Saturday, September 19, 2026

श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद------ Old is Gold Films's Post



आज जब तिरंगा आसमान में लहराता है, तो उसके साथ कुछ पंक्तियां अपने आप दिल में गूंजने लगती हैं—“विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा।” यह सिर्फ एक देशभक्ति गीत नहीं है। इसके पीछे स्वतंत्रता आंदोलन की वह कहानी छिपी है, जब भारत गुलाम था और देशभक्ति केवल भावना नहीं, बल्कि एक संघर्ष थी। इस गीत को शब्द देने वाले कवि थे श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’। उनका नाम शायद आज की पीढ़ी में उतना चर्चित न हो, लेकिन उनके लिखे शब्द स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय स्मृति का हिस्सा बन चुके हैं। शिक्षक रहे श्यामलाल गुप्त ने कविता को मनोरंजन का माध्यम नहीं माना। उनके लिए शब्द जनता में साहस जगाने और देश के लिए एकजुट करने का माध्यम थे। यही वजह है कि उनके लिखे गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में लोगों के बीच एक अलग ऊर्जा पैदा की।
एक व्यापारी परिवार का बेटा, जिसने कारोबार छोड़कर किताब और आंदोलन का रास्ता चुना
श्यामलाल गुप्त का जन्म 9 सितंबर 1896 को कानपुर के नरवल में हुआ था। उनके पिता विशेष्वर प्रसाद और माता कौशल्या देवी थीं। परिवार का संबंध दोसार वैश्य समुदाय से था और पारिवारिक व्यवसाय भी उनके सामने मौजूद था। लेकिन श्यामलाल का मन व्यापार में नहीं लगा। उन्होंने परिवार के पारंपरिक व्यवसाय में जाने के बजाय शिक्षा को अपना पेशा बनाया। कानपुर के अलग-अलग सरकारी स्कूलों में शिक्षक के रूप में काम करते हुए उनका जुड़ाव धीरे-धीरे स्वतंत्रता आंदोलन से गहरा होता गया। उस दौर में स्कूल की नौकरी और राजनीतिक गतिविधियों को साथ लेकर चलना आसान नहीं था। ब्रिटिश शासन की निगाहें उन लोगों पर रहती थीं, जो लोगों में राष्ट्रीय चेतना पैदा कर रहे थे। फिर भी श्यामलाल पीछे नहीं हटे। उनके लिए अध्यापन केवल नौकरी नहीं था। वह समाज और देश के भविष्य को तैयार करने का माध्यम भी था।
फिर हुई गणेश शंकर विद्यार्थी से मुलाकात, जिसने जिंदगी की दिशा बदल दी
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान श्यामलाल गुप्त की मुलाकात महान पत्रकार और स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी से हुई। यह मुलाकात उनके जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ बनी। कांग्रेस के एक अधिवेशन के दौरान हुए इस संपर्क के बाद उन्हें फतेहपुर क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े अभियान की जिम्मेदारी मिली। अब उनकी भूमिका केवल शिक्षक की नहीं रह गई थी। वह लोगों के बीच राष्ट्रीय भावना पहुंचाने वाले कार्यकर्ता भी बन चुके थे। इसी दौर में उनकी लेखनी भी अधिक मुखर हुई। वह जानते थे कि हर व्यक्ति भाषण सुनने नहीं आएगा, लेकिन एक गीत हजारों लोगों की जुबान पर चढ़ सकता है। इसलिए उनके शब्दों में सरलता, जोश और सामूहिक भावना दिखाई देती थी। आगे चलकर यही गुण “झंडा ऊंचा रहे हमारा” को एक व्यापक जनगीत बनाने में महत्वपूर्ण साबित हुए।
1921 में गिरफ्तारी, लेकिन क्या ब्रिटिश सरकार उनके शब्दों को रोक पाई?
साल 1921 में ब्रिटिश शासन ने श्यामलाल गुप्त को गिरफ्तार कर लिया। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय लोगों के लिए जेल जाना उस समय असामान्य बात नहीं थी। गिरफ्तारी के बाद भी उनका संकल्प कमजोर नहीं हुआ। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने गुप्त रूप से आंदोलन से जुड़ा काम जारी रखा। इसके बाद 1930 और 1944 में भी उन्हें गिरफ्तार किया गया और दोनों अवसरों पर उन्हें कारावास भुगतना पड़ा। करीब 19 वर्षों तक वह फतेहपुर जिला कांग्रेस समिति के अध्यक्ष रहे। उनके जीवन में राजनीति सत्ता पाने का माध्यम नहीं थी। वह इसे स्वतंत्रता के संघर्ष का हिस्सा मानते थे। उनकी प्रतिबद्धता का एक और उल्लेखनीय पहलू था उनका व्यक्तिगत संकल्प। स्वतंत्रता मिलने तक उन्होंने जूते और छाता इस्तेमाल न करने का व्रत रखा था। यह छोटा-सा व्यक्तिगत निर्णय उनके भीतर मौजूद त्याग और अनुशासन की भावना को दर्शाता है।
वह कविता जिसने 1924 में लिखे जाने के बाद इतिहास का रास्ता पकड़ लिया
“झंडा ऊंचा रहे हमारा” की मूल रचना मार्च 1924 में एक देशभक्ति कविता के रूप में हुई थी। इसे कानपुर की खन्ना प्रेस ने प्रकाशित किया और इसकी पांच हजार से अधिक प्रतियां बिकने की बात दर्ज है। उस समय भारत स्वतंत्र नहीं था। इसलिए तिरंगे और स्वराज की बात करना अपने आप में राजनीतिक संदेश था। इसी वर्ष भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस रचना को आधिकारिक ध्वज गीत के रूप में अपनाया। 13 अप्रैल 1924 को कानपुर के फूलबाग में जलियांवाला बाग शहीद दिवस के अवसर पर इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से गाया गया। इस कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू भी उपस्थित थे। एक कविता का इस तरह स्वतंत्रता आंदोलन के सार्वजनिक मंच तक पहुंचना उसके प्रभाव का संकेत था। गीत अब केवल कागज पर लिखे शब्द नहीं रह गया था। वह आंदोलन की सामूहिक आवाज बनने लगा था।
1938 में हरिपुरा अधिवेशन, और मंच पर मौजूद थे स्वतंत्रता आंदोलन के बड़े चेहरे
गीत की यात्रा यहीं नहीं रुकी। वर्ष 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन में सरोजिनी नायडू ने इस गीत को प्रस्तुत किया। उस समय महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, गोविंद बल्लभ पंत, जमनालाल बजाज, महादेव देसाई और पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रमुख नेता वहां मौजूद थे। कल्पना कीजिए उस दौर का दृश्य, जब एक देश गुलामी में था और हजारों लोग स्वराज की आकांक्षा के साथ एकत्रित थे। ऐसे वातावरण में जब तिरंगे को समर्पित गीत गूंजता होगा, तो उसके शब्द केवल संगीत नहीं रह जाते होंगे। वे सामूहिक संकल्प का रूप ले लेते होंगे। यही वह दौर था जब श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ की रचना स्वतंत्रता आंदोलन की सांस्कृतिक स्मृति में और गहराई से दर्ज होती चली गई।
