Thursday, April 28, 2022

प्रशांत किशोर जैसे राजनीतिक प्रबंधक इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि जनता को उसका सच पता नहीं चले ------ हेमंत कुमार झा

प्रशांत किशोर जैसे लोग इस तथ्य के प्रतीक हैं कि भारतीय राजनीति किस तरह जनता और उसकी वास्तविक समस्याओं से पलायन कर एक छद्म माहौल की रचना के सहारे वोटों की फसल काटने की अभ्यस्त होती जा रही है।
यह अकेले कोई भारत की ही बात नहीं है। चुनाव अब एक राजनीतिक प्रक्रिया से अधिक प्रबंधन का खेल बन गया है और यह खेल अमेरिका से लेकर यूरोप के देशों तक में खूब खेला जाने लगा है।
ऐसा प्रबंधन, जिसमें मतदाताओं को अपने पाले में लाने के लिये भ्रम की कुहेलिका रची जाती है, छद्म नायकों का निर्माण किया जाता है और उनमें जीवन-जगत के उद्धारक की छवि देखने के लिये जनता को प्रेरित किया जाता है।
दुनिया में कितनी सारी कंपनियां हैं जो राजनीतिक दलों को चुनाव लड़वाने का ठेका लेती हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव हो या ब्राजील, तुर्की से लेकर सुदूर फिलीपींस के राष्ट्रपति का चुनाव हो, इन कंपनियों ने नेताओं का ठेका लेकर जनता को भ्रमित करने में अपनी जिस कुशलता का परिचय दिया है उसने राजनीति को प्रवृत्तिगत स्तरों पर बदल कर रख दिया है।
जैसे, बाजार में कोई नया प्रोडक्ट लांच होता है तो उसकी स्वीकार्यता बढाने के लिये पेशेवर प्रबंधकों की टीम तरह-तरह के स्लोगन लाती है। ये स्लोगन धीरे-धीरे लोगों के अचेतन में प्रवेश करने लगते हैं और उन्हें लगने लगता है कि यह नहीं लिया तो जीवन क्या जिया।
भारत में नरेंद्र मोदी राजनीति की इस जनविरोधी प्रवृत्ति की पहली उल्लेखनीय पैदावार हैं जिनकी छवि के निर्माण के लिये न जाने कितने अरब रुपये खर्च किये गए और स्थापित किया गया कि मोदी अगर नहीं लाए गए तो देश अब गर्त्त में गया ही समझो।
प्रशांत किशोर इस मोदी लाओ अभियान के प्रमुख रणनीतिकारों में थे। तब उन्होंने मोदी की उस छवि के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था जो राष्ट्रवाद, विकासवाद और हिंदूवाद के घालमेल के सहारे गढ़ी गई थी।
सूचना क्रांति के विस्तार ने प्रशांत किशोर जैसों की राह आसान की क्योंकि जनता से सीधे संवाद के नए और प्रभावी माध्यमों ने प्रोपेगेंडा रचना आसान बना दिया था।
अच्छे दिन, दो करोड़ नौकरियाँ सालाना, चाय पर चर्चा, महंगाई पर लगाम, मोदी की थ्रीडी इमेज के साथ चुनावी सभाएं आदि का छद्म रचने में प्रशांत किशोर की बड़ी भूमिका मानी जाती है।
वही किशोर अगले ही साल "बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है" का स्लोगन लेकर बिहार विधानसभा चुनाव में मोदी की पार्टी के विरोध में चुनावी व्यूह रचना करते नजर आए।
दरअसल, ठेकेदारों या प्रबंधन कार्मिकों की अपनी कोई विचारधारा नहीं होती। हो भी नहीं सकती और न ही इसकी जरूरत है। वे जिसका काम कर रहे होते हैं उसके उद्देश्यों के लिए सक्रिय होते हैं।
कभी प्रशांत किशोर मोदी की चुनावी रणनीति बनाने के क्रम में राष्ट्रवाद का संगीत बजा रहे थे, बाद के दिनों में ममता बनर्जी के लिये काम करने के दौरान बांग्ला उपराष्ट्रवाद की धुनें बजाते बंगाली भावनाओं को भड़काने के तमाम जतन कर रहे थे। कोई आश्चर्य नहीं कि तमिलनाडु में स्टालिन के लिये काम करने के दौरान वे उन्हें हिंदी के विरोध, सवर्ण मानस से परिचालित भाजपा के हिंदूवाद के विरोध के फायदे समझाएं। जब जैसी रुत, तब तैसी धुन।
बार-बार चर्चा की लहरें उठती हैं और फिर चर्चाओं के समंदर में गुम हो जाती हैं कि प्रशांत किशोर देश की सबसे पुरानी पार्टी की जर्जर संरचना को नया जीवन, नया जोश देने का ठेका ले रहे हैं। मुश्किल यह खड़ी हो जा रही है कि अब वे ठेकेदारी से आगे बढ़ कर अपनी ऐसी राजनीतिक भूमिका भी तलाशने लगे हैं जो किसी भी दल के खुर्राट राजनीतिज्ञ उन्हें आसानी से नहीं देंगे।
