Wednesday, April 29, 2026

लाल बहादुर शास्त्री ------ Pankaj Kumar Jat




9 जून 1964 को एक 5 फुट 2 इंच का दुबला-पतला आदमी भारत का प्रधानमंत्री बना था और 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनकी रहस्यमयी मौत हो गई। कुल कार्यकाल लगभग 19 महीने। बस 19 महीने। 
इन 19 महीनों का वजन आज की कई पूरी सरकारों पर भारी पड़ता है। जिस आदमी को विदेशी प्रेस ने “अनलाइकली सक्सेसर” कहा, उसी ने पाकिस्तान को जवाब दिया, अमेरिका के दबाव को ठुकराया, किसानों को सम्मान दिया, सैनिकों का मनोबल बढ़ाया और देश को आत्मनिर्भरता की राह पर धकेल दिया। 
नाम था लाल बहादुर शास्त्री। कद छोटा था, काम हिमालय जितना बड़ा था।
आज देश में कैमरे की चमक को नेतृत्व समझ लिया गया है, भाषण को नीति और नारे को उपलब्धि। ऐसे समय में शास्त्री जी का नाम लेना ही कई लोगों की राजनीति पर तमाचा है। क्योंकि शास्त्री जी ने सत्ता को निजी ब्रांड नहीं बनाया, देश सेवा बनाया।
उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही खुद की मूर्तियाँ नहीं लगवाईं, खुद का चेहरा हर दीवार पर नहीं चिपकवाया, हर योजना का नाम अपने ऊपर नहीं रखा। वे उन नेताओं में थे जो काम करके चुप रहते थे, आज वाले उन नेताओं में हैं जो चुप रहकर भी प्रचार करवा लेते हैं।
रेल मंत्री रहते हुए 1956 में अरियालुर रेल दुर्घटना हुई। आज के नेताओं की तरह जांच बैठाओ, बयान दो, विपक्ष को दोष दो, मीडिया मोड़ दो वाला खेल नहीं खेला। शास्त्री जी ने नैतिक जिम्मेदारी ली और इस्तीफा दे दिया। सोचिए, एक रेल दुर्घटना पर इस्तीफा। 
आज तो पुल गिर जाए, ट्रेन भिड़ जाए, पेपर लीक हो जाए, बेरोजगार सड़क पर पिट जाएं, तब भी कुर्सी से चिपके रहते हैं जैसे फेविकोल की सरकारी स्कीम में आए हों।
प्रधानमंत्री बने तो देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। अमेरिका PL-480 के तहत गेहूं देकर दबाव बनाता था। शास्त्री जी ने कहा हम भूखे रह लेंगे, झुकेंगे नहीं। खुद एक वक्त उपवास रखा, देश से अपील की। पहले खुद त्याग किया, फिर जनता से कहा। 
आज पहले जनता से गैस महंगी करवाओ, फिर खुद वातानुकूलित मंच से त्याग पर भाषण दो। यही फर्क है चरित्र और अभिनय में।
शास्त्री जी ने “जय जवान जय किसान” नारा दिया था। यह नारा चुनावी मंच की तुकबंदी नहीं था, राष्ट्रीय दर्शन था। उन्होंने 1965 युद्ध में सेना को खुला मनोबल दिया। पाकिस्तान के अयूब खान जिन्हें लगा था छोटा आदमी है, बाद में उसी आदमी की दृढ़ता माननी पड़ी। 
दूसरी तरफ किसानों के लिए FCI, राष्ट्रीय बीज ढांचा, हरित क्रांति की नींव, डेयरी विकास के लिए NDDB, अमूल मॉडल का विस्तार। आज किसान सड़क पर बैठे रहें, महीनों मरते रहें, तब सरकार उन्हें राष्ट्रविरोधी बताने लगती है। 
