Wednesday, June 3, 2026

प्रिय #students #GenZ के बच्चों, ------ रश्मि दीक्षित




प्रिय #students #GenZ के बच्चों,

#नीट, #सीबीएसई, #सीयूईटी और #एसएससी #जीडी जैसी परीक्षाओं की अव्यवस्थित अनियमितताओ के चक्रव्यूह में फंसकर आज तुम जिस मानसिक तनाव, अनिश्चितता और गहरे दुख-दर्द से गुजर रहे हो, उसे पूरा देश देख रहा है।

अपनी मेहनत को चंद रुपयों में लीक होते देखना और अपने साथियों को प्रशासनिक नाकामियों के कारण आत्मघाती कदम उठाते देखना कोई मामूली तकलीफ नहीं है। व्यवस्था के इस क्रूर मजाक के खिलाफ तुम्हारा गुस्सा बिल्कुल जायज है और सत्ता पक्ष में किसी को तो इसकी जिम्मेदारी लेनी ही होगी।

लेकिन इस बेहद संवेदनशील मोड़ पर तुम्हें बहुत सतर्क रहने की जरूरत है। इस खुले खत के जरिए मैं सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि अपनी इस वास्तविक तकलीफ और आंसुओं का फायदा किसी और को अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए मत उठाने दो।

जो इंसान अब तक अपने डर की वजह से कभी हिंदुस्तान वापस आना ही नहीं चाहता था, वह अचानक 6 जून को ही वापस क्यों आ रहा है? समय के खेल को समझो; ठीक 6 जून को देश के प्रमुख विपक्षी दलों की एक बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण बैठक होने वाली है,जो हफ़्तों से तुम्हारे हक की लड़ाई चिलचिलाती गर्मी में सड़को पर लड़ रहा है।

यह लड़ाई विशुद्ध रूप से तुम्हारी है, तुम्हारे भविष्य की है, और इसे बेहद मजबूत कंधों के सहारे ही लड़ा जा सकता है। याद रखो, वे कंधे कभी मजबूत नहीं हो सकते जो CJI के एक बयान के बाद महज हंसी-मजाक ,उत्तेजना और सैटायर (व्यंग्य) के रूप में तुम्हें मिले थे। जिस मंच की अपनी कोई ठोस वैचारिक गहराई या जमीनी रीढ़ ही नहीं है, वह इतने बड़े देश के युवाओं के भविष्य का बोझ कैसे उठा सकता है?

इस पूरे ताने-बाने को थोड़ी और गहराई से समझो। जो व्यक्ति आज विदेश में बैठकर सोशल मीडिया पर वीडियो में चमका रहा है अचानक भारत लौटकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग कर रहा है, उसके बयानों के पीछे छुपे अहंकार को पहचानो। उसके संवादों में छिपा यह 'मैं' और व्यक्तिगत अहंकार देखने लायक है- "मैं आ रहा हूं इस्तीफा मांगने", जैसे वह अकेला अपने दम पर तुम्हें यह लड़ाई जिता देगा।

वह विपक्ष के अब तक के जमीनी और शांतिपूर्ण संघर्ष को यह कहकर छोटा और कमजोर दिखाने की कोशिश की रहा है कि देश भर में प्रोटेस्ट तो हो रहे हैं पर उनसे सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ रहा। यानी जो लोग हफ्तों से लाठियां खा रहे हैं, जमीन पर संघर्ष कर रहे हैं, उनकी मेहनत बेकार है और चमत्कार सिर्फ इसके आने से होगा? यह आत्ममुग्धता इतनी सीधी और सरल नहीं है, इसके पीछे एक गहरी राजनीतिक मंशा हो सकती है।

यह व्यक्ति पूर्व में आम आदमी पार्टी में सक्रिय कार्यकर्ता रह चुका है ये तो सभी जानते हैं। पर सवाल इसके बाद उठता है कि वह अच्छी तरह जानता है कि पिछले 12 सालों से देश की राजनीति में न तो जवाबदेही बची है और न इस्तीफों का कोई चलन है। और उसे यह भी बखूबी मालूम है कि भारत के कानून के तहत किसी भी प्रदर्शन के लिए पहले से प्रशासनिक अनुमति लेनी अनिवार्य होती है। इसके बावजूद उसने कोई पूर्व अनुमति नहीं ली?

