यह मेरी श्रद्धांजली बाबू के नाम
🌸🌼🏵️🙏
वैचारिक संतुलन की कसौटी: गांधी-नेहरू के साथ सावरकर-गोडसे को पढ़ने की ऐतिहासिक अनिवार्यता
✍️रश्मि दीक्षित
आधुनिक भारत का मानस एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ अतीत की प्रतिध्वनियाँ वर्तमान के कोलाहल से टकरा रही हैं। स्वतंत्रता के अमृतकाल से गुजरते हुए जब हम एक समर्थ, समृद्ध और न्यायपूर्ण भारत के निर्माण का संकल्प लेते हैं, तो हमारे सामने अनिवार्य रूप से वह वैचारिक नींव आती है, जिस पर इस राष्ट्र की आधुनिक चेतना टिकी है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ लाखों भारतीयों ने जिस भारत का स्वप्न देखा था, वह समावेशी था, बहुलतावादी था, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिपूर्ण था और करुणा तथा अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित था। उन सबका सपनों का भारत एक ऐसा सुंदर उपवन था, जहाँ हर संस्कृति, हर विचार और हर अस्मिता को फलने-फूलने का समान अवसर मिले। लेकिन क्या किसी भी राष्ट्र का स्वप्न केवल आदर्शों की एकतरफा व्याख्याओं से पूरा हो सकता है? क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को केवल एक ही वैचारिक धारा की छत्रछाया में रखकर उस समग्र सत्य से परिचित करा सकते हैं, जिसने इस देश की नियति को आकार दिया है?
आज का यह गंभीर विमर्श किसी राजनीतिक उथल-पुथल या सतही बहस का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह आत्मनिरीक्षण और राष्ट्र-निर्माण की उस गहरी ऐतिहासिक आवश्यकता से जुड़ा है, जो हमारी आने वाली पीढ़ी के बौद्धिक विकास को तय करेगी। हमें यह बहुत संजीदगी और बारीकी से समझना होगा कि यदि हमें अपने बच्चों को एक परिपक्व, तार्किक और वास्तव में सहिष्णु नागरिक बनाना है, तो उन्हें गांधी और नेहरू के साथ-साथ विनायक दामोदर सावरकर और नाथूराम गोडसे के विचारों, इतिहास और उनके अंतर्विरोधों को पढ़ाना क्यों अपरिहार्य हो चुका है। यह मांग इतिहास के किसी पुनर्लेखन या किसी विचारधारा के महिमामंडन की नहीं है, बल्कि यह इतिहास को उसकी संपूर्णता, उसके पूरे द्वंद्व और उसके सबसे स्याह तथा उजले पन्नों के साथ स्वीकार करने की एक ईमानदार कोशिश है।
जब हम बच्चों को केवल इतिहास का एक हिस्सा पढ़ाते हैं, तो हम अनजाने में उनके भीतर एक ऐसी बौद्धिक शून्यता पैदा कर देते हैं, जिसे बाद में सोशल मीडिया की अधकचरी जानकारियाँ, प्रोपेगैंडा और नफरत भरे नैरेटिव आसानी से भर देते हैं। आज का संकट यह नहीं है कि बच्चे बहुत अधिक पढ़ रहे हैं, बल्कि संकट यह है कि वे टुकड़ों में पढ़ रहे हैं। वे संदर्भों से कटे हुए निष्कर्षों को सत्य मान रहे हैं। यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे गांधी के 'सत्य के प्रयोगों' को गहराई से समझें, यदि हम चाहते हैं कि वे नेहरू की 'भारत की खोज' की भावना को आत्मसात करें, तो यह बेहद जरूरी है कि वे उस वैचारिक प्रतिपक्ष को भी जानें, जो गांधी और नेहरू की नीतियों के विरोध में खड़ा था। किसी भी विचार की महानता और उसकी प्रासंगिकता तभी सिद्ध होती है जब उसे उसके प्रतिपक्ष की कसौटी पर कसा जाए। सावरकर का राष्ट्रवाद और गोडसे की वह हिंसक मानसिकता जिसने गांधी की देह को तो समाप्त कर दिया लेकिन उनके विचारों को नहीं छू सकी, इन दोनों को पढ़े बिना भारत की स्वतंत्रता और उसके विभाजन की त्रासदी का इतिहास कभी पूरा हो ही नहीं सकता।
