Sunday, July 31, 2011

मुंशी प्रेमचंद -जयंती पर स्मरण



लमही (वाराणासी)मे 31 जूलाई 1880 को जन्मे स्व.धनपत राय श्रीवास्तव जो प्रारम्भ मे धनपत राय के नाम से उर्दू मे लिखा करते थे ;मुंशी प्रेमचंद के नाम से हिन्दी साहित्य मे अमर कथाकार हैं । स्व .अमृत राय और स्व .धरम वीर भारती (धर्मयुग के सम्पादक भी रहे) नामक उनके दो पुत्रों ने भी हिन्दी साहित्य मे अपना अमिट स्थान बनाया है । प्रेमचंद जी ने 'सेवा सदन','रंग भूमि','गोदान','गबन'आदि कई उपन्यास और सैंकड़ों कहानियाँ लिखी हैं । आपकी रचनाओं मे भारत के दरिद्र किसानों का सजीव चित्रण किया गया है । भाषा आपकी सरल और प्रवाह बद्ध है ।

1969 -71 मे बी .ए.के कोर्स मे गबन उपन्यास मेरठ कालेज ,मेरठ मे पढ़ा था । स्वाधीनता आंदोलन मे आमजन की भागीदारी का बड़ा ही मर्मांतक विवेचन प्रेम चंद जी ने इसमे प्रस्तुत किया है । शुरुआत  मे 'जालपा' नामक बच्ची के गहनों के प्रति लगाव से उपन्यास चला है और उसके इसी लगाव के कारण  बाद मे उसके पति को फरार होकर कलकत्ता जाना तथा पुलिस के चंगुल मे फंस कर क्रांतिकारियों के विरुद्ध गवाही देना पड़ा है । परंतु जालपा ने अपने पति रमानाथ के पथ-भ्रष्ट होने पर उसकी आँखें खोलने के लिए उसकी गवाही पर फांसी की सजा प्राप्त दिनेश की वृदधा माँ,पत्नी,बच्चों की खूब सेवाकी और उसे घेरने हेतु लगाई गई वेश्या  'ज़ोहरा' का भी हृदय परिवर्तन कर दिया । अन्ततः जालपा का त्याग और मेहनत रंग लायी एवं दिनेश तथा रमानाथ दोनों ही बरी हो गए । प्रेमचंद जी ने सफाई पक्ष के वकील की जुबानी 'गबन ' मे जो चित्रण किया है ,उसका अवलोकन करें -

"फिर रमानाथ के पुलिस के पंजे मे फँसने,फर्जी मुखबिर बनने और शहादत देने का जिक्र करके उसने कहा-

अब रमानाथ के जीवन मे एक नया परिवर्तन होता है ,ऐसा परिवर्तन जो एक विलासप्रिय,पद लोलुप युवक को धर्मनिष्ठ और कर्तव्यशील बना देता है । उसकी पत्नी जालपा,जिसे देवी कहा जाय तो अतिशयोक्ति न होगी,उसकी तलाश मे प्रयाग से यहाँ आती है और यहाँ जब उसे मालूम होता है कि रमा एक मुकदमे मे पुलिस का मुखबिर हो गया है,तो वह छिप कर उससे मिलने आती है । फाटक पर संतरी पहरा दे रहा है । जालपा को पति से मिलने मे सफलता नही होती । तब वह एक पत्र लिख कर उसके सामने फेंक देती है और देवीदीन  के घर चली जाती है । रमा यह पत्र पढ़ता है और उसकी आँखों के सामने से पर्दा हट जाता है । वह छिप कर जालपा के पास आता है । जालपा उससे सारा वृतांत कह सुनाती है और उससे अपना बयान वापस लेने पर ज़ोर देती है । रमा पहले शंकाएँ करता है,पर बाद को राजी हो जाता है और बंगले पर लौट आता है । वहाँ वह पुलिस अफसरों से साफ कह देता है,कि मैं अपना बयान बादल दूंगा । .............................