ये जानते हुए भी कि सत्ता पक्ष आन्दोलनों को किस तरह संभालता है, बस हवा-हवाई दावों के सहारे सबको सोशल मीडिया पर सीधे एयरपोर्ट पर पहुंचने का बुलावा दे दिया। बिना किसी कानूनी तैयारी के भीड़ इकट्ठा करना और फिर पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने जाकर परमिशन मांगने का नाटक करना, आठ लाख ऑनलाइन हस्ताक्षरों का भ्रम फैलाकर एक गंभीर छात्र आंदोलन को प्रशासनिक टकराव की अंधी गली में धकेलने की साजिश है।

हिंदुस्तान में पैर रखने से पहले ही अपनी संभावित गिरफ्तारी का अंदेशा जताकर पहले से ही एक 'विक्टिम कार्ड' तैयार कर लेना साफ इशारा है कि यहाँ कोई ठोस व्यावहारिक योजना नहीं है। अभिजीत दीपके राजनीतिक रूप से कोई अपरिचित इंसान नहीं है, मुझे अभिजीत में संभावना नजर आती है और मैं चाहती हूं कि ऐसे लोग राजनीति में आएं, लेकिन खेल-खेल में बनी इस वेबसाइट की सोशल मीडिया पर अप्रत्याशित रीच देखकर, करियर री-लॉन्चिंग यह एक बुरा विचार है वह भी छात्र आंदोलन जैसे बेहद संवेदनशील मुद्दे पर।

अभिजीत दीपके का लाईफ प्लान विदेश में पढ़ाई कर वहीं नौकरी करना था,अगर देश और समाज की इतनी ही चिंता हमेशा से थी, तो अपनी पुरानी पार्टी के बिखरने के बाद इसे समाज में सक्रिय रहना चाहिए था, जो कि यह बिल्कुल नहीं रहा। अब जरा ठंडे दिमाग से सोचो, कहीं यह तुम्हारे वास्तविक और पवित्र प्रोटेस्ट को पूरी तरह खराब और बदनाम करने के लिए बुना गया कोई सियासी ताना-बाना तो नहीं है?

बिना किसी संगठन और व्यावहारिक सोच के खड़ा किया गया यह गैर-जिम्मेदाराना तमाशा मौजूदा सरकार की एक 'सी-टीम' की तरह काम करता दिख रहा है, जिसका इकलौता मकसद विपक्ष के अब तक के गंभीर, वास्तविक और शांतिपूर्ण संघर्ष को जनता की नजरों में हल्का करना, असली मुद्दे को भटकाकर बिखरा देना और अंततः व्यवस्था को फायदा पहुंचाना है।

एक दशक पहले अन्ना आंदोलन के जरिए भी पूरे हिंदुस्तान की भावनाओं और गुस्से को इसी तरह भुनाकर एक बहुत बड़ा धोखा दिया गया था, जिसका हर्जाना देश पिछले 12 सालों से भुगत रहा है। यही वजह है कि जो समझदार और अनुभवी लोग शुरुआत में इस मंच के जोश में जुड़े थे, उन्होंने इतिहास की कड़वाहट को याद रखते हुए समय रहते अपने कदम पीछे खींच लिए।

तुम इस हिंदुस्तान की सबसे समझदार, जागरूक और तार्किक पीढ़ी हो। भावनाओं के सैलाब में बहकर कोई भी ऐसा कदम मत उठाओ जिससे तुम्हारी सालों की तपस्या और यह आंदोलन एक राजनीतिक ड्रामे में तब्दील हो जाए। अगर आज कोई तुमसे यह कहता है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों या सत्याग्रह से तुम व्यवस्था से नहीं जीत सकते, तो तुम्हें इतिहास को दोबारा पलटने की जरूरत है।

हमारी आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी की भूमिका को याद करो, जिसे पिछले 12 सालों में एक सोची-ऐसी रणनीति के तहत बेहद कमजोर दिखाने की कोशिश की गई है। सत्य, अहिंसा और बिना किसी हुड़दंग के किया गया शांतिपूर्ण आंदोलन ही इस देश में अधर्म और दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ सबसे अचूक और मजबूत हथियार रहा है। वर्तमान में इसका सबसे बड़ा उदाहरण किसान आंदोलन था।