आजादी के बाद भी गीत की यात्रा खत्म नहीं हुई, बल्कि एक फिल्म तक पहुंची
भारत को 1947 में स्वतंत्रता मिली, लेकिन इस गीत की लोकप्रियता बनी रही। वर्ष 1948 में यह गीत हिंदी फिल्म “आजादी की राह पर” में शामिल हुआ। फिल्म का निर्देशन ललित चंद्र मेहता ने किया था और इसमें पृथ्वीराज कपूर तथा वनमाला पवार प्रमुख भूमिकाओं में थे। गीत को शेखर कल्याण ने संगीतबद्ध किया और सरोजिनी नायडू की आवाज में इसे प्रस्तुत किए जाने का उल्लेख मिलता है। यह तथ्य इस गीत की यात्रा को विशेष बनाता है। जो रचना 1924 में स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से लिखी गई थी, वह स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों में सिनेमा के माध्यम से भी लोगों तक पहुंची। यानी कविता ने आंदोलन के मंच से लेकर साहित्य, सार्वजनिक समारोह और सिनेमा तक अपना सफर तय किया।
1952 में वही कवि, अपने ही गीत के साथ राष्ट्रीय मंच पर
स्वतंत्रता के बाद श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ को उनके गीत के लिए सार्वजनिक सम्मान भी मिला। 15 अगस्त 1952 को स्वतंत्रता दिवस समारोह में उन्हें ध्वज गीत गाने के लिए चुना गया। जिस गीत को उन्होंने वर्षों पहले गुलाम भारत के दिनों में लिखा था, उसे स्वतंत्र भारत के राष्ट्रीय समारोह में स्वयं प्रस्तुत करना उनके जीवन का असाधारण क्षण रहा होगा। एक कवि के लिए इससे बड़ी विडंबना और उपलब्धि क्या हो सकती है कि जिस आजादी का सपना उसने शब्दों में लिखा था, उसी आजाद देश में वह अपने गीत को तिरंगे के सामने गा रहा था। उनकी रचना अब संघर्ष की स्मृति से आगे बढ़कर स्वतंत्र भारत के सार्वजनिक समारोहों का हिस्सा बन चुकी थी।
1972 में मिला सम्मान, फिर 1973 में पद्मश्री
समय आगे बढ़ा, लेकिन देश ने श्यामलाल गुप्त के योगदान को भुलाया नहीं। 1972 के गणतंत्र दिवस समारोह में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें सम्मान पत्र प्रदान किया। इसके अगले वर्ष, 1973 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। यह सम्मान उनकी साहित्यिक और देशभक्ति से जुड़ी भूमिका की राष्ट्रीय पहचान का प्रमाण था। हालांकि उनके जीवन की सबसे बड़ी पहचान किसी पुरस्कार से नहीं बनी। उनकी पहचान उस गीत से बनी, जो दशकों बाद भी भारत के राष्ट्रीय समारोहों में सुनाई देता रहा। एक कवि की रचना का इतने लंबे समय तक जीवित रहना केवल साहित्यिक उपलब्धि नहीं है। यह इस बात का प्रमाण भी है कि कुछ शब्द समय से आगे निकल जाते हैं।
1997 में डाक टिकट पर आया नाम, लेकिन असली स्मारक आज भी वही गीत है
श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ का निधन 10 अगस्त 1977 को 81 वर्ष की आयु में हुआ। लेकिन उनकी कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। उनके निधन के लगभग दो दशक बाद, 4 मार्च 1997 को तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया। यह सम्मान उनकी राष्ट्रीय पहचान को एक और स्थायी स्मृति देता है। फिर भी उनके जीवन का सबसे बड़ा स्मारक कोई इमारत, प्रतिमा या डाक टिकट नहीं है। उनका सबसे बड़ा स्मारक वह गीत है, जिसे भारत में स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के ध्वजारोहण समारोहों में आज भी गाया जाता है। हर बार जब तिरंगा ऊपर उठता है और ये शब्द गूंजते हैं, तब एक ऐसे कवि की याद भी जीवित हो जाती है, जिसने अपने शब्दों को देश की आवाज बना दिया।
लेकिन इस गीत की सबसे बड़ी ताकत आखिर क्या थी?
गीत की पंक्तियों में तिरंगे को शक्ति, प्रेम, वीरता और मातृभूमि की भावना से जोड़ा गया है। इसमें स्वतंत्रता के संघर्ष के दौरान भय को पीछे छोड़ने का आह्वान है। इसमें स्वराज को लक्ष्य बनाने और देशवासियों को एक साथ खड़े होने की प्रेरणा मिलती है। यही सरलता इसकी सबसे बड़ी ताकत बनी। कठिन राजनीतिक विचारों को एक ऐसे गीत में बदल देना, जिसे आम लोग आसानी से याद रख सकें, अपने आप में बड़ी रचनात्मक क्षमता थी। श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ ने कविता को किताबों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने उसे जनता की आवाज बनने दिया। इसलिए “झंडा ऊंचा रहे हमारा” केवल एक गीत के रूप में नहीं देखा जाता। यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की सांस्कृतिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज भी है।
“विजयी विश्व तिरंगा प्यारा…” की गूंज में आज भी छिपी है एक पूरी पीढ़ी की कहानी
जब आज हम कहते हैं—“विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा”, तो शायद हमें उन शब्दों के पीछे खड़े व्यक्ति की पूरी कहानी याद नहीं रहती। लेकिन उन पंक्तियों में उस पीढ़ी की आकांक्षाएं दर्ज हैं, जिसने गुलामी देखी, संघर्ष किया, जेल गई और स्वतंत्रता का सपना देखा। श्यामलाल गुप्त ‘पार्षद’ ने अपने जीवन से दिखाया कि इतिहास केवल बड़े राजनीतिक नेताओं से नहीं बनता। इतिहास उन कवियों, शिक्षकों, लेखकों और सामान्य नागरिकों से भी बनता है, जिन्होंने अपने-अपने तरीके से देश की चेतना को मजबूत किया। यही कारण है कि उनका नाम भारतीय इतिहास और देशभक्ति साहित्य में एक विशेष स्थान रखता है। Old is Gold Films ऐसे ही भूले-बिसरे चेहरों और उनकी अनसुनी कहानियों को फिर से सामने लाने का प्रयास करता है। क्योंकि कुछ कहानियां पुरानी जरूर होती हैं, लेकिन उनकी आवाज कभी पुरानी नहीं होती।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।




