Wednesday, September 30, 2026

सूर्यकांत क्यों ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे ------ एडवोकेट अरुण अग्रवाल / गिरिजेश वशिष्ठ


सूर्यकांत क्यों ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे. ये विश्लेषण पढ़ें. एडवोकेट अरुण अग्रवाल के एक बयान से लिया है ....
• ज्ञानेश कुमार की भूमिका और प्रभाव (2016 से): ज्ञानेश कुमार वर्ष 2016 में गृह मंत्रालय में जॉइंट सेक्रेटरी के पद पर रहते हुए भी इतने प्रभावशाली थे कि उन्होंने केरल के तत्कालीन चीफ सेक्रेटरी (जी. थॉमसन) को बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए राजी कर लिया था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे राजनीतिक रूप से जुड़े हुए थे।
• जस्टिस सूर्यकांत के प्रमोशन की क्रोनोलॉजी: जस्टिस सूर्यकांत को हिमाचल प्रदेश का चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश 10 जनवरी 2018 से करीब 10 महीने तक लंबित थी। 17 सितंबर 2018 को ज्ञानेश कुमार गृह मंत्रालय में एडिशनल सेक्रेटरी (इंटरनल सिक्योरिटी) बने (जिसके तहत आईबी रिपोर्ट करती है)। इसके ठीक बाद, रंजन गोगोई के चीफ जस्टिस बनते ही महज 15-20 दिनों के भीतर जस्टिस सूर्यकांत की फाइल क्लियर हो गई।
• आईबी (IB) रिपोर्ट को दबाने का संदेह: सतीश जैन और सुप्रीम कोर्ट के जज ए.के. गोयल की चिट्ठियों में जस्टिस सूर्यकांत के खिलाफ जो गंभीर आरोप थे (जो 'द कारवां' मैगजीन में भी छपे), उनके आधार पर आईबी की रिपोर्ट प्रतिकूल (adverse) होनी तय थी। आरोप है कि ज्ञानेश कुमार ने गृह मंत्रालय और आईबी के स्तर पर साठगांठ करके इस रिपोर्ट को आगे नहीं बढ़ने दिया।
• इंटरनल सिक्योरिटी का अन्य मामलों में इस्तेमाल: तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के यौन उत्पीड़न मामले (sexual harassment scandal) में भी इंटरनल सिक्योरिटी का इस्तेमाल करके पुलिस के माध्यम से सहयोग दिया गया और शिकायतकर्ता महिला के पति व देवर को सस्पेंड/बर्खास्त कराया गया।
• सुप्रीम कोर्ट में त्वरित एलिवेशन: 8 मई को जब दोबारा सिफारिश भेजी गई, तो जो फाइल पहले 10 महीने तक रुकी रही, वह ज्ञानेश कुमार के प्रभाव के कारण सिर्फ 15 दिनों में क्लियर हो गई और जस्टिस सूर्यकांत सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए।
• चुनाव आयुक्त मामले में फाइल रोकना: जब चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित था, तब जस्टिस सूर्यकांत ने साल भर तक उस पर कोई सुनवाई नहीं की। चीफ जस्टिस की बेंच में आने के बाद भी उन्होंने 4 महीने तक फाइल अपने पास रखी और अंत में यह कहकर केस दूसरी बेंच को सौंप दिया कि नए कानून के तहत वे खुद चयन समिति के सदस्य हैं।
• सरकार को पूर्ण संरक्षण (Cast-Iron Protection): ज्ञानेश कुमार को सरकार और अदालत से अभेद्य सुरक्षा कवच मिला हुआ है क्योंकि उन्होंने अनुच्छेद 370, राम मंदिर और रंजन गोगोई को संरक्षण देने जैसे मामलों में एक महत्वपूर्ण सूत्रधार (instrumental role) की भूमिका निभाई है।
• अदालत का सरकार के प्रति झुकाव: जस्टिस सूर्यकांत की अदालत में एक भी ऐसा मामला नहीं आया जिससे सरकार को किसी तरह की शर्मिंदगी उठानी पड़ी हो। जब भी सरकार संकट में फंसती है, उसे तुरंत राहत दे दी जाती है।
• संवैधानिक शक्तियों (Article 142) का दुरुपयोग: चुनाव प्रक्रियाओं और वेरिफिकेशन (SIR) के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत मिली शक्तियों का दुरुपयोग करके 'कम्प्लीट जस्टिस' (पूर्ण न्याय) के बजाय 'कम्प्लीट इनजस्टिस' (पूर्ण अन्याय) किया है। अदालत ने ट्रिब्यूनल बनाकर और एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जजों (ADJs) को लगाकर चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित किया।
• प्रक्रिया को लटकाना और अवैधता को वैध बनाना: जो मामला (SIR की वैधता) जस्टिस धुलिया ने एक घंटे की सुनवाई में स्पष्ट कर दिया था, उसे जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने डेढ़ साल तक खींचकर अंतरिम आदेशों के जरिए पूरा होने दिया। इसके कारण पश्चिम बंगाल की सरकार प्रभावित हुई और लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से कट गए, जिसे बाद में पोस्ट-फेक्टो (बाद की तारीख से) वैध ठहरा दिया गया।
• कॉलेजियम सिस्टम में पारदर्शिता का अभाव: वर्तमान में कॉलेजियम के प्रस्तावों पर जजों के हस्ताक्षर तक नहीं होते और न ही चयन का कोई ठोस कारण बताया जाता है। व्यवस्था पूरी तरह "राजा की मर्जी" से चल रही है।
• निजी संपत्ति और पैन (PAN) नंबर का विसंगतिपूर्ण मामला: ग्रेटर कैलाश की एक संपत्ति (4500 वर्ग फीट का आधा बंगला), जिसकी कागजी कीमत 1.5 करोड़ दिखाई गई जबकि शिकायतकर्ता के अनुसार 3 करोड़ नकद दिए गए थे, उसके दस्तावेजों में पैन नंबर 'सूर्यकांत शर्मा' के नाम पर दर्ज है, लेकिन संपत्ति का रजिस्ट्रेशन 'सूर्यकांत' के नाम से हुआ है।

