Friday, October 2, 2026

वैचारिक संतुलन की कसौटी: गांधी-नेहरू के साथ सावरकर-गोडसे को पढ़ने की ऐतिहासिक अनिवार्यता ✍️रश्मि दीक्षित



यह मेरी श्रद्धांजली बाबू के नाम
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वैचारिक संतुलन की कसौटी: गांधी-नेहरू के साथ सावरकर-गोडसे को पढ़ने की ऐतिहासिक अनिवार्यता
✍️रश्मि दीक्षित
आधुनिक भारत का मानस एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ अतीत की प्रतिध्वनियाँ वर्तमान के कोलाहल से टकरा रही हैं। स्वतंत्रता के अमृतकाल से गुजरते हुए जब हम एक समर्थ, समृद्ध और न्यायपूर्ण भारत के निर्माण का संकल्प लेते हैं, तो हमारे सामने अनिवार्य रूप से वह वैचारिक नींव आती है, जिस पर इस राष्ट्र की आधुनिक चेतना टिकी है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ लाखों भारतीयों ने जिस भारत का स्वप्न देखा था, वह समावेशी था, बहुलतावादी था, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिपूर्ण था और करुणा तथा अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित था। उन सबका सपनों का भारत एक ऐसा सुंदर उपवन था, जहाँ हर संस्कृति, हर विचार और हर अस्मिता को फलने-फूलने का समान अवसर मिले। लेकिन क्या किसी भी राष्ट्र का स्वप्न केवल आदर्शों की एकतरफा व्याख्याओं से पूरा हो सकता है? क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को केवल एक ही वैचारिक धारा की छत्रछाया में रखकर उस समग्र सत्य से परिचित करा सकते हैं, जिसने इस देश की नियति को आकार दिया है?
आज का यह गंभीर विमर्श किसी राजनीतिक उथल-पुथल या सतही बहस का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह आत्मनिरीक्षण और राष्ट्र-निर्माण की उस गहरी ऐतिहासिक आवश्यकता से जुड़ा है, जो हमारी आने वाली पीढ़ी के बौद्धिक विकास को तय करेगी। हमें यह बहुत संजीदगी और बारीकी से समझना होगा कि यदि हमें अपने बच्चों को एक परिपक्व, तार्किक और वास्तव में सहिष्णु नागरिक बनाना है, तो उन्हें गांधी और नेहरू के साथ-साथ विनायक दामोदर सावरकर और नाथूराम गोडसे के विचारों, इतिहास और उनके अंतर्विरोधों को पढ़ाना क्यों अपरिहार्य हो चुका है। यह मांग इतिहास के किसी पुनर्लेखन या किसी विचारधारा के महिमामंडन की नहीं है, बल्कि यह इतिहास को उसकी संपूर्णता, उसके पूरे द्वंद्व और उसके सबसे स्याह तथा उजले पन्नों के साथ स्वीकार करने की एक ईमानदार कोशिश है।
जब हम बच्चों को केवल इतिहास का एक हिस्सा पढ़ाते हैं, तो हम अनजाने में उनके भीतर एक ऐसी बौद्धिक शून्यता पैदा कर देते हैं, जिसे बाद में सोशल मीडिया की अधकचरी जानकारियाँ, प्रोपेगैंडा और नफरत भरे नैरेटिव आसानी से भर देते हैं। आज का संकट यह नहीं है कि बच्चे बहुत अधिक पढ़ रहे हैं, बल्कि संकट यह है कि वे टुकड़ों में पढ़ रहे हैं। वे संदर्भों से कटे हुए निष्कर्षों को सत्य मान रहे हैं। यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे गांधी के 'सत्य के प्रयोगों' को गहराई से समझें, यदि हम चाहते हैं कि वे नेहरू की 'भारत की खोज' की भावना को आत्मसात करें, तो यह बेहद जरूरी है कि वे उस वैचारिक प्रतिपक्ष को भी जानें, जो गांधी और नेहरू की नीतियों के विरोध में खड़ा था। किसी भी विचार की महानता और उसकी प्रासंगिकता तभी सिद्ध होती है जब उसे उसके प्रतिपक्ष की कसौटी पर कसा जाए। सावरकर का राष्ट्रवाद और गोडसे की वह हिंसक मानसिकता जिसने गांधी की देह को तो समाप्त कर दिया लेकिन उनके विचारों को नहीं छू सकी, इन दोनों को पढ़े बिना भारत की स्वतंत्रता और उसके विभाजन की त्रासदी का इतिहास कभी पूरा हो ही नहीं सकता।
वैचारिक बहुलता और इतिहास की समग्रता
इतिहास कोई रैखिक कहानी नहीं है, जहाँ एक नायक होता है और एक खलनायक, और कहानी सीधे रास्ते पर चलती रहती है। इतिहास वास्तव में परस्पर टकराते हुए विचारों, संस्कृतियों, आकांक्षाओं और मानवीय भूलों का एक जटिल ताना-बाना है। महात्मा गांधी का दर्शन केवल अहिंसा का उपदेश नहीं था, बल्कि वह तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों में जनमानस को उद्वेलित करने और जोड़ने का एक महाप्रयोग था। नेहरू का समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता का मॉडल उस समय के बिखरे हुए और सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील भारत को एक सूत्र में पिरोने की एक आधुनिक कोशिश थी। लेकिन इस मुख्यधारा के समानांतर एक और वैचारिक धारा बह रही थी, जो भारत की पहचान को एक अलग चश्मे से देख रही थी। विनायक दामोदर सावरकर ने 'हिंदुत्व' की अवधारणा को रेखांकित करते हुए राष्ट्र, संस्कृति और नागरिकता को एक नई परिभाषा देने का प्रयास किया। उनके विचार मुख्यधारा के कांग्रेस नेतृत्व की नीतियों के बिल्कुल विपरीत थे।
यदि हम बच्चों की पाठ्यपुस्तकों से सावरकर को पूरी तरह गायब कर देते हैं, या उन्हें केवल एक संक्षिप्त टिप्पणी में समेट देते हैं, तो हम बच्चों को उस बड़े वैचारिक संघर्ष से वंचित कर रहे हैं जो बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में भारत के भीतर चल रहा था। बच्चों को यह जानना ही चाहिए कि सावरकर का राष्ट्रवाद क्या था, उनकी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की परिभाषा क्या थी और उन्होंने सामाजिक सुधारों, विशेषकर छुआछूत उन्मूलन और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लेकर क्या बातें कही थीं। इसके साथ ही, उन्हें यह भी पढ़ना होगा कि सावरकर के विचारों में कहाँ पर आकर वह समावेशी भारतीयता संकुचित होने लगती है जिसका सपना गांधी, नेहरू और लाखों देशवासियों ने देखा था। जब बच्चे इन दोनों धाराओं को आमने-सामने रखकर पढ़ेंगे, तभी उनके भीतर वह विवेक जागृत होगा जो किसी एक विचार के अंधानुकरण से बचाता है।
इसके बाद आता है इतिहास का वह सबसे दर्दनाक और संवेदनशील मोड़, जहाँ नाथूराम गोडसे का नाम जुड़ता है। गोडसे को पढ़ाना किसी भी तरह से उसके कृत्य का समर्थन करना नहीं है। गोडसे एक हिंसक अपराध का प्रतीक है, उसने इस देश की आत्मा पर चोट की थी। लेकिन प्रश्न यह है कि एक पढ़ा-लिखा, वैचारिक रूप से सक्रिय युवा इस हद तक कैसे भ्रमित हो गया कि उसने उस व्यक्ति की हत्या कर दी जिसे पूरा देश बापू कहता था? गोडसे के उस अंतिम बयान को, जो उसने अदालत में दिया था, अदालती दस्तावेजों और ऐतिहासिक संदर्भों के साथ बच्चों के सामने रखा जाना चाहिए। उसे छिपाने से कौतूहल पैदा होता है, और छिपा हुआ कौतूहल अक्सर गलत व्याख्याओं की तरफ ले जाता है। जब बच्चे गोडसे के तर्कों को पढ़ेंगे और फिर उसके समानांतर गांधी के जीवन, उनके कार्यों और देश के लिए उनके बलिदान को देखेंगे, तो वे खुद इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि हिंसा कभी भी किसी वैचारिक मतभेद का समाधान नहीं हो सकती। वे यह समझ पाएंगे कि गोडसे के तर्क कितने खोखले थे और किस तरह सांप्रदायिक उन्माद एक इंसान को अंधा कर देता है।