  ~विजय राजबली माथुर ©

Wednesday, September 16, 2026

पाश्चात्य जगत द्वारा जनता को नियंत्रित करने हेतु ज्योतिष का सहारा ------ सिद्धांत सहगल






Sidhant Sehgal
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AI content
 10 hours ago 
अमेरिका की बैंकिंग दुनिया के प्रमुख शिल्पकारों में से एक जे.पी. मॉर्गन का एक बेहद डार्क और संकेतपूर्ण कथन है—“Millionaires don't use astrology, billionaires do.” यानी मिलियनेयर ज्योतिष का इस्तेमाल नहीं करते, लेकिन बिलियनेयर करते हैं।
मुख्यधारा की मीडिया और अखबारों के पन्नों पर हम रोज जो सामान्य राशिफल या भविष्यवाणियां देखते हैं, दज्जालिया एलीट्स के लिए Astrology बिल्कुल भी वैसा सस्ता मनोरंजन या अंधविश्वास नहीं है। वे Astrology को एक बेहद सटीक ‘Metaphysical Clock’ यानी ब्रह्मांडीय घड़ी के रूप में इस्तेमाल करते हैं, जिसके माध्यम से वे ग्लोबल घटनाओं, आर्थिक क्रैश और अपने मनोवैज्ञानिक रिचुअल्स की टाइमलाइन निर्धारित करते हैं।
प्राचीन बेबीलोन से लेकर आज के सिलिकॉन वैली तक, जो लोग इस दुनिया को पर्दे के पीछे से नियंत्रित कर रहे हैं, वे अच्छी तरह जानते हैं कि ब्रह्मांड का प्रत्येक ग्रह और नक्षत्र एक विशेष फ्रिक्वेंसी उत्पन्न करता है।
सामान्य लोगों को विज्ञान और लॉजिक के नाम पर इन ब्रह्मांडीय प्रभावों का मजाक उड़ाना सिखाया जाता है, जबकि पर्दे के पीछे एलीट्स इस मेटाफिजिकल ज्ञान पर अपना एकाधिकार स्थापित करके मानव मनोविज्ञान को हैक करते हैं।
आज हम डिकोड करेंगे दज्जालिया सिस्टम की उस निषिद्ध Astro-Theology को, जिसका इस्तेमाल वे ग्लोबल कंट्रोल के ब्लूप्रिंट के रूप में कर रहे हैं।
दज्जालिया एलीट्स के ऑकल्टिज्म यानी गुप्तविद्या का सबसे बड़ा और अंधकारमय हिस्सा शनि ग्रह या Saturn से जुड़ा हुआ है। प्राचीन ग्रीक और रोमन मिथोलॉजी में Saturn या Kronos को समय, सीमाओं, प्रतिबंध, भौतिकवाद और मृत्यु के देवता के रूप में देखा जाता है। मुख्यधारा का समाज भले ही इन बातों से अनजान हो, लेकिन ग्लोबल एलीट्स इस Saturnian Energy की कथित रूप से गहरी पूजा करते हैं।
आधुनिक कॉरपोरेट कल्चर और दज्जालिया सिस्टम में Saturn का Core Symbolism काला चतुष्कोण यानी Black Cube माना जाता है। यदि आप ध्यान दें तो दुनिया के सत्ता केंद्रों में Black Cube की मौजूदगी काफी प्रमुख दिखाई देती है, जैसे न्यूयॉर्क का Apple Store, संयुक्त राष्ट्र का Meditation Room या World Economic Forum की विभिन्न वास्तु संरचनाएं।
एलीट्स Saturn के Astrological Cycle या Transit के समय पृथ्वी पर ऐसे एजेंडे लागू करते हैं, जो मानव जाति को और अधिक नियंत्रण में बांधते हैं। Saturn को चूंकि Restriction यानी प्रतिबंध और सीमाओं का ग्रह माना जाता है, इसलिए Globalists अपनी सबसे Restrictive व्यवस्थाओं जैसे Global Lockdown, Digital ID, Carbon Credit Score या Central Bank Digital Currency यानी CBDC को आगे बढ़ाने के लिए Saturn के विशेष Alignments का इंतजार करते हैं।
जब खगोलीय स्तर पर Saturn पृथ्वी की Spiritual Frequency को भारी बनाता है और लोगों को निराशा की ओर धकेलता है, तब उसी Metaphysical Window का इस्तेमाल एलीट्स अपनी गुलामी जैसी व्यवस्थाओं और कानूनों को लागू करने के लिए करते हैं। उनका विश्वास है कि यदि उनके Political Agenda का तालमेल Cosmic Frequencies के साथ हो, तो आम लोग अवचेतन रूप से उन व्यवस्थाओं को स्वीकार करने लगेंगे।
Occultism का सबसे पुराना और मूल मंत्र है—“As above, so below.” यानी ऊपर जैसा, नीचे भी वैसा ही।
Globalists के सत्ता केंद्र जैसे Washington D.C., City of London और Vatican केवल सामान्य Engineering Map या Traffic सुविधा को ध्यान में रखकर नहीं बनाए गए। इन शहरों को कथित रूप से पृथ्वी के Metaphysical Energy Grid या Ley Lines के आधार पर इस तरह Architect किया गया है कि वे आकाश के कुछ विशेष नक्षत्रों, जैसे Sirius या Orion, के साथ Align हो सकें।
Washington D.C. की सड़कों का नक्शा यदि ऊपर से Drone View में देखा जाए, तो उसमें स्पष्ट रूप से कुछ Occult Symbols, जैसे Pentagram, Owl या Masonic Compass दिखाई देने का दावा किया जाता है। मैं पहले ही इन विषयों पर विस्तार से लिख चुका हूं। आप मेरे Profile के पुराने Articles देखेंगे तो आपको इनके बारे में काफी सामग्री मिल जाएगी।