  ~विजय राजबली माथुर ©


Tuesday, September 29, 2026

लोकतंत्र के लिए हम सबको मिलकर आगे आना होगा ====== अंशू नेथानी / लोकतन्त्र की हत्या पर विदेशी मीडिया ------ राजेश सिंह





जिन संवैधानिक प्रावधानों के तहत चुनाव आयोग को काम करना था और भारतीय संसदीय प्रणाली के कार्यान्वित होने के लिए लोगों की सहभागिता को मतदान के माध्यम से सुनिश्चित करना था उसे करने में चुनाव आयोग पूरी तरह असफल रहा। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सारे संवैधानिक प्रावधानों और नागरिकों के मौलिक अधिकारों  की हत्या की । और जब यह बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची तो सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक प्रावधानों के तहत चुनाव आयोग के खिलाफ कोई कार्रवाई की नहीं। भारतीय संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए कोई कदम उठाए नही। उल्टे अधिकारों को कुचले जाने का कोई संज्ञान तक नहीं लिया उन अधिकारों को कुचले जाने का उन्होंने समर्थन किया । कहा कोई बात नहीं अगली बार मत दे देना। जबकि मतदान नागरिकों का मौलिक अधिकार है। तो यहां जितना दोषी चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार है उतना ही दोषी सुप्रीम कोर्ट और इस मामले की सुनवाई करने वाले मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत भी व अन्य जो है वह भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। संवैधानिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।
हमारे लॉ आफ जूरिप्रूडेंस में क्या ऐसा प्रावधान है कि किसी अपराधी के द्वारा अपराध किए जाने के बाद अपराध को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया गया हो और उन अपराधों के प्रमाणित होने पर उनकी सजा के प्रावधानों में क्या कोई परिवर्तन आ सकता है और यदि अपराध संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों के द्वारा संवैधानिक अधिकारों व नियमों के विरुद्ध किया गया हो तो इस पर कार्रवाई और सजा का निर्धारण किस तरह से होगा।
लोकतंत्र के लिए हम सबको मिलकर आगे आना होगा। प्रेस क्लब में लोकतंत्र पर विचार विमर्श के दौरान अपनी बात कहते हुए।
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भारत के लोकतन्त्र की हत्या पर विदेशी मीडिया रिपोर्टिंग 
दुनिया के बड़े मीडिया हाउस पहली बार चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं! द न्यूयॉर्क टाइम्स, ब्लूमबर्ग, अल जज़ीरा, बीबीसी और अन्य विदेशी मीडिया ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेदों, SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) प्रक्रिया और करोड़ों वोटर के नाम हटाने की रिपोर्टिंग की है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा कि आयोग के दो आयुक्तों ने कई बार आपत्ति दर्ज की, फिर भी फैसले एकतरफा लिए गए। अल जज़ीरा ने "शेकन फेथ" कहकर भारतीय चुनावों पर अभूतपूर्व संदेह जताया।  ब्लूमबर्ग ने SIR विवाद और विरोध प्रदर्शनों को कवर किया।  हिंदुस्तान के इतिहास में शायद पहली बार दुनिया के बड़े मीडिया हाउस चुनाव आयोग पर अंगुली उठा रहे हैं। दुनिया की नजरों में भारत का चुनावी तंत्र शक के दायरे में आ गया है। मोदी सरकार और चुनाव आयोग पर विदेशी रिपोर्टिंग से अंतरराष्ट्रीय बदनामी का सवाल खड़ा हो गया है।
न्यूयॉर्क टाइम्स ने 23 सितंबर 2026 को अपनी रिपोर्ट में लिखा कि भारतीय चुनाव आयोग ने ऐसे उपाय तेजी से लागू किए जो करोड़ों लोगों को वोट देने से वंचित कर सकते हैं, भले ही तीन में से दो आयुक्तों ने इन कदमों की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए हों। अखबार ने इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें खुलासा हुआ कि दो चुनाव आयुक्तों ने आधिकारिक तौर पर 14 बार आपत्ति दर्ज कराई, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इन सभी को नजरअंदाज करके एकतरफा फैसले लेते रहे। न्यूयॉर्क टाइम्स ने सवाल उठाया कि क्या यह प्रक्रिया वास्तव में स्वतंत्र और निष्पक्ष है, या फिर मोदी सरकार के राजनीतिक फायदे के लिए डिजाइन की गई है। आयोग के बयान पर भी अखबार ने संदेह जताया, जिसमें कहा गया कि यह "मतभेद" नहीं, बल्कि "सामान्य चर्चा" थी, लेकिन बयान किसी वरिष्ठ अधिकारी ने नहीं, बल्कि एक जूनियर अधिकारी ने साइन किया था। यह पहला मौका है जब अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित अखबार ने सीधे तौर पर भारतीय चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं।
अल जज़ीरा ने 26 सितंबर 2026 को "शेकन फेथ" शीर्षक से एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें लिखा गया कि भारतीय लोकतंत्र को नए खुलासों से गहरा झटका लगा है।  रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया के तहत 13 करोड़ से अधिक नाम मतदाता सूची से हटा दिए हैं, जिनमें ज्यादातर गरीब, अल्पसंख्यक और वंचित तबके के लोग शामिल हैं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने अल जज़ीरा से कहा, "आज वह भरोसा हिल गया है। यह देश के लिए बहुत चौंकाने वाला है।" रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीने में 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज कराई, जिसे संधू ने "अनधिकृत और गैरकानूनी" करार दिया। अल जज़ीरा ने सवाल उठाया कि क्या मोदी की BJP के फायदे के लिए एक खास तबके को वंचित किया जा रहा है, खासकर मुसलमानों को, जो BJP के हिंदूत्ववादी अभियान का मुख्य निशाना रहे हैं। यह रिपोर्ट सिर्फ भारत के भीतर ही नहीं, बल्कि पूरे मुस्लिम जगत में गूंज रही है।
