Monday, November 4, 2013

दीपावली क्या थी ?क्या हो गई?:आइये फिर से अतीत में लौट चलें ---विजय राजबली माथुर


http://krantiswar.blogspot.in/2011/10/blog-post_26.html

26 अक्तूबर 2011 को मैंने इस लिंक पर दिये गए लेख में यह भी बताया था:

"सुप्रसिद्ध आर्य सन्यासी (अब दिवंगत) स्वामी स्वरूपानन्द  जी के प्रवचन कमलानगर,आगरा मे सुनने का अवसर मिला है। उन्होने बड़ी बुलंदगी के साथ बताया था कि जिन लोगों की आत्मा हिंसक प्रकृति की होती है वे ही पटाखे छोड़ कर धमाका करते हैं। उनके प्रवचनों से कौन कितना प्रभावित होता था या बिलकुल नहीं होता था मेरे रिसर्च का विषय नहीं है। मै सिर्फ इतना ही बताना चाहता हूँ कि यशवन्त उस समय 13 या 14 वर्ष का रहा होगा और उसी दीपावली से उसने पटाखे छोडना बंद कर दिया है क्योंकि उसने अपने कानों से स्वामी जी के प्रवचन को सुना और ग्रहण किया। वैसे भी हम लोग केवल अपने पिताजी द्वारा प्रारम्भ परंपरा निबाहने के नाते प्रतीक रूप मे ही छोटे लहसुन आदि उसे ला देते थे। पिताजी ने अपने पौत्र को शुगन के नाम पर पटाखे देना इस लिए शुरू किया था कि औरों को देख कर उसके भीतर हींन भावना न पनपे। प्रचलित परंपरा के कारण ही हम लोगों को भी बचपन मे प्रतीकात्मक ही पटाखे देते थे। अब जब यशवन्त ने स्वतः ही इस कुप्रथा का परित्याग कर दिया तो हमने अपने को धन्य समझा।
स्वामी स्वरूपानन्द जी  आयुर्वेद मे MD  थे ,प्रेक्टिस करके खूब धन कमा सकते  थे लेकिन जन-कल्याण हेतु सन्यास ले लिया था और पोंगा-पंथ के दोहरे आचरण से घबराकर आर्यसमाजी बन गए थे। उन्होने 20 वर्ष तक पोंगा-पंथ के महंत की भूमिका मे खुद को अनुपयुक्त पा कर आर्यसमाज की शरण ली थी और जब हम उन्हें सुन रहे थे उस वक्त वह 30 वर्ष से आर्यसमाजी प्रचारक थे। स्वामी स्वरूपानन्द जी स्पष्ट कहते थे जिन लोगों की आत्मा 'तामसिक' और हिंसक प्रवृति की होती है उन्हें दूसरों को पीड़ा पहुंचाने मे आनंद आता है और ऐसा वे धमाका करके उजागर करते हैं। यही बात होली पर 'टेसू' के फूलों के स्थान पर सिंथेटिक रंगों,नाली की कीचड़,गोबर,बिजली के लट्ठों का पेंट,कोलतार आदि का प्रयोग करने वालों के लिए भी वह बताते थे। उनका स्पष्ट कहना था जब प्रवृतियाँ 'सात्विक' थीं और लोग शुद्ध विचारों के थे तब यह गंदगी और खुराफात (पटाखे /बदरंग)समाज मे दूर-दूर तक नहीं थे। गिरते चरित्र और विदेशियों के प्रभाव से पटाखे दीपावली पर और बदरंग होली पर स्तेमाल होने लगे।
दीपावली/होली क्या हैं?:
हमारा देश भारत एक कृषि-प्रधान देश है और प्रमुख दो फसलों के तैयार होने पर ये दो प्रमुख पर्व मनाए जाते हैं। खरीफ की फसल आने पर धान से बने पदार्थों का प्रयोग दीपावली -हवन मे करते थे और रबी की फसल आने पर गेंहूँ,जौ,चने की बालियों (जिन्हें संस्कृत मे 'होला'कहते हैं)को हवन की अग्नि मे अर्द्ध - पका कर खाने का प्राविधान  था।  होली पर अर्द्ध-पका 'होला' खाने से आगे आने वाले 'लू'के मौसम से स्वास्थ्य रक्षा होती थी एवं दीपावली पर 'खील और बताशे तथा खांड के खिलौने'खाने से आगे शीत  मे 'कफ'-सर्दी के रोगों से बचाव होता था। इन पर्वों को मनाने का उद्देश्य मानव-कल्याण था। नई फसलों से हवन मे आहुतियाँ भी इसी उद्देश्य से दी जाती थीं।
लेकिन आज वेद-सम्मत प्रविधानों को तिलांजली देकर पौराणिकों ने ढोंग-पाखंड को इस कदर बढ़ा दिया है जिस कारण मनुष्य-मनुष्य के खून का प्यासा बना हुआ है। आज यदि कोई चीज सबसे सस्ती है तो वह है -मनुष्य की जिंदगी। छोटी-छोटी बातों पर व्यक्ति को जान से मार देना इन पौराणिकों की शिक्षा का ही दुष्परिणाम है। गाली देना,अभद्रता करना ,नीचा दिखाना और खुद को खुदा समझना इन पोंगा-पंथियों की शिक्षा के मूल तत्व हैं। इसी कारण हमारे तीज-त्योहार विकृत हो गए हैं उनमे आडंबर-दिखावा-स्टंट भर  गया है जो बाजारवाद की सफलता के लिए आवश्यक है। पर्वों की वैज्ञानिकता को जान-बूझ कर उनसे हटा लिया गया है ।"