वैचारिक बहुलता और इतिहास की समग्रता
इतिहास कोई रैखिक कहानी नहीं है, जहाँ एक नायक होता है और एक खलनायक, और कहानी सीधे रास्ते पर चलती रहती है। इतिहास वास्तव में परस्पर टकराते हुए विचारों, संस्कृतियों, आकांक्षाओं और मानवीय भूलों का एक जटिल ताना-बाना है। महात्मा गांधी का दर्शन केवल अहिंसा का उपदेश नहीं था, बल्कि वह तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों में जनमानस को उद्वेलित करने और जोड़ने का एक महाप्रयोग था। नेहरू का समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का मॉडल उस समय के बिखरे हुए और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील भारत को एक सूत्र में पिरोने की एक आधुनिक कोशिश थी। लेकिन इस मुख्यधारा के समानांतर एक और वैचारिक धारा बह रही थी, जो भारत की पहचान को एक अलग चश्मे से देख रही थी। विनायक दामोदर सावरकर ने 'हिंदुत्व' की अवधारणा को रेखांकित करते हुए राष्ट्र, संस्कृति और नागरिकता को एक नई परिभाषा देने का प्रयास किया। उनके विचार मुख्यधारा के कांग्रेस नेतृत्व की नीतियों के बिल्कुल विपरीत थे।
यदि हम बच्चों की पाठ्यपुस्तकों से सावरकर को पूरी तरह गायब कर देते हैं, या उन्हें केवल एक संक्षिप्त टिप्पणी में समेट देते हैं, तो हम बच्चों को उस बड़े वैचारिक संघर्ष से वंचित कर रहे हैं जो बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में भारत के भीतर चल रहा था। बच्चों को यह जानना ही चाहिए कि सावरकर का राष्ट्रवाद क्या था, उनकी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की परिभाषा क्या थी और उन्होंने सामाजिक सुधारों, विशेषकर छुआछूत उन्मूलन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लेकर क्या बातें कही थीं। इसके साथ ही, उन्हें यह भी पढ़ना होगा कि सावरकर के विचारों में कहाँ पर आकर वह समावेशी भारतीयता संकुचित होने लगती है जिसका सपना गांधी, नेहरू और लाखों देशवासियों ने देखा था। जब बच्चे इन दोनों धाराओं को आमने-सामने रखकर पढ़ेंगे, तभी उनके भीतर वह विवेक जागृत होगा जो किसी एक विचार के अंधानुकरण से बचाता है।
इसके बाद आता है इतिहास का वह सबसे दर्दनाक और संवेदनशील मोड़, जहाँ नाथूराम गोडसे का नाम जुड़ता है। गोडसे को पढ़ाना किसी भी तरह से उसके कृत्य का समर्थन करना नहीं है। गोडसे एक हिंसक अपराध का प्रतीक है, उसने इस देश की आत्मा पर चोट की थी। लेकिन प्रश्न यह है कि एक पढ़ा-लिखा, वैचारिक रूप से सक्रिय युवा इस हद तक कैसे भ्रमित हो गया कि उसने उस व्यक्ति की हत्या कर दी जिसे पूरा देश बापू कहता था? गोडसे के उस अंतिम बयान को, जो उसने अदालत में दिया था, अदालती दस्तावेजों और ऐतिहासिक संदर्भों के साथ बच्चों के सामने रखा जाना चाहिए। उसे छिपाने से कौतूहल पैदा होता है, और छिपा हुआ कौतूहल अक्सर गलत व्याख्याओं की तरफ ले जाता है। जब बच्चे गोडसे के तर्कों को पढ़ेंगे और फिर उसके समानांतर गांधी के जीवन, उनके कार्यों और देश के लिए उनके बलिदान को देखेंगे, तो वे खुद इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि हिंसा कभी भी किसी वैचारिक मतभेद का समाधान नहीं हो सकती। वे यह समझ पाएंगे कि गोडसे के तर्क कितने खोखले थे और किस तरह सांप्रदायिक उन्माद एक इंसान को अंधा कर देता है।
गांधी और नेहरू के सपनों का भारत: कसौटी पर प्रतिपक्ष