अपनी लड़ाई खुद लड़ो, गरिमा के साथ लड़ो, और ऐसे किसी भी छलावे या सोशल मीडिया के मुखौटों के मोहरे मत बनो जिनका मकसद सिर्फ अपनी सियासी दुकान चमकाना है।

इस पूरे सफर में तुम खुद को अकेला मत समझना। सच की इस राह पर हम सब, पूरा देश तुम्हारे साथ है। तुम्हारी इस जायज और पवित्र लड़ाई में हम कदम से कदम मिलाकर तुम्हारे पीछे खड़े हैं। हिम्मत मत हारना, हौसला बनाए रखना, जीत अंततः तुम्हारी ही होगी।

एक अभिभावक और तुम्हारी शुभचिंतक,
रश्मि दीक्षित






  ~विजय राजबली माथुर ©

Sunday, May 31, 2026

सच बोलने वाले साहसी ------ विजय राजबली माथुर











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अकबर इलाहाबादी  का कथन  है  ------

"  न खींचो तीर कमानों को , न तलवार निकालो   । 

  जब तोप मुकाबिल हो ,        तो अखबार निकालो।। "

आचार्य महावीर प्रसाद  द्विवेदी ने भी कहा है कि,  जो शक्ति साहित्य में छिपी रहती है वह तोप, तलवार और बम के गोलों में भी नहीं पाई जाती। 

 स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अखबार साहित्य का  भी प्रतिविम्ब होते थे। साहित्य समाज का भी दर्पण होता है। 



आज क्या अखबार क्या दृश्य चेनल्स  सभी शोषकों - उत्पीड़कों का गुण - गान करने में व्यस्त हैं तब दीपक शर्मा ,  पल्लवी राय और मनोरमा सिंह सरीखे पत्रकार निर्भीकता - पूर्वक समाज और साहित्य का दर्पण बन कर जनता को जागरूक और देश को गौरान्वित कर रहे हैं , हम उनके साहस और निर्भीकता की सराहना करते और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए मंगलकामनाए करते हैं। 





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 ~विजय राजबली माथुर ©
 

Friday, May 8, 2026

ये सिर्फ़ एसआईआर का प्रभाव है ------ Mukesh Kumar

 
ममता बैनर्जी का दावा है कि बीजेपी ने उनसे 100 सीटें छीनी हैं। राहुल गाँधी ने उनके इस दावे का समर्थन भी किया है। तमाम विपक्षी दल भी उनसे सहमत हैं। लेकिन बीजेपी और गोदी मीडिया तरह-तरह के तर्क और आँकड़े देकर उन्हें झुठलाने में लगा हुआ है। 
इस अभियान के तहत एक नरैटिव ये बनाया जा रहा है कि ममता बैनर्जी की हार जनता की ज़बर्दस्त नाराज़गी की वज़ह से हुई। ये सही है कि पंद्रह साल से सत्ता में रहने की वज़ह से एंटी एनकंबेंसी रही होगी। मगर ये नहीं भूलना चाहिए कि लोकसभा चुनाव में उन्होंने ज़बर्दस्त प्रदर्शन किया था और बीजेपी को धूल चटा दी थी। 
दूसरे नरैटिव के तहत बताया जा रहा है कि हिंदुत्व की सुनामी ने ममता को डुबा दिया। यानी बीजेपी का घुसपैठिए का हौआ और ममता बैनर्जी का तथाकथित मुस्लिम प्रेम उनके ख़िलाफ़ चला गया। 
इसे भी आंशिक रूप से ही सही माना जा सकता है। सचाई ये है कि ये तमाम तर्क वोट चोरी को छिपाने के लिए दिए जा रहे हैं। कोशिश ये की जा रही है कि लोग धांधलियों की बात करने के बजाय ममता की नाकामी और बीजेपी की अभूतपूर्व कामयाबी की बात की जाए। 
लेकिन सचाई क्या है, आँकड़े क्या कहते हैं...जबरन थोपी गई एसआईआर का चुनाव पर कोई असर पड़ा या नहीं पड़ा। आँकड़ों की छानबीन करके बताया जा रहा है कि 49 से लेकर 105 सीटें ऐसी हैं जिन पर एसआईआर का असर देखा जा सकता है। बल्कि कहा जा सकता है कि एसआईआर की वज़ह नतीजों पर सीधा असर पड़ा। 
द वायर के मुताबिक 150 सीटें ऐसी हैं जिन पर हार जीत का अंतर हटाए गए मतदाताओं की संख्या से कम रहा। बीजेपी ने इनमें से 99 सीटें जीतीं, जबकि 2021 में उसने केवल 19 सीटें जीती थीं। यानी 80 सीटों का फ़ायदा। 
स्क्रोल . इन के मुताबिक 105 ऐसी सीटें हैं जिनमें बीजेपी की जीत का अंतर उन सीटों पर काटे गए वोटों से कम है। यानी अगर वोट नहीं काटे गए होते तो बीजेपी शायद नहीं जीत पाती। 
चुनाव में टीएमसी ने 129 सीटें गँवाई हैं। अगर इनमें से स्विंग सीटों को देखें तो 86 सीटें ऐसी हैं जिनमें बीजेपी की जीत का अंतर काटे गए वोटों से भी कम है। 
जादवपुर सीट को लीजिए। पिछले चुनाव में बीजेपी यहाँ तीसरे नंबर पर थी। मगर इस बार वह सत्ताईस हज़ार वोट से जीत गई। इस सीट पर 56 हज़ार मतदाताओं के नाम काटे गए थे। 
द ऑल्ट के मुताबिक 49 सीटें ऐसी हैं जहाँ पर हार जीत का अंतर ऐसे वोटरों की संख्या से कम रहा जो इसलिए वोट नहीं डाल सके क्योंकि उनके मताधिकार का फ़ैसला ही नहीं हो सका। 
एक विश्लेषक विकास कुमार ने दिलचस्प आँकड़े दिए हैं। सबसे ज़्यादा डिलीशन वाली 100 सीटों में भारी उलटफेर हुआ है। उनके मुताबिक 2021 में इन 100 सीटों में से बीजेपी के पास केवल 20 सीटें थीं मगर एसआईआर की बदौलत वे बढ़कर 68 हो गईँ। यानी 48 सीटों पर खेला।
ध्यान रहे, ये सिर्फ़ एसआईआर का प्रभाव है। और दूसरी तरह से जो खेल किए गए उनका हिसाब किताब भी लगाया जाए तो बीजेपी कहाँ होगी सोचा जा सकता है।