शशिशेखर जी ने उपरोक्त संपादकीय में परमावश्यक तथ्यों का उल्लेख करते हुये सामाजिक पर्वों में आज के संदर्भ में बदलाव किए जाने की आवश्यकता बतलाई है। जबकि वस्तुतः इन पर्वों को अपने मौलिक स्वरूप में वापिस लौटाने भर की ज़रूरत है। हमारे सभी पर्व 'देश-काल-जातिभेद' से परे समस्त पृथ्वीवासियों के हितार्थ थे उनको उसी रूप में मनाया जाये और व्यापार-जगत के लाभ में न चलाया जाये। बस जनता को यही समझाये जाने की आवश्यकता है जिसका व्यापारियों के एजेन्टों/पोंगापंथी ब्राह्मणों द्वारा प्रबल विरोध किया जाएगा जिस पर जन-समर्थन से विजय प्राप्त की जा सकती है। इस ब्लाग के माध्यम से इसी दिशा में एक छोटा सा प्रयास चल रहा है। 
अब जब शशिशेखर जी जैसे प्रबुद्ध संपादक गण भी लोक-प्रचलित पोंगा-पंथ का विरोध करने को आगे आ गए हैं तो हम उनका हार्दिक स्वागत करते हैं। 


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Sunday, September 15, 2013

भारत के राजनीतिक दल (भाग-1)---विजय राजबली माथुर

राजनीतिक दलों में चाहे जो दोष हों और चाहें अनेक विचारक उनसे घृणा करते हों,उनका लोकतन्त्र में होना अत्यावश्यक है। वे ही राजनीति को गतिशील बनाते हैं और वे ही निर्णयों पर पहुँचने की प्रक्रिया  के साधन हैं। सार्वजनिक मामलों के वे मुख्य प्रतिनिधि होते हैं। वे वास्तव में संसदात्मक शासन के भारी भवन के स्तम्भ हैं। एम दुवरगर ने अपनी पुस्तक 'पोलिटिकल पार्टीज़' में लिखा है-"संसदात्मक  ढंग के  लोकतन्त्र में तो उनकी आवश्यकता कहीं अधिक है। "

वस्तुतः राजनीतिक दल ही लोकतन्त्र का जीवन-रक्त होते हैं। उनके बिना लोकतन्त्र 'सर्वाधिकारवाद (Totalitarianism)'की ओर बढ़ता है।

विरोधी दल का महत्व:
फरवरी 1956 में नई दिल्ली में 'संसदात्मक लोकतन्त्र' पर एक सेमिनार आयोजित किया गया था जिसमें बोलते हुये भारत स्थित ब्रिटेन के हाई कमिश्नर मेलकाम मैकडोनाल्ड  ने कहा था-"इस प्रकार के लोकतन्त्र का निचोड़ इस बात में है कि कार्यपालिका की विधान मण्डल के भीतर और बाहर वर्ष के प्रतिदिन आलोचना की जा सके । ऐसा न होने पर सरकार लोकतंत्रात्मक न रहेगी ,वह शीघ्र ही मनचाही करने लगेगी और आगे चल कर अत्याचारी शासन का रूप ले लेगी। यह जो बात अपने हित में समझेगी वैसा ही दूसरों के हितों अथवा राष्ट्र हित का ध्यान न करते हुये करने लगेगी।' जनता का शासन जनता के लिए और जनता द्वारा 'महान सिद्धान्त का स्थान 'जनता का शासन 'कुछ थोड़े से व्यक्तियों द्वारा कुछ व्यक्तियों के लिए' का सिद्धान्त ले लेगा "

लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने अपने एक वक्तव्य में कभी इंगित किया था- "संसदीय पद्धति के भी अपने नियम हैं। उनमें सबसे अधिक आधारभूत नियम यह है कि यह पद्धति प्रभावशाली विरोध के बिना नहीं चल सकती। ....... अच्छे से अच्छे इरादे वाले व्यक्ति भी यदि उन पर सदैव ही विरोध का तेज प्रकाश न पड़ता रहे ,शक्ति पाने पर गलत मार्ग पर चले जाएँगे। यह भी प्रश्न नहीं है कि विरोधी दल सत्तारूढ़ दल से अच्छे हैं या बुरे। यह यथार्थ में बुरे हो सकते हैं। परंतु यही बात कि वह निरंतर 'सतर्कता' का प्रयोग करते हैं ,सत्तारूढ़ दल को ठीक मार्ग पर रखती है। "

