Tuesday, March 24, 2026

ममता बनर्जी की संभावनाएं ------ विजय राजबली माथुर

 


Friday, October 19, 2012

 "ममता बनर्जी के प्रधानमंत्री बनने की संभावनाएं ? "

उद्धृत लेख द्वारा मैंने स्पष्ट किया था :

पुराने अखबारों का अवलोकन करते समय सुश्री ममता बनर्जी की यह जन्मपत्री दिखाई दे गई जिसमे सन 2002 तक का उनका भविष्य लेखक ने अपनी थ्यौरी से दिया था। उसके सही-गलत होने की विवेचना मैं नहीं कर रहा हूँ। मैंने विगत विधानसभा चुनावों से पूर्व अपने एक लेख द्वारा ममता जी की कटु राजनीतिक आलोचना भी की थी और पश्चिम बंगाल की जनता से आह्वान भी किया था कि वह ममता जी को सत्तारूढ़ न होने दे। परंतु ममता जी मुख्यमंत्री बनी और बड़ी शान से बनीं। इसलिए भी कौतूहल था उनका भविष्य जानने का और इसलिए भी कि दार्जिलिंग ज़िले के सिलीगुड़ी मे 8वी कक्षा से 10वी बोर्ड की परीक्षा पास करने तक रहने के कारण बंगाल की राजनीति मे दिलचस्पी सदा ही रही है। वहाँ से 10-15 किलोमीटर दूर ही है नक्सल बाड़ी जहां 1967 मे 'नक्सल बाड़ी से नल बाड़ी तक' आंदोलन हमारे रहते ही शुरू हुआ था। इस आंदोलन का सम्पूर्ण लाभ राजस्थान के मारवाड़ियों को हुआ था जिनको इंश्योरेंस क्लेम नुकसान से कहीं बहुत ज़्यादा मिला था। अपनी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर आज भी मैं ममता जी का समर्थक नहीं हूँ,परंतु उनके ग्रह-नक्षत्र जो बोल रहे हैं उनको झुठलाया भी तो नहीं जा सकता। misuse of knowledge भी मैं नहीं कर सकता। अतः ममता जी की कुंडली का वैज्ञानिक निष्पक्ष  विश्लेषण प्रस्तुत करने मे कोई पूर्वाग्रह(IBN7 के प्रतिनिधि ब्लागर एवं उनकी  सहयोगी पूना प्रवासी ब्लागर की भांति जो ज्योतिष को मीठा जहर कहते हैं ) भी नहीं है। 



ममता जी की प्रस्तुत जन्मपत्री के अनुसार उनका जन्म लग्न-मकर है और---



द्वितीय भाव मे कुम्भ का 'मंगल'



पंचम भाव मे वृष का 'चंद्रमा'



षष्ठम भाव मे मिथुन का 'केतू'



सप्तम भाव मे कर्क का 'ब्रहस्पति'



दशम भाव मे तुला का 'शनि'



एकादश भाव मे वृश्चिक का 'शुक्र'



द्वादश भाव मे धनु के 'सूर्य','बुध' और 'राहू'



अखबारी विश्लेषण से अलग मेरा विश्लेषण यह है कि जन्म के बाद ममता जी की 'चंद्र महादशा' 07 वर्ष 08 आठ माह एवं 07 दिन शेष बची थी। इसके अनुसार 03 जूलाई 2010 से वह 'शनि'महादशांतर्गत 'शुक्र' की अंतर्दशा मे 03 सितंबर 2013 तक चलेंगी। यह उनका श्रेष्ठत्तम समय है। इसी मे वह मुख्य मंत्री बनी हैं। 34 वर्ष के मजबूत बामपंथी शासन को उखाड़ने मे वह सफल रही हैं तो यह उनके अपने ग्रह-नक्षत्रों का ही स्पष्ट प्रभाव है। 



इसके बाद पुनः 'सूर्य' की शनि मे  अंतर्दशा 15 अगस्त 2014 तक  उनके लिए अनुकूल रहने वाली है और लोकसभा के चुनाव इसी अवधि के  मध्य होंगे। केंद्र (दशम भाव मे )'शनि' उनको 'शश योग' प्रदान कर रहा है   

जो 'राज योग' है।



ममता जी को समयानुकूल सही बात कहने व उठाने का विलक्षण लाभ भी   उनके ग्रह प्रदान कर रहे हैं   

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आजकल इधर कई यू ट्यूब चेनल्स पर दिग्गज ज्योतिषी गण ' ममता बनर्जी ' के सत्ता वापसी को असंभव  बताते नहीं थक रहे है ऐसा  कर वे सत्तारूढ़ केंद्र सरकार से  पुरस्कार प्राप्त कर सकते हैं। 