 ~विजय राजबली माथुर ©
 

Sunday, May 3, 2026

RSS और BJP भारतीय लोकतंत्र की हत्या के गुनाहगार ------ Rajesh R. Singh



RSS और BJP भारतीय लोकतंत्र की हत्या के गुनाहगार 
चंद्र बाबू नायडू और नीतीश कुमार जैसे अनुभवी सियासी बाजीगर, जो कभी मोदी को तानाशाह करार देते थे और आरएसएस की विचारधारा से दूरी बनाते दिखते थे, आज केंद्र में आरएसएस-प्रेरित सरकार को अटूट समर्थन प्रदान कर रहे हैं। 2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा 240 सीटों पर सिमट गई, लेकिन टीडीपी के 16 और जेडीयू के 12 सांसदों समेत एनडीए के गैर-भाजपा सहयोगियों ने कुल 293 सांसदों का समर्थन देकर सरकार बनाई। इन नेताओं के कानों में लोकतंत्र के खात्मे की कोई पदचाप नहीं गूँज रही, न ही इनकी आंखों में आरएसएस की कथित तानाशाही का भय दिखाई दे रहा। नायडू 2018 में विशेष श्रेणी का दर्जा न मिलने पर एनडीए छोड़ चुके थे और मोदी सरकार पर हमले बोलते थे, लेकिन 2024 में आंध्र प्रदेश के लिए विशेष पैकेज और मंत्रालयों के लालच में फिर गले मिल गए। नीतीश कुमार तो पिछले दशक में कई बार पाला बदल चुके, 2013 में भाजपा से अलग हुए, 2017 में वापस लौटे, 2022 में महागठबंधन में गए और फिर 2024 से पहले एनडीए में लौट आए। यह सौदेबाजी है, बिहार और आंध्र के विकास, विशेष श्रेणी का दर्जा, रेलवे जैसे मंत्रालय और फंड्स के बदले संवैधानिक मूल्यों की बलि चढ़ाने का सौदा। इनके लिए सत्ता की कुर्सी संविधान और लोकतंत्र से कहीं ज्यादा अहम है, क्योंकि क्षेत्रीय अस्मिता और वोट बैंक बचाने की मजबूरी ने उन्हें सिद्धांतों से ऊपर उठा दिया। खैर नीतीश बाबू को उनकी करनी की सजा मिल गयी संघीयों नें उन्हें निगल लिया चंद्र बाबू को निगलने के लिए उनके खेमें में गद्दार तैयार किए जा रहे हैं देर सबेर उन्हें भी संघी निगल लेंगे।
आरएसएस, जिसकी स्थापना 1925 में डॉ. के.बी. हेडगेवार ने की, आजादी की लड़ाई में कोई संगठनात्मक भूमिका नहीं निभाई। बल्कि इसके संस्थापक और दूसरे सरसंघचालक एम.एस. गोलवलकर ने क्विट इंडिया आंदोलन जैसे राष्ट्रव्यापी संघर्षों से दूरी बनाए रखी और ब्रिटिश राज के खिलाफ सीधा मुकाबला 'प्रतिक्रियावादी' करार दिया। गोलवलकर की किताब 'वी ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड' (1939) में नाजी जर्मनी और फासीवादी इटली से प्रेरणा ली गई, जहां अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक मानने वाली सोच व्यक्त की गई। गांधीजी की हत्या के बाद संगठन पर प्रतिबंध लगा था। RSS ने शुरू से 'हिंदू एकता' और अनुशासन पर जोर दिया, लेकिन कांग्रेस के अखिल भारतीय आंदोलनों से परहेज किया। आज वही संगठन संविधान को 'पश्चिमी नकल' बताकर उसकी आलोचना करता रहा है और मनुस्मृति जैसे प्राचीन ग्रंथों को आदर्श मानता है। 