शास्त्री जी होते तो पहले बात करते, बाद में बिल लाते।
उनके पास अपनी कार तक नहीं थी। परिवार के कहने पर 12,000 रुपये का लोन लेकर फिएट कार खरीदी। मृत्यु के समय कर्ज बाकी था। पत्नी ने पेंशन से चुकाया। जरा तुलना कर लो। आज वार्ड स्तर का नेता करोड़पति, जिला स्तर वाला उद्योगपति, ऊपर वाला तो मानो चलता-फिरता विज्ञापन साम्राज्य। और एक प्रधानमंत्री ऐसा भी था जो कर्ज में मरा मगर ईमानदारी में अमर हो गया।
उनके बेटे को नौकरी में प्रमोशन मिला तो रद्द करवा दिया। सरकारी कार निजी काम में चली तो किलोमीटर का हिसाब लेकर पैसा जमा कराया। आज परिवारवाद पर भाषण देने वाले खुद रिश्तेदारों, मित्रों, चहेतों और कॉरपोरेट दरबारियों से घिरे रहते हैं। जनता को प्रवचन, अपने लोगों को संरक्षण। पुरानी चाल है, बस पैकिंग नई है।
शास्त्री जी फटा कुर्ता कोट के नीचे पहन लेते थे। कहते थे शर्म तब होनी चाहिए जब किसान नंगा सोए। आज शर्म किसे है? लाखों का सूट, करोड़ों का प्रचार, और जनता को डेटा पैक से राष्ट्रवाद डाउनलोड कराया जाता है। 
किसान की आय दोगुनी का सपना दिखाकर लागत चौगुनी कर दी। बेरोजगार को ऐप दे दिया, मजदूर को भाषण, छात्र को परीक्षा घोटाला।
11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनकी मृत्यु हुई। आधिकारिक कारण हार्ट अटैक बताया गया। परिवार ने सवाल उठाए। पोस्टमार्टम नहीं हुआ। फाइलें वर्षों बंद रहीं। सरकारें बदलीं, राज बदला, पर सच पर ताला जस का तस। 
कांग्रेस हो या बीजेपी, दोनों ने इस प्रश्न से दूरी बनाई। क्योंकि इतिहास की ईमानदार जांच से कई नकाब उतरते हैं, और सत्ता को नकाब बहुत प्रिय होता है।
आज कुछ लोग शास्त्री जी का नाम लेते हैं, पर उनकी आत्मा से डरते हैं। क्योंकि अगर शास्त्री मॉडल लागू हो जाए तो आधे नेता संपत्ति घोषित करते ही बेहोश हो जाएं, चौथाई इस्तीफा देने पड़ जाएं, बाकी प्रचार विभाग में नौकरी मांगते फिरें। 
शास्त्री जी का जीवन बताता है कि देश भाषणों से नहीं, संस्थाओं से चलता है। नारे से नहीं, नीति से चलता है। फोटो से नहीं, फैसलों से चलता है।
नरेंद्र भाई और बीजेपी को सबसे ज्यादा खतरा विपक्ष से नहीं, शास्त्री जी जैसे नेताओं की स्मृति से है। क्योंकि जनता अगर तुलना करने लगी तो सवाल पूछेगी कि 19 महीने में जिसने युद्ध भी संभाला, कृषि भी संभाली, संस्थाएं भी खड़ी कीं, सादगी भी निभाई, वह बड़ा नेता था या वह जो वर्षों से सत्ता में रहकर भी हर विफलता का दोष पिछले 70 साल पर डालता है।
लाल बहादुर शास्त्री जी साबित करते हैं कि ऊंचाई शरीर की नहीं, रीढ़ की होती है। कुर्सी की नहीं, चरित्र की होती है। नाम पोस्टर से नहीं, त्याग से बनता है। 
देश को आज फिर भाषणवीर नहीं, शास्त्री जैसे कर्मवीर चाहिए। बाकी पोस्टर तो बारिश में भीगकर उतर ही जाते हैं।