प्रशांत किशोर, उनकी आई-पैक कंपनी या इस तरह की दुनिया की अन्य किसी भी कंपनी की बढ़ती राजनीतिक भूमिका राजनीति में विचारों की भूमिका के सिमटते जाने का प्रतीक है।
जहां छद्म धारणाओं के निर्माण के सहारे मतदाताओं की राजनीतिक चेतना पर कब्जे की कोशिशें होंगी वहां जनता के जीवन से जुड़े वास्तविक मुद्दे नेपथ्य में जाएंगे ही।
टीवी और इंटरनेट ने दुनिया में बहुत तरह के सकारात्मक बदलाव लाए हैं। कह सकते हैं कि एक नई दुनिया ही रच दी गई है, लेकिन राजनीति पर इसके नकारात्मक प्रभाव ही अधिक नजर आए। अब प्रोपेगेंडा करना बहुत आसान हो गया और उसे जन मानस में इंजेक्ट करना और भी आसान।
जिस तरह कम्प्यूटर के माध्यम से किसी बौने को बृहदाकार दिखाना आसान हो गया उसी तरह किसी कल्पनाशून्य राजनीतिज्ञ को स्वप्नदर्शी बताना भी उतना ही आसान हो गया।
चुनाव प्रबंधन करने वाली कम्पनियों की सफलताओं ने राजनीति को जनता से विमुख किया है और नेताओं के मन में यह बैठा दिया है कि वे चाहे जितना भी जनविरोधी कार्य करें, उन्हें जनोन्मुख साबित करने के लिये कोई कंपनी चौबीस घन्टे, सातों दिन काम करती रहेगी।
डोनाल्ड ट्रम्प का राष्ट्रपति बनना, ब्राजील के बोल्सेनारो का शिखर तक पहुंचना, तुर्की में एर्दोआन का राष्ट्रनायक की छवि ओढ़ना, फिलीपींस में रोड्रिगो दुतेरते का जरूरत से अधिक बहादुर नजर आना...ये तमाम उदाहरण इन छवि निर्माण कंपनियों की बढ़ती राजनीतिक भूमिका को साबित करते हैं। ट्रम्प अगले चुनाव में हारते-हारते भी कांटे की टक्कर दे गए और आज तक कह रहे हैं कि दरअसल जीते वही हैं।
अपने मोदी जी की ऐसी महिमा तो अपरम्पार है। वे एक से एक जनविरोधी कदम उठाते हैं और प्रचार माध्यम सिद्ध करने में लग जाते हैं कि जनता की भलाई इसी में है, कि यही है मास्टर स्ट्रोक, जो अगले कुछ ही वर्षों में भारत को न जाने कितने ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बना देगा
तभी तो, दुनिया के सबसे अधिक कुपोषितों से भरे देश में 80 करोड़ निर्धन लोगों के मुफ्त अनाज पर निर्भर रहने के बावजूद देशवासियों को रोज सपने दिखाए जाते हैं कि भारत अब अगली महाशक्ति बनने ही वाला है।
उससे भी दिलचस्प यह कि शिक्षा को कारपोरेट के हवाले करने के प्रावधानों से भरी नई शिक्षा नीति के पाखंडी पैरोकार यह बताते नहीं थक रहे कि भारत अब 'फिर से' विश्वगुरु के आसन पर विराजमान होने ही वाला है।
प्रशांत किशोर जैसे राजनीतिक प्रबंधक इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि जनता को उसका सच पता नहीं चले बल्कि जनता उसी को सच माने जो उनकी कंपनी के क्लाइंट नेता समझाना चाहें।
अमेरिका, यूरोप, तुर्की आदि तो धनी और साधन संपन्न हैं भारत के मुकाबले। वहां की जनता अगर राजनीतिक शोशेबाजी में ठगी की शिकार होती भी है तो उसके पास बहुत कुछ बचा रह जाता है। लेकिन भारत में ऐसे प्रबंधकों ने जिस तरह की राजनीतिक संस्कृति विकसित की है उसमें जनता ठगी की शिकार हो कर बहुत कुछ खो देती है। देश ने बड़े पैमाने पर सार्वजनिक संपत्तियों को निजी हाथों में जाते देखा, गलत नीतियों के दुष्प्रभाव से करोड़ों लोगों को बेरोजगार होते देखा, गरीबों की जद से शिक्षा को और दूर, और दूर जाते देखा, मध्यवर्गियों को निम्न मध्यवर्गीय जमात में गिरते देखा, निम्नमध्यवर्गियों को गरीबों की कतार में शामिल हो मुफ्त राशन की लाइन में लगते देखा...न जाने क्या-क्या देख लिया, लेकिन, अधिसंख्य नजरें इन सच्चाइयों को नजरअंदाज कर उन छद्म स्वप्नों के संसार मे भटक रही हैं जहां अगले 15 वर्षों में अखंड भारत का स्वप्न साकार होना है, उसी के समानांतर हिन्दू राष्ट्र की रचना होनी है और...यह सब होते होते उस महान स्वप्न तक पहुंचना है, जिसे 'राम राज्य' कहते हैं, जहां होगा 'सबका साथ, सबका विकास'।

