Wednesday, July 27, 2011

'जन-हित में'

यों तो पहले से ही 'क्रान्तिस्वर' एवं 'विद्रोही स्व-स्वर में' लिखने का उद्देश्य "सर्वजन-हिताय ,स्वान्तः सुखाय" रहा है और 'कलम और कुदाल' पर पूर्व प्रकाशित लेख या सार्वजनिक हित के अन्य लोगों के विचार देता रहा हूँ फिर एक अलग ब्लॉग के माध्यम की क्या जरूरत आ पडी ,यह कौतूहल सब को हो सकता है. वस्तुतः काफी समय से मेरा विचार जन-हितकारी एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित ऋषि-मुनियों द्वारा रचित स्तुतियाँ एवं प्रार्थनाएं ब्लॉग पर सार्वजानिक करने का था. विलम्ब इसलिए हुआ कि,'गर्व से ...',आर.एस.एस.ब्लागर्स ने अभद्र रूप से मेरे लेखों की आलोचना की तो इस सुविधा का लाभ वे भी क्यों उठायें?लेकिन व्यक्तिगत रूप से तीन ऐसे  ब्लागर्स भी  स्वास्थ्य संबंधी स्तुति हासिल कर चुके  हैं और उसके बाद उन्होंने एहसान फरामोशी की है. यदि मैं इन स्तुतियों को सार्वजनिक रूप से दे देता हूँ तो अन्य अनेक ब्लागर्स लाभ उठा सकते हैं और अपने परिचितों को भी लाभ दिला सकते हैं. कबीर दास जी का कथन है-

काल्ह करे सो आज कर ,आज करे सो अब.        
पल में परलय  होयगी ,बहुरी करेगो  कब?

जब एक बार विचार बना लिया तो उस पर अमल करना ही उचित है. हालांकि हमारे बहन-बहनोई इस बात के खिलाफ हैं कि मैं सब के भले की सोचता हूँ. उनके अनुसार मेरे भले की कौन सोचता है?उनकी ही बात पर ध्यान दें तो सबसे पहले वे लोग खुद  ही उस श्रेणी में आते हैं.उन्हें तमाम स्तुतियाँ प्रिंट करा कर दे दीं हैं और पहले भी लिख कर दे चुके हैं.भांजियों (उनकी बेटियों को भी स्तुतियाँ दी हैं), हमारे तमाम विरोधियों और हमसे  शत्रुवत व्यवहार  करने वालों के प्रति उनका न केवल झुकाव है बल्कि घनिष्ठ एवं मधुर सम्बन्ध भी हैं.हमारी संस्कृति में -'सर्वे भवन्तु सुखिनः ' का अधिक महत्व रहा है.हमारे नाना जी और पिताजी ने तमाम लोगों को बगैर किसी लाभ की उम्मीद किये मदद की है,हमारे बाबाजी भी गाँव में लोगों को अपने पास से बायोकेमिक दवाएं देते थे.पूनम के माता जी -पिताजी भी लोगों की निस्वार्थ मदद करते रहे हैं अतः उन्हें भी कोई ऐतराज नहीं है और यशवन्त तो फाईनल फिनिशिंग करता ही है ,उसे भी मदद करने का शौक है. उसी परम्परा को जारी रखते हुए इस नये ब्लॉग के माध्यम से आज से मैं स्तुतियों को सार्वजानिक करना शुरू कर रहा हूँ. 'इदं न मम' ये मेरा नहीं है मैं तो अर्जित ज्ञान को कंजूस का धन नहीं बनाना चाहता इसलिए सब के भले के लिए उजागर कर रहा हूँ .जो न लेना चाहें लाभ न लें यह उनके विवेक और इच्छा पर है. 

परन्तु जो इनसे लाभ उठाना चाहें वे कुछ बातों को ध्यान रखें कि यह कोई पूजा-पाठ नहीं है. किसी आडम्बर या वितंड की जरूरत नहीं है. धुप-दीप,जल,किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है,केवल औषद्धि के रूप में इसका प्रयोग करें.यह भी ध्यान रखें वाचन के समय मुख पश्चिम की और रहे तथा अपने खुद के और धरती के बीच कोई इन्सुलेशन अवश्य   रहे.अर्थात लकड़ी के पट्टे,ऊनी वस्त्र या पोलीथिन शीट पर बैठें.ऐसा न करके नंगे पाँव या सीधी धरती पर बैठने से ऊर्जा-एनर्जी 'अर्थ'हो जायेगी और कोई लाभ नहीं प्राप्त होगा उससे अच्छा है कि करें ही नहीं.

किसी के भी बहकावे में किसी भी दशा में स्तुति पाठ के समय कोई भी मूर्ती या चित्र कभी भी न रखें ,यदि आपने ढोंग से जोड़ा और परिणाम शून्य रहा तो स्तुति या प्रस्तुतकर्ता का कोई दोष न होगा आप खुद ब खुद जिम्मेदार होंगें..

आज प्रथम दिवस 'गणेश -स्तुति 'से ही शुरुआत कर रहे हैं.'गणेश'=ज्ञान और मोक्ष का नियंता 'गणेश' है .कहावत है कि चिता मरनेके बाद जलाती है और  चिंता जीते जी जलाती है.तो आज 'चिंता और रोग' के निवारणार्थ यह 'गणेश' स्तुति प्रस्तुत है।
(http://janhitme-vijai-mathur.blogspot.com/2011/07/blog-post.html)

3 comments:

Dr (Miss) Sharad Singh said...

सारगर्भित आलेख...

मनोज कुमार said...

आप जो कर रहे हैं हमें तो अच्छा लगता है, प्रेरक लगता है।
बहुत सुंदर पोस्ट।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

आपके ज्ञानवर्धक विचारों का सदैव स्वागत है....सुंदर पोस्ट