मेरे अपने आँकलंन  के अनुसार ०६ फरवरी २०२६ से ०६ दिसंबर २०२८ तक ममता जी की बुध महादशान्तर्गत ' शुक्र' की अंतर्दशा चल रही है जो सुखदायक और श्रेष्ठ है उसके बाद भी ०९ मार्च २०३२ तक  ममता जी का समय लाभदायक,श्रेष्ठ और राज्य वृद्धिदायक होगा। अतः यदि व्यापक हेराफेरी ,धांधली और धूर्तता कामयाब न हो तो ममता जी की पुनः जीत अवश्य ही होगी। हम उनकी सफलता के लिए  मंगलकांनाएं। 











 ~विजय राजबली माथुर ©

Friday, October 17, 2025

स्वयंवर की जीत : स्त्री ने तोड़ी रूढ़ियों की जंजीर ------ डॉ. गिरीश कुमार वर्मा


Danda Lakhnavi
15 Oct 2025
 
 
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स्वयंवर की जीत : स्त्री ने तोड़ी रूढ़ियों की जंजीर
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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा
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सभा  में  सैकड़ों  राजकुमार  खड़े  हैं।  सबकी  निगाहें  एक  कन्या पर टिकी हैं— हाथ में माला, मन में  साहस।  मंच पर सजी यह माला केवल वरमाला नहीं, बल्कि युगों की जंजीरों को तोड़ने का साहस है। वह न किसी कुल की कैदी है, न  किसी  परंपरा   की। आज  वह  चुनने  आई है— अपने जीवन का साथी, अपने  विवेक  से।  यह केवल  विवाह  नहीं, यह  एक घोषणा  है— “मैं चुनूंगी!” यही था— स्वयंवर।
वर्ण की दीवारें
प्राचीन भारत में समाज को चार वर्गों — ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र— में बंटा था। व्यक्ति की योग्यता नहीं, उसके  जन्म  का  कुल तय करता था कि वह क्या करेगा, कहाँ बैठेगा और किससे  विवाह  करेगा।  प्रेम करना तो दूर की बात, प्रेम  के  बारे  में  सोचना भी अपराध  समझा  जाता   था। जन्म  और  जन्मपत्री  से  जीवनपत्र  लिख  दिया  जाता  था— और समाज  उस  पर  मुहर लगा देता था। ऐसे  समय  में  स्वयंवर  प्रथा ने रूढ़ियों की दीवार पर पहली चोट की। यह वह मंच था जहाँ कन्या को वर चुनने की स्वतंत्रता दी जाती थी— न कुल-गोत्र का भय, न वर्ण की दीवार, केवल एक प्रश्न— “कौन योग्य है?”
एक कवि ने बिल्कुल ठीक कहा—
“वर्ण व्यवस्था में रहे, युवजन हृदय मसोस!
मिला स्वयंवर-प्रथा में,उनको अति संतोष!!”
दुष्यंत–शकुंतला : जब प्रेम ने वर्ण को हराया
महर्षि  कण्व  की कुटिया में जब राजा दुष्यंत ने शकुंतला  को  देखा,  वहाँ  न  कोई सभा थी, न प्रतियोगिता— वहाँ थीं भावनाएँ, संवेदनाएँ और स्वीकृति की नीरव गूँज। यह प्रेम का स्वयंवर था, जहाँ कुल या वर्ण की दीवारें पिघल गईं। दुष्यंत और शकुंतला का मिलन  भारतीय  समाज  की  पहली भावनात्मक क्रांति थी — जिसने कहा, “प्रेम न जाति पूछता है, न वंश; वह तो बस दिल की बात सुनता है।”
कालिदास–विद्योतमा : बुद्धि का स्वयंवर
इतिहास  ने  एक  और  अद्भुत  स्वयंवर  देखा— विद्योतमा नामक विदुषी ने शर्त रखी, “जो मुझे शास्त्रार्थ में पराजित करे, वही  मेरा  वर  होगा।” यहाँ न राजवंश था, न सत्ता— केवल ज्ञान और तर्क   की   परीक्षा  थी।  कहते    हैं,  भाग्यवश कालिदास चुने गए, पर बाद में उन्होंने विद्योतमा के ज्ञान को अपनी प्रेरणा बना लिया। यह स्वयंवर बुद्धि की प्रतिष्ठा था, जिसने पुरुष-प्रधान समाज में स्त्री की मेधा को मान्यता दी।
स्वयंवर – स्वतंत्रता का सामाजिक उद्घोष
चाहे  दुष्यंत–शकुंतला  का  भावनात्मक स्वयंवर हो या विद्योतमा–कालिदास का बौद्धिक स्वयंवर— दोनों  ने  समाज  को  एक  ही संदेश  दिया— “विवाह केवल संस्कार नहीं, चयन का अधिकार है।” स्वयंवर  प्रथा  में  स्त्री  को “दी जाने वाली वस्तु” नहीं, बल्कि “निर्णय लेने वाली  व्यक्ति”  के रूप में मान्यता मिली। यही भारतीय समाज में स्त्री– स्वतंत्रता का पहला सामाजिक उद्घोष था।
विश्व में स्वयंवर की गूँज
भारत  की  यह  परंपरा  अकेली नहीं थी। दुनिया  के  कई  हिस्सों में भी स्त्री–चयन के विविध रूप मिलते हैं। यूनान  में  हेलन  ऑफ  ट्रॉय  जैसी  कथाओं में राजकुमारियाँ अपने  वर  का  चुनाव  करती  थीं। नॉर्स  देशों  में  वीरांगनाएँ  युद्ध  में  विजयी  योद्धा को पति के रूप में स्वीकारती थीं। सेल्टिक समाज में स्त्रियाँ अस्थायी विवाह के बाद स्वतंत्र  रूप  से  निर्णय  कर सकती थीं। चीन में  “ब्राइड शो”  आयोजित  होते  थे, जहाँ  सम्राट देशभर  की  युवतियों  में  से चयन करता था— यद्यपि भारत के समान स्वतंत्रता वहाँ नहीं थी।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि स्त्री–चयन की चेतना सार्वभौमिक रही है, पर भारत ने इसे सबसे पहले “संस्कार” का रूप दिया।
स्वयंवर का नया रूप : कोर्ट मैरिज 
अब दरबार की जगह  कोर्ट है, माला की  जगह  सर्टिफिकेट,  और  साक्षी के रूप में दो गवाह। पहले वर को धनुष उठाना पड़ता था, अब बस पेन उठाना पड़ता है! फ़र्क बस इतना है— पहले  वर   को   परीक्षा   देनी   पड़ती  थी, अब  बस  शपथपत्र! जब  से कोर्ट  मैरिज  का  चलन शुरू हुआ, स्वयंवर मानो ऑनलाइन हो गया है— अब जाति, गोत्र या वर्ग कोई बाधा नहीं; वर–कन्या स्वयं तय करते हैं कि वे एक-दूसरे के योग्य हैं या नहीं।
स्वयंवर – स्वतंत्रता की शाश्वत ज्योति
वर्ण व्यवस्था ने मनुष्य को बाँटा, पर स्वयंवर ने उसे जोड़ा। दुष्यंत  और शकुंतला ने बताया कि   प्रेम   समानता   सिखाता   है,  विद्योतमा  और  कालिदास ने दिखाया कि बुद्धि बंधनों से मुक्त होती है, और आज की कोर्ट मैरिज यह प्रमाणित करती है कि समाज चाहे जैसा भी हो, चयन का अधिकार सदा अजर-अमर रहेगा।
स्वयंवर  की  यह  ज्योति  आज  भी  उतनी ही उज्ज्वल है— जब भी कोई  स्त्री  अपने  मन  से   निर्णय  लेती है, इतिहास फिर से मुस्करा उठता है।