  ~विजय राजबली माथुर ©


Monday, March 28, 2022

100 प्रतिशत वीवीपैट पर्चियों की गणना मतपत्रों की गणना जैसा ही ------ संदीप पांडेय



                                                                                 संदीप पांडेय

  

हालांकि योगी आदियनाथ दोबारा मुख्यमंत्री बन गए हैं लेकिन 2022 के उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव के परिणाम संदेहास्पद हैं। चुनाव अभियान के दौरान उ.प्र. में एक बदलाव की लहर दिखाई पड़ रही थी। लोग भाजपा सरकार की विदाई की बात कर रहे थे। यादव व मुस्लिम, दो समुदाय जो मजबूती के साथ समाजवादी पार्टी के साथ खड़े थे। इसके अलावा भी लोग अखिलेश यादव को पुनः मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाह रहे थे, जिनकी जनसभाओं में योगी व मोदी से ज्यादा भीड़ जुट रही थी। किंतु परिणाम जनता की अपेक्षाओं के विपरीत निकले।

विश्वास नहीं होता कि लखीमपुर खीरी में जहां केन्द्रीय मंत्री अजय मिश्र टेनी के लड़के ने पांच लोगों के ऊपर गाड़ी चढ़ाई हो, जहां किसान नेता राकेश टिकैत कि चेतावनी पर मंत्री महोदय एक चीनी मिल का उद्घाटन करने तक न जा सकें, उन्हें चुनाव के दौरान भारी केन्दीय बल की सुरक्षा में मतदान करना पड़ता हो और जहां उनके बेटे आशीष मिश्र को जमानत मिलने से लोगों में रोष हो। वहां भारतीय जनता पार्टी को सभी आठ विधान सभा क्षेत्रों में सफलता मिल जाए।