आज़ादी से पहले कांग्रेस के झंडे के नीचे विदेशी शासन का अंत करने के लिए एक राष्ट्रीय आंदोलन चला था। लेकिन 1920 के बाद 'उदारवादी दल (Liberal  Party) ने एक संसादात्मक दल के रूप में कार्य किया और 1935 के भारत शासन अधिनियम के अंतर्गत प्रांतीय विधान मंडलों में कांग्रेस ने भी ऐसा ही किया था। शुरू में दो प्रकार के राजनीतिक दल थे:
1 )-वे जिंनका आधार राजनीतिक तथा आर्थिक कार्यक्रम हैं और,
2 )-वे जो सांप्रदायिक भावना व मनोवृत्ति से प्रेरित होकर राजनीति में घुस आए हैं।

सन 1953 में जवाहर लाल नेहरू ने कहा था (जिसका उल्लेख डी एन पामर ने अपनी पुस्तक 'इंडियन पोलिटिकल सिस्टम'के पृष्ठ-186 पर किया है)-"भारत में वर्तमान दलों को चार समूहों में रखा जा सकता है। कुछ दल ऐसे हैं जिनकी विचार धारा आर्थिक है (यथा-कांग्रेस,समाजवादी दल,साम्यवादी दल और उससे संबन्धित संगठन हैं)। कई सांप्रदायिक दल हैं जिनके नाम भिन्न-भिन्न हैं ,किन्तु वे सभी संकुचित सांप्रदायिक विचार धाराओं पर चल रहे हैं। और कई प्रांतीय अथवा प्रादेशिक दल हैं ,जिनके कार्यों का क्षेत्र उनके अपने प्रदेश हैं। "

1964 में अजित प्रसाद जैन की अध्यक्षता वाली कांग्रेस की एक संसदीय समिति ने सुझाव दिया था कि, सांप्रदायिक दलों के बनने पर रोक लगा देनी चाहिए।

12 फरवरी 1957 को 'इंडियन एक्स्प्रेस'में प्रकाशित एक समाचार में कहा गया था कि कुछ उच्च कांग्रेसी नेताओं ने विरोधी दलों पर यह आरोप लगाया कि वे विदेशों से आर्थिक सहायता पा रहे हैं। दूसरी ओर विरोधी दलों के नेताओं का यह आरोप था कि कांग्रेस को पूंजीवादी खूब धन दे रहे हैं।

कांग्रेस :
वस्तुतः 1857 की क्रांति की विफलता के बाद उसमे सक्रिय भाग ले चुके स्वामी दयानन्द सरस्वती ने 1875 में 'आर्यसमाज' की स्थापना जनता को संगठित कर स्वतन्त्रता प्राप्ति के उद्देश्य से की थी और उसकी प्रारम्भिक  शाखाएँ ब्रिटिश छावनी वाले  शहरों में ही खोली थीं।ब्रिटिश सरकार ने उनको Revolutionary Saint की संज्ञा दी थी और उनके प्रभाव को क्षीण करने हेतु रिटायर्ड ICS एलेन  आक्टावियन (AO) हयूम का प्रयोग लार्ड डफरिन ने इंडियन नेशनल कान्फरेंस के नेता सुरेन्द्र नाथ बनर्जी को मिला कर एक सेफ़्टी वाल्व संस्था 'इंडियन नेशनल कांग्रेस' की स्थापना WC(वोमेश चंद्र) बनर्जी की अध्यक्षता में करवाई थी।इसके शुरुआती नेता कहते थे-'हम नस-नस में राजभक्त हैं।'ये लोग मामूली सुविधाओं की ही मांग सरकार से करते थे। 

स्वामी दयानन्द सरस्वती के निर्देश पर आर्यसमाजी लोग इस कांग्रेस में प्रवेश कर गए जिनके प्रभाव से 1906 में कांग्रेस के कुछ नेता 'स्वराज्य' की मांग उठाने लगे। आगे जाकर गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन में आर्यसमाजियों ने बढ़ -चढ़ कर भाग लिया। ' कांग्रेस का इतिहास' के लेखक  डॉ पट्टाभि सीतारमइय्या ने लिखा है कि आज़ादी के आंदोलन में जेल जाने वाले सत्याग्रहियों में 85 प्रतिशत आर्यसमाजी थे। 

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद कांग्रेस 

1948 में 'सहकारी कामनवेल्थ' (Co-operative Commonwealth)का ध्येय अपनाया जिसे 1955 के अवदी अधिवेशन द्वारा 'समाजवादी ढंग के समाज'(Socialist Pattern of society) के लक्ष्य में परिवर्तित किया गया एवं जनवरी 1964 में 'लोकतान्त्रिक समाजवाद '(Democratic Socialism) का ध्येय अपनाया गया। 

नेहरू जी के बाद पूंजीवादी तबका निंरकुश होने लगा और कांग्रेस को ठेठ दक्षिण-पंथ की ओर धकेलने लगा अतः 1969 में राष्ट्रपति चुनाव की आड़ में 'कांग्रेस संगठन'(Congres-O) एवं 'सत्ता कांग्रेस' (Congres-R) के रूप में इसमें विभाजन हो गया। सत्ता कांग्रेस बाद में 'कांग्रेस- आई' अर्थात इन्दिरा कांग्रेस के रूप में जानी गई और संगठन कांग्रेस (जो कि मूल कांग्रेस थी ) का विलय 1977 में जनता पार्टी में हो गया । इस प्रकार स्वाधीनता आंदोलन वाली कांग्रेस का अब 'अस्तित्व' ही नहीं है और सोनिया जी की अध्यक्षता वाली कांग्रेस वस्तुतः 'कांग्रेस -आई' है। 

