Monday, July 20, 2026

अरुणा आसफ अली ------ Old is Gold Films's Post





भारत के स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे नाम हैं जिन्हें इतिहास की किताबों में कुछ पन्नों तक सीमित कर दिया गया, जबकि उनका योगदान किसी पूरे अध्याय से कम नहीं था। जब भी "भारत छोड़ो आंदोलन" की बात होती है, हमारे मन में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल और अन्य बड़े नेताओं की छवि उभरती है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि 9 अगस्त 1942 की वह सुबह, जब लगभग पूरा कांग्रेस नेतृत्व अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार किया जा चुका था, तब एक महिला ने हजारों लोगों के सामने तिरंगा फहराकर पूरे ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दे दी थी। यही महिला थीं अरुणा आसफ अली।

उन्हें "भारत छोड़ो आंदोलन की नायिका", "1942 की रानी" और बाद में "Grand Old Lady of the Independence Movement" कहा गया। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान केवल तिरंगा फहराने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने महात्मा गांधी के सम्मान के बावजूद, जब उन्हें लगा कि उनका रास्ता अलग है, तब गांधी जी की सलाह तक मानने से इनकार कर दिया। आखिर ऐसी कौन-सी महिला थी, जिसने देश की आजादी के लिए अपना घर, संपत्ति, पहचान और वर्षों का जीवन दांव पर लगा दिया? यही कहानी है उस असाधारण व्यक्तित्व की, जिसे आज भी भारत पूरी तरह जान नहीं पाया है।

एक ऐसे परिवार में जन्म, जहाँ विचारों की आजादी विरासत थी

16 जुलाई 1909 को ब्रिटिश भारत के कालका (आज का हरियाणा) में जन्मी अरुणा गांगुली एक शिक्षित बंगाली ब्राह्मण परिवार से थीं। उनका परिवार ब्रह्म समाज से जुड़ा हुआ था, जो उस दौर में सामाजिक सुधार और आधुनिक विचारों का समर्थन करता था। उनके पिता उपेंद्रनाथ गांगुली एक व्यवसायी थे, जबकि माँ अंबालिका देवी प्रसिद्ध समाज सुधारक त्रैलोक्यनाथ सान्याल की पुत्री थीं।

उनका परिवार साहित्य, शिक्षा और समाज सुधार से गहराई से जुड़ा था। उनके चाचा धीरेंद्रनाथ गांगुली भारतीय सिनेमा के शुरुआती फिल्म निर्देशकों में गिने जाते हैं, जबकि दूसरे चाचा नागेंद्रनाथ गांगुली ने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की बेटी मीरा देवी से विवाह किया था। उनकी बहन पूर्णिमा बनर्जी आगे चलकर भारत की संविधान सभा की सदस्य बनीं।

ऐसे वातावरण में पली-बढ़ी अरुणा ने बचपन से ही स्वतंत्र सोच, शिक्षा और सामाजिक न्याय के मूल्य सीखे। उन्होंने लाहौर के Sacred Heart Convent और नैनीताल के All Saints' College में शिक्षा प्राप्त की। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे कोलकाता के गोखले मेमोरियल स्कूल में अध्यापिका बनीं। लेकिन शायद नियति ने उनके लिए केवल अध्यापन नहीं, बल्कि इतिहास लिखना तय कर रखा था।

एक ऐसा विवाह जिसने पूरे समाज को हिला दिया

इलाहाबाद में उनकी मुलाकात कांग्रेस नेता और प्रसिद्ध वकील आसफ अली से हुई। आसफ अली वही व्यक्ति थे जिन्होंने भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का अदालत में बचाव किया था। वे अरुणा से लगभग 23 वर्ष बड़े थे और मुस्लिम थे।

1928 में दोनों ने विवाह करने का निर्णय लिया।

आज के समय में यह सामान्य लग सकता है, लेकिन उस दौर में यह फैसला सामाजिक विद्रोह से कम नहीं था। परिवार ने इस रिश्ते का तीखा विरोध किया। अरुणा के संरक्षक चाचा ने सार्वजनिक रूप से घोषणा कर दी कि उनके लिए अरुणा मर चुकी हैं और उन्होंने उनका श्राद्ध तक कर दिया।

लेकिन अरुणा ने समाज के डर के बजाय अपने विवेक की आवाज सुनी। यही साहस आगे चलकर उन्हें अंग्रेजी साम्राज्य के सामने भी अडिग खड़ा करने वाला था।

जब जेल उनके संघर्ष की पहली पाठशाला बनी

विवाह के बाद अरुणा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गईं और नमक सत्याग्रह सहित अनेक आंदोलनों में सक्रिय भाग लेने लगीं।

1931 में उन्हें गिरफ्तार किया गया। गांधी-इरविन समझौते के बाद अधिकांश राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया गया, लेकिन ब्रिटिश सरकार ने अरुणा को छोड़ने से इनकार कर दिया। जेल की अन्य महिला कैदियों ने भी जेल छोड़ने से मना कर दिया और कहा कि यदि अरुणा नहीं जाएँगी तो वे भी नहीं जाएँगी।

आखिरकार जनता के दबाव और महात्मा गांधी के हस्तक्षेप के बाद उन्हें रिहा किया गया।

लेकिन उनका संघर्ष यहीं नहीं रुका।

1932 में उन्हें फिर गिरफ्तार किया गया और तिहाड़ जेल भेजा गया। वहाँ राजनीतिक कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के विरोध में उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। उनके आंदोलन के बाद जेल प्रशासन को कई सुधार करने पड़े। हालांकि इसकी सजा उन्हें एकांत कारावास के रूप में मिली और बाद में अंबाला जेल भेज दिया गया।