इसी तरह हाथरस सुरक्षित विधान सभा क्षेत्र में पिछले साल जिले में एक दलित लड़की के साथ जघन्य बलात्कार, अस्पताल में कुछ दिनों के बाद उसकी मृत्यु, पुलिस द्वारा मृत शरीर को परिवार को सौंपने के बजाए तड़के सुबह जला दिया जाना और ऐसा प्रतीत होना कि प्रशासन चार सवर्ण आरोपियों को बचाने में लगा हुआ हो, के कारण लोगों में रोष था लेकिन यहां भी भाजपा ही जीती।

किसान आंदोलन का तो पश्चिमी उ.प्र. में साफ असर था। इतना कि कुछ गावों में तो भाजपा के प्रत्याशी प्रचार के लिए भी नहीं जा सकते थे। ऐसा माना जा रहा था कि प्रथम चरण में पश्चिमी उ.प्र. में ही भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ेगा और यहां डूबने के बाद शेष चरणों में भाजपा फिर उबर नहीं पाएगी।

चुनाव से तुरंत पहले एक बी.एड. की हुई लड़की शिखा पाल लखनऊ में शिक्षा निदेशालय परिसर में पानी की टंकी पर डेढ़ सौ दिनों से ऊपर चढ़ी हुई थी। उसकी मांग थी कि शिक्षा विभाग में रिक्त पद सरकार के मानक पूरे कर चुके अभ्यार्थियों द्वारा भरे जाएं। एम्बुलेंस चालक, जिन्हें करोना काल में देवतुल्य बताया गया व जिनके ऊपर प्रदेश सरकार ने हेलिकाॅपटर से फूलों की वर्षा करवाई, जिस कम्पनी के लिए ठेके पर काम कर रहे थे का सरकार के साथ अनुबंध समाप्त हो जाने पर नौकरी से निकाल दिए गए थे और वे विरोध प्रदशन कर रहे थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े मजदूर संगठन भारतीय मजदूर संघ के हस्तक्षेप के बावजूद भी उनकी एक न सुनी गई। हम यह कैसे मान लें कि रेलवे भर्ती प्रक्रिया विवाद में छात्रों के ऊपर पुलिस के बर्बर तरीके से लाठी बरसाने के बाद छात्र या उनके परिवार भाजपा का समर्थन कर सकते हैं? चुनाव से तुरंत पहले नवजवानों व नवयुवतियों में सरकार के खिलाफ रोजगार के मुद्दे पर जबरदस्त गुस्सा था।

दो चीजें जो सरकार के पक्ष में दिखाई पड़ रही थीं वे थीं मुफ्त राशन व किसान सम्मान निधि योजना। किंतु चौथे चरण के मतदान से पहले ही उ.प्र. में खुले पशुओं का मुद्दा उठ गया। नरेन्द मोदी को उन्नाव की एक सभा में कहना पड़ा कि यदि भाजपा पुनः सत्ता में आती है तो वह किसानों से गोबर खरीदेगी और योगी आदित्यनाथ को घोषणा करनी पड़ी कि प्रति पशु प्रति माह वे रु. 900 देंगे ताकि अनुपयोगी पशु को बांधने में किसान पर खर्च का बोझ न पड़े। खुला पशु तो 2017 में ही योगी आदित्यनाथ के पहली बार मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद ही मुद्दा बन गया था किंतु भाजपा ने किसी तरह 2019 के संसदीय चुनाव में इस मुद्दे को उभरने नहीं दिया। लेकिन इस बार भाजपा ऐसा कर पाने में सफल नहीं रही। अब लोगों को यह समझ में आ रहा है कि साल में तीन बार रु. 2000 किसान सम्मान निधि व मुफ्त राशन तो असल में किसानों की जो फसल खुले पशुओं द्वारा तबाह की जा रही है उसका मुआवज़ा है। किसान को सारी रात जग कर अपनी फसलों को खुले पशुओं से बचाना पड़ रहा है।

सवाल यह है कि जब माहौल भाजपा के खिलाफ था तो वह चुनाव कैसे जीत गई? क्या ई.वी.एम. के साथ छेड़-छाड़ की गई? अथवा सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से उसने चुनाव जीता?