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डाक्टर डंडा लखनवी साहब की इस पोस्ट पर मेरी  टिप्पणियाँ और डाक्टर साहब के प्रत्युत्तर :------

1)  पौराणिक-पोंगापंथी -ब्राह्मणवादी व्यवस्था मे जो छेड़-छाड़ विभिन्न वैज्ञानिक आख्याओं के साथ की गई है उससे 'कायस्थ' शब्द भी अछूता नहीं रहा है।
'कायस्थ'=क+अ+इ+स्थ
क=काया या ब्रह्मा ;
अ=अहर्निश;इ=रहने वाला;
स्थ=स्थित।
'कायस्थ' का अर्थ है ब्रह्म से अहर्निश स्थित रहने वाला सर्व-शक्तिमान व्यक्ति।

2 )  आज से दस लाख वर्ष पूर्व मानव जब अपने वर्तमान स्वरूप मे आया तो ज्ञान-विज्ञान का विकास भी किया। वेदों मे वर्णित मानव-कल्याण की भावना के अनुरूप शिक्षण- प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई। जो लोग इस कार्य को सम्पन्न करते थे उन्हे 'कायस्थ' कहा गया। क्योंकि ये मानव की सम्पूर्ण 'काया' से संबन्धित शिक्षा देते थे अतः इन्हे 'कायस्थ' कहा गया। किसी भी अस्पताल मे आज भी जेनरल मेडिसिन विभाग का हिन्दी रूपातंरण आपको 'काय चिकित्सा विभाग' ही लिखा मिलेगा। उस समय आबादी अधिक न थी और एक ही व्यक्ति सम्पूर्ण काया से संबन्धित सम्पूर्ण जानकारी देने मे सक्षम था। किन्तु जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई शिक्षा देने हेतु अधिक लोगों की आवश्यकता पड़ती गई। 'श्रम-विभाजन' के आधार पर शिक्षा भी दी जाने लगी। शिक्षा को चार वर्णों मे बांटा गया। 

