Monday, October 25, 2010

धर्म और विज्ञान

आज कल एक बहस आम तौर पर सुनी ,देखी और पढ़ी जा रही है कि,धर्म और विज्ञान में तालमेल होना चाहिए कि विज्ञान को धर्म के अधीन होना चाहिए कि ,धर्म को विज्ञान की राह का रोड़ा नहीं बनना चाहिए .यह सब इसलिए है कि धर्म और विज्ञान के गलत अर्थ निकले जा रहे हैं .वस्तुतः विज्ञान धर्म भी है और धर्म विज्ञान भी है -दोनों में कहीं कोई विरोध नहीं है .जो विषमता है वह व्याख्या करने वालों के स्वार्थ का खेल है .
धर्म -वह है जो शरीर को धारण करता है .
विज्ञान -किसी भी विषय के नियमबद्ध एवं क्रम -बद्ध अध्धयन को विज्ञान कहते हैं .
लेकिन लोग धर्म का अर्थ उपासना विधि से और विज्ञान का अर्थ प्रयोगशाला में सिद्ध किये जाने वाले तथ्यों से ले रहे हैं -यही झगड़ा है .
अध्यात्म -का भी गलत अर्थ निकला जा रहा है .दरअसल अध्यात्म =अध्य +आत्म है जिसका अर्थ हुआ आत्मा का अध्ययन .अपनी -२ आत्मा का अध्ययन करना ही अध्यात्म है;लेकिन ऐसा कोई नहीं करता है और दूसरों को अधार्मिक एवं गैर आध्यात्मिक बड़ी जल्दी करार दिया जाता है .
आस्तिक -जिसका अपने ऊपर विशवास है वह आस्तिक है और जिसका अपने ऊपर विशवास नहीं है वह नास्तिक है .स्वामी विवेकानंद ने ऐसी ही मीमांसा की है .यही तर्क -सगंत है .
 आत्मा -  आत्मा  का क्षय होता है अर्थात वजन भी होता है -गायत्री परिवार की पुस्तकों में आत्मा का वजन २० ग्रा.बताया गया है .दूसरों को मूर्ख बनाने वाली बात इससे ज्यादा कोई दूसरी हो ही नहीं सकती .
    वस्तुतः आत्मा -अदृश्य ,अजर ,अमर और अक्षय है .स्वामी दयानंद सरस्वती ने आत्मा को फ्लुइड (fluid ) बताया है .आत्मा जिस शरीर में प्रवेश करता है उसी का आकार ग्रहण कर लेता है .
  आत्मा और शरीर का सम्बन्ध अंधे व लंगड़े जैसा है .शरीर अँधा होता तथा आत्मा लंगड़ा .एक के बिना दूसरा कार्य नहीं कर सकता .शरीर तीन प्रकार के होते हैं :-
१ .स्थूल शरीर -जो भौतिक पदार्थों से बनता है और नश्वर है .
२ .कारण शरीर -जो आत्मा के साथ प्रेरक के रूप में चलता है.(किसी भी प्रकार की विकृती पहले कारण शरीर में होती है बाद में स्थूल शरीर में नजर आती है .चिकित्सक स्थूल शरीर की स्थिति के अनुसार इलाज करता है .वैज्ञानिक आधार वाला ज्योत्षी कारण शरीर के विकारों का पहले ही उपचार बता देता है .यदि तभी निराकरण कर लें तो स्थूल शरीर की विकृति और उसके इलाज से बच सकते हैं .)
३ .सूक्ष्म शरीर -भी आत्मा के साथ -२ चलता है और सूक्ष्म रूप से सभी कार्यों का लेखा -जोखा रखता है जो गुप्त रूप से चित्त पर अंकित होता रहता है -उसी को चित्रगुप्त कहते हैं .

लेकिन प्रचलन में चित्रगुप्त की एक अवैज्ञानिक कहानी चलती है;लोग उसी पाखण्ड को सही मानते हैं ..

पाखण्ड में आत्मा को परमात्मा का अंश कहा जाता है .यदि यह माना जाये तो सभी
कार्यों का दायित्व परमात्मा पर है और सेना ,पुलिस,न्याय तन्त्र कुछ रखने की जरूरत नहीं है .

आत्मा और परमात्मा सखा हैं और स्वतन्त्र हैं .

जल में शीतलता का गुण है तो वह समुद्र के जल में भी होगा और उससे अलग एक बूँद में भी .

 अग्नि में दग्धता का गुण है तो भट्ठी में भी होगा और एक चिंगारी में भी .

इसलिए अगर आत्मा -परमात्मा का अंश होता तो सत -चित -आनंद होता.लेकिन ऐसा तो नहीं है अतः सिध्द होता है की आत्मा -परमात्मा का अंश नहीं है उससे स्वतन्त्र है .