ब्लूमबर्ग ने 23 से 26 सितंबर के बीच कई रिपोर्टें प्रकाशित कीं, जिनमें चुनाव आयोग के खिलाफ बढ़ते विरोध, कांग्रेस के प्रदर्शनों और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के अल्टीमेटम को कवर किया गया। ब्लूमबर्ग ने लिखा कि SIR प्रक्रिया इतनी विवादास्पद हो गई है कि युवा आंदोलन CJP ने CEC ज्ञानेश कुमार को 48 घंटे का अल्टीमेटम दे दिया है, या तो इस्तीफा दो, या सड़कों पर उतरेंगे। कांग्रेस ने बड़े पैमाने पर देश भर में प्रदर्शन किए, जिनमें जम्मू-कश्मीर, असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। ब्लूमबर्ग ने यह भी रिपोर्ट किया कि चुनाव आयोग ने विरोध के बाद कुछ प्रक्रियाओं में ढील देने की घोषणा की है, लेकिन यह कदम बहुत देर से और बहुत कम है। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और बाजारों के लिए यह संकेत है कि भारत की राजनीतिक स्थिरता और संस्थागत विश्वसनीयता खतरे में है।
यह सिर्फ एक संस्थागत विवाद नहीं, बल्कि मोदी, अमित शाह और RSS की सुनियोजित साजिश है। 2014 से मोदी सरकार ने चुनाव आयोग को धीरे-धीरे अपने कब्जे में लिया।  2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया बदल दी गई, जिससे सरकार को सीधे तौर पर CEC चुनने का अधिकार मिल गया।  ज्ञानेश कुमार जैसा व्यक्ति, जो Article 370 के खत्म होने और राम मंदिर ट्रस्ट जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सरकार के लिए काम कर चुका है, को CEC बनाया गया।  SIR प्रक्रिया के तहत 13 करोड़ नाम हटाना कोई संयोग नहीं, बल्कि भारतीय लोकतन्त्र को ध्वस्त करने के लिए एक सुनियोजित रणनीति है, गरीबों, प्रवासियों, अल्पसंख्यकों और उन तबकों को वंचित करना, जो BJP के पक्ष में वोट नहीं करते। अमित शाह, जो "मशीनमैन" के नाम से जाने जाते हैं, ने चुनावी रणनीति का मास्टरमाइंड रहकर यह सुनिश्चित किया कि मतदाता सूची में ऐसे बदलाव हों जो BJP को फायदा पहुंचाएं। RSS, जो हिंदूत्ववादी विचारधारा का प्रचार करती है, ने दशकों से "एक देश, एक वोट" का नारा लगाया है, लेकिन हकीकत में उनका मकसद है, एक देश, एक वोट, लेकिन सिर्फ उनका वोट चले। मुसलमानों, अति पिछड़े, दलितों, आदिवासियों और गरीबों को वंचित करके BJP अपनी सत्ता बरकरार रखना चाहती है। यह लोकतंत्र नहीं बल्कि तानाशाही है। और दुनिया अब यह देख रही है।
दशकों तक भारत ने अपने आप को "विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र" कहकर पेश किया। लेकिन अब यह मुखौटा गिर चुका है। न्यूयॉर्क टाइम्स, अल जज़ीरा, ब्लूमबर्ग, बीबीसी जैसे प्रतिष्ठित मीडिया हाउस जब एक स्वर में सवाल उठाएं, तो यह सिर्फ राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीयता का संकट है। अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व में भारत की छवि खराब हो रही है। निवेशक सोचने लगे हैं कि क्या भारत में संस्थाएं स्वतंत्र हैं या सरकार के इशारे पर चलती हैं। मानवाधिकार संगठन चुनावी धांधली और वंचितीकरण की जांच की मांग कर रहे हैं। मोदी सरकार विदेशी मीडिया की रिपोर्टिंग को "झूठा और पक्षपातपूर्ण" कहकर खारिज कर रही है, लेकिन हकीकत यह है कि आंतरिक दस्तावेज और आयुक्तों की आपत्तियां सामने आ चुकी हैं। जब दो आयुक्त खुद कहें कि प्रक्रिया "गैरकानूनी" है, तो सरकार का बचाव कैसे माना जाए? अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब सवाल पूछ रहा है, क्या 2029 के चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे? क्या करोड़ों भारतीयों का वोट छीना जाएगा? और अगर हां, तो क्या दुनिया इसे स्वीकार करेगी?
निष्कर्ष: अब या तो सुधार होगा, या क्रांति, दुनिया की नजरें भारत पर टिकी हैं। अगर मोदी-शाह-RSS गठजोड़ ने चुनाव आयोग को सुधारने, SIR प्रक्रिया को रोकने और वंचित मतदाताओं को बहाल करने का कदम नहीं उठाया, तो नतीजा भयानक होगा। CJP का अल्टीमेटम सिर्फ शुरुआत है।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और विपक्षी दल 30 सितंबर को दिल्ली में बड़ी बैठक करने वाले हैं। अगर संसदीय रास्ते काम नहीं आए, तो भारत की जनता सड़कों पर उतरेगी। मोदी के पास दो रास्ते हैं, या तो वे लोकतंत्र को बचाएं, या लोकतंत्र उन्हें उखाड़ फेंकेगा। विदेशी मीडिया की रिपोर्टिंग ने दुनिया को आंखें खोल दी हैं। अब बहाने बिल्कुल नहीं चलेंगे। भारत की जनता नें मन बना लिया है कि या तो सुधार होगा, या क्रांति। तीसरा रास्ता बंद है।
Rajesh R. Singh 
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  ~विजय राजबली माथुर ©