  ~विजय राजबली माथुर ©


Sunday, April 26, 2026

भारत ऐसे ही ज्ञान और कला के लिए विख्यात था ------ Chandrashekhar Joshi

मुस्लिम बंधुओं ने बनाया था ऐतिहासिक सुपर कंप्यूटर---
यह दुर्लभ खगोलीय एस्ट्रोलैब 17वीं शताब्दी में पीतल से बनाया गया था। जमाने की अद्भुत कलाकारी देख इसे पुराना सुपर कंप्यूटर नाम दिया गया। अब यह लंदन में नीलाम किया जाएगा।
...ऐसा बताते हैं कि 17वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में भारतीयों में उच्च दर्जे की खगोलीय रुचि थी। मुगल साम्राज्य में लाहौर खगोलीय उपकरण बनाने का प्रमुख केंद्र बना। यहां ज्ञान विज्ञान के एक संस्थान का नाम लाहौर स्कूल था। यहां खगोलीय उपकरण बनाने का शिल्प एक ही परिवार के चार पीढ़ियों तक पिता से पुत्र के बीच आगे बढ़ता रहा। लंदन में मौजूद दुर्लभ एस्ट्रोलैब को दो भाई कइम मोहम्मद और मोहम्मद मुकिम ने इसी स्कूल में बनाया था।
...वर्ष 1612 में तैयार किया गया यह एस्ट्रोलैब उस जमाने का अपनी तरह का सबसे बड़ा कंप्यूटर था। इसे सरदार आगा अफजल ने बनवाया था। वह मुगल साम्राज्य के एक बेहद शक्तिशाली सरदार थे और उस समय सम्राट जहांगीर के अधीन लाहौर का प्रशासन संभालते थे। बाद में यह जटिल उपकरण महाराजा सवाई मान सिंह द्वितीय के शाही संग्रह का हिस्सा रहा फिर उनकी पत्नी गायत्री देव के पास सुरक्षित रहा। उसके बाद निजी संग्रह में लंदन चला गया।
...इसकी कारीगरी वाकई अद्भुत है। इसमें 94 शहरों के देशांतर और अक्षांश सहित विविध विवरण अंकित हैं। फूलों की नक्काशी से जुड़े 38 तारा चिह्न हैं, पांच प्लेटें हैं और डिग्री का विभाजन बेहद बारीक है। इस एस्ट्रोलैब पर तारों के फारसी नाम और देवनागरी लिपि में संस्कृत नाम अंकित हैं। इसपर मक्का, बीजापुर, अजमेर, कश्मीर और लाहौर के स्थानों को दर्शाने वाली पट्टियां भी हैं। इसकी विकसित तकनीक को देख इसे सुपर कंप्यूटर कहा गया। यह इस्लामिक जगत और भारत की कला का बेजोड़ नमूना है।
...दोनों भाइयों ने कई एस्ट्रोलैब बनाए जो आज भी मौजूद हैं। इन दोनों ने मिलकर एक अन्य एस्ट्रोलैब बनाया था, जो अब इराक के राष्ट्रीय संग्रहालय में है। उसका व्यास मात्र 12 सेंटीमीटर है।
...लंदन में मौजूद सुपर कंप्यूटर को अगले सप्ताह सोथबी नीलामी घर में नीलाम किया जाएगा। इसका व्यास 29.5 सेंटीमीटर और ऊंचाई लगभग 50 सेंटीमीटर है। नीलामी में इसकी अनुमानित कीमत 15 से 25 लाख पौंड के बीच है। नीलामी की अन्य प्रमुख कलाकृतियों में जहांगीर की एक मुगलकालीन पेंटिंग भी शामिल है। इसकी अनुमानित कीमत 150,000 से 200,000 पौंड के बीच है। 
.. भारत ऐसे ही ज्ञान और कला के लिए विख्यात था..