........ फिर जालपा देवी ने फांसी की सजा पाने वाले मुलजिम दिनेश के बाल-बच्चों का पालन-पोषण करने का निश्चय किया । इधर-उधर से चन्दे मांग-मांग कर वह उनके लिए जिंदगी की जरूरतें पूरी करती थी ,उसके घर का काम-काज अपने हाथों करती थी,उसके बच्चों को खेलाने को ले जाती थी ।

एक दिन रमानाथ मोटर पर सैर करता हुआ जालपा को सिर पर एक पानी का मटका रखे देख लेता है । उसकी आत्म-मर्यादा जाग उठती है । ज़ोहरा को  पुलिस कर्मचारियों ने रमानाथ के मनोरन्जन के लिए नियुक्त कर दिया है । ज़ोहरा युवक की मानसिक वेदना देख कर द्रवित हो जाती है और वह जालपा का पूरा समाचार लाने के इरादे से चलती है । दिनेश के घर उसकी जालपा से भेंट होती है । जालपा का त्याग,सेवा और साधना देख कर इस  वेश्या का हृदय इतना प्रभावित हो जाता है ,कि वह अपने जीवन पर लज्जित हो जाती है और दोनों मे बहनापा हो जाता है । वह एक सप्ताह के बाद जाकर रमा से सारा वृतांत कह सुनाती है । वह उसी वक्त वहाँ से चल पड़ता है और जालपा से दो-चार बातें करके जज के बंगले पर चला जाता है । "

प्रेमचंद जी ने रमानाथ के बीच मे पुलिस के दबाव मे आने और लज्जा वश सकुचाने का वर्णन इस प्रकार किया है जो गौर फरमाने लायक है-

"इस लज्जा का सामना करने की उसमे सामर्थ्य न थी । लज्जा ने सदैव वीरों को परास्त किया है । जो काल से भी नहीं डरते ,वे भी लज्जा के सामने खड़े होने की हिम्मत नहीं करते । आग मे कूद जाना,तलवार के सामने खड़ा हो जाना,इसकी अपेक्षा कहीं सहज है । लाज की रक्षा ही के लिए बड़े-बड़े राज्य मिट गए हैं,रक्त की नदियां बह गई हैं,प्राणों की होली खेल डाली गई है । इसी लाज ने आज रमा के पग भी पीछे हटा दिये । शायद जेल की सजा से वह इतना भयभीत न होता । "

यह आजादी के संघर्ष का जमाना है जिसका वर्णन प्रेमचंद जी ने किया है आज आजादी के 64 वर्ष होते -होते शर्म-ओ-हया हवा हो गई हैं । आज बेशर्मी का नग्न नृत्य चल रहा है । आज प्रेमचंद जी की आत्मा को बेहद कष्ट हो रहा होगा । 'गबन' मे उन्होने जज से भी कहलाया है -

"मुआमला केवल यह है ,कि एक युवक ने अपनी प्राण -रक्षा के लिए पुलिस का आश्रय लिया और जब उसे मालूम हो गया कि जिस भय से वह पुलिसका आश्रय ले रहा है वह सर्वथा निर्मूल है,तो उसने अपना बयान वापस ले लिया । ............... वह उन पेशेवर गवाहों मे नहीं है जो स्वार्थ के लिए निरपराधियों को फँसाने से भी नहीं हिचकते । अगर ऐसी बात न होती तो ,वह अपनी पत्नी के आग्रह से बयान बदलने पर कभी राजी न होता । यह ठीक है कि पहली अदालत के बाद ही उसे मालूम हो गया था,कि उस पर गबन का कोई मुकदमा नहीं है और जज की अदालत मे वह अपने बयान को वापस ले सकता था । उस वक्त उसने यह इच्छा प्रकट भी अवश्य की;पर पुलिस की धमकियों ने फिर उस पर विजय पायी । पुलिस का बदनामी से बचने के लिए इस अवसर पर उसे धमकियाँ देना स्वभाविक है ,क्योंकि पुलिस को मुलजिमों के अपराधी होने के विषय मे कोई संदेह न था । रमानाथ धमकियों मे आ गया,यह उसकी दुर्बलता अवश्य है;पर परिस्थिति को देखते हुये क्षम्यहै । इसलिए मैं रमानाथ को बारी करता हूँ"।

'गबन'उपन्यास के माध्यम से प्रेमचंद जी ने उस समय देशवासियों को आजादी के आंदोलन मे भाग लेने के लिए प्रेरित किया था । जालपा द्वारा हृदय परिवर्तन हेतु गांधीवादी दृष्टिकोण को अपनाया है । परंतु मौलिक रूप से प्रेमचंद जी बामपंथी रुझान वाले प्रगतिशील सर्जक थे । 1935 ई .मे जब लंदन के युवा भारतीय संस्कृति कर्मियों द्वारा प्रगतिशील लेखक संघ स्थापित करने के उद्देश्य से एक मसौदा तैयार हुआ तो "हंस" की ओर से प्रेमचंद जी ने समर्थन किया था ।