Saturday, September 26, 2026

सदमे में लोकतंत्र / असहमत होने का ड्रामा -------- Usrar Belous / Keshaw Bhatter's Post



क्या विवेक जोशी गोगोई की तरह देश को भ्रमित कर मुख्य चुनाव आयुक्त पद पर स्थापित होना चाहते है ?
गोगोई ने मोदी से मिल कर सरकार से असहमत होने का ड्रामा करते हुवे..
सरकार पर अविश्वास जताकर प्रेस कान्फ्रेंस मे सरकार पर न्याय पालिका मे हस्तक्षेप करने , दबाव डालने का आरोप लगा कर इतिहास मे पहेली बार इस तरह का विरोध किया था..
इस प्रेस कान्फ्रेंस के माध्यम से जनसमर्थन और अंदर से मोदी का समर्थन लेते हुवे चीफ जस्टिस के पद पर स्थापित होने का ड्रामा रचा था..
क्यो की सुप्रीम कोर्ट के जज की नियुक्ती कालेजियम के माध्यम से सरकार के हस्तक्षेप के साथ ही होती आ रही है..
सरकार चाहती तो गोगोई को चीफ जस्टिस बनने ही नही देती..
मोदी वैसे भी प्रतिशोध , बदला लेने मे विश्व प्रसिद्ध माने जाते है..
फिर भी गोगोई देश के चीफ जस्टिस बनाए गए और लगभग सभी फैसले सरकार और सरकार समर्थक गुंडो अपराधियो के पक्ष मे दिये..
क्या विवेक जोशी को इसी ड्रामेबाजी के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया जाना है..
ता के देश की जनता मे ऐसा मँसेज जाए मानो ग्यानेश कुमार को सजा दे दी गई हो और देश की जनता ग्यानेश कुमार द्वारा किये गए सरकार के सभी अपराध भूल कर नये चुनाव आयुक्त से लोकतंत्र की बहाली की अपेक्षा करने लगे ?
ग्यानेश कुमार के खिलाफ आजीवन मतलब रिटायर होकर जिंदा रहेने तक कोई कानूनी कारवाई हो नही सकती ऐसा कानून बनाया जा चुका है..
ये कानून हर केंद्रीय चुनाव आयुक्त के लिये है..
इस से नये चुनाव आयुक्त को भी सरकार इस्तेमाल कर सकेंगी..
देश की जनता संसद मे बहुमत के बगैर भी ग्यानेश कुमार से मुक्त हो सकती थी..
देश के आसपास जो हुवा ऊस से जनता ने कोई सबक नही सिखा ..
क्यो की देश की जनता की कलाईयो मे ताकत नही है , हिम्मत नही है..
देश की बहुसंख्यक जनता मे हिम्मत , ताकत , धैर्य , स्वाभिमान हजारो साल से है ही नही वर्ना ग्यानेश कुमार से मुक्त होने के पहेले देश की जनता हजारो साल की वर्ण व्यवस्था से मुक्त हो जाती..
कुल मिलाकर सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मिले हुवे है.
वर्ना श्रीलंका , नेपाल , बांग्लादेश कब का हो चुका होता..
(आगे पढना हो तो जारी रखे या पोस्ट को छोड दे)
हजारो साल के शुद्र गुलाम सरकार से तभी नाराज होते है जब RSS ..
* जय प्रकाश नारायण अर्थात JP के साथ मिल कर सरकार को अप्रिय करे..
* जब RSS अन्ना हजारे के साथ मिलकर मनमोहन सरकार को अप्रिय करे.
* RSS ने ओबीसी वर्ग को वि पी सिंग सरकार के द्वारा दिये भयानक आँफर वाले 'मंडल आरक्षण' के खिलाफ ओबीसी वर्ग खडा कर दिया था..
पुरे देश के ओबीसी वर्ग ने RSS और RSS के विद्यार्थी संगठन ABVP के साथ मिल कर , कंधे से कंधा लगा कर खुद को मिले 'मंडल आरक्षण' के खिलाफ तांडव मचाया था..
और खुद को मिले भयानक दे दनादन आरक्षण को अदालत की समिक्षा के लिये भिजवाना पडा था..
देश का कुल 65% ओबीसी मंडल आरक्षण देने वाले 'विश्वनाथ प्रताप सिंग और ऊनकी सरकार से इतनी नफरत कर रहा था के भारत के इतिहास मे इस का ऊदाहरण देना कठीन है'
पाकिस्तान और मुसलमान के नाम से अन्य मौको पर देश को भ्रमित कर लिया जाता है..
ऐसी हजारो साल की गुलाम जनता क्या श्रीलंका , नेपाल और बांग्लादेश करेंगी..?
नेपाल जैसा होने डर से नकली वर्दी वाली और बिना वर्दी वाली जो प्रायवेट सेना बनाई गई है..
ऊस मे भी हजारो साल के गुलाम ही भरे पडे है..
विपक्ष ने अब तक नही पुछा के क्या ये लोग पुलवामा , पहेलगाम भी आते जाते है ?
ये संयोग या प्रयोग का शब्द हर विध्वंस की टाईमिंग के बाद इस्तेमाल होता है ऊस की हकीकत क्या है ?
कुल मिला कर ये साबित किया जा सकता है के देश के सेक्युलर ढांचे , लोकतंत्र को बचाने के लिये देश की जनता कभी क्रांती वगैरह नही करेंगी..
वर्णद्वेषी मनुस्मृति वाले चाहे तो देश मे हर साल विद्रोह हो सकता है ..
ये रोस्टर पध्दती के दंगे क्या है अघोषित विद्रोह और भ्रम फैलाना है..