गांधी और नेहरू के सपनों का भारत: कसौटी पर प्रतिपक्ष
महात्मा गांधी ने जिस रामराज्य की कल्पना की थी, वह कोई धार्मिक राज्य नहीं था, बल्कि एक ऐसा नैतिक समाज था जहाँ समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को भी न्याय और सम्मान मिले। नेहरू का आधुनिक भारत का सपना बांधों, उद्योगों और वैज्ञानिक संस्थानों के रूप में सामने आया, जिसे उन्होंने 'आधुनिक भारत के मंदिर' कहा था। इन महापुरुषों और उनके साथ संघर्ष करने वाले अनगिनत देशभक्तों का मानना था कि भारत की ताकत उसकी विविधता में है। लेकिन इस सुंदर स्वप्न को यथार्थ में बदलने के लिए यह समझना जरूरी है कि इस मार्ग में कौन सी बाधाएं थीं और उन बाधाओं के पीछे की वैचारिकता क्या थी।
सावरकर को पढ़ना इसलिए जरूरी है क्योंकि वे उस राष्ट्रवाद के प्रणेता हैं जो आज के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में एक बहुत बड़ी ताकत बनकर उभरा है। आज के भारत को समझने के लिए सावरकर के विचारों को समझना अनिवार्य है। सावरकर ने अंडमान की सेलुलर जेल में जो यातनाएं सहीं, उनका जो प्रारंभिक क्रांतिकारी जीवन था, वह देशप्रेम से ओतप्रोत था। लेकिन बाद के वर्षों में उनके द्वारा प्रतिपादित हिंदुत्व का सिद्धांत, जो 'पितृभू' और 'पुण्यभू' की अवधारणा पर आधारित था, उसने भारतीय राष्ट्रवाद को एक नई दिशा दी। बच्चों को यह समझाना होगा कि गांधी का राष्ट्रवाद भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से कितना व्यापक था, जो सबको समेटता था, जबकि सावरकर का राष्ट्रवाद किस तरह विशिष्ट पहचानों को प्राथमिकता देता था। जब तक छात्र इन दोनों विचारों के मूल अंतर को नहीं समझेंगे, तब तक वे वर्तमान भारत की राजनीतिक बहसों को कभी नहीं समझ पाएंगे। वे केवल नारों के पीछे भागेंगे, तथ्यों के पीछे नहीं।
इसी तरह, जवाहरलाल नेहरू के धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक समाजवाद के विचारों को समझने के लिए भी प्रतिपक्ष का होना आवश्यक है। नेहरू ने जिस वैज्ञानिक चेतना की बात की, सावरकर भी अपने लेखन में गाय को एक उपयोगी पशु बताते हुए रूढ़िवादिता पर प्रहार करते हैं। यह एक बहुत ही बारीक और दिलचस्प तथ्य है कि धार्मिक राष्ट्रवाद की बात करने वाले सावरकर कई मायनों में सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ थे। जब बच्चे इन बारीक तत्वों को पढ़ेंगे, तो उनका बौद्धिक क्षितिज विस्तृत होगा। वे समझ पाएंगे कि इतिहास को काले और सफेद के खानों में नहीं बांटा जा सकता, उसमें धूसर रंग के कई रंगशेड होते हैं। गांधी और नेहरू के सपनों का भारत तभी मजबूत होगा जब हमारी आने वाली पीढ़ी इतनी सक्षम होगी कि वह अपने विरोधियों के विचारों को भी धैर्यपूर्वक सुन सके, उनका विश्लेषण कर सके और फिर तार्किक रूप से अपने सिद्धांतों पर टिकी रह सके।
प्रोपेगैंडा के युग में 'सत्य' की रक्षा
हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जिसे सूचना क्रांति का युग कहा जाता है, लेकिन वास्तव में यह सूचनाओं के प्रदूषण का युग है। आज व्हाट्सएप और सोशल मीडिया के माध्यम से इतिहास को विकृत करके परोसा जा रहा है। गांधी को एक कमजोर नेता के रूप में चित्रित करने की कोशिश की जाती है जिसने देश का विभाजन करवा दिया, नेहरू को एक विलासी और अदूरदर्शी राजनीतिज्ञ के रूप में दिखाया जाता है, सावरकर को केवल एक संकुचित नजरिए से खारिज कर दिया जाता है, और गोडसे को एक देशभक्त सिद्ध करने के गुप्त और मुखर प्रयास किए जाते हैं। यह स्थिति समाज के लिए अत्यंत घातक है। जब हम अपनी शिक्षा व्यवस्था में इन विषयों पर खुलकर बात नहीं करते, तो हम बच्चों को इस प्रोपेगैंडा के सामने असहाय छोड़ देते हैं।
आज के डिजिटल दौर में चुनौती केवल झूठी खबरों तक सीमित नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया का एलगोरिदम युवाओं को अपने ही विचारों के 'इको-चैंबर' में कैद कर देता है। स्क्रीन पर उन्हें वही दिखता है जो उनकी सोच से मेल खाता है, जिससे वैचारिक कट्टरता और गहरी होती जाती है। ऐसे समय में केवल विद्यालयी पाठ्यक्रम और कक्षा का निष्पक्ष माहौल ही वह एकमात्र स्थान बचता है, जहाँ बच्चे को 'प्रतिपक्ष' का सामना करने, उसके तर्कों को सुनने और निष्पक्ष विश्लेषण करने का अवसर मिल सकता है।
यदि एक बच्चा अपनी कक्षा में, अपने शिक्षकों की देखरेख में, प्रामाणिक दस्तावेजों के साथ गांधी, नेहरू, सावरकर और गोडसे को पढ़ेगा, तो उसके पास सोशल मीडिया के झूठ को काटने के लिए तथ्यों का हथियार होगा। जब उसे पता होगा कि गांधी ने विभाजन को रोकने के लिए क्या-क्या प्रयास किए थे और उस समय की वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं, तो वह गांधी पर लगने वाले सतही आरोपों से भ्रमित नहीं होगा। जब वह सावरकर की दया याचिकाओं के वास्तविक ऐतिहासिक संदर्भ को पढ़ेगा, तो वह न तो उनका अंध-समर्थन करेगा और न ही उन्हें पूरी तरह खारिज करेगा। जब वह गोडसे के हिंसक कृत्य के पीछे की विभाजनकारी मानसिकता को समझेगा, तो वह समाज में नफरत फैलाने वाले तत्वों को पहचान सकेगा।
इतिहास के अध्यापन में यह पारदर्शिता ही बच्चों के भीतर आलोचनात्मक सोच पैदा करती है। गांधीजी स्वयं सत्य के खोजी थे। वे कभी नहीं चाहते थे कि लोग उनकी बातों को बिना सोचे-समझे मान लें। उन्होंने हमेशा तर्क और आत्म-विवेक को सर्वोपरि रखा। इस मूल चेतना से हमें यह सीख मिलती है कि सत्य को किसी कृत्रिम सुरक्षा कवच की आवश्यकता नहीं है। गांधी इतने कमजोर नहीं हैं कि सावरकर या गोडसे के विचारों को पढ़ने से उनका कद छोटा हो जाएगा। इसके विपरीत, जब बच्चे इन सभी विचारों को पूरी बारीकी से पढ़ेंगे, तो वे देख पाएंगे कि गांधी की अहिंसा कायरता नहीं थी, बल्कि वह दुनिया की सबसे बड़ी औपनिवेशिक सत्ता से टकराने का सबसे साहसी कृत्य था। वे समझ पाएंगे कि गोडसे की गोली गांधी के शरीर को तो मार सकी, लेकिन जिस विचार को सावरकर और गोडसे पराजित करना चाहते थे, वह विचार आज भी भारत के संविधान की प्रस्तावना में सुरक्षित है।
इतिहास के घावों से सीखने की प्रक्रिया
एक परिपक्व राष्ट्र अपने इतिहास के गौरवशाली पन्नों से जितना सीखता है, उतना ही वह अपने इतिहास के घावों और त्रासदियों से भी सीखता है। भारत का विभाजन और महात्मा गांधी की हत्या हमारे आधुनिक इतिहास के दो सबसे गहरे घाव हैं। इन घावों को केवल ढक देने से या इन पर बात न करने से ये ठीक नहीं होते। इन घावों के कारणों की तह में जाना होगा। नाथूराम गोडसे को पढ़ाना वास्तव में उस मानसिकता का अध्ययन करना है जो किसी भी समाज को विनाश की ओर ले जा सकती है। बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि कट्टरता की शुरुआत कहाँ से होती है। जब कोई व्यक्ति या संगठन यह मानने लगता है कि केवल उसका विचार ही परम सत्य है और बाकी सब देशद्रोही या शत्रु हैं, तो वह समाज को गहरे संकट में डाल देता है।
