Tuesday, May 15, 2012

भारतीय संसद


दोनों कटिंग-हिंदुस्तान-लखनऊ-29/03/2012 

अभी 13 मई को भारतीय संसद के 60 वर्ष पूर्ण करने के जश्न काफी धूम-धाम से मनाए गए हैं जबकि हाल ही मे संसदीय लोकतन्त्र और भारतीय संसद पर खौफनाक हमले भी खूब हुये हैं जैसा उपरोक्त स्कैन कापियों से स्पष्ट भी हो रहा है। 1969-71 मे मेरठ कालेज मे बी ए पढ़ते समय अपने प्रो .कैलाश चंद्र गुप्त जी द्वारा बताए गए ये शब्द मुझे आज भी ज्यों के त्यों याद हैं ,"संसद भवन की नींव बहुत गहरी और मजबूत है और उतना ही मजबूत है हमारा संसदीय लोकतन्त्र "। हालांकि प्रो .गुप्ता खुद 'जनसंघ' से संबन्धित थे और अक्सर प्रो .बलराज मधोक को 'राजनीतिक चिंतक'बताते थे किन्तु उनकी रूस मे बनी  'अदृश्य स्याही' के जरिये इंदिरा जी के चुनाव जीतने की बात को उन्होने  हमारी कक्षा मे भ्रामक और असत्य भी कहा था। उनका निजी विचार था कि, संविधान के अनुसार संसद काफी शक्तिशाली है और उस पर किसी भी प्रकार का आघात उसे क्षति नहीं पहुंचा सकेगा। उन्होने मेरठ कालेज मे सम्पन्न एक 'छात्र संसद' का भी कई बार ज़िक्र किया था जिसे देखने तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सरदार हुकुम सिंह जी भी आए थे। यह कार्यक्रम मेरे कालेज ज्वाइन करने से बहुत पहले हुआ था। उन्होने यह भी बताया था कि जिन सतपाल मालिक,पूर्व अध्यक्ष छात्र संघ को प्राचार्य डॉ भट्टाचार्य ने कालेज मे दाखिला देने पर रोक लगा रखी है वह उसी वर्ष कालेज मे दाखिल हुये थे और उन्होने 'राज नारायण' की भूमिका अदा की थी जिसे सरदार हुकुम सिंह जी ने बहुत सराहा था क्योंकि वह राजनारायण जी को प्रत्यक्ष लोकसभा मे वैसा करते देखते रहे थे। तब यह सतपाल मलिक जी मधु लिंमये और राज नारायण वाली संसोपा (संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी) और उसके युवा संगठन -समाजवादी युवजन सभा मे सक्रिय थे ,जो अब भाजपा के बड़े नेता हैं)।

भारतीय संसद ने इंदिरा जी की 'एमर्जेंसी' को भी देखा और उनके कटु आलोचक एवं उन्हें अपदस्थ करने वाले (जिन्हें प्रो . गुप्ता पढ़ाते समय 'राजनीतिक दार्शनिक'-Political Philosphar बताते थे) मोरार जी देसाई ने स्पष्ट कहा था कि इंदिरा जी तानाशाह नहीं थीं। लेकिन आजकल अन्ना/रामदेव आंदोलन के नाम पर RSS/NGOs/देशी-विदेशी कारपोरेट घराने 'भारतीय संसद' और संसदीय लोकतन्त्र के लिए गंभीर खतरा बन कर उभरे हैं। नकसलवादी( जो संसदीय लोकतन्त्र को नहीं मानते और अमेरिकी धन के बल पर संसद के लिए चुनौती बने हुये हैं )से कम खतरनाक नहीं हैं ये एन जी ओ आंदोलनकारी। अन्ना/रामदेव का एक खतरनाक नारा है-सभी राजनीतिज्ञ भ्रष्ट हैं',इन लोगों ने आम जनता को राजनीति से विरक्त रखने का एक सुनियोजित षड्यंत्र चला रखा है। साम्राज्यवादियों के ये पिट्ठू अच्छी तरह जानते हैं कि जनता को राजनीति से दूर कर दो तो जनतंत्र स्वतः ही विफल हो जाएगा। 

दुर्भाग्य यह है कि पढे-लिखे और खुद को खुदा समझने वाले इंटरनेटी वीर भी इस नापाक अभियान मे शामिल हैं। ये वे लोग हैं जो खाते-पीते,सम्पन्न परिवारों से आते हैं और सरकारी नौकरी मे ऊंचे-ऊंचे पदों पर आसीन है या उद्योग-धंधे,व्यापार मे लगे हुये हैं। ये लोग कभी भी अपना 'मत'-Vote देने नहीं जाते और एयर कंडीशंड कमरों मे बैठ कर राजनीति और राजनीतिज्ञों को कोसते रहते हैं। इस प्रकार के लोगों ने आज भारतीय संसद के सम्मुख गंभीर चुनौती संसदीय लोकतन्त्र को नष्ट करने की उपस्थित कर रखी हैं।लेकिन भारत की जनता इन सरमायेदारों और सकारी नौकरशाहों के  नापाक मंसूबों को भलीभाँति समझती है  और उन्हें करारी शिकस्त देती रहती है। अतः भारत की जनता अपने संसदीय जनतंत्र और संसद की रक्षा करने मे सदैव सफल रहेगी।