खतरनाक मोड़: संवैधानिक संस्थाएं, हितों का टकराव और सदमे में लोकतंत्र
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देश के सर्वोच्च कानूनी और प्रशासनिक गलियारों से जो खबरें और तथ्य सामने आए हैं,वे पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए निहायत ही चिंताजनक है। 
LiveLaw और The Indian Express की रिपोर्टों के माध्यम से ऐसे घटनाक्रम एक साथ सामने आए हैं, जो जनता के मन में सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग- सर्वोच्च संवैधानिक संस्थाएं - की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करते हैं। 
सामने आया है कि सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ जज के पुत्र मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के आधिकारिक वकील हैं। चिंता की बात यह है कि 'वही जज' सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त से जुड़े अति-महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करने वाली पीठ में शामिल रहे हैं। यह हितों के टकराव (Conflict of Interest) का संकट है। 
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के विवादित कानून को चुनौती देने वाली याचिका, जिस पर तुरंत निर्णय होना चाहिए था, अब अनिश्चितकाल के लिए टल गई है।
नोएडा की तत्कालीन डीएम (जो मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी हैं) द्वारा एक छात्र पर एनएसए (NSA) के मनमाने इस्तेमाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फटकार लगाते हुए कड़ा जुर्माना लगाया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की पीठ ('वही जज') ने इस पर तुरंत रोक लगा दी। 'खास' के लिए त्वरित राहत और 'आम' के लिया दर-दर की ठोकरें ! डीएम मेधा रूपम का मामला जिस विषय से संबंधित था, वह नियमित रोस्टर के तहत जस्टिस शर्मा ('वही जज') की पीठ के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था। इसके अलावा, इसी से जुड़े मामले पर पहले से ही जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की पीठ सुनवाई कर रही थी। ऐसे में इस मामले का विशेष रूप से जस्टिस शर्मा की पीठ को सौंपा जाना अपने आप में संदेह पैदा करता है।   
सोचने वाली बात (Food for Thought) यह है कि - 
कानून का एक सदियों पुराना और सर्वमान्य सिद्धांत है - "न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए" - जब किसी न्यायाधीश के परिवार के सदस्य का करियर या व्यावसायिक हित किसी सरकारी संस्था (जैसे चुनाव आयोग) से जुड़ा हो, तो क्या आम नागरिक उस संस्था के खिलाफ अदालत से पूरी तरह निष्पक्ष फैसले की उम्मीद कर सकता है ? जब सुप्रीम कोर्ट के ही वरिष्ठ जस्टिस दीपांकर दत्ता सार्वजनिक रूप से यह कहें कि 'चुनाव आयोग को केवल स्वतंत्र होना ही नहीं चाहिए, बल्कि स्वतंत्र दिखना भी चाहिए', तो समझना होगा कि संविधान कितना भी अच्छा हो, यदि उसे चलाने वाले निष्पक्ष न हों तो वह विफल हो जाता है। वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि नियम-कानूनों की भावना को ताक पर रखकर केवल कानूनी छिद्रों का सहारा लिया जा रहा है, जिससे संस्थागत मर्यादाएं टूट रही हैं।
तो हमें किस बात पर विचार करना चाहिए ?
(01) ❓-लोकतंत्र किसी इमारत से नहीं, बल्कि संस्थाओं पर जनता के भरोसे से चलता है। अगर आम नागरिक का अदालत और चुनाव आयोग की निष्पक्षता से विश्वास उठ गया, तो लोकतंत्र का आधार ही हिल जाएगा। (02) ❓-चुनाव कराने वाली संस्थाओं की नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी न हो और उस पर न्यायिक निगरानी भी कमजोर पड़ जाए, तो चुनाव केवल एक ढकोसला बनकर रह जाएंगे और देश में महज नियंत्रित लोकतंत्र (Managed Democracy) रह जाएगा।  (03)-❓ जब कड़े प्रशासनिक फैसलों (जैसे NSA के दुरुपयोग) पर भी अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी, तो आम नागरिक के संवैधानिक मौलिक अधिकारों की रक्षा कौन करेगा? क्या यह जवाबदेही के अंत की घोषणा है। 
आप क्या सोच रहें हैं ?
यह मामला किसी एक पार्टी, नेता, अफसर या जज का नहीं है। एक आम नागरिक या छात्र जब अपने अधिकारों के लिए लड़ता है तो उस पर NSA जैसे कठोर कानून थोप दिए जाते हैं, लेकिन जब प्रशासनिक या संवैधानिक पदों पर बैठे शक्तिशाली अधिकारियों या उनके परिजनों की बात आती है, तो पूरी व्यवस्था तुरंत राहत देने और जवाबदेही टालने की दिशा में काम करती दिखती है। इससे समाज में आम आदमी का न्याय व्यवस्था पर से विश्वास कम होता है।यह देश के संवैधानिक संतुलन (Checks and Balances) का मामला है। क्या संवैधानिक संस्थाओं को अदृश्य ताकतवर हाथ नियंत्रित कर रहें हैं ? क्या तराजू बेपर्दा होकर सत्ता की तरफ झुकती दिख रही है ? क्या न्यायपालिका को अपने भीतर 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) को लेकर सख्त और पारदर्शी नियम लागू नहीं करने चाहिए ? क्या ऐसे मामलों में न्यायाधीशों को स्वेच्छा से सुनवाई से अलग (Recuse) नहीं हो जाना चाहिए ?
इन रिपोर्टों का संयुक्त निष्कर्ष यह चेतावनी देता है कि भारत "संस्थागत निष्पक्षता के संकट" से गुजर रहा है। देश एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है जहाँ संवैधानिक संस्थाएं स्वायत्त दिखने के बजाय सत्ता के अनुकूल या सत्ता से प्रभावित दिख रही हैं। सवाल यह भी उठता है कि क्या नियम और प्रक्रियाएं सबके लिए समान रूप से काम कर रही हैं ? क्या आम नागरिक के संवैधानिक हित सर्वोपरि सूची में हैं, सुरक्षित हैं ?
समय रहते न्यायपालिका ने अपने भीतर 'हितों के टकराव' के कड़े मानक लागू नहीं किए, और निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाओं की स्वायत्तता बहाल नहीं की, तो लोकतंत्र का आंतरिक ढांचा खोखला होता चला जाएगा।