9 अगस्त 1942... जब पूरा नेतृत्व जेल में था, तब एक महिला ने इतिहास बदल दिया

8 अगस्त 1942 को बंबई में कांग्रेस ने "भारत छोड़ो आंदोलन" का प्रस्ताव पारित किया। महात्मा गांधी ने "करो या मरो" का आह्वान किया।

ब्रिटिश सरकार ने तुरंत कार्रवाई करते हुए गांधी, नेहरू, पटेल और लगभग पूरे कांग्रेस नेतृत्व को रातोंरात गिरफ्तार कर लिया।

अंग्रेजों को लगा कि नेतृत्व खत्म होते ही आंदोलन भी खत्म हो जाएगा।

लेकिन वे अरुणा आसफ अली को भूल चुके थे।

9 अगस्त 1942 को बंबई के गोवालिया टैंक मैदान (आज का अगस्त क्रांति मैदान) में हजारों लोगों की भीड़ जमा थी। पुलिस चारों ओर तैनात थी। गिरफ्तारी और गोलियों का खतरा था।

ऐसे समय में अरुणा आसफ अली मंच पर पहुँचीं।

उन्होंने निर्भीक होकर तिरंगा फहराया।

यह केवल एक झंडा फहराने की घटना नहीं थी। यह संदेश था कि आंदोलन नेताओं की गिरफ्तारी से नहीं रुकेगा।

उस क्षण की तस्वीर पूरे भारत में प्रतिरोध का प्रतीक बन गई। अंग्रेजों के लिए यह खुली चुनौती थी और भारतीय युवाओं के लिए यह क्रांति का नया बिगुल।

जब अंग्रेजों ने उनकी हर चीज छीन ली, लेकिन उनका हौसला नहीं

तिरंगा फहराने के बाद अंग्रेजों ने उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया।

उनकी संपत्ति जब्त कर ली गई।

घर और सामान नीलाम कर दिए गए।

उनके सिर पर इनाम घोषित किया गया।

लेकिन अरुणा गिरफ्तार नहीं हुईं।

वे भूमिगत हो गईं और लगभग चार वर्षों तक अंग्रेजों को चकमा देती रहीं। इसी दौरान उन्होंने डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर कांग्रेस की गुप्त पत्रिका "इंकलाब" का संपादन किया।

उनके लेख युवाओं को केवल भाषण सुनने के लिए नहीं, बल्कि क्रांति में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित करते थे।

उन्होंने लिखा कि अब समय केवल बहस का नहीं, बल्कि कार्रवाई का है।

जब उन्होंने महात्मा गांधी की सलाह भी नहीं मानी

1946 में अरुणा लगातार भूमिगत जीवन जीते-जीते बेहद कमजोर हो चुकी थीं।

महात्मा गांधी ने उन्हें एक भावनात्मक पत्र लिखा।

उन्होंने कहा कि तुम्हारा साहस और बलिदान प्रेरणादायक है। अब सामने आकर आत्मसमर्पण कर दो। तुम्हारी गिरफ्तारी पर रखा गया इनाम हरिजन कल्याण में लगाया जा सकता है।

यह पत्र आज भी भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित पत्रों में गिना जाता है।

लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि अरुणा ने गांधी जी की इस सलाह को स्वीकार नहीं किया।

उन्होंने निर्णय लिया कि जब तक अंग्रेज स्वयं उनके खिलाफ जारी वारंट वापस नहीं लेते, तब तक वे सामने नहीं आएँगी।

बाद में जब इनाम और वारंट दोनों वापस लिए गए, तभी उन्होंने सार्वजनिक जीवन में वापसी की।

यह घटना दिखाती है कि वे गांधी जी का सम्मान करती थीं, लेकिन अंधानुकरण नहीं।

आजादी के बाद भी खत्म नहीं हुआ उनका संघर्ष

1947 में देश स्वतंत्र हुआ, लेकिन अरुणा का मिशन समाप्त नहीं हुआ।

उन्होंने महसूस किया कि राजनीतिक आजादी के बाद सामाजिक और आर्थिक न्याय की लड़ाई अभी बाकी है।

1948 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर सोशलिस्ट पार्टी का दामन थाम लिया।

कुछ वर्षों बाद वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से भी जुड़ीं, हालांकि 1956 में सोवियत संघ की राजनीतिक घटनाओं के बाद उन्होंने उससे भी दूरी बना ली।

उन्होंने जीवनभर वामपंथी सामाजिक सोच, मजदूर अधिकार, महिलाओं की भागीदारी और सामाजिक समानता के मुद्दों पर काम जारी रखा।

दिल्ली की पहली महिला मेयर बनने तक का सफर

1958 में अरुणा आसफ अली दिल्ली की पहली महिला मेयर चुनी गईं।

उन्होंने केवल राजनीति नहीं की बल्कि दिल्ली के विकास, नागरिक सुविधाओं, शिक्षा और सामाजिक कल्याण पर विशेष ध्यान दिया।

उन्होंने "Patriot" नामक दैनिक समाचार पत्र और "Link" साप्ताहिक पत्रिका की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पत्रकारिता को उन्होंने सत्ता की प्रशंसा का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आवाज माना।

महिलाओं, दलितों और समाज के वंचित वर्गों के लिए आजीवन संघर्ष

अरुणा आसफ अली का मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है।

वे दलितों, मजदूरों और गरीबों के अधिकारों के लिए लगातार आवाज उठाती रहीं।

उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक सशक्तिकरण पर विशेष बल दिया।

दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने महिलाओं के लिए आरक्षण का खुलकर समर्थन नहीं किया। उनका विश्वास था कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ महिलाओं को कहीं अधिक मजबूत बनाएँगी।

उन्होंने अनियंत्रित औद्योगिकीकरण का भी विरोध किया क्योंकि उनका मानना था कि इससे पर्यावरण और समाज दोनों को नुकसान होगा।

सम्मान जिनसे बड़ी थी उनकी सादगी

अरुणा आसफ अली को जीवनभर अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले।

उन्हें International Lenin Peace Prize, Jawaharlal Nehru Award for International Understanding, Padma Vibhushan और मरणोपरांत भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया।

दिल्ली की एक प्रमुख सड़क अरुणा आसफ अली मार्ग उनके नाम पर है। उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया और दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल का नाम भी उनके नाम पर रखा गया।

लेकिन जिन लोगों ने उन्हें करीब से जाना, वे कहते हैं कि उन्हें पुरस्कारों से अधिक संतोष उस दिन मिला था, जब उन्होंने अंग्रेजों की आँखों में आँखें डालकर तिरंगा फहराया था।

क्यों आज भी अरुणा आसफ अली की कहानी अधूरी लगती है?

इतिहास में अक्सर वही चेहरे सबसे ज्यादा दिखाई देते हैं जो सत्ता के केंद्र में रहे। लेकिन कई बार असली परिवर्तन उन लोगों ने किया, जिन्होंने सबसे कठिन समय में नेतृत्व संभाला।

अरुणा आसफ अली उन्हीं लोगों में से एक थीं।



उन्होंने सामाजिक बंधनों को तोड़ा, अंतरधार्मिक विवाह किया, जेल की यातनाएँ झेलीं, भूख हड़ताल की, अंग्रेजों से वर्षों तक बचती रहीं, भूमिगत रहकर आंदोलन को जीवित रखा, गांधी जी से मतभेद होने पर भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और आजादी के बाद भी समाज के कमजोर वर्गों के लिए काम करती रहीं।

आज जब हम भारत छोड़ो आंदोलन को याद करते हैं, तो केवल 9 अगस्त 1942 का तिरंगा ही नहीं, बल्कि उस तिरंगे के पीछे खड़ी उस निर्भीक महिला को भी याद करना चाहिए जिसने साबित कर दिया था कि इतिहास केवल बड़े नेताओं से नहीं, बल्कि साहस से लिखा जाता है।

अरुणा आसफ अली का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा देशभक्त वही है जो परिस्थितियों के सामने झुकने के बजाय अपने सिद्धांतों पर अडिग रहकर आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाए।

OLDISGOLDFILMS ऐसी ही भूली-बिसरी ऐतिहासिक हस्तियों की अनसुनी कहानियों को आपके सामने लाता रहेगा, ताकि इतिहास केवल याद न रहे, बल्कि समझा भी जाए।