10 मार्च की मतगणना से पहले एक या दो दिनों में आजमगढ़, प्रयागराज, बरेली, सोनभद्र, संत कबीर नगर व वाराणसी जैसे कई जिलों में ज्यादातर जगहों पर सरकारी वाहनों में मतपत्र व ई.वी.एम. पकड़े गए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से मतपत्र या ई.वी.एम. बदले जाने का काम बड़े पैमाने पर हुआ है, उपरोक्त तो सिर्फ वे स्थान हैं जहां सरकार के साथ सहानुभूति न रखने वाले किसी सरकारी कर्मचारी ने ही हेराफेरी की जानकारी सार्वजनिक कर दी होगी। सरकारी अधिकारियों की मदद से मतपत्र पहले बदले जाते रहे हैं। तो ई.वी.एम. बदले जाने का काम भी किया ही जा सकता है। इस बार कहीं-कहीं मतगणना स्थल से ये खबर मिली है कि कुछ ई.वी.एम. 99 प्रतिशत तक चार्ज थीं जिनमें भाजपा के पक्ष में ज्यादा मत निकले हैं बनिस्पत उनके जो सिर्फ 60-70 प्रतशत ही चार्ज थीं। क्या ये सम्भव नहीं है कि ज्यादा चार्ज वालीे ई.वी.एम. बदली हुई मशीनें थीं?

29 विधान सभा क्षेत्र ऐसे हैं जहां जीत-हार का अंतर 2000 मतों से कम रहा है और इनमें से 19 क्षेत्रों में भाजपा जीती है। जहां जीत-हार का अंतर 1000 मतों से भी कम था उन सभी क्षेत्रों में डाक मतपत्रों की संख्या जीत-हार के अंतर से ज्यादा है। इन जगहों पर तो बिना ई.वी.एम. को हाथ लगाए सिर्फ डाक मतपत्रों में ही हेरी-फेरी कर चुनाव के परिणाम को प्रभावित किया जा सकता है। उदाहरण के लिए बाराबंकी के कुर्सी विधान सभा क्षेत्र में सपा प्रत्याशी राकेश वर्मा को विजयी घोषित किया गया। जितनी देर में वे अपने स्वर्गीय पिता बेनी प्रसाद वर्मा की मूर्ति पर माला पहना कर आए तो उन्हें बताया गया कि भाजपा प्रत्याशी सकेन्द्र प्रताप 217 मतों से जीत गए हैं। यहां डाक मतपत्रों की संख्या 618 है।

यदि जनता के दिमाग में गड़बड़ी के किसी संदेह को दूर करना है तो, अभी भी, भारत के चुनाव आयोग को सभी मतदान केन्द्रों की सभी ई.वी.एम. से निकली वीवीपैट पर्चियों की गिनती कर यह जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। वर्तमान में यह प्रावधान है कि हरेक विधान सभा के पांच मतदान केन्द्रों की ही वीवीपैट से निकली पर्चियों की गिनती होती है और उसका मिलान ई.वी.एम. से निकले परिणाम से किया जाता है। लेकिन कभी भी अखबार में इस मिलान की कोई खबर पढ़ने को नहीं मिलती। चुनाव आयोग को इस प्रक्रिया में और पारदर्शिता लाने की जरूरत है और 100 प्रतिशत पर्चियों की गिनती करनी चाहिए। इससे वे लोग भी संतुष्ट होंगे जो मतपत्रों पर वापस लौटने की मांग कर रहे हैं क्योंकि 100 प्रतिशत वीवीपैट पर्चियों की गणना मतपत्रों की गणना जैसा ही हो जाएगा।