महात्मा गांधी ने जिस रामराज्य की कल्पना की थी, वह कोई धार्मिक राज्य नहीं था, बल्कि एक ऐसा नैतिक समाज था जहाँ समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को भी न्याय और सम्मान मिले। नेहरू का आधुनिक भारत का सपना बांधों, उद्योगों और वैज्ञानिक संस्थानों के रूप में सामने आया, जिसे उन्होंने 'आधुनिक भारत के मंदिर' कहा था। इन महापुरुषों और उनके साथ संघर्ष करने वाले अनगिनत देशभक्तों का मानना था कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है। लेकिन इस सुंदर स्वप्न को यथार्थ में बदलने के लिए यह समझना जरूरी है कि इस मार्ग में कौन सी बाधाएं थीं और उन बाधाओं के पीछे की वैचारिकता क्या थी।
सावरकर को पढ़ना इसलिए जरूरी है क्योंकि वे उस राष्ट्रवाद के प्रणेता हैं जो आज के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में एक बहुत बड़ी ताकत बनकर उभरा है। आज के भारत को समझने के लिए सावरकर के विचारों को समझना अनिवार्य है। सावरकर ने अंडमान की सेलुलर जेल में जो यातनाएं सहीं, उनका जो प्रारंभिक क्रांतिकारी जीवन था, वह देशप्रेम से ओतप्रोत था। लेकिन बाद के वर्षों में उनके द्वारा प्रतिपादित हिंदुत्व का सिद्धांत, जो 'पितृभू' और 'पुण्यभू' की अवधारणा पर आधारित था, उसने भारतीय राष्ट्रवाद को एक नई दिशा दी। बच्चों को यह समझाना होगा कि गांधी का राष्ट्रवाद भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से कितना व्यापक था, जो सबको समेटता था, जबकि सावरकर का राष्ट्रवाद किस तरह विशिष्ट पहचानों को प्राथमिकता देता था। जब तक छात्र इन दोनों विचारों के मूल अंतर को नहीं समझेंगे, तब तक वे वर्तमान भारत की राजनीतिक बहसों को कभी नहीं समझ पाएंगे। वे केवल नारों के पीछे भागेंगे, तथ्यों के पीछे नहीं।
इसी तरह, जवाहरलाल नेहरू के धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक समाजवाद के विचारों को समझने के लिए भी प्रतिपक्ष का होना आवश्यक है। नेहरू ने जिस वैज्ञानिक चेतना की बात की, सावरकर भी अपने लेखन में गाय को एक उपयोगी पशु बताते हुए रूढ़िवादिता पर प्रहार करते हैं। यह एक बहुत ही बारीक और दिलचस्प तथ्य है कि धार्मिक राष्ट्रवाद की बात करने वाले सावरकर कई मायनों में सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ थे। जब बच्चे इन बारीक तत्वों को पढ़ेंगे, तो उनका बौद्धिक क्षितिज विस्तृत होगा। वे समझ पाएंगे कि इतिहास को काले और सफेद के खानों में नहीं बांटा जा सकता, उसमें धूसर रंग के कई रंगशेड होते हैं। गांधी और नेहरू के सपनों का भारत तभी मजबूत होगा जब हमारी आने वाली पीढ़ी इतनी सक्षम होगी कि वह अपने विरोधियों के विचारों को भी धैर्यपूर्वक सुन सके, उनका विश्लेषण कर सके और फिर तार्किक रूप से अपने सिद्धांतों पर टिकी रह सके।
प्रोपेगैंडा के युग में 'सत्य' की रक्षा
हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जिसे सूचना क्रांति का युग कहा जाता है, लेकिन वास्तव में यह सूचनाओं के प्रदूषण का युग है। आज व्हाट्सएप और सोशल मीडिया के माध्यम से इतिहास को विकृत करके परोसा जा रहा है। गांधी को एक कमजोर नेता के रूप में चित्रित करने की कोशिश की जाती है जिसने देश का विभाजन करवा दिया, नेहरू को एक विलासी और अदूरदर्शी राजनीतिज्ञ के रूप में दिखाया जाता है, सावरकर को केवल एक संकुचित नजरिए से खारिज कर दिया जाता है, और गोडसे को एक देशभक्त सिद्ध करने के गुप्त और मुखर प्रयास किए जाते हैं। यह स्थिति समाज के लिए अत्यंत घातक है। जब हम अपनी शिक्षा व्यवस्था में इन विषयों पर खुलकर बात नहीं करते, तो हम बच्चों को इस प्रोपेगैंडा के सामने असहाय छोड़ देते हैं।