3 )  कालांतर मे व्यापार-व्यवसाय से संबन्धित वर्ग ने दुरभि-संधि करके शासन-सत्ता और पुरोहित वर्ग से मिल कर 'ब्राह्मण' को श्रेष्ठ तथा योग्यता आधारित उपाधि-वर्ण व्यवस्था को जन्मगत जाती-व्यवस्था मे परिणत कर दिया जिससे कि बहुसंख्यक 'क्षुद्र' सेवा-दाताओं को सदा-सर्वदा के लिए शोषण-उत्पीड़न का सामना करना पड़ा उनको शिक्षा से वंचित करके उनका विकास-मार्ग अवरुद्ध कर दिया गया।'कायस्थ' पर ब्राह्मण ने अतिक्रमण करके उसे भी दास बना लिया और 'कल्पित' कहानी गढ़ कर चित्रगुप्त को ब्रह्मा की काया से उत्पन्न बता कर कायस्थों मे भी उच्च-निम्न का वर्गीकरण कर दिया। खेद एवं दुर्भाग्य की बात है कि आज कायस्थ-वर्ग खुद ब्राह्मणों के बुने कुचक्र को ही मान्यता दे रहा है और अपने मूल चरित्र को भूल चुका है। कहीं कायस्थ खुद को 'वैश्य' वर्ण का अंग बता रहा है तो कहीं 'क्षुद्र' वर्ण का बता कर अपने लिए आरक्षण की मांग कर रहा है।
यह जन्मगत जाति-व्यवस्था शोषण मूलक है और मूल भारतीय अवधारणा के प्रतिकूल है। आज आवश्यकता है योग्यता मूलक वर्ण-व्यवस्था बहाली की एवं उत्पीड़क जाति-व्यवस्था के निर्मूलन की।'कायस्थ' वर्ग को अपनी मूल भूमिका का निर्वहन करते हुये भ्रष्ट ब्राह्मणवादी -जातिवादी -जन्मगत व्यवस्था को ध्वस्त करके 'योग्यता आधारित' मूल वर्ण व्यवस्था को बहाल करने की पहल करनी चाहिए।

स्वयंवर प्रथा के पसंग मे विस्तृत दृष्टिकोण रखने हेतु हार्दिक आभार।

माथुर साहब! आपकी भाषा वैज्ञानिक और समाज शास्त्रीय दृष्टि सही है। प्राचीन काल में आज की तरह विज्ञान की शाखाएं प्रति शाखाएं नहीं थी।‌ 'काय' आधीन ही विज्ञान की अन्य शाखाएं थीं, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान इत्यादि।







  ~विजय राजबली माथुर ©
 

Tuesday, October 14, 2025

एक क्रांतिकारी विद्वान - लाला हरदयाल जन्म 14 अक्टूबर 1884 ------ by : Nehru Revives



