Friday, July 15, 2011

लखनऊ वासियों के समक्ष ऐतिहासिक अवसर

सन १९३६ ई. में लखनऊ में आजादी के आंदोलन को गति प्रदान करने हेतु तीन संगठनों की स्थापना हुई थी.उनमें से दो के ७५ वर्ष पूर्ण हो चुके हैं और तीसरा संगठन भी अगस्त माह में ७५ वर्ष पूर्ण करने जा रहा है और इस उपलक्ष्य में उसका स्थापना समारोह भी लखनऊ में ही होने जा रहा है.१९३६ में वे लोग भाग्यशाली थे जिन्होंने इन संगठनों की स्थापना होते देखी और उसमें भाग लिया.उसी प्रकार अब वे लोग भी भाग्यशाली होंगें जो लखनऊ में हो रहे इस समारोह में भाग लेंगें या अपना योगदान देंगें.लखनऊ वासियों के लिए यह एक ऐतिहासिक और अमूल्य अवसर है कि वे इस कार्यक्रम में भाग लेकर अपने को धन्य कर सकते हैं.

१९३६ ई. की अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ

स्पेन में जेनरल फ्रैंको के नेतृत्व में फासीवादियों ने बर्बर नर-संहार का तांडव रचा.जर्मनी और इटली में हिटलर और मुसोलिनी का ख़तरा आ गया.इन परिस्थितियों में १९३६ ई. में 'रोम्या रोला','इडम फास्टर','आंद्रे मालेरा','टामसमान ',वोल्ड फ्रैंक ''मैक्सिम गोर्की',हेनरी बार्बूज'आदि के आह्वान पर पेरिस में 'विश्व लेखक अधिवेंशन' नामक सम्मलेन हुआ.

भारतीय परिस्थितियाँ

इसी काल-खंड में भारत में चल रहे आजादी के आंदोलन को किसानों,लेखकों एवं छात्रों के शोषण-उत्पीडन का सामना करना पड़ रहा था.१९२०-३० के दशकों में कई किसान सम्मलेन तथा संगठन बने. स्वाधीनता आंदोलन का समर्थन करने के कारण १९३०-३४ के बीच ३८४ पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा 'वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट 'द्वारा  रोक लगाई गई .

विश्व-व्यापी मंदी,ब्रिटिश शासकों की नृशंसता,जमींदारों,जागीरदारों का उत्पीडन और शोषण चरम पर था.कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर की पुस्तिका 'रूस से चिट्ठी'पर अंग्रेज सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया.साहित्यकार 'सत्य जीवन वर्मा'ने 'हिन्दी लेखक संघ'बनाया और सितम्बर १९३४ में इसकी सदस्यता केलिए अपील की.'मुंशी प्रेम चंद'और रामचंद्र टंडन ने भी 'भारतीय साहित्य परिषद' और 'हिन्दुस्तानी एकेडमी' नामक सहकारी प्रकाशन संस्थान लेखकों के सहयोग से स्थापित किये जिनका उद्देश्य अभिव्यक्ति की रक्षा करना था.

१९३५ ई.में लन्दन स्थित क्रांतिकारी युवा भारतीय लेखकों ने प्रगतिशील लेखक संघ स्थापित करने के उद्देश्य से एक मसौदा तैयार किया.इस अभियान को लखनऊ के सज्जाद जहीर के अलावा मुल्क राज आनंद,प्रमोद सेनगुप्त,अहमद अली,हीरेंन  मुखर्जी,ज्योति घोष,मह्म्दुज्जफर,डा. मोहमद दीन तासीर  आदि ने भी बल दिया."हंस"पत्रिका की और से मुंशी प्रेमचंद ने भी पूरा समर्थन किया.

"प्रगतिशील लेखक संघ" की स्थापना

सामाजिक रूढीवाद के विरुद्ध और आजादी के संघर्ष  हेतु लखनऊ के 'रफा-ए-आम' हाल में ०९ अप्रैल १९३६ से एक सम्मलेन हुआ जिसमें भारतीय भाषाओं के विश्व-स्तरीय २५० लेखकों ने भाग लिया.इनमें प्रमुख थे-
सुमित्रा नंदन पन्त,यशपाल,भीष्म साहनी,केदारनाथ अग्रवाल,उपेन्द्र नाथ अश्क,राम वृक्ष बेनीपुरी,बाल कृष्ण शर्मा नवीन,शमशेर बहादुर सिंह,नागार्जुन,रामधारी सिंह दिनकर,राहुल सांस्कृत्यायन,राम प्रसाद घिल्डियाल पहाड़ी,प्रकाश चन्द्र गुप्त,अमृत राय ,भैरव प्रसाद गुप्त,क्रिशन चंदर,राजेन्द्र सिंह बेदी,कुर्रतुल एन "हैदर",इस्मत चुगताई,देवेन्द्र सत्यार्थी,मखदूम,वामिक जौनपुरी,गोपाल सिंह नेपाली,सुदर्शन शील,विजन भाषचार्य,कैफी आजमी,सरदार जाफरी,मजरूह सुलतान पूरी,बलराज साहनी,सआदत हसन मंटो,डा.राम विलास शर्मा,शिवदान सिंह चौहान,ख्वाजा अहमद अब्बास,साहिर लुध्यानवी,हसरत मोहानी आदि.