आज के डिजिटल दौर में चुनौती केवल झूठी खबरों तक सीमित नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया का एलगोरिदम युवाओं को अपने ही विचारों के 'इको-चैंबर' में कैद कर देता है। स्क्रीन पर उन्हें वही दिखता है जो उनकी सोच से मेल खाता है, जिससे वैचारिक कट्टरता और गहरी होती जाती है। ऐसे समय में केवल विद्यालयी पाठ्यक्रम और कक्षा का निष्पक्ष माहौल ही वह एकमात्र स्थान बचता है, जहाँ बच्चे को 'प्रतिपक्ष' का सामना करने, उसके तर्कों को सुनने और निष्पक्ष विश्लेषण करने का अवसर मिल सकता है।
यदि एक बच्चा अपनी कक्षा में, अपने शिक्षकों की देखरेख में, प्रामाणिक दस्तावेजों के साथ गांधी, नेहरू, सावरकर और गोडसे को पढ़ेगा, तो उसके पास सोशल मीडिया के झूठ को काटने के लिए तथ्यों का हथियार होगा। जब उसे पता होगा कि गांधी ने विभाजन को रोकने के लिए क्या-क्या प्रयास किए थे और उस समय की वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं, तो वह गांधी पर लगने वाले सतही आरोपों से भ्रमित नहीं होगा। जब वह सावरकर की दया याचिकाओं के वास्तविक ऐतिहासिक संदर्भ को पढ़ेगा, तो वह न तो उनका अंध-समर्थन करेगा और न ही उन्हें पूरी तरह खारिज करेगा। जब वह गोडसे के हिंसक कृत्य के पीछे की विभाजनकारी मानसिकता को समझेगा, तो वह समाज में नफरत फैलाने वाले तत्वों को पहचान सकेगा।
इतिहास के अध्यापन में यह पारदर्शिता ही बच्चों के भीतर आलोचनात्मक सोच पैदा करती है। गांधीजी स्वयं सत्य के खोजी थे। वे कभी नहीं चाहते थे कि लोग उनकी बातों को बिना सोचे-समझे मान लें। उन्होंने हमेशा तर्क और आत्म-विवेक को सर्वोपरि रखा। इस मूल चेतना से हमें यह सीख मिलती है कि सत्य को किसी कृत्रिम सुरक्षा कवच की आवश्यकता नहीं है। गांधी इतने कमजोर नहीं हैं कि सावरकर या गोडसे के विचारों को पढ़ने से उनका कद छोटा हो जाएगा। इसके विपरीत, जब बच्चे इन सभी विचारों को पूरी बारीकी से पढ़ेंगे, तो वे देख पाएंगे कि गांधी की अहिंसा कायरता नहीं थी, बल्कि वह दुनिया की सबसे बड़ी औपनिवेशिक सत्ता से टकराने का सबसे साहसी कृत्य था। वे समझ पाएंगे कि गोडसे की गोली गांधी के शरीर को तो मार सकी, लेकिन जिस विचार को सावरकर और गोडसे पराजित करना चाहते थे, वह विचार आज भी भारत के संविधान की प्रस्तावना में सुरक्षित है।
इतिहास के घावों से सीखने की प्रक्रिया
एक परिपक्व राष्ट्र अपने इतिहास के गौरवशाली पन्नों से जितना सीखता है, उतना ही वह अपने इतिहास के घावों और त्रासदियों से भी सीखता है। भारत का विभाजन और महात्मा गांधी की हत्या हमारे आधुनिक इतिहास के दो सबसे गहरे घाव हैं। इन घावों को केवल ढक देने से या इन पर बात न करने से ये ठीक नहीं होते। इन घावों के कारणों की तह में जाना होगा। नाथूराम गोडसे को पढ़ाना वास्तव में उस मानसिकता का अध्ययन करना है जो किसी भी समाज को विनाश की ओर ले जा सकती है। बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि कट्टरता की शुरुआत कहाँ से होती है। जब कोई व्यक्ति या संगठन यह मानने लगता है कि केवल उसका विचार ही परम सत्य है और बाकी सब देशद्रोही या शत्रु हैं, तो वह समाज को गहरे संकट में डाल देता है।
