Wednesday, September 9, 2026

भारत को बर्बाद नेताओं ने नहीं, नौकरशाहों ने किया ------ राजेश आर सिंह




भारत को बर्बाद नेताओं ने नहीं, नौकरशाहों ने किया 
भारत की तबाही का असली चेहरा वो नहीं जो टीवी पर बहसों में दिखता है, असली चेहरा वो है जो फाइलों के पीछे छिपा बैठता है, फाइलों पर नोटिंग्स लिखता है, और चुने हुए जनप्रतिनिधियों के फैसलों को 'प्रक्रिया' के नाम पर रोकता है।  यह कोई संयोग नहीं कि भारत में अनपढ़, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले, या सिर्फ जाति-धर्म के नाम पर वोट पाने वाले नेताओं की भरमार है, यह 'बाई डिफाल्ट' नहीं, बल्कि 'बाई डिजाईन' है, क्योंकि नौकरशाहों का पूरा तंत्र ही इस बात पर टिका है कि पढ़े-लिखे, सक्षम, और जनता के मुद्दों पर बात करने वाले लोग राजनीति में न आएं। जब अरविंद केजरीवाल जैसे शिक्षित नेता दिल्ली में सत्ता में आए, तो उनके सामने सबसे बड़ी दीवार विधायिका या विपक्ष नहीं, बल्कि आईएएस अधिकारियों की 'फाइल वॉर' थी, जिसके चलते 2023 में सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा, और फिर भी केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर नौकरशाही को वापस पॉवर दे दी। पंजाब में भगवंत मान की सरकार ने दर्जनों आईएएस अधिकारियों को महीनों बिना पोस्टिंग के रखा, क्योंकि उन्होंने माइनिंग फाईलों पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया, यह कोई अलग अलग घटनाएं नहीं, बल्कि एक सिस्टमैटिक पैटर्न है, जहां ब्यूरोक्रेट्स चुने हुए जनप्रतिनिधियों को 'पनिस करते हैं, अगर वे उनके नियंत्रण को चैलेंज करें।  यह तंत्र औपनिवेशिक विरासत का हिस्सा है, जो कन्ट्रोल के लिए बना था, सर्विस के लिए नहीं, और आज भी यही तंत्र भारत की लोकतंत्र की रूह को खा रहा है।
1947 में आजादी मिली, लेकिन जो सिस्टम ब्रिटिशों ने बनाया था, वह कभी टूटा ही नहीं। भारतीय सिविल सेवा (ICS), जो बाद में IAS बना, उसका मकसद था 'कंट्रोल, राजस्व संग्रह, कानून एवं व्यवस्था, और साम्राज्यवादी हितों की संरक्षण। इस सिस्टम में 'सेवा' का कोई सवाल ही नहीं था, जनता तो सिर्फ 'subject' यानी प्रजा थी, 'citizen' यानी नागरिक नहीं। आजादी के बाद भी इसी सिस्टम को बरकरार रखा गया, क्योंकि नए नेताओं को लगा कि 'यही उपयुक्त व्यवस्था है'। लेकिन हकीकत यह है कि यह सिस्टम 'निपुणता' के लिए नहीं, 'इन्सुलेशन' के लिए बना था, ताकि ब्यूरोक्रेट्स किसी भी राजनैतिक दबाव से आजाद रहें, और व्यवस्था को अपनी मर्जी चलाएं। भर्ती की आयु सीमा, सामान्यवादी संवर्ग का प्रभाव, लैटरल एंट्री पर प्रतिरोध, सब कुछ इस बात को सुनिश्चित करता है कि 'बाहर से' कोई शिक्षित व्यक्ति सीधे पॉवर में न आए। जब एक आईएएस अधिकारी 22-23 साल की उम्र में परीक्षा पास करके सीधे जिला अधिकारी बन जाता है, तो उसके पास न तो जमीनी अनुभव होता है, न ही जनता की समस्याओं की समझ, लेकिन फिर भी वही अधिकारी एक चुने हुए विधायक या मंत्री को 'रूल' बताता है। यह कोई 'प्रतिभा' नहीं, बल्कि एक 'इलीट क्लब' है, जो अपने आप को संरक्षित करती है, और बाहर के लोगों को अलग करती है।
भारत में 'Transaction of Business Rules' और 'Allocation of Business Rules' ये वो कार्यकारी दस्तावेज़ हैं, जो तय करते हैं कि कौन सा फाईल किसके पास जाएगा, कौन निर्णय ले सकता है, और कौन सिर्फ 'औपचारिक प्रमुख' रहेगा। ये रूल 1950-1960 में बने थे, और आज भी वही रूल चल रहे हैं, जिनके तहत ब्यूरोक्रेट्स को इतना पॉवर मिला है कि वे कैबिनेट मंत्री को भी 'औपचारिक प्रमुख' बना सकते हैं। जब एक मंत्री कोई पॉलिसी लांच करता है, तो कार्यान्वयन ब्यूरोक्रेट्स के हाथ में होता है, और अगर वे चाहें, तो 'फाईल नोटिंग, 'प्रक्रियात्मक देरी', या 'क़ानूनी सलाह' के नाम पर उस पॉलिसी को महीनों-सालों तक रोक सकते हैं। मुंबई मैट्रो प्रोजेक्ट 10 साल से देरी से है, क्यों? ब्यूरोक्रेट्स की लालफीताशाही, कानूनी अड़चन, और समन्वय की कमी। मनरेगा, पीएम-किसान, या किसी भी कल्याणकारी योजना में लीकेज और देरी होती हैं, क्यों? नौकरशाही स्तर पर अकुशल कार्यान्वयन।  COVID-19 के दौरान ऑक्सीजन और वैक्सीन की वितरण में देरी, क्यों? नौकरशाही अक्षमता ने सक्रिय राजनीतिक पहल को भी फेल कर दिया।  यह कोई 'दुर्घटना' नहीं, बल्कि एक 'डिजाइन' है, जहां ब्यूरोक्रेट्स को इतना स्वायत्तता मिली कि वे चुने हुए जनप्रतिनिधियों को बाइपास कर सकते हैं, और जनता को कष्ट में डाल सकते हैं।