एक क्रांतिकारी विद्वान - लाला हरदयाल 
जन्म 14 अक्टूबर 1884
1884 में दिल्ली के एक कायस्थ परिवार में जब लाला हरदयाल का जन्म हुआ, तो किसी ने नहीं सोचा था कि यह बालक एक दिन तीन महाद्वीपों में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बनेगा। उनके पिता गौरी दयाल माथुर जिला न्यायालय में काम करते थे और फारसी व उर्दू के विद्वान थे। घर में किताबों का माहौल था, बहसों का माहौल था।
सेंट स्टीफन कॉलेज, दिल्ली में पढ़ाई के दौरान वे हर परीक्षा में अव्वल आते। लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर करते समय भी उनकी प्रतिभा चमकती रही। 1905 में उन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सेंट जॉन्स कॉलेज में अध्ययन के लिए भारत सरकार की छात्रवृत्ति मिली। यह सम्मान की बात थी  भारत का सर्वश्रेष्ठ छात्र, ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में।
लेकिन ऑक्सफोर्ड में कुछ बदल गया। हरदयाल क्रांतिकारी विचारों के संपर्क में आए। श्यामजी कृष्ण वर्मा, सी.एफ. एंड्रयूज, भाई परमानंद  इन सबसे उनकी मुलाकातें हुईं। वे 'द इंडियन सोशियोलॉजिस्ट' पत्रिका में ब्रिटिश राज के खिलाफ तीखे लेख लिखने लगे। 1907 में उन्होंने वह किया जो उस दौर में लगभग अकल्पनीय था  ऑक्सफोर्ड की छात्रवृत्ति त्याग दी। उन्होंने ब्रिटिश सरकार को लिखा कि वे उस साम्राज्य से कोई एहसान नहीं लेना चाहते जो उनकी मातृभूमि को गुलाम बनाए हुए है।
1908 में वे भारत लौटे, लाहौर में राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय हो गए। 'मॉडर्न रिव्यू' और 'द पंजाबी' जैसे अखबारों में उनके लेख छपने लगे। ब्रिटिश सरकार ने उन पर नजर रखनी शुरू कर दी। जल्द ही स्थिति ऐसी हो गई कि उन्हें फिर देश छोड़ना पड़ा। 1909 में वे पेरिस पहुंचे और 'वंदे मातरम' के संपादक बने। फिर अल्जीरिया और मार्टिनिक गए। वहां उन्होंने संन्यासी जैसा जीवन अपनाया  केवल उबले अनाज और सब्जियां, जमीन पर सोना, ध्यान करना। "सादा जीवन, उच्च विचार" यह उनका सिद्धांत बन गया।
1911 में उन्होंने अमेरिका की धरती पर कदम रखा। सैन फ्रांसिस्को बंदरगाह पर उतरे तो कैलिफोर्निया के पंजाबी सिख किसानों ने उनका स्वागत किया। ये लोग बेहतर जीवन की तलाश में यहां आए थे, लेकिन कनाडा और अमेरिका में नस्लभेद का सामना कर रहे थे। अपनी ही धरती पर गुलाम थे, पराई धरती पर भी दोयम दर्जे के नागरिक। हरदयाल ने उनकी पीड़ा को समझा और उन्हें एक दिशा दी
कैलिफोर्निया में उन्होंने ओकलैंड में 'बाकुनिन इंस्टीट्यूट' की स्थापना की। वे स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर भी बने। लेकिन उनका असली काम कहीं और था। वे स्टॉकटन, सैक्रामेंटो, फ्रेस्नो जहां भी पंजाबी किसान रहते थे, वहां जाते, उनसे मिलते, बातचीत करते उन्हें बताते कि ब्रिटिश राज कैसे भारत को लूट रहा है, कैसे भारतीय अपनी ही धरती पर पराए हैं।
1913 में ओरेगॉन के एस्टोरिया शहर में एक ऐतिहासिक बैठक हुई। लाला हरदयाल, सोहन सिंह भकना, करतार सिंह सराभा और अन्य साथियों ने मिलकर गदर पार्टी की स्थापना की। 'गदर'  1857 के विद्रोह की याद दिलाने वाला नाम। पार्टी का मुख्यालय सैन फ्रांसिस्को में बनाया गया। एक साप्ताहिक अखबार 'गदर' निकलना शुरू हुआ  गुरमुखी, उर्दू और हिंदी में। इसकी पहली पंक्ति थी: "आज का हुक्म, सरकार का महकूम, दिल्ली तख्त का मालिक, हिंदुस्तान का बादशाह, गदर दी अदालत से निकला है।"
हरदयाल केवल राजनीतिक नेता नहीं थे। वे विद्वान थे, दार्शनिक थे। गदर के दफ्तर में रात-रात भर वे साथियों के साथ बैठकर बहसें करते समाजवाद पर, अराजकतावाद पर, भारतीय दर्शन पर। लेकिन साथ ही सशस्त्र संघर्ष की योजना भी बनाते। विदेशों में रहने वाले भारतीयों से चंदा इकट्ठा करते, हथियार खरीदने की योजनाएं बनाते।
अप्रैल 1914 में अमेरिकी सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। आरोप था अराजकतावादी साहित्य फैलाना। ब्रिटिश सरकार का दबाव था। जमानत पर रिहा होने के बाद हरदयाल ने फैसला किया अमेरिका छोड़ना होगा। वे पहले स्विट्जरलैंड गए, फिर बर्लिन। प्रथम विश्व युद्ध शुरू हो चुका था। जर्मनी ब्रिटेन के खिलाफ लड़ रही थी। हरदयाल ने सोचा दुश्मन का दुश्मन दोस्त।
बर्लिन में उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता समिति के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जर्मन खुफिया विभाग के साथ मिलकर भारत में विद्रोह की योजनाएं बनाईं। हथियारों की खेप भारत भेजने की कोशिशें हुईं। लेकिन ब्रिटिश खुफिया विभाग सतर्क था। कई योजनाएं विफल हो गईं।
युद्ध खत्म हुआ, जर्मनी हार गई। हरदयाल के लिए यूरोप में रहना मुश्किल हो गया। वे लंदन गए। 1930 में लंदन विश्वविद्यालय से बौद्ध संस्कृत साहित्य पर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। फिर स्वीडन गए और दस साल तक भारतीय दर्शन के प्रोफेसर रहे। 1920 के दशक के अंत में फिर अमेरिका लौटे और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले में संस्कृत पढ़ाने लगे।
यह एक अजीब विरोधाभास था  दिन में विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय ग्रंथों की व्याख्या करते, शाम को क्रांतिकारी साथियों से मिलते। उनकी किताब 'हिंट्स फॉर सेल्फ-कल्चर' लिखी, जो व्यक्तिगत विकास को सामाजिक प्रगति का माध्यम बताती थी। स्वामी राम तीर्थ ने उन्हें "अमेरिका आने वाले सबसे महान हिंदू" कहा था।
4 मार्च 1939 की शाम, फिलाडेल्फिया में उन्होंने हमेशा की तरह व्याख्यान दिया। अंतिम शब्द थे, "मैं सबके साथ शांति में हूं।" उसी रात उनका निधन हो गया। अचानक, रहस्यमय। उनके करीबी मित्र लाला हनुमंत सहाय ने जहर देने की आशंका व्यक्त की, लेकिन कोई जांच नहीं हुई।
लाला हरदयाल की जिंदगी एक विरोधाभास थी विद्वान और क्रांतिकारी, शांत और विद्रोही, संन्यासी और योद्धा। उन्होंने ऑक्सफोर्ड की छात्रवृत्ति त्यागी, लेकिन लंदन से डॉक्टरेट ली। उन्होंने सशस्त्र संघर्ष की योजना बनाई, लेकिन जीवन भर सादगी से जिए। उन्होंने तीन महाद्वीपों में भटकते हुए भारत की आजादी के लिए संघर्ष किया, लेकिन खुद कभी आजाद भारत नहीं देख पाए। 
लाला हरदयाल की विरासत है एक ऐसे व्यक्ति की जिसने सबकुछ त्याग दिया, लेकिन सपना नहीं छोड़ा।
शत शत नमन 🙏