गोडसे का अध्ययन हमें यह सिखाता है कि किस तरह अति-राष्ट्रवाद की अंधी गली अंततः अपने ही देश के पितातुल्य महापुरुषों के रक्त से सिसकती है। यह बच्चों को सहिष्णुता का वास्तविक मूल्य सिखाएगा। जब वे देखेंगे कि मतभेदों को संवाद के माध्यम से सुलझाने के बजाय जब हिंसा का सहारा लिया जाता है, तो पूरा राष्ट्र कितनी गहरी पीड़ा में डूब जाता है। दूसरी ओर, सावरकर का अध्ययन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्रवाद की परिभाषाएं किस तरह बदलती हैं और उनका समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है। सावरकर के योगदान को पूरी तरह नकार देना भी इतिहास के साथ अन्याय होगा और बच्चों को एकपक्षीय ज्ञान देना होगा। हमें बच्चों को यह बताना होगा कि देश की आजादी के लिए सेलुलर जेल की कोठरी में कठिन यातनाएं सहने वाले सावरकर के भीतर क्या चल रहा था, और बाद में उनके विचारों ने जो मोड़ लिया, उसके पीछे क्या ऐतिहासिक विवशताएं या वैचारिक कारण थे।
यह संपूर्ण विमर्श बच्चों के भीतर एक संतुलन पैदा करेगा। वे समझ पाएंगे कि स्वतंत्रता संग्राम कोई एक सुर में गाया गया गान नहीं था, बल्कि वह एक ऐसा मंच था जिसमें कई अलग-अलग आवाजें उठ रही थीं। कुछ आवाजें आपस में मेल नहीं खाती थीं, उनमें तीखा टकराव था, लेकिन उन सभी के केंद्र में भारत की मुक्ति का ही सपना था, भले ही उस मुक्ति के बाद के भारत का स्वरूप उनकी नजरों में अलग था। जब बच्चे इस जटिलता को समझेंगे, तो वे वर्तमान भारत की समस्याओं को भी अधिक परिपक्वता से देख पाएंगे। वे समझ पाएंगे कि आज यदि देश में वैचारिक ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, तो उसकी जड़ें कहीं न कहीं इतिहास के इन्हीं अनसुलझे अध्यायों में छिपी हैं।
शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य: वैचारिक परिपक्वता
शिक्षा का उद्देश्य केवल कुछ तथ्यों को रटकर परीक्षा पास करना या एक अच्छी नौकरी पाना नहीं है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य एक ऐसे संवेदनशील और प्रबुद्ध नागरिक का निर्माण करना है जो अपने समाज, अपने देश और अपनी संस्कृति के प्रति जवाबदेह हो। एक सुंदर और आदर्श भारत का निर्माण तभी संभव है जब हमारे बच्चों का मानसिक विकास संकीर्णताओं से मुक्त हो। यदि हम अपने बच्चों को केवल वही पढ़ाएंगे जो हमें पसंद है, तो हम उनका विकास नहीं कर रहे हैं, बल्कि हम अपनी पसंद-नापसंद को उन पर थोप रहे हैं। यह एक प्रकार की बौद्धिक जड़ता को जन्म देता है जो किसी भी जीवंत लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) भी इसी दिशा में रेखांकित करती है कि शिक्षा का ध्यान रटंत विद्या के बजाय 'क्रिटिकल थिंकिंग' (आलोचनात्मक और तार्किक सोच) को बढ़ावा देने पर होना चाहिए। जब छात्र गांधी, नेहरू, सावरकर और गोडसे जैसे परस्पर विरोधी विचारों को एक ही मेज पर रखकर पढ़ेंगे, तो NEP की यही मूल आत्मा साकार होगी। किसी विचार से असहमत होने के लिए भी पहले उस विचार को गहराई से समझना अनिवार्य होता है - यह समझ बच्चों को अंध-समर्थक या अंध-विरोधी बनने से बचाती है।
गांधी और नेहरू को पढ़ाना हमारे बच्चों के नैतिक और बौद्धिक विकास के लिए अनिवार्य है। गांधी उन्हें सिखाते हैं कि साध्य की पवित्रता के साथ-साथ साधन की पवित्रता भी कितनी जरूरी है। वे सिखाते हैं कि यदि आपका उद्देश्य अच्छा है, तो उसे प्राप्त करने का तरीका भी नैतिक होना चाहिए। नेहरू उन्हें सिखाते हैं कि एक प्राचीन सभ्यता को आधुनिक दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संस्थागत ढांचे और लोकतांत्रिक मूल्यों की कितनी आवश्यकता होती है। लेकिन इन आदर्शों को यथार्थ की धरती पर बनाए रखने के लिए बच्चों को यह भी जानना होगा कि इन विचारों के सामने क्या चुनौतियां थीं। सावरकर और गोडसे को पढ़ाना उस प्रति-संतुलन की तरह है जो बच्चों को यह समझने में मदद करता है कि आदर्शों को बनाए रखना कितना कठिन होता है और उनके विरोधी तर्क कितने शक्तिशाली हो सकते हैं।
जब एक छात्र कक्षा में गांधी के 'हिंद स्वराज' और सावरकर के 'हिंदुत्व' को एक साथ पढ़ेगा, तो वह स्वयं दोनों के अंतर को समझेगा। वह देख पाएगा कि जहाँ गांधी का 'स्वराज' आत्म-नियंत्रण, नैतिकता और समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के कल्याण पर आधारित है, वहीं सावरकर का 'हिंदुत्व' एक विशिष्ट भू-भाग और सांस्कृतिक पहचान के इर्द-गिर्द केंद्रित है। यह समझ बच्चों में उस समय काम आएगी जब वे बड़े होकर देश के नागरिक के रूप में अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे, जब वे समाज की नीतियों को तय करेंगे। तब वे किसी लोकलुभावन नारे के झांसे में नहीं आएंगे, क्योंकि उन्होंने इतिहास की गहराई को छुआ है, उन्होंने विचारों के उस मंथन को देखा है जिससे यह आधुनिक भारत निकला है।
निष्कर्ष: सुंदर भारत के निर्माण का मार्ग
एक सुंदर और सशक्त भारत का सपना तभी साकार हो सकता है जब हमारी आने वाली पीढ़ियां वैचारिक रूप से निडर और सत्य को स्वीकार करने के साहस से भरी हों। इतिहास की किसी भी घटना या विचार को छिपाना अंततः समाज में अविश्वास और भ्रम को ही जन्म देता है। समाचार पत्रों और सार्वजनिक मंचों के माध्यम से इस बात को पूरी स्पष्टता और संजीदगी से रखा जाना चाहिए कि गांधी और नेहरू का विचार आज भी प्रासंगिक है क्योंकि वह सत्य, सह-अस्तित्व और प्रेम पर आधारित है। और इस सत्य को कभी भी प्रतिपक्ष के विचारों से डरने की आवश्यकता नहीं होती।
हमें अपने बच्चों को एक ऐसा बौद्धिक वातावरण देना होगा जहाँ वे गांधी को पढ़ें तो उनकी महानता के साथ-साथ उनके मानवीय दृष्टिकोण को भी समझें, नेहरू को पढ़ें तो उनके आधुनिक विजन के साथ उनकी सीमाओं को भी जानें। और इसी के साथ वे सावरकर को भी पढ़ें ताकि वे भारतीय राष्ट्रवाद के एक अत्यंत प्रभावशाली और जटिल पहलू से परिचित हो सकें, और वे गोडसे को भी पढ़ें ताकि वे कट्टरता के उस भयानक अंत को देख सकें जो किसी भी समाज को नष्ट कर सकता है।
जब हमारी शिक्षा व्यवस्था इतनी पारदर्शी, इतनी परिपक्व और इतनी साहसी होगी, तभी हम वास्तव में एक ऐसे 'सुंदर भारत' का निर्माण कर पाएंगे जहाँ वैचारिक मतभेदों का स्वागत होगा, जहाँ संवाद की संस्कृति होगी, और जहाँ हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होगा। यही गांधी, नेहरू और लाखों भारतीयों के सपनों का वास्तविक भारत होगा, जो अपने प्रतिपक्ष को दबाकर नहीं, बल्कि उसे तार्किक रूप से परखकर और समाहित करके आगे बढ़ेगा। इतिहास की इस संपूर्ण और बारीक समझ के साथ ही हमारी आने वाली पीढ़ी इस महान राष्ट्र की कमान संभालने के योग्य बन पाएगी।

