Tuesday, May 17, 2011

फांसी और आतंकवाद

२६ नवम्बर २००८ को मुम्बई पर हुए आतंकवादी हमले में जीवित बचे एकमात्र आतंकवादी अजमल कसाब को अदालत द्वारा फांसी की सजा सूना दी गई है.कानूनी प्रक्रिया में जो भी समय लगे और जब भी कसाब को फांसी पर चढ़ाया जाए;उसका वास्तविक लाभ तभी मिल सकता है जब आतंवाद पूर्णतया :समाप्त हो जाए.प्रसिद्द कूट्नीतिग्य जी.पार्थ सारथी का अभिमत है कि कसाब को फांसी देने के बाद आतंकवाद को समाप्त नहीं किया जा सकता है.क्योंकि असली मुलजिम कहीं और सुरक्षित बचे रहेंगे.उनसे असहमत नहीं हुआ जा सकता है.यही सच्चाई भी है.आतंकवाद कैसे समाप्त होगा इस पर चर्चा करने स पहले यह जांच करना जरूरी है कि आतंकवाद है क्या?

भय फैला कर दहशत उत्पन्न कर किसी व्यक्ति ,समाज या देश को विविध प्रकार से संकट में फंसाए रखने की कला (आर्ट )ही आतंक है.और जो व्यक्ति,संस्था या देश इस कला को अपना कर अपना उद्देश्य पूरा करना चाहते हैं -वे सभी आतंकवादी हैं.आतंकवाद न कोई जाती है और न ही कोई धर्म या सम्प्रदाय .यह तो साम्राज्यवाद का हित-पोषक है.अतः आतंकवाद को साम्राज्यवाद की संतान मानना और तदनरूप इसके साथ व्यवहार करना भी उचित होगा.

यूं.एस.ए.एक प्रमुख साम्राज्यवादी देश है.हालांकि इसका जन्म साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष में सफलता द्वारा ही हुआ था.पूर्ववर्ती साम्राज्यवादी देशों में प्रमुख देश ब्रिटेन,फ्रांस,जर्मनी और इटली आज अमेरिकी साम्राज्यवाद के सहयोगी हैं.ब्रिटेन के साम्राज्य से स्वतन्त्र सभी देशों में चाहे वे बर्मा हो,भारत,पाकिस्तान या श्रीलंका.सभी आतंकवाद से त्रस्त देश हैं.सभी देशों की प्रगति व उन्नत्ति इन आतंकवादी गतिविधियों से बाधित हो रही है क्योंकि साम्राज्यवादी देश कभी नहीं चाहते हैं कि ये देश स्वतन्त्र रूप से विकसित हो सकें.साम्राज्यवादी देश एक और तो आतंकवाद को प्रश्रय देते हैं और दूसरी  ओर आतंकवाद को नष्ट करने के नाम पर इन देशों की सरकारों को अपने चंगुल में फंसाये रखने हेतु सहायता भी देते हैं.


6 comments:

मनोज कुमार said...

आतंकवाद न कोई जाती है और न ही कोई धर्म या सम्प्रदाय .यह तो साम्राज्यवाद का हित-पोषक है.
बिल्कुल सही कहा है आपने। ये स्वार्थी और विघटनकारी तत्त्व हैं।

krati said...

हर बार जब भी कोई आतंकवादी मारा जाता है या उसे फांसी की सजा होती है तो हम ये सोच कर संतोष कर लेते हैं की अब आतंकवाद ख़तम हो जायेगा , पर हर बार चन्द दिनों के विराम के बाद अचानक हुआ कोई आतंकी हमला जैसे हमें फिर उस दिवास्वप्न से जगा देता है ,'कि नहीं अभी समूल नाश नहीं हुआ है , अभी भी कुछ है जिसे हम देख नहीं पा रहे हैं'| आतंकवाद तभी समाप्त होगा जब समस्या को जड़ से ख़तम किया जायेगा| अन्यथा हम सिर्फ़ मूक दर्शक की तरह तमाशा देखते रहेंगे, और वो गंदे ज़ेहन के लोग अपना काम करते रहेंगे |

डॉ टी एस दराल said...

आतंकवाद को बहुत अच्छी तरह से परिभाषित किया है आपने ।
आखिरी पंक्तियों में सच्चाई छुपी है ।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

साम्राज्यवादी देश एक और तो आतंकवाद को प्रश्रय देते हैं और दूसरी ओर आतंकवाद को नष्ट करने के नाम पर इन देशों की सरकारों को अपने चंगुल में फंसाये रखने हेतु सहायता भी देते हैं.

सहमत हूँ आपसे ...तभी तो ये विघटनकारी तत्व फल फूल रहे हैं....

Patali-The-Village said...

बिल्कुल सही कहा है आपने। ये स्वार्थी और विघटनकारी तत्त्व हैं।

PRO. PAWAN K MISHRA said...

वर्तमान समय में आवश्यकता है सहज ढंग से चलने वाली व्यवस्था का जिसमे शिखंडी तत्व की मौजूदगी न हो.