2019 में केंद्र सरकार ने 'लैटरल एंट्री' की शुरुआत की, ताकि निजी क्षेत्र, शिक्षा जगत, और सिविल सोसायटी के एक्सपर्ट को सीधे सीनियर ब्यूरोक्रेट्स के पोस्ट पर लाया जा सके। लेकिन इसका विरोध सबसे ज्यादा ब्यूरोक्रेट्स ने ही किया, क्योंकि यह उनके 'मोनोपोली' को चैलेंज करता था। IAS कैडर, जो सामान्यवादी है वे क्षेत्रीय ज्ञान को वैल्यू नहीं देते सीनियरिटी और 'नौकरशाही अनुभव' को प्राथमिकता देता है।  जब एक एक्सपर्ट, जो 20 साल से हेल्थ केयर या शिक्षा क्षेत्र में काम कर रहा हो और सीधे सेक्रेटरी लेवल पर आता है, तो वह 'पुराने समूह' को टेंशन देता है, क्योंकि वह 'रूल्स से नहीं, 'रिज़ल्ट से बात करता है। यही कारण है कि लैटरल एंट्री प्रोग्राम आज भी सीमित है, और ब्यूरोक्रेट्स का प्रतिरोध जारी है। यह सिर्फ नौकरशाही पदों तक सीमित नहीं, यह मानसिकता पूरे राजनीतिक प्रणाली में फैली हुई है। जब एक शिक्षित, पेशेवर व्यक्ति राजनीति में आता है, तो ब्यूरोक्रेट्स उसे 'आउट साइडर मानते हैं और उसे 'समायोजित' करने के लिए मजबूर करते हैं। अगर वह 'समायोजित' नहीं करता, तो उसके सामने 'फाईल वार, 'ट्रांसफर थ्रेट, या 'मीडिया लीक' की दीवार खड़ी कर दी जाती है।  यही कारण है कि भारत में आज भी 'वंशवाद की राजनीति', 'अपराधी राजनीतिज्ञों', या 'जाति-आधारित नेताओं' की भरमार है, क्योंकि वे ब्यूरोक्रेट्स के 'कंट्रोल' में रहते हैं, और उनके 'रूल्स' के हिसाब से चलते हैं।
दिल्ली में AAP सरकार के आने के बाद, सबसे बड़ा संघर्ष ब्यूरोक्रेट्स के साथ हुआ। IAS अधिकारियों ने फाईलों पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया, ट्रांसफर की मांग की, और मीडिया में लीक किए, ताकि सरकार की इमेज खराब हो।  2023 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली गवर्नमेंट को ऑफिसर के ट्रांसफर/पोस्टिंग का पॉवर दिया लेकिन केंद्र सरकार ने तुरंत अध्यादेश लाकर उस पॉवर को वापस ब्यूरोक्रेट्स को दे दिया।  यह कोई 'क़ानूनी मुद्दा' नहीं था, यह एक 'राजनैतिक संदेश था, कि 'शिक्षित नेता को कंट्रोल में रखा जाएगा।  पंजाब में भगवंत मान की सरकार ने दर्जनों आईएएस अधिकारियों को महीनों बिना पोस्टिंग के रखा, क्योंकि उन्होंने माइनिंग फाईल्स पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था।  गुरकीरत कृपाल सिंह, एक 2001- बैच के अधिकारी, को होम सेक्रेटरी के पद से हटाया गया और 8 महीने बाद भी उसे कोई पोस्टिंग नहीं मिली। कंवल प्रीत बरार, एक 2007- बैच के अधिकारी, को भी महीनों से इंतजार करना पड़ रहा है।  यह 'पनिसमेंट नहीं, बल्कि एक 'वार्निंग है कि अगर तुम चयनित जनप्रतिनिधि के हिसाब से नहीं चलोगे, तो तुम्हें 'किनारे' कर दिया जाएगा। यह पैटर्न सिर्फ दिल्ली या पंजाब तक सीमित नहीं, यह पूरे भारत में है, जहां ब्यूरोक्रेट्स चुने हुए जनप्रतिनिधि को 'सबक सिखाते' हैं, अगर वे उनके कन्ट्रोल को चैलेंज करें।
लोकतंत्र में जनता 'सार्वभौम' होती है और जनता के प्रतिनिधि, यानी चुने हुए नेता, वो होते हैं जो पॉलिसी बनाते हैं। ब्यूरोक्रेट्स का रोल होता है उसे 'लागू करना, लेकिन भारत में यह रोल उलट गया है। आज ब्यूरोक्रेट्स 'पॉलिसी' बनाते हैं, चुने हुए जनप्रतिनिधि मंजूरी देते हैं और जनता 'तकलीफ झेलती है। यह कोई 'थ्योरी नहीं, यह ग्राउंड रियलिटी है। एक IAS अधिकारी, जो कभी जनता के बीच नहीं रहा, वो तय करता है कि एक गांव को रोड मिलेगी या नहीं। एक ब्यूरोक्रेट्स, जो कभी अस्पताल या स्कूल नहीं गया, वो तय करता है कि हेल्थ केयर या एजुकेशन पॉलिसी कैसे लागू होगी। यह 'लोकतंत्र नहीं, बल्कि 'ब्यूरोक्रेटिक डिक्टेटरशीप है, जहां ' सेलेक्टेड' लोग 'इलेक्टेड लोगों को कन्ट्रोल करते हैं। और इसका सबसे बड़ा नुकसान जनता को होता है, क्योंकि जब एकाउंटबिलिटी नहीं होती, तो भ्रष्टाचार, अकुशलता, और देरी बढ़ती हैं।
यह लेख सिर्फ एक 'आलोचना' नहीं, बल्कि एक 'कार्रवाई के लिए आह्वान' है। अगर भारत को सच्चाई में 'विकसित' बनाना है, तो सिर्फ रोड्स, ब्रिज, या GDP ग्रोथ से नहीं होगा, यह होगा ब्यूरोक्रेटिक सिस्टम को रिफॉर्म करके। लैटरल एंट्री को बढ़ाकर करना होगा, ताकि विशेषज्ञ सीधे वरिष्ठ पदों पर आ सकें। ब्यूरोक्रेट्स की जवाबदेही बढ़ानी होगी, ताकि वे चुने हुए जनप्रतिनिधियों के कंट्रोल में रहें, न कि उनके ऊपर।  'Transaction of Business Rules' को रिफॉर्म करना होगा, ताकि मंत्री को असली शक्ति मिले, न कि सिर्फ ''औपचारिक' स्टेटस। और सबसे जरूरी जनता को जागना होगा, और सवाल उठाना होगा कि 'कौन चला रहा है देश को चुनें हुए जनप्रतिनिधि या सिलेक्टेड ब्यूरोक्रेट्स?'  नहीं तो, यह 'ब्यूरोक्रेटिक डिक्टेटरशीप' जारी रहेगा और भारत का 'लोकतंत्र' सिर्फ एक 'शो पीस' बनकर रह जाएगा।
Rajesh R. Singh 