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इतिहासकार की पैनी निगाहें भूतकाल के अंतराल में प्रविष्ट होकर तथ्य के मोतियों को सामने लाती हैं।इस लेख द्वारा यही किया गया है। 

  ~विजय राजबली माथुर ©
 

Wednesday, September 30, 2026

सूर्यकांत क्यों ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे ------ एडवोकेट अरुण अग्रवाल / गिरिजेश वशिष्ठ


सूर्यकांत क्यों ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे. ये विश्लेषण पढ़ें. एडवोकेट अरुण अग्रवाल के एक बयान से लिया है ....
• ज्ञानेश कुमार की भूमिका और प्रभाव (2016 से): ज्ञानेश कुमार वर्ष 2016 में गृह मंत्रालय में जॉइंट सेक्रेटरी के पद पर रहते हुए भी इतने प्रभावशाली थे कि उन्होंने केरल के तत्कालीन चीफ सेक्रेटरी (जी. थॉमसन) को बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए राजी कर लिया था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वे राजनीतिक रूप से जुड़े हुए थे।
• जस्टिस सूर्यकांत के प्रमोशन की क्रोनोलॉजी: जस्टिस सूर्यकांत को हिमाचल प्रदेश का चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश 10 जनवरी 2018 से करीब 10 महीने तक लंबित थी। 17 सितंबर 2018 को ज्ञानेश कुमार गृह मंत्रालय में एडिशनल सेक्रेटरी (इंटरनल सिक्योरिटी) बने (जिसके तहत आईबी रिपोर्ट करती है)। इसके ठीक बाद, रंजन गोगोई के चीफ जस्टिस बनते ही महज 15-20 दिनों के भीतर जस्टिस सूर्यकांत की फाइल क्लियर हो गई।
• आईबी (IB) रिपोर्ट को दबाने का संदेह: सतीश जैन और सुप्रीम कोर्ट के जज ए.के. गोयल की चिट्ठियों में जस्टिस सूर्यकांत के खिलाफ जो गंभीर आरोप थे (जो 'द कारवां' मैगजीन में भी छपे), उनके आधार पर आईबी की रिपोर्ट प्रतिकूल (adverse) होनी तय थी। आरोप है कि ज्ञानेश कुमार ने गृह मंत्रालय और आईबी के स्तर पर साठगांठ करके इस रिपोर्ट को आगे नहीं बढ़ने दिया।
• इंटरनल सिक्योरिटी का अन्य मामलों में इस्तेमाल: तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के यौन उत्पीड़न मामले (sexual harassment scandal) में भी इंटरनल सिक्योरिटी का इस्तेमाल करके पुलिस के माध्यम से सहयोग दिया गया और शिकायतकर्ता महिला के पति व देवर को सस्पेंड/बर्खास्त कराया गया।
• सुप्रीम कोर्ट में त्वरित एलिवेशन: 8 मई को जब दोबारा सिफारिश भेजी गई, तो जो फाइल पहले 10 महीने तक रुकी रही, वह ज्ञानेश कुमार के प्रभाव के कारण सिर्फ 15 दिनों में क्लियर हो गई और जस्टिस सूर्यकांत सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए।
• चुनाव आयुक्त मामले में फाइल रोकना: जब चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित था, तब जस्टिस सूर्यकांत ने साल भर तक उस पर कोई सुनवाई नहीं की। चीफ जस्टिस की बेंच में आने के बाद भी उन्होंने 4 महीने तक फाइल अपने पास रखी और अंत में यह कहकर केस दूसरी बेंच को सौंप दिया कि नए कानून के तहत वे खुद चयन समिति के सदस्य हैं।
• सरकार को पूर्ण संरक्षण (Cast-Iron Protection): ज्ञानेश कुमार को सरकार और अदालत से अभेद्य सुरक्षा कवच मिला हुआ है क्योंकि उन्होंने अनुच्छेद 370, राम मंदिर और रंजन गोगोई को संरक्षण देने जैसे मामलों में एक महत्वपूर्ण सूत्रधार (instrumental role) की भूमिका निभाई है।
• अदालत का सरकार के प्रति झुकाव: जस्टिस सूर्यकांत की अदालत में एक भी ऐसा मामला नहीं आया जिससे सरकार को किसी तरह की शर्मिंदगी उठानी पड़ी हो। जब भी सरकार संकट में फंसती है, उसे तुरंत राहत दे दी जाती है।
• संवैधानिक शक्तियों (Article 142) का दुरुपयोग: चुनाव प्रक्रियाओं और वेरिफिकेशन (SIR) के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत मिली शक्तियों का दुरुपयोग करके 'कम्प्लीट जस्टिस' (पूर्ण न्याय) के बजाय 'कम्प्लीट इनजस्टिस' (पूर्ण अन्याय) किया है। अदालत ने ट्रिब्यूनल बनाकर और एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जजों (ADJs) को लगाकर चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित किया।
• प्रक्रिया को लटकाना और अवैधता को वैध बनाना: जो मामला (SIR की वैधता) जस्टिस धुलिया ने एक घंटे की सुनवाई में स्पष्ट कर दिया था, उसे जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने डेढ़ साल तक खींचकर अंतरिम आदेशों के जरिए पूरा होने दिया। इसके कारण पश्चिम बंगाल की सरकार प्रभावित हुई और लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से कट गए, जिसे बाद में पोस्ट-फेक्टो (बाद की तारीख से) वैध ठहरा दिया गया।
• कॉलेजियम सिस्टम में पारदर्शिता का अभाव: वर्तमान में कॉलेजियम के प्रस्तावों पर जजों के हस्ताक्षर तक नहीं होते और न ही चयन का कोई ठोस कारण बताया जाता है। व्यवस्था पूरी तरह "राजा की मर्जी" से चल रही है।
• निजी संपत्ति और पैन (PAN) नंबर का विसंगतिपूर्ण मामला: ग्रेटर कैलाश की एक संपत्ति (4500 वर्ग फीट का आधा बंगला), जिसकी कागजी कीमत 1.5 करोड़ दिखाई गई जबकि शिकायतकर्ता के अनुसार 3 करोड़ नकद दिए गए थे, उसके दस्तावेजों में पैन नंबर 'सूर्यकांत शर्मा' के नाम पर दर्ज है, लेकिन संपत्ति का रजिस्ट्रेशन 'सूर्यकांत' के नाम से हुआ है।