साम्यवादी दल : 

मूलतः 1924 में इस दल की नींव विदेश में रखी गई तथा दिसंबर 1925 में कानपुर में विधिवत स्थापना हुई। कांग्रेस में शामिल क्रांतिकारी आर्यसमाजी अब इस दल में प्रविष्ट हो गए एवं स्वाधीनता आंदोलन को तीव्र गति प्रदान की जाने लगी। 
(इसका विस्तृत वर्णन अगले  किसी अंक में )

समाजवादी दल :
1)-1930 में डॉ राम मनोहर लोहिया की प्रेरणा पर 'कांग्रेस समाजवादी दल'(Congres Sociolist party) की स्थापना का विचार मूल रूप से 'साम्यवादी दल' के प्रभाव को क्षीण करने हेतु आया जिसे 1934 में 'नासिक जेल' में अमल में लाया गया। डॉ लोहिया ने 'लोकतान्त्रिक समाजवाद' एवं 'सर्वाधिकारवादी साम्यवाद' के अंतर पर विशेष ज़ोर दिया। 
2)-आज़ादी के बाद आचार्य जे बी कृपलानी ने कांग्रेस से हट कर 'कृषक मजदूर प्रजा पार्टी' बना ली एवं 1952 के प्रथम आम चुनाव 'समाजवादी दल' के साथ मिल कर लड़े एवं लोकसभा के लिए कुल पड़े मतों का 10 .4 प्रतिशत प्राप्त करके 12 सांसदों को निर्वाचित करा लिया। सितंबर 1952 में दोनों दलों का विलय हो गया और इसे 'प्रजा सोशलिस्ट पार्टी '(प्रसोपा) के नाम से जाना गया। 

3)-जनवरी 1956 में हैदराबाद में डॉ लोहिया ने प्रसोपा से अलग 'समाजवादी पार्टी' की स्थापना कर ली थी। 

21 अक्तूबर 1959 को टाईम्स आफ इंडिया में बी जी वर्घीज ने लिखा था कि,'कांग्रेस और प्रसोपा को मिल कर संगठित हो जाना चाहिए जिससे 'प्रतिक्रियावादी' एवं 'साम्यवादी' तत्वों का संगठन अवश्य ही कमजोर होगा। '

4)-दिसंबर 1962 में उत्तर-प्रदेश विधानमंडल के 'समाजवादी दल' व 'प्रजा समाजवादी दल' ने मिल कर 'संयुक्त समाजवादी दल' बनाया उसके बाद राजस्थान में भी इसे दोहराया गया। 1964 में अशोक मेहता को जवाहर लाल नेहरू द्वारा 'प्रसोपा' से तोड़ लेने के बाद श्रीधर महादेव जोशी  और डॉ लोहिया ने मिल कर 'संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी' (संसोपा) का गठन किया। किन्तु कुछ ही समय बाद आचार्य कृपलानी फिर से 'प्रसोपा' के झंडे तले चले गए और इस प्रकार 'संसोपा''प्रसोपा'दो समाजवादी दल चलते रहे। 

1977 में ये सभी दल 'जनता पार्टी' में विलय कर समाप्त हो गए थे। 

समाजवादी जनता पार्टी : 

जनता पार्टी से अलग होकर पूर्व पी एम चंद्रशेखर ने 'सजपा'  का गठन कर लिया था जिसके उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव द्वारा अपने चचेरे भाई राम गोपाल सिंह यादव को राज्यसभा के लिए उनसे पूछे बगैर टिकट देने से वह रुष्ट हो गए थे। 
समाजवादी पार्टी : 
मुलायम सिंह ने अलग 'समाजवादी पार्टी' (सपा) का गठन कर लिया और कई बार उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई अब भी उनके पुत्र अखिलेश सपा की ओर से मुख्यमंत्री हैं। 
चंद्रशेखर जी के पुत्र नीरज शेखर ने अब 'सजपा' का विलय 'सपा' में कर लिया है। 
यह समाजवादी पार्टी सिर्फ एक उद्देश्य 'साम्यवादी दल' को क्षति पहुंचाने के मामले में 1930 वाली CSP के नक्शे-कदम चल रही है बाकी के डॉ लोहिया के उद्देश्य नाम लेने मात्र के लिए प्रयुक्त होते हैं।

स्वतंत्र पार्टी : 

अगस्त 1959 में स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ,के एम मुंशी,प्रोफेसर एन जी रंगा,मीनू मसानी और पीलू मोदी आदि द्वारा इस दल की स्थापना बड़े जमींदारों,पूँजीपतियों के हितार्थ की गई थी। 1977 में इस दल का  विलय जनता पार्टी में होने पर यह समाप्त हो गया है।


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Saturday, September 14, 2013

Revolt of the people ......... can only usher in a blooming future---Gurudas Dasgupta