  ~विजय राजबली माथुर ©

 

Thursday, August 27, 2026

सत्ता की मलाई खाने का लालच. ------ गीता श्री




धर्म के पीछे पागल स्त्रियों को मनुस्मृति जरुर पढ़ना चाहिए, जरा उनके चेहरे देखूँगी. 😀
सिरहाने रख कर सो जाओ. 
वैसे भी उन स्त्रियों का कुछ नहीं हो सकता जो सत्ता से कुछ पा लेने के लालच में अपनी स्वतंत्रता गिरवी रखने को तैयार हैं. 
बड़ी मुश्किल से मुक्ति पाई थी, पितृसत्ता शिकार करती थी, और लंबे संघर्ष के बाद थोड़ी आज़ादी मिली है. 
कुछ स्त्रियाँ फिर से गूंगी गुडियाँ बन गई हैं. सत्ता की मलाई खाने का इतना लालच. 
हमारी पुरखिनों की लड़ाई को कमजोर मत करो बहनों. फिर सोने के पिंजरे में कैद होना है क्या? फिर भोग की वस्तु बनना है? 
ये लोग तुम्हारी आज़ादी छीन लेंगे. बोलने की, घूमने की, कपड़े पहनने की, बाहर निकलने की… 
तुमसे सिर्फ अपना झंडा उठाने को कहेंगे. पार्टी का, धर्म का झंडा. अपनी जय बोलने को कहेंगे. समझो इस साजिश को. 
मेरे कानों में लगातार एक धुन बज रही है… 
Smash patriarchy
पितृसत्तात्मक व्यवस्था का अंत हो !! इसकी अनुगामिनी बनना बंद करो. 










  ~विजय राजबली माथुर ©

Saturday, August 8, 2026

विपक्ष के मर्द और 'औरत सांसद/विधायक ग़ुलाम बनाए जाते हैं.. ------ कृष्णन अय्यर काँग्रेस