  ~विजय राजबली माथुर ©
 

Wednesday, April 8, 2026

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त का बम ------ विजय राजबली माथुर

आज ०८ अप्रैल है -वह दिन जब केन्द्रीय असेम्बली में सरदार भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने बम फेंका था.वह बम गूंगी -बहरी सरकार और क़ानून निर्माताओं को जगाने के लिए फेंका गया था किसी हिंसक इरादे से नहीं.न ही किसी की जान ही गई थी. २६ जनवरी १९३० को बांटे गए पर्चे में भगत सिंह ने कहा था-"एक क्रांतिकारी सबसे अधिक तर्क में विशवास करता है.वह केवल तर्क और तर्क में ही विशवास करता है.किसी प्रकार का गाली-गलौच या निन्दा,चाहे वह ऊंचे से ऊंचे स्तर से की गई हो,उसे अपने निश्चित उद्देश्य -प्राप्ति से वंचित नहीं कर सकती.यह सोचना कि यदि जनता का सहयोग न मिला या उसके कार्य की प्रशंसा न की गई तो वह अपने उद्देश्य को छोड़ देगा ,निरी मूर्खता है."



लोअर कोर्ट के जवाब में उन्होंने कहा था क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है-अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज -व्यवस्था में आमूल परिवर्तन."समाज का प्रमुख अंग होते हुए भी आज मजदूरों को उनके प्राथमिक अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढी कमाई का सारा धन शोषक पूंजीपति हड़प जाते हैं.दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिए मोहताज हैं.दुनिया भर के बाजारों को कपड़ा मुहैय्या करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढंकने -भर को भी कपडा नहीं पा रहा है.सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर,लोहार तथा बढ़ई स्वंय गंदे बाड़ों में रह कर ही अपनी   जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं.इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूंजीपति जरा-जरा सी बातों के लिए लाखों का वार-न्यारा कर देते हैं.........स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठ कर रंगरेलियां मना रहा है शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल पड़े हैं."


आज भी जो शासन-व्यवस्था है वह भगत सिंह आदि क्रांतिकारियों के सपनों का स्वराज्य नहीं है.उनका कथन है-"क्रांतिकारियों का विशवास है कि देश को क्रान्ति से ही स्वतंत्रता मिलेगी.वे जिस क्रान्ति के लिए प्रयत्नशील हैं और जिस क्रान्ति का रूप उनके सामने स्पष्ट है उसका अर्थ केवल यह नहीं है कि विदेशी शासकों तथा उनके पिट्ठुओं से क्रांतिकारियों का सशस्त्र संघर्ष हो ,बल्कि इस सशस्त्र संघर्ष के साथ -साथ नवीन सामाजिक व्यवस्था के द्वार देश के लिए मुक्त हो जाएँ.क्रान्ति पूंजीवाद,वर्गवाद तथा कुछ लोगों को ही विशेषाधिकार दिलाने वाली ओरानाली का अंत कर देगी.यह राष्ट्र को अपने पैरों पर खड़ा करेगी,उससे नवीन राष्ट्र और नए समाज का जन्म होगा.क्रान्ति से सबसे बड़ी बात तो यह होगी कि वह मजदूर तथा किसानों का राज्य कायम कर उन सब सामजिक अवांछित तत्वों को समाप्त कर देगी जो देश की राजनीतिक शक्ति को हथियाए बैठे हैं."


आप खुद ही तुलना करें क्या हमें जो आजादी मिली है वह वैसी ही है जिसके लिए भगत सिंह ,बटुकेश्वर दत्त,अशफाक उल्ला खाँ,राम प्रसाद बिस्मिल ,चन्द्र शेखार आजाद आदि असंख्य क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया था.यदि नहीं तो उसे प्राप्त करने में आप क्या योगदान देंगें?