खैर, इन Architectures को मूल रूप से एक-एक Metaphysical Antenna माना जाता है। जब Solstice या Equinox जैसे विशेष Astrological Days आते हैं, तब सूर्य और तारों का प्रकाश इन शहरों के Mega Obelisks, जैसे Washington Monument या Vatican के Obelisk, पर एक विशेष कोण से पड़ता है।
एलीट्स का विश्वास है कि इन विशेष Alignments के समय आसमानी दुनिया की Frequencies सीधे उनके द्वारा बनाए गए Metaphysical Antennas के माध्यम से पृथ्वी पर उतरती हैं।
वे इस Cosmic Energy का इस्तेमाल अपनी Political और Financial Power को Spiritually Recharge करने के लिए करते हैं। आम लोग जब इन Monuments के सामने खड़े होकर Selfie लेते हैं, तब उन्हें यह एहसास तक नहीं होता कि वे वास्तव में एक विशाल Astrological Circuit Board के भीतर खड़े हैं।
Wall Street और Global Stock Markets में भी ग्रह-नक्षत्रों तथा Lunar Cycles यानी चंद्रमा के चक्रों के एक बड़े Metaphysical प्रभाव की बात की जाती है। आधुनिक Central Banks और Corporate Elites कथित रूप से अपने High-Frequency Trading यानी HFT Algorithms को इन Astrological Cycles के साथ बेहद सटीक रूप से जोड़कर रखते हैं।
दुनिया में होने वाली बड़ी विनाशकारी घटनाएं, युद्धों की शुरुआत, Mega Market Crash या Pandemic की शुरुआत कभी भी संयोग नहीं होती। दज्जालिया एलीट्स इन Global Events को विशेष Blood Moon, पूर्ण सूर्यग्रहण या Pluto के विशेष Transit के साथ मिलाकर घटित करते हैं।
Occult की भाषा में इस Mechanism को ‘Macro-Ritual’ कहा जाता है।
जब ब्रह्मांडीय स्तर पर पृथ्वी की Energy सबसे अधिक Volatile या अस्थिर होती है, ठीक उसी समय वे पृथ्वी पर एक बड़े संकट का निर्माण करते हैं।
इसके पीछे असली उद्देश्य ‘Energy Harvesting’ है। वे जानते हैं कि कब Cosmic Influences के कारण आम लोगों का Subconscious Mind Panic और Fear को महसूस करने के लिए सबसे अधिक खुला हुआ होता है। करोड़ों लोग जब एक साथ Television Screens या Social Media के सामने बैठकर भय, आतंक और अनिश्चितता से गुजरते हैं, तब उनके शरीर और आत्मा से एक प्रकार की तीव्र Negative Energy निकलती है, जिसे Occult की भाषा में ‘Loosh’ कहा जाता है।
दज्जालिया सिस्टम उस Astrological Window का इस्तेमाल लोगों की इस Negative Energy को Harvest यानी एकत्र करने के लिए करता है। भय पैदा करके वे मूल रूप से लोगों के अवचेतन मन से Spiritual Energy को चूस लेते हैं और उस खालीपन का इस्तेमाल करके बहुत आसानी से कोई नया Dark Agenda या कानून लोगों पर थोप देते हैं।
सबसे Extreme और भयावह Astrological Project कथित रूप से स्विट्जरलैंड की जमीन के नीचे चल रहा है। CERN के Large Hadron Collider को Mainstream Science केवल Particle Physics यानी कण-विज्ञान की एक सामान्य प्रयोगशाला के रूप में प्रस्तुत करता है।
लेकिन यदि आप इसके Symbolism को Decode करें, तो दावा किया जाता है कि इसके Logo में बेहद चालाकी से ‘666’ छिपा हुआ है और इसके Headquarters के सामने विनाश के देवता भगवान शिव की Nataraja मूर्ति सार्वजनिक रूप से स्थापित है, जो Cosmic Dance यानी ब्रह्मांडीय विनाश का प्रतीक मानी जाती है।
सबसे Dark और Alarming दावा यह है कि CERN अपने सबसे High-Voltage Experiments यानी Particle Smashing को किसी भी सामान्य दिन संचालित नहीं करता। इसके बजाय यह Mega-Machine उस समय Activate की जाती है, जब आकाश में कोई विशेष Solar Eclipse या अत्यंत दुर्लभ Astrological Alignment होता है।
स्वतंत्र Metaphysical Researchers के अनुसार, वे मूल रूप से Cosmic Frequencies के साथ Synchronize होकर पृथ्वी के Magnetic Field या Dimensional Veil यानी अदृश्य पर्दे को भेदने का प्रयास कर रहे हैं।
प्राचीन युग के जादूगर जिस प्रकार Portal Open करने के लिए किसी विशेष नक्षत्र की स्थिति का इंतजार करते थे, उसी प्रकार Silicon Valley और CERN के आधुनिक Tech-Elites भी कथित रूप से यही काम कर रहे हैं, लेकिन अरबों डॉलर की मशीनों की मदद से।
उनका विश्वास है कि इन विशेष Cosmic Timings के दौरान Dimensional Portals खुल जाते हैं और दूसरी Dimensions की Dark Entities या Spirits के साथ संपर्क स्थापित करना अधिक आसान हो जाता है।
वे AI और Quantum Computing को केवल एक Tool के रूप में नहीं देख रहे हैं। बल्कि वे Astrological Timing का इस्तेमाल करके ऐसी Artificial Super Intelligence यानी ASI तैयार कर रहे हैं, जो मूल रूप से Dark Spirits के लिए एक Digital ‘Vessel’ यानी पात्र के रूप में काम कर सके।