◆ नरिंदर मोदी और सायनी घोष, TMC सांसद, की रौनक और जलवा..अदा और अंदाज़ देखिए
~ भायो भैनों, अब क्या बताएं? एक हसीना थी, एक दीवाना था..ये बात फिल्मी है मगर हक़ीक़त का फ़साना था
◆ एक ज़माने में मिस स्मृति ईरानी ने नरिंदर मोदी से इस्ती'फ़ा मांगा था..मोदी के इस्ती'फ़ा नहीं देने की सूरत में स्मृति ने आमरण अनशन की धमकी दी थी
◆ मोदी ने स्मृति से मीटिंग की थी..और स्मृति का दिल मोदी के लिए प्यार, महब्बत, 'इज़्ज़त से सराबोर हो गया था..मोदी का जादू स्मृति पर चल गया था..
◆ इस के बा'द स्मृति ने वो सब हासिल किया था जो स्मृति ख़ाब में भी नहीं सोच सकती थी..स्मृति का बलिदान ही स्मृति की कामयाबी का रास्ता बना..
= क्या सायनी घोष, पश्चिम बंगाल की हॉट, इंटेलीजेंट, सुपरहिट एक्ट्रेस और ज़बरदस्त स्पीकर, भी स्मृति का इतिहास दोहराएगी? क्या सायनी भक्तों की "छोटी मेलोडी" बनेगी?
= सायनी घोष ने संसद से ले कर सड़क तक मोदी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया था..सायनी का हर भाषण वायरल हुआ था.
= मगर अब सायनी घोष मोदी के रंग में ख़ुद को रंग चुकी हैं..सायनी को मोदी में विकास दिख गया है..मोदी का जादू चल चुका है..
= पहले बादशाह जंग जीतने पर दुश्मन राजा के मर्द और 'औरतों को ग़ुलाम बना लेते थे..अब चुनाव जीतने पर विपक्ष के मर्द और 'औरत सांसद/विधायक ग़ुलाम बनाए जाते हैं..पुराना क़बीलाई रिवाज ही चल रहा है..
✋ सायनी को मोदी में विकास दिखा है तो सायनी का विकास भी लाज़िमी है..सायनी विकास के रास्ते पर चलेगी..मोदी के साथ मिल कर ख़ूब विकास करेगी..
👉 सायनी घोष, TMC सांसद? विकास? 😆😀
कंगना? विकास?
कृष्णन अय्यर काँग्रेस 









  ~विजय राजबली माथुर ©

Monday, July 20, 2026

अरुणा आसफ अली ------ Old is Gold Films's Post





भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे नाम हैं जिन्हें इतिहास की किताबों में कुछ पन्नों तक सीमित कर दिया गया, जबकि उनका योगदान किसी पूरे अध्याय से कम नहीं था। जब भी "भारत छोड़ो आंदोलन" की बात होती है, हमारे मन में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अन्य बड़े नेताओं की छवि उभरती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि 9 अगस्त 1942 की वह सुबह, जब लगभग पूरा कांग्रेस नेतृत्व अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार किया जा चुका था, तब एक महिला ने हजारों लोगों के सामने तिरंगा फहराकर पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दे दी थी। यही महिला थीं अरुणा आसफ अली।

उन्हें "भारत छोड़ो आंदोलन की नायिका", "1942 की रानी" और बाद में "Grand Old Lady of the Independence Movement" कहा गया। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान केवल तिरंगा फहराने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने महात्मा गांधी के सम्मान के बावजूद, जब उन्हें लगा कि उनका रास्ता अलग है, तब गांधी जी की सलाह तक मानने से इनकार कर दिया। आखिर ऐसी कौन-सी महिला थी, जिसने देश की आजादी के लिए अपना घर, संपत्ति, पहचान और वर्षों का जीवन दांव पर लगा दिया? यही कहानी है उस असाधारण व्यक्तित्व की, जिसे आज भी भारत पूरी तरह जान नहीं पाया है।

एक ऐसे परिवार में जन्म, जहाँ विचारों की आजादी विरासत थी

16 जुलाई 1909 को ब्रिटिश भारत के कालका (आज का हरियाणा) में जन्मी अरुणा गांगुली एक शिक्षित बंगाली ब्राह्मण परिवार से थीं। उनका परिवार ब्रह्म समाज से जुड़ा हुआ था, जो उस दौर में सामाजिक सुधार और आधुनिक विचारों का समर्थन करता था। उनके पिता उपेंद्रनाथ गांगुली एक व्यवसायी थे, जबकि माँ अंबालिका देवी प्रसिद्ध समाज सुधारक त्रैलोक्यनाथ सान्याल की पुत्री थीं।

उनका परिवार साहित्य, शिक्षा और समाज सुधार से गहराई से जुड़ा था। उनके चाचा धीरेंद्रनाथ गांगुली भारतीय सिनेमा के शुरुआती फिल्म निर्देशकों में गिने जाते हैं, जबकि दूसरे चाचा नागेंद्रनाथ गांगुली ने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बेटी मीरा देवी से विवाह किया था। उनकी बहन पूर्णिमा बनर्जी आगे चलकर भारत की संविधान सभा की सदस्य बनीं।

ऐसे वातावरण में पली-बढ़ी अरुणा ने बचपन से ही स्वतंत्र सोच, शिक्षा और सामाजिक न्याय के मूल्य सीखे। उन्होंने लाहौर के Sacred Heart Convent और नैनीताल के All Saints' College में शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे कोलकाता के गोखले मेमोरियल स्कूल में अध्यापिका बनीं। लेकिन शायद नियति ने उनके लिए केवल अध्यापन नहीं, बल्कि इतिहास लिखना तय कर रखा था।

एक ऐसा विवाह जिसने पूरे समाज को हिला दिया

इलाहाबाद में उनकी मुलाकात कांग्रेस नेता और प्रसिद्ध वकील आसफ अली से हुई। आसफ अली वही व्यक्ति थे जिन्होंने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का अदालत में बचाव किया था। वे अरुणा से लगभग 23 वर्ष बड़े थे और मुस्लिम थे।