1949 में आरएसएस के मुखपत्र 'ऑर्गनाइजर' ने संविधान बनने पर अफसोस जताया कि उसमें 'भारतीय' तत्व नहीं हैं और मनु के कानूनों का कोई उल्लेख नहीं। फिर भी 100 से ज्यादा गैर-आरएसएस सांसद मोदी-शाह के इशारे पर घूम रहे हैं, बिना इस ऐतिहासिक गद्दारी और विचारधारा के खतरे को समझे। लाखों स्वतंत्रता सेनानियों, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस, गांधीजी के अनुयायियों की कुर्बानी से बड़ी ही मुश्किल से मिला लोकतंत्र अब 'हिंदू राष्ट्र' के खांचे में ढाला जा रहा है, जहां बहुलवाद की जगह एकरूपता थोपी जा रही है। इन सांसदों का ज़मीर सोया हुआ है या सत्ता की चकाचौंध में पूरी तरह बेहोश हो चुका है?
ये सांसद भूल गए कि आजादी की लड़ाई में कांग्रेस, समाजवादियों और क्रांतिकारियों ने ब्रिटिश साम्राज्य से सीधा संघर्ष किया, जबकि आरएसएस ने हिंदू संगठन को मजबूत करने और मुस्लिम एकता को खतरा मानकर अलग राह चुनी। गोलवलकर ने लोकतंत्र को हिंदू संस्कृति के अनुकूल नहीं माना और मनुस्मृति को कानून का आधार बनाने की वकालत की, जिसमें वर्ण व्यवस्था और असमानता को वैध ठहराया गया। आज एनडीए सरकार में सहयोगी दल इसी विचारधारा के विस्तार को चुपचाप देख रहे हैं। चंद्र बाबू नायडू और नीतीश कुमार जानते हैं कि उनकी पार्टियां टीडीपी और जेडीयू क्षेत्रीय मुद्दों, आंध्र के विकास, बिहार के विशेष दर्जे पर टिकी हैं, लेकिन आरएसएस की सांस्कृतिक और संगठनात्मक मशीनरी धीरे-धीरे उनके वोट बैंक को भी निगल सकती है। 2024 में भाजपा के बहुमत न होने के बावजूद इन नेताओं ने 'अनकंडीशनल सपोर्ट' दिया, क्योंकि विकास के वादे, केंद्रीय फंड्स और मंत्रालयों का लालच लोकतंत्र के लंबे खतरे से बड़ा साबित हुआ। क्या ये लोग नहीं देख रहे कि उनकी पार्टियों का वजूद और क्षेत्रीय स्वायत्तता RSS की केंद्रीकृत 'एक राष्ट्र, एक संस्कृति' वाली सोच में धीरे-धीरे विलीन हो रही है? इतिहास में कई क्षेत्रीय दल बड़े सहयोगी के साथ घुल-मिलकर अपनी पहचान खो चुके हैं, लेकिन सत्ता का नशा इनके विवेक को कुचल रहा है।
लाखों शहीदों की शहादत पर सवाल उठाना आसान है, लेकिन सच्चाई यह है कि भारतीय लोकतंत्र ने सभी विचारधाराओं, वामपंथी, दक्षिणपंथी और सेकुलर को जगह दी। आरएसएस ने शुरू से ही 'हिंदू राष्ट्र' की कल्पना की, जिसमें अल्पसंख्यक 'हिंदू संस्कृति' अपनाने को मजबूर हों। इसके प्रारंभिक दस्तावेजों में बहुलवाद और समानता वाले संविधान से असहजता साफ झलकती है। 