It is sad day for the nation Mr. Narendra Modi has been nominated as the candidate of BJP for the post of Prime Minister. A man who had played on communal passions that led to unprecedented killings, loot and destruction of Gujarat, a man who always speaks on fundamentalism, who is close to the corporate world and has no eye for the distress of the masses has been set up. I have great faith in the wisdom of the Indian electorate who surely will not hand over the rein of the country to a man having such blemished black track record. While saying so it is also imperative to note that the UPA government and the Prime Minister and the would-be Prime Minister as has been talked about are totally non performing, corrupt and anti-people. India is in a crossfire. the country must find out a different social and political combination which will not only be secular but must be free from corruption and performance based to bring relief to the distressed humanities of the country suffering from inflation, unemployment, poverty and destitution. The shadow of corporate giants over Indian political life must be ended. However long may be the destination, it is only working for such a perspective that the country can get rid of such a non-performing governance and highly tainted fundamentalist political forces. it is the revolt of the people against these two principal political forces that can only usher in a blooming future.

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Wednesday, August 21, 2013

आज जब देश कम्युनिस्टो की ओर आशा भरी नजर से देख रहा है ,ये पीठ करके खड़े हो रहे हैं--रईस अहमद सिद्दीकी

  -कम्युनिस्ट आंदोलन -विफल क्यों?---मनीषा पांडे
Manisha Pandey's status.

एक पुरानी एफबी पोस्‍ट, जो अचानक रेलेवेंट हो उठी है -

21 साल की उम्र में जब मैंने पहली बार इलाहाबाद छोड़ा, तो शहर के क्रांतिकारियों ने मुझे एक तमगे से नवाजा था - कॅरियरिस्ट । मनीषा अपना कॅरियर बनाने जा रही है। बेशक, मैं अपनी जिंदगी, अपना कॅरियर बनाने ही जा रही थी। और क्यों न बनाऊं कॅरियर। मैं आपकी पार्टी मीटिंगों और कार्यक्रमों में जाती थी, इसका मतलब ये नहीं कि अपना पूरा जीवन समर्पित करने के मूड में थी। और आखिर वो कौन लोग थे और क्यों उन्हेंी मेरे कॅरियर बनाने से तकलीफ हो रही थी। व्हाेय।
जो लोग इस सुगंधित मुगालते में हैं कि पार्टी के भीतर सब सुंदर और आदर्श दुनिया होती है तो या तो वो अज्ञानी हैं या महामूर्ख।
जैसे समाज में गरीबों की और औरतों की कोई औकात नहीं होती, वो सबसे ज्या दा लात खाए हुए होते हैं, वही क्ला स और जेंडर गैप पार्टी के भीतर भी है। जैसे मेरे घर में खाना बनाने वाली औरत और मुझमें फर्क साफ नजर आता है, उसी तरह मेरे पापा की पार्टी के ऊंचे लीडरानों के बच्चोंन और मुझमें फर्क साफ नजर आता था।
बड़े होने के बाद मैंने कम से कम सौ बड़े पार्टी नेताओं से सुना कि एक बड़े मकसद के लिए अपना जीवन समर्पित कर दो। क्रांति का काम करना है तो नौकरी करने की क्याच जरूरत। मूंगफली का ठेला लगाकर भी जिया जा सकता है। पार्टी होलटाइमर बन जाओ।
पता है, इन बातों का सबसे रोचक पहलू क्याच था।
ये कहने वाले वो लोग थे जो खुद अच्छे पदों पर बैठे हुए थे। जिनके बच्चेग प्रेस की हुई यूनीफॉर्म पहनकर शहर के महंगे अंग्रेजी स्कू लों में पढ़ने जाते थे। जो बड़े होकर फोटोग्राफी का कोर्स करने पेरिस गए। जो अमेरिका से ऊंची डिग्रियां लेकर लौटे। जिन्हों ने कैंब्रिज और हार्वर्ड में पढ़ाई की। जिनके बच्चोंि के लिए पार्टी का काम सिर्फ एक फैशन की तरह था। कभी-कभी आ जाया करते थे।
पार्टी की कमान भी कौन संभालता था। जिसके गांव में 200 बीघा जमीन है, जिसे रोटी जुगाड़ने का टेंशन नहीं, जिसका परिवार से मजे से चल रहा है, वो पार्टी में डिसिजन मेकर बना हुआ है। और गरीब होलटाइमरों के बच्चों को ज्ञान दे रहा है कि होलटाइमर बन जाओ।
मेरे होलटाइमर न बनने की दो वजहें थीं। एक तो मैं गरीब थी, दूसरे लड़की थी। पार्टी के अंदर भी मुझे दोनों तरफ से जूते पड़ते। एंड आय एम सॉरी, मैं जूते खाने के लिए नहीं पैदा हुई।
यकीन मानिए, होलटाइमरी और समर्पण का सारा ज्ञान पार्टी वाले मामूली घरों के लाचार बच्चों को ही देते हैं। जिनकी उम्र निकल गई इसी आदर्श के चक्कलर में।
जब से दिल्ली आई हूं, पापा कई बार पूछ चुके हैं, "तुम प्रकाश करात से मिली।"
मैं कहती हूं, "नहीं। आय एम नॉट इंटरेस्‍टेड। आय एम नॉट इंटरेस्टेपड इन पार्टीवालाजएट
ऑल।"