लखनऊ के रफा -ए-आम हाल मे जब 10 अप्रैल 1936 को 'प्रगतिशील लेखक संघ ' की स्थापना हुयी तो प्रेमचंद जी ने उसकी अध्यक्षता की थी जिसमे सज्जाद जहीर साहब (नादिरा बब्बर के पिताजी) महामंत्री चुने गए थे । प्रेमचंद जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण मे कहा था-"हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा,जिसमें उच्च चिंतन हो ,स्वाधीनता का भाव हो,सौंदर्य का सार हो,सृजन की आत्मा हो,जीवन की सच्चाईयों का प्रकाश हो -जो हमे गति,संघर्ष और बेचैनी पैदा करे सुलाये नहीं क्यों अब और सोना मृत्यु का लक्षण है"। 

मैंने केवल 'गबन'से कुछ उद्धरण दिये हैं सारा  का सारा प्रेमचंद साहित्य देश-प्रेम और आजादी के संघर्ष को धार देता हुआ है । 'नशा'कहानी मे भी उन्होने एक छात्र के माध्यम से गांधी जी के आंदोलन का समर्थन किया है । 'बौड़म ' कहानी मे उन्होने सांप्रदायिक सौहर्द के साथ-साथ स्वाधीनता संघर्ष की हिमायत की है एवं उसी प्रकार 'कर्तव्य बल' कहानी मे भी । 'पंचपरमेश्वर' सामाजिक सम्बन्धों और न्याय की कहानी है ।

आज जो उपन्यास अथवा कहानियाँ लोकप्रिय हो रहे हैं वे सब प्रेमचंद जी की सोच के विपरीत हैं। ब्लाग जगत का लेखन भी लगभग उस धारणा के विपरीत है । जो ब्लागर्स वैसा दृष्टिकोण अपना रहे हैं उन्हें आलोचना का शिकार बनाया जा रहा है । साहित्य क्या है?और कैसा होना चाहिए ?इस संबंध मे भी प्रेमचंद जी की अध्यक्षता वाले प्र.ले .स .ने अपने घोषणा पत्र मे बताया था -

"भारतीय समाज मे बड़े-बड़े परिवर्तन हो रहे हैं । पुराने विचारों और विश्वासों की जड़ें हिलती जा रही हैं और एक नए समाज का जन्म हो रहा है । भारतीय लेखकों का धर्म है कि वे भारतीय जीवन मे पैदा होने वाली 'क्रान्ति' को शब्द और रूप दें और राष्ट्र को उन्नति के मार्ग पर चलाने मे सहायक हों"। 

प्रेमचंद जी तो 08 अक्तूबर 1936 को यह दुनिया छोड़ गए । उनके अवसान को भी 75 वर्ष पूर्ण होने जा रहे हैं । उनके विचार आज भी देश,समाज ,परिवार और विश्व के सभी आबाल-वृद्ध,नर-नारी के लिए अनुकरणीय एवं ग्राह्य हैं । 

5 comments:

Kunwar Kusumesh said...

मुंशी प्रेमचंद जी की १३१ वीं जयंती पर आपकी पोस्ट पढ़कर अच्छा लगा.

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

एक महान रचनाकार के व्यक्तित्व कृतित्व को बयां करती इस उम्दा पोस्ट के लिए आभार

अमरनाथ 'मधुर' said...

प्रेमचंद पर समयोचित लेखन के लिए बधाई |

मनोज कुमार said...

प्रेमचन्द ने मध्य और निर्बल वर्ग की नब्ज पर हाथ रखा और उनकी समस्याओं, जैसे विधवा विवाह, अनमेल विवाह, वेश्यावृत्ति, आर्थिक विषमता, पूँजीवादी शोषण, महाजनी, किसानों की समस्या तथा मद्यपान आदि को अपनी कहानी का कथानक बनाया। तत्कालीन परिस्थितियों में शायद ही कोई ऐसा विषय छूटा हो जिसे प्रेमचन्द ने अपनी रचनाओं में जीवंत न किया हो।
उस महान आत्मा को शत-शत नमन!

डॉ टी एस दराल said...

प्रेमचंद जी के जीवन पर डाला प्रकाश और गबन के अंश पढ़कर अच्छा लगा .
सुन्दर प्रस्तुति .