  ~विजय राजबली माथुर ©

 

Monday, September 22, 2025

जीवन को सुन्दर,सुखद और समृद्ध बनाना ही वस्तुतः ज्योतिष का अभीष्ट है ------ विजय राजबली माथुर

ज्योतिष अकर्मण्य नहीं बनाता वरन यह कर्म करना सिखाता है.परमात्मा द्वारा जीवात्मा का नाम क्रतु रखा गया है। क्रतु का अर्थ है कर्म करने वाला.जीवात्मा को अपने बुद्धि -विवेक से कर्मशील रहते हुए इस संसार में रहना होता है। जो लोग अपनी अयोग्यता और अकर्मण्यता को छिपाने हेतु सब दोष भगवान् और परमात्मा पर मढ़ते हैं वे अपने आगामी जन्मों का प्रारब्ध ही प्रतिकूल बनाते हैं। 

यह संसार एक परीक्षालय(Examination Hall) है और यहाँ सतत परीक्षा चलती रहती है। परमात्मा ही पर्यवेक्षक(Invegilator) और परीक्षक (Examiner) है।  जीवात्मा कार्य क्षेत्र में स्वतंत्र है और जैसा कर्म करेगा परमात्मा उसे उसी प्रकार का फल देगा। यह संसार सत , रज , तंम के परमाणुओं से मिल कर बना है । जब तक यह परमाणु विषम अवस्था में होते हैं यह संसार चलता रहता है और जब ये परमाणु संम  अवस्था में आ  जाते हैं तब वह अवस्था प्रलय की होती है। 

ज्योतिष विज्ञान से यह ज्ञात करके कि समय अनुकूल है तो सम्बंधित जातक को अपने पुरुषार्थ व प्रयास से लाभ उठाना चाहिए। यदि कर्म न किया जाये और प्रारब्ध के भरोसे हाथ पर हाथ रख कर बैठे रहे तो यह अवसर निष्फल चला जाता है। इसे एक उदहारण से समझें कि माना आपके पास कर्णाटक एक्सप्रेस से बंगलौर जाने का reservation है और आप नियत तिथि व निर्धारित समय पर स्टेशन पहुँच कर उचित plateform पर भी पहुँच गए पर गाड़ी आने पर सम्बंधित कोच में चढ़े नहीं और plateform पर ही खड़े रह गए। इसमें आपके भाग्य का दोष नहीं है । यह सरासर आपकी अकर्मण्यता है जिसके कारण आप गंतव्य तक नहीं पहुँच सके। इसी प्रकार ज्योतिष द्वारा बताये गए अनुकूल समय पर तदनुरूप कार्य न करने वाले उसके लाभ से वंचित रह जाते हैं। लेकिन यदि किसी की महादशा/अन्तर्दशा अथवा गोचर ग्रहों के प्रभाव से खराब समय चल रहा है तो ज्योतिष द्वारा उन ग्रहों को ज्ञात कर के उनकी शान्ति की जा सकती है और हानि से बचा भी जा सकता है,अन्यथा कम किया जा सकता है।

लेकिन कभी - कभी अकर्मण्यता के कारण नहीं किसी और रणनीति के कारण व्यवहारिक जीवन में  जातक को कुछ अवसर छोड़ने पड़ते हैं तो उसको ग्रहों की चाल या गोचर - स्थिति से जोड़ कर देखना उचित नहीं है। 

कुछ लोग किसी गुटबाजी के कारण राहुल गांधी के विरुद्ध और कुछ उनके समर्थन में उनकी जन्म - कुंडली को आधार बना कर उनके पी एम बनने या न बनने की भविष्यवाणी करते रहते हैं। परंतु यहाँ हम ज्योतिषीय आधार पर नहीं उनकी राजनीतिक - रणनीति के आधार पर कह सकते हैं हैं कि , जिन राहुल गांधी ने अपनी माता - श्री को पी एम नहीं बनने दिया वह खुद भी पी एम नहीं बनेंगे वह सोनिया जी की ही तरह अवसर को किसी दूसरे के लिए छोड़ देंगे। अब इसको कुछ विदवजन उनकी पार्टी के अंदरूनी विरोध को इसका हेतु बताया करते हैं। वस्तुतः राहुल गांधी ने अभी तक जो स्थान प्राप्त कर लिया है वह पी एम और राष्ट्रपति से भी ऊपर  है क्योंकि उनकी लोकप्रियता दिन - प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। MOLITICS के एक कार्यक्रम में नीरज झा के प्रश्न के उत्तर में आदेश ने भी यही स्पष्ट किया है कि, राहुल गांधी सत्ता तो चाहते हैं लेकिन खुद पी एम नहीं बनना चाहते हैं किसी और को बना देंगे। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ते समय घोषणा की थी कि न वह खुद न उनकी बहन और परिवार से कोई भी इस पद पर नहीं आएगा और वही हुआ भी , ऐसे ही वह पी एम पद के लिए भी करेंगे। 






