Tuesday, October 18, 2022

जनाधार की राजनीति ------ नवेंदू कुमार

With_u_Navendu

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◆ देख लीजिये...जनाधार की राजनीति क्या होती है, इस वीडियो रिपोर्ट से आपको पता चल जायेगा। जनता का मेला था- और जैसे उमड़ पड़ा हो कोई जनसमुद्र!
● मुलायम कोई प्रधानमंत्री तो नहीं थे। न नेहरू थे। न गांधी थे। न शहीदे-आज़म भगत सिंह। ना ही भारत को "दूसरी आज़ादी" दिलाने वाले लोकनायक जयप्रकाश। तो फिर क्यों मुलायम के निधन पर दलीय दीवार टूटती दिखाई दी। क्यों लालू प्रसाद की पार्टी राजद के राष्ट्रीय अधिवेशन में सपा नेता "मुलायम अमर रहें" के नारे हज़ारों-हज़ार लोग लगा रहे। क्यों पीएम मोदी हों या लालू प्रसाद अपनी सभा में मुलायम की गौरवगाथा सुना कर अपना शोक जगजाहिर कर रहे थे? 
● मुलायम- लालू को समझियेगा तो समझ में आएगी लेफ्ट और आरएसएस के कैडर आधारित राजनीतिक दलों की संरचना और दर्शन से इतर भारत में "जनाधार की राजनीति" की ताकत और उसका दर्शन। समाजवाद की कसौटी पर इसे शुध्द समाजवादी राजनीति न भी मानें तो इतना मानना तो पड़ेगा कि सत्ता-समाज-राजनीति में "संख्या भारी तो उतनी हिस्सेदारी" और "सामाजिक न्याय के साथ विकास" की भूख ही इस जनाधार की राजनीति का मूल आधार है। 
● बहुसंख्यक जनता की यही भूख मुलायम और लालू जैसे नेता और लोहिया के बुनियादी राजनीति को जन्म देती है। ऐसी राजनीति जो कैडर आधारित राजनीति के मुक़ाबिल एक ताक़त दिखती है। इसे "पिछड़ा उभार" कह कर भले अलगा दें पर है ये जनता के वंचित पीड़ित ज़मात की राजनीति का विस्फोटक व्याकरण। यही वज़ह है कि राजनीतिक सक्रियता के मामले में शिथिल निस्तेज हो चुके मुलायम सिंह यादव के देहावसान पर शोक विलाप भी किसी विस्फोटक जन आंदोलन के नारे के बतौर सुनाई और दिखाई देता लगता है।
● "धार्मिक उन्माद" और "हिंदुत्वा राष्ट्रवादी ब्रांड" की सत्ता-राजनीति के इस दौर में किसी "सेकुलर छवि" वाले नेता की मृत्यु पर जनता का हाहाकार और जुटान, राजनीति की कई समझ और संकेत देता है। इस संकेत को समझे बिना सत्ता को भले हांक ले कोई पार्टी या संगठन, सर्व समाज और सर्वजन को नहीं हांक सकता कोई महाबली या राष्ट्रबली!!