1949 के ऑर्गनाइजर संपादकीय में मनुस्मृति की तारीफ करते हुए कहा गया कि संविधान में प्राचीन भारतीय कानूनों का अभाव है। आज भी कुछ आरएसएस नेता 'सेकुलर' और 'सोशलिस्ट' शब्दों की समीक्षा की बात करते हैं। फिर भी ये समर्थन देने वाले दल इस बहस में नहीं पड़ना चाहते। उनका डर सिर्फ चुनावी हार और सत्ता गंवाने का है, न कि संवैधानिक मूल्यों का। इन्हे यह कहते हुए सुना जा सकता है कि अगर आरएसएस की तानाशाही आ रही होती, तो ये 'किंगमेकर' पहले ही पाला बदल चुके होते, लेकिन सत्ता और फंड्स का स्वाद इतना मीठा है कि लोकतंत्र के दुश्मन बनकर भी ये घूम रहे हैं। चंद्र बाबू ने 2014 से विशेष श्रेणी का दर्जा मांगा, नीतीश ने बिहार के लिए 2000 से मांग की, और 2024 में एनडीए में शामिल होकर इन्हें हासिल करने की उम्मीद में चुप्पी साध ली।
ये सब कब जागेंगे? शायद तब जब उनकी अपनी पार्टियां, टीडीपी और जेडीयू आरएसएस की शाखाओं में बदल चुकी होंगी, जब क्षेत्रीय अस्मिताएं केंद्रीय हिंदुत्व में पूरी तरह घुल-मिल गई होंगी। नीतीश कुमार का फ्लिप-फ्लॉप इतिहास प्रसिद्ध है, वे 'सुशासन बाबू' के रूप में जाने जाते थे, लेकिन सत्ता बचाने के लिए बार-बार गठबंधन बदलते रहे। नायडू भी ट्रांजेक्शनल पॉलिटिक्स के माहिर हैं। आज ये नेता जानते हैं कि भाजपा बिना उनके समर्थन के बहुमत नहीं बना सकती, फिर भी वे बिना शर्त समर्थन दे रहे हैं क्योंकि अल्पकालिक फायदे, विशेष पैकेज, मंत्रालय, लंबे लोकतांत्रिक खतरे से ज्यादा आकर्षक हैं। इतिहास गवाह है कि सत्ता के लिए सिद्धांत बेचने वाले अंत में खुद बिक जाते हैं। आरएसएस की विचारधारा अनुशासन के नाम पर बहुलवादी भारत को एकरूप बनाने की कोशिश लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती है। सहयोगी दल अगर आज पदचाप नहीं सुन रहे, तो कल उनके कार्यकर्ता और वोटर जब जागेंगे, तब तक उनकी पहचान मिट चुकी होगी।
अंत में, भारतीय लोकतंत्र मजबूत है क्योंकि यह बहुलवादी और समावेशी है, न कि किसी एक विचारधारा का गुलाम। आरएसएस चाहे जितना हिंदू राष्ट्र का सपना देखे, संविधान की जड़ें समता, स्वतंत्रता, न्याय गहरी हैं। लेकिन सवाल ये है कि जो सांसद आज आरएसएस के प्रभाव में 'मोदी-शाह के इशारे' पर चल रहे हैं, वे कल खुद को और अपनी विरासत को बचाने के लिए क्या करेंगे? लाखों शहीदों की आहें, संविधान निर्माताओं का सपना और आजादी की लड़ाई की यादें इनके कानों तक पहुंचनी चाहिए। जागना होगा, वरना इतिहास इन्हें सिर्फ सत्ता के दलाल और लोकतंत्र के कमजोर करने वाले के रूप में याद रखेगा, न कि रक्षक के रूप में। सच्चा लोकतंत्र तब बचता है जब सत्ता के सहयोगी भी सवाल पूछें, विपक्ष की तरह नहीं तो कम से कम अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनें। जनता को भी सतर्क रहना होगा, क्योंकि लोकतंत्र किसी एक दल या गठबंधन की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की अमूल्य विरासत है। सत्ता का खेल खेलते रहो, लेकिन याद रखो, जो आजादी के सपनों से समझौता करता है, वह खुद इतिहास की कचरा टोकरी में समा जाता है। जागो सोने वालों, वरना बहुत देर हो जाएगी।
Rajesh R. Singh