१० अप्रैल १९३६ ई.को सम्मलेन में संगठन बन गया जिसके महामंत्री बने सज्जाद जहीर और अध्यक्ष मुंशी प्रेम चंद.इस संगठन के घोषणा पत्र में कहा गया था-"भारतीय समाज में बड़े-बड़े परिवर्तन हो रहे हैं.पुराने विचारोनौर विश्वासों की जड़ें हिलती जा रही हैं और एक नए समाज का जन्म हो रहा है.भारतीय लेखकों का धर्म है कि वे भारतीय जीवन में पैदा होने वाली 'क्रान्ति'को शब्द और रूप दें और राष्ट्र को उन्नति के मार्ग पर चलने में सहायक हों."  मुंशी प्रेम चंद ने तब जो अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा था वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है-

"हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा,जिसमें उच्च चिंतन हो,स्वाधीनता का भाव हो,सौंदर्य का सार हो,सृजन की आत्मा हो,जीवन की सच्चाइयों का प्रकाश हो जो हमें गति,संघर्ष और बेचैनी पैदा करे सुलाये नहीं क्यों अब और सोना मृत्यु का लक्षण है"

१९५३ ई.तक यह संगठन भारतीय साहित्यकारों के मध्य छाया रहा.'इप्टा' पहले इसी की एक शाखा था जो अब अलग संगठन है.राजनीतिक कारणों से इससे कुछ और संगठन अब अलग चल रहे हैं परन्तु भारत की आजादी के संघर्ष में इसके योगदान को विस्मृत नहीं किया जा सकता.

"किसान सभा "की स्थापना

छिट-पुट रूप से किसान आंदोलन को गति देने हेतु संगठन बनते रहे.१८ जून १९३३ को बिहटा में 'बिहार प्रदेश किसान सभा'का पहला सम्मलेन हुआ और दूसरा सम्मलेन १९३५ ई. में हाजीपुर में हुआ.१५ जनवरी १९३६ को मेरठ (यूं.पी.)में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के अखिल भारतीय सम्मलेन में किसान नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने एक अखिल भारतीय किसान संगठन बनाने का निश्चय किया और प्रो.एन.जी.रंगा तथा जय प्रकाश नारायण के संयोजकत्व में एक समिति गठित कर दी.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अखिल भारतीय अधिवेशन के मध्य ११ अप्रैल १९३६ ई. को लखनऊ में अखिल भारतीय किसान सम्मलेन आयोजित हुआ और स्वामी सहजानंद की अध्यक्षता में 'अखिल भारतीय किसान कांग्रेस'की स्थापना की गई ,कुछ ने इसे अखिल भारतीय किसान संघ भी कहा और आगे चल कर १४ जुलाई १९३७ को गया(बिहार)में  इसका नाम "अखिल भारतीय किसान सभा"कर दिया गया.

स्थापना सम्मलेन में बिहार ,बंगाल,आंध्र,तामिलनाडू,मलाबार,मध्य प्रांत,पंजाब ,गुजरात,दिल्ली और यूं.पी.का प्रतिनिधित्व रहा. सम्मलेन को संबोधित करने वालों में प्रमुख नेता थे-सोहन सिंह जोश,राम मनोहर लोहिया,भाग लेने वालों में और प्रमुख लोग थे-इंदु लाल याग्निक,के.एम्.अशरफ,एन.जी.रंग,जय प्रकाश नारायण आदि.

"आल इंडिया स्टुडेंट्स फेडरेशन"- A.I.S.F.की स्थापना

१९३६ ई. में विश्व तथा अपने देश में भी परिस्थितियाँ बड़ी विकट थीं.विदेशी हुकूमत का जुल्म सबसे ज्यादा युवा वर्ग विशेषकर छात्रों को भुगतना पड़ रहा था.अतः स्वीधीनता संग्राम के अग्रणी नेताओं ने लेखकों तथा किसानों के समान ही छात्रों हेतु भी एक अखिल भारतीय संगठन बनाने हेतु लखनऊ में अमीनाबाद के 'गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल'में १२ अगस्त १९३६ को छात्रों का एक सम्मलेन बुलाया.ए .आई .एस.एफ.के प्रथम महामंत्री लखनऊ के ही प्रेम नारायण भार्गव चुने गए ,हजरत गंज में उनका भार्गव प्रेस आज भी कार्य रत है.अध्यक्ष पं.जवाहर लाल नेहरू चुने गए थे और मुख्य अतिथि थे मो.अली जिन्नाह.महात्मा गांधी तथा रवीन्द्र नाथ टैगोर ने अपने सन्देश भेज कर इसे आशीर्वाद दिया था.क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह,राजगुरु,सुखदेव भी इसके सदस्य रहे हैं.