(संदीप पांडेय मैगसेसे पुरस्कार विजेता और सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।)





  ~विजय राजबली माथुर ©

Tuesday, January 25, 2022

बीजू पटनायक ----- गौरव पुंडीर

 





इंदिरा गाँधी को बोला था कि 
'मैं तुम्हें कटक की गलियों में नचवा सकता हूँ..'
भारत के एकमात्र ऐसे व्यक्ति बीजू पटनायक है जिनके निधन पर उनके पार्थिव शरीर को 3 देशों के राष्ट्रीय ध्वज में लपेटा गया था भारत रूस और इंडोनेशिया.
बीजू पटनायक पायलट थे और जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ संकट में गिर गया था तब उन्होंने लड़ाकू विमान डकोटा उड़ा कर हिटलर की सेनाओं पर काफी बमबारी की थी जिससे हिटलर पीछे हटने को मजबूर हो गया था 
उनकी इस बहादुरी पर उन्हें सोवियत संघ का सर्वोच्च पुरस्कार भी दिया गया था और उन्हें सोवियत संघ ने अपनी नागरिकता प्रदान की थी।
कश्मीर पर जब कवालियों ने आक्रमण किया था तब बीजू पटनायक थे जो प्लेन उड़ा कर दिन में कई चक्कर दिल्ली से श्रीनगर का लगाए थे और सैनिकों को श्रीनगर पहुँचाए थे।
इंडोनेशिया कभी डच यानी हालैंड का उपनिवेश था और डच ने इंडोनेशिया के काफी बड़े इलाके पर कब्जा किया था और इंडोनेशिया के आसपास के सारे समुद्र को डच कंट्रोल करते थे और वह किसी भी इंडोनेशियन नागरिक को बाहर नहीं जाने देते थे।
उस वक्त इंडोनेशिया के प्रधानमंत्री सजाहरीर को एक कांफ्रेंस में हिस्सा लेने के लिए भारत आना था लेकिन डच ने इसकी इजाजत नहीं दिया।
इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो ने भारत से मदद माँगी और इंडोनेशिया के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने बीजू पटनायक से मदद माँगी। बीजू पटनायक और उनकी पत्नी ने अपनी जान की परवाह किए बगैर एक डकोटा प्लेन लेकर डच के कंट्रोल एरिया के ऊपर से उड़ान भरते हुए उतरे और बेहद बहादुरी का परिचय देकर इंडोनेशिया के प्रधानमंत्री को सिंगापुर होते हुए सुरक्षित भारत लाया। 
इससे इंडोनेशिया के लोगों में एक असीम ऊर्जा का संचार हुआ और उन्होंने डच सैनिकों पर धावा बोला और इंडोनेशिया एक पूर्ण  आजाद देश बना।
बाद में इंडोनेशिया के राष्ट्रपति सुकर्णो की बेटी हुई तब उन्होंने उसका नामकरण करने के लिए बीजू पटनायक और उनकी पत्नी को बुलाया था और बीजू पटनायक और उनकी पत्नी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति की बेटी का नाम  मेघवती रखा था। 
इंडोनेशिया ने बीजू पटनायक और उनकी पत्नी को अपने देश की आनरेरी  नागरिकता दिया था।
बीजू पटनायक के निधन के बाद इंडोनेशिया में 7 दिनों का राजकीय शोक मनाया गया था और रूस में 1दिन के लिए मनाया गया था सारे झंडे झुका दिए गए थे।
इंदिरा गाँधी कभी भी बीजू पटनायक की इज्जत नहीं करती थी जबकि इंदिरा गाँधी को यह पता था कि बीजू पटनायक की इज्जत नेहरू कितनी करते थे। बीजू पटनायक को परेशान करने के लिए इंदिरा गाँधी ने पूरी ताकत लगा दी थी और तब बीजू पटनायक ने कहा था कि 
'मैं तुम्हें कटक की गलियों में नचवा सकता हूँ।'
गौरव पुंडीर






 ~विजय राजबली माथुर ©