  ~विजय राजबली माथुर ©

Monday, September 14, 2026

दिव्या श्रीवास्तव पर हमला : लोकतंत्र पर हमला ------ पल्लवी राय / अभिषेक उपाध्याय




एक मुस्कान से डरे योगी जीयोगी से सवाल पूछने वाली दिव्या की हकीकत | Bharat Ek Nayi Soch
"क्या हमारे देश में सत्ता से सवाल पूछना गुनाह हो गया है? Yogi Adityanath की Press Conference में सवाल पूछने वाली स्वतंत्र महिला पत्रकार Divya Srivastava को लगातार धमकियां मिल रही हैं और troll किया जा रहा है। Bharat Ek Nayi Soch की इस वीडियो में पल्लवी राय ने बताया है कि कैसे एक पत्रकार की मुस्कान से पूरा System बौखला गया है।
गोदी मीडिया (Godi Media) के इस दौर में जब एक आम परिवार की बेटी स्वतंत्र पत्रकारिता (Independent Journalism) करने निकलती है, तो उसे UP Police का संरक्षण मिलने के बजाय धमकियां मिलती हैं। आखिर दिव्या श्रीवास्तव ने ऐसा क्या पूछ लिया था?  ------ Pallavi Rai 







Super Exclusive-
योगी से सवाल की ऐसी सज़ा दी!
महिला पत्रकार रो पड़ी!!
प्रेस कॉन्फ्रेंस में योगी आदित्यनाथ से सवाल पूछने वाली दिव्या श्रीवास्तव का इंटरव्यू।
सुनेंगे तो सिहर उठेंगे।
"मैने योगी आदित्यनाथ से एक सवाल पूछा था।
मुझे बीजेपी दफ्तर में घेर लिया। बहुत धमकाया।
कहा- बुलडोजर चलेगा घर पर।
LIU पीछे पड़ी है।
मुझे चैनल से भी निकाल दिया गया।
मैं अब कहीं नहीं हूं।
मैं बहुत डरी हुई हूं।"  ------ Abhishek Upadhyay