आत्मा इस संसार में कर्म करने के लिए स्वतन्त्र है परन्तु फल भोगने हेतु परमात्मा के अधीन है .यह सारा संसार एक परीक्षालय है .यहाँ निरंतर परीक्षाएँ चल रही हैं .परमात्मा एक निरीक्षक के रूप में देख कर चुप रहता है परन्तु एक परीक्षक के रूप में कर्मों का फल देता है .

कर्म तीन प्रकार के होते हैं :-
१ .सद्कर्म ,२ .दुष्कर्म ,३ . अकर्म .

सद्कर्म का श्रेष्ठ ,दुष्कर्म का बुरा फल मिलता ही है .अकर्म वह कर्म है जो   फ़र्ज़ ,ड्यूटी ,कर्तव्य  किया   जाना चाहिए था ;किया नहीं गया .उदाहरण के लिए सड़क पर कराहते हुए व्यक्ति को देख कर कोई चिकित्सक इसलिए छोड़ कर चला जाये कि कानूनी जाल -जंजाल में कौन फंसे तो समाज और कानून की निगाह में अपराध न होते हुए भी परमात्मा के विधान में वह चिकित्सक दंड का भागीदार होगा .चक्रधर की चक्कलस में अशोक जी ने गाडी छूटने का जो उल्लेख किया है वह उनके ऐसे ही अकर्म का दंड था .

चाहे कोई  माने या न माने प्रकृती के नियमानुसार (according  to laws  of  nature ) इस जनम में जो कर्म फल अवशेष रह जाते हैं वे आगामी जनम का प्रारब्ध (भाग्य )बन जाते हैं .ज्योतिष में हम जनम -पत्र के माध्यम से इसे ज्ञात कर लेते हैं .मनुष्य अपने कर्मों के द्वारा अच्छे को बुरा और बुरे को अच्छा बना सकता है .जिस प्रकार धूप की तीव्रता और वर्षा से बचने के लिए छाता प्रयोग में लाया जाता है उसी प्रकार ज्योतिषीय उपायों द्वारा अनिष्ट से बचाव किया जाता है .परन्तु यदि ये उपाए वैज्ञानिक न हो कर आस्था और विश्वास का नाम लेकर ढोंग व पाखण्ड के हों तो व्यक्ति को कोई लाभ प्राप्त नहीं होता और ज्योतिष पर नाहक लांछन लगा दिया जाता है .गलती ढोगी बताने वाले की होती है ,ज्योतिष विज्ञान की नहीं .मानव जीवन को सुन्दर ,सुखद और समृद्ध बनाने वाला विज्ञान ही ज्योतिष है ;बाक़ी सब ढोंग व पाखण्ड ही है जिसका सहारा लेकर पोंगापंथी जनता को उलटे उस्तरे से मूढ़ रहे हैं .

रियूमर स्पिच्युटेड सोसाईटी  के लोग ढोंग व पाखण्ड को धर्म का नाम देकर नफरत और नुक्सान करने पर आमादा हैं .देश टूटा तो टूटा फिर टूटे तो टूटे ढोंगियों का तथाकथित धार्मिक वितंडावाद दरअसल साम्रज्य्वादियीं के हित साधन के लिए है .भारत में धर्मोन्माद फ़ैलाने के लिए फोर्ड फौन्डेशन ने बाकायदा चंदा दिया था और निर्लज्जता पूर्वक अपनी बेलेंस- शीट में दिखाया था .लेकिन फिर भी हमारे प्रबुध्द जनों की आँखें नहीं खुलती हैं .एक तरफ खुद को राष्ट्रवादी कहने वाले वस्तुतः साम्राज्यवादियों को खुश करने के काम करते हैं ;चाहे वे जिस छेत्र में हों वहीँ गड़बड़ी करते हैं और दूसरों को बेवकूफ समझते हैं .हिटलर का साथी डा. गोयबल्स कहता था कि एक झूठ को सौ बार बोला जाये तो वह सच हो जाता है ,उसके भारतीय अनुयायी आत्मा को परमात्मा का अंश बताते नहीं थकते और उसका क्षरण होना भी बताते हैं .