  ~विजय राजबली माथुर ©

 

Tuesday, June 17, 2025

कांग्रेस का भविष्य: सोनिया-युग ------ Kanak Tiwari






(12) आज कांग्रेस यही बताने में मशगूल है कि यदि अंदरूनी संकट फोड़े की तरह फूट रहा हो तो उस पर सोनिया गांधी के हाथ ही मरहम लगा सकते हैं। लोग राजीव को उनके बुरे दिनों में इटली कांग्रेस का सरगना बताते थे। फिर भी उस परिवार से अपने संबंधों की डींग मारते अघाते नहीं थे। इटली से भारत आई नेहरू परिवार की बहू में कांग्रेस-रक्त होने से उनकी विश्वसनीयता और अनुकूलता इस कदर बढ़ी कि अच्छे से अच्छे अखाड़ची कांग्रेसी को विनय की मुद्रा में उनसे मिलने 10, जनपथ अपने राजनीतिक वजूद को बचाए रखने के लिए जाना पड़ता है। लोकसभा के चौदहवें चुनाव में सोनिया के समर्थन में दिया गया जन-ऐलान राजनीतिज्ञों और मीडिया सहित विदेशियों को भी चकित कर गया। ‘फील गुड‘ के निर्माता और ‘इंडिया शाइनिंग‘ के निर्देशक ‘फील बैड‘ करते अंधेरे में एक दूसरे की शूटिंग करते रहे। 10 जनपथ नई कांग्रेसी राजनीतिक संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण गवाह, खिलाड़ी और हस्ताक्षर है। 
मूल प्रश्न ये हैं:
(13) नेतृत्व को लेकर सोनिया गांधी निस्सन्देह वह ’फेवीकोल’ हैं जिससे पूरी पार्टी के टूटते हाथ पांव जुड़ जाते हैं। लेकिन कांग्रेस की आत्मा कहां है? स्वदेशी का विरोध, विचारों की सफाई, वंशवाद की बढ़ोत्तरी, समाजवाद का खात्मा, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का समर्थन और पश्चिमी अपसंस्कृति के सामने समर्पण करने के बाद कांग्रेस और अन्य दक्षिणपंथी पार्टियों में क्या फर्क रह जाता है? सड़क पर यदि कांग्रेस और भाजपा के दो कार्यकर्ता चलें, तो उन्हें देखकर कोई नहीं अलग अलग पहचान पाता, जबकि चार दशक पहले तक बात ऐसी नहीं थी। कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य भी गाहे बगाहे जीन्स और टी शर्ट्स पहनकर दूरदर्शन के झरोखों से जनता को निकट दर्शन देते हैं। पैन्ट कोट और विलायती सूट डांटे रहने का फैशन भी कांग्रेस में है। देहाती गंध की गमक लिए लाखों कांग्रेसी कार्यकर्ता अब दरी बिछाने वालों की जमात तक में शामिल नहीं हैं। अब तो उनके बदले शामियाना भंडार वाले कांग्रेस नगर रचने के ठेकेदार हो गये हैं। हर चीज अब बाजार से किराये पर है। पूरा मंच, शामियाना, खान-पान, विज्ञापन एजेन्सियों से ठेके में छपा साहित्य, ढोकर लाये गये श्रोता, भाषण पढ़ते अशुद्ध हिन्दी के नवजात प्रवाचक। ऐसा लगता है स्टूडियो में कांग्रेस-लीला नामक किसी फिल्म की शूटिंग हो रही है। 
(14) संघ परिवार पर कांग्रेस का तीखा आक्रमण तर्कसंगत है कि परिवार ने भारत की आज़ादी के लिए घरों में दुबक कर बैठने के अलावा कुछ नहीं किया। लेकिन आज खुद कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों में से कितनों ने अथवा उनके पूर्वजों ने आजादी के आन्दोलन में हिस्सेदारी की है? पराजय-विशेषज्ञ कांग्रेस की जीत की रणनीति बनाते हैं। जिन्होंने जीवन में कोई चुनाव नहीं लड़ा। जो अपने राज्य से एक वार्ड का चुनाव जीत नहीं पाते। जो लगातार हार रहे हैं। जो हारने के बावजूद राज्य सभा में आसानी से पहुंच जाते हैं, लेकिन दूसरों को नहीं जाने देते। जो आखिरी बार हार चुके हैं। ऐसे तत्व ने मिलकर कांग्रेस की अगली लोकसभा में जीत की गारन्टी करते रहते हैं। कांग्रेस कार्य समिति तथा प्रदेशों के कई शीर्ष नेता ऐसे भी हैं जिन्होंने कभी न कभी कांग्रेस छोड़ी भी है। इनमें से कई नेताओं