  ~विजय राजबली माथुर ©

Thursday, April 2, 2026

पाप और पुण्य का भुगतान इसी ईह लोक में है ------ अरविन्द राज स्वरूप


कानपुर 2 अप्रैल 2026 
पाप और पुण्य का भुगतान इसी ईह लोक में है।
कल रात में लखनऊ से कानपुर आया । एक दिन के लिए।आज सवेरे का हिंदुस्तान अखबार पढ़ा।पूरा पेज कानपुर वासियों की गैस की किल्लत से हो रही परेशानी से भरा हुआ है। 
सरकार सिर्फ बयान बाजी तक सीमित है। 
सारी रिस्पांसिबिलिटी इस दिक्कत की भारतीय जनता पार्टी की केंद्रीय सरकार की है। उसकी अमेरिकन चाटुकारिता की नीति ने भारत देश की पूरी जनता को परेशानी में डाल दिया है। यह उतनी ही बड़ी परेशानी है जितनी भारत देश को कोविड में भुगतनी पड़ी थी। तब तत्काल मौत का खतरा था और अब रोज-रोज रोटी बनाना मुश्किल हो गया। 
ईरान भारत का दोस्त था। ईरान से भारत को कोई खतरा नहीं था। फिर भी प्रधानमंत्री श्री मोदी इसराइल जाकर नस्ली सहांरक नेतन्याहू से गले मिलने लगे । 26 तारीख फ़रवरी को वहां से लौटे और 28 को इसराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया। इतना ही नहीं इसराइल को फादर लैंड भी प्रधानमंत्री घोषित कर आए।
अगर भारत सरकार स्पष्ट रूप से ईरान के साथ खड़ी होती तो हमको कोई दिक्कत ना होती ।जबकि ईरान हमारा पुराना दोस्त था ।भारत सरकार ने अमेरिका का चाटुकार  बनना स्वीकार किया और अमेरिका का राष्ट्रपति तो दुनिया का सबसे रद्दी  और बेकार राष्ट्रपति साबित हुआ।
मैं देख रहा हूं कि भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों में भी उनकी पार्टी में जो चल रहा है और जो देश में हो रहा है उसका प्रभाव है और वहां भी खलबली है। 
आरएसएस का प्रभाव तो भाषण भरों में सीमित है। उनको पता है कि उनका महत्व सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी सरकार की वजह से है। इसलिए उनकी तो बोलती ही बंद है।
उनके पदाधिकारी बड़े-बड़े खाली पीली शब्द बोलते हैं बस। 
सब लोगों को अपने किए का भुगतान होता है। पाप का पाप से। पुण्य का पुण्य से। 
एक पाप देश की जनता से अनजाने में हो गया और अब हम भुगत रहे हैं ।हम ही तो देश की जनता है ,और हमारे जैसे 140 करोड़ भारतीय। 
अब इससे छुटकारा पाना है ।जनतंत्र में वोट के द्वारा ही छुटकारा पाया जाता है, सो 2027 में उत्तर प्रदेश में और 2029 में पूरे भारतवर्ष से बीजेपी से  छुटकारा पाना है।
जो भी आएगा वह इससे तो अच्छा ही होगा।