1928 में दोनों ने विवाह करने का निर्णय लिया।

आज के समय में यह सामान्य लग सकता है, लेकिन उस दौर में यह फैसला सामाजिक विद्रोह से कम नहीं था। परिवार ने इस रिश्ते का तीखा विरोध किया। अरुणा के संरक्षक चाचा ने सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी कि उनके लिए अरुणा मर चुकी हैं और उन्होंने उनका श्राद्ध तक कर दिया।

लेकिन अरुणा ने समाज के डर के बजाय अपने विवेक की आवाज सुनी। यही साहस आगे चलकर उन्हें अंग्रेजी साम्राज्य के सामने भी अडिग खड़ा करने वाला था।

जब जेल उनके संघर्ष की पहली पाठशाला बनी

विवाह के बाद अरुणा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गईं और नमक सत्याग्रह सहित अनेक आंदोलनों में सक्रिय भाग लेने लगीं।

1931 में उन्हें गिरफ्तार किया गया। गांधी-इरविन समझौते के बाद अधिकांश राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया गया, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने अरुणा को छोड़ने से इनकार कर दिया। जेल की अन्य महिला कैदियों ने भी जेल छोड़ने से मना कर दिया और कहा कि यदि अरुणा नहीं जाएँगी तो वे भी नहीं जाएँगी।

आखिरकार जनता के दबाव और महात्मा गांधी के हस्तक्षेप के बाद उन्हें रिहा किया गया।

लेकिन उनका संघर्ष यहीं नहीं रुका।

1932 में उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया और तिहाड़ जेल भेजा गया। वहाँ राजनीतिक कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। उनके आंदोलन के बाद जेल प्रशासन को कई सुधार करने पड़े। हालांकि इसकी सजा उन्हें एकांत कारावास के रूप में मिली और बाद में अंबाला जेल भेज दिया गया।

9 अगस्त 1942... जब पूरा नेतृत्व जेल में था, तब एक महिला ने इतिहास बदल दिया

8 अगस्त 1942 को बंबई में कांग्रेस ने "भारत छोड़ो आंदोलन" का प्रस्ताव पारित किया। महात्मा गांधी ने "करो या मरो" का आह्वान किया।

ब्रिटिश सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए गांधी, नेहरू, पटेल और लगभग पूरे कांग्रेस नेतृत्व को रातोंरात गिरफ्तार कर लिया।

अंग्रेजों को लगा कि नेतृत्व खत्म होते ही आंदोलन भी खत्म हो जाएगा।

लेकिन वे अरुणा आसफ अली को भूल चुके थे।

9 अगस्त 1942 को बंबई के गोवालिया टैंक मैदान (आज का अगस्त क्रांति मैदान) में हजारों लोगों की भीड़ जमा थी। पुलिस चारों ओर तैनात थी। गिरफ्तारी और गोलियों का खतरा था।

ऐसे समय में अरुणा आसफ अली मंच पर पहुँचीं।

उन्होंने निर्भीक होकर तिरंगा फहराया।

यह केवल एक झंडा फहराने की घटना नहीं थी। यह संदेश था कि आंदोलन नेताओं की गिरफ्तारी से नहीं रुकेगा।

उस क्षण की तस्वीर पूरे भारत में प्रतिरोध का प्रतीक बन गई। अंग्रेजों के लिए यह खुली चुनौती थी और भारतीय युवाओं के लिए यह क्रांति का नया बिगुल।

जब अंग्रेजों ने उनकी हर चीज छीन ली, लेकिन उनका हौसला नहीं

तिरंगा फहराने के बाद अंग्रेजों ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया।

उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई।

घर और सामान नीलाम कर दिए गए।

उनके सिर पर इनाम घोषित किया गया।

लेकिन अरुणा गिरफ्तार नहीं हुईं।

वे भूमिगत हो गईं और लगभग चार वर्षों तक अंग्रेजों को चकमा देती रहीं। इसी दौरान उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर कांग्रेस की गुप्त पत्रिका "इंकलाब" का संपादन किया।

उनके लेख युवाओं को केवल भाषण सुनने के लिए नहीं, बल्कि क्रांति में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करते थे।

उन्होंने लिखा कि अब समय केवल बहस का नहीं, बल्कि कार्रवाई का है।

जब उन्होंने महात्मा गांधी की सलाह भी नहीं मानी

1946 में अरुणा लगातार भूमिगत जीवन जीते-जीते बेहद कमजोर हो चुकी थीं।

महात्मा गांधी ने उन्हें एक भावनात्मक पत्र लिखा।

उन्होंने कहा कि तुम्हारा साहस और बलिदान प्रेरणादायक है। अब सामने आकर आत्मसमर्पण कर दो। तुम्हारी गिरफ्तारी पर रखा गया इनाम हरिजन कल्याण में लगाया जा सकता है।

यह पत्र आज भी भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित पत्रों में गिना जाता है।

लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अरुणा ने गांधी जी की इस सलाह को स्वीकार नहीं किया।