  ~विजय राजबली माथुर ©

Monday, October 17, 2022

ग्रेट गेम वालों की गुलामी करने से इंकार ------ सिद्धांत सहगल


 
न्यू वर्ल्ड आर्डर को लेकर जागरूक करने वाले
जागरूक कम , डरा ज्यादा रहे हैं
ग्रेट गेम का महिमामण्डन तो कर रहे हैं
पर रूस, पुतिन, ग्रेटर यूरेशिया पर कुछ लिख बोल नहीं रहे
मिडिया तो नहीं बोलेगा क्योंकि मिडिया डीप स्टेट, वर्ल्ड इकनोमिक फोरम और ग्रेट गेम वालों के हाथो बिका हुआ है
क्योंकि उन्ही का महिमामण्डन करने का पैसा इनको मिलता हैं
पर सोशल मिडिया पर भी लोग एक ही लकीर पर चलते दिखाई देते हैं
इन्हे रूस और पुतिन भी डर्टी गेम का हिस्सा लग रहा है
जबकि ऐसा बिलकुल नहीं है
मैने पोस्ट डाली पुतिन को धन्यवाद देते हुए कि इसने शैतानों के हाथ से हमें बचा लिया , इसलिए धन्यवाद
तो एक मित्र ने पूछा कि ऐसा क्या कर दिया इसने ?
तो मैं बड़े शार्ट में बतला रहा हूँ
पुतिन यूक्रेन के बहाने इनके खिलाफ नहीं खड़ा हुआ होता
तो आज पहले से भी ''खतरनाक लॉक डाउन का शिकार हो रहे होते और आठवीं बूस्टर डोज आपको घरों में घुसकर ठोकी जाती''
बस इतने में समझ लो
जब पुतिन स्पुतनिक V वैक्सीन बना ली थी
बिल गेट्स की फिजर मोडर्ना को अपने देश में घुसने नहीं दिया और WHO ने जब स्पुतनिक-V को जब मान्यता नहीं दी तो उस वक्त मुझे एहसास हो गया था कि इन शैतानो के विरुद्ध कोई खड़ा हो रहा है -- वन वर्ल्ड वन गवर्नमेंट के खिलाफ रूस के रक्षामंत्री का ये बयान काफी महत्वपूर्ण था कि जिस पृथिवी पर रूस नहीं होगा उस पृथिवी की भी हमे जरूरत नहीं हैं - ये एक प्रकार की परमाणु युद्ध की ही धमकी थी और ग्रेट गेम वालों की गुलामी करने से इंकार का खुला एलान था।
बहुत कुछ घट रहा है ध्यान रखें।


  ~विजय राजबली माथुर ©

Thursday, October 13, 2022

कारोबारी जनता का मूड भांप लेते हैं.. ------ कुमुद सिंह




कुमुद सिंह

12-10-2022 

लोकतंत्र में नेता से पहले कारोबारी जनता का मूड भांप लेते हैं.. हाल ही में प्रकाशित एक पॉलिसीसेटर अमेरिकी पत्रिका में राहुल गांधी को लेकर रपट छपी है. रपट के अनुसार राहुल गांधी एक बड़ी राजनीतिक ताकत बन कर उभरनेवाले हैं, जो भारत की आगामी सरकार के गठन में महत्वपूर्ण रोल अदा करेंगे. रपट में विदेशी राजनयिकों और खास तौर पर अमेरिकी विदेश मंत्रालय को राहुल को पप्पू समझने की भूल न करने की सलाह दी है. रपट में यह भी कहा गया है कि भारतीय कारोबारी जगत अब राहुल और कांग्रेस को नजरअंदाज करने का जोखिम और नहीं उठाना चाहता है. वो गांधी परिवार से बेहतर संबंध बनाने के लिए अपने संपर्कों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. मुकेश अंबानी के बेटे ने कुछ माह पहले मुंबई में प्रियंका गांधी से मुलाकात की थी. वैसे राहुल या सोनिया से उनकी सीधी मुलाकात की कोई सूचना नहीं है. इधर, राहुल से रिश्ते बेहतर करने के लिए गौतम अदानी भी लगातार प्रयास कर रहे हैं. क्योंकि राहुल और कांग्रेस को लेकर भारत में तेजी से माहौल बदला है और मोदी के बाद भाजपा में नेतृत्व को लेकर वो एकजुटता नहीं है, जो 2014 में दिखाई दे रही थी. ऐसे में बड़े कारोबारी अब संतुलन बनाने में जुट गये हैं. भूपेश और गलहोत के माध्यम से अदानी अपने रिश्ते कांग्रेस से बेहतर कर रहे हैं. इधर राहुल गांधी ने भी यात्रा के दौरान कारोबारी जगह को बेहतर रिश्ते के साफ संकेत दे दिया है. खास तौर पर अदानी को लेकर राहुल का बयान गौरतलब है. भारतीय मीडिया जो कहे, कम से कम विदेशी मीडिया तो यही कह रही है...

  ~विजय राजबली माथुर ©