ए.आई.एस.एफ ने आजादी की लड़ाई में सक्रीय रूप से भाग लिया था.आज हमारे सामने फिर वैसी ही समस्याएं मुंह बाएं सामने हैं.पूंजीवादी जनतंत्र की खर्चीली धोखाधड़ी ,लूटतंत्र का दमन जारी है.पंचायती राज की कपट पूर्ण सरकारी नौटंकी चल रही है.साम्राज्यवाद और पूंजीवाद की यह घुटन ,यह सडांध अब ज़िंदा आदमी के बर्दाश्त के काबिल नहीं है.

यूरोप में छात्र -युवा उठ खड़े हुए हैं.नवंबर २०१० में शिक्षा मदों में कटौती और फीसों को बढाए जाने की सरकार की योजना के खिलाफ ब्रिटेन के स्कूलों और विश्वविद्यालयों के छात्र बार-बार सड़कों पर उतरे और अपने गुस्से का भरपूर प्रदर्शन किया.सत्ताधारी कंजर्वेटिव पार्टी के दफ्तर पर हजारों छात्रों ने हमला बोल दिया था.२४ नवंबर २०१० के प्रदर्शनों में पूरे ब्रिटेन में १ लाख ३० हजार छात्रों ने भाग लिया.त्रैफल्गार चौराहे पर भारी तोड़-फोड की.

इससे पहले फ्रांस,जर्मनी,स्पेन,पुर्तगाल और यूनान में भी छात्र शिक्षा में किये जाने वाले सुधारों के खिलाफ झुझारू प्रदर्शन कर चुके थे.उनके यहाँ पूंजीवादी सरकारों ने अपने बजट घाटे को घटाने के नाम पर सार्वजनिक व्यय में कमी करना शुरू कर दिया है.ब्रिटेन,फ्रांस समेत यूरोपीय देशों की जनता अपनी हुकूमत से पूंछ रही है -सट्टेबाजी में लिप्त बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के जुए की कीमत हम क्यों अदा करें?

१९३० की मंदी के बाद अमेरिका में हाल में आई मंदी से वहाँ काफी झटका लगा है और अभी फिर लगने वाला है.हमारे देश में पढाई दिन दूनी रात चौगुनी मंहगी होती जा रही है.अभी बी.एड.कालेजों में यूं.पी.में फीस रु.५१०००/-निर्धारित कर दी गई है.हमारे यहाँ आज छात्र आंदोलन शून्य है.

आगामी १२ और १३ अगस्त को ए.आई.एस.एफ.के ७५ वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में पहले दिन का समारोह उसी ऐतिहासिक गंगा प्रसाद मेमोरियल हाल में होने जा रहा है.इस सम्बन्ध में विगत १० जुलाई को एक आवश्यक बैठक जिसकी अध्यक्षता प्रो.डा.रमेश दीक्षित ने की थी द्वारा आगामी सम्मलेन हेतु एक 'स्वागत समिति'का गठन किया गया है जिसकी महामंत्री सुश्री निधि चौहान बनायी गई हैं.

यह लखनऊ वासियों के लिए गौरव की बात है कि उन्हें फिर एक बार ऐतिहासिक क्षण की मेजबानी मिली है.उनका कर्तव्य है कि ए.आई.एस.एफ के सम्मलेन को सफल बनाने हेतु अपना योगदान दें.संगठन मांग कर रहा है कि सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.)का ६ प्रतिशत तथा राज्य बजट का १० प्रतिशत भाग शिक्षा पर खर्च किया जाए.इससे अधिकाधिक मुफ्त शिक्षा का प्रबंध किया जा सकता है.शिक्षा के बाजारीकरण पर रोक लगाने तथा सारे देश में 'एक सामान शिक्षा प्रणाली'लागू करना भी प्रमुख मांग है.छात्रों की सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने तथा युवाओं की राज्नीतिक्भागीदारी बढ़ाना भी संगठन का उद्देश्य है.

आगामी पीढ़ियों का भविष्य संवारने हेतु लखनऊ में हो रहे इस ऐतिहासिक कार्यक्रम को सफल बनाना प्रत्येक लखनऊ वासी का धर्म होना चाहिए.


(संपर्क स्थल :- कार्यालय स्वागत समिति,ए.आई.एस.एफ.,२२ -कैसर बाग,लखनऊ)

4 comments:

अमरनाथ 'मधुर' said...

बहुत महत्वपूर्ण जानकारी दी है | आलेख सहेजकर रखने योग्य है | अनुरोध है कि आगे भी इसी प्रकार ऐतिहासिक जानकारी देते रहें |

Dr (Miss) Sharad Singh said...

बहुत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी .....

Maheshwari kaneri said...

बहुत ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक जानकारी देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद...आभार..

मनोज कुमार said...

आप तो ज्ञान का खजाना हैं। कई ऐसे तथ्यों से साबका पड़ा जो कभी सुना ही नहीं था।