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  ~विजय राजबली माथुर ©


Wednesday, July 15, 2026

क्योंकि वे कर नहीं सकते ------ Pankaj Kumar Singh / Shyam Singh



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मोदी प्रेस से क्यों डरते हैं?
यह ऐसा सवाल है जो पिछले बारह वर्षों से भारतीयों के ज़हन और सार्वजनिक चर्चा में तो प्रायः आता रहता है और अब इस पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी बातें हो रही हैं लेकिन जवाब किसी के पास नहीं है।
इसी मुद्दे पर Pankaj Kumar Singh की यह पोस्ट कुछ संकेत करती है, पढ़िए—
मोदी जी की चुप्पी के पीछे छिपा सच 
मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस इसलिए नहीं करते क्योंकि उन्हें पैसे देने वाले लोग उन्हें करने नहीं देते। यह सिर्फ़ एक इल्ज़ाम से कहीं ज़्यादा है। यह एक ऐसे 'स्ट्रक्चर' की पुष्टि है जो बहुत पहले से बना हुआ था और ज़्यादातर लोगों की सोच से कहीं ज़्यादा गहरा है।
(1). ACYPL ➤
यह सिर्फ़ 'ट्रेनिंग प्रोग्राम' नहीं, बल्कि 'रिक्रूटमेंट' की दीर्घकालिक योजना भी है।
मोदी ने 1993 में RSS के ग्रासरूट ऑर्गेनाइज़र (प्रचारक) के तौर पर यूनाइटेड स्टेट्स का दौरा किया, जिसे अमेरिकन काउंसिल ऑफ़ यंग पॉलिटिकल लीडर्स (ACYPL) ने होस्ट किया था। हालांकि, ACYPL सिर्फ़ एक एक्सचेंज प्रोग्राम नहीं था; इसे बड़े पैमाने पर CIA द्वारा विदेशी पॉलिटिकल टैलेंट को तैयार करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक फ्रंटल ऑर्गेनाइज़ेशन माना जाता था।
एक ज़रूरी बात यह है कि मोदी ने इसी दौरान यूरोप के कई हिस्सों का भी दौरा किया और उनकी यात्रा और रहने का खर्च विदेशी प्राइवेट कंपनियों ने उठाया। इसका मतलब है कि उनका 1993 का ट्रिप कोई इंडिपेंडेंट डिप्लोमैटिक एंगेजमेंट नहीं था, बल्कि एंगेजमेंट और कल्चर का एक स्ट्रक्चर्ड, बाहर से फंडेड प्रोसेस था। 
मोदी का नाम ACYPL की ऑफिशियल एल्युमनाई लिस्ट में है। 
जुलाइ 2026 में पाकिस्तानी मीडिया ने साफ तौर पर बताया कि ACYPL को आम तौर पर CIA का फ्रंट माना जाता है, एक ऐसा ऑर्गनाइज़ेशन जिसका इस्तेमाल CIA दुनिया भर में एसेट्स बनाने और भविष्य के लीडर्स को U.S. एजेंडा के साथ जोड़ने के लिए तैयार करने के लिए करती है।
मोदी सिर्फ CIA प्रोग्राम के एल्युमनाई नहीं थे। उन्होंने 1999 में युवा लीडर्स के लिए U.S. स्टेट डिपार्टमेंट के 'स्टडी ऑफ द U.S. इंस्टिट्यूट्स' (SUSI) प्रोग्राम में भी हिस्सा लिया था। नेशनल पॉलिटिकल स्टेज में आने से पहले उन्होंने कम से कम छह साल तक ट्रेनिंग ली।
 (2). 2014 ➤  CIA और मोसाद ने मोदी की जीत कैसे सुनिश्चित की—
2014 के चुनाव के नतीजे, जिसमें काँग्रेस पार्टी के साँसदों की संख्या 206 से घटकर 44 हो गई थी, वह 'नैचुरल मैंडेट' नहीं था।  काँग्रेस के पूर्व MP कुमार केतकर ने सबके सामने आरोप लगाया कि CIA और मोसाद ने काँग्रेस पार्टी की हार की साज़िश रची थी।
वजह? एक स्थिर, काँग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार भारत के फ़ैसले लेने में किसी भी बाहरी दखल को कम करेगी। इसलिए, उन्होंने एक गैर-कांग्रेसी बहुमत वाली सरकार बनाने का फ़ैसला किया, यह मानते हुए कि ऐसी लीडरशिप उनके फ़ायदे के लिए बेहतर होगी। खबर है कि मोसाद ने भारत के अलग-अलग राज्यों और चुनाव क्षेत्रों को कवर करते हुए डिटेल्ड पॉलिटिकल असेसमेंट डेटा इकट्ठा किया।
(3). ऐपस्टीन नेटवर्क मोसाद की शैडो डिप्लोमेसी ➤
'द न्यूयॉर्क टाइम्स' की रिपोर्ट्स ने सबसे गुप्त लेयर का खुलासा किया—
जेफ्री ऐपस्टीन ने भारत-इज़राइल सम्बंधों के स्ट्रेटेजिक मोड़ में एक अहम भूमिका निभाई।