  ~विजय राजबली माथुर ©

Friday, September 25, 2026

स्वतंत्र पत्रकारिता में रितिका चोपड़ा (Ritika Chopra) का प्रेरणादायक योगदान Keshaw Bhatter's Post

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कुछ पोस्ट्स देखी जिनमे रीतिका चोपड़ा को कॉन्ग्रेसी एजेंट बताते हुए अपशब्द कहे गए हैं। दरअसल 23.09.2026 के ' द इंडियन एक्स्प्रेस' में छपी भारत के चुनाव आयोग की अंदरूनी स्टोरी ने देश भर में हलचल मचा दी है। यह बात कुछ लोगों को कुछ ज्यादा ही परेशान कर रही है। बस!  इस पोस्ट को लिखने की भूमिका बन गई। और हाँ- 'शाबाश !'  
पत्रकारिता में निष्पक्षता, साहस और गहराई की एक मिसाल! 
रितिका चोपड़ा (Ritika Chopra), जिन्हें 19 वर्षों से अधिक का एक शानदार पत्रकारिता अनुभव है, वर्तमान में The Indian Express, Mumbai की Resident Editor के रूप में अपनी भूमिका निभा रही हैं।
राजनीति, शासन और शिक्षा नीति जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर उनकी पकड़ बेजोड़ है। अपने करियर के दौरान उन्होंने भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) और शिक्षा मंत्रालय जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर ऐसी खोजी रिपोर्ट्स तैयार की हैं, जिन्होंने सरकार और प्रशासन को जवाबदेह ठहराया है।
एक नज़र उनके प्रेरणादायक सफर और उपलब्धियों पर:
प्रमुख सम्मान एवं पुरस्कार:
चमेली देवी जैन अवॉर्ड (2024): खोजी पत्रकारिता और स्वतंत्र संस्थाओं की स्थिति उजागर करने के लिए 'आउटस्टैंडिंग वुमन मीडिया पर्सन ऑफ द ईयर'।
रामनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म अवॉर्ड (2021): चुनाव आयोग के कामकाज पर की गई बेहतरीन सीरीज़ के लिए।
IPI इंडिया अवॉर्ड (2022): 2019 के लोकसभा चुनावों के निष्पक्ष और साहसिक कवरेज के लिए।
UNFPA-लाडली मीडिया अवॉर्ड (2018) एवं ACJ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म स्पेशल मेंशन (2018) ("डीवैल्यूएड डिग्री" सीरीज़ के लिए)।
शिक्षा और करियर की शुरुआत:
उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज, कोलकाता से मास कम्यूनिकेशन में डिग्री हासिल की। 2006 में 'हिंदुस्तान टाइम्स' से इंटर्नशिप के रूप में शुरू हुआ यह सफर 'द इकोनॉमिक टाइम्स' और 'मेल टुडे' जैसे प्रमुख संस्थानों से होते हुए आज पत्रकारिता के एक नए शिखर पर है।
सच्चाई को सामने लाने और स्वतंत्र पत्रकारिता की साख को बनाए रखने के लिए उनका योगदान प्रेरणादायक है! 

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  ~विजय राजबली माथुर ©

Saturday, September 19, 2026

श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद------ Old is Gold Films's Post