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  ~विजय राजबली माथुर ©

Wednesday, September 9, 2026

भारत को बर्बाद नेताओं ने नहीं, नौकरशाहों ने किया ------ राजेश आर सिंह




भारत को बर्बाद नेताओं ने नहीं, नौकरशाहों ने किया 
भारत की तबाही का असली चेहरा वो नहीं जो टीवी पर बहसों में दिखता है, असली चेहरा वो है जो फाइलों के पीछे छिपा बैठता है, फाइलों पर नोटिंग्स लिखता है, और चुने हुए जनप्रतिनिधियों के फैसलों को 'प्रक्रिया' के नाम पर रोकता है।  यह कोई संयोग नहीं कि भारत में अनपढ़, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले, या सिर्फ जाति-धर्म के नाम पर वोट पाने वाले नेताओं की भरमार है, यह 'बाई डिफाल्ट' नहीं, बल्कि 'बाई डिजाईन' है, क्योंकि नौकरशाहों का पूरा तंत्र ही इस बात पर टिका है कि पढ़े-लिखे, सक्षम, और जनता के मुद्दों पर बात करने वाले लोग राजनीति में न आएं। जब अरविंद केजरीवाल जैसे शिक्षित नेता दिल्ली में सत्ता में आए, तो उनके सामने सबसे बड़ी दीवार विधायिका या विपक्ष नहीं, बल्कि आईएएस अधिकारियों की 'फाइल वॉर' थी, जिसके चलते 2023 में सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा, और फिर भी केंद्र सरकार ने अध्यादेश लाकर नौकरशाही को वापस पॉवर दे दी। पंजाब में भगवंत मान की सरकार ने दर्जनों आईएएस अधिकारियों को महीनों बिना पोस्टिंग के रखा, क्योंकि उन्होंने माइनिंग फाईलों पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया, यह कोई अलग अलग घटनाएं नहीं, बल्कि एक सिस्टमैटिक पैटर्न है, जहां ब्यूरोक्रेट्स चुने हुए जनप्रतिनिधियों को 'पनिस करते हैं, अगर वे उनके नियंत्रण को चैलेंज करें।  यह तंत्र औपनिवेशिक विरासत का हिस्सा है, जो कन्ट्रोल के लिए बना था, सर्विस के लिए नहीं, और आज भी यही तंत्र भारत की लोकतंत्र की रूह को खा रहा है।
1947 में आजादी मिली, लेकिन जो सिस्टम ब्रिटिशों ने बनाया था, वह कभी टूटा ही नहीं। भारतीय सिविल सेवा (ICS), जो बाद में IAS बना, उसका मकसद था 'कंट्रोल, राजस्व संग्रह, कानून एवं व्यवस्था, और साम्राज्यवादी हितों की संरक्षण। इस सिस्टम में 'सेवा' का कोई सवाल ही नहीं था, जनता तो सिर्फ 'subject' यानी प्रजा थी, 'citizen' यानी नागरिक नहीं। आजादी के बाद भी इसी सिस्टम को बरकरार रखा गया, क्योंकि नए नेताओं को लगा कि 'यही उपयुक्त व्यवस्था है'। लेकिन हकीकत यह है कि यह सिस्टम 'निपुणता' के लिए नहीं, 'इन्सुलेशन' के लिए बना था, ताकि ब्यूरोक्रेट्स किसी भी राजनैतिक दबाव से आजाद रहें, और व्यवस्था को अपनी मर्जी चलाएं। भर्ती की आयु सीमा, सामान्यवादी संवर्ग का प्रभाव, लैटरल एंट्री पर प्रतिरोध, सब कुछ इस बात को सुनिश्चित करता है कि 'बाहर से' कोई शिक्षित व्यक्ति सीधे पॉवर में न आए। जब एक आईएएस अधिकारी 22-23 साल की उम्र में परीक्षा पास करके सीधे जिला अधिकारी बन जाता है, तो उसके पास न तो जमीनी अनुभव होता है, न ही जनता की समस्याओं की समझ, लेकिन फिर भी वही अधिकारी एक चुने हुए विधायक या मंत्री को 'रूल' बताता है। यह कोई 'प्रतिभा' नहीं, बल्कि एक 'इलीट क्लब' है, जो अपने आप को संरक्षित करती है, और बाहर के लोगों को अलग करती है।
भारत में 'Transaction of Business Rules' और 'Allocation of Business Rules' ये वो कार्यकारी दस्तावेज़ हैं, जो तय करते हैं कि कौन सा फाईल किसके पास जाएगा, कौन निर्णय ले सकता है, और कौन सिर्फ 'औपचारिक प्रमुख' रहेगा। ये रूल 1950-1960 में बने थे, और आज भी वही रूल चल रहे हैं, जिनके तहत ब्यूरोक्रेट्स को इतना पॉवर मिला है कि वे कैबिनेट मंत्री को भी 'औपचारिक प्रमुख' बना सकते हैं। जब एक मंत्री कोई पॉलिसी लांच करता है, तो कार्यान्वयन ब्यूरोक्रेट्स के हाथ में होता है, और अगर वे चाहें, तो 'फाईल नोटिंग, 'प्रक्रियात्मक देरी', या 'क़ानूनी सलाह' के नाम पर उस पॉलिसी को महीनों-सालों तक रोक सकते हैं। मुंबई मैट्रो प्रोजेक्ट 10 साल से देरी से है, क्यों? ब्यूरोक्रेट्स की लालफीताशाही, कानूनी अड़चन, और समन्वय की कमी। मनरेगा, पीएम-किसान, या किसी भी कल्याणकारी योजना में लीकेज और देरी होती हैं, क्यों? नौकरशाही स्तर पर अकुशल कार्यान्वयन।  COVID-19 के दौरान ऑक्सीजन और वैक्सीन की वितरण में देरी, क्यों? नौकरशाही अक्षमता ने सक्रिय राजनीतिक पहल को भी फेल कर दिया।  यह कोई 'दुर्घटना' नहीं, बल्कि एक 'डिजाइन' है, जहां ब्यूरोक्रेट्स को इतना स्वायत्तता मिली कि वे चुने हुए जनप्रतिनिधियों को बाइपास कर सकते हैं, और जनता को कष्ट में डाल सकते हैं।