ऐपस्टीन ने मोदी को सलाह दी कि वे इज़राइल से मिलिट्री और इंटेलिजेंस खरीद $2 बिलियन बढ़ा दें। ताकि रिश्ते मज़बूत हों और ह्वाइट हाउस का सपोर्ट मिल सके। मोदी के एक्शन लेने से पहले उन्होंने ट्रंप प्रशासन के कैबिनेट अपॉइंटमेंट और फॉरेन पॉलिसी में बदलाव के बारे में पहले से जानकारी शेयर की थी। ऐपस्टीन ने भारतीय अरबपति अनिल अंबानी को भी गाइड किया कि स्टीव बैनन, टॉम बैरक और जेरेड कुशनर जैसे ट्रंप के करीबी लोगों से कैसे जुड़े थे।
खास बात यह है कि ऐपस्टीन इस्राएली इंटेलिजेंस एजेंसी—मोसाद के लिए एक हाइ-लेवल ऑपरेटिव था। एक FBI मेमो में साफ तौर पर लिखा है, "ऐपस्टीन के इस्राएल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक के साथ करीबी रिश्ते थे और उन्होंने उसकी गाइडेंस में जासूसी की ट्रेनिंग ली थी।" 
बराक 2013 और 2017 के बीच 30 से ज़्यादा बार ऐपस्टीन के न्यूयॉर्क टाउन हाउस गए।
ऐपस्टीन ने मोदी और इस्राएली 'डीप स्टेट' के बीच एक कनेक्शन का काम किया। उसकी भूमिका पर्सनल क्रिमिनैलिटी से कहीं ज़्यादा थी; यह एक जियोपॉलिटिकल ऑपरेशन था।  
(4). मोसाद के तरीके RAW ने दोहराए ➤
दरअसल, इज़राइल ने जो टूल फ़िलिस्तीनियों पर नज़र रखने के लिए बनाए थे, उन्हें भारत ने अपने आलोचकों को टारगेट करने के लिए अपनाया। मोसाद ने दशकों में 'टारगेटेड एलिमिनेशन' का जो तरीका विकसित किया, जिसमें ईरानी न्यूक्लियर साइंटिस्ट की हत्या भी शामिल है, उसे भारत के रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) ने कनाडा के सबअर्ब में सिख एक्टिविस्ट को टारगेट करने के लिए दोहराया।
14 फरवरी, 2026 को, भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता ने मैनहट्टन फ़ेडरल कोर्ट में एक US-कैनेडियन सिख एक्टिविस्ट गुरपतवंत सिंह पन्नून की हत्या की साज़िश में शामिल होने का गुनाह कबूल किया और माना कि उसने एक भारतीय सरकारी कर्मचारी के कहने और कोऑर्डिनेशन पर काम किया। मोसाद के तरीकों को मोदी के ऑफ़िस के साथ भारत में सफ़लतापूर्वक 'एक्सपोर्ट' किया गया था, जो चेन ऑफ़ कमांड में सबसे ऊपर था।
(5). भारत इस्राएल के लिए एक 'प्रॉक्सी स्टेट' बन गया है ➤
मोदी प्रशासन असल में इस्राएल के लिए एक प्रॉक्सी स्टेट बन गया है, जिसमें भारतीय एजेंसियाँ ​​जासूसी के लिए इस्राएली टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रही हैं। RAW और मोसाद के बीच जो सहयोग 1980 के दशक में शुरू हुआ था, मोदी के राज में एक फॉर्मल डिफेंस और इंटेलिजेंस अलायंस में बदल गया है।
|• इज़राइली पेगासस स्पाइवेयर का इस्तेमाल राहुल गाँधी, कम से कम 40 पत्रकारों, सुप्रीम कोर्ट के जजों और चुनाव कमिश्नरों की निगरानी के लिए किया गया था।
|• भारत के सुप्रीम कोर्ट ने जाँचे गए 29 डिवाइस में से 5 में मैलवेयर पाया।
|• मोदी प्रशासन ने जाँच में सहयोग करने से इनकार कर दिया।
|• इस्राएल की डिफेंस एक्सपोर्ट कंट्रोल एजेंसी (DECA) ने पेगासस की बिक्री को मंज़ूरी दी।
सबसे बड़ा सच ➤
मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते क्योंकि वे कर नहीं सकते। वे जब एक बार बोलते हैं, तो ये सवाल उठने ज़रूरी हो जाते हैं—
• 2014 ➤ CIA और मोसाद ने काँग्रेस पार्टी की हार कैसे करवाई?
• ऐपस्टीन ➤ एक सिद्ध-दोषी सेक्स अपराधी और मोसाद के एसेट ने इस्राएल के प्रति भारत की विदेश नीति बनाने में भूमिका क्यों निभाई?
• पेगासस ➤ भारतीय पत्रकारों, जजों और विपक्षी नेताओं पर नज़र रखने के लिए इज़राइली स्पाइवेयर का इस्तेमाल क्यों किया गया?
• हत्याएं ➤ RAW ने विदेशों में हत्याओं के लिए मोसाद के टारगेटेड किलिंग के तरीके को क्यों कॉपी किया?
• प्रॉक्सी स्टेटस ➤ भारत इज़राइल के लिए प्रॉक्सी स्टेट क्यों बन गया है?
मोदी की चुप्पी सिर्फ़ एक कम्युनिकेशन स्टाइल नहीं है, यह उनकी असली पहचान छिपाने के लिए बनाया गया एक शील्डिंग मैकेनिज्म है। बोलना पूरे स्ट्रक्चर को एक्सपोज़ करना होगा और ऐसा वे कभी नहीं होने देंगे।♦️
#एकदा_जंबूद्वीपे 
फोटो—ACYPL की वेबसाइट से See less