  ~विजय राजबली माथुर ©


Tuesday, September 29, 2026

लोकतंत्र के लिए हम सबको मिलकर आगे आना होगा ====== अंशू नेथानी / लोकतन्त्र की हत्या पर विदेशी मीडिया ------ राजेश सिंह





जिन संवैधानिक प्रावधानों के तहत चुनाव आयोग को काम करना था और भारतीय संसदीय प्रणाली के कार्यान्वित होने के लिए लोगों की सहभागिता को मतदान के माध्यम से सुनिश्चित करना था उसे करने में चुनाव आयोग पूरी तरह असफल रहा। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने सारे संवैधानिक प्रावधानों और नागरिकों के मौलिक अधिकारों  की हत्या की । और जब यह बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची तो सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक प्रावधानों के तहत चुनाव आयोग के खिलाफ कोई कार्रवाई की नहीं। भारतीय संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए कोई कदम उठाए नही। उल्टे अधिकारों को कुचले जाने का कोई संज्ञान तक नहीं लिया उन अधिकारों को कुचले जाने का उन्होंने समर्थन किया । कहा कोई बात नहीं अगली बार मत दे देना। जबकि मतदान नागरिकों का मौलिक अधिकार है। तो यहां जितना दोषी चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार है उतना ही दोषी सुप्रीम कोर्ट और इस मामले की सुनवाई करने वाले मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत भी व अन्य जो है वह भी इसके लिए जिम्मेदार हैं। संवैधानिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई होनी चाहिए।
हमारे लॉ आफ जूरिप्रूडेंस में क्या ऐसा प्रावधान है कि किसी अपराधी के द्वारा अपराध किए जाने के बाद अपराध को सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर लिया गया हो और उन अपराधों के प्रमाणित होने पर उनकी सजा के प्रावधानों में क्या कोई परिवर्तन आ सकता है और यदि अपराध संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्तियों के द्वारा संवैधानिक अधिकारों व नियमों के विरुद्ध किया गया हो तो इस पर कार्रवाई और सजा का निर्धारण किस तरह से होगा।
लोकतंत्र के लिए हम सबको मिलकर आगे आना होगा। प्रेस क्लब में लोकतंत्र पर विचार विमर्श के दौरान अपनी बात कहते हुए।
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भारत के लोकतन्त्र की हत्या पर विदेशी मीडिया रिपोर्टिंग 
दुनिया के बड़े मीडिया हाउस पहली बार चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं! द न्यूयॉर्क टाइम्स, ब्लूमबर्ग, अल जज़ीरा, बीबीसी और अन्य विदेशी मीडिया ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयोग के अंदर कथित मतभेदों, SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) प्रक्रिया और करोड़ों वोटर के नाम हटाने की रिपोर्टिंग की है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा कि आयोग के दो आयुक्तों ने कई बार आपत्ति दर्ज की, फिर भी फैसले एकतरफा लिए गए। अल जज़ीरा ने "शेकन फेथ" कहकर भारतीय चुनावों पर अभूतपूर्व संदेह जताया।  ब्लूमबर्ग ने SIR विवाद और विरोध प्रदर्शनों को कवर किया।  हिंदुस्तान के इतिहास में शायद पहली बार दुनिया के बड़े मीडिया हाउस चुनाव आयोग पर अंगुली उठा रहे हैं। दुनिया की नजरों में भारत का चुनावी तंत्र शक के दायरे में आ गया है। मोदी सरकार और चुनाव आयोग पर विदेशी रिपोर्टिंग से अंतरराष्ट्रीय बदनामी का सवाल खड़ा हो गया है।
न्यूयॉर्क टाइम्स ने 23 सितंबर 2026 को अपनी रिपोर्ट में लिखा कि भारतीय चुनाव आयोग ने ऐसे उपाय तेजी से लागू किए जो करोड़ों लोगों को वोट देने से वंचित कर सकते हैं, भले ही तीन में से दो आयुक्तों ने इन कदमों की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए हों। अखबार ने इंडियन एक्सप्रेस की जांच रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें खुलासा हुआ कि दो चुनाव आयुक्तों ने आधिकारिक तौर पर 14 बार आपत्ति दर्ज कराई, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने इन सभी को नजरअंदाज करके एकतरफा फैसले लेते रहे। न्यूयॉर्क टाइम्स ने सवाल उठाया कि क्या यह प्रक्रिया वास्तव में स्वतंत्र और निष्पक्ष है, या फिर मोदी सरकार के राजनीतिक फायदे के लिए डिजाइन की गई है। आयोग के बयान पर भी अखबार ने संदेह जताया, जिसमें कहा गया कि यह "मतभेद" नहीं, बल्कि "सामान्य चर्चा" थी, लेकिन बयान किसी वरिष्ठ अधिकारी ने नहीं, बल्कि एक जूनियर अधिकारी ने साइन किया था। यह पहला मौका है जब अमेरिका के सबसे प्रतिष्ठित अखबार ने सीधे तौर पर भारतीय चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं।
अल जज़ीरा ने 26 सितंबर 2026 को "शेकन फेथ" शीर्षक से एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें लिखा गया कि भारतीय लोकतंत्र को नए खुलासों से गहरा झटका लगा है।  रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया के तहत 13 करोड़ से अधिक नाम मतदाता सूची से हटा दिए हैं, जिनमें ज्यादातर गरीब, अल्पसंख्यक और वंचित तबके के लोग शामिल हैं। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने अल जज़ीरा से कहा, "आज वह भरोसा हिल गया है। यह देश के लिए बहुत चौंकाने वाला है।" रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीने में 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति दर्ज कराई, जिसे संधू ने "अनधिकृत और गैरकानूनी" करार दिया। अल जज़ीरा ने सवाल उठाया कि क्या मोदी की BJP के फायदे के लिए एक खास तबके को वंचित किया जा रहा है, खासकर मुसलमानों को, जो BJP के हिंदूत्ववादी अभियान का मुख्य निशाना रहे हैं। यह रिपोर्ट सिर्फ भारत के भीतर ही नहीं, बल्कि पूरे मुस्लिम जगत में गूंज रही है।