2019 में केंद्र सरकार ने 'लैटरल एंट्री' की शुरुआत की, ताकि निजी क्षेत्र, शिक्षा जगत, और सिविल सोसायटी के एक्सपर्ट को सीधे सीनियर ब्यूरोक्रेट्स के पोस्ट पर लाया जा सके। लेकिन इसका विरोध सबसे ज्यादा ब्यूरोक्रेट्स ने ही किया, क्योंकि यह उनके 'मोनोपोली' को चैलेंज करता था। IAS कैडर, जो सामान्यवादी है वे क्षेत्रीय ज्ञान को वैल्यू नहीं देते सीनियरिटी और 'नौकरशाही अनुभव' को प्राथमिकता देता है।  जब एक एक्सपर्ट, जो 20 साल से हेल्थ केयर या शिक्षा क्षेत्र में काम कर रहा हो और सीधे सेक्रेटरी लेवल पर आता है, तो वह 'पुराने समूह' को टेंशन देता है, क्योंकि वह 'रूल्स से नहीं, 'रिज़ल्ट से बात करता है। यही कारण है कि लैटरल एंट्री प्रोग्राम आज भी सीमित है, और ब्यूरोक्रेट्स का प्रतिरोध जारी है। यह सिर्फ नौकरशाही पदों तक सीमित नहीं, यह मानसिकता पूरे राजनीतिक प्रणाली में फैली हुई है। जब एक शिक्षित, पेशेवर व्यक्ति राजनीति में आता है, तो ब्यूरोक्रेट्स उसे 'आउट साइडर मानते हैं और उसे 'समायोजित' करने के लिए मजबूर करते हैं। अगर वह 'समायोजित' नहीं करता, तो उसके सामने 'फाईल वार, 'ट्रांसफर थ्रेट, या 'मीडिया लीक' की दीवार खड़ी कर दी जाती है।  यही कारण है कि भारत में आज भी 'वंशवाद की राजनीति', 'अपराधी राजनीतिज्ञों', या 'जाति-आधारित नेताओं' की भरमार है, क्योंकि वे ब्यूरोक्रेट्स के 'कंट्रोल' में रहते हैं, और उनके 'रूल्स' के हिसाब से चलते हैं।
दिल्ली में AAP सरकार के आने के बाद, सबसे बड़ा संघर्ष ब्यूरोक्रेट्स के साथ हुआ। IAS अधिकारियों ने फाईलों पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया, ट्रांसफर की मांग की, और मीडिया में लीक किए, ताकि सरकार की इमेज खराब हो।  2023 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली गवर्नमेंट को ऑफिसर के ट्रांसफर/पोस्टिंग का पॉवर दिया लेकिन केंद्र सरकार ने तुरंत अध्यादेश लाकर उस पॉवर को वापस ब्यूरोक्रेट्स को दे दिया।  यह कोई 'क़ानूनी मुद्दा' नहीं था, यह एक 'राजनैतिक संदेश था, कि 'शिक्षित नेता को कंट्रोल में रखा जाएगा।  पंजाब में भगवंत मान की सरकार ने दर्जनों आईएएस अधिकारियों को महीनों बिना पोस्टिंग के रखा, क्योंकि उन्होंने माइनिंग फाईल्स पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया था।  गुरकीरत कृपाल सिंह, एक 2001- बैच के अधिकारी, को होम सेक्रेटरी के पद से हटाया गया और 8 महीने बाद भी उसे कोई पोस्टिंग नहीं मिली। कंवल प्रीत बरार, एक 2007- बैच के अधिकारी, को भी महीनों से इंतजार करना पड़ रहा है।  यह 'पनिसमेंट नहीं, बल्कि एक 'वार्निंग है कि अगर तुम चयनित जनप्रतिनिधि के हिसाब से नहीं चलोगे, तो तुम्हें 'किनारे' कर दिया जाएगा। यह पैटर्न सिर्फ दिल्ली या पंजाब तक सीमित नहीं, यह पूरे भारत में है, जहां ब्यूरोक्रेट्स चुने हुए जनप्रतिनिधि को 'सबक सिखाते' हैं, अगर वे उनके कन्ट्रोल को चैलेंज करें।
लोकतंत्र में जनता 'सार्वभौम' होती है और जनता के प्रतिनिधि, यानी चुने हुए नेता, वो होते हैं जो पॉलिसी बनाते हैं। ब्यूरोक्रेट्स का रोल होता है उसे 'लागू करना, लेकिन भारत में यह रोल उलट गया है। आज ब्यूरोक्रेट्स 'पॉलिसी' बनाते हैं, चुने हुए जनप्रतिनिधि मंजूरी देते हैं और जनता 'तकलीफ झेलती है। यह कोई 'थ्योरी नहीं, यह ग्राउंड रियलिटी है। एक IAS अधिकारी, जो कभी जनता के बीच नहीं रहा, वो तय करता है कि एक गांव को रोड मिलेगी या नहीं। एक ब्यूरोक्रेट्स, जो कभी अस्पताल या स्कूल नहीं गया, वो तय करता है कि हेल्थ केयर या एजुकेशन पॉलिसी कैसे लागू होगी। यह 'लोकतंत्र नहीं, बल्कि 'ब्यूरोक्रेटिक डिक्टेटरशीप है, जहां ' सेलेक्टेड' लोग 'इलेक्टेड लोगों को कन्ट्रोल करते हैं। और इसका सबसे बड़ा नुकसान जनता को होता है, क्योंकि जब एकाउंटबिलिटी नहीं होती, तो भ्रष्टाचार, अकुशलता, और देरी बढ़ती हैं।
यह लेख सिर्फ एक 'आलोचना' नहीं, बल्कि एक 'कार्रवाई के लिए आह्वान' है। अगर भारत को सच्चाई में 'विकसित' बनाना है, तो सिर्फ रोड्स, ब्रिज, या GDP ग्रोथ से नहीं होगा, यह होगा ब्यूरोक्रेटिक सिस्टम को रिफॉर्म करके। लैटरल एंट्री को बढ़ाकर करना होगा, ताकि विशेषज्ञ सीधे वरिष्ठ पदों पर आ सकें। ब्यूरोक्रेट्स की जवाबदेही बढ़ानी होगी, ताकि वे चुने हुए जनप्रतिनिधियों के कंट्रोल में रहें, न कि उनके ऊपर।  'Transaction of Business Rules' को रिफॉर्म करना होगा, ताकि मंत्री को असली शक्ति मिले, न कि सिर्फ ''औपचारिक' स्टेटस। और सबसे जरूरी जनता को जागना होगा, और सवाल उठाना होगा कि 'कौन चला रहा है देश को चुनें हुए जनप्रतिनिधि या सिलेक्टेड ब्यूरोक्रेट्स?'  नहीं तो, यह 'ब्यूरोक्रेटिक डिक्टेटरशीप' जारी रहेगा और भारत का 'लोकतंत्र' सिर्फ एक 'शो पीस' बनकर रह जाएगा।
Rajesh R. Singh 