आधुनिक विज्ञान अभी अपनी शैशवावस्था में है .अभी तक ब्रहम्मांड का कुल ४(चार ) प्रतिशत ही ज्ञान उपलब्ध हो पाया है उस पर भी भीषण झगड़ा है कि आधुनिक विज्ञान श्रेष्ठ है ."ब्रह्म वर्चसी"-पोस्ट में इस पर पहले ही प्रकाश डाला है .आधुनिक विज्ञान की नयी खोजें हमारे प्राचीन निष्कर्षों को सही ही सिध्द करने वाली है ,विरोधी नहीं हैं .जो लोग वैज्ञानिक खोजों को धर्म विरोधी बता रहे हैं वे दरअसल धर्म के मर्म को ही नहीं समझते .विज्ञान और धर्म एक दूसरे के पूरक हैं .(science  and dharam are complementary  and  supplementary  to each  other )   उदाहरणार्थ अभी जूलाई में वैज्ञानिकों की नयी खोज सामने आयी है कि पहले मुर्गी आयी फिर अंडा .इस पर तमाम जीव वैज्ञानिकों में ही मतभेद हो गए और इस खोज की आलोचना होने लगी .धैर्य पूर्वक ध्यान देन तो यह नयी खोज हमारी प्राचीन अवधारणा को पुष्ट करने वाली है कि ,सृष्टी का प्रारम्भ युवा शक्ति से हुआ है .मानव सृष्टी अफ्रीका ,यूरोप और तृवृष्टी (तिब्बत )में एक साथ युवा पुरुष और युवा स्त्री के कई जोड़ों के साथ प्रारम्भ हुयी और आज की मानव जाति उन्ही की संताने हैं .इसी प्रकार सभी प्राणी -पशु -पक्षी आदि की प्रारंभिक सृष्टी युवा रूप में हुयी है ---इसी तथ्य को यह नवीनतम खोज प्रमाणित करती है .कहाँ हुआ विज्ञान और धर्म में टकराव ? विज्ञान ने तो धार्मिक अवधारणा की पुश्टी ही की है .विज्ञान जहाँ पर छोड़ता है धर्म वहीं  से शुरू होता है .science  can reply  what and how but it can not reply why the dharam comes to stand the reply why ?
  
लेकिन धर्म का अर्थ ढोंग ,पाखण्ड ,आस्था या विश्वास कतई नहीं है .ये चीजें धर्म का तत्व न होकर  शोषण का माध्यम हैं .जो मानव द्वारा मानव के शोषण का साम्राज्यवादी हथियार हैं .जो लोग इन्हें धर्म बता रहे हैं वे पूरी तरह अधार्मिक हैं और मानव उत्थान से उनका कोई ताल्लुक नहीं है .धर्म और विज्ञान में कहीं कोई टकराव नहीं है . 
        




(इस ब्लॉग पर प्रस्तुत आलेख लोगों की सहमति -असहमति पर निर्भर नहीं हैं -यहाँ ढोंग -पाखण्ड का प्रबल विरोध और उनका यथा शीघ्र उन्मूलन करने की अपेक्षा की जाती है)
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Comments on facebook :
15-04-2016 
16-04-2016 

6 comments:

सुज्ञ said...

इस सार से पूर्णतः सहमत कि "धर्म और विज्ञान में कहीं कोई टकराव नहिं है।"

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

सचमुच धर्म और विज्ञान में कोई टकराव नहीं है.... यह मैं भी मानती हूँ.... विश्लेषणात्मक पोस्ट

arvind said...

aapse sahamat...vigyan our dharm me kahi virodh nahi hai....dono ekaarthak hain.

डॉ टी एस दराल said...

ज्ञान की बातें , आधुनिक रूप में । सहेज कर रखने योग्य लेख । बहुत बढ़िया ।

Vijai Mathur said...

सुग्य्जी ,मोनिकाजी ,अरविन्दजी ,दराल सा .
धन्यवाद एवं आभार आप सब की सद्भावनाओं के लिए
यहाँ एक टिपणी के रूप में एक पूरा का पूरा पोंगापंथी आलेख किन्ही बेनामी सा .ने लिख डाला था उसे हटा दिया गया है .यह कालम सिर्फ इस आलेख से सम्बंधित विचारों के लिए है न कि किसी दुसरे आलेख के लिए ,सबह वह सा . मेरे दुसरे ब्लाग विद्रोही स्वर पैर अपनी पोस्ट डाल गए थे वहां से हटाया तो वाही आलेख फिर यहाँ लगाया था .पूर्वाग्रही पोंगापंथी इसे ही विध्वंस करते हैं ,उन्हें जनता को मूर्ख जो बनाना है .

Dr.J.P.Tiwari said...

माथुर साहब!
भक्ति सिद्धांत और मुक्ति सिद्धांत से भी इस द्वैतवाद की पुष्टि होती है क्योंकि साधक, सालोक्य, सार्ष्टि, सारुप्य और सायुज्ज्य की स्थिति में भी ऐक्य अथवा भी साम्य नहीं है. ईश्वर लोक में जाकर भी, उसके जैसा ऐश्वर्यशाली बनकर भी, उसके जैसा जैसा रूपवान-गुणवान बनकर भी, सायुज्ज्य रूप में विलीन होकर भी, किसी भी परिस्थिति में सर्जक और विध्वंशक जैसी शक्ति - गुण- विद्यासम्पन्न नहीं हो सकता. यह अंतर सतत और सदा के लिए राह जाएगा.........और सत्य यही है भी. ,