ब्लूमबर्ग ने 23 से 26 सितंबर के बीच कई रिपोर्टें प्रकाशित कीं, जिनमें चुनाव आयोग के खिलाफ बढ़ते विरोध, कांग्रेस के प्रदर्शनों और कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के अल्टीमेटम को कवर किया गया। ब्लूमबर्ग ने लिखा कि SIR प्रक्रिया इतनी विवादास्पद हो गई है कि युवा आंदोलन CJP ने CEC ज्ञानेश कुमार को 48 घंटे का अल्टीमेटम दे दिया है, या तो इस्तीफा दो, या सड़कों पर उतरेंगे। कांग्रेस ने बड़े पैमाने पर देश भर में प्रदर्शन किए, जिनमें जम्मू-कश्मीर, असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। ब्लूमबर्ग ने यह भी रिपोर्ट किया कि चुनाव आयोग ने विरोध के बाद कुछ प्रक्रियाओं में ढील देने की घोषणा की है, लेकिन यह कदम बहुत देर से और बहुत कम है। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और बाजारों के लिए यह संकेत है कि भारत की राजनीतिक स्थिरता और संस्थागत विश्वसनीयता खतरे में है।
यह सिर्फ एक संस्थागत विवाद नहीं, बल्कि मोदी, अमित शाह और RSS की सुनियोजित साजिश है। 2014 से मोदी सरकार ने चुनाव आयोग को धीरे-धीरे अपने कब्जे में लिया।  2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया बदल दी गई, जिससे सरकार को सीधे तौर पर CEC चुनने का अधिकार मिल गया।  ज्ञानेश कुमार जैसा व्यक्ति, जो Article 370 के खत्म होने और राम मंदिर ट्रस्ट जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सरकार के लिए काम कर चुका है, को CEC बनाया गया।  SIR प्रक्रिया के तहत 13 करोड़ नाम हटाना कोई संयोग नहीं, बल्कि भारतीय लोकतन्त्र को ध्वस्त करने के लिए एक सुनियोजित रणनीति है, गरीबों, प्रवासियों, अल्पसंख्यकों और उन तबकों को वंचित करना, जो BJP के पक्ष में वोट नहीं करते। अमित शाह, जो "मशीनमैन" के नाम से जाने जाते हैं, ने चुनावी रणनीति का मास्टरमाइंड रहकर यह सुनिश्चित किया कि मतदाता सूची में ऐसे बदलाव हों जो BJP को फायदा पहुंचाएं। RSS, जो हिंदूत्ववादी विचारधारा का प्रचार करती है, ने दशकों से "एक देश, एक वोट" का नारा लगाया है, लेकिन हकीकत में उनका मकसद है, एक देश, एक वोट, लेकिन सिर्फ उनका वोट चले। मुसलमानों, अति पिछड़े, दलितों, आदिवासियों और गरीबों को वंचित करके BJP अपनी सत्ता बरकरार रखना चाहती है। यह लोकतंत्र नहीं बल्कि तानाशाही है। और दुनिया अब यह देख रही है।
दशकों तक भारत ने अपने आप को "विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र" कहकर पेश किया। लेकिन अब यह मुखौटा गिर चुका है। न्यूयॉर्क टाइम्स, अल जज़ीरा, ब्लूमबर्ग, बीबीसी जैसे प्रतिष्ठित मीडिया हाउस जब एक स्वर में सवाल उठाएं, तो यह सिर्फ राजनीतिक विवाद नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीयता का संकट है। अमेरिका, यूरोप और मध्य पूर्व में भारत की छवि खराब हो रही है। निवेशक सोचने लगे हैं कि क्या भारत में संस्थाएं स्वतंत्र हैं या सरकार के इशारे पर चलती हैं। मानवाधिकार संगठन चुनावी धांधली और वंचितीकरण की जांच की मांग कर रहे हैं। मोदी सरकार विदेशी मीडिया की रिपोर्टिंग को "झूठा और पक्षपातपूर्ण" कहकर खारिज कर रही है, लेकिन हकीकत यह है कि आंतरिक दस्तावेज और आयुक्तों की आपत्तियां सामने आ चुकी हैं। जब दो आयुक्त खुद कहें कि प्रक्रिया "गैरकानूनी" है, तो सरकार का बचाव कैसे माना जाए? अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब सवाल पूछ रहा है, क्या 2029 के चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष होंगे? क्या करोड़ों भारतीयों का वोट छीना जाएगा? और अगर हां, तो क्या दुनिया इसे स्वीकार करेगी?
निष्कर्ष: अब या तो सुधार होगा, या क्रांति, दुनिया की नजरें भारत पर टिकी हैं। अगर मोदी-शाह-RSS गठजोड़ ने चुनाव आयोग को सुधारने, SIR प्रक्रिया को रोकने और वंचित मतदाताओं को बहाल करने का कदम नहीं उठाया, तो नतीजा भयानक होगा। CJP का अल्टीमेटम सिर्फ शुरुआत है।भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और विपक्षी दल 30 सितंबर को दिल्ली में बड़ी बैठक करने वाले हैं। अगर संसदीय रास्ते काम नहीं आए, तो भारत की जनता सड़कों पर उतरेगी। मोदी के पास दो रास्ते हैं, या तो वे लोकतंत्र को बचाएं, या लोकतंत्र उन्हें उखाड़ फेंकेगा। विदेशी मीडिया की रिपोर्टिंग ने दुनिया को आंखें खोल दी हैं। अब बहाने बिल्कुल नहीं चलेंगे। भारत की जनता नें मन बना लिया है कि या तो सुधार होगा, या क्रांति। तीसरा रास्ता बंद है।
Rajesh R. Singh 
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  ~विजय राजबली माथुर ©


Saturday, September 26, 2026

सदमे में लोकतंत्र / असहमत होने का ड्रामा -------- Usrar Belous / Keshaw Bhatter's Post