  ~विजय राजबली माथुर ©

 

Wednesday, April 29, 2026

लाल बहादुर शास्त्री ------ Pankaj Kumar Jat




9 जून 1964 को एक 5 फुट 2 इंच का दुबला-पतला आदमी भारत का प्रधानमंत्री बना था और 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनकी रहस्यमयी मौत हो गई। कुल कार्यकाल लगभग 19 महीने। बस 19 महीने। 
इन 19 महीनों का वजन आज की कई पूरी सरकारों पर भारी पड़ता है। जिस आदमी को विदेशी प्रेस ने “अनलाइकली सक्सेसर” कहा, उसी ने पाकिस्तान को जवाब दिया, अमेरिका के दबाव को ठुकराया, किसानों को सम्मान दिया, सैनिकों का मनोबल बढ़ाया और देश को आत्मनिर्भरता की राह पर धकेल दिया। 
नाम था लाल बहादुर शास्त्री। कद छोटा था, काम हिमालय जितना बड़ा था।
आज देश में कैमरे की चमक को नेतृत्व समझ लिया गया है, भाषण को नीति और नारे को उपलब्धि। ऐसे समय में शास्त्री जी का नाम लेना ही कई लोगों की राजनीति पर तमाचा है। क्योंकि शास्त्री जी ने सत्ता को निजी ब्रांड नहीं बनाया, देश सेवा बनाया।
उन्होंने प्रधानमंत्री बनते ही खुद की मूर्तियाँ नहीं लगवाईं, खुद का चेहरा हर दीवार पर नहीं चिपकवाया, हर योजना का नाम अपने ऊपर नहीं रखा। वे उन नेताओं में थे जो काम करके चुप रहते थे, आज वाले उन नेताओं में हैं जो चुप रहकर भी प्रचार करवा लेते हैं।
रेल मंत्री रहते हुए 1956 में अरियालुर रेल दुर्घटना हुई। आज के नेताओं की तरह जांच बैठाओ, बयान दो, विपक्ष को दोष दो, मीडिया मोड़ दो वाला खेल नहीं खेला। शास्त्री जी ने नैतिक जिम्मेदारी ली और इस्तीफा दे दिया। सोचिए, एक रेल दुर्घटना पर इस्तीफा। 
आज तो पुल गिर जाए, ट्रेन भिड़ जाए, पेपर लीक हो जाए, बेरोजगार सड़क पर पिट जाएं, तब भी कुर्सी से चिपके रहते हैं जैसे फेविकोल की सरकारी स्कीम में आए हों।
प्रधानमंत्री बने तो देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। अमेरिका PL-480 के तहत गेहूं देकर दबाव बनाता था। शास्त्री जी ने कहा हम भूखे रह लेंगे, झुकेंगे नहीं। खुद एक वक्त उपवास रखा, देश से अपील की। पहले खुद त्याग किया, फिर जनता से कहा। 
आज पहले जनता से गैस महंगी करवाओ, फिर खुद वातानुकूलित मंच से त्याग पर भाषण दो। यही फर्क है चरित्र और अभिनय में।
शास्त्री जी ने “जय जवान जय किसान” नारा दिया था। यह नारा चुनावी मंच की तुकबंदी नहीं था, राष्ट्रीय दर्शन था। उन्होंने 1965 युद्ध में सेना को खुला मनोबल दिया। पाकिस्तान के अयूब खान जिन्हें लगा था छोटा आदमी है, बाद में उसी आदमी की दृढ़ता माननी पड़ी। 
दूसरी तरफ किसानों के लिए FCI, राष्ट्रीय बीज ढांचा, हरित क्रांति की नींव, डेयरी विकास के लिए NDDB, अमूल मॉडल का विस्तार। आज किसान सड़क पर बैठे रहें, महीनों मरते रहें, तब सरकार उन्हें राष्ट्रविरोधी बताने लगती है। 