  ~विजय राजबली माथुर ©

Monday, June 8, 2026

युवा आक्रोश को भटकाने का नया खेल ------ रश्मि दीक्षित

 




स्क्रिप्टेड गुस्सा और दिशाहीन नेतृत्व: युवा आक्रोश को भटकाने का नया खेल
देश में बदहाली और बेरोजगारी का दौर कोई आज की पैदाइश नहीं है, और न ही नीट (NEET) का पेपर पहली बार लीक हुआ है। यह युवाओं के भविष्य पर बरसों से लगा एक ऐसा घाव है, जिसका दर्द वही समझ सकता है जिसने अपनी रातों की नींद और माता-पिता की खून-पसीने की कमाई को सिस्टम की भेंट चढ़ते देखा है। जब सालों का यह दबा हुआ गुस्सा अचानक फूटता है, तो वह पूरी तरह स्वाभाविक और जायज है। लेकिन आज जब मुख्य विपक्ष सड़क से संसद तक इस मुद्दे पर पूरी ताकत से सरकार से लोहा ले रहा है, ठीक उसी वक्त एक समानांतर 'नए मोर्चे' का उभरना कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
बारीकी से देखें तो समझ आता है कि यह नया उबाल युवाओं की उस वास्तविक बदहाली को न्याय दिलाने के लिए नहीं आया, बल्कि न्यायपालिका की एक टिप्पणी में उछाले गए 'कॉकरोच' शब्द की चोट और तात्कालिक आवेश से पैदा हुआ है। युवाओं का भविष्य तो बरसों से दांव पर लगा था, तब इस नए मोर्चे का यह दर्द क्यों नहीं जागा?
इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की कड़ियों को जोड़ें तो एक अलग ही खेल नज़र आता है। इस मुहिम के मुख्य चेहरों का अतीत और उनके तार कहीं न कहीं घूम-फिरकर एक खास राजनीतिक सोच और दलीय पृष्ठभूमि से जुड़ते रहे हैं। भले ही खुद को 'स्वतंत्र' और 'गैर-राजनीतिक' कहकर पेश किया जाए, लेकिन जब किसी मोर्चे की वैचारिक रीढ़ ही सीधे तौर पर स्थापित राजनीतिक दलों के पूर्व सिपहसालारों और सोशल मीडिया हैंडलर्स से जुड़ी हो, तो यह बात साफ़ हो जाती है कि इस पूरे गुस्से की दिशा कहीं और तय की जा रही है।
सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इस पूरे उभार के पीछे युवाओं, छात्रों या देश के भविष्य को लेकर कोई सोची-समझी नीति या विज़न है ही नहीं। यह किसी लंबी वैचारिक लड़ाई या ज़मीनी संघर्ष का नतीजा नहीं है। यह तो महज एक अदालती टिप्पणी के बाद हंसी-मजाक और तात्कालिक आवेश में खड़ी कर दी गई एक वेबसाइट और कुछ सोशल मीडिया पेजों का 'संयोग' है। जो ताकत खुद एक 'इत्तेफाक' या हादसे की तरह पैदा हुई हो, वह भला इतने बड़े और जटिल हालातों से जूझ रहे देश और युवाओं को संभालने का खाका कैसे पेश कर सकती है? जब आंदोलन का मुख्य नेतृत्व खुद सरेआम यह स्वीकार करता दिखे कि उसे समझ नहीं आ रहा कि आगे क्या करना है, तो समझ आता है कि नींव कितनी खोखली है। जहां नेतृत्व ही दिशाहीन हो, वहां योजनाएं बाद में सोची जाती हैं और राजनीति पहले शुरू हो जाती है।
सत्ता और व्यवस्था के चरित्र को समझने के लिए किसी समाजशास्त्रीय शोध की आवश्यकता नहीं होती, बस किसी भी शहर के धरना स्थल पर एक चक्कर लगा आना काफी है। लोकतांत्रिक देशों में विरोध प्रदर्शन का अधिकार एक बुनियादी हक माना गया है, लेकिन हकीकत यह है कि अमूमन एक अदद धरने की अनुमति पाने में आम इंसान की चप्पलें घिस जाती हैं। पुलिस रिपोर्ट और न जाने कितने दफ्तरों के चक्कर काटने के बाद भी 'कानून-व्यवस्था' का हवाला देकर फाइल बंद कर दी जाती है। लेकिन जब व्यवस्था अचानक इतनी दरियादिल हो जाए कि इन नए नवेले चेहरों को मांगते ही हाथों-हाथ धरने की अनुमति का परवाना थमा दिया जाए, तो माथा ठनकना स्वाभाविक है। जब प्रशासन खुद आगे बढ़कर लाल कालीन बिछाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि यह गुस्सा जनता का नहीं, बल्कि व्यवस्था द्वारा ही प्रायोजित एक स्क्रिप्ट का हिस्सा है।
यहाँ एक अजीब विरोधाभास दिखाई देता है। ये चेहरे मौजूदा सत्ता की नीतियों और कमियों पर उतने मुखर नहीं हैं, जितनी ऊर्जा वे व्यवस्था के खिलाफ लड़ रही मुख्य विपक्षी ताकतों की कमियां ढूंढने में लगा रहे हैं। अगर यह वाकई सत्ता की नीतियों से परेशान आम नागरिकों का कोई संगठन है, तो इनके तीखे सवाल सीधे शासन से होने चाहिए थे। लेकिन ज़मीनी हकीकत को समझने के बजाय, ये चेहरे अपने सोशल मीडिया फॉलोअर्स की संख्या के बूते अकेले ही पूरी जंग जीतने का भ्रम पालकर बैठ गए हैं। इस बिखराव का सीधा नुकसान उस लड़ाई को होगा जो लंबे समय से ज़मीन पर लड़ी जा रही है, और इसका सीधा फायदा अंततः सत्तासीन दल की झोली में जाकर गिरेगा। यह कोई साधारण चूक नहीं, बल्कि एक ऐसी रणनीति है जो बदलाव की हर गंभीर कोशिश को भीतर से कमज़ोर करती है।
इस तमाशे का सबसे दुखद पहलू यह है कि इसमें हमारे देश का भोला युवा वर्ग सबसे आसानी से इस्तेमाल हो जाता है। जिस ऊर्जा, जोश और आक्रोश को बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी अधिकारों के लिए एक ठोस नीतिगत लड़ाई में बदलना चाहिए था, वह भीड़ बनकर किसी शॉर्ट-कट एजेंडे के पीछे दौड़ रही है। युवाओं को लगता है कि वे क्रांति कर रहे हैं, जबकि असल में वे केवल उस बड़े खेल के मोहरे मात्र बन जाते हैं, जिसका रिमोट कंट्रोल किसी और के हाथ में है।
जब तक देश का युवा और आम नागरिक इन अचानक पैदा हुए आंदोलनों और तथाकथित 'सांस्कृतिक या सामाजिक लड़ाइयों' के कृत्रिम शोर में उलझा रहेगा, तब तक पर्दे के पीछे बैठे नीति-नियंताओं का काम बेहद आसान हो जाता है। व्यवस्था की नजर में आम जनता की हैसियत कॉकरोच से ज्यादा कुछ नहीं है। उन्हें लगता है कि इन्हें एक सुरक्षित कोना दे दो, जहाँ ये बैठकर चिल्लाते रहें और खुश रहें कि इन्हें अभिव्यक्ति की आजादी मिली हुई है। जब तक यह शोर एक तय दायरे के अंदर है और सत्ता की जड़ों को नहीं हिलाता, तब तक ऐसी हर अनुमति हाथों-हाथ मिलती रहेगी।
लेकिन युवाओं को अब यह अक्ल लानी होगी कि वे इस व्यवस्था के सुरक्षित कोने में रेंगने वाले मोहरे नहीं हैं। बदलाव रातों-रात किसी वायरल पोस्ट या बिना विज़न के खड़े हुए मंचों से नहीं आता। अगर वाकई देश की तस्वीर बदलनी है, तो युवाओं को 'शोर' और 'ठोस नीति' के बीच का अंतर समझना होगा। उन्हें किसी प्रायोजित स्क्रिप्ट का हिस्सा बनने से इंकार करना होगा। असली क्रांति सोशल मीडिया के फॉलोअर्स की गिनती में नहीं, बल्कि ज़मीनी संघर्ष, स्पष्ट रोडमैप और व्यवस्था को हिला देने वाली वैचारिक एकजुटता में होती है। जब युवा केवल आक्रोश दिखाना छोड़, एक स्पष्ट विज़न के साथ डटना सीख जाएगा, तब व्यवस्था उसे कॉकरोच समझने की भूल कभी नहीं कर पाएगी।