आज जब तिरंगा आसमान में लहराता है, तो उसके साथ कुछ पंक्तियां अपने आप दिल में गूंजने लगती हैं—“विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा।” यह सिर्फ एक देशभक्ति गीत नहीं है। इसके पीछे स्वतंत्रता आंदोलन की वह कहानी छिपी है, जब भारत गुलाम था और देशभक्ति केवल भावना नहीं, बल्कि एक संघर्ष थी। इस गीत को शब्द देने वाले कवि थे श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’। उनका नाम शायद आज की पीढ़ी में उतना चर्चित न हो, लेकिन उनके लिखे शब्द स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा बन चुके हैं। शिक्षक रहे श्यामलाल गुप्त ने कविता को मनोरंजन का माध्यम नहीं माना। उनके लिए शब्द जनता में साहस जगाने और देश के लिए एकजुट करने का माध्यम थे। यही वजह है कि उनके लिखे गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में लोगों के बीच एक अलग ऊर्जा पैदा की।
एक व्यापारी परिवार का बेटा, जिसने कारोबार छोड़कर किताब और आंदोलन का रास्ता चुना
श्यामलाल गुप्त का जन्म 9 सितंबर 1896 को कानपुर के नरवल में हुआ था। उनके पिता विशेष्वर प्रसाद और माता कौशल्या देवी थीं। परिवार का संबंध दोसार वैश्य समुदाय से था और पारिवारिक व्यवसाय भी उनके सामने मौजूद था। लेकिन श्यामलाल का मन व्यापार में नहीं लगा। उन्होंने परिवार के पारंपरिक व्यवसाय में जाने के बजाय शिक्षा को अपना पेशा बनाया। कानपुर के अलग-अलग सरकारी स्कूलों में शिक्षक के रूप में काम करते हुए उनका जुड़ाव धीरे-धीरे स्वतंत्रता आंदोलन से गहरा होता गया। उस दौर में स्कूल की नौकरी और राजनीतिक गतिविधियों को साथ लेकर चलना आसान नहीं था। ब्रिटिश शासन की निगाहें उन लोगों पर रहती थीं, जो लोगों में राष्ट्रीय चेतना पैदा कर रहे थे। फिर भी श्यामलाल पीछे नहीं हटे। उनके लिए अध्यापन केवल नौकरी नहीं था। वह समाज और देश के भविष्य को तैयार करने का माध्यम भी था।
फिर हुई गणेश शंकर विद्यार्थी से मुलाकात, जिसने जिंदगी की दिशा बदल दी
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान श्यामलाल गुप्त की मुलाकात महान पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी से हुई। यह मुलाकात उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ बनी। कांग्रेस के एक अधिवेशन के दौरान हुए इस संपर्क के बाद उन्हें फतेहपुर क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े अभियान की जिम्मेदारी मिली। अब उनकी भूमिका केवल शिक्षक की नहीं रह गई थी। वह लोगों के बीच राष्ट्रीय भावना पहुंचाने वाले कार्यकर्ता भी बन चुके थे। इसी दौर में उनकी लेखनी भी अधिक मुखर हुई। वह जानते थे कि हर व्यक्ति भाषण सुनने नहीं आएगा, लेकिन एक गीत हजारों लोगों की जुबान पर चढ़ सकता है। इसलिए उनके शब्दों में सरलता, जोश और सामूहिक भावना दिखाई देती थी। आगे चलकर यही गुण “झंडा ऊंचा रहे हमारा” को एक व्यापक जनगीत बनाने में महत्वपूर्ण साबित हुए।
1921 में गिरफ्तारी, लेकिन क्या ब्रिटिश सरकार उनके शब्दों को रोक पाई?
साल 1921 में ब्रिटिश शासन ने श्यामलाल गुप्त को गिरफ्तार कर लिया। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय लोगों के लिए जेल जाना उस समय असामान्य बात नहीं थी। गिरफ्तारी के बाद भी उनका संकल्प कमजोर नहीं हुआ। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने गुप्त रूप से आंदोलन से जुड़ा काम जारी रखा। इसके बाद 1930 और 1944 में भी उन्हें गिरफ्तार किया गया और दोनों अवसरों पर उन्हें कारावास भुगतना पड़ा। करीब 19 वर्षों तक वह फतेहपुर जिला कांग्रेस समिति के अध्यक्ष रहे। उनके जीवन में राजनीति सत्ता पाने का माध्यम नहीं थी। वह इसे स्वतंत्रता के संघर्ष का हिस्सा मानते थे। उनकी प्रतिबद्धता का एक और उल्लेखनीय पहलू था उनका व्यक्तिगत संकल्प। स्वतंत्रता मिलने तक उन्होंने जूते और छाता इस्तेमाल न करने का व्रत रखा था। यह छोटा-सा व्यक्तिगत निर्णय उनके भीतर मौजूद त्याग और अनुशासन की भावना को दर्शाता है।
वह कविता जिसने 1924 में लिखे जाने के बाद इतिहास का रास्ता पकड़ लिया
“झंडा ऊंचा रहे हमारा” की मूल रचना मार्च 1924 में एक देशभक्ति कविता के रूप में हुई थी। इसे कानपुर की खन्ना प्रेस ने प्रकाशित किया और इसकी पांच हजार से अधिक प्रतियां बिकने की बात दर्ज है। उस समय भारत स्वतंत्र नहीं था। इसलिए तिरंगे और स्वराज की बात करना अपने आप में राजनीतिक संदेश था। इसी वर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस रचना को आधिकारिक ध्वज गीत के रूप में अपनाया। 13 अप्रैल 1924 को कानपुर के फूलबाग में जलियांवाला बाग शहीद दिवस के अवसर पर इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया। इस कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू भी उपस्थित थे। एक कविता का इस तरह स्वतंत्रता आंदोलन के सार्वजनिक मंच तक पहुंचना उसके प्रभाव का संकेत था। गीत अब केवल कागज पर लिखे शब्द नहीं रह गया था। वह आंदोलन की सामूहिक आवाज बनने लगा था।
1938 में हरिपुरा अधिवेशन, और मंच पर मौजूद थे स्वतंत्रता आंदोलन के बड़े चेहरे
गीत की यात्रा यहीं नहीं रुकी। वर्ष 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में सरोजिनी नायडू ने इस गीत को प्रस्तुत किया। उस समय महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, गोविंद बल्लभ पंत, जमनालाल बजाज, महादेव देसाई और पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेता वहां मौजूद थे। कल्पना कीजिए उस दौर का दृश्य, जब एक देश गुलामी में था और हजारों लोग स्वराज की आकांक्षा के साथ एकत्रित थे। ऐसे वातावरण में जब तिरंगे को समर्पित गीत गूंजता होगा, तो उसके शब्द केवल संगीत नहीं रह जाते होंगे। वे सामूहिक संकल्प का रूप ले लेते होंगे। यही वह दौर था जब श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ की रचना स्वतंत्रता आंदोलन की सांस्कृतिक स्मृति में और गहराई से दर्ज होती चली गई।
