ने चर्चा मंच पर भी स्थान दिया था,जो इसी ब्लाग पर ही भोजपुरी में प्रकाशित हुआ था.क्रन्तिस्वर के लिए पूनम के योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता.

बहुत से ब्लागर्स मेरे आलेखों पर अनुकूल टिप्पणियाँ और सराहना कर गए हैं उन सभी का ह्रदय से आभारी हूँ और जिन्होंने प्रतिकूल टिप्पणियाँ की है उन्हें इसलिए धन्यवाद कि उनसे नए विचार देने का अवसर मिला.जिन्होंने मखौल उड़ाया और अनर्गल आलोचना की उनकी बुद्धी -शुद्धी की प्रार्थना करता हूँ.

मैं तो केवल आलेख टाइप करके छोड़ देता हूँ ,चित्र आदि लगाना ,सेटिंग करना सब यशवंत पर निर्भर है उसका और उसके वाई नेट कम्प्यूटर्स का भी आप सब से संपर्क करवाने में योगदान है.

यह ब्लाग 'स्वान्तः सुखाय -सर्वजन हिताय' प्रारंभ किया गया था और उसी नीति पर आगे भी चलता रहेगा तथा ढोंग एवं पाखण्ड का प्रबल विरोध करता रहेगा .हमारी यही मनोकामना और प्रयास है कि इस धरती पर मानव द्वारा मानव का शोषण अविलम्ब समाप्त हो और मानव जीवन को सुन्दर,सुखद एवं समृद्ध बनाने हेतु  समता मूलक समाज की स्थापना शीघ्रातिशीघ्र हो.