गोडसे का अध्ययन हमें यह सिखाता है कि किस तरह अति-राष्ट्रवाद की अंधी गली अंततः अपने ही देश के पितातुल्य महापुरुषों के रक्त से सिसकती है। यह बच्चों को सहिष्णुता का वास्तविक मूल्य सिखाएगा। जब वे देखेंगे कि मतभेदों को संवाद के माध्यम से सुलझाने के बजाय जब हिंसा का सहारा लिया जाता है, तो पूरा राष्ट्र कितनी गहरी पीड़ा में डूब जाता है। दूसरी ओर, सावरकर का अध्ययन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्रवाद की परिभाषाएं किस तरह बदलती हैं और उनका समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है। सावरकर के योगदान को पूरी तरह नकार देना भी इतिहास के साथ अन्याय होगा और बच्चों को एकपक्षीय ज्ञान देना होगा। हमें बच्चों को यह बताना होगा कि देश की आजादी के लिए सेलुलर जेल की कोठरी में कठिन यातनाएं सहने वाले सावरकर के भीतर क्या चल रहा था, और बाद में उनके विचारों ने जो मोड़ लिया, उसके पीछे क्या ऐतिहासिक विवशताएं या वैचारिक कारण थे।
यह संपूर्ण विमर्श बच्चों के भीतर एक संतुलन पैदा करेगा। वे समझ पाएंगे कि स्वतंत्रता संग्राम कोई एक सुर में गाया गया गान नहीं था, बल्कि वह एक ऐसा मंच था जिसमें कई अलग-अलग आवाजें उठ रही थीं। कुछ आवाजें आपस में मेल नहीं खाती थीं, उनमें तीखा टकराव था, लेकिन उन सभी के केंद्र में भारत की मुक्ति का ही सपना था, भले ही उस मुक्ति के बाद के भारत का स्वरूप उनकी नजरों में अलग था। जब बच्चे इस जटिलता को समझेंगे, तो वे वर्तमान भारत की समस्याओं को भी अधिक परिपक्वता से देख पाएंगे। वे समझ पाएंगे कि आज यदि देश में वैचारिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, तो उसकी जड़ें कहीं न कहीं इतिहास के इन्हीं अनसुलझे अध्यायों में छिपी हैं।
शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य: वैचारिक परिपक्वता
शिक्षा का उद्देश्य केवल कुछ तथ्यों को रटकर परीक्षा पास करना या एक अच्छी नौकरी पाना नहीं है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य एक ऐसे संवेदनशील और प्रबुद्ध नागरिक का निर्माण करना है जो अपने समाज, अपने देश और अपनी संस्कृति के प्रति जवाबदेह हो। एक सुंदर और आदर्श भारत का निर्माण तभी संभव है जब हमारे बच्चों का मानसिक विकास संकीर्णताओं से मुक्त हो। यदि हम अपने बच्चों को केवल वही पढ़ाएंगे जो हमें पसंद है, तो हम उनका विकास नहीं कर रहे हैं, बल्कि हम अपनी पसंद-नापसंद को उन पर थोप रहे हैं। यह एक प्रकार की बौद्धिक जड़ता को जन्म देता है जो किसी भी जीवंत लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) भी इसी दिशा में रेखांकित करती है कि शिक्षा का ध्यान रटंत विद्या के बजाय 'क्रिटिकल थिंकिंग' (आलोचनात्मक और तार्किक सोच) को बढ़ावा देने पर होना चाहिए। जब छात्र गांधी, नेहरू, सावरकर और गोडसे जैसे परस्पर विरोधी विचारों को एक ही मेज पर रखकर पढ़ेंगे, तो NEP की यही मूल आत्मा साकार होगी। किसी विचार से असहमत होने के लिए भी पहले उस विचार को गहराई से समझना अनिवार्य होता है - यह समझ बच्चों को अंध-समर्थक या अंध-विरोधी बनने से बचाती है।