आजादी के बाद भी गीत की यात्रा खत्म नहीं हुई, बल्कि एक फिल्म तक पहुंची
भारत को 1947 में स्वतंत्रता मिली, लेकिन इस गीत की लोकप्रियता बनी रही। वर्ष 1948 में यह गीत हिंदी फिल्म “आजादी की राह पर” में शामिल हुआ। फिल्म का निर्देशन ललित चंद्र मेहता ने किया था और इसमें पृथ्वीराज कपूर तथा वनमाला पवार प्रमुख भूमिकाओं में थे। गीत को शेखर कल्याण ने संगीतबद्ध किया और सरोजिनी नायडू की आवाज में इसे प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख मिलता है। यह तथ्य इस गीत की यात्रा को विशेष बनाता है। जो रचना 1924 में स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से लिखी गई थी, वह स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में सिनेमा के माध्यम से भी लोगों तक पहुंची। यानी कविता ने आंदोलन के मंच से लेकर साहित्य, सार्वजनिक समारोह और सिनेमा तक अपना सफर तय किया।
1952 में वही कवि, अपने ही गीत के साथ राष्ट्रीय मंच पर
स्वतंत्रता के बाद श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ को उनके गीत के लिए सार्वजनिक सम्मान भी मिला। 15 अगस्त 1952 को स्वतंत्रता दिवस समारोह में उन्हें ध्वज गीत गाने के लिए चुना गया। जिस गीत को उन्होंने वर्षों पहले गुलाम भारत के दिनों में लिखा था, उसे स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय समारोह में स्वयं प्रस्तुत करना उनके जीवन का असाधारण क्षण रहा होगा। एक कवि के लिए इससे बड़ी विडंबना और उपलब्धि क्या हो सकती है कि जिस आजादी का सपना उसने शब्दों में लिखा था, उसी आजाद देश में वह अपने गीत को तिरंगे के सामने गा रहा था। उनकी रचना अब संघर्ष की स्मृति से आगे बढ़कर स्वतंत्र भारत के सार्वजनिक समारोहों का हिस्सा बन चुकी थी।
1972 में मिला सम्मान, फिर 1973 में पद्मश्री
समय आगे बढ़ा, लेकिन देश ने श्यामलाल गुप्त के योगदान को भुलाया नहीं। 1972 के गणतंत्र दिवस समारोह में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें सम्मान पत्र प्रदान किया। इसके अगले वर्ष, 1973 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। यह सम्मान उनकी साहित्यिक और देशभक्ति से जुड़ी भूमिका की राष्ट्रीय पहचान का प्रमाण था। हालांकि उनके जीवन की सबसे बड़ी पहचान किसी पुरस्कार से नहीं बनी। उनकी पहचान उस गीत से बनी, जो दशकों बाद भी भारत के राष्ट्रीय समारोहों में सुनाई देता रहा। एक कवि की रचना का इतने लंबे समय तक जीवित रहना केवल साहित्यिक उपलब्धि नहीं है। यह इस बात का प्रमाण भी है कि कुछ शब्द समय से आगे निकल जाते हैं।
1997 में डाक टिकट पर आया नाम, लेकिन असली स्मारक आज भी वही गीत है
श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ का निधन 10 अगस्त 1977 को 81 वर्ष की आयु में हुआ। लेकिन उनकी कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। उनके निधन के लगभग दो दशक बाद, 4 मार्च 1997 को तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया। यह सम्मान उनकी राष्ट्रीय पहचान को एक और स्थायी स्मृति देता है। फिर भी उनके जीवन का सबसे बड़ा स्मारक कोई इमारत, प्रतिमा या डाक टिकट नहीं है। उनका सबसे बड़ा स्मारक वह गीत है, जिसे भारत में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के ध्वजारोहण समारोहों में आज भी गाया जाता है। हर बार जब तिरंगा ऊपर उठता है और ये शब्द गूंजते हैं, तब एक ऐसे कवि की याद भी जीवित हो जाती है, जिसने अपने शब्दों को देश की आवाज बना दिया।
लेकिन इस गीत की सबसे बड़ी ताकत आखिर क्या थी?
गीत की पंक्तियों में तिरंगे को शक्ति, प्रेम, वीरता और मातृभूमि की भावना से जोड़ा गया है। इसमें स्वतंत्रता के संघर्ष के दौरान भय को पीछे छोड़ने का आह्वान है। इसमें स्वराज को लक्ष्य बनाने और देशवासियों को एक साथ खड़े होने की प्रेरणा मिलती है। यही सरलता इसकी सबसे बड़ी ताकत बनी। कठिन राजनीतिक विचारों को एक ऐसे गीत में बदल देना, जिसे आम लोग आसानी से याद रख सकें, अपने आप में बड़ी रचनात्मक क्षमता थी। श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ ने कविता को किताबों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने उसे जनता की आवाज बनने दिया। इसलिए “झंडा ऊंचा रहे हमारा” केवल एक गीत के रूप में नहीं देखा जाता। यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की सांस्कृतिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है।
“विजयी विश्व तिरंगा प्यारा…” की गूंज में आज भी छिपी है एक पूरी पीढ़ी की कहानी
जब आज हम कहते हैं—“विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा”, तो शायद हमें उन शब्दों के पीछे खड़े व्यक्ति की पूरी कहानी याद नहीं रहती। लेकिन उन पंक्तियों में उस पीढ़ी की आकांक्षाएं दर्ज हैं, जिसने गुलामी देखी, संघर्ष किया, जेल गई और स्वतंत्रता का सपना देखा। श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ ने अपने जीवन से दिखाया कि इतिहास केवल बड़े राजनीतिक नेताओं से नहीं बनता। इतिहास उन कवियों, शिक्षकों, लेखकों और सामान्य नागरिकों से भी बनता है, जिन्होंने अपने-अपने तरीके से देश की चेतना को मजबूत किया। यही कारण है कि उनका नाम भारतीय इतिहास और देशभक्ति साहित्य में एक विशेष स्थान रखता है। Old is Gold Films ऐसे ही भूले-बिसरे चेहरों और उनकी अनसुनी कहानियों को फिर से सामने लाने का प्रयास करता है। क्योंकि कुछ कहानियां पुरानी जरूर होती हैं, लेकिन उनकी आवाज कभी पुरानी नहीं होती।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।




  ~विजय राजबली माथुर ©