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03-08-2013 

कुछ लोग जवानी के जोश में ईमानदारी, प्रगतिशीलता,धर्मनिरपेक्षता और कम्युनिज्म की बातें करते हैं .उम्र ढलने पर दकियानूसी बातें करने लगते है और घोर प्रतिक्रियावादी हो जाते हैं .मैं समझता हूँ वे कभी क्रान्तिकारी थे ही नहीं.ऐसे लोगो की हमारे देश में कमी नहीं है ,हाँ एक बात और अपनी जवानी के दिनों में इन्होंने धर्म और मज़हब की इतनी बुराई की ,,कि लोगो को लगा कि कम्युनिज्म का मतलब धर्म को डंडा मारो है और लोग कम्युनिज्म से दूर हो गये.कल भी ऐसे लोगो की कमी नहीं थी और आज भी भरमार है.
चीन में महज एक करोड़ डालर की रिश्वत लेने वाले रेल मंत्री को मौत की सजा सुनाई है|आप कहते है कि चीन ने तरक्की की है,क्या खाक तरक्की की है,तरक्की तो हमारे देश ने की है जहाँ एक अदना सा अस्पताल का कर्मचारी या फिर किसी कार्यालय का चपरासी हजारों करोड़ की चपत लगाने की क्षमता रखता है,मंत्री के तो कहने की क्या.मंत्री तो हमारे देश के है जो हजारों हजार करोड़ डकार जाते है और सांस भी नहीं लेते .शान से रहते है कोई उँगली उठाने की भी हिम्मत नहीं कर सकता.लानत है ऐसे विकास पर कि रेल मंत्री महज एक करोड़ की रिश्वत ले और मौत की सजा पाये.


  • Rajesh Tyagi लाल झंडे की आड़ में चीन ने एक ऐसे सैनिक पूंजीवाद की रचना कर ली है, जो भारत या अमेरिका के पूंजीपतियों के बस की बात नहीं है. यह लौह-राज्य मजदूरों किसानो के उस भयंकर दमन पर आधारित है जिसकी परिणति हम तिएनान्मेन चौक पर देख चुके हैं. मंत्री को सजा किसी जनपक्षीय उद्देश्य से नहीं, बल्कि पूंजीवाद के नियमों का उल्लंघन करने के लिए, चीनी लौह-पूंजीवाद की सुरक्षा के लिए दी गई है...
कांग्रेस तो देश की आजादी के लिये लड़ने वालों का एक समूह था ,जिसमें तमाम विचारधाराऑ के लोग शामिल थे.आजादी के बाद देश की सबसे बड़ी और अनुशासित राजनैतिक पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी थी ,फिर चूक कहाँ हुई कि कम्युनिस्ट आन्दोलन कमज़ोर हुआ.
 

Kalpesh Dobariya ये ज़रूरी मुद्दा उठाया है आपने , Rais जी , ये लोग धर्म को लेकर कुछ ज़्यादा ही हाइपर रहते है , और मूल शत्रु पूंजीवाद पर इनका ध्यान कभिकभार ही जाता है , फ़ेसबुक पे भी ये देख सकते है हम , भारत जैसे धर्मभीरू देश मे इन्ही लोगो की बदौलत मार्क्सवाद बदनाम है , बेशक ये क्रिया क्रांतिविरोधी है....आप Vijai RajBali Mathur का ब्लॉग क्रानतीस्वर देखिए , इस विषय पर उन्होने बहूत अच्छे लेख लिखे है
 
  • Rupesh Kumar Singh CPI ne 1947 ke bad se hi ek awsarwadi politics ka parichay diya aur congress se aar par ki larai kabhi nahi kiya ....telangana movement ko fail karne me CPI netaon ki bhi ek bari bhumika rahi....

  • Rais Ahmad Siddiqui सही फरमाया रूपेश सिंह जी आपने,काश उस वक्त कांग्रेस से आर पार की लड़ाई लड़ी होती तो आज देश की तस्वीर एकदम अलग होती|
  • Rupesh Kumar Singh Rais Ahmad Siddiqui ji, aaj bhi mukhydhara ki communist partiyon ne in sabse sabak nahi sikha hai, aaj bhi congress ke pichhe chalne ko utaru rahte hain.....inhi karano se ab logon ko communist party se vishwash uthta ja raha hai .....

  • Rais Ahmad Siddiqui रूपेश सिंह जी इन पार्टियों के अन्दर जो बुर्जुआ लोग घुसे बैठे है,वे आन्दोलन की धार कुंद कर रहे है .पार्टी कैडर आज भी ईमानदार है और किसी भी तरह के समझौते के खिलाफ है,आखिर कब तक साम्प्रदायिक पार्टियों के डर से कांग्रेस का साथ देंगे ये ,और कांग्रेस क्या कम साम्प्रदायिकता फैलाती है|
  • Rupesh Kumar Singh Rais Ahmad Siddiqui ji, in CPI-CPI(M) se ab india ke communist aandolan ko ummid bhi nahi rakhna chahiye, hame ek naya vikalp dena hoga....jan sangharsh- jan vikalp !