उन्होंने निर्णय लिया कि जब तक अंग्रेज स्वयं उनके खिलाफ जारी वारंट वापस नहीं लेते, तब तक वे सामने नहीं आएँगी।

बाद में जब इनाम और वारंट दोनों वापस लिए गए, तभी उन्होंने सार्वजनिक जीवन में वापसी की।

यह घटना दिखाती है कि वे गांधी जी का सम्मान करती थीं, लेकिन अंधानुकरण नहीं।

आजादी के बाद भी खत्म नहीं हुआ उनका संघर्ष

1947 में देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन अरुणा का मिशन समाप्त नहीं हुआ।

उन्होंने महसूस किया कि राजनीतिक आजादी के बाद सामाजिक और आर्थिक न्याय की लड़ाई अभी बाकी है।

1948 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी का दामन थाम लिया।

कुछ वर्षों बाद वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से भी जुड़ीं, हालांकि 1956 में सोवियत संघ की राजनीतिक घटनाओं के बाद उन्होंने उससे भी दूरी बना ली।

उन्होंने जीवनभर वामपंथी सामाजिक सोच, मजदूर अधिकार, महिलाओं की भागीदारी और सामाजिक समानता के मुद्दों पर काम जारी रखा।

दिल्ली की पहली महिला मेयर बनने तक का सफर

1958 में अरुणा आसफ अली दिल्ली की पहली महिला मेयर चुनी गईं।

उन्होंने केवल राजनीति नहीं की बल्कि दिल्ली के विकास, नागरिक सुविधाओं, शिक्षा और सामाजिक कल्याण पर विशेष ध्यान दिया।

उन्होंने "Patriot" नामक दैनिक समाचार पत्र और "Link" साप्ताहिक पत्रिका की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पत्रकारिता को उन्होंने सत्ता की प्रशंसा का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आवाज माना।

महिलाओं, दलितों और समाज के वंचित वर्गों के लिए आजीवन संघर्ष

अरुणा आसफ अली का मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है।

वे दलितों, मजदूरों और गरीबों के अधिकारों के लिए लगातार आवाज उठाती रहीं।

उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण पर विशेष बल दिया।

दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने महिलाओं के लिए आरक्षण का खुलकर समर्थन नहीं किया। उनका विश्वास था कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ महिलाओं को कहीं अधिक मजबूत बनाएँगी।

उन्होंने अनियंत्रित औद्योगिकीकरण का भी विरोध किया क्योंकि उनका मानना था कि इससे पर्यावरण और समाज दोनों को नुकसान होगा।

सम्मान जिनसे बड़ी थी उनकी सादगी

अरुणा आसफ अली को जीवनभर अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले।

उन्हें International Lenin Peace Prize, Jawaharlal Nehru Award for International Understanding, Padma Vibhushan और मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया।

दिल्ली की एक प्रमुख सड़क अरुणा आसफ अली मार्ग उनके नाम पर है। उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया और दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल का नाम भी उनके नाम पर रखा गया।

लेकिन जिन लोगों ने उन्हें करीब से जाना, वे कहते हैं कि उन्हें पुरस्कारों से अधिक संतोष उस दिन मिला था, जब उन्होंने अंग्रेजों की आँखों में आँखें डालकर तिरंगा फहराया था।

क्यों आज भी अरुणा आसफ अली की कहानी अधूरी लगती है?

इतिहास में अक्सर वही चेहरे सबसे ज्यादा दिखाई देते हैं जो सत्ता के केंद्र में रहे। लेकिन कई बार असली परिवर्तन उन लोगों ने किया, जिन्होंने सबसे कठिन समय में नेतृत्व संभाला।

अरुणा आसफ अली उन्हीं लोगों में से एक थीं।



उन्होंने सामाजिक बंधनों को तोड़ा, अंतरधार्मिक विवाह किया, जेल की यातनाएँ झेलीं, भूख हड़ताल की, अंग्रेजों से वर्षों तक बचती रहीं, भूमिगत रहकर आंदोलन को जीवित रखा, गांधी जी से मतभेद होने पर भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और आजादी के बाद भी समाज के कमजोर वर्गों के लिए काम करती रहीं।

आज जब हम भारत छोड़ो आंदोलन को याद करते हैं, तो केवल 9 अगस्त 1942 का तिरंगा ही नहीं, बल्कि उस तिरंगे के पीछे खड़ी उस निर्भीक महिला को भी याद करना चाहिए जिसने साबित कर दिया था कि इतिहास केवल बड़े नेताओं से नहीं, बल्कि साहस से लिखा जाता है।

अरुणा आसफ अली का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा देशभक्त वही है जो परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय अपने सिद्धांतों पर अडिग रहकर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाए।

OLDISGOLDFILMS ऐसी ही भूली-बिसरी ऐतिहासिक हस्तियों की अनसुनी कहानियों को आपके सामने लाता रहेगा, ताकि इतिहास केवल याद न रहे, बल्कि समझा भी जाए।