शास्त्री जी होते तो पहले बात करते, बाद में बिल लाते।
उनके पास अपनी कार तक नहीं थी। परिवार के कहने पर 12,000 रुपये का लोन लेकर फिएट कार खरीदी। मृत्यु के समय कर्ज बाकी था। पत्नी ने पेंशन से चुकाया। जरा तुलना कर लो। आज वार्ड स्तर का नेता करोड़पति, जिला स्तर वाला उद्योगपति, ऊपर वाला तो मानो चलता-फिरता विज्ञापन साम्राज्य। और एक प्रधानमंत्री ऐसा भी था जो कर्ज में मरा मगर ईमानदारी में अमर हो गया।
उनके बेटे को नौकरी में प्रमोशन मिला तो रद्द करवा दिया। सरकारी कार निजी काम में चली तो किलोमीटर का हिसाब लेकर पैसा जमा कराया। आज परिवारवाद पर भाषण देने वाले खुद रिश्तेदारों, मित्रों, चहेतों और कॉरपोरेट दरबारियों से घिरे रहते हैं। जनता को प्रवचन, अपने लोगों को संरक्षण। पुरानी चाल है, बस पैकिंग नई है।
शास्त्री जी फटा कुर्ता कोट के नीचे पहन लेते थे। कहते थे शर्म तब होनी चाहिए जब किसान नंगा सोए। आज शर्म किसे है? लाखों का सूट, करोड़ों का प्रचार, और जनता को डेटा पैक से राष्ट्रवाद डाउनलोड कराया जाता है। 
किसान की आय दोगुनी का सपना दिखाकर लागत चौगुनी कर दी। बेरोजगार को ऐप दे दिया, मजदूर को भाषण, छात्र को परीक्षा घोटाला।
11 जनवरी 1966 को ताशकंद में उनकी मृत्यु हुई। आधिकारिक कारण हार्ट अटैक बताया गया। परिवार ने सवाल उठाए। पोस्टमार्टम नहीं हुआ। फाइलें वर्षों बंद रहीं। सरकारें बदलीं, राज बदला, पर सच पर ताला जस का तस। 
कांग्रेस हो या बीजेपी, दोनों ने इस प्रश्न से दूरी बनाई। क्योंकि इतिहास की ईमानदार जांच से कई नकाब उतरते हैं, और सत्ता को नकाब बहुत प्रिय होता है।
आज कुछ लोग शास्त्री जी का नाम लेते हैं, पर उनकी आत्मा से डरते हैं। क्योंकि अगर शास्त्री मॉडल लागू हो जाए तो आधे नेता संपत्ति घोषित करते ही बेहोश हो जाएं, चौथाई इस्तीफा देने पड़ जाएं, बाकी प्रचार विभाग में नौकरी मांगते फिरें। 
शास्त्री जी का जीवन बताता है कि देश भाषणों से नहीं, संस्थाओं से चलता है। नारे से नहीं, नीति से चलता है। फोटो से नहीं, फैसलों से चलता है।
नरेंद्र भाई और बीजेपी को सबसे ज्यादा खतरा विपक्ष से नहीं, शास्त्री जी जैसे नेताओं की स्मृति से है। क्योंकि जनता अगर तुलना करने लगी तो सवाल पूछेगी कि 19 महीने में जिसने युद्ध भी संभाला, कृषि भी संभाली, संस्थाएं भी खड़ी कीं, सादगी भी निभाई, वह बड़ा नेता था या वह जो वर्षों से सत्ता में रहकर भी हर विफलता का दोष पिछले 70 साल पर डालता है।
लाल बहादुर शास्त्री जी साबित करते हैं कि ऊंचाई शरीर की नहीं, रीढ़ की होती है। कुर्सी की नहीं, चरित्र की होती है। नाम पोस्टर से नहीं, त्याग से बनता है। 
देश को आज फिर भाषणवीर नहीं, शास्त्री जैसे कर्मवीर चाहिए। बाकी पोस्टर तो बारिश में भीगकर उतर ही जाते हैं।



  ~विजय राजबली माथुर ©