  • Rais Ahmad Siddiqui बिल्कुल सही फरमाया आपने,अगर कम्युनिस्ट आन्दोलन को इनके भरोसे छोड़ा गया तो और एक शताब्दी बीत जायेगी.आज जब देश कम्युनिस्टो की ओर आशा भरी नजर से देख रहा है ,ये पीठ करके खड़े हो रहे हैं|
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उपरोक्त फेसबुक स्टेटस यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि आज भी कम्युनिस्ट पार्टियां और वामपंथ जनता की नब्ज को पहचान कर चलने को तैयार नहीं हैं ,केवल कोरे 'नास्तिकवाद' के सहारे जनता को अपने पक्ष  में खड़ा नहीं किया जा सकता और जन-समर्थन के बगैर संसद में बहुमत कैसे हासिल किया जा सकता है। रूस में रक्तरंजित क्रान्ति के बाद स्थापित साम्यवादी शासन इसीलिए उखड़ गया कि वह 'धर्म' के विरुद्ध था। यह समझने की नितांत ज़रूरत है कि पोंगापंथ-ढोंग-पाखंड-आडंबर धर्म नहीं हैं। धर्म=सत्य,अहिंसा (मनसा -वाचा-कर्मणा),अस्तेय,अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य है। इसे ठुकरा कर आप 'साम्यवाद' नहीं स्थापित कर सकते। रूस में इसका पालन न होने के कारण ही साम्यवाद उखड़ा है। तो भारत में बेवजह की ज़िद्द क्यों?---विजय राजबली माथुर
 






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Sunday, August 11, 2013

स्वतन्त्रता आंदोलन मे युवा/छात्रों का योगदान(पुनर्प्रकाशन)---विजय राजबली माथुर


(Shaheed Smarak-Patna)
 1922 ई .मे गांधी जी द्वारा चौरी-चौरा कांड के नाम पर असहयोग आंदोलन वापिस लेने पर युवा/छात्र क्रान्ति की ओर मुड़े । क्रांतिकारी आंदोलन को चलाने और बम आदि बनाने हेतु काफी धन की आवश्यकता थी। अतः राम प्रसाद 'बिस्मिल'/चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व मे क्रांतिकारियों ने सरकारी खजाना कब्जे मे लेने की योजना बनाई। 09 अगस्त 1925 की रात्रि लखनऊ के 'काकोरी'रेलवे स्टेशन पर पेसेंजर गाड़ी के गार्ड से खजाने को हस्तगत किया गया। आज इस घटना को हुये 88 वर्ष पूर्ण हो गए हैं।
इस क्रांतिकारी घटना मे भाग लेने वाले स्वातंत्र्य योद्धाओं मे राम प्रसाद 'बिस्मिल',अशफाक़ उल्ला खान ,रोशन सिंह तथा राजेन्द्र सिंह लाहिड़ी को 17 एवं 19 दिसंबर 1927 को ब्रिटिश सरकार ने फांसी दे दी। बिस्मिल उस समय शाहजहाँपुर के मिशन स्कूल मे नौवी कक्षा के छात्र थे। वह पढ़ाई कम और आंदोलनों मे अधिक भाग लेते थे। गोरा ईसाई हेड मास्टर भी उनका बचाव करता था। एक बार जब वह कक्षा मे थे तो ब्रिटिश पुलिस उन्हें पकड़ने पहुँच गई। उस हेड मास्टर ने पुलिस को उलझा कर कक्षा अध्यापक से राम प्रसाद''बिस्मिल' को रेजिस्टर  मे गैर-हाजिर करवाया और भागने का संदेश दिया। बिस्मिल दूसरी मंजिल से खिड़की के सहारे कूद कर भाग गए और पुलिस चेकिंग करके बैरंग लौट गई। लेकिन खजाना कांड मे फांसी की सजा ने हमारा यह होनहार क्रांतिकारी छीन लिया। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क मे पुलिस से घिरने पर चंद्रशेखर 'आजाद'ने भी खुद कोअपनी ही पिस्तौल की गोली से  शहीद कर लिया। 

 होनहार युवा/छात्रों ने आजादी की मशाल को थामे रखा जब 08 अगस्त 1942 को गांधी जी के आह्वान पर 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का प्रस्ताव पास किया गया था। लगभग सभी बड़े नेता ब्रिटिश सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिए गए थे। इस दशा मे सम्पूर्ण आंदोलन युवाओं और छात्रों द्वारा संचालित किया गया था। 11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय से यूनियन जेक को उतार कर तिरंगा छात्रों ने फहरा दिया था किन्तु सभी सातों छात्र ब्रिटिश पुलिस की गोलियों से शहीद हो गए थे। उनकी स्मृति मे वहाँ उनकी प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं। इस अभियान का नेतृत्व राजेन्द्र सिंह जी ने किया था और सबसे आगे उन्हीं की मूर्ती है। इस अभियान के संबंध मे श्री अजय प्रकाश ने एक लेख  लिखा था जो 18 जनवरी 1987 को प्रकाशित -'पटना हाईस्कूल भूतपूर्व छात्र संघ' की 'स्मारिका' मे छ्पा था ,आप भी उसकी स्कैन कापी देख सकते हैं-
(बड़े अक्षरों मे पढ़ने हेतु डबल क्लिक करें) 