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  ~विजय राजबली माथुर ©


Wednesday, July 15, 2026

क्योंकि वे कर नहीं सकते ------ Pankaj Kumar Singh / Shyam Singh



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मोदी प्रेस से क्यों डरते हैं?
यह ऐसा सवाल है जो पिछले बारह वर्षों से भारतीयों के ज़हन और सार्वजनिक चर्चा में तो प्रायः आता रहता है और अब इस पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी बातें हो रही हैं लेकिन जवाब किसी के पास नहीं है।
इसी मुद्दे पर Pankaj Kumar Singh की यह पोस्ट कुछ संकेत करती है, पढ़िए—
मोदी जी की चुप्पी के पीछे छिपा सच 
मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस इसलिए नहीं करते क्योंकि उन्हें पैसे देने वाले लोग उन्हें करने नहीं देते। यह सिर्फ़ एक इल्ज़ाम से कहीं ज़्यादा है। यह एक ऐसे 'स्ट्रक्चर' की पुष्टि है जो बहुत पहले से बना हुआ था और ज़्यादातर लोगों की सोच से कहीं ज़्यादा गहरा है।
(1). ACYPL ➤
यह सिर्फ़ 'ट्रेनिंग प्रोग्राम' नहीं, बल्कि 'रिक्रूटमेंट' की दीर्घकालिक योजना भी है।
मोदी ने 1993 में RSS के ग्रासरूट ऑर्गेनाइज़र (प्रचारक) के तौर पर यूनाइटेड स्टेट्स का दौरा किया, जिसे अमेरिकन काउंसिल ऑफ़ यंग पॉलिटिकल लीडर्स (ACYPL) ने होस्ट किया था। हालांकि, ACYPL सिर्फ़ एक एक्सचेंज प्रोग्राम नहीं था; इसे बड़े पैमाने पर CIA द्वारा विदेशी पॉलिटिकल टैलेंट को तैयार करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक फ्रंटल ऑर्गेनाइज़ेशन माना जाता था।
एक ज़रूरी बात यह है कि मोदी ने इसी दौरान यूरोप के कई हिस्सों का भी दौरा किया और उनकी यात्रा और रहने का खर्च विदेशी प्राइवेट कंपनियों ने उठाया। इसका मतलब है कि उनका 1993 का ट्रिप कोई इंडिपेंडेंट डिप्लोमैटिक एंगेजमेंट नहीं था, बल्कि एंगेजमेंट और कल्चर का एक स्ट्रक्चर्ड, बाहर से फंडेड प्रोसेस था। 
मोदी का नाम ACYPL की ऑफिशियल एल्युमनाई लिस्ट में है। 
जुलाइ 2026 में पाकिस्तानी मीडिया ने साफ तौर पर बताया कि ACYPL को आम तौर पर CIA का फ्रंट माना जाता है, एक ऐसा ऑर्गनाइज़ेशन जिसका इस्तेमाल CIA दुनिया भर में एसेट्स बनाने और भविष्य के लीडर्स को U.S. एजेंडा के साथ जोड़ने के लिए तैयार करने के लिए करती है।
मोदी सिर्फ CIA प्रोग्राम के एल्युमनाई नहीं थे। उन्होंने 1999 में युवा लीडर्स के लिए U.S. स्टेट डिपार्टमेंट के 'स्टडी ऑफ द U.S. इंस्टिट्यूट्स' (SUSI) प्रोग्राम में भी हिस्सा लिया था। नेशनल पॉलिटिकल स्टेज में आने से पहले उन्होंने कम से कम छह साल तक ट्रेनिंग ली।
 (2). 2014 ➤  CIA और मोसाद ने मोदी की जीत कैसे सुनिश्चित की—
2014 के चुनाव के नतीजे, जिसमें काँग्रेस पार्टी के साँसदों की संख्या 206 से घटकर 44 हो गई थी, वह 'नैचुरल मैंडेट' नहीं था।  काँग्रेस के पूर्व MP कुमार केतकर ने सबके सामने आरोप लगाया कि CIA और मोसाद ने काँग्रेस पार्टी की हार की साज़िश रची थी।
वजह? एक स्थिर, काँग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार भारत के फ़ैसले लेने में किसी भी बाहरी दखल को कम करेगी। इसलिए, उन्होंने एक गैर-कांग्रेसी बहुमत वाली सरकार बनाने का फ़ैसला किया, यह मानते हुए कि ऐसी लीडरशिप उनके फ़ायदे के लिए बेहतर होगी। खबर है कि मोसाद ने भारत के अलग-अलग राज्यों और चुनाव क्षेत्रों को कवर करते हुए डिटेल्ड पॉलिटिकल असेसमेंट डेटा इकट्ठा किया।
(3). ऐपस्टीन नेटवर्क मोसाद की शैडो डिप्लोमेसी ➤
'द न्यूयॉर्क टाइम्स' की रिपोर्ट्स ने सबसे गुप्त लेयर का खुलासा किया—
जेफ्री ऐपस्टीन ने भारत-इज़राइल सम्बंधों के स्ट्रेटेजिक मोड़ में एक अहम भूमिका निभाई।