क्या विवेक जोशी गोगोई की तरह देश को भ्रमित कर मुख्य चुनाव आयुक्त पद पर स्थापित होना चाहते है ?
गोगोई ने मोदी से मिल कर सरकार से असहमत होने का ड्रामा करते हुवे..
सरकार पर अविश्वास जताकर प्रेस कान्फ्रेंस मे सरकार पर न्याय पालिका मे हस्तक्षेप करने , दबाव डालने का आरोप लगा कर इतिहास मे पहेली बार इस तरह का विरोध किया था..
इस प्रेस कान्फ्रेंस के माध्यम से जनसमर्थन और अंदर से मोदी का समर्थन लेते हुवे चीफ जस्टिस के पद पर स्थापित होने का ड्रामा रचा था..
क्यो की सुप्रीम कोर्ट के जज की नियुक्ती कालेजियम के माध्यम से सरकार के हस्तक्षेप के साथ ही होती आ रही है..
सरकार चाहती तो गोगोई को चीफ जस्टिस बनने ही नही देती..
मोदी वैसे भी प्रतिशोध , बदला लेने मे विश्व प्रसिद्ध माने जाते है..
फिर भी गोगोई देश के चीफ जस्टिस बनाए गए और लगभग सभी फैसले सरकार और सरकार समर्थक गुंडो अपराधियो के पक्ष मे दिये..
क्या विवेक जोशी को इसी ड्रामेबाजी के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया जाना है..
ता के देश की जनता मे ऐसा मँसेज जाए मानो ग्यानेश कुमार को सजा दे दी गई हो और देश की जनता ग्यानेश कुमार द्वारा किये गए सरकार के सभी अपराध भूल कर नये चुनाव आयुक्त से लोकतंत्र की बहाली की अपेक्षा करने लगे ?
ग्यानेश कुमार के खिलाफ आजीवन मतलब रिटायर होकर जिंदा रहेने तक कोई कानूनी कारवाई हो नही सकती ऐसा कानून बनाया जा चुका है..
ये कानून हर केंद्रीय चुनाव आयुक्त के लिये है..
इस से नये चुनाव आयुक्त को भी सरकार इस्तेमाल कर सकेंगी..
देश की जनता संसद मे बहुमत के बगैर भी ग्यानेश कुमार से मुक्त हो सकती थी..
देश के आसपास जो हुवा ऊस से जनता ने कोई सबक नही सिखा ..
क्यो की देश की जनता की कलाईयो मे ताकत नही है , हिम्मत नही है..
देश की बहुसंख्यक जनता मे हिम्मत , ताकत , धैर्य , स्वाभिमान हजारो साल से है ही नही वर्ना ग्यानेश कुमार से मुक्त होने के पहेले देश की जनता हजारो साल की वर्ण व्यवस्था से मुक्त हो जाती..
कुल मिलाकर सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मिले हुवे है.
वर्ना श्रीलंका , नेपाल , बांग्लादेश कब का हो चुका होता..
(आगे पढना हो तो जारी रखे या पोस्ट को छोड दे)
हजारो साल के शुद्र गुलाम सरकार से तभी नाराज होते है जब RSS ..
* जय प्रकाश नारायण अर्थात JP के साथ मिल कर सरकार को अप्रिय करे..
* जब RSS अन्ना हजारे के साथ मिलकर मनमोहन सरकार को अप्रिय करे.
* RSS ने ओबीसी वर्ग को वि पी सिंग सरकार के द्वारा दिये भयानक आँफर वाले 'मंडल आरक्षण' के खिलाफ ओबीसी वर्ग खडा कर दिया था..
पुरे देश के ओबीसी वर्ग ने RSS और RSS के विद्यार्थी संगठन ABVP के साथ मिल कर , कंधे से कंधा लगा कर खुद को मिले 'मंडल आरक्षण' के खिलाफ तांडव मचाया था..
और खुद को मिले भयानक दे दनादन आरक्षण को अदालत की समिक्षा के लिये भिजवाना पडा था..
देश का कुल 65% ओबीसी मंडल आरक्षण देने वाले 'विश्वनाथ प्रताप सिंग और ऊनकी सरकार से इतनी नफरत कर रहा था के भारत के इतिहास मे इस का ऊदाहरण देना कठीन है'
पाकिस्तान और मुसलमान के नाम से अन्य मौको पर देश को भ्रमित कर लिया जाता है..
ऐसी हजारो साल की गुलाम जनता क्या श्रीलंका , नेपाल और बांग्लादेश करेंगी..?
नेपाल जैसा होने डर से नकली वर्दी वाली और बिना वर्दी वाली जो प्रायवेट सेना बनाई गई है..
ऊस मे भी हजारो साल के गुलाम ही भरे पडे है..
विपक्ष ने अब तक नही पुछा के क्या ये लोग पुलवामा , पहेलगाम भी आते जाते है ?
ये संयोग या प्रयोग का शब्द हर विध्वंस की टाईमिंग के बाद इस्तेमाल होता है ऊस की हकीकत क्या है ?
कुल मिला कर ये साबित किया जा सकता है के देश के सेक्युलर ढांचे , लोकतंत्र को बचाने के लिये देश की जनता कभी क्रांती वगैरह नही करेंगी..
वर्णद्वेषी मनुस्मृति वाले चाहे तो देश मे हर साल विद्रोह हो सकता है ..
ये रोस्टर पध्दती के दंगे क्या है अघोषित विद्रोह और भ्रम फैलाना है..