  ~विजय राजबली माथुर ©

 

Thursday, August 27, 2026

सत्ता की मलाई खाने का लालच. ------ गीता श्री




धर्म के पीछे पागल स्त्रियों को मनुस्मृति जरुर पढ़ना चाहिए, जरा उनके चेहरे देखूँगी. 😀
सिरहाने रख कर सो जाओ. 
वैसे भी उन स्त्रियों का कुछ नहीं हो सकता जो सत्ता से कुछ पा लेने के लालच में अपनी स्वतंत्रता गिरवी रखने को तैयार हैं. 
बड़ी मुश्किल से मुक्ति पाई थी, पितृसत्ता शिकार करती थी, और लंबे संघर्ष के बाद थोड़ी आज़ादी मिली है. 
कुछ स्त्रियाँ फिर से गूंगी गुडियाँ बन गई हैं. सत्ता की मलाई खाने का इतना लालच. 
हमारी पुरखिनों की लड़ाई को कमजोर मत करो बहनों. फिर सोने के पिंजरे में कैद होना है क्या? फिर भोग की वस्तु बनना है? 
ये लोग तुम्हारी आज़ादी छीन लेंगे. बोलने की, घूमने की, कपड़े पहनने की, बाहर निकलने की… 
तुमसे सिर्फ अपना झंडा उठाने को कहेंगे. पार्टी का, धर्म का झंडा. अपनी जय बोलने को कहेंगे. समझो इस साजिश को. 
मेरे कानों में लगातार एक धुन बज रही है… 
Smash patriarchy
पितृसत्तात्मक व्यवस्था का अंत हो !! इसकी अनुगामिनी बनना बंद करो. 










  ~विजय राजबली माथुर ©