गांधी और नेहरू को पढ़ाना हमारे बच्चों के नैतिक और बौद्धिक विकास के लिए अनिवार्य है। गांधी उन्हें सिखाते हैं कि साध्य की पवित्रता के साथ-साथ साधन की पवित्रता भी कितनी जरूरी है। वे सिखाते हैं कि यदि आपका उद्देश्य अच्छा है, तो उसे प्राप्त करने का तरीका भी नैतिक होना चाहिए। नेहरू उन्हें सिखाते हैं कि एक प्राचीन सभ्यता को आधुनिक दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संस्थागत ढांचे और लोकतांत्रिक मूल्यों की कितनी आवश्यकता होती है। लेकिन इन आदर्शों को यथार्थ की धरती पर बनाए रखने के लिए बच्चों को यह भी जानना होगा कि इन विचारों के सामने क्या चुनौतियां थीं। सावरकर और गोडसे को पढ़ाना उस प्रति-संतुलन की तरह है जो बच्चों को यह समझने में मदद करता है कि आदर्शों को बनाए रखना कितना कठिन होता है और उनके विरोधी तर्क कितने शक्तिशाली हो सकते हैं।
जब एक छात्र कक्षा में गांधी के 'हिंद स्वराज' और सावरकर के 'हिंदुत्व' को एक साथ पढ़ेगा, तो वह स्वयं दोनों के अंतर को समझेगा। वह देख पाएगा कि जहाँ गांधी का 'स्वराज' आत्म-नियंत्रण, नैतिकता और समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के कल्याण पर आधारित है, वहीं सावरकर का 'हिंदुत्व' एक विशिष्ट भू-भाग और सांस्कृतिक पहचान के इर्द-गिर्द केंद्रित है। यह समझ बच्चों में उस समय काम आएगी जब वे बड़े होकर देश के नागरिक के रूप में अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे, जब वे समाज की नीतियों को तय करेंगे। तब वे किसी लोकलुभावन नारे के झांसे में नहीं आएंगे, क्योंकि उन्होंने इतिहास की गहराई को छुआ है, उन्होंने विचारों के उस मंथन को देखा है जिससे यह आधुनिक भारत निकला है।
निष्कर्ष: सुंदर भारत के निर्माण का मार्ग
एक सुंदर और सशक्त भारत का सपना तभी साकार हो सकता है जब हमारी आने वाली पीढ़ियां वैचारिक रूप से निडर और सत्य को स्वीकार करने के साहस से भरी हों। इतिहास की किसी भी घटना या विचार को छिपाना अंततः समाज में अविश्वास और भ्रम को ही जन्म देता है। समाचार पत्रों और सार्वजनिक मंचों के माध्यम से इस बात को पूरी स्पष्टता और संजीदगी से रखा जाना चाहिए कि गांधी और नेहरू का विचार आज भी प्रासंगिक है क्योंकि वह सत्य, सह-अस्तित्व और प्रेम पर आधारित है। और इस सत्य को कभी भी प्रतिपक्ष के विचारों से डरने की आवश्यकता नहीं होती।
हमें अपने बच्चों को एक ऐसा बौद्धिक वातावरण देना होगा जहाँ वे गांधी को पढ़ें तो उनकी महानता के साथ-साथ उनके मानवीय दृष्टिकोण को भी समझें, नेहरू को पढ़ें तो उनके आधुनिक विजन के साथ उनकी सीमाओं को भी जानें। और इसी के साथ वे सावरकर को भी पढ़ें ताकि वे भारतीय राष्ट्रवाद के एक अत्यंत प्रभावशाली और जटिल पहलू से परिचित हो सकें, और वे गोडसे को भी पढ़ें ताकि वे कट्टरता के उस भयानक अंत को देख सकें जो किसी भी समाज को नष्ट कर सकता है।
जब हमारी शिक्षा व्यवस्था इतनी पारदर्शी, इतनी परिपक्व और इतनी साहसी होगी, तभी हम वास्तव में एक ऐसे 'सुंदर भारत' का निर्माण कर पाएंगे जहाँ वैचारिक मतभेदों का स्वागत होगा, जहाँ संवाद की संस्कृति होगी, और जहाँ हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होगा। यही गांधी, नेहरू और लाखों भारतीयों के सपनों का वास्तविक भारत होगा, जो अपने प्रतिपक्ष को दबाकर नहीं, बल्कि उसे तार्किक रूप से परखकर और समाहित करके आगे बढ़ेगा। इतिहास की इस संपूर्ण और बारीक समझ के साथ ही हमारी आने वाली पीढ़ी इस महान राष्ट्र की कमान संभालने के योग्य बन पाएगी।
**********************************************************************************
इतिहासकार की पैनी निगाहें भूतकाल के अंतराल में प्रविष्ट होकर तथ्य के मोतियों को सामने लाती हैं।इस लेख द्वारा यही किया गया है।