ने तो इन्दिरा गांधी तक को धोखा दिया। फिर भी सोनिया गांधी उन पर विश्वास किए बैठी हैं। कांग्रेस अकेली पार्टी है जिसके संविधान में प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष पद एक ही व्यक्ति को दिए जाने के प्रावधान रचे गए हैं। जिस पार्टी में गांधी जैसा राज्य शक्ति की खिलाफत करने वाला नेता पैदा हुआ, उस पार्टी में खुले आम दिल्ली से लेकर पंचायतों तक वंशवाद की राजनीति चलाई जाती रही है। नेहरू गांधी परिवार ने यदि देश की सेवा की होगी तो कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों, मुख्यमंत्रियों, सांसदों और विधायकों के परिवार वालों को आम कांग्रेस कार्यकर्ता के ऊपर क्यों तरजीह दी जा रही है? पूरी पार्टी को कुछ परिवार क्यों जकड़े हुए हैं? 
(15) चाहे जो हो, मनमोहनसिंह को प्रधानमंत्री बनाया जाना सोनिया गांधी के यश के खाते की घटना नहीं हो सकती। कथित आर्थिक सुधारों का नायक जननायक नहीं होता। एक सेवानिवृत्त नौकरशाह के लिए इतनी पेंशन ठीक नहीं थी कि वह मूल वेतन से ही ज्यादा हो जाए। देश या कांग्रेस कोई घाटा उठाती ‘पब्लिक कम्पनी‘ नहीं रही है जिसका प्रबंधन विशेषज्ञ को इस भय के साथ सौंप दिया जाए, ताकि वह कम्पनी बीमार नहीं हो जाए। वह अर्थशास्त्र के अध्यापक की नौकरी नहीं बल्कि सेवा के अर्थ का अध्यापन है। मनमोहन सिंह ने ही वित्तमंत्री के रूप में वल्र्ड बैंक, गैट, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, निजीकरण जैसे शब्दों के अर्थ पढ़ाए हैं। सोनिया की विजय आक्रमण पर प्रतिरक्षा की विजय थी। विरोधाभास यह भी कि बहुलवादी संस्कृति में विश्वास करने वाली कांग्रेस एकल प्रचारक सोनिया तक कैद होकर रह गई। सोनिया गांधी इतिहास का भूकम्प नहीं हो सकतीं। वे अतिशयोक्ति अलंकार के काबिल भी नहीं हैं। हो सकता है मनमोहनसिंह को प्रधानमंत्री बनाने के पीछे कई राजनीतिक कारण भी रहे होंगे। 
 मनमोहन सिंह के बदले राजनीतिक व्यक्ति यदि प्रधानमंत्री होता तो पार्टी पतन के रास्ते पर शायद इस तेज़ी से नहीं जा पाती। एक गैरराजनीतिज्ञ, मनोनीत प्रधानमंत्री ने किसी अन्य लोकतंत्र में इस कदर अपना शिकंजा संगठन और सरकार पर नहीं कसा जैसा करतब भारत में हुआ। 
चुनावों में पराजय
(16) जनता ने 1989 के बाद कांग्रेस को केन्द्र की एकल सत्ता से बेदखल कर दिया। यह अलग बात है कि सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के कारण उसे पांच वर्ष सत्ता में रहने का राजनीतिक परिस्थितियों के कारण 1991 में अवसर मिल गया था और 2003 तथा 2008 में भी। लोकतंत्र में सत्तासीन होना ही कामयाब होना है। चुनावों में कांग्रेस का पतन फीनिक्स पक्षी की दंत-कथाओं की तरह उन तंतुओं से नहीं बना है, जिनमें पांच सौ बरस बाद भी शरीर के भस्म हो जाने पर राख से जी उठने की कालजयी कुदरती क्षमता होती है। सवाल उठता रहा कि आत्महंता और अहंकारी तथा अधकचरे कांग्रेसियों के हुजूम को किसी अनुशासित सेना में बदलने की शक्ति क्या कांग्रेस के नेतृत्व में बची रही है? सवाल उठता रहा कि भविष्य यानी वक्त एक निर्मम हथियार है। उसे कांग्रेसियों की गरदन से भी कोई परहेज़ नहीं है। क्या कांग्रेस आत्म प्रशंसा में गाफिल रही अथवा निराशा के महासमुद्र में विलीन होने को बेताब हो गई थी? क्या कांग्रेस के कर्णधार केवल उनके पूर्वजों के गौरवशाली इतिहास को ढोने लेकिन नहीं बांचने का दंभ लिए हुए मतदाताओं को घर की मुर्गी समझते रहेंगे?














  ~विजय राजबली माथुर ©