 ~विजय राजबली माथुर ©
 

Wednesday, June 3, 2026

प्रिय #students #GenZ के बच्चों, ------ रश्मि दीक्षित




प्रिय #students #GenZ के बच्चों,

#नीट, #सीबीएसई, #सीयूईटी और #एसएससी #जीडी जैसी परीक्षाओं की अव्यवस्थित अनियमितताओ के चक्रव्यूह में फंसकर आज तुम जिस मानसिक तनाव, अनिश्चितता और गहरे दुख-दर्द से गुजर रहे हो, उसे पूरा देश देख रहा है।

अपनी मेहनत को चंद रुपयों में लीक होते देखना और अपने साथियों को प्रशासनिक नाकामियों के कारण आत्मघाती कदम उठाते देखना कोई मामूली तकलीफ नहीं है। व्यवस्था के इस क्रूर मजाक के खिलाफ तुम्हारा गुस्सा बिल्कुल जायज है और सत्ता पक्ष में किसी को तो इसकी जिम्मेदारी लेनी ही होगी।

लेकिन इस बेहद संवेदनशील मोड़ पर तुम्हें बहुत सतर्क रहने की जरूरत है। इस खुले खत के जरिए मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि अपनी इस वास्तविक तकलीफ और आंसुओं का फायदा किसी और को अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए मत उठाने दो।

जो इंसान अब तक अपने डर की वजह से कभी हिंदुस्तान वापस आना ही नहीं चाहता था, वह अचानक 6 जून को ही वापस क्यों आ रहा है? समय के खेल को समझो; ठीक 6 जून को देश के प्रमुख विपक्षी दलों की एक बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है,जो हफ़्तों से तुम्हारे हक की लड़ाई चिलचिलाती गर्मी में सड़को पर लड़ रहा है।

यह लड़ाई विशुद्ध रूप से तुम्हारी है, तुम्हारे भविष्य की है, और इसे बेहद मजबूत कंधों के सहारे ही लड़ा जा सकता है। याद रखो, वे कंधे कभी मजबूत नहीं हो सकते जो CJI के एक बयान के बाद महज हंसी-मजाक ,उत्तेजना और सैटायर (व्यंग्य) के रूप में तुम्हें मिले थे। जिस मंच की अपनी कोई ठोस वैचारिक गहराई या जमीनी रीढ़ ही नहीं है, वह इतने बड़े देश के युवाओं के भविष्य का बोझ कैसे उठा सकता है?

इस पूरे ताने-बाने को थोड़ी और गहराई से समझो। जो व्यक्ति आज विदेश में बैठकर सोशल मीडिया पर वीडियो में चमका रहा है अचानक भारत लौटकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहा है, उसके बयानों के पीछे छुपे अहंकार को पहचानो। उसके संवादों में छिपा यह 'मैं' और व्यक्तिगत अहंकार देखने लायक है- "मैं आ रहा हूं इस्तीफा मांगने", जैसे वह अकेला अपने दम पर तुम्हें यह लड़ाई जिता देगा।

वह विपक्ष के अब तक के जमीनी और शांतिपूर्ण संघर्ष को यह कहकर छोटा और कमजोर दिखाने की कोशिश की रहा है कि देश भर में प्रोटेस्ट तो हो रहे हैं पर उनसे सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ रहा। यानी जो लोग हफ्तों से लाठियां खा रहे हैं, जमीन पर संघर्ष कर रहे हैं, उनकी मेहनत बेकार है और चमत्कार सिर्फ इसके आने से होगा? यह आत्ममुग्धता इतनी सीधी और सरल नहीं है, इसके पीछे एक गहरी राजनीतिक मंशा हो सकती है।

यह व्यक्ति पूर्व में आम आदमी पार्टी में सक्रिय कार्यकर्ता रह चुका है ये तो सभी जानते हैं। पर सवाल इसके बाद उठता है कि वह अच्छी तरह जानता है कि पिछले 12 सालों से देश की राजनीति में न तो जवाबदेही बची है और न इस्तीफों का कोई चलन है। और उसे यह भी बखूबी मालूम है कि भारत के कानून के तहत किसी भी प्रदर्शन के लिए पहले से प्रशासनिक अनुमति लेनी अनिवार्य होती है। इसके बावजूद उसने कोई पूर्व अनुमति नहीं ली?