ऐपस्टीन ने मोदी को सलाह दी कि वे इज़राइल से मिलिट्री और इंटेलिजेंस खरीद $2 बिलियन बढ़ा दें। ताकि रिश्ते मज़बूत हों और ह्वाइट हाउस का सपोर्ट मिल सके। मोदी के एक्शन लेने से पहले उन्होंने ट्रंप प्रशासन के कैबिनेट अपॉइंटमेंट और फॉरेन पॉलिसी में बदलाव के बारे में पहले से जानकारी शेयर की थी। ऐपस्टीन ने भारतीय अरबपति अनिल अंबानी को भी गाइड किया कि स्टीव बैनन, टॉम बैरक और जेरेड कुशनर जैसे ट्रंप के करीबी लोगों से कैसे जुड़े थे।
खास बात यह है कि ऐपस्टीन इस्राएली इंटेलिजेंस एजेंसी—मोसाद के लिए एक हाइ-लेवल ऑपरेटिव था। एक FBI मेमो में साफ तौर पर लिखा है, "ऐपस्टीन के इस्राएल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक के साथ करीबी रिश्ते थे और उन्होंने उसकी गाइडेंस में जासूसी की ट्रेनिंग ली थी।" 
बराक 2013 और 2017 के बीच 30 से ज़्यादा बार ऐपस्टीन के न्यूयॉर्क टाउन हाउस गए।
ऐपस्टीन ने मोदी और इस्राएली 'डीप स्टेट' के बीच एक कनेक्शन का काम किया। उसकी भूमिका पर्सनल क्रिमिनैलिटी से कहीं ज़्यादा थी; यह एक जियोपॉलिटिकल ऑपरेशन था।  
(4). मोसाद के तरीके RAW ने दोहराए ➤
दरअसल, इज़राइल ने जो टूल फ़िलिस्तीनियों पर नज़र रखने के लिए बनाए थे, उन्हें भारत ने अपने आलोचकों को टारगेट करने के लिए अपनाया। मोसाद ने दशकों में 'टारगेटेड एलिमिनेशन' का जो तरीका विकसित किया, जिसमें ईरानी न्यूक्लियर साइंटिस्ट की हत्या भी शामिल है, उसे भारत के रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) ने कनाडा के सबअर्ब में सिख एक्टिविस्ट को टारगेट करने के लिए दोहराया।
14 फरवरी, 2026 को, भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता ने मैनहट्टन फ़ेडरल कोर्ट में एक US-कैनेडियन सिख एक्टिविस्ट गुरपतवंत सिंह पन्नून की हत्या की साज़िश में शामिल होने का गुनाह कबूल किया और माना कि उसने एक भारतीय सरकारी कर्मचारी के कहने और कोऑर्डिनेशन पर काम किया। मोसाद के तरीकों को मोदी के ऑफ़िस के साथ भारत में सफ़लतापूर्वक 'एक्सपोर्ट' किया गया था, जो चेन ऑफ़ कमांड में सबसे ऊपर था।
(5). भारत इस्राएल के लिए एक 'प्रॉक्सी स्टेट' बन गया है ➤
मोदी प्रशासन असल में इस्राएल के लिए एक प्रॉक्सी स्टेट बन गया है, जिसमें भारतीय एजेंसियाँ ​​जासूसी के लिए इस्राएली टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रही हैं। RAW और मोसाद के बीच जो सहयोग 1980 के दशक में शुरू हुआ था, मोदी के राज में एक फॉर्मल डिफेंस और इंटेलिजेंस अलायंस में बदल गया है।
|• इज़राइली पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल राहुल गाँधी, कम से कम 40 पत्रकारों, सुप्रीम कोर्ट के जजों और चुनाव कमिश्नरों की निगरानी के लिए किया गया था।
|• भारत के सुप्रीम कोर्ट ने जाँचे गए 29 डिवाइस में से 5 में मैलवेयर पाया।
|• मोदी प्रशासन ने जाँच में सहयोग करने से इनकार कर दिया।
|• इस्राएल की डिफेंस एक्सपोर्ट कंट्रोल एजेंसी (DECA) ने पेगासस की बिक्री को मंज़ूरी दी।
सबसे बड़ा सच ➤
मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते क्योंकि वे कर नहीं सकते। वे जब एक बार बोलते हैं, तो ये सवाल उठने ज़रूरी हो जाते हैं—
• 2014 ➤ CIA और मोसाद ने काँग्रेस पार्टी की हार कैसे करवाई?
• ऐपस्टीन ➤ एक सिद्ध-दोषी सेक्स अपराधी और मोसाद के एसेट ने इस्राएल के प्रति भारत की विदेश नीति बनाने में भूमिका क्यों निभाई?
• पेगासस ➤ भारतीय पत्रकारों, जजों और विपक्षी नेताओं पर नज़र रखने के लिए इज़राइली स्पाइवेयर का इस्तेमाल क्यों किया गया?
• हत्याएं ➤ RAW ने विदेशों में हत्याओं के लिए मोसाद के टारगेटेड किलिंग के तरीके को क्यों कॉपी किया?
• प्रॉक्सी स्टेटस ➤ भारत इज़राइल के लिए प्रॉक्सी स्टेट क्यों बन गया है?
मोदी की चुप्पी सिर्फ़ एक कम्युनिकेशन स्टाइल नहीं है, यह उनकी असली पहचान छिपाने के लिए बनाया गया एक शील्डिंग मैकेनिज्म है। बोलना पूरे स्ट्रक्चर को एक्सपोज़ करना होगा और ऐसा वे कभी नहीं होने देंगे।♦️
#एकदा_जंबूद्वीपे 
फोटो—ACYPL की वेबसाइट से See less














  ~विजय राजबली माथुर ©