  ~विजय राजबली माथुर ©

Monday, March 30, 2026

भारत की राजधानियों का ऐतिहासिक क्रम ------ डॉ. गिरीश कुमार वर्मा

 
भारत की राजधानियों का ऐतिहासिक क्रम
(एकरेखीय विकास यात्रा)
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✍🏻 डॉ. गिरीश कुमार वर्मा
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भारत  का  इतिहास अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और विविधतापूर्ण   है, जिसमें सत्ता के केंद्र —अर्थात् राजधानियाँ—समय-समय पर बदलती  रही  हैं। इन  परिवर्तनों  के  पीछे राजनीतिक, सामरिक, आर्थिक और प्रशासनिक कारण निहित थे। यदि हम इन राजधानियों को एकरेखीय क्रम में देखें, तो भारतीय इतिहास की एक स्पष्ट और सतत धारा हमारे सामने उभरती है।
प्राचीन भारत में पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) एक अत्यंत   महत्त्वपूर्ण   एवं प्रभावशाली राजधानी रही। इसे एक सुदृढ़ राजधानी के रूप में स्थापित करने में महापद्मनंद का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने सोलह महाजनपदों को अपने अधीन कर एक विशाल और सशक्त राज्य की आधारशिला रखी। बाद   में   मौर्य  और  गुप्त   जैसे   महान साम्राज्यों ने यहीं से शासन किया। चंद्रगुप्त मौर्य और सम्राट अशोक के काल में यह नगर अपनी चरम   उन्नति   पर पहुँचा। गंगा के किनारे स्थित होने   के   कारण   यह   व्यापार, प्रशासन और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बना रहा।
प्राचीन  भारत   में  जहाँ   पाटलिपुत्र जैसे   नगर व्यापक साम्राज्यों की राजधानी रहे, वहीं अनेक क्षेत्रीय   राजधानियाँ   भी अपने-अपने स्तर पर अत्यंत महत्त्वपूर्ण थीं। उदाहरणतः मथुरा शूरसेन जनपद   की   राजधानी   थी   और धार्मिक तथा सांस्कृतिक  दृष्टि  से  अत्यंत   समृद्ध  केंद्र  रहा, जबकि हस्तिनापुर  कुरु  राज्य  की राजधानी के रूप   में  विख्यात था। यद्यपि   ये  नगर  सम्पूर्ण  भारत  की   राजधानियाँ नहीं थे, तथापि इन्होंने प्राचीन भारतीय सभ्यता, राजनीति और संस्कृति के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मध्यकाल  में  दिल्ली सल्तनत के उदय के साथ सत्ता का  केंद्र   दिल्ली बना। हालांकि, मोहम्मद बिन   तुगलक   ने राजधानी को दक्षिण भारत के दौलताबाद (पूर्व नाम देवगिरि) स्थानांतरित करने का प्रयास किया था। इसका उद्देश्य साम्राज्य पर बेहतर  नियंत्रण   स्थापित  करना था, किंतु यह प्रयोग सफल नहीं हो सका और अंततः राजधानी पुनः दिल्ली लौटा दी गई।
मुगल काल में भी राजधानियों में परिवर्तन देखने को मिलता   है।   प्रारंभ में आगरा को राजधानी बनाया   गया,   जहाँ   से अकबर, जहाँगीर और शाहजहाँ   ने   शासन   किया।  इसके   पश्चात्   शाहजहाँ   ने दिल्ली में शाहजहाँनाबाद बसाकर उसे राजधानी   बनाया।   इस काल में इलाहाबाद  (प्रयाग)   भी   पूर्ण   राजधानी  न   होकर   एक महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक और सामरिक केंद्र के रूप में उभरा।
ब्रिटिश   काल   में    प्रारंभ   में कलकत्ता   (अब कोलकाता) को भारत की राजधानी बनाया गया, जो   व्यापार   और   प्रशासन    का प्रमुख   केंद्र    था। किन्तु 1911 में ब्रिटिश सरकार ने राजधानी को पुनः  दिल्ली  स्थानांतरित   कर  दिया, ताकि भारत  के  उत्तरी और मध्य भागों पर प्रशासनिक नियंत्रण और अधिक सुदृढ़ बनाया जा सके।
15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी दिल्ली को ही भारत की राजधानी बनाए रखा गया। आज   नई   दिल्ली भारत का राजनीतिक,  प्रशासनिक  और कूटनीतिक केंद्र है। यदि भारत की राजधानियों   का   एकरेखीय  क्रम निर्धारित किया जाए, तो वह इस प्रकार उभरता है—
पाटलिपुत्र → दिल्ली → दौलताबाद (अल्पकालिक) → दिल्ली →
आगरा → दिल्ली → कलकत्ता → दिल्ली (वर्तमान)
अंततः   कहा   जा‌  सकता   है   कि भारत  की राजधानियों   का ‌ यह   परिवर्तन   केवल   स्थान परिवर्तन   नहीं था, बल्कि  यह समय-समय पर बदलती  राजनीतिक   परिस्थितियों, प्रशासनिक आवश्यकताओं   और   साम्राज्य   विस्तार  की रणनीतियों का दर्पण भी था। यह क्रम भारतीय इतिहास   की   गतिशीलता,   निरंतरता   और विकासशीलता   को  स्पष्ट   रूप  से प्रतिबिंबित करता है।
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 ~विजय राजबली माथुर ©