ये जानते हुए भी कि सत्ता पक्ष आन्दोलनों को किस तरह संभालता है, बस हवा-हवाई दावों के सहारे सबको सोशल मीडिया पर सीधे एयरपोर्ट पर पहुंचने का बुलावा दे दिया। बिना किसी कानूनी तैयारी के भीड़ इकट्ठा करना और फिर पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने जाकर परमिशन मांगने का नाटक करना, आठ लाख ऑनलाइन हस्ताक्षरों का भ्रम फैलाकर एक गंभीर छात्र आंदोलन को प्रशासनिक टकराव की अंधी गली में धकेलने की साजिश है।

हिंदुस्तान में पैर रखने से पहले ही अपनी संभावित गिरफ्तारी का अंदेशा जताकर पहले से ही एक 'विक्टिम कार्ड' तैयार कर लेना साफ इशारा है कि यहाँ कोई ठोस व्यावहारिक योजना नहीं है। अभिजीत दीपके राजनीतिक रूप से कोई अपरिचित इंसान नहीं है, मुझे अभिजीत में संभावना नजर आती है और मैं चाहती हूं कि ऐसे लोग राजनीति में आएं, लेकिन खेल-खेल में बनी इस वेबसाइट की सोशल मीडिया पर अप्रत्याशित रीच देखकर, करियर री-लॉन्चिंग यह एक बुरा विचार है वह भी छात्र आंदोलन जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे पर।

अभिजीत दीपके का लाईफ प्लान विदेश में पढ़ाई कर वहीं नौकरी करना था,अगर देश और समाज की इतनी ही चिंता हमेशा से थी, तो अपनी पुरानी पार्टी के बिखरने के बाद इसे समाज में सक्रिय रहना चाहिए था, जो कि यह बिल्कुल नहीं रहा। अब जरा ठंडे दिमाग से सोचो, कहीं यह तुम्हारे वास्तविक और पवित्र प्रोटेस्ट को पूरी तरह खराब और बदनाम करने के लिए बुना गया कोई सियासी ताना-बाना तो नहीं है?

बिना किसी संगठन और व्यावहारिक सोच के खड़ा किया गया यह गैर-जिम्मेदाराना तमाशा मौजूदा सरकार की एक 'सी-टीम' की तरह काम करता दिख रहा है, जिसका इकलौता मकसद विपक्ष के अब तक के गंभीर, वास्तविक और शांतिपूर्ण संघर्ष को जनता की नजरों में हल्का करना, असली मुद्दे को भटकाकर बिखरा देना और अंततः व्यवस्था को फायदा पहुंचाना है।

एक दशक पहले अन्ना आंदोलन के जरिए भी पूरे हिंदुस्तान की भावनाओं और गुस्से को इसी तरह भुनाकर एक बहुत बड़ा धोखा दिया गया था, जिसका हर्जाना देश पिछले 12 सालों से भुगत रहा है। यही वजह है कि जो समझदार और अनुभवी लोग शुरुआत में इस मंच के जोश में जुड़े थे, उन्होंने इतिहास की कड़वाहट को याद रखते हुए समय रहते अपने कदम पीछे खींच लिए।

तुम इस हिंदुस्तान की सबसे समझदार, जागरूक और तार्किक पीढ़ी हो। भावनाओं के सैलाब में बहकर कोई भी ऐसा कदम मत उठाओ जिससे तुम्हारी सालों की तपस्या और यह आंदोलन एक राजनीतिक ड्रामे में तब्दील हो जाए। अगर आज कोई तुमसे यह कहता है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों या सत्याग्रह से तुम व्यवस्था से नहीं जीत सकते, तो तुम्हें इतिहास को दोबारा पलटने की जरूरत है।

हमारी आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी की भूमिका को याद करो, जिसे पिछले 12 सालों में एक सोची-ऐसी रणनीति के तहत बेहद कमजोर दिखाने की कोशिश की गई है। सत्य, अहिंसा और बिना किसी हुड़दंग के किया गया शांतिपूर्ण आंदोलन ही इस देश में अधर्म और दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ सबसे अचूक और मजबूत हथियार रहा है। वर्तमान में इसका सबसे बड़ा उदाहरण किसान आंदोलन था।

अपनी लड़ाई खुद लड़ो, गरिमा के साथ लड़ो, और ऐसे किसी भी छलावे या सोशल मीडिया के मुखौटों के मोहरे मत बनो जिनका मकसद सिर्फ अपनी सियासी दुकान चमकाना है।

इस पूरे सफर में तुम खुद को अकेला मत समझना। सच की इस राह पर हम सब, पूरा देश तुम्हारे साथ है। तुम्हारी इस जायज और पवित्र लड़ाई में हम कदम से कदम मिलाकर तुम्हारे पीछे खड़े हैं। हिम्मत मत हारना, हौसला बनाए रखना, जीत अंततः तुम्हारी ही होगी।

एक अभिभावक और तुम्हारी शुभचिंतक,
रश्मि दीक्षित






  ~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, May 31, 2026

सच बोलने वाले साहसी ------ विजय राजबली माथुर











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अकबर इलाहाबादी  का कथन  है  ------

"  न खींचो तीर कमानों को , न तलवार निकालो   । 

  जब तोप मुकाबिल हो ,        तो अखबार निकालो।। "

आचार्य महावीर प्रसाद  द्विवेदी ने भी कहा है कि,  जो शक्ति साहित्य में छिपी रहती है वह तोप, तलवार और बम के गोलों में भी नहीं पाई जाती। 

 स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अखबार साहित्य का  भी प्रतिविम्ब होते थे। साहित्य समाज का भी दर्पण होता है। 



आज क्या अखबार क्या दृश्य चेनल्स  सभी शोषकों - उत्पीड़कों का गुण - गान करने में व्यस्त हैं तब दीपक शर्मा ,  पल्लवी राय और मनोरमा सिंह सरीखे पत्रकार निर्भीकता - पूर्वक समाज और साहित्य का दर्पण बन कर जनता को जागरूक और देश को गौरान्वित कर रहे हैं , हम उनके साहस और निर्भीकता की सराहना करते और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए मंगलकामनाए करते हैं। 





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 ~विजय राजबली माथुर ©