खतरनाक मोड़: संवैधानिक संस्थाएं, हितों का टकराव और सदमे में लोकतंत्र
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देश के सर्वोच्च कानूनी और प्रशासनिक गलियारों से जो खबरें और तथ्य सामने आए हैं,वे पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए निहायत ही चिंताजनक है। 
LiveLaw और The Indian Express की रिपोर्टों के माध्यम से ऐसे घटनाक्रम एक साथ सामने आए हैं, जो जनता के मन में सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग- सर्वोच्च संवैधानिक संस्थाएं - की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करते हैं। 
सामने आया है कि सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ जज के पुत्र मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के आधिकारिक वकील हैं। चिंता की बात यह है कि 'वही जज' सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त से जुड़े अति-महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई करने वाली पीठ में शामिल रहे हैं। यह हितों के टकराव (Conflict of Interest) का संकट है। 
मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के विवादित कानून को चुनौती देने वाली याचिका, जिस पर तुरंत निर्णय होना चाहिए था, अब अनिश्चितकाल के लिए टल गई है।
नोएडा की तत्कालीन डीएम (जो मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी हैं) द्वारा एक छात्र पर एनएसए (NSA) के मनमाने इस्तेमाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फटकार लगाते हुए कड़ा जुर्माना लगाया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की पीठ ('वही जज') ने इस पर तुरंत रोक लगा दी। 'खास' के लिए त्वरित राहत और 'आम' के लिया दर-दर की ठोकरें ! डीएम मेधा रूपम का मामला जिस विषय से संबंधित था, वह नियमित रोस्टर के तहत जस्टिस शर्मा ('वही जज') की पीठ के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था। इसके अलावा, इसी से जुड़े मामले पर पहले से ही जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की पीठ सुनवाई कर रही थी। ऐसे में इस मामले का विशेष रूप से जस्टिस शर्मा की पीठ को सौंपा जाना अपने आप में संदेह पैदा करता है।   
सोचने वाली बात (Food for Thought) यह है कि - 
कानून का एक सदियों पुराना और सर्वमान्य सिद्धांत है - "न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए" - जब किसी न्यायाधीश के परिवार के सदस्य का करियर या व्यावसायिक हित किसी सरकारी संस्था (जैसे चुनाव आयोग) से जुड़ा हो, तो क्या आम नागरिक उस संस्था के खिलाफ अदालत से पूरी तरह निष्पक्ष फैसले की उम्मीद कर सकता है ? जब सुप्रीम कोर्ट के ही वरिष्ठ जस्टिस दीपांकर दत्ता सार्वजनिक रूप से यह कहें कि 'चुनाव आयोग को केवल स्वतंत्र होना ही नहीं चाहिए, बल्कि स्वतंत्र दिखना भी चाहिए', तो समझना होगा कि संविधान कितना भी अच्छा हो, यदि उसे चलाने वाले निष्पक्ष न हों तो वह विफल हो जाता है। वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि नियम-कानूनों की भावना को ताक पर रखकर केवल कानूनी छिद्रों का सहारा लिया जा रहा है, जिससे संस्थागत मर्यादाएं टूट रही हैं।
तो हमें किस बात पर विचार करना चाहिए ?
(01) ❓-लोकतंत्र किसी इमारत से नहीं, बल्कि संस्थाओं पर जनता के भरोसे से चलता है। अगर आम नागरिक का अदालत और चुनाव आयोग की निष्पक्षता से विश्वास उठ गया, तो लोकतंत्र का आधार ही हिल जाएगा। (02) ❓-चुनाव कराने वाली संस्थाओं की नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी न हो और उस पर न्यायिक निगरानी भी कमजोर पड़ जाए, तो चुनाव केवल एक ढकोसला बनकर रह जाएंगे और देश में महज नियंत्रित लोकतंत्र (Managed Democracy) रह जाएगा।  (03)-❓ जब कड़े प्रशासनिक फैसलों (जैसे NSA के दुरुपयोग) पर भी अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय नहीं होगी, तो आम नागरिक के संवैधानिक मौलिक अधिकारों की रक्षा कौन करेगा? क्या यह जवाबदेही के अंत की घोषणा है। 
आप क्या सोच रहें हैं ?
यह मामला किसी एक पार्टी, नेता, अफसर या जज का नहीं है। एक आम नागरिक या छात्र जब अपने अधिकारों के लिए लड़ता है तो उस पर NSA जैसे कठोर कानून थोप दिए जाते हैं, लेकिन जब प्रशासनिक या संवैधानिक पदों पर बैठे शक्तिशाली अधिकारियों या उनके परिजनों की बात आती है, तो पूरी व्यवस्था तुरंत राहत देने और जवाबदेही टालने की दिशा में काम करती दिखती है। इससे समाज में आम आदमी का न्याय व्यवस्था पर से विश्वास कम होता है।यह देश के संवैधानिक संतुलन (Checks and Balances) का मामला है। क्या संवैधानिक संस्थाओं को अदृश्य ताकतवर हाथ नियंत्रित कर रहें हैं ? क्या तराजू बेपर्दा होकर सत्ता की तरफ झुकती दिख रही है ? क्या न्यायपालिका को अपने भीतर 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) को लेकर सख्त और पारदर्शी नियम लागू नहीं करने चाहिए ? क्या ऐसे मामलों में न्यायाधीशों को स्वेच्छा से सुनवाई से अलग (Recuse) नहीं हो जाना चाहिए ?
इन रिपोर्टों का संयुक्त निष्कर्ष यह चेतावनी देता है कि भारत "संस्थागत निष्पक्षता के संकट" से गुजर रहा है। देश एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है जहाँ संवैधानिक संस्थाएं स्वायत्त दिखने के बजाय सत्ता के अनुकूल या सत्ता से प्रभावित दिख रही हैं। सवाल यह भी उठता है कि क्या नियम और प्रक्रियाएं सबके लिए समान रूप से काम कर रही हैं ? क्या आम नागरिक के संवैधानिक हित सर्वोपरि सूची में हैं, सुरक्षित हैं ?
समय रहते न्यायपालिका ने अपने भीतर 'हितों के टकराव' के कड़े मानक लागू नहीं किए, और निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाओं की स्वायत्तता बहाल नहीं की, तो लोकतंत्र का आंतरिक ढांचा खोखला होता चला जाएगा।






  ~विजय राजबली माथुर ©

Friday, September 25, 2026

स्वतंत्र पत्रकारिता में रितिका चोपड़ा (Ritika Chopra) का प्रेरणादायक योगदान Keshaw Bhatter's Post

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कुछ पोस्ट्स देखी जिनमे रीतिका चोपड़ा को कॉन्ग्रेसी एजेंट बताते हुए अपशब्द कहे गए हैं। दरअसल 23.09.2026 के ' द इंडियन एक्स्प्रेस' में छपी भारत के चुनाव आयोग की अंदरूनी स्टोरी ने देश भर में हलचल मचा दी है। यह बात कुछ लोगों को कुछ ज्यादा ही परेशान कर रही है। बस!  इस पोस्ट को लिखने की भूमिका बन गई। और हाँ- 'शाबाश !'  
पत्रकारिता में निष्पक्षता, साहस और गहराई की एक मिसाल! 
रितिका चोपड़ा (Ritika Chopra), जिन्हें 19 वर्षों से अधिक का एक शानदार पत्रकारिता अनुभव है, वर्तमान में The Indian Express, Mumbai की Resident Editor के रूप में अपनी भूमिका निभा रही हैं।
राजनीति, शासन और शिक्षा नीति जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर उनकी पकड़ बेजोड़ है। अपने करियर के दौरान उन्होंने भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) और शिक्षा मंत्रालय जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर ऐसी खोजी रिपोर्ट्स तैयार की हैं, जिन्होंने सरकार और प्रशासन को जवाबदेह ठहराया है।
एक नज़र उनके प्रेरणादायक सफर और उपलब्धियों पर:
प्रमुख सम्मान एवं पुरस्कार:
चमेली देवी जैन अवॉर्ड (2024): खोजी पत्रकारिता और स्वतंत्र संस्थाओं की स्थिति उजागर करने के लिए 'आउटस्टैंडिंग वुमन मीडिया पर्सन ऑफ द ईयर'।
रामनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म अवॉर्ड (2021): चुनाव आयोग के कामकाज पर की गई बेहतरीन सीरीज़ के लिए।
IPI इंडिया अवॉर्ड (2022): 2019 के लोकसभा चुनावों के निष्पक्ष और साहसिक कवरेज के लिए।
UNFPA-लाडली मीडिया अवॉर्ड (2018) एवं ACJ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म स्पेशल मेंशन (2018) ("डीवैल्यूएड डिग्री" सीरीज़ के लिए)।
शिक्षा और करियर की शुरुआत:
उन्होंने सेंट जेवियर्स कॉलेज, कोलकाता से मास कम्यूनिकेशन में डिग्री हासिल की। 2006 में 'हिंदुस्तान टाइम्स' से इंटर्नशिप के रूप में शुरू हुआ यह सफर 'द इकोनॉमिक टाइम्स' और 'मेल टुडे' जैसे प्रमुख संस्थानों से होते हुए आज पत्रकारिता के एक नए शिखर पर है।
सच्चाई को सामने लाने और स्वतंत्र पत्रकारिता की साख को बनाए रखने के लिए उनका योगदान प्रेरणादायक है! 

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  ~विजय राजबली माथुर ©