उसी स्मारिका मे छपा यह लेख आज भी छात्रों/युवाओं के महत्व को रेखांकित करता है-

'लोकसंघर्ष' मे प्रकाशित महेश राठी साहब के एक महत्वपूर्ण लेख द्वारा बताया गया है कि,"आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन भारतीय स्वतन्त्रता आंदोलन का बेहद गौरवमयी और प्रेरणापरद हिस्सा है। ए .आई .एस .एफ .भारतीय स्वाधीनता संग्राम का वह भाग है जिसके माध्यम से देश के छात्र समुदाय ने आजादी की लड़ाई मे अपने संघर्षों और योगदान की अविस्मरणीय कथा लिखी"। 


राठी साहब ने बताया है कि,भारतीय छात्र आंदोलन का संगठित रूप 1828 मे सबसे पहले कलकत्ता मे 'एकेडेमिक एसोसिएशन'के नाम से दिखाई दिया जिसकी स्थापना एक पुर्तगाली छात्र विवियन डेरोजियो द्वारा की गई । 1840 से 1860 के मध्य 'यंग बंगाल मूवमेंट'के रूप मे दूसरा संगठित प्रयास हुआ। 1848 मे दादा भाई नौरोजी की पहल पर मुंबई मे 'स्टूडेंट्स लिटरेरी और सायींटिफ़िक सोसाइटी '
की स्थापना हुयी। कलकत्ता के आनंद मोहन बॉस और सुरेन्द्र नाथ बनर्जी द्वारा 1876 मे 'स्टूडेंट्स एसोसिएशन'की स्थापना हुयी जिसने 1885 मे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना मे महती भूमिका अदा की। 16 अक्तूबर 1905 मे बंगाल विभाजन के बाद छात्रों एवं युवाओं ने जबर्दस्त आंदोलन चलाया जिसमे आम जनता का भी सहयोग रहा।


1906 मे राजेन्द्र प्रसाद जी (जो पहले राष्ट्रपति बने थे) की पहल पर 'बिहारी स्टूडेंट्स सेंट्रल एसोसिएशन'की स्थापना हुयी जिसने बनारस से कलकत्ता तक अपनी शाखाएँ खोली और 1908 मे बिहार मे इसी संगठन के बल पर कांग्रेस की स्थापना हुयी। श्रीमती एनी बेसेंट ने 1908 मे 'सेंट्रल हिन्दू कालेज'नामक पत्रिका मे एक अखिल भारतीय छात्र संगठन बनाने का विचार प्रस्तुत किया।


25-12-1920 को नागपूर मे आल इंडिया कालेज स्टूडेंट्स कान्फरेंस का आरंभ हुआ जिसकी स्वागत समिति के अध्यक्ष आर .जे .गोखले थे। इसका उदघाटन लाला लाजपत राय ने किया था। 1920 से 1935 तक देश मे बड़े स्तर पर विद्यालयों  और महा विद्यालयों की स्थापना हुयी। आजादी के संघर्ष मे छात्रों की महत्वपूर्ण भूमिका दिखाई दे रही थी।


26 मार्च 1931 को कराची मे जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता मे एक अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमे देश भर से 700 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। 23 जनवरी 1936 को यू .पी .विश्वविद्यालय छात्र फेडरेशन ने अपनी कार्यकारिणी मे अखिल भारतीय छात्र सम्मेलन बुलाने का निर्णय लिया। पी .एन .भार्गव की अध्यक्षता मे एक स्वागत समिति का गठन किया गया जिसने देश के सभी छात्र संगठनों तथा कांग्रेस,सोशलिस्ट पार्टी और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी सहित सभी राजनीतिक धड़ों से संपर्क बनाया।


12-13 अगस्त 1936 को लखनऊ मे -सर गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल मे A I S F का स्थापना सम्मेलन सम्पन्न हुआ जिसमे 936 प्रतिनिधियों ने भाग लिया जिसमे से 200 स्थानीय और शेष 11 प्रांतीय संगठनों के प्रतिनिधि थे। सम्मेलन मे महात्मा गांधी,रवीन्द्रनाथ टैगोर,सर तेज बहादुर सप्रू और श्री निवास शास्त्री सरीखे गणमान्य व्यक्तियों के बधाई संदेश भी प्राप्त हुये। सम्मेलन का उदघाटन जवाहर लाल नेहरू ने किया।


A I S F के स्थापना सम्मेलन मे पी .एन .भार्गव पहले महा सचिव निर्वाचित हुये । 'स्टूडेंट्स ट्रिब्यून'इसका पहला आधिकारिक मुख पत्र था। 22-11-1936 को लाहौर मे दूसरा सम्मेलन हुआ जिसकी अध्यक्षता शरत चंद बॉस ने की और उसमे 150 लोगों ने भाग लिया। इसमे छात्रों का एक मांग पत्र भी तैयार हुआ।



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